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गुरुवार, 9 सितंबर 2010

इस कसक से मीठा कुछ भी नहीं

साखी पर वेद व्यथित की गीतिकाओं पर अच्छा  हंगामा मचा| कुछ तो व्यथित की शैली पर, तकनीक पर और कुछ रचना की समीक्षा के लिए एक ख़ास शब्द पोस्टमार्टम  के इस्तेमाल पर| इस मारामारी में कभी भावुक क्षण भी आये, कभी ताने, उलाहने के अवसर भी लेकिन कुछ संयत स्वर भी दिखे| मेरा मानना है कि कविता पर बातचीत में किसी को भी भावुक होने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि भावुकता हमेशा तर्क और विश्लेषण को मार देती है। यह उलझाती भी है और अक्सर जब हम भावुक होते हैं तो व्यक्तिगत स्तर पर भी उतर आते हैं, जो इस मंच के लिए उचित नहीं है| प्रख्यात शायर सरवत जमाल और सलिल जी उलझे मगर कवि संजीव गौतम, कथाकार निर्मला कपिला और जाने-माने रचनाकार राजेश उत्साही ने सतर्क बीच-बचाव भी किया|  वेद ने बड़ी साफगोई से अपनी कविताओं पर भिन्न-भिन्न तरह के विचारों को स्वीकार किया और जहां जरूरी लगा, अपनी विनम्र असहमति भी जताई|  


सरवत जमाल ने कहा, वेद जी की रचनाएँ निस्संदेह शिल्प और कथ्य के स्तर पर पाठकों को बांधे रखने में सफल हैं, श्रृंगार रस में डूबी, लोगों की कोमल भावनाओं को सहलाती-दुलराती, प्रेम के उस प्रकोष्ठ तक ले जाती हैं, जिसका वर्तमान में अस्तित्व समाप्त प्राय है फिर भी टेक्निक, रिदम और प्रेम-रस, सभी मिलकर एक अनोखी दुनिया तक पहुंचा देते हैं पढ़ने वालों को| भाषा के स्तर पर रचना कई स्थानों पर कमजोर दिखी| चार  स्थान ऐसे हैं, जहां मुझे खटक महसूस होती हैं..गीतिका-१ "उन में शायद ही होंगी तुम को कोई याद अभी|". गीतिका-२ "पपीहा बादलों को ही उसे गा कर सुनाते हैं|".....यही तो नेह की मीठी बहुत नदियाँ बहाते हैं|" गीतिका-३ "हर पल मुझको याद रहा", यह टेक अंत आते आते "वो पल मुझको......"में परिवर्तित हो गया| १- २ मात्राएँ कम हैं| २- पपीहा बादलों.....भाषा के मुताबिक पपीहे होना चाहिए था| ३- यही तो नेह की मीठी बहुत..... यह बहुत नदियाँ के लिए है या नेह के लिए, स्थिति भ्रामक हो गयी है| ४- गीत का एक अनुशासन होता है, उसका पालन होना चाहिए। कई जगह तुक में भी छूट ली गयी है, जिसे जायज़ नहीं ठहराया जा सकता| इन कमियों से रचनाकार का कद कहीं से छोटा नहीं होता| लोगों के समक्ष अपनी रचनाएँ 'पोस्टमार्टम' के लिए पेश करना ही बहुत बड़े कलेजे का काम है| 

सर्वत जमाल का यह पोस्टमार्टम शब्द निशाने पर आ गया| गजल और कविता की अच्छी समझ रखने वाले बिहारी ब्लॉगर यानी सलिल जी ने विस्तार से अपनी बात रखी| उन्होंने कहा,  पहली गीतिका प्रेम की ओस में भीगी सी बाल्यावस्था के प्रेम का स्मरण, बड़े ही कोमल शब्दों में कराती है| कविता के पार्श्व में एक विरह का आभास दीखता है और ऐसा प्रतीत होता है कि कवि आज भी बाल्यावस्था के प्रेम पाश से मुक्त नहीं हो पाया है| कविता में  लयबद्धता कहीं भी भंग होती नहीं दिखती और शब्द विन्यास प्रत्येक शब्द को गरिमा प्रदान करता है| दूसरी गीतिका में विरह के निर्दय चित्रण की परंपरा व्यथित जी ने तोड़ी है| यद्यपि उन्होंने आँसू बहाए हैं, तथापि वे आँसू मोतियों का स्थान रखते हैं| प्रेयसि के विस्मृत बोल, वे पक्षियों के कलरव में श्रवण करते हैं, पपीहे की पुकार बादलों को संदेश देती है विरही प्रेमी का| कवि हिमालय से ऊँची पीर नहीं देखता, उससे निकलती प्रेम की मीठी गंगा को देखता है, उदासी का अंधेरा नहीं, सिंदूरी भोर में प्रेम के कमल खिलते देखता है।


तीसरी गीतिका को सलिल जी ने गज़ल कहने की हिमाक़त की| कहा,  मतला व्यथित साहब के पुराने अंदाज़ यानि हिज्र के अंदाज़ से तर ब तर है, लेकिन अगले मिसरे से जो तेवर उन्होंने बदले हैं वो ग़ज़ब का कन्ट्रास्ट पेश करता है| जहाँ मुल्क़ की आज़ादी के शहीदों को वे याद करते हैं, वहीं टूटी टपकती छत, झूठे वादे और कंगाली का ज़िक्र करके याद दिलाते हैं कि उन शहीदों की क़ुर्बानियों के साथ हमारे लीडरान कितना भद्दा मज़ाक करते रहे हैं| चौथी गीतिका में एक छोटी सी भूल  ने ठिठका दिया| “तुम्हारे आँख” की जगह पर “तुम्हारी आँख” होना चाहिए था| उन्होंने कहा कि  हिंदी या हिंदुस्तानी ज़ुबान में की गई ये शायरी, गुफ्तगू करती मालूम पड़ती है| व्यथित जी की कलम को सलाम करने को जी चाहता है| अगर मुख़्तसर में बात कहनी हो तो बस इतना ही कहा जा सकता है कि एक ख़ुशनुमा बारिश के मौसम में, इतवार के रोज़ बालकनी में बैठे, अपने माज़ी से मुलाक़ात करने की ख्वाहिश हो, तो इनकी ग़ज़लों से बेहतर कोई हमसफर नहीं| 

इसी क्रम में सलिल ने सर्वत साहब को भी खींच लिया | सर्वत साहब खरे साहित्यकार हैं... उन्होंने जिन कमियों की ओर इशारा किया वो दुरुस्त है... सिर्फ एक बात मुझे अखर रही है.. याद नहीं पर पहले भी कहीं किसी ने साखी पर समीक्षा के लिए पोस्ट मार्टम शब्द का प्रयोग किया था, जो सर्वथा अनुचित है| मैं हाथ जोड़कर विनती करता हूँ कि किसी शायर या कवि की जीवंत रचना के लिए, जो शायर के मरने के बाद भी जीवित रहती है, इस  शब्द  का प्रयोग मज़ाक में भी न किया जाए| कविता एक जीती जागती कृति है और ज़िंदा जिस्म पर पोस्ट मार्टम नहीं किया जाता| सर्वत भावुक हो गए ,मुझे बेहद अफ़सोस है कि मुझसे भारी गलती हो गयी और एक शब्द 'पोस्ट मार्टम' का प्रयोग समीक्षा के लिए मैंने कर दिया| पोस्ट मार्टम शब्द  मैंने इन्वर्टेड कामा में लिखा था, मेरा आशय किसी को दुःख पहुँचाना नहीं था| मैं क्षमाप्रार्थी हूँ, आइन्दा आपको शिकायत का मौक़ा नहीं मिलेगा| सलिल भी थोड़ा  पिघले, मेरी अगली लाइन आपने शायद ध्यान से नहीं पढ़ी, जिसमें मैंने कहा है कि पहले भी साखी पर यह शब्द किसी ने प्रयोग किया था... आपका यह लफ्ज़ मुझे पहले वाक़ये की याद दिला गया, मेरे ज़ख़्म ताज़ा हो गए| मेरी बात सोलह आने सच्ची है, आपको बुरी लगी हो तो मैं दोनों हाथ जोड़कर माफी माँगता हूँ|

