कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 18 जून 2011

हरे प्रकाश उपाध्याय की चार कविताएँ

 हरे प्रकाश उपाध्याय को साखी पर प्रस्तुत करते हुए मुझे संतोष और गर्व दोनों का अनुभव हो रहा है| वे एक ऐसे युवा कवि हैं, जिन्होंने अपनी और अपने पहले और बाद की पीढ़ियों को एक साथ आकर्षित और प्रभावित किया है| बिहार में ५ फरवरी १९८१ को जन्मे इस अग्निधर्मा युवक ने लम्बी अराजक भटकन के बाद अपना दीप्त पथ बना लिया है और उस पर अब आगे बढ़ना जारी  है| हरे के शब्दों में मैं हिन्दी का एक गरीब लेखक हूँ, रोटी के लिए पत्रकारिता करता हूँ| भारतीय ज्ञानपीठ से एक कविता संकलन प्रकाशित है| वे मेरे सहयोगी भी हैं और जनसंदेश टाइम्स के फीचर संपादक के रूप में काम कर रहे हैं| मेरे सपनों के पंख की तरह| पर मैंने उन्हें बेड़ियाँ डाल रखी हैं| काम, हर दम काम| योजना, संपर्क और उस पर अमल| बीवी, बच्चों तक के लिए समय नहीं| साखी के लिए रचनाएँ मांगी तो उन्होंने बदहवासी में एक साथ लिखी तीन कविताएँ मुझे मेल कर दीं| मैंने एक और रचना उनके संकलन से उठा ली, जो बदहवास समाज के बारे में है| प्रस्तुत है हरे प्रकाश उपाध्याय की चार कविताएँ....   


१.
माघ में गिरना
कविता मिली थी
बहुत दिनों के बाद
सावन के बाद माघ में
एक पेड़ के नीचे
पत्ते बुहार रही थी
चूल्हा जलाना था उसे शायद
हमने उलाहने नहीं दिए
उसने देखा एक नजर मेरी तरफ
मैं थोड़ी दूर पर शीतल हवा में कांपते हुए पत्तों सा
ठिठुरता अपने गिरने की प्रतीक्षा करते हुए
उसे देखता रहा भौंचक

हम यों तलाश रहे थे बरसों से
एक-दूसरे को हर सावन के मौसम में
ईश्वर की लीला ही कहिए जनाब कि
माघ में जब बिना ढूंढे मिले
अचानक
तब वह मुझे ठीक से देख नहीं पा रही थी
मैं रचता क्या उसे
रचा तो मुझे जाना था...

हम देर तक देखते रहे
नहीं पता क्या-क्या
उसकी आंखों के कोर भीग गए
और मैं गिरा तो उठ न सका...

जान-पहचान नये सिरे से हो रही थी।
२.
मायावी यह संसार
अधिकांश चीजें मायावी हैं
मार तमाम संकटों के बीच ही
हँसी की बारिश
मार गुर्राहटों के बीच
कोयल की विह्वल पुकार
ऐ कोयल तुम पागल हो और एक दिन तुम पागल बना दोगी समूची दुनिया को
ऐ नदी तुम जरा इधर नहीं आ सकती शहर में
ऐ हवा, तुम अपना मोबाइल नं. दोगी मुझे
सुनो, सुनो, सुनो....
अधिकांश चीजें मायावी हैं...

जिनकी आवाजों के शोर के बजे नगाड़े
उनसे भागे जिया
जिनकी आवाज न आए
उसी आवाज पर पागल पिया..
जहां रहने का ठौर, मन वहां न लागे मितवा
चल, यहां नहीं, यहां नहीं, यहां नहीं...
पता नहीं कहां
चल कहीं चल मितवा...
अधिकांश चीजें मायावी हैं...

जिन चीजों से प्रेम वे अत्यंत अधूरी
इन अधूरी चीजों की भी महिमा गजब

यह जीवन सुखी-दुःखी एक पहेली...

जी नहीं रहे हम
बस अपनी उम्र के घंटे-पल-छिन गिन रहे बस
और इसी गुणा-भाग में एक लंबी उम्र गुजार कर
जो गए
उनके लिए मर्सिया पढ़ रहे हैं हम...
३.
कविता के बारे में एक बड़बड़ाहट
कविता, ओ कविता
क्या तुम गरीब की जोरू हो...
नहीं तो क्यों इतने सारे लोग
तुम्हें भौजाई बनाए हुए हैं
कोई तुम्हें चिकोटी काट रहा है
कोई कागज के बिस्तर पर नचा रहा है तुम्हें

कोई माइक पर गूंजते
कुछ निहायत उपयोगी शब्दों के लिबास में तुम्हें पेश कर रहा है
कोई तुम्हें बेच रहा है
कोई खरीद रहा है
खाने-कमाने का काम भी ले रहे तुमसे कुछ लोग
क्या तुम ही हमारे समय की कामधेनु

तुमसे करते हैं इतने लोग जो प्रेम
क्या सब देह-संबंधी हैं तुम्हारे?
रहने दो कुछ गोपनीय प्रश्न और भी हो सकते हैं
कुछ लोग मां कहते होंगे तुम्हें, बुरा मान जाएंगे
जाओ जीयो अपनी जिंदगी, जाओ
नदी की तरह, हवा की तरह...चाहे जैसे

पर कविता को फसल की तरह
काटनेवाले कवियों
एक न एक दिन तुम्हें हिसाब देना ही होगा...

