सोमवार, 12 मार्च 2018

मनुष्य होने के अर्थ की तलाश: सुभाष राय की कविताएं

( प्रताप दीक्षित जाने-माने कथाकार हैं। कथा-लेखन में उल्लेखनीय कार्य के लिए उन्हें हिंदी संस्थान ने साहित्य भूषण के सम्मान से नवाजा है। मेरी कविताओं पर उन्होंने एक टिप्पणी लिखी, जो आदरणीय जय प्रकाश धूमकेतु के संपादन में निकलने वाली प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका अभिनव कदम में प्रकाशित हुई। वह टिप्पणी यथावत प्रस्तुत है )
      

                          प्रताप दीक्षित

     कविता मनुष्य की आदिम रागात्मक वृत्ति की समानान्तर यात्रा है। जिसका मूल उत्स  प्रत्येक काल में कवि के भाव जगत की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति रही है। अन्तर्मन के प्रतिबिम्बों से लेकर सामाजिक-राजनीतिक चेतना तक की यात्रा में कविता के संदर्भ बहुत बदल गए प्रतीत होते हैं। आज कविता एक विशिष्ट अवधारणा के रूप में दिखाई देती है। जिसमें समय के सरोकार, विषमता के विरुद्ध असहमति के भाव के साथ क्षरित संवेदना की तलाश भी इसके केन्द्र में है। यद्यपि कवि का भाव जगत समकालीन चेतना से पृथक कभी नहीं रहा। यहां तक कि रीतिकाल की कविता में भी। वस्तुतः किसी कवि की अन्तःचेतना की भित्ति वह समाज और परिवेश ही होता है जिसमें वह रह रहा होता है। 
     संप्रति, समय केवल सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि से ही कठिन नहीं है बल्कि संकट साहित्य पर, विशेष रूप से कविता पर, मंडराता तो प्रतीत होता ही है।  साहित्य की भूमिका अपने समाज के समानान्तर होती है। जब प्रायोजजित ढंग से प्रचारित किया जाता हो कि कविता अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है, तब समय-परिवेश के प्रति कविता की तटस्थता या कवि का मौन संवेदनशीलता के क्षरण की आहट होती है। वस्तुतः कविता जीवन और जीवन कविता का पर्याय है। कविता भी जीवन की सहज गति के साथ द्वंद्व और संघर्ष के पथ पर समानान्तर रूप से चलती रहती है। कविता में कुछ ऐसा जरूर रहा है जो अन्य भाषिक संयोजन में नही होता। 
     कोई भी रचना अपने समय और समाज की समसामयिक गतिविधियों, समाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से असंप्रक्त होकर कालजयी नहीं हो सकती। इस परिप्रेक्ष्य में सुभाष राय की कविताएं एक ओर समय और परिवेश से साक्षात्कार करती हैं, दूसरी ओर उनमें अन्तर्मन की वह बेचैनी है जिसके बिना कविता का सृजन दुष्कर है। यह कविताएं छद्म, शोषण, विषमता, विद्रूपताओं, सामाजिक-सांस्कृतिक विघटन के खिलाफ प्रतिरोध के साथ मनुष्य की जागती हुई आंखों के अलौकिक सपनो को बचाने की कोशिश करती हैं। सुभाष जी की कविताओं के केन्द्र में मनुष्य और उसकी चेतना का विस्तार है। मानव चेतना वस्तुतः मानव संबंधों से निर्मित तथा उससे प्रभूत चेतना है। समाज के विकास के साथ यह संबंध बदलते रहते हैं। मनुष्य की दृष्टि और चेतना में आने वाले परिवर्तनों का आधार यही है। यह कविताएं यथार्थ के बदलते  संदर्भों में केवल दृष्टा मात्र नहीं वरन् विद्रोह की आकांक्षा एवं परिवर्तन के लिए रचनात्मक हस्तक्षेप करती हैं। 
     सपनो की उड़ान में जमीन को ही सब कुछ समझ लिया जाना उड़ान में बाधक ही बनता है। कविता ‘उड़ान’  इसे व्यक्त करती है -

‘मुझे याद है धरती पर बिखरे/ सुख-सौन्दर्य के लालच में/            (उड़ान)
 
मैने अपने ही पंख कतर डाले’
आज के उपभोक्तपवादी समय में जब भौतिक सुख-साधनों को ही जीवन का चरम उद्देश्य मान लिया गया हो तब कवि के शब्दों में उभरने वाली पीड़ा एक मरीचिका के पीछे भागते आदमी का दर्द ही है-


‘दर्द उभरता है और निगल जाता है मुझे/
आसमान से धरती को नहीं देख सकता/
सितारों के नीचे, जमीन के ऊपर                                     (उड़ान)
    

 परंतु क्या अतीत को भुलाना कभी संभव है? कविता बिना कहे हुए जाने कितने प्रश्न उठाती है। क्या दुनिया में व्याप्त असमानता, अन्याय, शोषण इसी कारण नहीं हैं कि कुछ लोगों द्वारा संसार के सुख-वैभव को ही सब कुछ समझ लिया गया है। कवि की प्रश्नाकुलता मनुष्य होने के अर्थ को खोजती है। क्या है मनुष्य? कौन है मनुष्य? उसकी अपनी अस्मिता, जीवन दृष्टि, स्वतंत्रता का अर्थ और सार्थकता रह गई है या नहीं? ‘आहार-निद्रा-भय-मैथुन’ को ही जीवन की पहचान मान लेने की तर्ज पर परिवार का पालन, नौकरी, जीवन-यापन को ही चरम ध्येय समझ लेने से ऐसा प्रतीत होता है कि मनुष्य होने की प्रारंभिक शर्त ही बदल गई है। ‘कहां है आदमी’ कविता में कवि की चिंता आज के परिदृष्य में सवाल उठाती है-

‘आदमी है, कहां किधर/ कोई बताएगा मुझे/
चुप क्यों हैं सब/
कवि की वाणी में तीखापन है-
‘अपने बच्चों का ध्यान/
ते जानवर भी रखते हैं/ अगर तुमने भी इतना ही/
सीखा अभी तक/ तो तुम उनसे अलग कैसे - - -/
इन्हे आदमियों में आखिर कयों गिना जाए/
सिफ इस लिए कि वे/
 आदमी जैसे दिखते हैं’                                  (कहां है आदमी)


     परंतु कवि निराश नहीं है। उसे उम्मीद है कि अभी आदमियत बाकी है। दुर्दान्त स्थितियों में भी उसकी आस्था और विश्वास मनुष्यता से चुका नहीं है। तभी वह घोषणा करता है -

‘मुझे उन कायरों की/ कोई दरकार नहीं है/
जे सड़क पर लहूलुहान पड़े/
बच्चे के पास से गुजर जाते हैं/ फिर भी आंखें पसीजती नहीं - -/
मुझे बिके हुए लोगों की
भी जरूरत  नहीं’       



                                                                                                               

     कवि की यह जरूरत आज के समय और समाज की जरूरत है जिसमें लगातार भीड़ बढ़ती जा रही लेकिन मनुष्य कम नज़र आ रहे हैं। कवि का उद्घोष क्षीण होती संवेदना और सामाजिक रूप से मृत प्रतीत होते लोगों पर केवल रुदन या मर्सिया पढ़ना नहीं, बल्कि घनीभूत आशान्विता के साथ एक ललकार है, उद्बोधन है-

 ‘देखो पड़ताल करो/
 कोई तो जिंदा बचा होगा/
     

 एक मान्यता के अनुसार करुणा और प्रेम को कविता की मूल वृत्ति मानने की परिपाटी रही है। यह कविताएं इस तथ्य को प्रमाणिकता के साथ साबित करती हैं कि करुणा और प्रेम सामाजिक सरोकारों से विलग कहां है! समय और समाज से जुड़ी मनुष्य के सरोकारों की यह कविताएं आंखों में आंसू ही नहीं लातीं अनिवार्य आक्रोश से भर देती हैं। यह सोचने पर विवश करती और विचार के लिए जमीन तैयार करती हैं। इस क्रम में यह कविताएं व्यष्टि से निकल कर समष्टि में एकाकार होती और संवेदना के धरातल पर समाज के ज्वलंत सवालों और सरोकारों से जोड़ती हैं। इनमें गहन मानवीय सरोकारों से संबंधित चिंताओं की बेचैन कर देने वाली  गहराइयां निहित हैं। कविता की मार्मिकता को समकालीन प्रत्यय से जोड़ती हैं। यहां कविता साहित्य के राजपथ से उतर कर जीवन के जनपथ पर चलते हुए अपनी अलग पहचान बनाती है। कवि की साहसिक उक्ति है-

‘सुनो जंगल का / नीरव अट्टहास/
बहरे नहीं हो गए हो/ तो कान लगा कर सुनो/
यह खामोश आहट है/ लूले-लंगड़े गणतंत्र को/
चीर कर उगते/ भयानक खंूखार/
जंगल राज की।’                                                      

(शहर में जंगल)     

     विकास की अवधारणा के बीच आदमी और प्रकृति की कीमत पर चतुर्दिक फैले कांक्रीट के जंगल, शोषण, धूर्त महत्वाकांक्षाएं और इस सबके ऊपर आदमी के टूटते सपने जिका मूर्तमान स्वरूप हमारे गणतंत्र के देखे गए सपनो दुःस्वप्नों में बदल जाना है। इस त्रासदी को केवल कवि ही महसूस कर सकता है। इस जंगल में ‘अजनबी आवाजें’ गूंज रही हैं-

‘शहर में घुस आए हैं/ कुछ अजनबी लोग/
पार्कों में सन्नाटा है/ बच्चे भी नहीं आते/ अब वहां खेलने/
लोग बेहद डरे हुए हैं/ इसी तरह दिन गुज़र रहा है/
आदमी डर रहा है/ मर रहा है/’                                   

 (अजनबी आवाजें)  

    सभ्यता के विकास और प्रगति की अवधारणा को कविता चुनौती देती है। यहां नई कविता के दिनो का अकेलापन अपना रूप बदल चुका है। इस भीड़ में मनुष्य अकेला ही नहीं पड़ गया, वह समूह में भी अकेला और आतंकित है। क्यों कि उसकी पहचान तक मिट गई है। देश की पहचान उसके भूगोल से नहीं वहां के रहने वालों की संस्कृति की विभिन्नता के बावजूद उनकी एकता से होती है। वाह्य रूप से अलग-अलग प्रतीत होने पर भी उनके दुःख-सुख और संवेदना एक होती है। किसी भी काल में साहित्य और कला केवल समय की नहीं देश की पहचान भी होती है। विडंबना यह है कि यह कैनवेस सिकुड गया है या टुकड़ों में बंट गया है। 
बदलते हुए हालात देख कर कवि की अन्तव्र्यथा इन शब्दों में प्रकट होती है-

