अशोक रावत नाम है एक अलग अंदाज का, एक अलग रोशनी का| दुष्यंत के बाद हिन्दी में ग़ज़ल को ज़मीनी (हारिजन्टल) विस्तार तो खूब मिला, लेकिन आसमानी (वर्टिकल) विस्तार बहुत ज्यादा नहीं। दुष्यंत की ग़ज़लों में इतनी चमक थी कि ज्यादातर हिन्दी ग़ज़लकार उन जैसा बनने के मोह में फंसे रहे। जिन ग़ज़लकारों ने हिन्दी में ग़ज़ल को वर्टिकल विस्तार देने की सफल कोशिश की है, उनमें अशोक रावत जी का नाम अग्रिम पंक्ति में रखा जा सकता है। उन्होंने हिन्दी में ग़ज़ल को नयी भाषा, नये संस्कार और नयी कहन दी है, जो उनकी अपनी है। अशोक जी की ग़ज़लों को आप भीड़ में पहचान सकते हैं। यानि की उनके पास अपना मुहावरा है। ये वो गुण है, जिसकी तलाश हर साहित्यकार को रहती है। ग़ज़लों की दुनिया में पूरी उम्र गुज़ार देने के पश्चात भी ये हर किसी को नहीं प्राप्त होता। अशोक जी की ग़ज़लों का दूसरा गुण है कि वे कहीं से भी आयातित नहीं लगतीं। उनमें अपनी मिट्टी, अपने भाषाई सौन्दर्य और अपनी सांस्कृतिक चेतना की महक हर किसी को अपना दीवाना बना लेती है। 15 नवम्बर, 1953 को ग्राम-मलिकपुर, मथुरा (उत्तर प्रदेश) में जन्मे अशोक रावत का एक ग़ज़ल संग्रह ‘थोड़ा सा ईमान‘ वर्ष 2003 में प्रकाशित हो चुका है। देश की लगभग हर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका में उनकी ग़ज़लें प्रकाशित होती रहीं हैं| संप्रति वे भारतीय खाद्य निगम में उच्च पद पर नोएडा में पदस्थ हैं। यहां प्रस्तुत हैं उनकी कुछ ग़ज़लें........
1.
हाँ मिला तो मगर मुश्किलों से मिला, आइनों का पता पत्थरों से मिला.
दोस्ती आ गयी आज किस मोड़ पर,
दोस्तों का पता दुश्मनों से मिला.
मौलवी और पंडित घुमाते रहे,
उसका पूरा पता काफिरों से मिला.
ढूँढ़ते-ढूँढ़ते थक गया अंत में,
मुंसिफों का पता कातिलों से मिला.
जाने क्या लिख दिया उसने तकदीर में,
मुझको जो भी मिला मुश्किलों से मिला.
अड़चनें ही मेरी रहनुमा बन गयीं,
मंजिलों का पता ठोकरों से मिला.
2.
हमारे हमसफर भी घर से जब बाहर निकलते हैं,हमेशा बीच में कुछ फासला रखकर निकलते हैं.
छतों पर आज भी उनकी जमा हैं ईंट के अद्धे,
कहीं कानून से सदियों पुराने डर निकलते हैं.
किसे गुस्सा नहीं आता, कहां झगड़े नहीं होते,
मगर हर बात पर क्या इस तरह खंजर निकलते हैं.
समझ लेता हूं मैं दंगा अलीगढ़ में हुआ होगा,
मेरी बस्ती में मुझसे लोग जब बचकर निकलते हैं.
जिन्हें हीरा समझ कर रख लिया हमने तिजोरी में,
परखते हैं कसौटी पर तो सब पत्थर निकलते हैं.
| मिलीवोज सेगन द्वारा तैयार की गयी डिजिटल छवि |
3.
उसके दर पे सर झुकाने मैं तो रोजाना गया,ये अलग किस्सा है काफिर क्यों मुझे माना गया.
अब किसी की फिक्र में ये बात शामिल ही नहीं,
नाम जाना भी गया तो किसलिये जाना गया.
उनकी हां में हां मिलाना मुझको नामंजूर था,
मेरे सीने पर तमंचा इसलिये ताना गया.
मैं किसी पहचान में आऊं न आऊं, गम नहीं,
मेरी गजलों को तो दुनिया भर में पहचाना गया.
जो हमारी जान थी, पहचान थी, ईमान थी,
आज उस तहजीब का हर एक पैमाना गया.
यूं सुना तो पक्ष मेरा भी अदालत ने, मगर,
मुजरिमों के पक्ष को ही अंत में माना गया.
4.
जब देखो तब हाथ में खंजर रहता है,उसके मन में कोई तो डर रहता है.
चलती रहती है हर दम इक आँधी सी,
एक ही मौसम मेरे भीतर रहता है.
गुजर रहे हैं बेचैनी में आईने,
चैन से लेकिन हर इक पत्थर रहता है.
तंग आ गया हूं मैं इसकी बातों से,
कौन है ये जो मेरे भीतर रहता है.
दीवारों में ढूढ़ रहे हो क्या घर को,
ईंट की दीवारों में क्या घर रहता है.
गौर से देखा हर अक्षर को तब जाना,
प्रश्नों में ही तो हर उत्तर रहता है.
थोड़ा झुककर रहना भी तो सीख कभी,
चौबीसो घंटे क्यों तन कर रहता है.
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