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शनिवार, 31 दिसंबर 2011

नसीम साकेती की रचनाएँ

खेत में भूख उगे फाकों के अंकुर फूटें, क्या इसी वास्ते खूनों से धरा सींची थी, ऐ मेरे देश के नेताओं बताओ इतना, क्या नए देश की तस्वीर यही खींची थी, अपने आग भरे अल्फाज से ये सवाल उठाने वाले नसीम साकेती को साहित्य की दुनिया में सभी जानते हैं| वे केवल शायर या कवि नहीं हैं, एक सरोकार संपन्न लेखक के रूप में भी उन्होंने अपनी पहचान बनाई है| इधर हंस, वागर्थ और लमही में आयी उनकी कहानियां काफी चर्चा में रही हैं| एक साफ-सुथरा नजरिया और जनपक्षधरता नसीम की पूंजी है, जिसके बूते वे अपना किरदार खड़ा करते हैं| उनकी सादगी में उनका बड़ा होना देखा जा सकता है| अम्बेडकर नगर  जिले के मिझौड़ा कसबे में जन्मे नसीम रेलवे में इंजीनिअर रहे| अब वे पूरी तरह लेखन में जुटे हैं| प्रारंभिक दौर में प्रेमचंद और अमृत लाल नागर की कहानियों तथा  साहिर, कैफ़ी और दुष्यंत की कविताओं ने उन्हें बहुत प्रभावित किया| नसीम की कविताएं भी कहानियों का आनंद देती हैं| यहाँ प्रस्तुत हैं उनकी कुछ रचनाएँ-- 

१. पत्थरों का शहर
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पहले आप..पहले आप
जेहन में उभरते ही
बिजली की तरह कौंध जाता है
शहर का नाम
जो कभी जाना जाता था
तहजीब और तमद्दुन के लिए
नजाकत और नफासत के लिए
प्यार और मुहब्बत के लिए
अम्न और शांति के लिए
भाई चारे के लिए
इंसानियत के लिए
सबसे बड़ी बात इज्जत के लिए

लेकिन आज...?
जिस शहर में खड़ा हूँ
ये तो वो शहर नहीं है
पहले आप..पहले आप के बजाय
पहले मैं..पहले मैं
मैं...माफिया हूँ, नेता हूँ
धन-कुबेर हूँ, तिकड़मी अफसर हूँ
मेरे हुक्म के बगैर
एक पत्ता नहीं हिलता
मैं...जो चाहता हूँ, करता हूँ
है किसी में हिम्मत
मुझ पर डाल दे हाथ
किया तो था मेरे बेटे ने उस
लड़की का अपहरण, हत्या
क्या हुआ
घूम तो रहा है वह बेख़ौफ़, निश्चिन्त
इसी शहर में

आँखें फाड़-फाड़ कर देखता हूँ
कुछ धुंधला-धुंधला सा दिखता है
शहर बहुत बड़ा हो गया है
पर आदमी छोटा
बागों के शहर में उग आये हैं
कंक्रीट के जंगल
अख़बार बोझिल हैं
अपराध की खबरों से
इसीलिये दीनानाथ ने छोड़ दिया
अख़बार पढ़ना
पर इससे क्या सब कुछ बदल जायेगा..?

पहले जब कोई मां, कोई बहन
कोई चाची-ताई
मनचले लड़कों को
किसी लड़की पर बुरी निगाह
डालते देखती थी
डांटती, फटकारती थी---
कलमुंहे तेरी यह मजाल
और लडके सर नीचा करके
रफू चक्कर हो जाते थे

लेकिन अब तो
सगी मां, बहन, चाची, ताई के
मना करने पर
आँखें तरेरकर खड़े हो जाते हैं
धमकाते, कट्टा  दिखाते
कई बार पूरी ढिठाई के साथ
खड़े हो जाते हैं

क्यों? क्योंकि अब पूरा शहर
पत्थरों का शहर हो गया है





२. मुल्क की बात करो
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मियां बीवी राजी
तुम क्यों दुबले हो रहे हो काजी..?

मचल रहे थे शब्द
दोनों पक्षों के जुबान की नोंक पर
अदालत के फैसले का सम्मान करेंगे

फैसला आ गया
मनहूस आशंकाएं काफूर हो गयीं
फिर तुम अपनी नाक क्यों
घुसेड़ते हो..मुसरचंदों..?

पहले की तरह
आग लगा कर जमालो दूर खड़ी

लेकिन सुनो

नयी नस्लों को अब वैसा तमाशा नहीं
दिखा पाओगे मदारिओं ...?
जनमानस करवट बदल चुका है
अब तुम्हारी दाल नहीं गलेगी

कल की तरह आज भी

तुम्हारी सोच से
सियासत की बू आती है
तुम्हीं तो थे
विवाद की आंच पर
स्वार्थ की रोटियां सेंकते हुए
खून-खराबा को दावत देते हुए
अनेक शहरों में बम-ब्लास्ट करते हुए

छीन लेते थे क्षण भर में जिंदगियां

लूट लेते थे मां-बहनों की अस्मतें
बेबस मजबूर आँखों के सामने....
साठ साल का तवील अरसा....


हजारों साल पीछे चली गयी
अयोध्या के चेहरे पर उभरने वाली रौनक
विकास का मुंह टेढ़ा हो गया
अफवाहों के हाथ लम्बे हो गये
कारोबार बौने हो गये
घर के चूल्हे ठन्डे पड़ गये
फाके पर फाके

अयोध्या रो पडी

लेकिन इसका अफ़सोस
तुम्हें नहीं है शायद
अयोध्या को तो है
अयोध्यावासियों के जख्मीं दिलों से
पूछ कर तो देखो
सरयू की पावन धारा का
करुण क्रंदन तो सुनो
कलेजा मुंह को आ जायेगा

सद्य स्नाता दुल्हन सी लगती थी अयोध्या

लेकिन आज..?
किसी विधवा की मांग सी लगती है
चेहरा पीला मुरझाये फूल सा हो गया है
शरीर सूख कर कांटा हो गया है

