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शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

ओम प्रकाश नदीम की गज़लें

जिंदादिली, मुश्किल से मुश्किल हालात की भी परवाह किये बगैर अपनी ऊंची परवाज कायम रखने की महारत और बेबाकी से अपनी बात कहने की कुव्वत, ये कुछ ऐसी  खासियतें हैं, जिनसे एक शख्सियत की तामीर होती है और वो शख्सियत है मशहूर शायर ओम प्रकाश नदीम। गहरी से गहरी बात को भी आसान लफ्जों में बयां करने का हुनर अगर कोई सीखना चाहे तो हाजिर हैं जनाब नदीम साहब। उनकी शायरी की सबसे बड़ी बात है, वक्त के साथ उनका कदम-ताल, जैसे समय उनके शब्दों में उतर कर बोलता हो। 26 नवम्बर 1956 को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर कस्बे में जन्मे नदीम जी छात्र जीवन में सीटू में सक्रिय रहे और वर्तमान में इप्टा के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। सम्प्रति वे कानपुर देहात में लेखा परीक्षा विभाग में अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं। पेश हैं ओम प्रकाश नदीम की  कुछ गज़लें......  
1. 
नजर आते हैं जो जैसे वो सब वैसे नहीं होते
जो फल पीले नहीं होते वो सब कच्चे नहीं होते

जहां जैसी जरूरत हो वहां वैसे ही बन जाओ
अगर ऐसे ही होते हम तो फिर ऐसे नहीं होते

भरे बाजार से अक्सर मैं खाली हाथ आता हूँ
कभी ख्वाहिश नहीं होती कभी पैसे नहीं होते

न होते धूप के टुकड़े न मिलता छाँव को हिस्सा
अगर पेड़ों पे इतने एकजुट पत्ते नहीं होते

मरासिम जिन्दगी के पेड़ पर पत्तों के जैसे हैं
तअल्लुक तोड़ने से फूल फल अच्छे नहीं होते

शरारत जिनके सीने पे हमेशा मूंग दलती है
वो आँगन काटता है घर में जब बच्चे नहीं होते

 २.
ये रिश्ता हर सफ़र हर मोड़ पर हर बार मिलता है
तुम्हारी हर कहानी में मेरा किरदार मिलता है

नयी कलमी तिजारत का ये फल हासिल हुआ हमको
कि हर मौसम में अब हर फल सरे बाज़ार मिलता है

मेरी कमजोर हालत का असर सब पर हुआ कैसे
मैं जिसके पास जाता हूँ वही बीमार मिलता है

बहुत कम में बहुत कुछ है हमारे गाँव में अब भी
भले बिजली न सड़कें हैं न ही अखबार मिलता है

कम अज कम आज तो आवारगी की छुट्टी कर देते
बड़ी मुश्किल से हफ्ते भर में इक इतवार मिलता है

हवा के रुख बदलने की खबर उड़ने से पहले ही
वो अपना रुख बदलने के लिए तैयार मिलता है

३.
ये न समझो ऐसा वैसा वास्ता सूरज से है
ये सफ़र ऐसा है अपना सामना सूरज से है

हम सितारों की तरह छोटे हैं तो छोटे सही
झूठ क्यों बोलें हमारा सिलसिला सूरज से है

ये न सोचो रात भर करना पड़ेगा इन्तजार
बस ये समझो रात भर का फासला सूरज से है

बेतवज्जो हो गयी उसके चिरागों की चमक
इस कदर वो इसलिए शायद खफा सूरज से है

रात में दरिया किसी को क्या दिखा पायेगा अक्स
ये सिफत पानी की मिस्ले-आइना सूरज से है

चिलचिलाती धूप ही लाती है पेड़ों के करीब
साये में दो पल ठहरने का मजा सूरज से है

धूप खाने में कहीं पानी न मर जाए नदीम
हमको अंदेशा इसी नुकसान का सूरज से है


 