राजेश जी ने सलिल जी को पूरी बात याद दिला दी| आपकी पोस्‍टमार्टम वाली टिप्‍पणी मैंने देखी थी और उस पर एक टिप्‍पणी भी की थी लेकिन वह प्रकाशित नहीं हुई। हो जाती तो बेहतर होता। इस शब्‍द का इस्‍तेमाल गिरीश जी ने किया था| उनकी पंक्तियां थीं-मुझे बड़ी खुशी होती है, जब कोई पोस्टमार्टम करता है. ऐसे लोग अब बचे ही कहाँ. एकाध दिखते हैं, तो इनका अभिनन्दन ही होना चाहिए। यह मुझे तब भी खटका था| उन्होंने सर्वत जी  को सलाह दी कि सलिल जी की बात को भावावेश में न लें। राजेश जी ने गीतिकाओं पर कहा कि वेद जी की गीतिकाएं मुझे आत्‍मालाप ज्‍यादा लगीं। लगा जैसे वे बस खुद से बतिया रहे हैं। असल में मेरा पाठक मन हर रचनाकार की रचना में समकालीन परिदृश्‍य को ढूंढता है। वेद जी की एक रचना इस बात का हल्‍का सा आभास देती है कि वे वर्तमान में हैं। पर अगले क्षण वे लौट जाते हैं अपने एकाकीपन में। सच कहूं तो वेद जी मुझे व्‍यथित नहीं कर पाए। हो सकता है मैं ही असमर्थ हूं इन्‍हें समझ पाने में ।

यहां संजीव गौतम ने भी दखल दिया, ये माफियों का दौर अच्छा नहीं लग रहा, अरे ये तो विचार हैं, कोई सहमत होगा, कोई असहमत। इसमें बुरा नहीं मानना चाहिए। सर्वत दादा से  अनुरोध है कि आप खूब टिप्पणी करें। पहले से और ज्यादा करें। अगर साखी पर आप, सलिल जी, राजेश  जी की टिप्पणियां न हों तो साखी का मतलब क्या है। आदरणीय सलिल जी का आशय आपको हर्ट करने का  नहीं था।  वेद जी को देखिए उन्होंने किस उदारता के साथ सारी टिप्पणियां स्वीकार की। उम्मीद  है ये माफियों का दौर यहीं खत्म हो जायेगा। गीतिकाओं पर संजीव ने कहा कि  वेद जी के लिए कविता कर्म के द्वारा समाज को रचने के बजाय स्वयं को रचना ज्यादा अच्छा है। मैं तो उनकी इस बात की दाद दूंगा कि उन्होंने इन रचनाओं को ग़ज़ल नहीं कहा। अगर उनकी जगह कोई और होता तो इन्हें ग़ज़ल ही कहता। इस बात के लिए औरों को वेद जी से सीख लेनी चाहिए। वेद जी बहुत संवेदनदशील रचनाकार हैं लेकिन साखी की कसौटी पर ये रचनाएं हल्की हैं। एक बात और सर्वत जी ने वेद जी की एक पंक्ति ‘यही तो नेह की मीठी बहुत नदिया बहाते हैं‘ में 'बहुत' शब्द के स्थान को लेकर कहा है कि वहां भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो रही है पर  अगर हम 'बहुत' को नेह, नदिया और मीठे, तीनों के साथ अलग-अलग भी रखकर देखें तो भी अनर्थ नहीं होता है। इस आलोचना से वेद जी को मुक्त करना चाहिए। निर्मला कपिला जी ने सलाह दी कि  हमे आलोचना को सकारात्मक रूप में लेना चाहिये। अगर हम अपना नज़रिया रख रहे हैं तो जरूरी नहीं कि  वो सब से मिलता हो। व्यथित जी की सभी रचनायें बहुत अच्छी लगी। 


कवि और व्यंग्यकार गिरीश पंकज ने कहा कि अपनी ख़ास मौलिक रंगत के साथ लिखी गयी गीतिकाएं दिल को छू गयीं| वेद जी जैसे प्रयोगधर्मी कवि की ये रचनाएँ हमेशा याद रहेंगी। मदन  मोहन अरविन्द  ने कहा कि  सब का सोचने का अपना-अपना ढंग होता है, कई बार अलग-अलग मूड में पढ़ने पर भी एक ही बात कई तरह के अर्थ दे जाती है, हम सब लोग आपस में एक दूसरे पर विश्वास करना और एक दूसरे को समझने की बेहतर कोशिश करना जारी रखें तो ऐसा करना संभवतः मौन रहने या कुछ कहना बंद करने से अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकता है| नरेंद्र व्यास ने कहा कि  वेद व्यथित जी की रचनाएँ तो अच्छी लगीं ही, मेरे जैसे नव-उत्साही सीखने वालों को इस गहन चर्चा से कितना फायदा हुआ है...मैं बयान नहीं कर सकता| उम्मीद है ऐसी उच्चस्तरीय चर्चा भविष्य में भी पढ़ने को मिलेगी| लेखिका वन्दना जी, विज्ञान कथाकार अरविन्द मिश्र, शायर दिगंबर नासवा, डा रूप चन्द्र शास्त्री मयंक, अदा जी, जय कृष्ण राय तुषार, सुनील गज्जानी, विनय  और फिरदौस खान को भी वेद जी की गीतिकाएं पसंद आयीं| 


मशहूर गजलकार श्रद्धा जैन ने कहा कि बहुत मीठे गीत हैं, प्यार की अठखेलियाँ याद आ गयीं, पेड़ के नीचे बातें, रूठना-मनाना| हिन्दी शब्दों का चयन भी खूब किया है| गीतिकाएं ख़ास तौर पर अपनी सी लगीं, दिल को छू गयीं| अविनाश वाचस्पति अपने रंग में दिखे, रस दे रही हैं रचनायें, गीतिकाएं हों कि कविताएं, तुक के साथ हों या कि हों बेतुकी, रसदार हों या बेरस, पर रचना कोई नीरस नहीं होती, रचना जीवन में रस भरती है, रंग भरती है, तरंग भरती है, आलोड़ित कर देती है मन को, वही व्‍यथित भी करती है, जब करे वेद को व्‍यथित तो घाव महत्‍वपूर्ण हो जाता है| 

गीतिकाकार डा वेद व्यथित ने विनम्रता पूर्वक कहा मैं तो साहित्य का बहुत ही अकिंचन प्रथम कक्षा का भी नहीं अपितु नर्सरी का विद्यार्थी हूँ परन्तु जिन भी मित्रों ने मेरा मार्ग दर्शन किया है और  उत्साह बढ़ाया है, मैं हृदय से उन का आभार व्यक्त करता हूँ | मतभेद बहुत जरूरी हैं परन्तु मनभेद न हों, यह उससे भी जरूरी है|  कुछ शब्दों ,पंक्तियों व व्याकरण सम्बन्धी त्रुटियों की और मित्रों ने ध्यान दिलाया है, अत्यधिक विनम्रता से निवेदन कर रहा हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति एक ही शब्द को अलग-अलग  ढंग से उच्चारित करता है, सबका अपना अपना रिदम है, उच्चारण है, मानसिकता है| हिंदी में जो बारी है, पंजाबी में वही पारी हो जाता है | काव्य व गद्य में भी बहुत अंतर है|  सबको अपनी सोच या विचार रखने का पूरा अधिकार है इसलिए मैं सबके  विचार का सम्मान करता हूँ| भाई सुभाष राय, जो इस सारस्वत कर्म में कर्म योगी की भांति निंरतर गतिशील है, साधुवाद के पात्र हैं| औरों को मान बड़ाई देना, यही उनकी साधुता का आलोक है | वन्दना जी सहित जिन मित्रों ने अपनी कृपा दृष्टि डाली है, उन सभी का मैं हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ |


शनिवार को अशोक रावत की गज़लें 
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बुधवार, 25 अगस्त 2010

जब कहता हूँ सच कहता हूँ.