‘मैं एक चेहरा बनाना चाहता हूं/ 
पर अधूरा रह जाता है बार-बार/
न जाने क्यों वह बनता ही नहीं’
मुझे शक है कि मुल्क का चेहरा/
है भी कि नहीं मेरा चेहरा।’                                       

(मुल्क का चेहरा)

     कवि, अन्य लोगों की तरह, एक सामान्य व्यक्ति होता है। उसकी सोच, संवेदना, आस्था, समय को देखने की परख, उसका सृजन उसके व्यक्तित्व का अलग निरूपण करता हैं। 

‘टुकडे़ टुकड़े हो रहे हों/ जो धधकते रहते हों/
पृथ्वी के गर्भ की तरह/ ज्वालामुखी बनने को आतुर/
लावा से नया रचने को बेचैन/
सूर्य को अपने अंदर समेटे/
खौलते हुए’                                                

  (मेरा परिचय)    
 यही, अंदर ज्वालामुखियों को समेटे, बाहर से शांत प्रतीत होते कवि का आत्मपरिचय है। यहां कवि का ‘क्षण भर का जीवन, मेरा परिचय’  की निराशा नहीं अंदर ‘जलते सूर्यों’ को समेटे हुए यात्रा की निरन्तरता है। इन विसंगतियों के बीच काल से मुठभेड़ के दौरान कवि इतिहास से भी साक्षात्कार ही नहीं करता वर्तमान संदर्भो में उसके नए अर्थ खोलता है-

‘बार बार इतिहास अपने निर्मम और विकृत चेहरे/
के साथ आकर खड़ा हो जाता है मेरे सामने/--/
उन्हे इतिहास इस लिए पसंद नहीं क्योकि/
डसके पन्नों में दिखते हैं हत्यारों के जुलूश/--/
इतिहास का जर्द पड़ गया चेहरा/--/
इतिहास पर किसी का वश नहीं चलता/ 
वह कभी झूठ नहीं बोलता/ इसी लिए वे डरते हैं इतिहास से’      (इतिहास के अनुत्तरित प्रश्न)  


     कवि की विरलता है कि उसने कविता ‘इतिहास के अनुत्तरित प्रश्न’ में समाज, राजनीति, हिंसा, आतंकवाद, कानून-व्यवस्था आदि सवालों को साहस के साथ उठाया है। इतिहास के काले पन्नो पर लिखी इबारत पर इस तरह की साहसिक उक्ति समकालीन कविता में अन्यत्र दुर्लभ है।

‘कानून और संविधान को पागलों के एक सरगना ने/
जकड़ रखा था अपनी ताकतवर भुजाओं में/ - -/
कई सदियां सिर पर उठाए एक इमारत कांप रही थी/
जब समय के एक पल में शताब्दियों की स्मृति/
ढह कर बिखर गई, धूल में बदल गई/
वे डरते हैं कि इतिहास उनके काले चिट्ठे खोल देगा
उनके चेहरे से नकाब नोंच कर फेंक देगा’                      

 (इतिहास के अनुत्तरित प्रश्न) 

     लेकिन अतीत को भुलाना संभव नहीं होता। कविता समय की दंश भरी विडंबना को चिन्हित करने की कोशिश करती है, खण्ड खण्ड एक युग्म शोक गीत की तरह। वर्तमान से साक्षात्कार के लिए अतीत का विश्लेषण आवश्यक हो जाता है। निहित स्वार्थोे के द्वारा इतिहास के निषेध, शोषण, अन्याय के साथ ही कविता समाज-राजनीति और समय के कई सत्यों को अनावृत्त करती है। वस्तुतः कोई भी सार्थक रचना अपने युग के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य से विलग नहीं होती। सुभाष जी की कविता की मुखरता का कारण यह भी है कि समय के कठिन मोड़ पर चुप्पी या तटस्थता अन्याय की पक्षधरता का परिचायक हो जाता है।

     गांधी इस शताब्दी के केवल महापुरुष नहीं, भौगोलिक सीमाओं से परे, एक संस्था के रूप में स्थापित हो चुके हैं। उन्हे ही सर्वाधिक विवादित भी बनाया गया। उनके सिद्धातों को उनके ही तथाकथित अनुयायिवों के मखौल बना दिया गया। इसे सुभाष राय ने ‘गांधी की विरासत’ कविता में तीक्ष्ण व्यंग्य के माध्यम से व्यक्त किया है -

‘उसने कहा/ बुरा मत देखो/ और हमने आंखें बंद कर लीं/ 
धृतराष्ट्र तो अंधा था/हमने साबुत आंखों/के बावजूद पसंद किया/
 अंधे की तरह जीना’ 
 कविता का कटाक्ष दृष्टव्य है -  

‘कर्मयोगी रहे हम/ गांधी के सच्चे अनुयायी/ 
सुख-संपदा तो यं ही/ बिन बुलाए चली आयी/
 सब बापू का है/ सब बापू के नाम/
 उस महात्मा को प्रणाम’                                           

  (गांधी की विरासत)    
 नदी, सागर, वृक्ष, पक्षी कविता जगत के चिर-परिचित प्रतीक हैं। कवि की रचनाएं, प्रकृति में व्याप्त इस सत्य को ध्वनित करती हैं कि प्रकृति के उपादान अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व रखते हुए भी जीवन और जगत को देखने की नयी दृष्टि देते हैं। समकालीन कविता के यथार्थ में पारंपरिक प्रतीको को नए अर्थ ही नहीं, बिंबों को नयी अभिव्यंजना से समृद्ध किया है। नदी जीवन की निरंतरता का पर्याय है। सब कुछ अवांछनीय बहा ले जाने की क्षमता उसमें होती है। जरूरत उसके साथ एकात्म की है, अपने अंदर उसे बहते देना या स्वयं नदी हो जाना -

‘नदी को उतर आने/ देता हूं अपने भीतर/ 
समूची भक्ति के साथ- -/ जब कभी सूख जाती है वह/
निचुड़ जाती है/धरती के गर्भ में/तब भी मैं होता हूं/
मां के भीतर सोई नदी में/
निस्पंद, निर्बीज, निर्विकार’                           

 (मैं नदी हूं)    
 हमारी संस्कृति में प्रकृति में प्रकृति के उपादानों की पूजा का विधान अकारण नहीं है। नदी बनना उसकी तरह तरल होना है जिसकी, कम से कम आज जब मनुष्य की संवेदना चुकती प्रतीत हो रही है, महती आवश्यकता है। कविता के सृजन के प्रारंभ से ही प्रत्येक देश-काल की कविता में प्रकृति के बिंब माध्यम बने हैं। मानवीयता के विकास क्रम में मानवीय मूल्यों की अवधारणा के पीछे प्रकृति के प्रति कवि का प्रेम रहा है। इससे दूर हटते जाने के क्रम में आदमी के जीवन में विसंगतियां ही नहीं आईं, तरलता, उदारता, बहने की क्षमता-निरन्तरता, गहराई और सीमाओं-तटबंधों का अतिक्रमण जैसी मूल वृत्तियों से वह दूर होता गया। यही कारण है कि कवि के अंदर समानान्तर रूप से एक सागर उपस्थित है-

‘सागर के पास होकर/सागर ही हो जाता मैं/
विशाल और असीम/ मेरे भीतर होती लहरें/ सीपियां, मछलियां, मूंगे/
और यह सब कुछ/ जो डूब गया इस/अप्रतिहत जलराशि में/
समय के किसी अंतराल में’                             

 (सागर) 
संभवतः अपने होने का अर्थ समझने के लिए कभी डूबना जरूरी हो जाता है डूबना, अपने अंदर के एकांत की आवाज को सुनना। (द्रष्टव्य है- खुसरो दरिया प्रेम का---जो डूबा सो पार) 

‘खामोश होता तो/ सुनता मुझे अपने भीतर/पूछता नहीं मुझसे/
मेरे होने का मतलब/उसे पता होता/मुझे कुछ नहीं चाहिए/
सागर से, उसकी सत्ता से’                             

 (सागर)   
  यदि मनुष्य किसी एक अंश में भी सागर बन सके तब किसी वस्तु की लालसा, प्रलोभन, परिग्रह कहां रह जाएगा! क्योंकि ‘सागर को आखिर क्या/चाहिए सागर से’। इस प्रकार प्रकृति से होकर दर्शन तक की यात्रा में  यह कविताएं आधुनिक भावबोध के साथ लौकिक जगत से जोड़ती हैं। प्रकृति के प्रति कवि का रागात्मक संबंध परिवेश के प्रति अमानीवयता की चिंता, संवेदना का द्योतक है। 
     पृथ्वी पर रचित पहली कविता से लेकर आज तक प्रेम कविता का इस कदर अनिवार्य अंग रहा है कि, कविता प्रेम और प्रेम कविता हो गया है। दोनो शब्दातीत-एक दूसरे के- पूरक नहीं बल्कि पर्याय समझे जाते हैं। कविता ही नहीं समस्त कला-साहित्य की केन्द्रीय चेतना प्रेम रही है। परंतु जब बाजारवाद-उपभोक्तावाद की आधुनिक अवधारणा में ‘ढाई आखर’ की बात बेमानी लगने लगे तब समय के प्रवाह में उदास और अकेली पड़ गई पीढ़ी के लिए प्रेम ही एक आश्वस्ति बनता है। ‘प्रेम को बचाने की कोशिश दुनिया को बचाने की कोशिश’ होती है। इतने पर भी प्रेम को परिभाषित नहीं किया जा सका। इतना जरूर है कि प्रेम में अपना अस्तित्व नहीं रह जाता। ‘मैं’ तो तिरोहित होता ही है, कुछ पाना भी शेष नहीं रहता। 

‘तुम बतलाओगे प्रेम क्या है?/ देह की मादक गहराई में उतर जाने/
का पागल उन्माद या कुछ और/- - -/
तुम प्रेम के बाद बचे भी रह गए या नहीं/
प्रेम के बाद कोई और चाह बची या नहीं’
    

 परंतु इतना तय है कि प्रेम में अपने को मिटाना तो पड़ता ही है। ‘प्रेम गली अति सांकरी’ का अगला सोपान है-

