सोमवार, 12 मार्च 2018

मनुष्य होने के अर्थ की तलाश: सुभाष राय की कविताएं

( प्रताप दीक्षित जाने-माने कथाकार हैं। कथा-लेखन में उल्लेखनीय कार्य के लिए उन्हें हिंदी संस्थान ने साहित्य भूषण के सम्मान से नवाजा है। मेरी कविताओं पर उन्होंने एक टिप्पणी लिखी, जो आदरणीय जय प्रकाश धूमकेतु के संपादन में निकलने वाली प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका अभिनव कदम में प्रकाशित हुई। वह टिप्पणी यथावत प्रस्तुत है )
      

                          प्रताप दीक्षित

     कविता मनुष्य की आदिम रागात्मक वृत्ति की समानान्तर यात्रा है। जिसका मूल उत्स  प्रत्येक काल में कवि के भाव जगत की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति रही है। अन्तर्मन के प्रतिबिम्बों से लेकर सामाजिक-राजनीतिक चेतना तक की यात्रा में कविता के संदर्भ बहुत बदल गए प्रतीत होते हैं। आज कविता एक विशिष्ट अवधारणा के रूप में दिखाई देती है। जिसमें समय के सरोकार, विषमता के विरुद्ध असहमति के भाव के साथ क्षरित संवेदना की तलाश भी इसके केन्द्र में है। यद्यपि कवि का भाव जगत समकालीन चेतना से पृथक कभी नहीं रहा। यहां तक कि रीतिकाल की कविता में भी। वस्तुतः किसी कवि की अन्तःचेतना की भित्ति वह समाज और परिवेश ही होता है जिसमें वह रह रहा होता है। 
     संप्रति, समय केवल सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि से ही कठिन नहीं है बल्कि संकट साहित्य पर, विशेष रूप से कविता पर, मंडराता तो प्रतीत होता ही है।  साहित्य की भूमिका अपने समाज के समानान्तर होती है। जब प्रायोजजित ढंग से प्रचारित किया जाता हो कि कविता अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है, तब समय-परिवेश के प्रति कविता की तटस्थता या कवि का मौन संवेदनशीलता के क्षरण की आहट होती है। वस्तुतः कविता जीवन और जीवन कविता का पर्याय है। कविता भी जीवन की सहज गति के साथ द्वंद्व और संघर्ष के पथ पर समानान्तर रूप से चलती रहती है। कविता में कुछ ऐसा जरूर रहा है जो अन्य भाषिक संयोजन में नही होता। 
     कोई भी रचना अपने समय और समाज की समसामयिक गतिविधियों, समाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से असंप्रक्त होकर कालजयी नहीं हो सकती। इस परिप्रेक्ष्य में सुभाष राय की कविताएं एक ओर समय और परिवेश से साक्षात्कार करती हैं, दूसरी ओर उनमें अन्तर्मन की वह बेचैनी है जिसके बिना कविता का सृजन दुष्कर है। यह कविताएं छद्म, शोषण, विषमता, विद्रूपताओं, सामाजिक-सांस्कृतिक विघटन के खिलाफ प्रतिरोध के साथ मनुष्य की जागती हुई आंखों के अलौकिक सपनो को बचाने की कोशिश करती हैं। सुभाष जी की कविताओं के केन्द्र में मनुष्य और उसकी चेतना का विस्तार है। मानव चेतना वस्तुतः मानव संबंधों से निर्मित तथा उससे प्रभूत चेतना है। समाज के विकास के साथ यह संबंध बदलते रहते हैं। मनुष्य की दृष्टि और चेतना में आने वाले परिवर्तनों का आधार यही है। यह कविताएं यथार्थ के बदलते  संदर्भों में केवल दृष्टा मात्र नहीं वरन् विद्रोह की आकांक्षा एवं परिवर्तन के लिए रचनात्मक हस्तक्षेप करती हैं। 
     सपनो की उड़ान में जमीन को ही सब कुछ समझ लिया जाना उड़ान में बाधक ही बनता है। कविता ‘उड़ान’  इसे व्यक्त करती है -

‘मुझे याद है धरती पर बिखरे/ सुख-सौन्दर्य के लालच में/            (उड़ान)
 
मैने अपने ही पंख कतर डाले’
आज के उपभोक्तपवादी समय में जब भौतिक सुख-साधनों को ही जीवन का चरम उद्देश्य मान लिया गया हो तब कवि के शब्दों में उभरने वाली पीड़ा एक मरीचिका के पीछे भागते आदमी का दर्द ही है-


दर्द उभरता है और निगल जाता है मुझे/
आसमान से धरती को नहीं देख सकता/
सितारों के नीचे, जमीन के ऊपर                                     (उड़ान)
    