४.
चुप रहा तो घुट के रह जाएगा जीने का मजा
रोया तो बह जाएगा सब अश्क पीने का मजा

मुफ्त में राहत नहीं  देगी हवा चालाक है
लूट कर ले जायेगी मेरे पसीने का मजा

साल भर तक एक ही  मौसम न रास आएगा अब
अब जरूरत बन चुका है हर महीने का मजा

एक मंजिल और हर मंजिल के बाद आयी नजर
रफ्ता-रफ्ता हो गया काफूर जीने का मजा

वो न हो तो प्यास की हालत ही होती है कुछ और
पशोपस में ही पड़ा रहता है पीने का मजा

लुत्फ़ मंजिल तक पहुँचने की ललक में है नदीम 
ख़त्म हो जाता है साहिल पर सफीने का मजा 


संपर्क
५ डी/२५, वृन्दावन योजना, रायबरेली रोड, लखनऊ 
फोन-०९४५६४६०६५९ 

तस्वीरें जयपुर के प्रसिद्ध कवि और लेखक हेमंत शेष के सौजन्य से. हेमंत का ई.मेल पता है......
hemantshesh@gmail.com

23 टिप्‍पणियां:

  1. ई साखी त हमको सीप का जईसा बुझाता है जिसमें से एक से एक मोती निकल कर सामने आता है..ओम प्रकाश नदीम जी को हमारा प्रणाम
    भरे बाजार से अक्सर मैं खाली हाथ आता हूँ
    कभी ख्वाहिश नहीं होती कभी पैसे नहीं होते
    एक आम आदमी का बेदना जहाँ इस सेर में देखाई देता है ओहीं एकजुटता का एतना अच्छा उदाहरन हमको कहीं नहीं मिला कि
    न होते धूप के टुकड़े न मिलता छाँव को हिस्सा
    अगर पेड़ों पे इतने एकजुट पत्ते नहीं होते
    खाली बजार नहीं देस में दोगला नस्ल का ऐसा फैलाव हुआ है कि कहने पर मजबूर हो गया है सायर
    नयी कलमी तिजारत का ये फल हासिल हुआ हमको
    कि हर मौसम में अब हर फल सरे बाज़ार मिलता है
    इसको तरक्की कहिए कि बरबादी... लिखेंगे त लिखते चले जाएंगे..इसलिए सचमौच सब एक से एक है... आनंदित हो गए हम!!

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  2. बहुत ही उम्दा ग़ज़लें.
    मन खुश हो गया.
    सभी शेर बहुत अच्छे हैं.

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  3. नदीम जी की गज़लें पढ कर दिल खुश हुआ। सारी ही गज़लें अनमोल हैं।
    हर शेर मार्के का है।

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  4. ISO 9001 - 9002 मार्का कहा जाना चाहिए ग़ज़लों को। वो कहते हैं न कि मज़ा आया, आया ही आया, मन में समाया। बाहर निकाला न गया।

    मुफ्त में राहत नहीं देगी हवा चालाक है
    लूट कर ले जायेगी मेरे पसीने का मजा।


    और मैं बतलाना चाहूंगा कि हवा ने यह चालाकी, हमारे जैसे हवा का इस्‍तेमाल करने वालों से ही सीखी है।

    भरे बाजार से अक्सर मैं खाली हाथ आता हूँ
    कभी ख्वाहिश नहीं होती कभी पैसे नहीं होते।

    और कभी कभी सौदेबाजी नहीं हो पाती है। बिना बार्गेनिंग के खरीदारी में अब लुत्‍फ कहां रहा है। यह एक असलियत बन गई है मध्‍यवर्गीय परिवारों की।

    मेरी कमजोर हालत का असर सब पर हुआ कैसे
    मैं जिसके पास जाता हूँ वही बीमार मिलता है।


    और इस शेर ने तो मरीजों का हाल पूछने-जानने वालों को शर्मिन्‍दा करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है।