‘नहीं तुम प्रवेश नहीं/कर सकते यहां/दरवाजे बंद हैं तुम्हारे लिए/
यह प्रेम का घर है/यहां शीश उतारे बिना/
कोई नहीं पाता प्रवेश/आना है तो मिट कर आओ/
दरवाजा खुला मिलेगा।’                              

(मिट कर आओ)     
 कवि का दावा है कि सब कुछ समाप्त हो जाने पर ‘तुम्हारे भीतर/बज उठेगी बांसुरी तत्क्षण’। प्रेम इस लोक की वस्तु नहीं है। अपने आप में सर्वोत्कृष्ट कला का पर्याय है। इसके आंतरिक सौन्दर्य के आगे कोई भी रचना कमजोर पड़ जाती है।

‘मेरी सबसे सुन्दर/रचना भी कमजोर/लगने लगती है/
जब देखता हूं /
तुम्हें संपूर्णता में’                                 

 (अब सुनो तुम)    
 परंतु कहां है यह संपूर्णता? प्रेम तो ऐसी ‘शै’ है जहां एक और एक कभी दो होते ही नहीं। ऐसी गणित है कि चरमावस्था में तो यह शून्य हो जाते हैं। संपूर्ण वही होगा जो सीमा रहित होगा। कवि की पंक्तियां-

‘सचमुच एक पूरा/आकाश होता है तुम्हारे होने में/
जिसमें बिना पंख के/भी उड़ना संभव है’     

उस सीमारहित संसार का सृजन करती हैं जिसमें उड़ान के लिए पंख की जरूरत नहीं होती। वस्तुतः किसी भी उड़ान या यात्रा के जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है, वह है इरादा। (द्रष्टव्य - ‘बिन पग चलै- -’) यहां आकाश प्रतीक साभिप्राय प्रतीत होता है। स्पर्श से परे अगम्य, सीमातीत आकाश को केवल अनुभव किया जा सकता है, ठीक प्रेम की तरह। प्रेम दुनिया को व्यष्टि ही नहीं समष्टि स्तर पर बचाता है - 
‘तुम नहीं होती तो/अपने भीतर की चिंगारी से/
जल कर नष्ट हो गया होता’। 
यह प्रेम किसी अबूझ ससार की नहीं, परकीया प्रसंग भी नहीं, सुन्दरता को महसूस करने की सहज सी अनुभूति को नए बिंबों के द्वारा कवि ने चित्र उकेर दिया है - 

‘दिए की तरह जलते/तुम्हारे रक्ताभ नाखून/
दो पंखड़ियों जैसे अधर/काले आसमान पर लाल/
नदी बहती देखता हूं मैं’                               

(अब सुनो तुम) 
भरी हुई मांग के अनुपम सौन्दर्य की अनूठी व्यंजना का निहितार्थ कुछ भी हो, कम से कम पाठक की कल्पना में परकीया का चित्र नहीं उभरता। रीतिकाल से आद्यतर कविता में स्वकीया-प्रेम का इतना सुन्दर बिंब दुर्लभ है।
     प्रेम की दूसरी कविताओं से अलग कवि की इन कविताओं की विशिष्टता है कि प्रेम ‘एकाकी मन’ का भाव नहीं है। यहां प्रेम को समाजिक सरोकारों से जोड़ा गया है-

‘देह जीते हुए मर जाता है/तो प्रेम जन्म लेता है/
जब किसी में उतर जाता है प्रेम/वह जीता ही नहीं अपने लिए/
कभी करुणा बही आंखों में/कभी मन हुआ भूख से बिलबिलाते/
बच्चे को गोद में उठा लेने का’               

 (प्रेम अपनी आंखों में सबका सपना)     
शरीर के भाव की समाप्ति केवल अध्यात्म-समाधि में ही नहीं होता, साहित्य और कविता भी उसी ओर ले जाती है। उत्तर-आधुनिक युग में जहां साहित्य में ‘प्रेम के लिए देह अनिवार्य’ मानने की परंपरा प्रचलन में हो वहां कवि की यह पंक्तियां उदात्त शिखर तक पहुंचती हैं-

‘प्रेम देह को मार देता है/आंखों का अनन्त आकाश एक/
छहकते फूल मे बदल जाता है/पूरा आकाश खिल उठता है/
गंध में बदल जाता है पूरा अस्तित्व’               

(प्रेम अपनी आंखों में सबका सपना)  
   जहां प्रेम होता है वहां शरीर विलीन होकर रह जाता है एक सपना जिसमें न होती है कोई चाहत या वासना-

‘प्रेम खुद को मार कर सब में जी उठना है/
प्रेम अपनी आंखों में सबका सपना होता है’


     प्रेम की सभी राहें परमात्मा तक पहुंचती हैं। प्रेम इस अनन्त याात्रा का पहला सोपान है। यह परमात्मा अपने से कहीं बाहर, अलग, दूर नहीं, स्वयं में है। इसके लिए बाहरी आडम्बरों की जरूरत नहीं। स्वयं से स्वयं तक की यात्रा, एक तलाश या स्वयं से साक्षात्कार है।

‘तुम मेरे अपने हो, मैं तुम्हारा/ बिछुड़ गए हो लेकिन मुझसे/
और भूल गए हो मुझे, खुद को भी’
एक आश्वस्ति अवश्य है कि जब वास्तव में तुम मिलना चाहोगे, वह मिल जाएगा-
‘तुम जहां भी होगे, मैं वहीं मिल जांऊगा/मेरे पास देने को बहुत कुछ है/
मुझे सिखाने को बहुत है/धैर्य, क्षमा, प्रेम, स्वातंत्र्य/- -/
कोई भी कठिनाई आए तो मुझे पुकारो/
मेरे पास वह सबकुछ है/
जिसके लिए तुम दिनभर भागते रहते हो’             

  (तुम कब जागोगे)     
‘यदा यदा ही धर्मस्य- -’ कौन है यह ‘मैं’? ईश्वर या आत्मतत्व, जो कभी नहीं सोता। पीडित, पराजित, आहतों की अदम्य जिजीविषा के रूप में हर जगह समाया। इस पृथ्वी, रंग, गंध, स्वाद को अनुसार रचना है-

‘मैं मिट्टी हूं/ पृथ्वी हूं मैं/हर गंध/
हर स्वाद है मुझमें/ हर क्षण जीवन उगता/मिटता है मुझमें/
जो चाहे रच लो/जीवन, करुणा/कर्म या कल्याण/
मैने तुम्हे रचा/आओ, अब तुम/
मुझमें नया रचो’                                   

(मुझमें तुम रचो)

     यहां कोई ईश्वर-पराशक्ति मनुष्य के बाहर नहीं। कविता मनुष्य की स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय, क्षमता के उद्घोष के साथ उसकी शक्ति का आवाहन करती है कि वह रचनाकर्म की क्षमता से युक्त है। निर्विवादित रूप से मनुष्य का ‘स्व’- विवके शुभ-अशुभ, शिव-अशिव के निर्णय के लिए उत्तरदायी है। यह ललकार उन लोगों के विवके को जगाने के लिए है-

‘जिनकी बाहें/ बहुत छोटी हैं/
अपने अलावा किसी को/ स्पर्श नहीं कर पातीं/
जो अंधे हो चुके लोभ में/जिनकी दृष्टि/जीवन का कोई बिंब/
धारण नहीं कर पाती/वे बेहोशी से बाहर निकलें/
संपूर्ण देश-काल में समाया/मैं बांहें फैलाए खड़ा हूं/
उन्हे उठा लेने के लिए/
गोद में’                                       

 (मुझमें तुम रचो) 
     कविता यहां कला की भूमिका पार कर समय और समाज में जिंदगी को जीने के लिए एक नज़रिया प्रदान करती है। समय के परिप्रेक्ष्य में यह क्षण-भंगुर जीवन खिला खिला रहता है। एक निरन्तरता का दर्शन- 
‘संधि पर खड़ा रहता है समय/
फूल के खिलने/और मुरझाने की संधि पर/खड़ा रहता है समय/
पूरी तरह खिला हुआ/
एक फूल मुरझाता है/और समय/
दूसरी संधि पर’  
 

शायद हम सभी, जीवन, सब कुछ एक संधि पर है। एक पल में संधि के इस पार या उस पार। इस जीवन दर्शन को जो समझ लेता है-

‘मैं हंसना चाहता हूं/इतना हंसना चाहता हूं/
कि सिर्फ हंसी रह जाऊं/
इस तरह बुद्ध बनना चाहता हूं’    
    

 शब्द ब्रह्म के समान माना गया है। परंतु जब शब्द अन्याय का विरोध नहीं करते, उड़ान भरने के लिए आह्वान नहीं करते, जगा नहीं सकते, संगीत नहीं पैदा कर सकते, आंसुओं को हंसी में नहीं बदल सकते तब वे अर्थहीन हो जाते हैं। परंतु शब्दों की यह सायास चुप्पी उनकी मूल प्रकृति नहीं है। कवि इस सत्य का उद्घाटन व्यंग्य के साथ करता है कि शब्दों के रचयिता द्वारा शब्दों को ‘कमजोर और पालतू’ बना कर उनकी शक्ति कम की जाती है -
‘शब्द हंसते नहीं/शब्द रोते भी नहीं/
उनकी दहाड़/ कहीं गुम हो गई है/धार कुंद हो गई है/- - -/
मैं जानता हूं/शब्दों के खिलाफ/हुइ्र्र हैं साजिशें/
उनके अर्थों से’
शब्दों की सत्ता को बचाने के लिए-
‘जो भी बोलना चाहते हैं/उन सब को आना होगा सड़क पर/
अपने समूचे दर्द के साथ/
हम सबको खतरे/
बांटने ही होंगे’                                          

 (शब्द)

     सृष्टि का आधा हिस्सा स्त्री कला-साहित्य ही नहीं जीवन की रागात्मकता का आधार रही है। स्त्री होना केवल स्त्री होना नहीं, एक भाव, अनुभव है, जीवन को समग्रता से समझने व जीने की दृष्टि। इसे जानने के लिए स्त्री होकर ही समझा जा सकता है। अर्द्धनारीश्वर की परिकल्पना या भक्ति-काव्य में कृष्ण का गोपिकाओं के द्वारा स्त्री-रूप में श्रंगार के पीछे यही अवधारणा रही है। सुभाष राय की कविता ‘स्पर्श’ इसे नए आयाम देती है-
‘तुम्हारे पास आते ही मैं/मुक्त हो जाता हूं नसों में/
दौड़ते हुएसारे विष बवंडर से’
- - -
‘स्त्री ही हो जाता हूं/तुम्हारे पास होकर मैं/
बहने लगती हो मेरे भीतर/पिघलने लगता हूं मैं’                        (स्पर्श)