४. 
खिलाड़ी दोस्त 
खिलाड़ी दोस्तों के बारे में
बताने से पहले ही सावधान कर दूँ कि
मेरा इशारा ऐसे दोस्तों की तरफ़ नहीं है
जो ज़िन्दगी को ही एक खेल समझते हैं
बल्कि यह उन दोस्तों की बात है जो
खेल को ही ज़िन्दगी समझते हैं
जो कहीं भी खेलना शुरू कर देते हैं
जो अक़सर पारम्परिक मैदानों के बाहर
ग़ैर पारम्परिक खेल खेलते रहते हैं


वे दोस्त
खेल के बाहर भी खेलते रहते हैं खेल
जब भी जहाँ
मौक़ा मिलता है पदाने लगते हैं
पत्ते फेंकने लगते हैं
बुझौव्वल बुझाने लगते हैं
गोटी बिछाने लगते हैं
आँखों पर कसकर बाँध देते हैं रूमाल
और दुखती रग को दुखाने लगते हैं


वे दोस्त अच्छी तरह जानते हैं
दोस्ती में खेलना
सही तरह पैर फँसाना वे जानते हैं
जानते हैं वे कब
कहाँ से मारने पर रोक नहीं पाएगा गोल
जानते हैं कितनी देर दौड़ाएँगे
तो थककर गिर जाएगा दोस्त
वे हाथ मिलाते हुए अक़सर
हमारी भावनाएँ नहीं
हमारी ताक़त आँकते रहते हैं
अक़सर थके हुए दौर में
भूला हुआ गेम शुरू करते हैं दोस्त
वे आँसू नहीं मानते
तटस्थ वसूलते हैं क़ीमत
हमारे हारने की


सुख और ख़ुशी में भले भूल जाते हों
दुख में अकेला नहीं छोड़ते
आ जाते हैं डंडा सँभाले
उदासी और थकान में
शुरू करते हैं खेल
और नचा-नचा देते हैं


दोस्त अवसर देखते रहते हैं
काम आने का
और मुश्किल समय में अक़सर
ऐसे काम आते हैं कि भूल नहीं सकते हम


हमारे गहरे अभाव
टूटन और बर्बादी के दिनों में
जब दुश्मन उपेक्षा करते हैं हमारी
दोस्त आते हैं ख़ैरियत पूछने
और हास्य के शिल्प में पूछते हैं हाल
हमारे चेहरे की उड़ती हवाइयाँ देखकर
हताश नहीं होते
वे मूँछों में लिथड़ाती मुस्कान बिखेरते हैं


दोस्त हमें हारकर
बैठ नहीं जाने देते
वे हमें ललकारते हैं
चाहे जितने पस्त हों हम


उठाकर हमें मैदान में खड़ा कर देते हैं वे
और देखते रहते हैं हमारा दौड़ना
गिरना और हमारे घुटने का छिलना
ताली बजाते रहते हैं वे
मूँगफली खाते रहते हैं
और कहते हैं
धीरे-धीरे सीख जाओगे खेल


जो दोस्त खेल में पारंगत होते हैं
खेल से भागने पर कान उमेठ देते हैं
कहते हैं, कहाँ-कहाँ भागोगे
'भागकर जहाँ जाओगे
हमें वहीं पाओगे'


खेल में पारंगत दोस्त
खेल में अनाड़ी दोस्त से ही
अक़सर खेलते हैं खेल!  

संपर्क--08853002004

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

अरुणा राय की कविताएं

 अरुणा राय का नाम कविता के उन नये सशक्त हस्ताक्षरों में शामिल किया जा सकता है, जो अपनी रचनाओं से लगातार सबका ध्यान आकृष्ट कर रहे हैं। वे इलाहाबाद में जन्मीं, वहीं से स्नातक पूरा किया। पठन-पाठन और अपने मन के गहन कोने से उभरती आवाजों को शब्द देना उनकी अभिरुचियों में शामिल है। पत्र-पत्रिकाओं और वेब पत्रिकाओ में निरंतर उनकी उपस्थिति देखी जा सकती है। प्रथम काव्य संग्रह प्रकाशनाधीन है। सम्प्रति शासकीय सेवा में कार्यरत हैं । अरुणा राय की कुछ रचनायें प्रस्तुत हैं......
1. 
हाँ जी, इन दिनों हम
प्यार
में हैं 
अब यह मत पूछिएगा कि
किसके
हवाओं के, चांदनी के या
रेत के
बस प्यार है और हम
लिखते चल
रहे हैं कोई नाम
जहाँ-तहाँ और उसके आजू
बाजू
लिख दे रहे हैं पवित्र
मासूम निर्दोष
और यह सोचते हैं कि ये
उसे ज़ाहिर कर देंगे या
ढंक लेंगे


