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शनिवार, 15 सितंबर 2012

समकालीन सरोकार का प्रवेशांक पाठकों के हाथ में


प्रधान संपादक --सुभाष राय
संपादक --हरे प्रकाश उपाध्याय
फोन संपर्क--9455081894, 8756219902

साखी के पाठकों, लेखकों से क्षमा-याचना सहित। मेरे प्रिय भाई नीरज गोस्वामी और आदरणीय प्राण शर्मा जी की गजलें मेरे पास हैं। उनका यथासमय समकालीन सरोकार में इस्तेमाल किया जायेगा।

सोमवार, 3 सितंबर 2012

कशमकश ऐसी कि मत पूछो


ग़ज़लकार  ओम प्रकाश यती की रचनाओं पर गंभीर चर्चा हुई। सलिल वर्मा उर्फ बिहारी ब्लागर ने कहा कि ओम प्रकाश यती की ग़ज़लों को देखकर मुझे श्रीलाल शुक्ल और मनोहर श्याम जोशी जी की याद आ गयी। आपको अटपटा लगेगा। ये दोनों साइंस के ग्रैजुएट थे, मगर अदब की दुनिया में इनका कोई सानी नहीं। ब्लॉग की दुनिया में जितने भी अदबी लोग मिले तकरीबन ८०% इंजीनियर। और आज एक और इंजीनियर साहब से मुलाक़ात हो गयी उनकी ग़ज़लों के मार्फ़त। सिविल इंजीनियर हैं, लिहाजा ग़ज़लों और अशआर को इस तरतीब से तराशा है कि हर शे’र का हुस्न निखर कर सामने आ गया है।
सुभाष जी, सबसे पहले मैं गज़ल की तरतीब के बारे में कहूँगा कि पिछली बारी में मैंने यही बात कही थी जो आज देखने में आ रही है। एक के बाद दूसरी गज़ल बेहतर से बेहतरीन होती गयी है। पहली गज़ल, लफ़्ज़ों की बुनाई के हिसाब से बहुत अच्छी है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं कि मुँह से ‘कमाल’ निकल जाए। पहले कहीं सुनी-सुनाई सी बातें लगती हैं। लेकिन अपनी बातों को वापस लेने का जी चाहता है जब अगली गज़ल के इन दो शे’र से सामना होता है:
कहीं मैं डूबने से बच न जाऊँ, सोचकर ऐसा
मेरे नज़दीक से होकर कोई तिनका नहीं निकला
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ज़रा सी बात थी और कशमकश ऐसी कि मत पूछो
भिखारी मुड़ गया पर जेब से सिक्का नहीं निकला
इन दोनों शेर पर बेसाख्ता “वाह” निकल जाती है। तीसरी गज़ल में देवता को इतने रूप में पेश किया है कि आसमान से लेकर धरती और यहाँ तक कि नकली (टीवी सीरियल वाले) देवताओं को भी इन्होंने नहीं बख्शा है। मगर मासूमियत से भरा शेर है ..
भीड़ इतनी थी कि दर्शन पास से सम्भव न था
दूर से ही देख आए हम उछल के देवता.

जिसे पढकर अपना बचपन याद आ जाता है। मेरा सबसे पसंदीदा शेर है यही। और अगले ही शेर में बयान कडवी सचाई :
कामना पूरी न हो तो सब्र खो देते हैं लोग
देखते हैं दूसरे ही दिन बदल के देवता.

अगली गज़ल में “सहसा” खटकता है मतले के अंदर और मतले में छिपा फलसफा खुलकर सामने नहीं आ पाया। आसान से अशआर और एक अच्छी गज़ल। मक्ते में छिपा दर्द बहुत ही खुलकर सामने आया है। और आखिर में बाबूजी का पोर्ट्रेट। इस गज़ल का मर्म वही समझ सकता है जिसने “वो ज़माना” देखा है। एक-एक शेर के साथ लगता है जैसे एक तस्वीर उभरती जाती है और मक्ते तक आकर एक मुकम्मल तस्वीर धोती, कुर्ता, टोपी लगाए बाबूजी की। एक स्केच है यह गज़ल और शायद याद दिलाए कितने घरों में फ्रेम में जड़े बाबूजी की।
आखिर में बस इतना ही कि यती साहब की ग़ज़लों में सादाबयानी है और एक्सप्रेशन की क्लैरिटी है। कुल मिलाकर इंजीनियर साहब एक अच्छे शायर है और इनकी गज़लें मुतासिर करती हैं।
मशहूर शायर अशोक रावत के मुताबिक ओम प्रकाश यती जी मेरे मित्र हैं लेकिन उनसे मित्रता का पहला कारण उनकी ग़ज़लें ही हैं। भाषा के मुहाबरे पर उनकी पकड़, कहन का मासूम अंदाज़ और अपने आस पास की दुनिया मे रमे यती जी अलग खड़े नज़र आते हैं। कोई बनावट नहीं, कोई सजावट नहीं, कोई आक्रामकता नहीं, कोई शिकायत नहीं, कोई धारा नहीं, कोई नारा नहीं बस सीधी-सादी बातें और मासूम अंदाज़। उनकी गज़लें एक दिन हिंदी गज़लों की पहचान बनेंगी मेरा पक्का विश्वास है।
लंदन से ग़ज़लकार प्राण शर्मा ने कहा, यूं तो ओम प्रकाश यती की सभी ग़ज़लें अच्छी हैं लेकिन पहली ग़ज़ल का कोई जवाब नहीं। उसका एक-एक शेर दिल में उतरता है। उनकी एक गज़ल का मिसरा है, देखिये आते हैं अब कब तक निकल कर देवता। इस मिसरे में कब तक के साथ अब का इस्तेमाल मुझे अच्छा नहीं लगा। यती की ग़ज़लें पढ़वाने के लिए सुभाष जी का हार्दिक धन्यवाद।
.शायर तिलक राज कपूर ने कहा, क्या यह एक संयोग भर है कि लगातार तीसरा सिविल इंजीनियर ग़ज़लों के साथ प्रस्‍तुत है और वह दुष्‍यंत कुमार के रंग में डूबा हुआ। भाई बड़ी दमदार ग़ज़ल हैं। बधाई। दिगंबर नासवा के अनुसार यती जी की ग़ज़लें समाज की सच्चाइयों से जुडी ... उनपे गहरा कटाक्ष करती हुयी हैं । किसी एक गज़ल को यहाँ कोट करना आसान नहीं।. बस आनद ही लिया जा सकता है।  वाणभट्ट ने कहा, यती जी की गज़लें एकदम दिल के करीब से निकलीं...और दिल तक पहुँचीं।
ज़रा सी बात थी और कशमकश ऐसी कि मत पूछो
भिखारी मुड़ गया पर जेब से सिक्का नहीं निकला
कामना पूरी न हो तो सब्र खो देते हैं लोग
देखते हैं दूसरे ही दिन बदल के देवता
क्या बात है...
वीरेंद्र कुमार शर्मा ने तारीफ की। शाहिद मिर्जा ने कहा, सुभाष जी, यती जी को पढ़ने का सौभाग्य पहले भी मिला है। आज आपके ब्लॉग के माध्यम से और उम्दा कलाम पढ़ने को मिला। कवि और सायर रूप चंद्र शास्त्री मयंक ने इन ग़ज़लों की लिंक  चर्चा मंच पर लगायी।



आठ सितंबर शनिवार को नीरज गोस्वामी की ग़ज़लें 
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