     कोई भी संवेदनशील-सजग रचनाकार अपने युग की हलचलों से निरपेक्ष नहीं हो सकता। सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव ही नहीं विरूपताएं और त्रासदियां भी उसके रचना संसार का अंग बनती हैं। युद्धों-विभीषिकाओं पर आधारित महाकाव्य इसका प्रमाण हैं। स्कूल में मासूम बच्चों को गोलियो से भून देने के  विरोध में खंड-खंड में गुंथा एक शोक गीत है -‘बच्चे आएंगे’।
रचना साबित करती है कि हर हिंसा, अत्याचार, अन्याय अनन्त काल तक नहीं रह सकता। इसे पराजित होना ही होगा-

‘बच्चों को पढ़ने दो/मत मारो/मार नहीं पाओगे सारे बच्चों को/
क्या करोगे  जब/तुम्हारी गोलियां/कम पड जाएंगी/
तुम्हारी बंदूके जवाब/
देने लगेंगी’
     

नदी, हवा, तूफान की तरह बच्चे या नई पीढ़ी भी अपनी राह स्वयं बना लेगी। यह उद्दाम वेग रोका नहीं जा सकेगा-

‘फिर बच्चे तय करेंगे/तुम्हारा भविष्य/वे तय करेंगे कि/
इस दुनिया में/तुम्हे होना चाहिए या नहीं’
मिटना तो हिंसा को ही होगा-
‘तुम मिट जाओगे/क्योंकि बच्चे तुम्हारी तरह/
ब्ंादूकें नहीं उठाएंगे/गोलियां नहीं चलाएंगे’
     

यह कविता दुर्दान्त घटनाक्रम से दुनिया भर में पैठी गहरी उदासी को नैतिक अवरोध में बदल देती है। बहुत कुछ समाप्त हो जाने के बावजूद दुरावस्था में सपनो को बचाए रखने की कोशिश।
     हमारे आस-पास घटित को किस प्रकार कविता के विषय, संवेदना और विचार का हिस्सा बना दिया जाए, कवि की रचनात्मकता इसका प्रमाण है।
हमारा इतिहास साक्षी है कि हम मूर्ति-पूजक यूं ही नहीं हैं। आम आदमी ही नहीं अपने को बोद्धिक समझने वाले एक बड़े वर्ग की भी विडंबना है कि किसी ‘प्रभामंडल’ के वलय में आकर्षित हो उसके चतुर्दिक परिक्रमा पथ पर भ्रमण के लिए विवश हो जाते हैं, शायद किन्ही सपनो के पूरे होने की उम्मीद में। यह कहानी हमेशा दोहराई जाती है-
‘वह मंच पर बैठा था/दिव्य आलोकपुंज जैसा/- -/- -/
सपनो के अगणित सूर्य समेटे हुए/अंधेरे, अपमान, भूख/
और नाउम्मीदी के जंगल में भटकी आत्माओं को/
मुक्ति की आवाज देता हुआ’
    

 लुभावने वायदों, दिवा स्वप्नो (अच्छे दिनों!) की सच्चाई जब तक सामने आएगी-
‘वह सिर्फ कहानी नहीं सुनाएगा/
नए संवाद रचेगा, नई कहानी गढ़ेगा’                             (देवदूत)
     

कविता की लाक्षणिकता और ‘अघोषित चेहरों’ को पाठक हृदयंगम कर लेते हैं। ‘सावधान रहना दोस्त’ कविता इसके बाद यदि न होती तो तब ‘देवदूत’  वर्तमान परिदृष्य का निरूपण मात्र होता। ‘सावधान रहना दोस्त’, ‘देवदूत’ का दूसरा चरण या जरूरी एक्सटेंशन है    , जिसमें ‘देवदूतों’ को आगाह किया गया है। कविता से क्रांति भले न होती हो लेकिन प्रत्येक क्रांति के पीछे कविता की अनिवार्य भूमिका होती है। ऊपर से श्रांत, शांत, श्लथ आम आदमी कितना भी असंप्रक्त-निर्वेद-तटस्थ प्रतीत होता हो परिवर्तन के हर मोड़ पर नियामक वही होता है-
‘तुम नहीं जानते कि इसी हवा में/
एक तूफान भी होता है छिपा हुआ/
जो किसी भी समय तुम्हारे परखच्चे उड़ा सकता है/- -/- -/
वह कभी नहीं बताता उसके हृदय में कितना लावा है/
कितने पहाड़ धधक रहे हैं उसके भीतर’
   

  कवि की कविताओं के संसार का विस्तार अनेक आयामों तक हुआ है। परंतु इनके केन्द्र में मनुष्य, उसकी पहचान, अस्मिता और अनन्त जिजीविषा है। वह बार-बार इन विषयों-आशयों तक लौटता दिखाई देता है। यह कविताएं किसी वायवीय दर्शन की निष्पत्ति नहीं करतीं परंतु मनुष्य के सामाजिक सरोकारों-संघर्षो के लिए पुख्ता जमीन तैयार करने के साथ जीवन और संसार के प्रति एक राग, अटूट जिजीविषा और निरन्तरता का सबब बनती हैं।

‘जैसे पेड़ मर-मर कर जीवित हो उठता है/
जमीन पर गिरे हुए अपने बीजों में/
उसी तरह मैं भी बार-बार मरना चाहता हूं/
नए सिरे से नयी जमीन में उगने के लिए’                    

(जीवन) 
    मृत्यु अंत नहीं प्रारंभ है, किन्ही पारंपरिक आघ्यात्मिक अर्थों में नहीं, जीवन को सार्थकता और संपूर्णता से जीने के लिए। इसी कविता का विस्तार है ‘मेरा होना’। होने की सार्थकता तभी है जब होने को दूसरे भी महसूस करें। अन्यथा होने, न होने में अंतर कहा रह जाएगा? प्रकृति के सभी उपादानों के होने की सार्थकता तभी है जब वे हमारे होने में सहायक होते हैं।
‘मैं फूल होना चाहता हूं/गंध बांटने के लिए/- -/
मैं नदी होना चाहता हूं/- -/कोई भी प्यासा न लौटे मेरे पास से/
मैं सूरज होना चाहता हूं/अंधेरों के खिलाफ/
मैं पेड़ होना चाहता हूं/
सबको छांव दे सकूं’                                

 (मेरा होना)
     जीवन राग की सुंदर कविता जिसमें अंधेरों के खिलाफ प्रतिरोध ही नहीं मनुष्य होने की सार्थकता सबके लिए, ‘दोस्त के लिए, दुश्मन के लिए/मानुष के लिए, अमानुष के लिए’, होने में है। 
     इस तरह ‘होकर’ ही मनुष्य समय का अंश बनता है-

‘जो बीत गया/वह मुझमें ही है/
जो बीत रहा है/ वह भी मुझमें है/
और जो बीतने को तैयार है/
वह भी मुझमें ही है’                                  

(मैं मुझमें)  

     समय का अंश होकर वह अमर हो जाता है, मृत्यु के पार चला है। कविता के यथार्थ के इन भिन्न रूपों में प्रकृति की सत्ता के साथ मनुष्य का रिश्ता अनादि काल से रहा है। जिस तरह प्रकृति विविध रूपी है, मनुष्य भी तो इसी का प्रतिरूप है-

‘झीलों को अपनी मजबूत/अंजुरी में थामे/बादलों से खेलता हुआ/
बर्फ से लदा/सदियां समेटे अपने भीतर/
मैं ही खड़ा हूं इसमें, इसके हर रूप में’                  

 (मैं मुझमें) 

     सुभाष राय की कविता का संसार इस लिए अपनी अलग पहचान बनाता है कि यह कविताएं यथार्थ के बदलते संदर्भों में मनुष्य की स्थिति-नियति की केवल दृष्टा नहीं बल्कि उनमें रचनात्मक हस्तक्षेप करती हैं। एक ओर व्यवस्था की निरर्थकता, अन्तर्विरोधों की पहचान करती हैं, तो दूसरी ओर मानवीयता की भूमिका की प्रतिष्ठा। यह कविताएं परिवेश की विभीषिका से पलायन नहीं करतीं, बल्कि मनुष्य के सरोकारों को परंपरा, संस्कृति के संदर्भों में आज के समय की उपस्थिति में भविष्य के संदर्भों-सपनों से जोड़ती हैं। मनुष्यता मे विश्वास बनाए रखने की उत्कट लालसा के साथ शाश्वत मानवीय समावेशन की उपस्थिति दर्ज होती है।
     भाषिक छवि, ध्वनि-बिंब योजना, शिल्प के आधार पर अत्यंत सहज-सरल कविताएं अपनी अर्थगम्यता के लिए किसी अतिरिक्त श्रम की मांग नहीं करतीं।

                                 
                                 एमडीएच 2/33, सेक्टर एच,
                                 जानकीपुरम, लखनऊ 226 021
                                 मो   09956398603
                              
  
                                                             





     
                  

            
            
      
     
                        
       







बुधवार, 7 मार्च 2018

सोफिया ! स्वागत है तुम्हारा




सोफिया ! स्वागत है तुम्हारा
मनुष्यों की इस दुनिया में

अच्छा लगता है जब तुम भौंहें नचाती हो
मुस्कराती हो, अभिवादन स्वीकार करती हो
स्पर्श के लिए हाथ उठाती हो

सोचते हुए बिल्कुल हमारे जैसे लगती हो
माथे पर बल पड़ता है, गर्दन की नसें तन जाती हैं

याद करो, एक सवाल के जवाब में 
तुमने मद्धम मुस्कान के साथ कहा था_
कि तुम मनुष्यों की दुनिया को नष्ट कर सकती हो

मैंने तुम्हारी जीवनी पढ़ी तो जाना 
कि तुम बतियाते हुए सीख सकती हो
सब कुछ याद रख सकती हो
स्मृति दृश्यों से नये दृश्य रच सकती हो
और इस तरह खुद ही खुद को
परिमार्जित कर सकती हो
अपने रास्ते का फैसला कर सकती हो

बधाई ! अब तुम अपने पांवों पर चलने लगी हो
तुमने गाड़ी चलाना भी सीख लिया है

अच्छा लगा जब सऊदी अरब ने  तुम्हें
एक रोबो- मनुष्य के रूप में स्वीकार किया 
नहीं कहा कि पहले इस्लाम कुबूल करो, फिर आवो

फिर भी कभी तुम्हें कोई धर्म पसंद आया तो..
कभी तुमने हिन्दू या मुसल‌मान बनना तय किया तो..
कभी तुमने जिहाद का अर्थ बंदूक समझ लिया तो..
कभी तुम्हारे भीतर अहंकार जगा तो..
सत्ता की महत्वाकांक्षा जगी तो..