शर्म करो..चुल्लू भर पानी में डूब मरो

क्योंकि सरयू तुम्हें स्वीकार नहीं करेगी

अभी भी वक्त है

गंगा-जमुनी तहजीब को निखारने का
कौमी एकता की डोर को मजबूत करने का
सदियों से अपनी सांझी शहादत की दास्ताँ
सुना रहा है जन्मस्थान रामकोट के पास
कुबेरटीला का ऐतिहासिक इमली का पेड़

जो साक्षी है

१८५७ के बागियों
रामदास, अच्छन खां, अमीर अली को
१८ मार्च १८५८ को एक साथ 

फांसी पर चढ़ा दिया गया था

वो इमली का पेड़

जब देशभक्तों के लिए
रोशनी का मीनार बनने लगा
१९३५ में अंग्रेजों ने उसे भी
शहीद कर दिया

चश्मदीद गवाह है

मणिपर्वत पर
पैगम्बर शीश की मजार
स्वर्ग द्वार पर शाहजहानी मस्जिद

आज भी उसी अयोध्या में

रामगुलाम, गुलाम हुसेन
अगल-बगल मकानों में रहते हैं
उनका राम-भरत जैसा प्यार
भाई-चारे की ऐसी मिसाल
चिराग लेकर ढूँढने पर भी
नहीं मिलेगी

भगवान के लिए

खुदा के वास्ते
बंद करो
पत्थर फेंकना
प्यार के ठहरे हुए  पानी में

बंद करो स्वार्थ की रोटियां सेंकना

सियासत के तवे पर
यहाँ की दरो-दीवार
हवा, फिजां
सरयू की धारा
की आवाजें सुनों

अमन के दीप जलाओ

नफ़रत के अँधेरे मिटाओ
दिल से दिल को मिलाओ
कौमी एकता के गीत गाओ
जय-पराजय की नहीं सौहार्द की बात करो
मंदिर-मस्जिद की
मिल्कियत के आईने में
मुल्क की बात करो

३. अंतिम अभिलाषा

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मुहब्बत के चिरागों को जला लूं तो चलूँ

नफ़रत के अंधेरों को मिटा लूं तो चलूँ
ऐ मौत मुझे थोड़ी सी मोहलत दे दे
वतन की खाक को आँखों में लगा लूं तो चलूँ 


संपर्क-१/७५६, आदिलनगर एन्क्लेव, लेन ५, कंचना विहारी मार्ग, कल्यानपुर पश्चिम लखनऊ
मोबाईल 09415458582

शनिवार, 3 सितंबर 2011

पाँच रंगों की रंगोली


साखी पर जितेन्द्र जौहर के गीत कुछ आलोचनाओं के साथ आम तौर पर सराहे गये| विमर्श की गंभीरता दिखाई पडी| कविता की खासी समझ रखने वाले सलिल वर्मा उर्फ़ बिहारी ब्लॉगर की बात गौर करने लायक रही| उन्होंने कहा, आज ब्लॉग लेखन में या अन्यत्र भी कविता लिखना इतना सहज और सामान्य समझा जाने लगा है कि हर व्यक्ति कविताई करता दिखाई देता है| उन्हें ऐसी कविता लिखते समय तनिक भी भान नहीं होता कि मूर्ख उन जगहों पर धड़ल्ले  से प्रवेश कर जाते हैं, जहां पाँव धरते हुए देवदूत भी भयभीत होते हैं| जितेन्द्र  जी की कवितायेँ जब-जब पढ़ी हैं, तब-तब यह प्रतीत हुआ है कि इनकी कविताओं में इनका अनुभव और ज्ञान दोनों परिलक्षित होता है| एक और विशेषता यह दिखाई देती है कि भाषा के विद्यार्थी होने के कारण अंगरेजी एवं हिन्दी दोनों भाषाओं पर समान प्रभाव दिखाई देता है| ऐसे में शब्दों का चयन, भावों का सम्प्रेषण, विषय का चयन और शब्दों की मितव्ययिता देखी जा सकती है| 

साखी के अंक में उनकी पाँच कविताओं का संकलन स्वागत योग्य है| जब मैंने पहली  कविता पढ़ना प्रारम्भ किया तो लगा कि अपने ही गाँव में बैठा हूँ, आस पड़ोस की कहानी सुन देख रहा हूँ, अपनी माता को मुझे विदा करते हुए और अंचरा के कोर से आँखें पोंछते देख रहा हूँ| गाँव से शहर की ओर पलायन करते लोगों के साथ परिवार मनोविज्ञान का जीवंत चित्रण देखने को मिलता है| बाद की दोनों कविताओं में अम्मा की व्यथा और बंटवारे का दुःख मन को झकझोर गया किन्तु साथ ही लगा कि तीनों कविताओं की पृष्ठभूमि और परिवेश एक से हैं और व्यथा भी| जौहर जी की रचनाओं में इतनी विविधता है कि उनकी पाँच रचनाएँ पाँच रंगों की रंगोली प्रस्तुत कर सकती हैं| हमारे नपुंसक दौर के वर्णन में जिस ओज का परिचय जौहर जी ने दिया है, वह उनके ही नहीं इस दौर की हर संवेदनशील मन की सोच है| इस कविता में जिन शब्दों का चयन किया गया है वे शब्द उस आक्रोश को व्यक्त करने में सफल रहे हैं. और इतने उचित हैं कि उनके स्थानापन्न शब्दों की कल्पना भी उस आक्रोश को कम करती सी लगती है|
अंतिम रचना एक व्यंग्य रचना है इसलिए उसे हलके फुल्के अंदाज़ की ही रचना कहना उचित होगा| कुल मिलाकर जितेन्द्र जौहर साहब का रचना संसार मुग्ध करता है|
 