अपनी गज़लों के कथ्य और भाव के लिये मदन मोहन शर्मा अरविंद की सराहना की गयी पर  गज़ल की तकनीक के अधूरेपन को लेकर उनका घिराव भी किया गया। गज़ल की दुनिया के महारथियों, सर्वत जमाल, प्राण शर्मा और संजीव गौतम  ने साखी के व्यूह में उन्हें घेरा, उन पर सधे तीर चलाये और गज़ल के बुलंद दरवाजे में दाखिल होने की जरूरतें पूरी करने की सलाह दी। मदन ने अपने बचाव में अपने तर्कों के पुष्पवाण छोड़े पर विनम्रता का प्रदर्शन करते हुए गज़ल  के मर्मज्ञ रचनाकारों से इस कला की बारीकियां सीखने की उत्सुकता भी दिखायी। सलिल जी, श्रद्धा जैन और कई अन्य रचनाकर्मियों के सार्थक  दखल ने बहस को  रोचक  और सारगर्भित बनाने में पूरी मदद की। सर्वत जमाल ने माना कि  मदन जी की गजलें अर्थ, भावाभिव्यक्ति के आधार पर मंत्रमुग्ध कर देने की हैसियत रखती हैं। ये गजलें परम्परा से हट कर, समकालीन मानवीय मूल्यों से जुड़ी हुई हैं और इन्हें पढ़ने से रचनाकार का व्यक्तित्व  काफी कुछ सामने आ जाता है पर यह भी जोड़ा कि कुछ शेरों पर थोड़ी मेहनत और की गयी होती तो नतीजा बेहतर हो सकता था। पहली गजल की रदीफ़ है---कुछ ऐसे बरस। अगर यह गजल मेरी होती तो मैं रदीफ ' हाँ अबके बरस' रखता। शर्मा जी द्वारा प्रयुक्त रदीफ़ के कारण कुछ शेर अर्थ को सीधी राह नहीं दे सके। दूसरी गजल अच्छी है,  रात सितारों वाली- हमारे सपनों, सियासत, समाज सभी के पर्याय के रूप में काम कर गयी पर 'मैं भी कितना पागल हूँ', इस गजल में शायद रचनाकार कुछ जल्दबाजी से काम ले गया। मतले में ही, "जब कहता हूँ सच कहता हूँ......"किया होता तो क्या गलत होता। उल्टा वाक्य रख कर अनूठापन पैदा करने का प्रयास सफल नहीं हुआ। चौथी गजल- मेरे लिए हैरान करने वाली है। गलती नजर की चूक हो तो नजरअंदाज़ हो सकती है, गलती बार-बार हो तो सोचना पड़ता है। " जिस्म बौछार जलाती क्यों है-ये घटा आग लगाती क्यों है", इसका वजन है-२१२२११२२२। मतले के बाद गजल के हर पहले मिसरे का वजन है- २१२२१२१२२२। लम्बे अरसे से गजल साधना में रत किसी गजलकार के लिए यह दोष निराशा पैदा करने वाला है। शर्मा जी को मेरा मशवरा है कि गजल का व्याकरण ढंग से सीख लें, सीखना तो जीवन पर्यन्त चलता रहता है।
 

प्राण शर्मा जी ने कहा, मदन मोहन शर्मा के कई शेरों के बयान स्पष्ट नहीं हैं.उनका एक शेर है -
थी फलों की आस जिनसे वो तने सड़ गल गये
हो नयी फिर से फसल तैयार कुछ ऐसा बरस
इस शेर से यह आभास नहीं होता है कि गज़लकार का इशारा पानी से
है या बादल से ? उनका एक और शेर देखिए --


बिन बुलाये गरीब की छत पर 
रोज तूफान मचाती क्यों है
इस शेर में तूफ़ान मचाने वाली कौन है ,बिलकुल स्पष्ट नहीं है। गज़लकार को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि ग़ज़ल का हर शेर स्वंतत्र, अपने बयान में परिपूर्ण और स्पष्ट होना चाहिए। इस बिन्दु पर शर्मा जी ने दखल देने की कोशिश की और स्पष्ट क़िया कि पानी बरसे या बादल, फसल पर दोनों का प्रभाव एक ही होगा, वैसे भी बादल पानी ही बरसाते हैं, फिर अस्पष्टता का प्रश्न समझ में नहीं आता। गरीब क़ी छत पर तूफान मचाने वाली बरसात ही होगी। हर शेर में बरसात की पुनरावृत्ति कोई अच्छा प्रभाव उत्पन्न नहीं करती। प्राण जी ने समझाया,  गज़ल साफ-सुथरा बयान चाहती है। एक बार मैंने ये  मिसरा कहा था, वो गिरेगी, आशियां जल जायेगा। मेरे  उस्ताद ने आंखें तरेर कर पूछा, कौन गिरेगी? मैंने कहा, बिजली। उस्ताद ने कहा, जाओ मिसरे में बिजली का इस्तेमाल करो, गज़ल में किसी भी शब्द की कंजूसी करना सही नहीं। कभी कविवर राम नरेश त्रिपाठी ने कहा था, भाषा को मांजने, संवारने और स्पष्ट कविता लिखने में जितना काम उर्दू शायरों ने किया है, उतना हिंदी के कवि नहीं कर पाये।


संजीव गौतम ने कहा, अच्छी रदीफ ग़ज़ल के अधिकांश  मिजाज को तय कर देती है और रदीफ क्या है, भाषा के मुहावरे का हिस्सा। यहीं हिन्दी के अधिकांश ग़ज़लकार गलती करते हैं और उर्दू में इसी हिस्से पर सबसे ज्यादा मेहनत की गई है। ये भले ही कड़वा लगे लेकिन सच है कि हिन्दी के ऊपर हिन्दी वालों से ज्यादा मेहनत उर्दू वालों ने की है। इसी मुहावरे की कमी के कारण अरविंद जी की ग़ज़लें कुछ कमजोर कही जा सकती हैं। मिसरा पढ़ते ही उसका चित्र आंखों के सामने आ जाना चाहिए, अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो कमी है और यह कमी भाषा पर मुहावरे की कम पकड़ के कारण ही आती है। अरविन्द जी का कथ्य,  उनकी साफगोई एवं अनुभव की प्रामाणिकता  उनमें प्रभावोत्पादकता पैदा करती है लेकिन जब ग़ज़लों की बात चलती है तो कम्बख्त व्याकरण बीच में आ ही जाता है। साहित्य और छंद शास्त्र के मर्मज्ञ आचार्य संजीव वर्मा सलिल और गीतकार रूप चन्द्र शास्त्री मयंक की मौजूदगी महत्वपूर्ण रही| शास्त्री जी ग़ज़लों को पढ़कर प्रसन्न हुए जबकि सलिल जी मदन की ग़ज़लों पर दो दोहे कह गए-
मनमोहन जी की ग़ज़ल, है अनूप-जीवंत.
शब्द-शब्द में भाव हैं, सँग अनुभाव अनंत..
'सलिल' मुग्ध है देखकर, भाषिक सरल प्रवाह.
बिम्ब-प्रतीकों ने दिया, शैल्पिक रूप अथाह..