 परंतु क्या अतीत को भुलाना कभी संभव है? कविता बिना कहे हुए जाने कितने प्रश्न उठाती है। क्या दुनिया में व्याप्त असमानता, अन्याय, शोषण इसी कारण नहीं हैं कि कुछ लोगों द्वारा संसार के सुख-वैभव को ही सब कुछ समझ लिया गया है। कवि की प्रश्नाकुलता मनुष्य होने के अर्थ को खोजती है। क्या है मनुष्य? कौन है मनुष्य? उसकी अपनी अस्मिता, जीवन दृष्टि, स्वतंत्रता का अर्थ और सार्थकता रह गई है या नहीं? ‘आहार-निद्रा-भय-मैथुन’ को ही जीवन की पहचान मान लेने की तर्ज पर परिवार का पालन, नौकरी, जीवन-यापन को ही चरम ध्येय समझ लेने से ऐसा प्रतीत होता है कि मनुष्य होने की प्रारंभिक शर्त ही बदल गई है। ‘कहां है आदमी’ कविता में कवि की चिंता आज के परिदृष्य में सवाल उठाती है-

‘आदमी है, कहां किधर/ कोई बताएगा मुझे/
चुप क्यों हैं सब/
कवि की वाणी में तीखापन है-
‘अपने बच्चों का ध्यान/
ते जानवर भी रखते हैं/ अगर तुमने भी इतना ही/
सीखा अभी तक/ तो तुम उनसे अलग कैसे - - -/
इन्हे आदमियों में आखिर कयों गिना जाए/
सिफ इस लिए कि वे/
 आदमी जैसे दिखते हैं’                                  (कहां है आदमी)


     परंतु कवि निराश नहीं है। उसे उम्मीद है कि अभी आदमियत बाकी है। दुर्दान्त स्थितियों में भी उसकी आस्था और विश्वास मनुष्यता से चुका नहीं है। तभी वह घोषणा करता है -

‘मुझे उन कायरों की/ कोई दरकार नहीं है/
जे सड़क पर लहूलुहान पड़े/
बच्चे के पास से गुजर जाते हैं/ फिर भी आंखें पसीजती नहीं - -/
मुझे बिके हुए लोगों की
भी जरूरत  नहीं’       



                                                                                                               

     कवि की यह जरूरत आज के समय और समाज की जरूरत है जिसमें लगातार भीड़ बढ़ती जा रही लेकिन मनुष्य कम नज़र आ रहे हैं। कवि का उद्घोष क्षीण होती संवेदना और सामाजिक रूप से मृत प्रतीत होते लोगों पर केवल रुदन या मर्सिया पढ़ना नहीं, बल्कि घनीभूत आशान्विता के साथ एक ललकार है, उद्बोधन है-

 ‘देखो पड़ताल करो/
 कोई तो जिंदा बचा होगा/
     

 एक मान्यता के अनुसार करुणा और प्रेम को कविता की मूल वृत्ति मानने की परिपाटी रही है। यह कविताएं इस तथ्य को प्रमाणिकता के साथ साबित करती हैं कि करुणा और प्रेम सामाजिक सरोकारों से विलग कहां है! समय और समाज से जुड़ी मनुष्य के सरोकारों की यह कविताएं आंखों में आंसू ही नहीं लातीं अनिवार्य आक्रोश से भर देती हैं। यह सोचने पर विवश करती और विचार के लिए जमीन तैयार करती हैं। इस क्रम में यह कविताएं व्यष्टि से निकल कर समष्टि में एकाकार होती और संवेदना के धरातल पर समाज के ज्वलंत सवालों और सरोकारों से जोड़ती हैं। इनमें गहन मानवीय सरोकारों से संबंधित चिंताओं की बेचैन कर देने वाली  गहराइयां निहित हैं। कविता की मार्मिकता को समकालीन प्रत्यय से जोड़ती हैं। यहां कविता साहित्य के राजपथ से उतर कर जीवन के जनपथ पर चलते हुए अपनी अलग पहचान बनाती है। कवि की साहसिक उक्ति है-

सुनो जंगल का / नीरव अट्टहास/
बहरे नहीं हो गए हो/ तो कान लगा कर सुनो/
यह खामोश आहट है/ लूले-लंगड़े गणतंत्र को/
चीर कर उगते/ भयानक खंूखार/
जंगल राज की।’                                                      

(शहर में जंगल)     

     विकास की अवधारणा के बीच आदमी और प्रकृति की कीमत पर चतुर्दिक फैले कांक्रीट के जंगल, शोषण, धूर्त महत्वाकांक्षाएं और इस सबके ऊपर आदमी के टूटते सपने जिका मूर्तमान स्वरूप हमारे गणतंत्र के देखे गए सपनो दुःस्वप्नों में बदल जाना है। इस त्रासदी को केवल कवि ही महसूस कर सकता है। इस जंगल में ‘अजनबी आवाजें’ गूंज रही हैं-

शहर में घुस आए हैं/ कुछ अजनबी लोग/
पार्कों में सन्नाटा है/ बच्चे भी नहीं आते/ अब वहां खेलने/
लोग बेहद डरे हुए हैं/ इसी तरह दिन गुज़र रहा है/
आदमी डर रहा है/ मर रहा है/’                                   

 (अजनबी आवाजें)  