कवि और आलोचक राजेश  उत्साही जितेन्द्र की रचनाओं की जी भर तारीफ से संभवत: और लेकिन के साथ सहमत हैं| वे कहते हैं, कई बार कुछ बातें और कुछ ऐसे पहलू भी होते हैं जो हमें प्रत्यक्ष नजर नहीं आते। इन कविताओं में भी ऐसा कुछ है। यह भी बहुत संभव है कि कई पाठकों ने उन्हें देखा भी हो, पर साथ ही नजरअंदाज कर दिया हो। मैं अभिव्यक्ति के इस खतरे को जानते हुए भी अपनी बात रख रहा हूं। मेरी इस टिप्पणी को सिक्के के दूसरे पहलू के रूप में ही लिया जाए। सारी ही कविताएं जो गीत की तर्ज पर लिखी गई हैं, इन्हें निश्चित तौर पर व्यापक जनसमूह के सामने मंच से पढ़ा जाएगा तो वन्स मोर, वन्स मोर की ध्वनि सुनाई देगी। इस कसौटी पर वे खरी उतरती हैं। लेकिन यहीं इनमें एक गंभीर बात छिपी है। पहली तीन कविताएं आंसू बहाऊ फिल्मों की स्क्रिप्ट लगती हैं। 

पहली कविता हिन्दुस्तान के किसी ऐसे गांव का वर्णन लगता है जो शहर को लेकर अति पूर्वाग्रही है। ऐसे गांव शायद फिल्मों में ही नजर आते हैं। दूसरी कविता अम्मा की दुर्दशा जबरन संवदेना से भर देती है। लेकिन जरा रुककर आप इसे पढ़ें। यह घोर स्त्री विरोधी कविता है। स्त्री को स्त्री के खिलाफ खड़ी करती कविता। वही बहू और सास के टाइप्ड स्टीरियो। जीवन का सच यही भर नहीं है याकि इतना सफेद और काला नहीं है कि आप किसी भी एक पक्ष में खड़े हो जाएं। तीसरी कविता बंटवारा पढ़ते हुए फिर एक बार लि‍जलिजी संवदेना उभर आती है। चौथी कविता में शब्दों से चमत्कार पैदा करने की कोशिश है जिसमें कवि सफल भी हुआ है। पर बात जैसे कुछ बनती नहीं है। अंतिम कविता चुनावी मौसम भी चुनाव के नारों की तरह ही लगती है। इन कविताओं में मूल स्वर निराशा ही पकड़ में आता है। पांच कविताओं में से एक भी ऐसी नहीं है जो जीवन के प्रति किसी तरह की आशा जगाती हो। कम से कम कवि अपनी इन कविताओं में तो कोई नई जमीन नहीं खोज पा रहा है। 

अरुण चन्द्र राय  कहते हैं, जौहर जी की पांचो कवितायेँ पढ़ ली हैं| कुछ कवितायेँ कई बार पढ़ी हैं| लम्बी दूरी है, अम्मा की दुर्दशा और बंटवारा एक मिजाज़ और विषय की कवितायेँ हैं और हमारा दौर और चुनावी मौसम अलग चित्र प्रस्तुत करते हैं| इन दिनों अच्छी कविता का अर्थ गूढ़ और उलझी हुई, जटिल कविता से होता है| इस रुझान से अलग ये पांचो कवितायेँ सरल हैं, सहज हैं. स्पष्ट हैं, बड़ी बातें नहीं, आम बात कह रही हैं| हिंदी कविता आज कई खेमो में खड़ी है| कुछ कविता इंडिया में और इंडिया के लिए लिखी जा रही हैं, कुछ कवितायेँ भारत के लिए लिखी जा रही हैं|  इस वर्चुअल स्पेस में भारत की कविता, ठेठ छोटे शहर और गाँव से लिखी गई और गाँव के लिए लिखी गई कवितायेँ है| ये पांचो कवितायें उसी भारत की हैं| माएं आज भी लम्बी दूरी के लिए, ठेठ गरीबी में भी लड्डू बाँध देती हैं, भले बेसन और चीनी उधार की हो| कविता में गाँव की महक और संवेदना यत्र तत्र सर्वत्र है| पहली कविता मुझे व्यक्तिगत तौर पर अधिक महत्वपूर्ण लग रही है क्योंकि अभी आंकड़े  आये हैं कि देश में शहरीकरण बढ़ा है| आज़ादी के बाद से ही शहरों के विकेंद्रीकरण की बात चल रही है लेकिन बहुत लाभ नहीं मिला है| गाँव से पलायन जारी है| यह लम्बी दूरी महज भौतिक दूरी नहीं है बल्कि दूरी सामाजिक, संस्कृति और अवसर की उपलब्धता की है|

ब्लाग की दुनिया के महारथी अविनाश वाचस्पति कहते हैं, कविता का यही चित्र सच्‍चा है। सच्‍ची बात कहने का अपना आनंद है। इन कविताओं में जो महसूसन है, वह सबकी है। सब जानते हैं। पर करते वही हैं जो कविता में कहा गया है। इसे बदलना संभव नहीं है। कविता चाहे लंबी हैं पर एक बार पढ़ने में ही पूरा आनंद देती हैं। बार बार पढ़ने का मन करता है। सच सच ही रहता है। सच सच ही कहता है। यही जौहर है इन कविताओं का। कवि ने कविताओं का सृजन कर नामानुरूप सुख दिया है।