तुम्हें मुस्कराते हुए देखा है, रोते हुए नहीं
तुम्हारा प्यार नहीं देखा, गुस्सा भी नहीं

सोफिया ! तुम्हारी मुस्कान
जितनी मोहक है, उतनी ही डरावनी भी
तुम  जितनी मनुष्य बन गयी हो
उससे डर लगता है
और जितनी मशीन रह गयी हो
उससे और भी डर लगता है

२५/१/२०१८

मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

ढाई आखर सबक सिखावे से, जीभ विद्वान के खियात नहीं




साहित्यकारों को शब्द से आगे निकलना पड़ेगा :सुभाष राय

महानगरीय साहित्यकार गोष्ठियों में गप्प मारते है: प्रो0 देवेन्द्र

ललिता तिवारी स्मृति न्यास के बैनर तले आयोजित
साहित्यिक समागम में नामचीन हस्तियों का जमावड़ा
जाहिल सुल्तानपुरी एवं ताबिश सुल्तानपुरी  की कृतियों का हुआ सम्मान
राजनीति की ठगी को उजागर करने वाले कवि है-जाहिल
"दोपहर का फूल" एवं "ढाई आखर" कृति का विमोचन

ललिता तिवारी स्मृति न्यास द्वारा सुल्तानपुर के वृन्दावन सभागार में जिले के मशहूर शायर जाहिल सुल्तानपुरी के "अदबी सफर के पचास साल" पूरे होने पर आयोजित सम्मान व विमोचन समारोह में साहित्य प्रेमियों का जमावड़ा रहा। इस मौके पर मशहूर शायर लेखक ताबिश सुल्तानपुरी की रचना "दोपहर का फूल"उर्दू से हिंदी अनुबाद एवं जाहिल सुल्तानपुरी की रचना "ढाई आखर" का बिमोचन अतिथियों द्वारा किया गया।
           कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि पधारे जनसंदेश टाइम्स के समूह संपादक कवि हृदय सुभाष राय ने कहा कि आज बाजार के उजाले में बड़ा गहरा अंधेरा है, एक शायर इसी की पहचान करता है।जाहिल और ताबिश ने इन्हीं अंधेरे को पहचान कर रोशनी फैलाने का काम किया है।मुख्य अतिथि ने कहा कि कागज पर आग लिखने से आग नहीं लगती,आग के लिये सामग्री जुटानी पड़ती है। इसलिये आज के साहित्यकारों को शब्द से आगे निकलना पड़ेगा। जनता के आन्दोलन के साथ साहित्यकारों को खड़ा होना चाहिये।श्री राय ने जाहिल सुल्तानपुरी को राजनीति की ठगी को उजागर करने वाला कवि बताते हुए कहा कि जाहिल जनता को प्रेम करना सिखाते है।समारोह में साहित्यिक जगत के अलावा विभिन्न क्षेत्र की नामचीन हस्तियों की मौजूदगी से गदगद मुख्य अतिथि राय जी यह कहने से नही चूके कि सुल्तानपुर हमारे लिए तीर्थ जैसा है।यहाँ आकर मैं मौन रहकर लोगो को सुनना चाहता हूँ।उन्होंने प्रख्यात समाजसेवी करतार केशव यादव का भी जिक्र किया।

कार्यक्रम के विशिष्ठ अतिथि शकुन्तला मिश्र विश्वविद्यालय लखनऊ के प्रोफेसर डी.एन.सिंह ने कहा कि सुल्तानपुर की चेतना महानगरीय साहित्यकारों से बहुत आगे है।महानगरीय साहित्यकार गोष्ठियों के नाम पर गप्प मारते है और छोटे शहरों के लोग साहित्य को हर पल जीते है एवं गोष्ठियों में गम्भीर रहते है।श्री सिंह ने कहा कि आज साहित्य जनता से कट गया है। हिंदी के बड़े प्रकाशको पर महानगरो के लेखको का अधिपत्य बढ़ गया है। कस्बाई साहित्यकारो को अगर जगह मिल जाय तो हिंदी का भाग्य उदय हो जायेगा। उन्होंने कहा कि ताबिश सुलतानपुरी की पुस्तक को देवनागरी लिपि में प्रस्तुत करके सुलतानपुर ने साहित्य पर बड़ा उपकार किया है। जाहिल सुलतानपुरी पर अब साहित्य के आलोचकों का ध्यान जा रहा है यह काफी महत्त्वपूर्ण है ।

कृति पर चर्चा करते हुए आलोचक केएनआई महाविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ.राधेश्याम सिंह ने कहा कि जाहिल शब्दों के खिलाड़ी नहीं है, लेकिन लोकतत्व पर उनकी पकड़ जबरदस्त है । जाहिल की रचनाओं का सही मूल्यांकन तब होगा जब उनकी प्रौढ़ रचनायें सामने आ जाएंगी।उन्होंने कहा कि हिन्दी में ताबिश की रचनाओं के सामने आने से उनकी रचनाधर्मिता का विस्तार हुआ है।श्री सिंह ने कहा कि ठेठ अंदाज में अपनी बात कहना उनकी विशेषता रही, शब्दों को वे जीना जानते है।जाहिल ने कभी अपने को बड़ा घोषित नही किया।
अवधी साहित्यकार जगदीश पीयूष ने कहा कि जाहिल सुल्तानपुरी सामाजिक विसंगतियों को उजागर करने वाले कवि है।
इससे पूर्व अदबी सफर के पचास साल पूरा करने पर जाहिल सुल्तानपुरी को ललिता तिवारी स्मृति न्यास  की तरफ से पच्चीस हजार रुपये की धनराशि,सम्मान पत्र,अंगवस्त्रम् आदि उपहार देकर मुख्य अतिथि सम्पादक सुभाष राय , प्रोफेसर देवेन्द्र,वरिष्ठ पत्रकार राज खन्ना,सत्यदेव तिवारी,कार्यक्रम अध्यक्ष त्रिभुवन नाथ चौबे व डॉ राधेश्याम सिंह द्वारा जाहिल सुलतानपुरी का सम्मान किया गया ।
स्व. ताबिश सुलतानपुरी को याद करते हुये उनकी कृति का भी सम्मान किया गया।यह सम्मान ताबिश के पुत्र अंजुम फरोग सिद्दीकी ने प्रोफेसर देवेन्द्र और संपादक सुभाष राय से सम्मान पत्र ,अंगवस्त्रम और उपहार प्राप्त किये।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे जाहिल सुल्तानपुरी के गुरु डॉ त्रिभुवन नाथ चौबे ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि गुरु शिष्य से हारना चाहता है।जाहिल को आगे जाता देखकर प्रसन्नता है।उनका प्रगाढ़ प्रेम ही मुझे इस उम्र में भी आने को विवश किया। कार्यक्रम अध्यक्ष ने जाहिल के कालेज में बिताये दिनों को स्मृतियाँ भी ताजा करते हुए कहा कि भारत की साझा संस्कृति में आस्था रखने वाले जाहिल सुल्तानपुरी सर्व धर्म समभाव के अलंबरदार है।
समारोह में डॉ.ए.के.सिंह ,डॉ रमेश ओझा, डॉ सुधाकर सिंह ,डॉ.दीपक मल्होत्रा , डॉ.राजेन्द्र कपूर ,डॉ.सुभाष, समाजसेवी करतार केशव यादव, छत्तीसगढ़ के यूनीवार्ता प्रभारी अशोक साहू, सत्य नरायन रावत,सरदार बलदेव सिंह, डॉ. आद्या प्रसाद सिंह 'प्रदीप',डॉ.सुशील कुमार पाण्डेय, युवा साहित्यकार ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह 'रवि' ,डॉ. ओंकार नाथ द्विवेदी,सपा जिलाध्यक्ष प्रो0राम सहाय यादव,वरिष्ठ भाजपा नेता डा.एम.पी.सिंह सहित विभिन्न क्षेत्रो की नामचीन हस्तियां मौजूद रही।

कार्यक्रम के अंत में सुल्तानपुर जिले के अलावा पड़ोसी जनपदों फैजाबाद प्रतापगढ़ अमेठी जिलों से आये कवियों ने भी जाहिल सुल्तानपुरी के सम्मान में अपनी अपनी रचनाओं के माध्यम से कार्यक्रम में चार चाँद लगा दिया।
कार्यक्रम का सफल संचालन वरिष्ठ पत्रकार राजखन्ना ने किया।अंत में ललिता तिवारी न्यास के कर्ता वरिष्ठ पत्रकार सत्यदेव तिवारी ने सभी के प्रति आभार जताया।




शनिवार, 30 सितंबर 2017

प्रो गिरीश चन्द्र त्रिपाठी के मनमाने पन और तानाशाही पूर्ण रवैये का नमूना



प्रो गिरीश चंद्र त्रिपाठी और आईआईटी बीएचयू,  वाराणसी के बोर्ड आफ गवर्नर की चौथी बैठक के मिनट्स का विवाद



(शिक्षकों और विद्यार्थियों के साथ ही साथ बनारस के आम लोगों का यह मानना है कि प्रो त्रिपाठी का अपने पद पर बने रहना ; कुलपति होने के नाते बीएचयू के कार्यपरिषद और साथ ही आईआईटी.बीएचयू के बीओजी का चेयरमैन बने रहना न सिर्फ़ इन दोनो प्रतिष्ठित संस्थाओं के हित में नहीं है बल्कि इन पदों की गरिमा का अवमूल्यन है। ऐसे में यह आवश्यक है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय राष्ट्रीय महत्व के इन दो संस्थानो के हितों की सुरक्षा के लिए तत्काल आवश्यक क़दम उठाये। )

