शनिवार, 28 जुलाई 2012

तिलकराज कपूर की ग़ज़लें

रचनाकार का वक्तव्य
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तिलकराज कपूर
ग़ज़ल कहने की मेरी प्रक्रिया और किसी अन्‍य की प्रक्रिया में शायद ही कुछ अंतर हो। बस यकायक कोई शेर बन जाता है, कोशिश रहती है कि पहला ही शेर मत्‍ले के रूप में हो जाये। यदि ऐसा नहीं हुआ तो शेर के बाद मत्‍ले का शेर ही होता है। बस उसके बाद फ़ुर्सत का ही प्रश्‍न रह जाता है। एकाध हफ़्ते में ग़ज़ल का ढॉंचा तैयार हो जाता है। यदा-कदा उस ढॉंचे को देखता रहता हूँ और मंजाई चलती रहती है। कई ग़ज़ल ऐसी रहीं कि एक-दो महीने के अंतराल पर उन्‍हें देखने पर मज़ा नहीं आया और पूरी की पूरी खारिज हो गयीं। जब कोई 'तरही' का अवसर मिलता है तो समय बंधन ग़ज़ल लिखवा ही लेता है। मेरी रचना प्रक्रिया में एक भारी दोष है, जब तक नया शब्‍द काफि़या के लिये मिलता जाये, नया शेर बनता जाता है। उद्देश्‍य रहता है अधिक से अधिक शेर कहने का, जिससे बाद में कमज़ोर शेर हटाकर एक पुख्‍ता ग़ज़ल को अंतिम रूप दिया जा सके; लेकिन फिर कभी सम्‍पादन का अवसर ही नहीं मिल पाता और ग़ज़ल में कई शेर ऐसे छूट जाते हैं, जिन्‍हें भरती का माना जा सकता है। आदत की बात है, लगता है धीरे-धीरे जायेगी।
शेर कहने में सबसे अधिक मज़ा आता है चुनौती के रूप में। अक्‍सर घर में कहता हूँ कि कुछ शब्‍द दो। फिर कोशिश रहती है सभी शब्‍दों को एक ही शेर में लेने की। मुझे लगता है इससे शब्‍दों को  बॉंधने का अभ्‍यास अच्‍छी तरह होता है।





तिलकराज कपूर की ग़ज़लें

1.
ज़माने को हुआ क्‍या है, कोई निश्‍छल नहीं मिलता
किसी मासूम बच्‍चे सा कोई निर्मल नहीं मिलता।
युगों की प्‍यास का मतलब उसी से पूछिये साहब
जिसे मरुथल में मीलों तक कहीं बादल नहीं मिलता।
जुनूँ की हद से आगे जो निकल जाये शराफ़त में
हमें इस दौर में ऐसा कोई पागल नहीं मिलता।
यक़ीं कोशिश पे रखता हूँ, मगर मालूम है मुझको
अगर मर्जी़ न हो तेरी, किसी को फल नहीं मिलता।
जहॉं भी देखिये नक्‍़शे भरे होते हैं जंगल से
ज़मीं पर देखिये तो दूर तक जंगल नहीं मिलता।
समस्‍या में छुपा होगा, अगर कुछ हल निकलना है
नियति ही मान लें उसको, अगर कुछ हल नहीं मिलता।
हर इक पल जिंदगी का खुल के हमने जी लिया 'राही'
गुज़र जाता है जो इक बार फिर वो पल नहीं मिलता।

2.
हुस्‍नो-अदा के तीर के बीमार हम नहीं
ऐसी किसी भी शै के तलबगार हम नहीं।
हमको न इस की फि़क्र हमें किसने क्‍या कहा
जब तक तेरी नज़र में ख़तावार हम नहीं।
जैसा रहा है वक्‍त निबाहा वही सदा
हम जानते हैं वक्‍त की रफ़्तार हम नहीं
चेहरा पढ़ें हुजूर नहीं झूठ कुछ यहॉं
कापी, किताब, पत्रिका, अखबार हम नहीं।
हमको सुने निज़ाम ये मुमकिन नहीं हुआ
तारीफ़ में लिखे हुए अश'आर हम नहीं।
उम्‍मीद फ़ैसलों की न हमसे किया करें,
खुद ही खुदा बने हुए दरबार हम नहीं।
फि़क़्रे-सुखन हमारा ज़माने के ग़म लिये
हुस्‍नो अदा को बेचते बाज़ार हम नहीं।