आजकल कभी भी खटखटा देते
हैं
एक दूसरे का हृदय
और हड़बड़ाए से कह
बैठते हैं
लगता है बेवक़्त आ गए
और ऐसा कहते हुए समाते
चले
जाते हैं
एक दूसरे के भीतर


फिर अचानक ख़ुद को
समेटते
चल देते हैं झटके से
कि फिर बात करते हैं
कि एक पूछता है
अरे, आपका कुछ छूटा जा
रहा है यहाँ
कोई दिल-विल-सा तो
नहीं


नहीं वह आपका ही है
मेरे तो किसी काम का
नहीं


ऐसा कहता मन मसोसता
झटके से छुपा लेता है
उसे मन


कभी यूँ ही बज उठता है
मोबाइल
पता चलता है ग़लती से दब
गया
था नंबर
कि घंटी बजती है दिमाग
की
वह लगता है चीख़ने
संभलो दिल दिल दिल
कि हत्था मार बंद करता
उसका हंगामा...




2. 
कैसी हैं आप
फोन पर
पूछता है कोई


क्‍या ...
हकलाती हूं मैं ...
ठीक हूं
ठीक तो हूं...


आप ठीक हैं ना ...
मैं कुछ कहता
कि ...
शिराओं का रक्‍त
उलीचने लगा
नमक और जल


आंसुओं की बाढ़  ने
हुमककर कहा
हां ... हां...
ठीक हूं बिल्‍कुल...


उसने कहा ...


कुछ सुनाई नहीं दे रहा
साफ


ओह ... हां ...
आंसू तो आंखों की भाषा है
आंखवालों के लिए है
कानों के लिए तो
सस्‍वर पाठ करना होगा
आंसुओं का ....


3. 
कुछ बूंदें टपका...
हल्की हो गई...
कि
कुछ हुआ ही ना हो...
फिर कुछ सुना...
फिर याद किया किसी को...
पर नहीं आए आँसू
फिर
गुज़र गई रात भी
गहरी नींद थी
स्वप्नहीन
सुबह जगी
तरोताज़ा
क़िताबें पढ़ीं.............
नहीं
अब यादें शेष नहीं
वाह - जादू हो गया आज
मुक्त हो गई वह तो...........


फिर बैठ गई कुर्सी पर
तभी दूर आकाश में
यूकेलिप्टस हिले
कि जाने कहाँ से फिर
छाने लगी धुंध
और छाती चली गई... 


सम्पर्क - ई-मेल-arunarai2010@gmail.com
--------------------------------------------- 

शनिवार, 24 जुलाई 2010

राजेश उत्साही की कविताएं

राजेश उत्साही लम्बे समय से रचना कर्म से जुड़े हुए हैं। उन्होंने मप्र की अग्रणी शैक्षिक संस्था एकलव्य में 1982 से 2008 तक कार्य किया। संस्‍था की बाल विज्ञान पत्रिका चकमक का 17 साल तक संपादन किया। संस्‍था की अन्‍य पत्रिकाओं में संपादन तथा प्रबंधन सहयोग के अलावा एकलव्‍य के प्रकाशन कार्यक्रम में भी उनका योगदान रहा। मप्र शिक्षा विभाग की पत्रिका गुल्‍लक तथा पलाश का संपादन भी सम्हाला। नालंदा, रुमटूरीड तथा मप्रशिक्षा विभाग के लिए बच्‍चों के लिए साहित्‍य निर्माण कार्यशालाओं में स्रोतव्‍यक्ति के रूप में जिम्मेदारी निभायी। कविताएं, कहानी, व्‍यंग्‍य लेखन खासकर बच्‍चों के लिए साहित्‍य निर्माण, संपादन तथा समीक्षा में उनकी गहरी रुचि है। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। फिलहाल आजीविका के सिलसिले में बंगलौर में हैं। यहां उनकी चार कविताएं प्रस्तुत हैं.... 