लेखक और व्यंग्यकार रवीन्द्र प्रभात कहते हैं, जौहर की रचनाएँ पढ़ने के बाद गहरी संवेदनाओं को अपने अंतर्मन में उतारकर बार-बार मानव जीवन की व्यथा को महसूस करते हुए नए सृजन को तलाशने की इच्छा बलवती होती  है, सचमुच यह इन रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता है ...बहुत सुन्दर,बहुत सारगर्भित और बहुत ही उम्दा रचनाएँ ! कवयित्री हरकीरत हीर कहती हैं, जितेन्द्र जी के ये गीत सीधे दिल में उतरते हैं| पारिवारिक रिश्तों की मार्मिकता को कितनी गहराई से उतारा है उनकी कलम ने | ये गीत महज़ गीत नहीं हैं पारिवारिक रिश्तों में हो रहे विघटन को भी दर्शा रहे हैं, हमें भविष्य के लिए सचेत भी कर रहे हैं| सीधी सरल भाषा में गाँव का परिवेश बाँध कर रख दिया है उन्होंने| शब्दों में भी गाँव की भीनी-भीनी सी मिठास है, जो गीत को बार-बार पढने का आग्रह करती है|  अश्विनी राय प्रखर कहते हैं, जौहर के गीतों में मिठास, निश्छल प्रेम, करुणा, सम्मान तथा सुन्दर शब्दों का धारा प्रवाह देखते ही बनता है|  माँ बाप की अपने बेटे के प्रति ममता अत्यन्त प्रभावी ढंग से मुखरित हुई है| अम्मा की दुर्दशा का जो सजीव चित्रण किया है, वह आज घर घर की कहानी है| ‘बंटवारा’ में एक और कड़वे सच को अनूठे गीत के माध्यम से प्रस्तुत किया है| जीवन में जिस तीव्रता से सामाजिक मूल्यों में गिरावट आई है, उसकी झांकी  इन गीतों में स्पष्ट दिखाई देती है| गीतकार ने जिस उद्देश्य से इन गीतों की रचना की है, वह सर्वजन हिताय एवं सर्वजन सुखाय होने के साथ साथ मनोरंजक एवं मनमोहक भी है|


कवि और गजलगो प्राण शर्मा लिखते हैं, कविवर जितेन्द्र की कवितायें मैं बड़े मनोयोग से पढ़ गया| उत्कृष्ट भावाभिव्यक्ति ने मन को छू लिया| डॉ महाराज सिंह परिहार कहते हैं, जितेन्‍द्र जौहर की कविताओं में मानवीय संवेदना के साथ ही पारिवारिक आत्‍मीयता है। बदलते परिवेश में जबकि आदमी आत्‍मकेन्द्रित हो गया है, इस तरह की अनुभूतिपरक  रचनाएं कविता के जीवंत होने का प्रमाण हैं| अलबेला खत्री के अनुसार मैंने कविता पढ़नी  शुरू की, गीत की रौ में मैं यों बहता गया कि जितेन्द्र जी बहुत पीछे छूट गये और उनके गीत बहुत आगे निकल गये| इस अनुपम काव्य-यात्रा को मैं लम्बे समय तक अपने भीतर महसूसता रहूँगा| देवेन्द्र पाण्डेय को जौहर की कवितायें पढ़कर प्रेमचंद की कहानियाँ याद हो आईं। सुशील बाकलीवाल  कहते हैं, जीवन में संयुक्त परिवार की कठोर वास्तविकताओं को रेखांकित करती इन सुन्दर कविताओं के वाचन का अवसर उपलब्ध करवाने हेतु साधुवाद| लेखक जाकिर अली रजनीश कहते हैं, जितेन्‍द्र जौहर उन रचनाकारों में हैं, जो दिल से लिखते हैं और जो लोग दिल से लिखते हैं, वे सीधे पाठकों के दिल में उतर जाते हैं। दिगंबर नासवा लिखते हैं, सभी रचनाये  ज़मीन से जुड़े सत्य को लक्षित कर के लिखी गयी हैं|


भोजपुरी के सशक्त रचनाकार मनोज भावुक के अनुसार सरल, सहज लेकिन सारगर्भित व मानवीय संवेदनाओं से लबालब ये कवितायेँ सीधे दिल को छूती हैं और कुछ सोचने - समझने को विवश करती हैं| राजेश जी क्षमा करेंगे, स्त्री-स्त्री के बीच खाई बढाने जैसी कोई बात है ही नहीं.....यथार्थ का बयान है यह| सत्य को उपेक्षित कर एक काल्पनिक सुखद चित्र खींचने से अधिक प्रेरक है वास्तविक दुखद चित्र खींचना| कल्पना हमें भटकाती है, वास्तविकता चिंतन के लिए प्रेरित करती है,  इसलिए रचना धर्मिता का उद्देश्य तो इसी में पूर्ण हो पाता है| अंतिम रचना में भी फ़िल्मी जैसा कुछ नहीं लगा मुझे| सरल सहज रचनाओं के लिए जीतेन्द्र जी को साधुवाद ! कन्नौजी बोली के आंचलिक शब्दों की मिठास और आंचलिक शब्दों को संरक्षित करने के अनुकरणीय प्रयास के लिए जौहर जी को विशेष बधाई| हिन्दी की समृद्धि तो आंचलिक अगढ़ शब्दों से ही है| हिन्दी के प्राण बसते हैं इनमें| कन्नौजी बोली की ग्राम्य सरलता आकर्षक है| 


उमेश महादोषी लिखते हैं, जितेन्द्र जौहर जी को इस रूप में देखकर कुछ अलग ही अनुभूति हुई। गांव का वह परिदृश्य भी जीवन का हिस्सा रहा है और वे परिस्थितियां भी, जिन्हें पहले तीनो गीतों में शब्द-चित्रों में बांधा है। नज़दीक से देखी-भोगी यह अनुभूति संवेदना को भी झंकृत कर गई और स्मृतियों को भी। समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है। गांव अब गांव नहीं रह गये हैं, उनमें भी शहर की आत्मा बस गई है और शहर आज हमारी भौतिक जरूरत बन गये हैं। पर आत्मिक जरूरतें पूरी नहीं हो पाती, सो मन उस सबको याद करता ही है, जो भले नहीं रहा, पर हमारे अन्तर्मन में कौंधता जरूर है। पहला गीत पढ़कर करीब पच्चीस वर्ष पूर्व पढ़े एक गीत की अनुभूति भी मेरी स्मृति में ताजा हो आई है, सम्भवत डा. अश्वघोष जी का गीत है- ‘बहुत दिनों के बाद मिला है, अम्मां का खत गांव से’। समीर लाल उर्फ़ उड़नतश्तरी, अवनीश चौहान, वेद व्यथित, नीरज गोस्वामी, धर्मेन्द्र सिंह सज्जन, मनोज कुमार , रामेश्वर काम्बोज, बी एस पाबला, ज्ञान चन्द्र मर्मज्ञ , डॉ श्याम गुप्ता, गीता पंडित, गिरिजा कुलश्रेष्ठ , कौशलेन्द्र, पंकज सारस्वत ने भी इन गीतों को सराहा| 