बिहारी ब्लागर यानि सलिल जी ने अपनी गंभीर उपस्थिति दर्ज कराई| उनके मुताबिक अलंकारिक प्रयोग  ग़ज़लों की सुंदरता को बढ़ा देता है| पहली गज़ल वर्तमान परिस्थिति पर एक अफसोस ज़ाहिर करती हुई, एक उम्मीद की आस लगाए बरसात से विनती करती प्रतीत होती  है। मौक़ापरस्तों और ठगों की बस्तियाँ जलाने का अनुरोध, मुल्क़ के सौदागरों को ख़त्म करने के भाव, धरती के घिनौने दाग़ धो डालने की उम्मीद और एक नई धुली, सद्यःस्नाता धरा की कामना भी है| दूसरी ग़ज़ल में  सितारों की चमक  आशावाद का प्रतीक है|  तीसरी ग़ज़ल, तो एक एलानिया बयान है कि हाँ मैं ऐसा ही हूँ, भले ही तुम्हारी दुनिया मुझे पागल समझे|  हर शेर अपने आप में एकबालिया बयान है इस शायर को पागलख़ाने में डालने के लिए।  जुर्म सिर्फ इतना कि इसने ज़माने के आदाब नहीं अपनाए| चौथी ग़ज़ल में घटा से जिस्म का जलना,  महलों को छोड़कर कच्चे घरों को गिराना, ग़रीब की छत पर तूफान मचाना और मुफलिस के सारे किये पर पानी फेर देना आम आदमी की वेदना है| सलिल जी ने कहा कि इन ग़ज़लों में एक कमी खटकती है, वो यह है कि मिसरा ए सानी को पढ़ने के बाद आपके मुँह से बेसाख़्ता वाह नहीं निकलती है और न टीस पर आह निकलती है| ग़ज़ल की सफलता पूरी तरह उस इम्पैक्ट पर मुनस्सिर है जो मिसरा ए ऊला के साथ डेवेलप होता है और मिसराए सानी के साथ क्या बात है, की बुलंदी पर ख़त्म होता है| राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा कि इन चार ग़ज़लों में चार ख़ूबसूरत शेर छांटने को कहा जाए तो मुश्किल काम साबित हो सकता है । अशआर एक से एक बेहतरीन हैं !
खुश्क मौसम को सिखा दे प्यार कुछ ऐसे बरस
आग पानी से करे सिंगार कुछ ऐसे बरस

आग का पानी से श्रृंगार, बिल्कुल नयी बात है ! वैसे  तग़ज़्ज़ुल और तख़य्युल के पैमाने पर ग़ज़लें कुछ कमजोर हैं । लगभग सपाटबयानी - सी होने के कारण शिल्प - सौष्ठव की परिपक्वता दबती प्रतीत हो रही है । हां , एक दो जगह अलंकारों की उत्पत्ति हुई है , जो सराहने योग्य है ।


श्रद्धा जैन ने ग़ज़लों की तारीफ की| उनको ये ग़ज़ल  खास तौर पर पसंद आई, और सकून समेटते हुए ग़ज़ल के मतले से मक्ते तक का सफ़र तय हुआ... 
अब ये बरसात क्यों नहीं जाती
नींद मुफलिस की उड़ाती क्यों है
उन्होंने इस गजल पर भी मदन मोहन को दिली दाद कबूल कराने को कहा...
कुछ मिटने का खौफ नहीं कुछ आदत की मज़बूरी है
जो दिल में है सब कहता हूँ मैं भी कितना पागल हूँ.
 

कवि और व्यंग्यकार गिरीश पंकज ने कहा, अरविन्दजी की ग़ज़लें  नए तेवर के साथ सामने आई हैं| रचनाओं के तेवर बतलाते हैं कि ये कम नहीं हैं|  कथ्य और शिल्प दोनों मोर्चे पर इनका अपना रंग है..ढंग है। ऐसे पागल ही आज के दौर को चाहिए, जो परिवर्तनकामी हों| कवि राजेश उत्साही ने कहा कि मदन जी की पहली ग़ज़ल के भाव  दोहरा अर्थ पैदा करते हैं। ऐसे बरस से जो ध्‍वनि पैदा होती है वह बारिश का आभास भी देती है और समय का भी। तीसरी ग़ज़ल पढ़कर लगता है जैसे वे हम जैसे पागलों की बात कह रहे हैं। हममें कितने लोग ऐसे हैं जिन्‍हें जब चुप रहना चाहिए तब ही बोलते हैं लेकिन जब बोलते हैं तो केवल सच बोलते हैं। असल में पागलों को ही मिटने का खौफ नहीं होता है। जिसे मिटने का खौफ न हो, वही सच्‍चाई से नहीं डरता है।
चुप रहना हो तब कहता हूँ मैं भी कितना पागल हूँ
सच कहता हूँ जब कहता हूँ मैं भी कितना पागल हूँ.

कुल मिलाकर मदनमोहन जी दिल और दुनिया के बहुत नजदीक हैं। वे केवल दिल की बात नहीं करते, वे दुनिया की बात दिल से करते हैं। यही उनकी रचनात्‍मक ताकत है। 

कवि और रचनाधर्मी सुरेश यादव ने कहा कि मदन मोहन जी की गज़लें मानवीय भावों का तनाव लेकर उपस्थित हैं ,सार्थक अभिव्यक्ति के लिए बधाई| विनोद कुमार पाण्डेय ने कहा, मदन मोहन जी के भाव और शब्द चयन दोनों का कोई जोड़ नहीं| ब्लागलेखन की दुनिया में चर्चित संगीता स्वरुप, अरविन्द मिश्र, नरेंद्र व्यास, डा अमर ज्योति, वंदना जी, गज़लकार दिगंबर नासवा, गीतकार वेद व्यथित, सुनील गज्जाणी और  राणा प्रताप सिंह  की मौजूदगी ने बहस में और रंग भर दिया| 


मदन मोहन शर्मा अरविन्द ने अंत में अपनी ग़ज़ल पर बात करने के लिए साखी पर आये सभी रचनाकारों और साहित्यप्रेमियों के प्रति आभार जताया| आलोचना के बाबत उन्होंने कहा, एक प्रयोग के नजरिये से चौथी ग़ज़ल में मैंने गेयता, प्रवाह और लय का पूरा ध्यान रखते हुए बहर की पाबन्दी में थोड़ी ढील जानबूझ कर छोड़ दी| एक उस्ताद शायर की नज़रों के सिवा यह कमी सब को धोखा दे गयी|  मेरे प्रयोग का यही मकसद था| सही-गलत का फैसला मेरे जैसे नौसिखिये के लिए आसान नहीं, इस पर तो विद्वान् ही कुछ कहें तो बेहतर| प्राण शर्मा जी और सर्वत जमाल साहब के  मार्गदर्शन का लाभ मुझे जरुर मिलेगा| जिन्हें ग़ज़लें कमजोर लगीं, उनसे  निवेदन है, आशीर्वाद दें कि आगे जो  लिखूं,  अच्छा लगे| राजेश उत्साही जी, श्रद्धा जी, डॉ रूप चन्द शास्त्री मयंक जी और बिहारी ब्लॉगर साहब की टिप्पणियों में जिस प्यार और अपनेपन की खुशबू का अहसास हुआ, वह मेरे लिए किसी खजाने से कम नहीं, धन्यवाद कहकर इस अपनेपन में कमी लाने की हिम्मत मैं कैसे करूँ|  संगीता स्वरुप जी , अरविन्द मिश्रा जी, नरेंद्र व्यास जी, दिगंबर नासवा जी, आचार्य संजीव सलिल जी, सुनील गज्जानी जी और गिरीश पंकज जी ने मेरा उत्साह वर्धन किया, आप सबके असीम स्नेह के समक्ष मैं नत मस्तक हूँ|
  