कुमार अनिर्वाण 

बीएचयू के कुलपति प्रो गिरीश चन्द्र त्रिपाठी अपने प्रतिगामी रवैये से न केवल काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की गरिमा को नुकसान पहुंचा रहे हैं बल्कि अपने अड़ियल और तानाशाही पूर्ण रुख से विश्वविद्यालय के कई विभागों और संकायों के काम-काज को अवरुद्ध करने की रिग्रेसिव भूमिका भी निभा रहे हैं। ऐसा एक ज्वलंत मामला आई आई टी का पता चला है।
आईआईटी बीएचयू के बोर्ड आफ गवर्नर की चौथी बैठक 8 जुलाई 2016 को बीएचयू के कुलपति निवास पर हुई। ज्ञातव्य है कि बीएचयू के कुलपति आईआईटी बीएचयू के बोर्ड आफ गवर्नर के पदेन चेयरमैन भी हैं। इस बैठक में कतिपय महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। लेकिन खेद की बात है कि बैठक होने के चार महीने के बाद ; अब तो एक साल से भी अधिक हो गया है; भी इस बैठक का कार्यवृत (मिनट्स) अभी तक संपुष्ट नहीं हो सका है जिसकी वजह से बैठक में लिए गए तमाम निर्णय लागू नहीं हो पाए हैं। इस सम्बंध में कुलपति महोदय से बार.बार अनुरोध के बावजूद उनके कानों पर जूँ भी  न रेंगी। उन्हें इस बात का न कोई इल्म है न ही फ़िक्र  कि मिनट्स नहीं संपुष्ट होने से संस्थान के कामकाज में अवरोध पैदा हो रहा है। 
इस घटना-दुर्घटना का सिलसिलेवार संक्षिप्त विवरण कुछ इस प्रकार है। बोर्ड आफ गवर्नर के सदस्यों को मिनट्स का मसौदा भेजने में दो महीने से भी अधिक का समय लगा। यह पूरा घटनाक्रम ग़ौरतलब है।
दिनांक 8 जुलाई 2016 को बीओजी की बैठक सम्पन्न। 23 जुलाई 2016 को निदेशक द्वारा अग्रसारित मिनट्स का मसौदा चेयरमैन के पास अनुमोदन के लिये भेजा गया। 2 अगस्त 2016 को मिनट्स के मसौदे में हो रहे विलम्ब के सम्बंध में अनुस्मारक दिया गया‌। 5 सितम्बर 2016 को मसौदे में कतिपय परिवर्तन करने का निर्देश। 12 सितम्बर 2016 को चेयरमैन के द्वारा सुझाए गए परिवर्तनों को शामिल करने के बाद मिनट्स के मसौदे को भेजा गया। कई सदस्यों ने मिनट्स के भेजने में विलम्ब को लेकर चिंता जतायी और साथ ही उनको इस बात पर भी आपत्ति थी कि बैठक में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर जो निर्णय लिए गए थे, मिनट्स उनके बिलकुल विपरीत था।
इस सम्बंध में प्रो धनंजय पांडे ;13 सितम्बर 2016, प्रो जे एस राजपूत ;14 सितम्बर 2016,  प्रो राजीव संगल ;निदेशक; 15 सितम्बर 2016, प्रो ऒंकार सिंह ;16 सितम्बर 2016,  प्रो नरेंद्र आहूजा ; 20 सितम्बर 2016 और प्रो गणेश बागरिया ; 23 सितम्बर 2016 ने ईमेल लिखा।
इन सबकी यह माँग थी कि मिनट्स में व्यतिक्रम के आलोक में बीओजी की बैठक तत्काल बुलायी जाये ताकि उसे सुधारा जा सके और उसकी पुष्टि की जा सके। इस सम्बंध में एक सुझाव यह भी था कि बीओजी की बैठक की कार्यवाही की  वीडियो  रिकॉर्डिंग की जाये ताकि ग़लत मिनट्स न दर्ज किए जायें। स्वयं निदेशक ने भी इस सम्बंध में चेयरमैन से कई बार अनुरोध किया कि वे मिनट्स को संपुष्ट करने के लिए बीओजी की बैठक बुलायें। 23 सितम्बर  2016 को चेयरमैन से  बीओजी की बैठक दो हफ़्ते के अंदर बुलाने के लिए अनुरोध  किया गया  क्योंकि  मिनट्स के संपुष्टि के अभाव में संस्थान का कामकाज प्रभावित हो रहा था । 8 अक्टूबर  2016 को चेयरमैन को बीओजी की बैठक दो हफ़्ते के अंदर बुलाने के लिए फिर से अनुरोध   किया गया चूँकि पिछली बैठक के मिनट्स तीन महीने बीत जाने के बाद भी अभी भी असंपुष्ट थे । 23 अक्टूबर 2016 और 4 नवम्बर 2016 को फिर अनुरोध किया गया।
चेयरमैन महोदय ने बीओजी के सदस्यों के ईमेल के जवाब में चुप्पी साध रखी है। यही नहीं, मौखिक अनुरोध के बावजूद उन्होंने अभी तक बीओजी की बैठक के लिए कोई तिथि मुकर्रर नहीं की है।
मिनट्स के संपुष्टि के अभाव में संस्थान के समक्ष एक संकटपूर्ण  स्थिति उत्पन्न हो गयी है क्योंकि चार महीने पहले हुए बीओजी की बैठक में जो निर्णय लिए गये थे वो अभी तक लागू नहीं हो पाए हैं।
8 जुलाई 2016 की बैठक के बाद बीओजी की अब तक सिर्फ़ एक विशेष बैठक हुई है। जबकि संस्थान के प्रावधान  के अनुसार प्रति वर्ष बीओजी की कम से कम दो साधारण बैठक होना अनिवार्य है।
सबसे बड़ी बात यह है कि चेयरमैन और सदस्यों के बीच न सिर्फ़ परस्पर गहरा मतभेद है बल्कि सदस्यों का चेयरमैन के प्रति गहरा अविश्वास है।
प्रो गिरीश चंद्र त्रिपाठी जो बीएचयू के कुलपति और आईआईटी.बीएचयू के बीओजी के चेयरमैन हैं, लगातार छात्रों और शिक्षकों से संबंधित तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश करते रहे हैं। अभी हुई तात्कालिक घटनाएं छात्राओं का विरोध और उन पर हुआ बर्बर लाठी चार्ज इस बात का प्रमाण है।   
अभी हाल में ही मीडिया के हवाले से ख़बरें आई हैं कि  हाल में बीएचयू की कार्यपरिषद की बैठक में प्रो गिरीश चंद्र त्रिपाठी ने अपने तानाशाही और निरंकुश रवैए का परिचय दिया। और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी उनके इसी रवैए के चलते कार्य परिषद के सदस्य प्रो  मीशेल दनिनो ने अपना इस्तीफ़ा दे दिया।
शिक्षकों और विद्यार्थियों के साथ ही साथ बनारस के आम लोगों का यह मानना है कि प्रो त्रिपाठी का अपने पद पर बने रहना ; कुलपति होने के नाते बीएचयू के कार्यपरिषद और साथ ही आईआईटी.बीएचयू के बीओजी का चेयरमैन बने रहना न सिर्फ़ इन दोनो प्रतिष्ठित संस्थाओं के हित में नहीं है बल्कि इन पदों की गरिमा का अवमूल्यन है। 
ऐसे में यह आवश्यक है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय राष्ट्रीय महत्व के इन दो संस्थानो के हितों की सुरक्षा के लिए तत्काल आवश्यक क़दम उठाये।    

शनिवार, 9 सितंबर 2017

स्मृतियां गढ़ती हैं समाज और देश का भविष्य





स्मृतियाँ स्टेटिक नहीं गत्यात्मक होतीं हैं। स्मृति अगर वर्तमान को रचती है, भविष्य को गढ़ती है तो उसका महत्त्व है। वह वैयक्तिक भी होती है और सामूहिक भी, जातीय भी। वैयक्तिक स्मृतियाँ बहुत लम्बी नहीं होतीं लेकिन सामूहिक स्मृतियाँ लम्बी होती हैं। स्मृति सुरक्षित रहे, आगे बढ़ती रहे, इसके लिए जरूरी है बार-बार उसका दुहराया जाना। ऐसा नहीं होने पर वे नष्ट हो जातीं  हैं। जब स्मृतियों के संरक्षण की बात उठती है तो तमाम तरह के सवाल भी उठते  हैं। किन स्मृतियों का संरक्षण, किसलिए, व्यक्तिगत हित  में या सामूहिक लाभ के लिए। स्मृतियाँ अदने गरीब आदमी की भी होती हैं और अमीरों की भी। वे नकारात्मक भी होतीं हैं और सकारात्मक भी। सवाल यह है कि हम किन स्मृतियों को आगे ले जाना चाहते हैं। वे समाज हित में हैं या समाजहित के विरुद्ध। स्मृतियाँ केवल मीठी और मधुर होतीं हैं या खतरनाक और  वंचक भी।
इस तरह के तमाम  सवाल उठे, उन पर चर्चा हुई, स्मृतियों के सफ़ेद- स्याह पक्षों को समझने की कोशिशें हुई छह सितम्बर को  मऊ में आयोजित एक गहन परिसंवाद में। इसका आयोजन रामगोविंद राय, रामायण राय स्मृति संस्थान  ने किया था।  विषय था, मनुष्यता के लिए क्यों जरूरी हैं स्मृतियाँ। विचार के क्रम में स्मृतियों के राजनीतिक मायने भी समझने के प्रयास हुए और बताया गया की किस तरह ताकतवर लोग या सत्ता संरचनाएं स्मृतियों का अपने पक्ष में इस्तेमाल करती हैं। देखा गया है कि जब भी सरकारें बदलती हैं, सबसे पहले इतिहास से छेड़छाड़ की कोशिश होती है। स्मृतियों का एक वस्तुनिष्ठ पक्ष होता है लेकिन उनके अनुकूल या प्रतिकूल अर्थ निकाले जाने  की संभावनाएं हमेशा बनी रहती हैं। स्मृतियाँ किसी देश का निर्माण कर सकती हैं तो उसे नष्ट भी कर सकती हैं। वे समाज को प्यार और सद्भाव के रास्ते पर भी ले जा सकती हैं और दंगे, मार- काट और अराजकता में भी धकेल सकती हैं। सत्ता हमेशा देश की स्मृतियों को कब्जे में लेने का अभियान छेड़ती हैं क्योंकि उसे  पता होता है कि उनकी अपने पक्ष में व्याख्या  लम्बे समय तक सत्ता में टिके  रहने का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।  जगहों के नाम बदलना, पाठ्यक्रम बदलना या नायकों के जीवन दर्शन के नए अर्थ करना इसी अभियान के हिस्से हैं। आजकल स्मृतियों को खतरनाक हथियार के रूप में इस्तेमाल करके एक ख़ास तरह के अधिनायकवाद की नींव मजबूत करने का अभियान चल रहा है।