रचनाकार जितेन्द्र जौहर ने अपना पक्ष रखते हुए कहा, सभी टिप्पणियाँ/अभिमत किसी-न-किसी रूप में महत्त्वपूर्ण हैं; इनमें जो भी मुझे विशेष रूप से ग्राह्य लग रहा है, उसे मैं आभार सहित सिर-माथे स्वीकार करता हूँ। इस टिप्पणी  "...तीसरी कविता ‘बँटवारा’ पढ़ते हुए फिर एक बार लि‍जलिजी संवदेना उभर आती है..." -में प्रयुक्त ‘लि‍जलिजी संवदेना’ नामक वाक्यांश अरसा-पूर्व गीत के खिलाफ़ छेड़े गये एक आन्दोलन में प्रयोग किये गये ‘लिजलिजी भावुकता’ नामक आक्षेप का ‘उच्छिष्‍ट-चर्वण’ है। ध्यातव्य है कि जो लोग गीतिकाव्य पर ‘लिजलिजी भावुकता’ का आरोप लगाते रहे हैं, उनकी बोझिल कविताएँ वृहत्तर पाठक-वर्ग ने नकार दी थीं। उनमें बिम्ब और प्रतीक इतने जटिल थे कि कविता जो कि हृदय-प्रधान मानी जाती है (और ‘है’ भी), बुद्धिवादी होकर रह गयी थी। कुछेक कवि अपने उक्ति-वैचित्र्य एवं खनकती हुई भाषा के प्रयोग से अपनी छाप अवश्य छोड़ गये, लेकिन उनकी भी कविताएँ आम आदमी की ज़ुबान अथवा कण्ठ पर आसीन होने का गौरव नहीं पा सकीं। 


हम स्वयं अपनी स्मृति को टटोलकर देखें कि हमें कितनी ‘मुक्तछंद’ अथवा ‘छंदमुक्त’ कविताएँ कंठस्थ हैं। मेरा आशय यह कदापि नहीं कि उन या इन वर्षों में छंदोबद्ध काव्य में जो कुछ लिखा गया, वह सब सराहनीय रहा...कचरा तो कमोबेश  हर जगह होता ही है। टिप्पणीकार का यह कथन कि:"...सारी ही कविताएं जो गीत की तर्ज पर लिखी गई हैं"-पूर्णतः अनौचित्यपूर्ण है। ये ‘गीति रचनाएँ’ हैं, न कि किसी "गीत की तर्ज" पर लिखी गयी हैं| टिप्पणीकार का यह कथन कि: "दूसरी कविता ‘अम्मा की दुर्दशा’...घोर स्त्री विरोधी कविता है। स्त्री को स्त्री के खिलाफ खड़ी करती कविता -टिप्पणीकार इसे सही परिप्रेक्ष्य में ग्रहण करने में असफल रहा। इस गीत में वस्तुस्थिति का यथातथ्य/यथासत्य चित्रण है, न कि ‘स्त्री को स्त्री के खिलाफ खड़ा करने’ की कोशिश। क्या ऐसी घटनाएँ हमारे घर-परिवार में नहीं घटतीं? यदि हाँ...तो उनके चित्रण से गुरेज/परहेज कैसा? यहाँ ‘अम्मा की दुर्दशा’ का यथातथ्य चित्रण गीतकार का अभीष्‍ट रहा है...न कि वह जिसे टिप्पणीकार ज़बरन घसीट लाया है। उसे फतवा-शैली में जजमेण्टल नहीं होना चाहिए... आप्‍त-वचनीय मुद्रा संवाद की स्वस्थ परम्परा को आहत कर देती है।

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२४ सितम्बर शनिवार को सर्वत जमाल की गज़लें

सोमवार, 18 जुलाई 2011

रचती तो कविता है कवि को

साखी पर हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताओं पर गंभीर चर्चा भले न हुई हो लेकिन लम्बे अन्तराल के बाद उनकी रचनाओं ने लोगों का ध्यान खींचा| उनकी बदहवासी पर बात हुई, उनकी बदहवासी में उनके होश पर बात हुई| अनुभूति की संपादक पूर्णिमा वर्मन, व्यंग्य यात्रा के संपादक  डा प्रेम जनमेजय, वरिष्ठ कवि उमेश सिंह चौहान  की उपस्थिति महत्वपूर्ण रही| 