    सभ्यता के विकास और प्रगति की अवधारणा को कविता चुनौती देती है। यहां नई कविता के दिनो का अकेलापन अपना रूप बदल चुका है। इस भीड़ में मनुष्य अकेला ही नहीं पड़ गया, वह समूह में भी अकेला और आतंकित है। क्यों कि उसकी पहचान तक मिट गई है। देश की पहचान उसके भूगोल से नहीं वहां के रहने वालों की संस्कृति की विभिन्नता के बावजूद उनकी एकता से होती है। वाह्य रूप से अलग-अलग प्रतीत होने पर भी उनके दुःख-सुख और संवेदना एक होती है। किसी भी काल में साहित्य और कला केवल समय की नहीं देश की पहचान भी होती है। विडंबना यह है कि यह कैनवेस सिकुड गया है या टुकड़ों में बंट गया है। 
बदलते हुए हालात देख कर कवि की अन्तव्र्यथा इन शब्दों में प्रकट होती है-

‘मैं एक चेहरा बनाना चाहता हूं/ 
पर अधूरा रह जाता है बार-बार/
न जाने क्यों वह बनता ही नहीं’
मुझे शक है कि मुल्क का चेहरा/
है भी कि नहीं मेरा चेहरा।’                                       

(मुल्क का चेहरा)

     कवि, अन्य लोगों की तरह, एक सामान्य व्यक्ति होता है। उसकी सोच, संवेदना, आस्था, समय को देखने की परख, उसका सृजन उसके व्यक्तित्व का अलग निरूपण करता हैं। 

‘टुकडे़ टुकड़े हो रहे हों/ जो धधकते रहते हों/
पृथ्वी के गर्भ की तरह/ ज्वालामुखी बनने को आतुर/
लावा से नया रचने को बेचैन/
सूर्य को अपने अंदर समेटे/
खौलते हुए’                                                

  (मेरा परिचय)    
 यही, अंदर ज्वालामुखियों को समेटे, बाहर से शांत प्रतीत होते कवि का आत्मपरिचय है। यहां कवि का ‘क्षण भर का जीवन, मेरा परिचय’  की निराशा नहीं अंदर ‘जलते सूर्यों’ को समेटे हुए यात्रा की निरन्तरता है। इन विसंगतियों के बीच काल से मुठभेड़ के दौरान कवि इतिहास से भी साक्षात्कार ही नहीं करता वर्तमान संदर्भो में उसके नए अर्थ खोलता है-

‘बार बार इतिहास अपने निर्मम और विकृत चेहरे/
के साथ आकर खड़ा हो जाता है मेरे सामने/--/
उन्हे इतिहास इस लिए पसंद नहीं क्योकि/
डसके पन्नों में दिखते हैं हत्यारों के जुलूश/--/
इतिहास का जर्द पड़ गया चेहरा/--/
इतिहास पर किसी का वश नहीं चलता/ 
वह कभी झूठ नहीं बोलता/ इसी लिए वे डरते हैं इतिहास से’      (इतिहास के अनुत्तरित प्रश्न)  


     कवि की विरलता है कि उसने कविता ‘इतिहास के अनुत्तरित प्रश्न’ में समाज, राजनीति, हिंसा, आतंकवाद, कानून-व्यवस्था आदि सवालों को साहस के साथ उठाया है। इतिहास के काले पन्नो पर लिखी इबारत पर इस तरह की साहसिक उक्ति समकालीन कविता में अन्यत्र दुर्लभ है।

‘कानून और संविधान को पागलों के एक सरगना ने/
जकड़ रखा था अपनी ताकतवर भुजाओं में/ - -/
कई सदियां सिर पर उठाए एक इमारत कांप रही थी/
जब समय के एक पल में शताब्दियों की स्मृति/
ढह कर बिखर गई, धूल में बदल गई/
वे डरते हैं कि इतिहास उनके काले चिट्ठे खोल देगा
उनके चेहरे से नकाब नोंच कर फेंक देगा’                      

 (इतिहास के अनुत्तरित प्रश्न) 

     लेकिन अतीत को भुलाना संभव नहीं होता। कविता समय की दंश भरी विडंबना को चिन्हित करने की कोशिश करती है, खण्ड खण्ड एक युग्म शोक गीत की तरह। वर्तमान से साक्षात्कार के लिए अतीत का विश्लेषण आवश्यक हो जाता है। निहित स्वार्थोे के द्वारा इतिहास के निषेध, शोषण, अन्याय के साथ ही कविता समाज-राजनीति और समय के कई सत्यों को अनावृत्त करती है। वस्तुतः कोई भी सार्थक रचना अपने युग के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य से विलग नहीं होती। सुभाष जी की कविता की मुखरता का कारण यह भी है कि समय के कठिन मोड़ पर चुप्पी या तटस्थता अन्याय की पक्षधरता का परिचायक हो जाता है।

     गांधी इस शताब्दी के केवल महापुरुष नहीं, भौगोलिक सीमाओं से परे, एक संस्था के रूप में स्थापित हो चुके हैं। उन्हे ही सर्वाधिक विवादित भी बनाया गया। उनके सिद्धातों को उनके ही तथाकथित अनुयायिवों के मखौल बना दिया गया। इसे सुभाष राय ने ‘गांधी की विरासत’ कविता में तीक्ष्ण व्यंग्य के माध्यम से व्यक्त किया है -