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  5. 1
    नजर आते हैं जो जैसे वो सब वैसे नहीं होते
    जो फल पीले नहीं होते वो सब कच्चे नहीं होते
    2
    बहुत कम में बहुत कुछ है हमारे गाँव में अब भी
    भले बिजली न सड़कें हैं न ही अखबार मिलता है
    3
    साल भर तक एक ही मौसम न रास आएगा अब
    अब जरूरत बन चुका है हर महीने का मजा
    नदीम साब
    aadab !
    ओम्दा ग़ज़लों के लिए आप का साधुवाद , नए प्रतीक लगे मुझे जो आप कि नज़र किया है ,
    शुक्रिया ,
    सुभाष जी का भी आभार !
    सादर
    हम सितारों की तरह छोटे हैं तो छोटे सही
    झूठ क्यों बोलें हमारा सिलसिला सूरज से है

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  6. bhut sundr rchnayen hainrchnaon me bhur sundr ridm hai rvangi hai sahjta hai
    bdhai
    dr. ved vyathit

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  7. NADEEM SAHIB KEE SABHEE GAZALEN MANOYOG SE PADH
    GAYAA HOON. SABHEE SHER EK SE BADHKAR EK HAIN.
    SEEDHEE SAADEE ZUBAAN HAI AUR GAHRE BHAAV HAIN.
    BAHUT KHOOB.

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  8. ओम प्रकाश नदीम की गज़लें उम्दा होती हैं, कथ्य और बिंब में गज़ब का तारतम्य होता और बज्नो-बहर की बात मत पूछिए वो इनकी ग़ज़लों की सबसे बड़ी विशेषता होती है, खासकर यह शेर मुझे बहुत पसंद आया, कि-

    चुप रहा तो घुट के रह जाएगा जीने का मजा
    रोया तो बह जाएगा सब अश्क पीने का मजा

    मुफ्त में राहत नहीं देगी हवा चालाक है
    लूट कर ले जायेगी मेरे पसीने का मजा

    उत्तर देंहटाएं
  9. वाह!! बहुत आभार ओम प्रकाश नदीम जैसे उम्दा रचनाकार की रचनायें पढ़वाने का.

    बहुत ही जबरदस्त रहीं सभी गज़ले और एक शेर जो मेरी डायरी में उतर गया:


    बहुत कम में बहुत कुछ है हमारे गाँव में अब भी
    भले बिजली न सड़कें हैं न ही अखबार मिलता है


    -क्या कहने...शानदार!!

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  10. नदीम जी चारो गजले बहुत अच्छी है .एक एक शेर पूरी गजल है .बहुत अच्छे .आपको पढ़ कर आनंद आ गया .बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  11. नदीम जी चारो गजले बहुत अच्छी है .एक एक शेर पूरी गजल है .बहुत अच्छे .आपको पढ़ कर आनंद आ गया .बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  12. ये रिश्ता हर सफ़र हर मोड़ पर हर बार मिलता है
    तुम्हारी हर कहानी में मेरा किरदार मिलता है
    बहुत बढ़िया शेर लगा ..

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  13. ये तो होना ही था। नदीम सर की ग़ज़लें सर चढ़कर बोलती हैं उनके व्यक्तित्व की तरह। जैसा उनका परिचय यहां दिया गया है, ये ग़ज़लें इस बात को प्रमाणित करती हैं। मुझे नहीं लगता कि इन पर मुझ जैसे नौसिखये को कुछ कहना चाहिए। मैं तो इनसे प्रेरणा ग्रहण करता हूं।

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  14. ओम् प्रकाश नदीम जी की हर गज़ल लाजवाब है ...

    नजर आते हैं जो जैसे वो सब वैसे नहीं होते
    जो फल पीले नहीं होते वो सब कच्चे नहीं होते

    कितनी सहजता से बात कह दी है ..