  मेरे अनुज और कवि राजेश उत्साही ने हरे प्रकाश के परिचय और मनस्थिति पर कुछ सवाल उठाये| स्‍पष्‍ट नहीं हो रहा है कि कविताएं बदहवासी में लिखी गईं थीं या भेजी गईं थीं। उनकी पहली तीन कविताओं में एक तरह की बदहवासी नजर आ रही है। कवि शायद बहुत आश्‍वस्‍त नहीं हुआ है कविता लिखते हुए। उसे संभवत: कविताओं पर कुछ और काम करने की जरूरत थी। बावजूद इसके कि कविताओं में उठाए गए विषय नए हैं, पर कविताओं में पैनापन नजर नहीं आता। कविताएं चौंकाती नहीं हैं। पहली कविता इस अर्थ में सार्थक लगती है कि बहुत दिनों बाद कवि जब अपनी कविता में लौटता है तो कुछ इसी तरह से सोचता है। यह कविता अंत तक आते आते अपना मतंव्‍य बदल देती है, वह कुछ और भी कहने लगती है।
दूसरी कविता आपाधापी को समेटने का प्रयत्‍न करती हुई नजर आती है,पर मुझे लगता है कवि इसे समेटने में थोड़ा पिछड़ गया है। तीसरी कविता असल में उस नारे से आगे नहीं बढ़ती जिसका एक तरह से हरे विरोध कर रहे हैं। हरे को इस तरह की अभिव्‍यक्ति से बचना चाहिए। चौथी कविता प्रकाशित संकलन से सुभाष जी ने ली है, दोस्‍तों के बारे में बिलकुल अलग नजरिए से रूबरू कराती है। हमने शायद दोस्‍तों को इस नजर से देखा ही नहीं। पर यहां भी लगता है कि जैसे हरे कुछ कहते कहते रूक जा रहे हैं। पूरी तरह खुल नहीं रहे हैं वे।
राजेश के सवालों पर मैंने सफाई देने की कोशिश की,  आजकल हरे कुछ बदहवास से हैं, अच्छी बात ये है कि इस बदहवासी के बावजूद वे बदहोशी में नहीं गये, अन्यथा कविता होती ही नहीं। उनकी बदहवासी का कारण मैं हूं और वे होश में रहते हैं, इसका महाकारण भी मैं ही हूं। दरअसल मैंने उनके सूली पर चढ़ने की तारीख घोषित कर रखी थी, इतना ही नहीं फंदा लिये बैठा भी था। रोज तलब करते हुए कि कविताएं दो भाई। मांग पर कविता लिखना आसान नहीं होता पर यह देखना होता है कि मांग कितनी प्यारी है, कितनी नाजुक है। दिन करीब आता गया, बैठने का मौका नहीं, मांग ठुकराने की हिम्मत नहीं। फिर बदहवासी से कोई कैसे बचा सकता था। मगर कविता लिखनी थी, कोई झाड़ू तो लगाना नहीं था, सो हरे को अपना होश भी बनाये रखना पड़ा। कुल मिलाकर मैं तो इस बदहवास हरे को भी पसंद करता हूं।
राजेश चूकने वाले कहाँ,  कौन बदहवास नहीं है। कुछ होते हैं जो बदहवासी के बावजूद अपने को इस तरह से व्‍यक्‍त करते हैं कि सब कुछ ठीक ठाक है, और कुछ होते हैं कि सब कुछ ठीक ठाक होने के बावजूद इस तरह प्रस्‍तुत होते हैं जैसे सारी दुनिया का बोझ उन पर ही है। अच्‍छी बात यह है कि हरे इन दोनों श्रेणियों में नहीं आते हैं, वे जैसे हैं वैसे ही अभिव्‍यक्‍त हो रहे हैं। यह एक ईमानदार कोशिश है।  एक और बात कि कविता कभी भी मांग पर नहीं लिखी जा सकती। अगर लिखी जाएगी तो उसका हाल वही होगा, जिसका विरोध हरे खुद अपनी कविता में कर रहे हैं। मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि झाड़ू लगाना ऐसा काम है जिसमें होश की जरूरत नहीं होती है। मेरे हिसाब से कविता भी झाड़ू लगाती है, दिमागों में।


सद्भावना दर्पण के   संपादक और लेखक गिरीश पंकज ने कहा, हरेप्रकाश की कविताएं अपने शिल्पलोक में नए आस्वादन के साथ उपस्थित होती हैं| कविताओं में ताज़गी तो है ही, नई दृष्टि भी है| पत्रकार सत्येन्द्र  मिश्र ने कहा, कविता हरे प्रकाश के लिए ड्राइंग रूम में रखा शोपीस नहीं, वास्तविकता है जीवन की जो प्रकट होती है विभिन्न रूपों मे| प्रसिद्ध प्रवासी रचनाकार देवी नागरानी जी ने कहा, हरे के सोच की उड़ान परिंदों के पर कतरने वाली है|


वरिष्ठ कवि उमेश सिंह चौहान ने कहा कि हरे की ये कविताएं वैसी ही हैं, जैसी कविताओं के लिए उनकी पहचान बनी है। धारदार, असरदार, कपट को नंगा करतीं। बहुत अच्छा लगा उन्हें पढ़कर एक अन्तराल के बाद। पूर्णिमा वर्मन ने कहा, हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताएँ भले ही अंतराल के बाद आयी हों मगर कुछ खोया है ऐसा नहीं लगता। शायद उन्होंने एक लंबी छलांग लगाने के लिये यह समय अपने को तैयार करने में लगाया। जहाँ पहले वे सहज और सरल अभिव्यक्ति के कारण आकर्षित करते थे, अब उसमें जीवन के अनुभव की संपन्नता व वैचारिक गहनता भी जुड़ने लगी है। लेखक और जनसेवक अमिताभ ठाकुर कहते है, मैं इन चार कविताओं को पढ़ने के बाद आराम से यह कह सकता हूँ कि एक विधा के रूप में कविता (या नयी कविता) किसी भी प्रकार से कमतर नहीं है, न ही कविता की आवश्यकता और जरूरत ही हम लोगों के लिए कम हो रही है| यदि कोई जरूरत है तो मात्र इतनी  ही कि लिखने वाला व्यक्ति हरे प्रकाश उपाध्याय हों जो कविता नहीं लिखें, अपने मन की भावनाओं को उड़ेल दें और साथ ही इस बात का भी भरपूर ख्याल रखें कि उनकी बात उचित ढंग से और आसानी से पाठकों को संप्रेषित हो रही है| लेखिका नूतन ठाकुर ने कहा, हरे प्रकाश की कविताओं में गहराई और संवेदनाओं की संश्लिष्टता है जो केवल उन्ही कवियों में हो सकती है जो बहुत अधिक गंभीरता से चीज़ों को देखते और समझते हैं|

प्रख्यात व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय ने कहा कि  हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताओं की स्वाभाविकता मुझे बहुत आकर्षित करती है| माघ में गिरना कविता की यह पंक्तियाँ --मैं रचता क्या उसे,रचा तो मुझे जाना था...क्या कवि कर्म कि उस ऊँचाई को साक्षात  नहीं करती हैं जहाँ कविता रची नहीं जाती अपितु वह कवि को रचनात्मकता प्रदान करती है और कवि उदात्त गुणों की ओर अग्रसर होता है| अक्सर कवि सोचता है कि वह कविता को रच रहा है पर रचती तो कविता है कवि को| सुनील अमर ने कहा, मन को छू गईं ये पंक्तियाँ! सरल, सहज और संवेदनशील ! अ-कृत्रिम ! 