3.
किसी को मस्‍ती, मज़े का आलम, प्रभु तुम्‍हारे भजन में आए
हमें मज़ा ये ग़ज़ल में तेरे वचन की हर इक कहन में आए।
खिले हुए हैं, हज़ार रंगों के फ़ूल नज़रों की राह में पर,
जिसे न चाहत हो तोड़ने की, वही मेरे इस चमन में आए।
सभी पे छाया हुआ है जादू, बहुत कमाने की आरज़ू है
खुदा ही जाने, उधर गया जो, न जाने फिर कब वतन में आए।
तुझे पता है, मेरे किये में, सियाह कितना, सफ़ेद कितना
जो इनमें अंतर, करे उजागर, वो धूप मेरे सहन में आए।
कहा किसी ने बुरा कभी तो, चुभन हमेशा, रही दिलों में
कभी किसी को, लगे बुरा जो, न बोल ऐसा जहन में आए।
अगर जहां हो तेरे मुखालिफ़, कभी न डरना, कभी न झुकना
खुदा निगहबॉं बना हो जिसका तपिश न उस तक अगन में आये।
तुझे ऐ 'राही' कसम खुदा की, सभी को अपना, बना के रखना
मिलो किसी से, सुकूँ वो देना, जो दिल से दिल की छुअन में आये।

4.
सज्‍़दे में जो झुके हैं तेरे कर्ज़दार है
दीदार को तेरे ये बहुत बेकरार हैं।
मेरे खि़लाफ़ जंग में अपने शुमार हैं
हमशीर भी हैं, उनमे कई दिल के यार हैं।
ऑंधी चली, दरख्‍़त कई साथ ले गई
बाकी वही बचे जो अभी पाएदार हैं।
ऐसा न हो कि आखिरी लम्‍हों में हम कहें
अपने किये पे हम तो बहुत शर्मसार हैं।
बेचैनियों का राज़ बतायें हमें जरा
फ़ूलों भरी बहार में क्‍यूँ बेकरार हैं
किससे मिलायें हाथ यहॉं आप ही कहें
जब दिल ये जानता है सभी दाग़दार हैं।
सपने नये न और दिखाया करें हमें
दो वक्‍त रोटियों के सपन तार-तार हैं।
सौ चोट दीजिये, न मगर भूलिये कि हम
हारे न जो किसी से कभी वो लुहार हैं।
कपड़ों के, रोटियों के, मकानों के वासते
जाता हूँ जिस तरफ़ भी उधर ही कतार हैं।
तुम ही कहो कि छोड़ इसे जायें हम कहॉं
इस गॉंव में ही मॉं है सभी दोस्‍त यार हैं।
कहता नहीं कि हैं सभी 'राही' यहॉं बुरे
पर जानता हूँ इनमें बहुत से सियार हैं।



5.
इधर इक शम्‍अ तो उस ओर परवाना भी होता था
नसीबे-इश्‍क में मिलना-ओ-मिट जाना भी होता था।
अरे साकी हिकारत से हमें तू देखता क्‍या है
हमारी ऑंख की ज़ुम्बिश पे मयखाना भी होता था।
समय के साथ ये सिक्‍का पुराना हो गया तो क्‍या
कभी दरबार में लोगों ये नज़राना भी होता था।
हमारे बीच का रिश्‍ता हुआ क्‍यूँ तल्‍ख अब इतना
कभी मेरी मुहब्‍ब्‍त में तू दीवाना भी होता था।
मैं अरसे बाद लौटा हूँ तो दिन वो याद आये जब
यहॉं महफिल भी जमती थी तेरा आना भी होता था।
भला क्‍यूँ भीड़ में इस शह्र की हम आ गये लोगों
मुहब्‍बत कम नहीं थी गॉंव में दाना भी होता था।
सुनाये क्‍या नया 'राही', ठहर कर कौन सुनता है
हमें जब लोग सुनते थे तो अफ़साना भी होता था।