    नयी कलमी तिजारत का ये फल हासिल हुआ हमको
    कि हर मौसम में अब हर फल सरे बाज़ार मिलता है

    सटीक बात है...आज कल कौन मौसम का इंतज़ार करता है ..

    ये न सोचो रात भर करना पड़ेगा इन्तजार
    बस ये समझो रात भर का फासला सूरज से है

    प्रेरणा देती हुई बहुत खूबसूरत बात ...

    लुत्फ़ मंजिल तक पहुँचने की ललक में है नदीम
    ख़त्म हो जाता है साहिल पर सफीने का मजा

    वाह ...बहुत खूब ...

    उत्तर देंहटाएं
  15. नदीम जी की शायरी उद्वेलित करती है। उनकी शायरी पर कहने को कुछ नहीं है। हां गुनने को बहुत कुछ है। अपनी बात को कहने का उनका अंदाज निराला है। पर उनकी शायरी के बहाने मैं यहां कुछ और कहना चाहता हूं। उनकी शायरी पढ़कर अगर दिल खुश हो गया,मन खुश हो गया या आनंद आ गया जैसी ही प्रतिक्रिया आप दे पा रहे हैं तो समझिए आप उनकी शायरी की आत्‍मा तक नहीं पहुंचे। बस शब्‍दों के चयन और बेहतर संयोजन को देखकर ही वापस लौट गए हैं। नदीम जी की शायरी जिन्‍दगी की जद्दोजहद से रूबरू कराती है, उसकी छटपटाहट को महसूस करने की जरूरत है।
    मुझे लगता है जितनी मेहनत से रचनाकार लिखता है, उतनी ही मेहनत से उस पर टिप्‍पणी लिखने वालों को करना चाहिए। अन्‍यथा न लें, मन खुश हुआ,दिल खुश हुआ जैसे शब्‍द पढ़कर लगता है जैसे हम प्रशंसा कर रहे हैं या लानत भेज रहे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  16. कभी चुप रहना कुछ बोलने से अधिक कारगर रहता है. नदीम जी की ग़ज़लें मुझे कुछ बोलने की मोहलत भी नहीं दे रहीं. साखी और नदीम जी दोनों को बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  17. मंगलवार 10 अगस्त को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ....आपकी अभिव्यक्ति ही हमारी प्रेरणा है ... आभार

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  18. भरे बाजार से अक्सर मैं खाली हाथ आता हूँ
    कभी ख्वाहिश नहीं होती कभी पैसे नहीं होते

    मरासिम जिन्दगी के पेड़ पर पत्तों के जैसे हैं
    तअल्लुक तोड़ने से फूल फल अच्छे नहीं होते
    ****
    नयी कलमी तिजारत का ये फल हासिल हुआ हमको
    कि हर मौसम में अब हर फल सरे बाज़ार मिलता है

    हवा के रुख बदलने की खबर उड़ने से पहले ही
    वो अपना रुख बदलने के लिए तैयार मिलता है
    ****
    चिलचिलाती धूप ही लाती है पेड़ों के करीब
    साये में दो पल ठहरने का मजा सूरज से है
    ****
    मुफ्त में राहत नहीं देगी हवा चालाक है
    लूट कर ले जायेगी मेरे पसीने का मजा

    लुत्फ़ मंजिल तक पहुँचने की ललक में है नदीम
    ख़त्म हो जाता है साहिल पर सफीने का मजा
    ****

    वाह वा...हर शेर ऐसा है के बार बार पढ़िए और पहले ज्यादा लुफ्त उठाइए...एक दम अलग अंदाज़ और ज़ज्बात की बेहतरीन पेशकश बहुत कम कलाम में नज़र आती है लेकिन नदीम साहब की सभी ग़ज़लों में जो आपने पढवाई हैं ये हुनर खूब नज़र आया है...इस लाजवाब शायर के सम्मान में सर झुकता हूँ और आपका, उनकी शायरी हम तक पहुँचाने के लिए, दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  19. Nadeem sahab ki pahli hi gazal padh rahi thi aur man jaise jhoom utha aur socha gazal mein se kisi bhi ek sher ko kaise chun lun mujhe to sab itne pasand aa rahe hain .......