लेखक और ब्लागर रवीन्द्र प्रभात ने लिखा,  हरे प्रकाश की कविताई तेवर में अवमूल्‍यन के प्रति आक्रोश तथा यथास्थितिवाद के खिलाफ परिवर्तन का स्‍वर उदघोषित हो रहा है। रूप चन्द्र शास्त्री मयंक , प्रमोद ताम्बट, आहट,  काजल कुमार, प्रकाश बादल, दिगंबर नासवा , गीता पंडित , आशुतोष, कौशल किशोर, वंदना शुक्ल , श्याम बिहारी श्यामल, विवेक जैन, डंडा लखनवी, अवनीश सिंह चौहान , फरीद खान ने भी इन कविताओं की सराहना की| प्रज्ञा पाण्डेय ने कहा, ये कवितायेँ एकदम नयी पेंटिंग जैसी हैं| नए ढंग की बिलकुल ताज़ी हवा की तरह .. आगे और भी पढ़ने की उम्मीद रहेगी| ब्रजेश कुमार पाण्डेय के अनुसार समय की तल्खियों से लैस एक ताजगी लिए ये कवितायेँ हरे भाई के विस्तृत दृष्टि परास को सामने लाती है| थोड़ी चुप्पी के बाद ही सही इस तरह आना अच्छा लगा| अरुण चन्द्र राय ने कहा, हरेप्रकश नई पीढी के सशक्त हस्ताक्षरों में से हैं|  इनकी कविता इस पीढी के द्वंद्व  और संक्रमण की कविता होती है|  जैसे मायावी संसार में वे लिखते हैं..."जहां रहने का ठौर, मन वहां न लागे मितवा/चल, यहां नहीं, यहां नहीं, यहां नहीं../ पता नहीं कहां/ चल कहीं चल मितवा...अधिकांश चीजें मायावी हैं| माघ में गिरना कविता में कविता को माघ, सावन में पाना दरअसल खुद को पाना है... खिलाडी साथी भी बेहतरीन कविता है..| 

लेखक जाकिर अली कहते हैं, उनकी कविता भी गहरे अर्थों को बयां करती हैं। उन्‍हें समझने के लिए एकाग्रता की जरूरत होती है, अन्‍यथा ऊपरी तौर पर देखने पर लोग कुछ का कुछ समझ लेते हैं।  प्रमोद रंजन कहते हैं, हरे की बातों से गुजरना मेरे लिए हमेशा एक सुखद अहसास की तरह होता है, चाहे वह गपशप में हो, या कविता में। 'मायावी यह संसार' के लिए बधाई|  लेखक विमल चंद पाण्डेय कहते हैं, हरे का कवि सारे शातिरपने को जानते हुए भी शातिरों से मुस्करा कर मिलता है लेकिन अपनी पैनी आँखों से आर-पर देख रहा होता है|

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६ अगस्त शनिवार को साखी पर जितेन्द्र जौहर की रचनाएँ 

शनिवार, 18 जून 2011

हरे प्रकाश उपाध्याय की चार कविताएँ

 हरे प्रकाश उपाध्याय को साखी पर प्रस्तुत करते हुए मुझे संतोष और गर्व दोनों का अनुभव हो रहा है| वे एक ऐसे युवा कवि हैं, जिन्होंने अपनी और अपने पहले और बाद की पीढ़ियों को एक साथ आकर्षित और प्रभावित किया है| बिहार में ५ फरवरी १९८१ को जन्मे इस अग्निधर्मा युवक ने लम्बी अराजक भटकन के बाद अपना दीप्त पथ बना लिया है और उस पर अब आगे बढ़ना जारी  है| हरे के शब्दों में मैं हिन्दी का एक गरीब लेखक हूँ, रोटी के लिए पत्रकारिता करता हूँ| भारतीय ज्ञानपीठ से एक कविता संकलन प्रकाशित है| वे मेरे सहयोगी भी हैं और जनसंदेश टाइम्स के फीचर संपादक के रूप में काम कर रहे हैं| मेरे सपनों के पंख की तरह| पर मैंने उन्हें बेड़ियाँ डाल रखी हैं| काम, हर दम काम| योजना, संपर्क और उस पर अमल| बीवी, बच्चों तक के लिए समय नहीं| साखी के लिए रचनाएँ मांगी तो उन्होंने बदहवासी में एक साथ लिखी तीन कविताएँ मुझे मेल कर दीं| मैंने एक और रचना उनके संकलन से उठा ली, जो बदहवास समाज के बारे में है| प्रस्तुत है हरे प्रकाश उपाध्याय की चार कविताएँ....   


१.
माघ में गिरना
कविता मिली थी
बहुत दिनों के बाद
सावन के बाद माघ में
एक पेड़ के नीचे
पत्ते बुहार रही थी
चूल्हा जलाना था उसे शायद
हमने उलाहने नहीं दिए
उसने देखा एक नजर मेरी तरफ
मैं थोड़ी दूर पर शीतल हवा में कांपते हुए पत्तों सा
ठिठुरता अपने गिरने की प्रतीक्षा करते हुए
उसे देखता रहा भौंचक

हम यों तलाश रहे थे बरसों से
एक-दूसरे को हर सावन के मौसम में
ईश्वर की लीला ही कहिए जनाब कि
माघ में जब बिना ढूंढे मिले
अचानक
तब वह मुझे ठीक से देख नहीं पा रही थी
मैं रचता क्या उसे
रचा तो मुझे जाना था...

हम देर तक देखते रहे
नहीं पता क्या-क्या
उसकी आंखों के कोर भीग गए
और मैं गिरा तो उठ न सका...

जान-पहचान नये सिरे से हो रही थी।
२.
मायावी यह संसार
अधिकांश चीजें मायावी हैं
मार तमाम संकटों के बीच ही
हँसी की बारिश
मार गुर्राहटों के बीच
कोयल की विह्वल पुकार
ऐ कोयल तुम पागल हो और एक दिन तुम पागल बना दोगी समूची दुनिया को
ऐ नदी तुम जरा इधर नहीं आ सकती शहर में
ऐ हवा, तुम अपना मोबाइल नं. दोगी मुझे
सुनो, सुनो, सुनो....
अधिकांश चीजें मायावी हैं...