6.
रात हो या दिन, कभी सोता नहीं,
सूर्य का विश्राम पल होता नहीं।
चाहतें मुझ में भी तुमसे कम नहीं,
चाहिये पर, जो कभी खोता नहीं।
मोतियों की क्‍या कमी सागर में है,
पर लगाता, अब कोई गोता नहीं।
क्‍यूँ मैं दोहराऊँ सिखाये पाठ को
आदमी हूँ, मैं कोई तोता नहीं।
देख कर ये रूप निर्मल गंग का
पाप मैं संगम पे अब धोता नहीं।
जब से जानी है विवशता बाप की,
बात मनवाने को वो रोता नहीं।
हैं सभी तो व्‍यस्‍त 'राही' गॉंव में
मत शिकायत कर अगर श्रोता नहीं।

7.
थक गये जब नौजवॉं, ये हल निकाला
फिर से बूढ़ी बातियों में तेल डाला।
जो परिंदे थे नये, टपके वही बस
इस तरह बाज़ार को उसने उछाला।
देर मेरी ओर से भी हो गयी, पर
आपने भी ये विषय हरचन्‍द टाला।
जब उसे कॉंधा दिया दिल सोचता था
साथ कितना था सफ़र, क्‍यूँ बैर पाला।
भूख क्‍या होती है जबसे देख ली है
क्‍यूँ हलक में जा अटकता है निवाला।
एकलव्‍यों की कमी देखी नहीं पर
देश में दिखती नहीं इक द्रोणशाला।
तोड़कर दिल जो गया वो पूछता है
दिल हमारे बाद में कैसे संभाला।
जिंदगी तेरा मज़ा देखा अलग है
इक नशा दे जब खुशी औ दर्द हाला।
त्‍याग कर बीता हुआ इतिहास इसने
हरितिमा का आज ओढ़ा है दुशाला।
बस उसी 'राही' को मंजि़ल मिल सकी है
राह के अनुरूप जिसने खुद को ढाला।

रचनाकार का परिचय
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  1. जन्‍म-26 जुलाई 1956 श्‍योपुर कलॉं जिला मुरैना में। (अब श्‍योपुर भी एक जिला है)
  2. उच्‍चतर माध्‍यमिक तक अधिकॉंश शिक्षा मुरैना जिले में। 1976 में ग्‍वालियर के माधव
  3. इंस्‍टीट्यूट ऑफ़ टेक्‍नॉलॉजी एण्‍ड साईंस से सिविल इंजीनियरिंग में स्‍नातक
  4. 1980 से मध्‍यप्रदेश जल संसाधन विभाग में कार्यरत।
  5. वर्तमान में मध्‍यप्रदेश जल संसाधन विभाग में संचालक, जल मौसम विज्ञान के पद पर
  6. सूचना प्रबंधन, मानव संसाधन विकास, आर्गेनाईज़ेशनल डेव्‍हलपमेंट, चेंज मैनेजमेंट,
  7. इन्‍टीग्रेटेड रिवर बेसिन प्‍लॉनिंग आदि विषयों पर विशेष नियंत्रण।