    to laga gazal dar gazal likhti hun

    नजर आते हैं जो जैसे वो सब वैसे नहीं होते
    जो फल पीले नहीं होते वो सब कच्चे नहीं होते
    Matla kya kaha hai kitna alag aur kitni saadgi se kahi baat

    जहां जैसी जरूरत हो वहां वैसे ही बन जाओ
    अगर ऐसे ही होते हम तो फिर ऐसे नहीं होते
    waah sahab

    भरे बाजार से अक्सर मैं खाली हाथ आता हूँ
    कभी ख्वाहिश नहीं होती कभी पैसे नहीं होते
    kamaal ki gahrayi hai sher mein

    न होते धूप के टुकड़े न मिलता छाँव को हिस्सा
    अगर पेड़ों पे इतने एकजुट पत्ते नहीं होते

    kitni badi baat kah di

    मरासिम जिन्दगी के पेड़ पर पत्तों के जैसे हैं
    तअल्लुक तोड़ने से फूल फल अच्छे नहीं होते

    kya baat hai

    शरारत जिनके सीने पे हमेशा मूंग दलती है
    वो आँगन काटता है घर में जब बच्चे नहीं होते

    kamal ki gazal hai bahut shaandaar har sher barson tak zahan mein gunjne wala

    उत्तर देंहटाएं
  20. नयी कलमी तिजारत का ये फल हासिल हुआ हमको
    कि हर मौसम में अब हर फल सरे बाज़ार मिलता है

    कम अज कम आज तो आवारगी की छुट्टी कर देते
    बड़ी मुश्किल से हफ्ते भर में इक इतवार मिलता है

    चिलचिलाती धूप ही लाती है पेड़ों के करीब
    साये में दो पल ठहरने का मजा सूरज से है

    मुफ्त में राहत नहीं देगी हवा चालाक है
    लूट कर ले जायेगी मेरे पसीने का मजा
    ye sare hi sher bahut bahut pasand aaye
    Main sakhi subhash rai ji aur hemant ji ki shukrguzaar hun jo unhone itne achche shayar se parichay karaya aur unki gazlen padhwayi

    bas isi tarah ye karwan chalta rahe dua hai

    उत्तर देंहटाएं
  21. sundar...adbhut....har nazariye se. arase baad maine itani pyaree , dil me utarane valee ghazale parhee. dhanyvaad sybhash ji iss chayan k liye.

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  22. भरे बाजार से अक्सर मैं खाली हाथ आता हूँ
    कभी ख्वाहिश नहीं होती कभी पैसे नहीं होते

    न होते धूप के टुकड़े न मिलता छाँव को हिस्सा
    अगर पेड़ों पे इतने एकजुट पत्ते नहीं होते

    मरासिम जिन्दगी के पेड़ पर पत्तों के जैसे हैं
    तअल्लुक तोड़ने से फूल फल अच्छे नहीं होते

    सुभाष जी आज आपके ही माध्यम से जाना नदीम जी इतना बढ़िया लिखते हैं .....
    हर शे'र गहराइयों से जुड़ा हुआ ....ज़िन्दगी को आइना दिखलाता सा ....
    बहुत कुछ सिखने को मिला इनकी ग़ज़लों से ......आभार ....!!

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  23. संजीव गौतम की टिप्‍पणी पढ़कर चला आया और देखता हूँ कि ग़लत नहीं आया। ग़ज़ल सीधे-सादे शब्‍दों में भी गहराई लिये हो सकती है इसका स्‍पष्‍ट उदाहरण ये ग़ज़लें हैं।

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