जिनकी आवाजों के शोर के बजे नगाड़े
उनसे भागे जिया
जिनकी आवाज न आए
उसी आवाज पर पागल पिया..
जहां रहने का ठौर, मन वहां न लागे मितवा
चल, यहां नहीं, यहां नहीं, यहां नहीं...
पता नहीं कहां
चल कहीं चल मितवा...
अधिकांश चीजें मायावी हैं...

जिन चीजों से प्रेम वे अत्यंत अधूरी
इन अधूरी चीजों की भी महिमा गजब

यह जीवन सुखी-दुःखी एक पहेली...

जी नहीं रहे हम
बस अपनी उम्र के घंटे-पल-छिन गिन रहे बस
और इसी गुणा-भाग में एक लंबी उम्र गुजार कर
जो गए
उनके लिए मर्सिया पढ़ रहे हैं हम...
३.
कविता के बारे में एक बड़बड़ाहट
कविता, ओ कविता
क्या तुम गरीब की जोरू हो...
नहीं तो क्यों इतने सारे लोग
तुम्हें भौजाई बनाए हुए हैं
कोई तुम्हें चिकोटी काट रहा है
कोई कागज के बिस्तर पर नचा रहा है तुम्हें

कोई माइक पर गूंजते
कुछ निहायत उपयोगी शब्दों के लिबास में तुम्हें पेश कर रहा है
कोई तुम्हें बेच रहा है
कोई खरीद रहा है
खाने-कमाने का काम भी ले रहे तुमसे कुछ लोग
क्या तुम ही हमारे समय की कामधेनु

तुमसे करते हैं इतने लोग जो प्रेम
क्या सब देह-संबंधी हैं तुम्हारे?
रहने दो कुछ गोपनीय प्रश्न और भी हो सकते हैं
कुछ लोग मां कहते होंगे तुम्हें, बुरा मान जाएंगे
जाओ जीयो अपनी जिंदगी, जाओ
नदी की तरह, हवा की तरह...चाहे जैसे

पर कविता को फसल की तरह
काटनेवाले कवियों
एक न एक दिन तुम्हें हिसाब देना ही होगा...

४. 
खिलाड़ी दोस्त 
खिलाड़ी दोस्तों के बारे में
बताने से पहले ही सावधान कर दूँ कि
मेरा इशारा ऐसे दोस्तों की तरफ़ नहीं है
जो ज़िन्दगी को ही एक खेल समझते हैं
बल्कि यह उन दोस्तों की बात है जो
खेल को ही ज़िन्दगी समझते हैं
जो कहीं भी खेलना शुरू कर देते हैं
जो अक़सर पारम्परिक मैदानों के बाहर
ग़ैर पारम्परिक खेल खेलते रहते हैं


वे दोस्त
खेल के बाहर भी खेलते रहते हैं खेल
जब भी जहाँ
मौक़ा मिलता है पदाने लगते हैं
पत्ते फेंकने लगते हैं
बुझौव्वल बुझाने लगते हैं
गोटी बिछाने लगते हैं
आँखों पर कसकर बाँध देते हैं रूमाल
और दुखती रग को दुखाने लगते हैं


वे दोस्त अच्छी तरह जानते हैं
दोस्ती में खेलना
सही तरह पैर फँसाना वे जानते हैं
जानते हैं वे कब
कहाँ से मारने पर रोक नहीं पाएगा गोल
जानते हैं कितनी देर दौड़ाएँगे
तो थककर गिर जाएगा दोस्त
वे हाथ मिलाते हुए अक़सर
हमारी भावनाएँ नहीं
हमारी ताक़त आँकते रहते हैं
अक़सर थके हुए दौर में
भूला हुआ गेम शुरू करते हैं दोस्त
वे आँसू नहीं मानते
तटस्थ वसूलते हैं क़ीमत
हमारे हारने की


सुख और ख़ुशी में भले भूल जाते हों
दुख में अकेला नहीं छोड़ते
आ जाते हैं डंडा सँभाले
उदासी और थकान में
शुरू करते हैं खेल
और नचा-नचा देते हैं


दोस्त अवसर देखते रहते हैं
काम आने का
और मुश्किल समय में अक़सर
ऐसे काम आते हैं कि भूल नहीं सकते हम


हमारे गहरे अभाव
टूटन और बर्बादी के दिनों में
जब दुश्मन उपेक्षा करते हैं हमारी
दोस्त आते हैं ख़ैरियत पूछने
और हास्य के शिल्प में पूछते हैं हाल
हमारे चेहरे की उड़ती हवाइयाँ देखकर
हताश नहीं होते
वे मूँछों में लिथड़ाती मुस्कान बिखेरते हैं


दोस्त हमें हारकर
बैठ नहीं जाने देते
वे हमें ललकारते हैं
चाहे जितने पस्त हों हम


उठाकर हमें मैदान में खड़ा कर देते हैं वे
और देखते रहते हैं हमारा दौड़ना
गिरना और हमारे घुटने का छिलना
ताली बजाते रहते हैं वे
मूँगफली खाते रहते हैं
और कहते हैं
धीरे-धीरे सीख जाओगे खेल


जो दोस्त खेल में पारंगत होते हैं
खेल से भागने पर कान उमेठ देते हैं
कहते हैं, कहाँ-कहाँ भागोगे
'भागकर जहाँ जाओगे
हमें वहीं पाओगे'


खेल में पारंगत दोस्त
खेल में अनाड़ी दोस्त से ही
अक़सर खेलते हैं खेल!  

संपर्क--08853002004

हां, आज ही, जरूर आयें

 विजय नरेश की स्मृति में आज कहानी पाठ कैफी आजमी सभागार में शाम 5.30 बजे जुटेंगे शहर के बुद्धिजीवी, लेखक और कलाकार   विजय नरेश की स्मृति में ...