पानी
_________
पानी
अब कहीं नहीं है

पानी जो हम पीते थे
पानी जो हम जीते थे
पानी
मीठा पानी
पानी का मीठापन
अब नहीं है

न पानी रहा
न पानीदार लोग
पानी न आंखों में है
न चेहरे पर

पानी
उतर गया है
जमीन में नीचे
बहुत नीचे
इतना जितना कि
आदमी अपनी आदमीयत से।

विलोम अर्थ
वो
दुश्म‍न
नहीं हैं मेरे
हां, मैं उनका दुश्मन हूं
चूंकि
अपना दोस्त कहा था उन्हें 
इसलिए मैं
उनका दुश्मन हुआ
क्योंकि 
उनके शब्द कोश में
मेरे हर शब्द के लिए एक विलोम अर्थ है
मेरे हर तर्क के लिए एक विलोम तर्क है
जैसे
मैं सूखा कहूं तो वे पानी कहेंगे
मैं दिन कहूं तो वे रात कहेंगे
रखूं अगर हल तो उलझन कहेंगे
शायद
अपना अस्तित्व बनाए
रखने के लिए
यह जरूरी है
उनकी अपनी रणनीति में

आश्चर्य
कि मेरे शब्दकोश में
दोस्त का अर्थ
अब तक वही है।

 इच्छाएं
1. 
चुक
जाने के भय से
अभिव्यक्ति के खतरे
उठाने से बचता रहा
यह अलग बात है कि
व्यक्त करने को कुछ भी नहीं है।

2. 
अचोटिल रहे शरीर, इसलिए
दूर रहा छोटी-मोटी लड़ाइयों से
फिर भी
बचा नहीं पाया
सुई की नोक भर जगह
वार झेलने के लिए
हृदय पर ।

3. 
शब्दों
के खेल में बचाकर रखे थे
ढाई आखर
बारी आने तक
असली अर्थ खो चुके थे वे।

4 . 
इच्छाएं
अनंत हैं, रहेंगी
ताउम्र अधूरी
फिर भी कुछ आदिम इच्छाएं
बची हैं
अंत के लिए। 


कल रात
कल रात
अपना कटा हुआ सिर
लिए घूमता रहा मैं
सड़क पर आवारा
कोई
नहीं था
जो करता शिनाख्त

देखा
जिसने भी
वह अपरिचय
के भाव से भर उठा
इस तरह
जैसे वर्षों से नहीं मिला
मुझसा कोई

पहचानने
से इंकार कर दिया
दोस्तों ने
रीझते थे
जो बातों पर मेरी
हमनिवाला हमप्याला थे

नहीं दौड़ा
उनकी नसों में भी खून
जो देखकर भर उठते थे
हिकारत से मुझे
वे
रहे
सहज ही
नजदीकियों से मेरी जो
हो उठते थे परेशान

चमक
उनकी आंखों में भी
नहीं दिखी
खिल उठती थीं बांछें जिनकी
मुझे देखकर
यहां
तक कि
भावशून्य रहा
चेहरा उनका, लबों पर
नहीं हुई जुंबिश
जिन पर थिरकती थीं
तितलियां मुस्कान की
मेरे होने भर के अहसास से
अपना
कटा हुआ सिर
लिए घूमता रहा मैं
सड़क पर बदहवास
कल रात

कहीं
कोई
नहीं था जो करता शिनाख्त।
--------------------------------- 

सम्‍पर्क : मोबाइल  09611027788,
email:  utsahi@gmail.com
ब्‍लाग   
http://utsahi.blogspot.com गुल्‍लक  
http://apnigullak.blogspot.com यायावरी
http://gullakapni.blogspot.com गुलमोहर







शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

यही है साखी

कबीर ने कहा, आओ 
तुम्हें सच की भट्ठी में 
पिघला दूं, खरा बना दूं 


मैंने  उनके शबद की आंच पर 
रख दिया अपने आप को 
मेरी स्मृति खदबदाने लगी 
वेद, श्रुति, पुराण और उपनिषद 
तलछट की तरह बाहर हो गये 
जाति वाष्प बनकर उड़ गयी 
उंच-नीच का दर्प भस्म हो गया
शबद रह गया सिर्फ अनहद 
गूंजता हुआ मेरे महाकाश में 


कबीर ने पूछा, क्या देख रहे हो 
अब अपने भीतर, बताओ 
मैं चुप रहा, बिल्कुल खामोश 
जब मेरे भीतर-बाहर 
कबीर ही कबीर था 
जब मैं था ही नहीं तो 
कौन देता जवाब, किसे 


यही है साखी, कहा कबीर ने 
और मैं स्पंदन में बदल गया 
नाद में तबदील हो गया
अब मैं अपना घर 
फूंकने को तैयार हूँ, 
लुकाठा थामने को तैयार हूँ 





हां, आज ही, जरूर आयें

 विजय नरेश की स्मृति में आज कहानी पाठ कैफी आजमी सभागार में शाम 5.30 बजे जुटेंगे शहर के बुद्धिजीवी, लेखक और कलाकार   विजय नरेश की स्मृति में ...