अगले शनिवार को गिरीश पंकज की गज़लें 

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बुधवार, 18 अगस्त 2010

हाथ में पत्थर लिए जब लोग सारे आ गए

श्रद्धा जैन की गज़लों पर जम कर बात हुई। नयी कविता के जाने-माने नाम अरुन  देव को छोड़कर बाकी सबने श्रद्धा जी की गज़लों में नयी आवाज और नया आकाश देखा। अरुन को कुछ शेर पसंद आये, कुछ नहीं पर क्यों पसंद नहीं आये, यह उन्होंने नहीं बताया। हाथ में पत्थर लिये... और ये लम्स तेरा... ज्यादातर लोगों के दिल में उतर गये. गज़लों की दुनिया को नये तेवर देने वाले सर्वत जमाल, बिहारी ब्लागर उर्फ सलिलजी और डा त्रिमोहन तरल ने विस्तार से श्रद्धा की गजलों की छानबीन की।  सर्वत का ख्याल है कि श्रद्धा की सबसे बड़ी खूबी अगर तलाश करने की कोशिश की जाए तो यह बहुत मुश्किल काम होगा. आसान जबान को खूबी बताया जाए, विषय (कंटेंट) को खूबी गिना जाए, कहने के अंदाज़ की तारीफ की जाए, फैसला करना मुश्किल है. एक बात जरूर है, श्रद्धा की कोई भी गजल, पढ़ने वाले को एक फौलादी गिरफ्त में जकड़ लेती है. अगर आप चाहें भी तो श्रद्धा का एक मतला या एक शेर पढ़कर गजल से हट नहीं सकते. गजल बिना खत्म हुए आप को हटने नहीं देगी. इन सबके बावजूद श्रद्धा को अभी और मिट्टी खोदनी होगी, बहुत सी खाइयां पाटनी होगीं, बहुत से रास्तों को अपने हक में हमवार करना होगा. डॉ. सुभाष राय का आभार प्रकट करना पड़ेगा जिन्होंने यत्र-तत्र-सर्वत्र छिटके हुए रचनाकारों को 'साखी' के माध्यम से एक मजबूत प्लेटफ़ॉर्म दिया है. 

सलिल का अंदाजे-बयां इस बार बदला हुआ नजर आया. वे अपनी जुबान भूल गये  और इसके लिये श्रद्धा को जिम्मेदार ठहराया, उनके आधे नम्बर भी काट लिये. बोले, हिज्र के रंग से सराबोर ग़ज़ल, क़ाफिया “छोड़ गया” इसी जज़्बे की तर्जुमानी करता है. मतला बाँध लेता है
अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया
वो मेरी मेज़ पे, अपनी किताब छोड़ गया
ग़ज़ल के सारे शेर एक रूमानियत में डूबे हैं और यहाँ हिज्र का रंग, दर्द से ज़्यादा मोहब्बत का असर पैदा करता है. यहाँ विसाले यार की उम्मीद हर शेर के पसेमंज़र में दिखाई देती है. हर शेर एक से बढकर एक.  मतला सारे रूमानी सिम्बल लिए महबूब के अफसानों का एलान कर रहा है. पर इस रोमांटिसिज़्म में थोड़ा फलसफा भी शामिल है. मसलन, रूह और जिस्म की गुफ्तगू, आँसुओं के सींचे दरख़्त पे खारे फलों की बात, लेकिन दो शेर अलग से खींचकर बाँध लेते हैं...
हमको भी अपनी मुहब्बत पर हुआ तब ही यकीं
हाथ में पत्थर लिए जब लोग सारे आ गए
और
उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे
पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए
जहाँ एक ओर पत्थर हाथ में लिए ज़माने का ज़िक्र है और दूसरी ओर बूढे पेड़ को काटने के लिए आरे लिए इंसानों की ज़हनियत. मक़्ते पर तो बस इतना ही कहना काफी होगा कि ये शरारे नहीं शोले हैं.
 

इस ग़ज़ल की ख़ूबसूरती अलग से निखर के सामने आती है. यहाँ हर शेर अपनी एक अलग पहचान रखता है. और यहाँ प्रतियोगिता है कि कौन बेहतर है. अक्सर ग़ज़ल के मुख़्तलिफ़ शेर मुख्तलिफ़ बयान होते हैं. श्रद्धा जी कि इस ग़ज़ल में सारे शेर अलग अलग तरह से एक ही बात की ओर इशारा कर रहे हैं और वो बात है एक आशिक़ (या माशूक) का अपने बिछड़े माशूक (या आशिक़) के लिए त्याग का जज़्बा, या फिर टूटे हुए दिल से दुआ देना. चाहे वो आँखों में आँसू लिए हौसला देना हो, बारिशों में पत्ते बनकर उड़ जाने वाले परिंदों को छाँव मुहैया कराना हो, अच्छा होगा कह कर ख़ुद को दगा देना हो, सारी ख़ुशियाँ उसके पते पर रुख़सत करना हो, ख़ुद से साथीके मिलने की दुआ हो या तमाम बंदिशों के बावजूद ख़ामोश सदा देना हो. एक शेर जो बाकियों से मुख्तलिफ बयानी करता है अलग से ख़ूबसूरत लगता हैः
मेरे चुप होते ही, किस्सा छेड़ देते थे नया
इस तरह वो गुफ़्तगू को, सिलसिला देते रहे.
उन्होंने कहा, सारी गज़लें बाबहर हैं और गाई जाने वाली हैं.हमारी तरफ से 10 में से 9.5 अंक.
 

डा तरल ने श्रद्धा की ग़ज़लों में  रवायती और जदीद शायरी के फूलों से सजाया गया एक बेहतरीन गुलदस्ता देखा। कहा, ग़ज़लकार के रूप में मैं ख़ुद पारम्परिक एवं आधुनिक तत्वों के स्वस्थ संतुलन का सबल पक्षधर हूँ। चिंतन के वृक्ष की नवीनतम कोपलें सबसे ऊपर और गगन उन्मुखी तो हो सकतीं हैं मगर उन्हें ऐसा बने  रहने के लिए खाद पानी तो जड़ों के माध्यम से ही प्राप्त करने होंगे। माँ कितनी ही बूढ़ी  क्यों न हो जाए अपनी युवा संतति को कुछ न कुछ सिखाने की स्थिति में हमेशा रहती है। श्रद्धा ने जिस खूबसूरती से रूमानी हकीक़त या हक़ीकी रूमानियत को अपने अशआर में पेश किया है वो वाकई काबिले तारीफ़ है। पहली ग़ज़ल के मक़ते में हिज्र देखने वाले हिज्र देखने के लिए आजाद हैं, मुझे तो इसमें उस मुहब्बत के आगाज़ का बड़ी तहज़ीब से किया गया एक खूबसूरत इशारा दिखाई दे रहा है जिसका अंजाम वस्ल भी हो सकता है :
अजीब शख्स  था आँखों में ख्वाब छोड़ गया
वो मेरी मेज पे अपनी किताब छोड़ गया
ध्यान रहे अभी ख्वाब टूटा नहीं है अभी तो ख्वाब की शुरुआत है। दूसरी ग़ज़ल के शेर दौरे हाज़िर के हालात से रूबरू कराते हुए ग़ज़ल को सीधे जदीद शायरी से जोड़ते हैं:
हमको अपनी मुहब्बत पर हुआ तब ही यकीं
हाथ में पत्थर लिए जब लोग सारे आ गए
आनर किलिंग  वाली आज की ज्वलंत सामाजिक समस्या पर सीधा प्रहार तो दिखता ही है, पुरानी पीढ़ी के प्रति हमारी नयी पीढ़ी की अहसान फरामोशी पर उँगली भी उठती नजर आती है। बहर-ओ-वज्न पर पर्याप्त पकड़ बना चुकीं श्रद्धा के पास ग़ज़ल कहने का सभी ज़रूरी साज़-ओ-सामान मौजूद है।
 