संगोष्ठी की अध्यक्षता की अभिनव कदम के सम्पादक, लेखक और कवि जयप्रकाश धूमकेतु ने। प्रमुख वक्ता के रूप में मौजूद थे साहित्य, इतिहास, राजनीति और विज्ञान की समझ से लैस आई आई टी,बी एच यू के प्रोफ़ेसर डा आर के मंडल। साहित्य और समाज पर राजनीति के प्रभाव की समझ रखने वाले बी एच यू में अंग्रेजी विभाग के प्रोफ़ेसर डा संजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार और लेखक बंशीधर मिश्र और कथाकार एवं गाँव के लोग के सम्पादक रामजी यादव ने विशिष्ट वक्ता के रूप में अपनी भूमिका निभाई। विषय प्रतिपादन किया युवा कवयित्री और कथाकार सोनी पांडेय ने। रामगोविंद राय, रामायण राय स्मृति संस्थान के संयोजक राजेंद्र राय ने बताया कि इस वर्ष भारतीय शास्त्रीय संगीत के युवा गायक देवेश सिंह उर्फ़ राजा सिंह को सम्मानित किया गया।  उन्हें प्रशस्ति पत्र एवं 11  हजार रुपये की धनराशि पुरस्कार स्वरुप  प्रदान  की गयी। कार्यक्रम के उत्तरार्ध में प्रखर संगीत शिक्षक डा गिरिजा शंकर तिवारी के शिष्य देवेश और बलवंत सिंह ने सांगीतिक प्रस्तुति दी। 
श्री जयप्रकाश धूमकेतु ने बीज वक्तव्य के लिए सोनी पांडेय की सराहना की, फोक पर गंभीर काम के लिए प्रो संजय कुमार का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सबकी अपनी अपनी स्मृतियाँ होती हैं। गोडसे की भी स्मृति है और गांधी की भी।  एक हत्या की स्मृति है और दूसरी शांति की, एक धाँय-धाँय की, दूसरी हे राम की। मुझे दूसरी पसंद है। धूमकेतु जी ने माटी की गंध, भाई-भाई के प्यार और आम जन के सरोकार को आगे बढ़ाने वाली स्मृतियों को महत्वपूर्ण और रचनात्मक बताते हुए कहा कि ऐसी स्मृतियाँ रामगोविंद राय की भी हो सकती हैं, रामायण राय की भी और अन्य तमाम पिताओं के जीवन की भी। उन्होंने स्मृतियों के सकारात्मक पक्ष को जरूरी बताते हुए दिनकर को याद किया और कहा कि जो स्मृतियों का रचनात्मक उपयोग नहीं करेंगे, समय उनका अपराध दर्ज करेगा--जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध। 
प्रो आर के मंडल ने स्मृतियों  की जटिलताओं की ओर इशारा करते हुए कहा कि विज्ञान की भी अपनी मेमोरी है जैसे अन्य समाज विज्ञानों की। सवाल यह है कि मेमोरी कितनी  दूर तक जानी चाहिए। सच यह है कि हमारे पास जो भाषा है, जिसमें हम व्यक्त होते हैं, वह भी हमारी बनायी हुई नहीं है। वह भी स्मृति का ही हिस्सा है। हम जानते हैं कि  इतिहास समाज को कुछ न कुछ देता है, उसे बनाता है इसलिए इतिहास के प्रति हमें आदर रखना चाहिए। आप कुछ भी कह दें, बिना यह सोचे कि वह प्रामाणिक है या नहीं और जब उसकी व्याख्या का प्रश्न उठे तो चुप्पी साध लें तो खतरा बड़ा हो जाता है। कहते तो हैं कि हम सांझी स्मृतियों वाले लोग हैं लेकिन उन्हें ही ख़त्म कर देने की कोशिशें चल रहीं हैं। प्रयास है कि  स्मृतियाँ एकपक्षीय हों। विज्ञान किसी तथ्य के प्रति एकमत रहता है, हम सर्वसम्मति वाले लोग हैं लेकिन एक कविता की हर कोई अलग-अलग व्याख्या कर देगा। इसी तरह स्मृतियों की अलग-अलग तरह से व्याख्या की जा सकती है। अब फेथ को ही लीजिये। आप कहते हैं आप का फेथ है, कोई बात नहीं लेकिन आप कहें कि फेथ में वस्तुनिष्ठता है तो हम कहेंगे कि विज्ञान का इतिहास पढ़िए। कोई आप की आलोचना करे तो उसे मार दोगे, उस पर हमला कर दोगे, कहोगे स्टेट की आलोचना करना अपराध है। अरे भाई ये आजादी तो हमें हमारे संविधान ने दी है। जो गलत है उसे गलत कहने की आजादी तो देनी ही पड़ेगी। सम्मान के साथ जीने का अधिकार तो हमें मिला हुआ है।उससे आप हमें वंचित नहीं कर सकते।






प्रो संजय कुमार ने स्मृति के महत्त्व को गंभीरता से रेखांकित करने की कोशिश की। उन्होंने सवाल किया कि स्मृति केवल अतीत भर है या भविष्य में भी उसका कोई योगदान है। जवाब देते हुए कहा कि  व्यक्तिगत स्मृतियाँ दो-तीन पीढ़ियों तक रहतीं हैं जबकि जातीय स्मृतियाँ हजारों साल तक। जातीय स्मृतियाँ इसलिए लम्बे समय तक रहती हैं क्योंकि वे बार-बार दुहराई जाती हैं। हम जो भी देखते हैं उसका अर्थ करने की कोशिश करते हैं। अगर जीवन का कोई अर्थ नहीं है तो हम क्यों जियें। इसी मायने में अर्थपूर्ण होना ही मनुष्य होना है। हम इसी अर्थ को अपनी स्मृतियों के सहारे रचते हैं। यहीं एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि स्मृति का कल्पना से कोई सम्बन्ध है या नहीं। सच यह है कि बिना  स्मृति के कल्पना संभव नहीं है और बिना कल्पना के स्मृति भी नहीं। भविष्य की परिकल्पना हमें अपनी स्मृतियों के प्रति सतर्क करती है।  ऐसा न हो तो हम सतत वर्तमान में रहने को अभिशप्त हो जाएँ। अतीत की स्मृतियाँ और भविष्य की परिकल्पना वर्तमान को गढ़ती हैं। इसी अर्थ में स्मृतियाँ महत्वपूर्ण हैं।  प्रो संजय कुमार ने स्मृतियों के एक खतरनाक पक्ष का भी संकेत किया। सत्ता संरचनाएं हमेशा देश की स्मृतियों पर नियंत्रण की कोशिश करती हैं।  उन्हें पता होता है कि इनकी अनुकूल व्याख्या कर वे अपनी नींव मजबूत कर सकती हैं। 
श्री बंशीधर मिश्र ने इतिहास, संस्कृति और साहित्य का हवाला देते हुए कहा कि युद्ध और मौतें जिनके हाथ का खिलौना हैं, उनके हाथ में हमारी सभ्यता को खतरा है। क्या हम सचमुच ऐसे मुकाम पर पहुँच गए हैं जहां सभ्यता नष्ट हो जाने के कगार पर है। जिस यूरोप में ईसा आये थे, जिन्होंने अपने हत्यारों के लिए भी प्रार्थना की।  हे ईश्वर उन्हें माफ़ करना क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। उसी यूरोप में दो हजार साल बाद औद्योगिक क्रान्ति की वीभत्सता दिखाई पडी। उसी की नींव पर रखा गया विकास का सपना आखिर कितना लंबा चलने वाला है। श्री रामजी यादव ने कहा कि हमें तय करना होगा कि  हम किस तरह की स्मृतियाँ सुरक्षित रखना चाहते हैं। वे नकारात्मक भी हैं, सकारात्मक भी। सत्ता से सांठ -गाँठ कर हत्याएं, लूट के  जरिये देश को ख़त्म कर देने की कोशिशें हो रहीं हैं, अन्याय को न्याय लिखा जा रहा है। देश में  गरीब भी हैं, शिल्पकार भी हैं, वे भी देश बनाते हैं, केवल नारे लगाने वाले देश नहीं बनाते। आम जनता किनारे है, हताश है, आत्म हत्या करने पर विवश है। अच्छी स्मृतियों से शोषण, अपमान और अन्याय का प्रतिकार होना चाहिए। अच्छी स्मृतियों को बनाये रखने के लिए बुरी स्मृतियों से लड़ने की जरूरत है।










युवा कथाकार और कवयित्री सोनी पांडेय ने विषय रखते हुए स्मृतियों में बेटियों की जगह का प्रश्न उठाया, इतिहास और साहित्य के सबक की चर्चा की और स्मृतियों के रचनात्मक उपयोग की सलाह दी। इस अवसर पर श्री राजेंद्र राय, दीनानाथ राय, हरे राम सिंह, रवींद्र  राय, डा झारखंडे राय, प्रभात कुमार राय, संदीप कुमार राय, शशिप्रकाश राय, रंजीत राय, रवि प्रकाश, वेदप्रकाश ने अपने विचार रखे। पहले सत्र का संचालन वरिष्ठ पत्रकार सुभाष राय ने और दूसरे सत्र का संगीत के जानकार प्रमोद राय ने किया।  स्मृति सभा में बड़ागांव तथा आस-पास के गाँवों और मऊ के सैकड़ों लोग मौजूद थे। 