बुधवार, 18 जुलाई 2012

सबसे बतियाती हुई गज़लें


अशोक  रावत की ग़ज़लों ने काव्यप्रेमियों  को आलोड़ित किया. रावत जी की रचनात्मक उर्जा उनके गहरे सामाजिक अनुभवों और सरोकारों की उपज है. वे ऐसे रचनाकार हैं, जो बहुत आसानी से अपने निजी अनुभवों को ऐसी जमीन दे देता है, जो निजीपन से बाहर निकलकर सबके अनुभव का हिस्सा बन जाते हैं. वे अपनी गंभीर और थका देने वाली कार्यालयीय  जिम्मेदारियों के बीच शब्दों से भी जूझते रहते हैं. कई बार ऐसे ही क्षणों में भीतर कुछ चमकता है और उनकी सारी थकन मिट जाती है. वे मानते  हैं कि  एक अच्छा कवि होने के लिए एक अच्छा आदमी होना बहुत जरूरी है. उनके व्यवहार में भी यह नजर आता है. इसीलिये उनकी गजलें सीधे अपने पाठक से बतियाती हुई प्रस्तुत होती हैं.
साखी पर उनकी गज़लें पढ़कर शायर नीरज गोस्वामी ने कहा, रावत जी की बेजोड़ ग़ज़लों के साथ, इससे बेहतर साखी का आगाज़ नहीं हो सकता था. सकारात्मक सोच और ज़माने की दुश्वारियों को निहायत ख़ूबसूरती से रावत जी ने अपनी ग़ज़लों में प्रस्तुत किया है. ग़ज़ल के कहन में ताजगी और रवानी है. मेरी ढेरों दाद उन तक पहुंचाए. साखी को इस लाजवाब प्रस्तुति पर मेरी ढेरों शुभकामनाएं . नीरज ने रावत जी को कोट किया, "सारी कलाएं जीवन में आनंद की सृष्टि के लिये हैं लेकिन न जाने क्यों और किन लोगों ने काव्य कला को घटनाओं और दुर्घटनाओं का गोदाम बनाकर रख दिया है जिसमें घुसते ही साँस घुटने लगती है. " "मेरा सफ़र किसी मंच पर जाकर ख़त्म नहीं होता. मेरी मंज़िल आदमी के मन तक पहुँचने की है. मैं जानता हूँ यह बहुत कठिन काम है लेकिन आसानियों में मुझे भी कोई आनंद नहीं आता." और कहा कि अशोक जी के  विचार उनकी ग़ज़लों की तरह ही प्रेरक हैं...कितनी सहजता से उन्होंने कितनी सच्ची बात कह दी है....नमन है उनकी  कलम को.
तिलक राज कपूर ने कहा कि इन लाजवाब ग़ज़लों को पढ़कर; समझकर नतमस्तक । खूबसूरत भाव, कथ्‍य व शिल्‍प। नि:शब्‍द हूँ। कहीं-कहीं जो अटकाव दिखा वह शायद आप स्‍पष्‍ट कर सकें।

मनुष्यों की तरह यदि पत्थरों में चेतना होती,

कोई पत्थर मनुष्यों की तरह निर्मम नहीं होता.
इस शेर में कुछ गंभीर समस्‍या है, पहली बात तो यह है कि बावज्‍़न होते हुए भी पहला मिस्रा प्रवाह में नहीं है जिसका मुख्‍य कारण इस बह्र के रुक्‍न 'मफ़ाईलुन्' की प्रकृति है। दूसरी समस्‍या यह है कि दूसरी पंक्ति कहती है कि पत्‍थर चेतनाविहीन होते हुए भी मनुष्‍यों की तरह निर्मम होता है। अचेतन से निर्मम का यह संबंध असंगत है। अगर यह भी मान लिया जाये कि पत्‍थर को अचेतन नहीं मनुष्‍यों जैसी चेतना से विहीन माना गया है तो काव्‍य-प्रवाह की दृष्टि से सरलता की समस्‍या है। इस शेर की मूल भावना यह ध्‍वनित होती है कि मनुष्य निर्मम होता है और पत्‍थर नहीं लेकिन गठन में यह प्रभाव उत्‍पन्‍न नहीं हो पा रहा है। इस शेर से ध्‍वनित बात जो मुझे समझ आई वो कुछ ऐसे है कि:
अगर पत्‍थर में होती चेतना इन्‍सान के जैसी
कोई पत्‍थर किसी इन्‍सान सा निर्मम नहीं होता।
या
मनुष्‍यों सी नहीं है चेतना, फिर भी कोई पत्‍थर
किसी इंसान के जैसा कभी निर्मम नहीं होता।