शायर ओम प्रकाश नदीम ने कहा, श्रद्धा जी की गजलें पढ़कर सुखद अनुभूति हुई। उनके शेर कहने का ढंग बहुत अच्छा है। ये लम्स तेरा... बिल्कुल नये अन्दाज में कहा गया शेर है। उनकी शायरी का कैनवस काफी बड़ा है। उनमें बहुत सम्भावनाएं निहित हैं। उम्मीद है आगे भी इसी तरह की उम्दा गजलें पढने को मिलेंगी। गजलकार नीरज गोस्वामी ने कहा, श्रद्धा जी की  दिलकश गजलों को पढ़ना एक अनुभव से गुजरने जैसा होता है. सलीके से अपनी बात कहने का उनका अपना एक अलग अंदाज़ है...उनकी ग़ज़लों में से किसी एक शेर को कोट नहीं किया जा सकता, क्यूँ कि  सारी ग़ज़लें और उनमें आये अशआर बेशकीमती, लाजवाब और अनूठे होते हैं...शुक्रिया उनकी बेहतरीन शायरी हम तक पहुँचाने के लिए. 

गजलकार संजीव गौतम ने कहा,  पिछले वर्ष ब्लाग जगत में ग़ज़लों में कई नामों से परिचय हुआ। प्रकाष अर्ष, वीनस केसरी, रविकांत पाण्डेय, अंकित सफर, श्रद्धा जैन। इन सबमें श्रद्धा जी ने बहुत कम समय में अपना एक मेयार कायम किया है। वे अन्यों से मीलों आगे हैं। उनके व्यक्तित्व की एक और खासियत है जिसके कारण वे आज इस मुकाम पर हैं, वह है हर प्रकार की टिप्पणी को सहजता से लेने और ज्ञान जहां से भी मिले उसे समेटने का गुण। उनकी ग़ज़लों की खुश्बू दूर तक और देर तक कायम रहेगी, ऐसा मेरा विश्वास है। श्रद्धा जी की ग़जलों को पढ़कर उन्हें अशआर याद आया-
गिजाल, चांदनी, सन्दल, गुलाब रखता है।
वो एक शख्स भी क्या-क्या खिताब रखता है।
मशहूर रचनाकार अविनाश वाचस्पति का निराला अंदाज फिर दिखायी पड़ा, वैसे तो सभी ताजातरीन हैं पर यह तो बेहतरीन है..
हमको भी अपनी मुहब्बत पर हुआ तब ही यकीं
हाथ में पत्थर लिए जब लोग सारे आ गए
वे बोले, पत्‍थर भी खुश हो रहे होंगे कि सिर फोड़ने से इतर अब यकीं दिलाने के लिए हमारा इस्‍तेमाल होने लगा है। ऐसे पत्‍थरों से सिर नहीं फूटा करते बल्कि मुहब्‍बत करने वाले पत्‍थरों के प्रति श्रद्धावनत हुआ करेंगे। बिना हेलमेट धारण किए पहुंच जाया करेंगे, और इससे अच्‍छा सच्‍चा यकीन का कोई और तरीका क्‍या होगा ? 


मशहूर रचनाकार रवीन्द्र प्रभात ने कहा, अगर सच पूछिये तो श्रद्धा जी की गज़लें मुझे बहुत पसंद है , जब भी कुछ बढ़िया पढ़ने की इच्छा होती है कविता कोश में श्रद्धा जी की ग़ज़लों को बांच लेता हूँ. कवि डा महाराज सिंह परिहार का मानना है कि श्रद्धा जी की गजलें काबिले तारीफ है। उन्‍होंने अपनी निजी अनुभूतियों को अनूठे अंदाज में प्रस्‍तुत किया है। उनकी गजल में संयोग और वियोग की जुगलबंदी भी दिखाई देती है। लेखक और कवि गिरीश पंकज ने कहा, श्रद्धा की अच्छी रचनाओं के कारण उनके प्रति श्रद्धा टपकती है. मुकेश पोपली के अनुसार श्रद्धा की एक-एक ग़ज़ल श्रद्धा पूर्ण है, एक आग है जो इन शोलों से उठती है, एक राग है जो दिल का दर्द सुनाती है। वन्दना जी के मुताबिक श्रद्धा जी ने ज़िन्दगी के हर पहलू को छुआ है अपनी गज़लों मे। अनामिका जी ने कहा कि श्रद्धा जी की लेखनी कमाल की है. सारी गजलें बहुत उम्दा हैं. विनोद कुमार पांडेय को पछतावा है, श्रद्धा को इतना देर से पढ़ना शुरू  करने का. एक से बढ़कर एक शेर. शायर अशोक का कहना है कि श्रद्धा जी की गज़लें  हर गज़ल प्रेमी के दिल को बाँध लेती हैं, ऐसी गज़लें, जिसके किसी भी शेर को आप
न पढ़ने की चूक नहीं कर सकते. कनाडा से समीर लाल जी, बन्धुवर जाकिर अली रजनीश, मदन मोहन शर्मा अरविंद, शहरोज, वेद व्यथित, राजेश उत्साही, राणा प्रताप सिंह, अदा जी और् सुलभ जी की मौजूदगी ने मजलिस को और रौशन किया.  


श्रद्धा जैन  ने वैसे तो सबके प्रति आभार जताया पर सलिल जी को खास याद फरमाया, क्या कहूँ जिस तरह आपने मेरी गजलों का विश्लेषण किया है उसकी रूह तक पढ़ी है, एक एक शब्द पर आपकी टिप्पणी. बस इतना ही कहूँगी कि मेरा ग़ज़ल लिखना सार्थक हो गया .चर्चाकार संगीता स्वरूप को  वैसे तो श्रद्धा जी की गजलें बेहद पसंद हैं, पर एक शेर बहुत लाजवाब लगा,
धूप खिलते ही परिंदे, जाएँगे उड़, था पता
बारिशों में पेड़ फिर भी, आसरा देते रहे .
उन्होंने साखी की इस प्रस्तुति को चर्चा मंच पर 17 अगस्त को पुनर्प्रस्तुत करके हमारा दिल जीत लिया. 








 


अगले शनिवार को मदन मोहन शर्मा अरविंद की गजलें 
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गुरुवार, 12 अगस्त 2010