‘उसने कहा/ बुरा मत देखो/ और हमने आंखें बंद कर लीं/ 
धृतराष्ट्र तो अंधा था/हमने साबुत आंखों/के बावजूद पसंद किया/
 अंधे की तरह जीना’ 
 कविता का कटाक्ष दृष्टव्य है -  

‘कर्मयोगी रहे हम/ गांधी के सच्चे अनुयायी/ 
सुख-संपदा तो यं ही/ बिन बुलाए चली आयी/
 सब बापू का है/ सब बापू के नाम/
 उस महात्मा को प्रणाम’                                           

  (गांधी की विरासत)    
 नदी, सागर, वृक्ष, पक्षी कविता जगत के चिर-परिचित प्रतीक हैं। कवि की रचनाएं, प्रकृति में व्याप्त इस सत्य को ध्वनित करती हैं कि प्रकृति के उपादान अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व रखते हुए भी जीवन और जगत को देखने की नयी दृष्टि देते हैं। समकालीन कविता के यथार्थ में पारंपरिक प्रतीको को नए अर्थ ही नहीं, बिंबों को नयी अभिव्यंजना से समृद्ध किया है। नदी जीवन की निरंतरता का पर्याय है। सब कुछ अवांछनीय बहा ले जाने की क्षमता उसमें होती है। जरूरत उसके साथ एकात्म की है, अपने अंदर उसे बहते देना या स्वयं नदी हो जाना -

‘नदी को उतर आने/ देता हूं अपने भीतर/ 
समूची भक्ति के साथ- -/ जब कभी सूख जाती है वह/
निचुड़ जाती है/धरती के गर्भ में/तब भी मैं होता हूं/
मां के भीतर सोई नदी में/
निस्पंद, निर्बीज, निर्विकार’                           

 (मैं नदी हूं)    
 हमारी संस्कृति में प्रकृति में प्रकृति के उपादानों की पूजा का विधान अकारण नहीं है। नदी बनना उसकी तरह तरल होना है जिसकी, कम से कम आज जब मनुष्य की संवेदना चुकती प्रतीत हो रही है, महती आवश्यकता है। कविता के सृजन के प्रारंभ से ही प्रत्येक देश-काल की कविता में प्रकृति के बिंब माध्यम बने हैं। मानवीयता के विकास क्रम में मानवीय मूल्यों की अवधारणा के पीछे प्रकृति के प्रति कवि का प्रेम रहा है। इससे दूर हटते जाने के क्रम में आदमी के जीवन में विसंगतियां ही नहीं आईं, तरलता, उदारता, बहने की क्षमता-निरन्तरता, गहराई और सीमाओं-तटबंधों का अतिक्रमण जैसी मूल वृत्तियों से वह दूर होता गया। यही कारण है कि कवि के अंदर समानान्तर रूप से एक सागर उपस्थित है-

सागर के पास होकर/सागर ही हो जाता मैं/
विशाल और असीम/ मेरे भीतर होती लहरें/ सीपियां, मछलियां, मूंगे/
और यह सब कुछ/ जो डूब गया इस/अप्रतिहत जलराशि में/
समय के किसी अंतराल में’                             

 (सागर) 
संभवतः अपने होने का अर्थ समझने के लिए कभी डूबना जरूरी हो जाता है डूबना, अपने अंदर के एकांत की आवाज को सुनना। (द्रष्टव्य है- खुसरो दरिया प्रेम का---जो डूबा सो पार) 

‘खामोश होता तो/ सुनता मुझे अपने भीतर/पूछता नहीं मुझसे/
मेरे होने का मतलब/उसे पता होता/मुझे कुछ नहीं चाहिए/
सागर से, उसकी सत्ता से’                             

 (सागर)   
  यदि मनुष्य किसी एक अंश में भी सागर बन सके तब किसी वस्तु की लालसा, प्रलोभन, परिग्रह कहां रह जाएगा! क्योंकि ‘सागर को आखिर क्या/चाहिए सागर से’। इस प्रकार प्रकृति से होकर दर्शन तक की यात्रा में  यह कविताएं आधुनिक भावबोध के साथ लौकिक जगत से जोड़ती हैं। प्रकृति के प्रति कवि का रागात्मक संबंध परिवेश के प्रति अमानीवयता की चिंता, संवेदना का द्योतक है। 
     पृथ्वी पर रचित पहली कविता से लेकर आज तक प्रेम कविता का इस कदर अनिवार्य अंग रहा है कि, कविता प्रेम और प्रेम कविता हो गया है। दोनो शब्दातीत-एक दूसरे के- पूरक नहीं बल्कि पर्याय समझे जाते हैं। कविता ही नहीं समस्त कला-साहित्य की केन्द्रीय चेतना प्रेम रही है। परंतु जब बाजारवाद-उपभोक्तावाद की आधुनिक अवधारणा में ‘ढाई आखर’ की बात बेमानी लगने लगे तब समय के प्रवाह में उदास और अकेली पड़ गई पीढ़ी के लिए प्रेम ही एक आश्वस्ति बनता है। ‘प्रेम को बचाने की कोशिश दुनिया को बचाने की कोशिश’ होती है। इतने पर भी प्रेम को परिभाषित नहीं किया जा सका। इतना जरूर है कि प्रेम में अपना अस्तित्व नहीं रह जाता। ‘मैं’ तो तिरोहित होता ही है, कुछ पाना भी शेष नहीं रहता। 