एक और बात ---


परिंदों की ज़रूरत है खुला आकाश भी लेकिन,

कहीं पर शाम ढलते ही ज़रूरी है ठिकाना भी.
खुला आकाश परिंदों की मुख्‍य ज़रूरत है लेकिन पहली पहली पंक्ति में ये ज़रूरत सामान्‍य हो गयी है. शेर में जो कहना चाहा गया है वह कुछ ऐसा लगता है कि:
खुले आकाश की चाहत परिंदों को रही लेकिन
ढले जब शाम तो उनकी ज़रूरत है ठिकाना भी.

देवी नागरानी  का कहना है कि सब की सब ग़ज़लें अपने शायरी के फन से लबालब. पढ़ते हुए गुनगुनाहट का तत्व लिए हुए. रावत जी को मेरी शुभकमनयें इस सुंदर प्रस्तुति के लिए.


  प्रतुल वशिष्ठ के मुताबिक 'गज़लकार' अपनी ही गजलों का श्रोता या पाठक होना नहीं चाहता. कभी-कभी 'कविता' या 'ग़ज़ल' को श्रोताभाव से पढ़कर दोहरे सुख को लेना भी नहीं छोड़ना चाहिये.


बढ़े चलिये, अँधेरों में ज़ियादा दम नहीं होता,

निगाहों का उजाला भी दियों से कम नहीं होता. ......
को प्रतुल ने  बहुत उम्दा शेर कहा.

भरोसा जीतना है तो ये ख़ंजर फैंकने होंगे,

किसी हथियार से अम्नो- अमाँ क़ायम नहीं होता
को  लाजवाब बताया.
डा त्रिमोहन तरल ने कहा, हिन्दी भाषा के संस्कारों और मानवीय सरोकारों से सराबोर ग़ज़लें आदरणीय रावतजी की ही हो सकतीं थीं . पढ़ने  वालों को आनंद आना ही था. रावतजी को बधाई और राय साहब को धन्यवाद
.
संजीव गौतम और सुमन ने भी साखी के पुनरारंभ की सराहना की. 