कभी मेयार से नीचे न गिरना

साखी पर मशहूर शायर ओम प्रकाश नदीम की गज़लों ने जिस तरह सबका ध्यान खींचा, वह इस बात का संकेत है कि जीवन के बीच से उठाये गये कलात्मक बिम्बों के प्रति रचनाकारों और साहित्यप्रेमियों का आकर्षण अपनी पूरी अर्थवत्ता के साथ अभी बना हुआ है। कोई भी अच्छी रचना अपनी पहचान खुद ही करा लेती है, वह पढ़ने या सुनने वालों से आत्मीय होकर बात करती है और उन्हें अपना बना लेती है। गजल की दुनिया में जाने-माने नाम, प्राण शर्मा, श्रद्धा जैन, गिरीश पंकज, नीरज गोस्वामी, हरकीरत हीर  जैसे रचनाकारों ने नदीम साहब को अदब की दुनिया के एक रोशन चिराग की तरह देखा और उनकी गज़लों की मुक्तकंठ से सराहना की. श्रद्धा जैन तो नदीम की गज़लों के मधु-तिक्त स्फोट से इतनी आह्लादित दिखीं कि एक-एक शेर पर अलग-अलग टिप्पड़ी करने से अपने को रोक नहीं पायीं। उन्होंने कहा, कमाल की गजलें हैं, शानदार, हर शेर बरसों तक जेहन में गूंजने वाला। उन्होंने शुभकामना दी कि साखी का कारवां बस इसी तरह चलता रहे। गिरीश पंकज ने कहा, अरसे बाद मैने इतनी प्यारी,दिल में उतरने वालीं गजलें पढ़ी। नीरज गोस्वामी ने कहा, हर शेर ऐसा है कि बार-बार पढ़िए और पहले से ज्यादा लुफ्त उठाइए...एक दम अलग अंदाज़ और ज़ज्बात की बेहतरीन पेशकश बहुत कम कलाम में नज़र आती है लेकिन नदीम साहब की सभी ग़ज़लों में ये हुनर खूब नज़र आया है। .इस लाजवाब शायर के सम्मान में सर झुकाता हूँ और आपका, उनकी शायरी हम तक पहुँचाने के लिए, दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ। प्राण शर्मा ने कहा, नदीम साहब के सभी शेर एक से बढकर एक हैं, सीधी-सादी जुबां है और गहरे भाव हैं। हीर ने कहा, हर शे'र गहराइयों से जुड़ा हुआ, ज़िन्दगी को आइना दिखलाता सा। बहुत कुछ सीखने को मिला इनकी ग़ज़लों से। 

इस बहस में अनेक मान्य रचनाकारों ने अपनी मौजूदगी दर्ज की। रविन्द्र प्रभात का मानना है कि ओम प्रकाश नदीम की गज़लें उम्दा होती हैं, कथ्य और बिंब में गज़ब का तारतम्य होता है और बज्नो-बहर की बात मत पूछिए वो इनकी ग़ज़लों की सबसे बड़ी विशेषता होती है, खासकर यह शेर मुझे बहुत पसंद आया--

चुप रहा तो घुट के रह जाएगा जीने का मजा, 
रोया तो बह जाएगा सब अश्क पीने का मजा। 
समीर लाल जी का कहना है, बहुत ही जबरदस्त रहीं सभी गज़लें और एक शेर जो मेरी डायरी में उतर गया-- 
 बहुत कम में बहुत कुछ है हमारे गाँव में अब भी,
 भले बिजली न सड़कें हैं न ही अखबार मिलता है। 
संजीव  गौतम ने कहा,  नदीम सर की ग़ज़लें सर चढ़कर बोलती हैं उनके व्यक्तित्व की तरह। मुझे नहीं लगता कि इन पर मुझ जैसे नौसिखये को कुछ कहना चाहिए। मैं तो इनसे प्रेरणा ग्रहण करता हूं। मदन मोहन शर्मा अरविन्द ने कहा, कभी चुप रहना कुछ बोलने से अधिक कारगर रहता है. नदीम जी की ग़ज़लें मुझे कुछ बोलने की मोहलत भी नहीं दे रहीं। सुनील गज्जाणी ने उम्दा ग़ज़लों के लिए साखी का साधुवाद किया और गजलों के नयेपन की ओर इंगित किया। वेद व्यथित की नजर में इन गजलों में बहुत सुन्दर रिदम है, रवानगी है और सहजता  है। अविनाश वाचस्पति अपनी काव्यमय प्रतिक्रिया के साथ हमारा उत्साह बढ़ाने के लिये हमारे बीच उपस्थित रहे। बिहारी बाबू यानि सलिल जी अपने अन्दाज में जब गजलों की बात करते हैं तो सबहन के मजा आ जाला। उन्होंने कहा, ई साखी त हमको सीप का जईसा बुझाता है जिसमें से एक से एक मोती निकल कर सामने आता है..ओम प्रकाश नदीम जी को हमारा प्रणाम।
भरे बाजार से अक्सर मैं खाली हाथ आता हूँ
कभी ख्वाहिश नहीं होती कभी पैसे नहीं होते
एक आम आदमी का बेदना इस सेर में देखाई देता है। आनंदित हो गए हम!


राजेश उत्साही ने लिखा, नदीम जी की शायरी उद्वेलित करती है। उनकी शायरी पर कहने को कुछ नहीं है। हां गुनने को बहुत कुछ है। अपनी बात को कहने का उनका अंदाज निराला है। पर उनकी शायरी के बहाने मैं यहां कुछ और कहना चाहता हूं। उनकी शायरी पढ़कर अगर दिल खुश हो गया,मन खुश हो गया या आनंद आ गया जैसी ही प्रतिक्रिया आप दे पा रहे हैं तो समझिए आप उनकी शायरी की आत्‍मा तक नहीं पहुंचे। बस शब्‍दों के चयन और बेहतर संयोजन को देखकर ही वापस लौट गए हैं। नदीम जी की शायरी जिन्‍दगी की जद्दोजहद से रूबरू कराती है, उसकी छटपटाहट को महसूस करने की जरूरत है। मुझे लगता है जितनी मेहनत से रचनाकार लिखता है, उतनी ही मेहनत से उस पर टिप्‍पणी लिखने वालों को करना चाहिए। अन्‍यथा न लें, मन खुश हुआ,दिल खुश हुआ जैसे शब्‍द पढ़कर लगता है जैसे हम प्रशंसा कर रहे हैं या लानत भेज रहे हैं। ध्यान रखियेगा राजेश जी ने कहा है, अन्यथा न लें। डा सी पी राय ने कहा, नदीम जी चारों गजलें बहुत अच्छी है। एक एक शेर पूरी गजल है। शारदा अरोरा को यह शेर बहुत पसन्द आया--

ये रिश्ता हर सफ़र हर मोड़ पर हर बार मिलता है, 
तुम्हारी हर कहानी में मेरा किरदार मिलता है। 

राजीव भरोल और राणा प्रताप सिंह को भी गजलें भायीं। संगीता स्वरूप जी ने इन गजलों की प्रशंसा तो की ही, उन्हें 10 अगस्त को चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर भी लिया। उन्हें साखी परिवार की ओर से आभार।  


 ओम प्रकाश नदीम साहब ने अपने प्रति दिखायी गयी इस आत्मीयता के लिये सभी गजलकारों, रचनाकारों और संवेदनशील साहित्यप्रेमियों के प्रति विनम्रतापूर्वक आभार जताया. उन्होंने सबके लिये एक शेर अर्ज किया---

कभी मेयार से नीचे न गिरना आइना हो तुम
अगर गिरना ही पड़ जाये तो चकनाचूर हो जाना.



शनिवार को साखी पर श्रद्धा जैन की गजलें 
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बुधवार, 4 अगस्त 2010

कविता की चीख भी समझें

'अरुणा के अल्हड़ मन की सहज अभिव्यक्तियाँ सामने आयीं। जैसे कविता के विशाल उपवन में कोई ताज़ा कली अचानक-अनायास खिलकर सुगंध को शब्दों की बयार में घोलकर पूरे उपवन को अपनी ताज़गी का अहसास करा रही हो। कविता में जब सारे मुद्दे चुक जाते हैं तब प्रेम शाश्वत मुद्दे के रूप में हमारे सामने आता है और हर बार नया रूप लेकर। ऐसा ही नया रूप दिखाई दिया है इस नवोदित  कवयित्री की इन कविताओं में', यह विचार जाने-माने रचनाकार डा. त्रिमोहन तरल के हैं।  अरुणा की कविताओं पर बात करते हुए वे आगे कहते हैं, मानवीय व्यवहार की संवेदनशून्यता को अभिव्यक्ति तो उनकी तीनों कवितायें दे रहीं हैं लेकिन दूसरी कविता के अंतिम छोर ने तो ह्रदय को झकझोर कर रख दिया। एक कवि की दो पंक्तियाँ याद आ रहीं हैं -
इक वो दुनियां है जो चीखों को गीत समझती है
इक वो दुनियां है जो गीतों को चीख समझती है
चीखों को गीत समझने वाले लोग तो दुनियां में भरे पड़े हैं, हम कवियों का दर्द तो यह है कि गीतों को चीख समझने वाले लोग कहाँ से आयें।