‘तुम बतलाओगे प्रेम क्या है?/ देह की मादक गहराई में उतर जाने/
का पागल उन्माद या कुछ और/- - -/
तुम प्रेम के बाद बचे भी रह गए या नहीं/
प्रेम के बाद कोई और चाह बची या नहीं’
    

 परंतु इतना तय है कि प्रेम में अपने को मिटाना तो पड़ता ही है। ‘प्रेम गली अति सांकरी’ का अगला सोपान है-

‘नहीं तुम प्रवेश नहीं/कर सकते यहां/दरवाजे बंद हैं तुम्हारे लिए/
यह प्रेम का घर है/यहां शीश उतारे बिना/
कोई नहीं पाता प्रवेश/आना है तो मिट कर आओ/
दरवाजा खुला मिलेगा।’                              

(मिट कर आओ)     
 कवि का दावा है कि सब कुछ समाप्त हो जाने पर ‘तुम्हारे भीतर/बज उठेगी बांसुरी तत्क्षण’। प्रेम इस लोक की वस्तु नहीं है। अपने आप में सर्वोत्कृष्ट कला का पर्याय है। इसके आंतरिक सौन्दर्य के आगे कोई भी रचना कमजोर पड़ जाती है।

मेरी सबसे सुन्दर/रचना भी कमजोर/लगने लगती है/
जब देखता हूं /
तुम्हें संपूर्णता में’                                 

 (अब सुनो तुम)    
 परंतु कहां है यह संपूर्णता? प्रेम तो ऐसी ‘शै’ है जहां एक और एक कभी दो होते ही नहीं। ऐसी गणित है कि चरमावस्था में तो यह शून्य हो जाते हैं। संपूर्ण वही होगा जो सीमा रहित होगा। कवि की पंक्तियां-

सचमुच एक पूरा/आकाश होता है तुम्हारे होने में/
जिसमें बिना पंख के/भी उड़ना संभव है’     

उस सीमारहित संसार का सृजन करती हैं जिसमें उड़ान के लिए पंख की जरूरत नहीं होती। वस्तुतः किसी भी उड़ान या यात्रा के जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है, वह है इरादा। (द्रष्टव्य - ‘बिन पग चलै- -’) यहां आकाश प्रतीक साभिप्राय प्रतीत होता है। स्पर्श से परे अगम्य, सीमातीत आकाश को केवल अनुभव किया जा सकता है, ठीक प्रेम की तरह। प्रेम दुनिया को व्यष्टि ही नहीं समष्टि स्तर पर बचाता है - 
तुम नहीं होती तो/अपने भीतर की चिंगारी से/
जल कर नष्ट हो गया होता’। 
यह प्रेम किसी अबूझ ससार की नहीं, परकीया प्रसंग भी नहीं, सुन्दरता को महसूस करने की सहज सी अनुभूति को नए बिंबों के द्वारा कवि ने चित्र उकेर दिया है - 

‘दिए की तरह जलते/तुम्हारे रक्ताभ नाखून/
दो पंखड़ियों जैसे अधर/काले आसमान पर लाल/
नदी बहती देखता हूं मैं’                               

(अब सुनो तुम) 
भरी हुई मांग के अनुपम सौन्दर्य की अनूठी व्यंजना का निहितार्थ कुछ भी हो, कम से कम पाठक की कल्पना में परकीया का चित्र नहीं उभरता। रीतिकाल से आद्यतर कविता में स्वकीया-प्रेम का इतना सुन्दर बिंब दुर्लभ है।
     प्रेम की दूसरी कविताओं से अलग कवि की इन कविताओं की विशिष्टता है कि प्रेम ‘एकाकी मन’ का भाव नहीं है। यहां प्रेम को समाजिक सरोकारों से जोड़ा गया है-

‘देह जीते हुए मर जाता है/तो प्रेम जन्म लेता है/
जब किसी में उतर जाता है प्रेम/वह जीता ही नहीं अपने लिए/
कभी करुणा बही आंखों में/कभी मन हुआ भूख से बिलबिलाते/
बच्चे को गोद में उठा लेने का’               

 (प्रेम अपनी आंखों में सबका सपना)     
शरीर के भाव की समाप्ति केवल अध्यात्म-समाधि में ही नहीं होता, साहित्य और कविता भी उसी ओर ले जाती है। उत्तर-आधुनिक युग में जहां साहित्य में ‘प्रेम के लिए देह अनिवार्य’ मानने की परंपरा प्रचलन में हो वहां कवि की यह पंक्तियां उदात्त शिखर तक पहुंचती हैं-

‘प्रेम देह को मार देता है/आंखों का अनन्त आकाश एक/
छहकते फूल मे बदल जाता है/पूरा आकाश खिल उठता है/
गंध में बदल जाता है पूरा अस्तित्व’               

(प्रेम अपनी आंखों में सबका सपना)  
   जहां प्रेम होता है वहां शरीर विलीन होकर रह जाता है एक सपना जिसमें न होती है कोई चाहत या वासना-