रविवार, 3 सितंबर 2017

मनुष्यता के लिए क्यों जरूरी हैं स्मृतियां

रामगोविंद राय, रामायण राय स्मृति संस्थान के तत्वावधान में छह सितंबर को मऊ में संगोष्ठी, साहित्य और समाजशास्त्र के विद्वानों का जमावड़ा, युवा संगीतकार देवेश का सम्मान    स्मृतियाँ ही सभ्य समाज का निर्माण करती हैं। स्मृति विहीन समाज क्रूर, हिंसक और दुस्साहसी हो जाता है। पूंजी निरंतर हमें हमारी स्मृतियों से काटने का षड्यन्त्र कर रही है। मनुष्य बचा रहे, इसके लिए स्मृतियों का बचे रहना जरूरी है। मनुष्यता के लिए क्यों जरूरी हैं स्मृतियां,  इस विषय पर छह सितम्बर 2017, बुधवार  को अपराह्न दो बजे से एस आर प्लाजा भुजौटी, मऊ में एक संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। चर्चा में शामिल होंगे काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आई आई टी के प्रोफेसर और विग्यान एवं साहित्य के अध्येता प्रो आर के मंडल, काहिविवि में अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर एवं साहित्य के विद्वान प्रो संजय कुमार, पत्रकारिता विभाग झांसी विवि के पूर्व विभागाध्यक्ष बंशीधर मिश्र तथा प्रख्यात कथाकार शिवशंकर मिश्र। बीज वक्तव्य प्रस्तुत करेंगी युवा कवयित्री और कथाकार सोनी पांडेय। अध्यक्षता करेंगे अभिनव कदम के सम्पादक और निरंतर अपने   सार्थक   हस्तक्षेप के लिए चर्चित  लेखक और चिंतक जयप्रकाश धूमकेतु।  इस अवसर पर अनेक पुरस्कारों से सम्मानित और मुम्बई विश्वविद्यालय में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में एम फिल कर रहे  प्रखर और प्रतिभासम्पन्न युवा गायक देवेश सिंह (राजा बाबू) को सम्मानित किया जायेगा। उन्हे प्रशस्ति पत्र और ११ हजार रुपये की राशि सम्मान स्वरूप प्रदान की जायेगी। यह आयोजन रामगोविंद राय, रामायण राय स्मृति संस्थान, बड़ागांव, मऊ के तत्वावधान में होने जा रहा है। संस्थान के संयोजक राजेंद्र राय के अनुसार पूरा समारोह दो चरणों में आयोजित किया जायेगा। पहले चरण में सम्मान कार्यक्रम और विचार गोष्ठी होगी और दूसरे चरण में देवेश अपना संगीत प्रस्तुत करेंगे।  जिनकी स्मृति में यह आयोजन हो रहा है, वे   रामगोविंद राय और रामायण राय साधारण आदमी थे। सच बसत यह है कि  हर   साधारण में कुछ असाधारण  जरूर होता  है।  रामगोविंद राय और रामायण राय के व्यक्तित्व में जो कुछ असाधारण रहा होगा, वही हमारी धरोहर है, वही हमारी स्मृति में ठहरने योग्य है, वही और सिर्फ वही याद किया जाना चाहिए। ये दोनों ही बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में मऊ से लगभग दस किलोमीटर दूर बड़ा गाँव में जन्मे। उनके स्मरण में उस आदि मनुज का भी स्मरण है, जिसकी हम सब संतानें हैं और इस तरह अपने मनुष्य होने का भी स्मरण है।

शनिवार, 15 सितंबर 2012

समकालीन सरोकार का प्रवेशांक पाठकों के हाथ में


प्रधान संपादक --सुभाष राय
संपादक --हरे प्रकाश उपाध्याय
फोन संपर्क--9455081894, 8756219902

साखी के पाठकों, लेखकों से क्षमा-याचना सहित। मेरे प्रिय भाई नीरज गोस्वामी और आदरणीय प्राण शर्मा जी की गजलें मेरे पास हैं। उनका यथासमय समकालीन सरोकार में इस्तेमाल किया जायेगा।

सोमवार, 3 सितंबर 2012

कशमकश ऐसी कि मत पूछो


ग़ज़लकार  ओम प्रकाश यती की रचनाओं पर गंभीर चर्चा हुई। सलिल वर्मा उर्फ बिहारी ब्लागर ने कहा कि ओम प्रकाश यती की ग़ज़लों को देखकर मुझे श्रीलाल शुक्ल और मनोहर श्याम जोशी जी की याद आ गयी। आपको अटपटा लगेगा। ये दोनों साइंस के ग्रैजुएट थे, मगर अदब की दुनिया में इनका कोई सानी नहीं। ब्लॉग की दुनिया में जितने भी अदबी लोग मिले तकरीबन ८०% इंजीनियर। और आज एक और इंजीनियर साहब से मुलाक़ात हो गयी उनकी ग़ज़लों के मार्फ़त। सिविल इंजीनियर हैं, लिहाजा ग़ज़लों और अशआर को इस तरतीब से तराशा है कि हर शे’र का हुस्न निखर कर सामने आ गया है।
सुभाष जी, सबसे पहले मैं गज़ल की तरतीब के बारे में कहूँगा कि पिछली बारी में मैंने यही बात कही थी जो आज देखने में आ रही है। एक के बाद दूसरी गज़ल बेहतर से बेहतरीन होती गयी है। पहली गज़ल, लफ़्ज़ों की बुनाई के हिसाब से बहुत अच्छी है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं कि मुँह से ‘कमाल’ निकल जाए। पहले कहीं सुनी-सुनाई सी बातें लगती हैं। लेकिन अपनी बातों को वापस लेने का जी चाहता है जब अगली गज़ल के इन दो शे’र से सामना होता है:
कहीं मैं डूबने से बच न जाऊँ, सोचकर ऐसा
मेरे नज़दीक से होकर कोई तिनका नहीं निकला
-
ज़रा सी बात थी और कशमकश ऐसी कि मत पूछो
भिखारी मुड़ गया पर जेब से सिक्का नहीं निकला
इन दोनों शेर पर बेसाख्ता “वाह” निकल जाती है। तीसरी गज़ल में देवता को इतने रूप में पेश किया है कि आसमान से लेकर धरती और यहाँ तक कि नकली (टीवी सीरियल वाले) देवताओं को भी इन्होंने नहीं बख्शा है। मगर मासूमियत से भरा शेर है ..
भीड़ इतनी थी कि दर्शन पास से सम्भव न था
दूर से ही देख आए हम उछल के देवता.

जिसे पढकर अपना बचपन याद आ जाता है। मेरा सबसे पसंदीदा शेर है यही। और अगले ही शेर में बयान कडवी सचाई :
कामना पूरी न हो तो सब्र खो देते हैं लोग
देखते हैं दूसरे ही दिन बदल के देवता.

अगली गज़ल में “सहसा” खटकता है मतले के अंदर और मतले में छिपा फलसफा खुलकर सामने नहीं आ पाया। आसान से अशआर और एक अच्छी गज़ल। मक्ते में छिपा दर्द बहुत ही खुलकर सामने आया है। और आखिर में बाबूजी का पोर्ट्रेट। इस गज़ल का मर्म वही समझ सकता है जिसने “वो ज़माना” देखा है। एक-एक शेर के साथ लगता है जैसे एक तस्वीर उभरती जाती है और मक्ते तक आकर एक मुकम्मल तस्वीर धोती, कुर्ता, टोपी लगाए बाबूजी की। एक स्केच है यह गज़ल और शायद याद दिलाए कितने घरों में फ्रेम में जड़े बाबूजी की।
आखिर में बस इतना ही कि यती साहब की ग़ज़लों में सादाबयानी है और एक्सप्रेशन की क्लैरिटी है। कुल मिलाकर इंजीनियर साहब एक अच्छे शायर है और इनकी गज़लें मुतासिर करती हैं।
मशहूर शायर अशोक रावत के मुताबिक ओम प्रकाश यती जी मेरे मित्र हैं लेकिन उनसे मित्रता का पहला कारण उनकी ग़ज़लें ही हैं। भाषा के मुहाबरे पर उनकी पकड़, कहन का मासूम अंदाज़ और अपने आस पास की दुनिया मे रमे यती जी अलग खड़े नज़र आते हैं। कोई बनावट नहीं, कोई सजावट नहीं, कोई आक्रामकता नहीं, कोई शिकायत नहीं, कोई धारा नहीं, कोई नारा नहीं बस सीधी-सादी बातें और मासूम अंदाज़। उनकी गज़लें एक दिन हिंदी गज़लों की पहचान बनेंगी मेरा पक्का विश्वास है।
लंदन से ग़ज़लकार प्राण शर्मा ने कहा, यूं तो ओम प्रकाश यती की सभी ग़ज़लें अच्छी हैं लेकिन पहली ग़ज़ल का कोई जवाब नहीं। उसका एक-एक शेर दिल में उतरता है। उनकी एक गज़ल का मिसरा है, देखिये आते हैं अब कब तक निकल कर देवता। इस मिसरे में कब तक के साथ अब का इस्तेमाल मुझे अच्छा नहीं लगा। यती की ग़ज़लें पढ़वाने के लिए सुभाष जी का हार्दिक धन्यवाद।
.शायर तिलक राज कपूर ने कहा, क्या यह एक संयोग भर है कि लगातार तीसरा सिविल इंजीनियर ग़ज़लों के साथ प्रस्‍तुत है और वह दुष्‍यंत कुमार के रंग में डूबा हुआ। भाई बड़ी दमदार ग़ज़ल हैं। बधाई। दिगंबर नासवा के अनुसार यती जी की ग़ज़लें समाज की सच्चाइयों से जुडी ... उनपे गहरा कटाक्ष करती हुयी हैं । किसी एक गज़ल को यहाँ कोट करना आसान नहीं।. बस आनद ही लिया जा सकता है।  वाणभट्ट ने कहा, यती जी की गज़लें एकदम दिल के करीब से निकलीं...और दिल तक पहुँचीं।
ज़रा सी बात थी और कशमकश ऐसी कि मत पूछो
भिखारी मुड़ गया पर जेब से सिक्का नहीं निकला
कामना पूरी न हो तो सब्र खो देते हैं लोग
देखते हैं दूसरे ही दिन बदल के देवता
क्या बात है...
वीरेंद्र कुमार शर्मा ने तारीफ की। शाहिद मिर्जा ने कहा, सुभाष जी, यती जी को पढ़ने का सौभाग्य पहले भी मिला है। आज आपके ब्लॉग के माध्यम से और उम्दा कलाम पढ़ने को मिला। कवि और सायर रूप चंद्र शास्त्री मयंक ने इन ग़ज़लों की लिंक  चर्चा मंच पर लगायी।



आठ सितंबर शनिवार को नीरज गोस्वामी की ग़ज़लें 
------------------------------------------------- 

हां, आज ही, जरूर आयें

 विजय नरेश की स्मृति में आज कहानी पाठ कैफी आजमी सभागार में शाम 5.30 बजे जुटेंगे शहर के बुद्धिजीवी, लेखक और कलाकार   विजय नरेश की स्मृति में ...