पर गज़लकार संजीव गौतम को अरुणा की कविताओं की अपनी अर्थवत्ता के बावजूद  सब कुछ संयत नहीं लगा। वे कहते हैं , अरूणा जी  की कविताओं का स्वर वैयक्तिक ज्यादा है लेकिन  यह हमारे समय का एक सच है। कुछ भाषिक प्रयोग के अंश सुखद रूप से चौंकाते हैं। अचानक हड़बड़ाहट या घबराहट में आ जाने वाले पसीने के लिए किया गया प्रयोग ‘शिराओं का रक्त उलीचने लगता है नमक और जल‘ और इस प्रयोग की चित्रात्मकता तथा ध्वन्यात्मकता देखिए ‘कानों के लिए तो सस्वर पाठ करना होगा आंसुओं का..‘ और ये, ‘तभी दूर आकाश में यूकेलिप्टस हिले....‘ वाह बहुत खूब। चित्रात्मक भाषा कवि की सबसे बड़ी पूंजी है। बहुत कुछ अच्छा दिखा इन कविताओं में लेकिन ये गद्य और पद्य के बीच की एक बारीक विभाजन रेखा का अतिक्रमण करतीं भी दिखीं। छन्दमुक्त कविताओं के सृजन में  यदि आप भाषिक रूप से सतर्क नहीं हैं तो कविता के गद्य हो जाने का खतरा उत्पन्न हो जाता है। छन्द मुक्त कविता और गद्य के बीच बहुत स्पष्ट अन्तर नहीं है। पहली कविता के पहले खंड में यह विभाजक रेखा का अतिक्रमण बार-बार दीखता है।

ब्रिटेन के मशहूर कवि और गज़लगो प्राण शर्मा ने कहा कि अरुणा राय की कविताओं में साफ-सुथरी भाषा है और साफ-सुथरे भाव भी। उनमें एक अच्छा कवि छुपा हुआ है, वे बहुत आगे जायेंगी। प्रसिद्ध कवयित्री हरकीरत हीर के मुताबिक अरुणा जी की रचनायें ह्रदय से लिखी गयी हैं, इसलिए पाठक को बरबस खींच लेतीं हैं। कवि, राजनीतिक एक्टिविस्ट और आगरा विश्व विद्यालय में शिक्षक डा सी पी राय ने कहा कि अरुणा जी कि कविताये बहुत गंभीर है, वे  जो कहना चाहती हैं, कहने में सफल रही है। इनकी कवितायें दिल को छूने वाली है। कवि और गज़लकार मदन मोहन 'अरविन्द'  अरुणा की कविताओं में मानवीय संवेदनाओं की सहज अभिव्यक्ति देखते हैं। कवयित्री कविता रावत का मानना है कि अरुणा जी ने मानवीय मन की भावनाओं को बखूबी बांधा है।

रचनात्मक प्रतिभा की धनी संगीता स्वरूप कहती हैं, मन के भावों को बहुत सहजता से कहा है, आधुनिक प्रेम का चित्र खींचा है  और मन की संवेदनाओं को शब्दों में खूबसूरती से ढाला है। प्रसिद्ध चर्चाकार अनामिका जी कहती हैं,  मन के उदगारों को कोमलता से कुछ शब्द दे दिए हैं। कवि और आलोचक राजेश उत्साही  का मानना है कि अरूणा की कविता में एक तरह की अराजकता है। शब्‍दों की अराजकता, विचारों की अराजकता। अराजकता ऐसी है जो आपको अचंभित करती है,परेशान भी और मुग्‍ध भी। आज का युवा मन प्रेम को किस तरह महसूस करता है, वह अरूणा की पहली कविता में सहज रूप से उभर आया है। मोबाइल नामक यंत्र हमारी संवेदनाओं को किस हद तक भौंथरा बना सकता है, यह उनकी दूसरी कविता में है। तीसरी कविता में अनजाने ही यूकिलिप्‍टस का जिक्र आ गया है। संयोग ही है कि यूकिलिप्‍टस संस्‍कृति ने जमीन का पानी तो सुखाया ही है,हमारी आंखों का पानी भी अब सूखता चला है। यह भी क्‍या संयोग ही है कि पिछले हफ्ते इसी जगह प्रस्‍तुत मेरी एक कविता में भी इसी विडम्‍बना का जिक्र था। सचमुच अरूणा से अपेक्षाएं और बढ़ गई हैं। वन्दना जी को लगता है कि राजेश की समीक्षा के बाद उनके लिये कहने को कुछ नहीं बचा है। प्रतुल वशिष्ठ कहते हैं कि प्यार के इर्द-गिर्द पवित्र, मासूम, निर्दोष विशेषणों को सजाना प्यार के प्रति दृष्टिकोण  निर्मित करना है। हम या तो अपने प्रेम की कलुषता को छिपाने के लिए इन शब्दों को ओढ़ते हैं, या फिर इन शब्दों को बिछाकर प्यार की साधना करते दर्शाते हैं। आकांक्षा जी और मिथिलेश दुबे को भी कवितायें दिल छूने वाली लगीं।




व्यंग्यकार अविनाश वाचस्पति की प्रतिक्रियाओं में मैंने प्रतिकविता के तत्व पाये, इसलिये उनका उल्लेख करना जरूरी होगा।  उन्होंने एक खास बात भी कही, रचना वही है, जो रचने केलिये बाध्य कर दे। उनकी प्रतिकविताओं को उसी तरह रख रहा हूं।
1. मोबाइल से प्‍यार/ उससे खींचे चित्रों से प्‍यार/ संदेशों से प्‍यार/ चाहे वे भेजे गए हों/ चाहे वे पाए गए हों/ चाहे खो गए हों/ पर प्‍यार सबसे है। हवा, पानी, धूप/ जैसा हो गया है मोबाइल/ ऐसा लगता है/ प्रकृति में ही ढला था/  अब सामने आया है/ इसने सबको लुभाया है। इसका प्‍यार अलग भी है/ इसे रिचार्जिंग चाहिए/ ऊष्‍मा बैटरी की चाहिए/ बिना इसके / न प्‍यार चलता है/ न प्‍यार पलता है/ इसके झांसे में आ जाए/ वो कभी न संभलता है / पर यह जीवन है/ क्‍यों जीवन ऐसे ही चलता है। 2. आंसुओं का सस्‍वर पाठ/ बरसात है/ उसका साथ है/ आप उसे किस रूप में/ स्‍वीकारते हैं/ बादल बनते हैं खुद / या बन जाते हैं टब/ जिसमें भर जाए पानी/ आंखों का सारा पानी/
जो आंसू बन बहने लगता है। 3. आकाश में यूकेलिप्‍टस/ यू के से लिपटना नहीं होगा/ जरूर कोई पौधा ही होगा/ नहीं जानता अर्थ/ इसलिए अनर्थ गढ़ा है/ शब्‍दकोश में तलाशूं/ इस पचड़े में नहीं पड़ता/ मन से पढ़ता हूं/ जिन शब्‍दों को/ मैं समझ नहीं पाता/ याद फिर भी/ मुझे रह नहीं पाता/ बरसात हो और/ ले गया होऊं छाता।


शनिवार को ओम प्रकाश नदीम की गज़लें
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हां, आज ही, जरूर आयें

 विजय नरेश की स्मृति में आज कहानी पाठ कैफी आजमी सभागार में शाम 5.30 बजे जुटेंगे शहर के बुद्धिजीवी, लेखक और कलाकार   विजय नरेश की स्मृति में ...