प्रेम खुद को मार कर सब में जी उठना है/
प्रेम अपनी आंखों में सबका सपना होता है’


     प्रेम की सभी राहें परमात्मा तक पहुंचती हैं। प्रेम इस अनन्त याात्रा का पहला सोपान है। यह परमात्मा अपने से कहीं बाहर, अलग, दूर नहीं, स्वयं में है। इसके लिए बाहरी आडम्बरों की जरूरत नहीं। स्वयं से स्वयं तक की यात्रा, एक तलाश या स्वयं से साक्षात्कार है।

तुम मेरे अपने हो, मैं तुम्हारा/ बिछुड़ गए हो लेकिन मुझसे/
और भूल गए हो मुझे, खुद को भी’
एक आश्वस्ति अवश्य है कि जब वास्तव में तुम मिलना चाहोगे, वह मिल जाएगा-
‘तुम जहां भी होगे, मैं वहीं मिल जांऊगा/मेरे पास देने को बहुत कुछ है/
मुझे सिखाने को बहुत है/धैर्य, क्षमा, प्रेम, स्वातंत्र्य/- -/
कोई भी कठिनाई आए तो मुझे पुकारो/
मेरे पास वह सबकुछ है/
जिसके लिए तुम दिनभर भागते रहते हो’             

  (तुम कब जागोगे)     
‘यदा यदा ही धर्मस्य- -’ कौन है यह ‘मैं’? ईश्वर या आत्मतत्व, जो कभी नहीं सोता। पीडित, पराजित, आहतों की अदम्य जिजीविषा के रूप में हर जगह समाया। इस पृथ्वी, रंग, गंध, स्वाद को अनुसार रचना है-

‘मैं मिट्टी हूं/ पृथ्वी हूं मैं/हर गंध/
हर स्वाद है मुझमें/ हर क्षण जीवन उगता/मिटता है मुझमें/
जो चाहे रच लो/जीवन, करुणा/कर्म या कल्याण/
मैने तुम्हे रचा/आओ, अब तुम/
मुझमें नया रचो’                                   

(मुझमें तुम रचो)

     यहां कोई ईश्वर-पराशक्ति मनुष्य के बाहर नहीं। कविता मनुष्य की स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय, क्षमता के उद्घोष के साथ उसकी शक्ति का आवाहन करती है कि वह रचनाकर्म की क्षमता से युक्त है। निर्विवादित रूप से मनुष्य का ‘स्व’- विवके शुभ-अशुभ, शिव-अशिव के निर्णय के लिए उत्तरदायी है। यह ललकार उन लोगों के विवके को जगाने के लिए है-

जिनकी बाहें/ बहुत छोटी हैं/
अपने अलावा किसी को/ स्पर्श नहीं कर पातीं/
जो अंधे हो चुके लोभ में/जिनकी दृष्टि/जीवन का कोई बिंब/
धारण नहीं कर पाती/वे बेहोशी से बाहर निकलें/
संपूर्ण देश-काल में समाया/मैं बांहें फैलाए खड़ा हूं/
उन्हे उठा लेने के लिए/
गोद में’                                       

 (मुझमें तुम रचो) 
     कविता यहां कला की भूमिका पार कर समय और समाज में जिंदगी को जीने के लिए एक नज़रिया प्रदान करती है। समय के परिप्रेक्ष्य में यह क्षण-भंगुर जीवन खिला खिला रहता है। एक निरन्तरता का दर्शन- 
‘संधि पर खड़ा रहता है समय/
फूल के खिलने/और मुरझाने की संधि पर/खड़ा रहता है समय/
पूरी तरह खिला हुआ/
एक फूल मुरझाता है/और समय/
दूसरी संधि पर’  
 

शायद हम सभी, जीवन, सब कुछ एक संधि पर है। एक पल में संधि के इस पार या उस पार। इस जीवन दर्शन को जो समझ लेता है-

मैं हंसना चाहता हूं/इतना हंसना चाहता हूं/
कि सिर्फ हंसी रह जाऊं/
इस तरह बुद्ध बनना चाहता हूं’    
    

 शब्द ब्रह्म के समान माना गया है। परंतु जब शब्द अन्याय का विरोध नहीं करते, उड़ान भरने के लिए आह्वान नहीं करते, जगा नहीं सकते, संगीत नहीं पैदा कर सकते, आंसुओं को हंसी में नहीं बदल सकते तब वे अर्थहीन हो जाते हैं। परंतु शब्दों की यह सायास चुप्पी उनकी मूल प्रकृति नहीं है। कवि इस सत्य का उद्घाटन व्यंग्य के साथ करता है कि शब्दों के रचयिता द्वारा शब्दों को ‘कमजोर और पालतू’ बना कर उनकी शक्ति कम की जाती है -
‘शब्द हंसते नहीं/शब्द रोते भी नहीं/
उनकी दहाड़/ कहीं गुम हो गई है/धार कुंद हो गई है/- - -/
मैं जानता हूं/शब्दों के खिलाफ/हुइ्र्र हैं साजिशें/
उनके अर्थों से’
शब्दों की सत्ता को बचाने के लिए-
‘जो भी बोलना चाहते हैं/उन सब को आना होगा सड़क पर/
अपने समूचे दर्द के साथ/
हम सबको खतरे/
बांटने ही होंगे’                                          

 (शब्द)

     सृष्टि का आधा हिस्सा स्त्री कला-साहित्य ही नहीं जीवन की रागात्मकता का आधार रही है। स्त्री होना केवल स्त्री होना नहीं, एक भाव, अनुभव है, जीवन को समग्रता से समझने व जीने की दृष्टि। इसे जानने के लिए स्त्री होकर ही समझा जा सकता है। अर्द्धनारीश्वर की परिकल्पना या भक्ति-काव्य में कृष्ण का गोपिकाओं के द्वारा स्त्री-रूप में श्रंगार के पीछे यही अवधारणा रही है। सुभाष राय की कविता ‘स्पर्श’ इसे नए आयाम देती है-
‘तुम्हारे पास आते ही मैं/मुक्त हो जाता हूं नसों में/
दौड़ते हुएसारे विष बवंडर से’
- - -
‘स्त्री ही हो जाता हूं/तुम्हारे पास होकर मैं/
बहने लगती हो मेरे भीतर/पिघलने लगता हूं मैं’                        (स्पर्श)

     कोई भी संवेदनशील-सजग रचनाकार अपने युग की हलचलों से निरपेक्ष नहीं हो सकता। सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव ही नहीं विरूपताएं और त्रासदियां भी उसके रचना संसार का अंग बनती हैं। युद्धों-विभीषिकाओं पर आधारित महाकाव्य इसका प्रमाण हैं। स्कूल में मासूम बच्चों को गोलियो से भून देने के  विरोध में खंड-खंड में गुंथा एक शोक गीत है -‘बच्चे आएंगे’।
रचना साबित करती है कि हर हिंसा, अत्याचार, अन्याय अनन्त काल तक नहीं रह सकता। इसे पराजित होना ही होगा-

बच्चों को पढ़ने दो/मत मारो/मार नहीं पाओगे सारे बच्चों को/
क्या करोगे  जब/तुम्हारी गोलियां/कम पड जाएंगी/
तुम्हारी बंदूके जवाब/
देने लगेंगी’
     

नदी, हवा, तूफान की तरह बच्चे या नई पीढ़ी भी अपनी राह स्वयं बना लेगी। यह उद्दाम वेग रोका नहीं जा सकेगा-

‘फिर बच्चे तय करेंगे/तुम्हारा भविष्य/वे तय करेंगे कि/
इस दुनिया में/तुम्हे होना चाहिए या नहीं’
मिटना तो हिंसा को ही होगा-
‘तुम मिट जाओगे/क्योंकि बच्चे तुम्हारी तरह/
ब्ंादूकें नहीं उठाएंगे/गोलियां नहीं चलाएंगे’
     

यह कविता दुर्दान्त घटनाक्रम से दुनिया भर में पैठी गहरी उदासी को नैतिक अवरोध में बदल देती है। बहुत कुछ समाप्त हो जाने के बावजूद दुरावस्था में सपनो को बचाए रखने की कोशिश।
     हमारे आस-पास घटित को किस प्रकार कविता के विषय, संवेदना और विचार का हिस्सा बना दिया जाए, कवि की रचनात्मकता इसका प्रमाण है।
हमारा इतिहास साक्षी है कि हम मूर्ति-पूजक यूं ही नहीं हैं। आम आदमी ही नहीं अपने को बोद्धिक समझने वाले एक बड़े वर्ग की भी विडंबना है कि किसी ‘प्रभामंडल’ के वलय में आकर्षित हो उसके चतुर्दिक परिक्रमा पथ पर भ्रमण के लिए विवश हो जाते हैं, शायद किन्ही सपनो के पूरे होने की उम्मीद में। यह कहानी हमेशा दोहराई जाती है-
‘वह मंच पर बैठा था/दिव्य आलोकपुंज जैसा/- -/- -/
सपनो के अगणित सूर्य समेटे हुए/अंधेरे, अपमान, भूख/
और नाउम्मीदी के जंगल में भटकी आत्माओं को/
मुक्ति की आवाज देता हुआ’
    

 लुभावने वायदों, दिवा स्वप्नो (अच्छे दिनों!) की सच्चाई जब तक सामने आएगी-
‘वह सिर्फ कहानी नहीं सुनाएगा/
नए संवाद रचेगा, नई कहानी गढ़ेगा’                             (देवदूत)
     

कविता की लाक्षणिकता और ‘अघोषित चेहरों’ को पाठक हृदयंगम कर लेते हैं। ‘सावधान रहना दोस्त’ कविता इसके बाद यदि न होती तो तब ‘देवदूत’  वर्तमान परिदृष्य का निरूपण मात्र होता। ‘सावधान रहना दोस्त’, ‘देवदूत’ का दूसरा चरण या जरूरी एक्सटेंशन है    , जिसमें ‘देवदूतों’ को आगाह किया गया है। कविता से क्रांति भले न होती हो लेकिन प्रत्येक क्रांति के पीछे कविता की अनिवार्य भूमिका होती है। ऊपर से श्रांत, शांत, श्लथ आम आदमी कितना भी असंप्रक्त-निर्वेद-तटस्थ प्रतीत होता हो परिवर्तन के हर मोड़ पर नियामक वही होता है-
‘तुम नहीं जानते कि इसी हवा में/
एक तूफान भी होता है छिपा हुआ/
जो किसी भी समय तुम्हारे परखच्चे उड़ा सकता है/- -/- -/
वह कभी नहीं बताता उसके हृदय में कितना लावा है/
कितने पहाड़ धधक रहे हैं उसके भीतर’
   

  कवि की कविताओं के संसार का विस्तार अनेक आयामों तक हुआ है। परंतु इनके केन्द्र में मनुष्य, उसकी पहचान, अस्मिता और अनन्त जिजीविषा है। वह बार-बार इन विषयों-आशयों तक लौटता दिखाई देता है। यह कविताएं किसी वायवीय दर्शन की निष्पत्ति नहीं करतीं परंतु मनुष्य के सामाजिक सरोकारों-संघर्षो के लिए पुख्ता जमीन तैयार करने के साथ जीवन और संसार के प्रति एक राग, अटूट जिजीविषा और निरन्तरता का सबब बनती हैं।

जैसे पेड़ मर-मर कर जीवित हो उठता है/
जमीन पर गिरे हुए अपने बीजों में/
उसी तरह मैं भी बार-बार मरना चाहता हूं/
नए सिरे से नयी जमीन में उगने के लिए’                    

(जीवन) 
    मृत्यु अंत नहीं प्रारंभ है, किन्ही पारंपरिक आघ्यात्मिक अर्थों में नहीं, जीवन को सार्थकता और संपूर्णता से जीने के लिए। इसी कविता का विस्तार है ‘मेरा होना’। होने की सार्थकता तभी है जब होने को दूसरे भी महसूस करें। अन्यथा होने, न होने में अंतर कहा रह जाएगा? प्रकृति के सभी उपादानों के होने की सार्थकता तभी है जब वे हमारे होने में सहायक होते हैं।
मैं फूल होना चाहता हूं/गंध बांटने के लिए/- -/
मैं नदी होना चाहता हूं/- -/कोई भी प्यासा न लौटे मेरे पास से/
मैं सूरज होना चाहता हूं/अंधेरों के खिलाफ/
मैं पेड़ होना चाहता हूं/
सबको छांव दे सकूं’                                

 (मेरा होना)
     जीवन राग की सुंदर कविता जिसमें अंधेरों के खिलाफ प्रतिरोध ही नहीं मनुष्य होने की सार्थकता सबके लिए, ‘दोस्त के लिए, दुश्मन के लिए/मानुष के लिए, अमानुष के लिए’, होने में है। 
     इस तरह ‘होकर’ ही मनुष्य समय का अंश बनता है-

जो बीत गया/वह मुझमें ही है/
जो बीत रहा है/ वह भी मुझमें है/
और जो बीतने को तैयार है/
वह भी मुझमें ही है’                                  

(मैं मुझमें)  

     समय का अंश होकर वह अमर हो जाता है, मृत्यु के पार चला है। कविता के यथार्थ के इन भिन्न रूपों में प्रकृति की सत्ता के साथ मनुष्य का रिश्ता अनादि काल से रहा है। जिस तरह प्रकृति विविध रूपी है, मनुष्य भी तो इसी का प्रतिरूप है-

झीलों को अपनी मजबूत/अंजुरी में थामे/बादलों से खेलता हुआ/
बर्फ से लदा/सदियां समेटे अपने भीतर/
मैं ही खड़ा हूं इसमें, इसके हर रूप में’                  

 (मैं मुझमें) 

     सुभाष राय की कविता का संसार इस लिए अपनी अलग पहचान बनाता है कि यह कविताएं यथार्थ के बदलते संदर्भों में मनुष्य की स्थिति-नियति की केवल दृष्टा नहीं बल्कि उनमें रचनात्मक हस्तक्षेप करती हैं। एक ओर व्यवस्था की निरर्थकता, अन्तर्विरोधों की पहचान करती हैं, तो दूसरी ओर मानवीयता की भूमिका की प्रतिष्ठा। यह कविताएं परिवेश की विभीषिका से पलायन नहीं करतीं, बल्कि मनुष्य के सरोकारों को परंपरा, संस्कृति के संदर्भों में आज के समय की उपस्थिति में भविष्य के संदर्भों-सपनों से जोड़ती हैं। मनुष्यता मे विश्वास बनाए रखने की उत्कट लालसा के साथ शाश्वत मानवीय समावेशन की उपस्थिति दर्ज होती है।
     भाषिक छवि, ध्वनि-बिंब योजना, शिल्प के आधार पर अत्यंत सहज-सरल कविताएं अपनी अर्थगम्यता के लिए किसी अतिरिक्त श्रम की मांग नहीं करतीं।

                                 
                                 एमडीएच 2/33, सेक्टर एच,
                                 जानकीपुरम, लखनऊ 226 021
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1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (14-03-2018) को "ढल गयी है उमर" (चर्चा अंक-2909) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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