२८ जुलाई शनिवार को पढ़िए शायर तिलकराज कपूर की रचनाएँ

शनिवार, 7 जुलाई 2012

अशोक रावत की ग़ज़लें

रचनाकार का वक्तव्य 
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अशोक रावत
अपनी ही ग़ज़लों पर कोई टिप्पणी करना  मुझे  मुनासिब नहीं लगता.  कभी कोई मुकाम  ज़िंदगी  में हासिल हो तो कुछ कहने  की हिमाक़त भी करूँ  लेकिन  जितना वक़्त गुज़रता चला जाता है ऐसा लगता है,  कुछ बात बन नहीं रही.   मै क्यों लिखता  हूँ  और कैसे लिखता हूँ  ये जिज्ञासाएं भी  किसी के  मन में  आख़िर क्यों उठती होगीं ?  वैसे भी ग़ज़ल कोई  छोटा और आसान विषय नहीं  है. अभिव्यक्ति की  बारीक़ियाँ  इतनी कि  उनमें डूबते जाइए और लगेगा कि अभी और  न  जाने कितनी गहराइयाँ  बाक़्री हैं.  ये  जो बारीक़ियाँ  हैं , कविता  के   किसी भी फार्म के लिये ज़रूरी हैं.   काफ़ी  लोग  इस बात पर  कुतर्क भी करते हैं. किसी भी विचार का कविता होना  इन बारीक़ियाँ  से गुज़रना  ही है वरना  गद्य और कविता में अंतर  ही क्या है.  ये बारीक़ियाँ  ही कला के  अनुशासन की  रचना करती है.  अनुशासन ही  विचार में   सौंदर्य की स्थापना  करता है.  और अभिव्यक्ति का सौंदर्य ही  कविता और पाठक के बीच एक रिश्ता है. जब ये रिश्ता टूट जाता है, तो पाठक कविता को फूटी आँख से नहीं  देखता. गद्य या पद्य में अभिव्यक्त  होने से  विचार की श्रेष्ठता   प्रभावित नहीं होती.  यह  अनुशासन  या छंद का  दायित्व नहीं कि वह  विचार को  श्रेष्ठ बना दे. सारी कलाएं जीवन में आनंद  की सृष्टि के लिये हैं  लेकिन न जाने क्यों और किन लोगों ने काव्य  कला  को घटनाओं और  दुर्घटनाओं का गोदाम बनाकर रख  दिया है  जिसमें घुसते ही  साँस  घुटने लगती है.  यद्यपि  कविता पर  इस प्रकार की टिप्पणी करना  ठीक नहीं क्यों कि लेखन कोई सामुदायिक या संस्थागत कार्य न होकर एक व्यक्तिगत कार्य है और एक या कुछ कवियों   द्वारा लिखी कविता के लिये पूरे कवि  समुदाय को ज़िम्मेदार नहीं  ठहराया जा सकता.  लेकिन समकालीनता   के नाम पर  कविता को ऐसे संदर्भों के  बोझ से  लाद   दिया गया है कि  उसकी ओर देखने का भी मन नहीं करता.
बिना कलात्मकता के  कोई कविता कविता नहीं हो सकती. जैसे  बिना चीनी के कोई मिठाई, मिठाई नहीं हो सकती. लिखना मेरे लिये एक ज़िम्मेदारी का काम है,  जिसे मैं ने लापरवाही  से कभी नहीं निभाया. जो मैं ने जिया है वही लिखा है.  मेरा लेखन किसी प्रतिबद्ध  विचारधारा का वफ़ादार  नहीं रहा.  मेरी वफ़ादारी  सिर्फ़ मानवीय सरोकारों से रही.  मेरा सफ़र  किसी मंच पर जाकर ख़त्म नहीं होता. मेरी मंज़िल आदमी के मन तक पहुँचने की है.  मैं जानता हूँ यह बहुत कठिन काम है लेकिन आसानियों में मुझे भी कोई आनंद नहीं आता. मैं अपने लिये सिर्फ़ चुनौतियाँ चुनता हूँ और उनका सामना करने में अपने आप को  खपा देता हूँ. सारे खतरे उठाकर सिर्फ़  सामना करता हूँ. जानता हूँ आदमी की ज़िंदगी में न कोई  विजय अंतिम है न  कोई पराजय. उसे तो हर रोज़ एक युद्ध करना है बिना हार जीत की परवाह करते हुए.  कल  की कभी ज़्यादा परवाह नहीं की. आज को जिया  और  पूरी निष्ठा से जिया.   मेरी ग़ज़लें मेरी ज़िंदगी का हिस्सा  हैं. हाँ, इतना  ज़रूर है कि मैं  उन पर मेहनत करता हूँ.  मैंने कितना लिखा , इस बात का मेरे लिये कोई अर्थ नहीं है, मेरे  लिये इस बात का अर्थ है कि मैंने क्या लिखा है.  कभी  कभी ऐसा लगता है ये समाज और सारी  संस्थाएं   आदमी के शोषण का  साधन बनके  रह गई हैं.मेरी कविता  मुझे हमेशा इनसे लड़ने का साहस देती है. मैं ने अपनी ग़ज़लों  से इससे ज़्यादा  कभी  कुछ चाहा भी नहीं.



                                 अशोक रावत की ग़ज़लें
                                                     -----------------------------

1.

बढ़े   चलिये,  अँधेरों  में ज़ियादा दम नहीं होता,
निगाहों  का  उजाला भी दियों से कम नहीं होता.

भरोसा  जीतना  है  तो  ये ख़ंजर   फैंकने होंगे,
किसी हथियार से अम्नो- अमाँ क़ायम नहीं होता.

मनुष्यों की  तरह  यदि पत्थरों में चेतना  होती,
कोई पत्थर मनुष्यों की तरह  निर्मम  नहीं होता.

तपस्या  त्याग  यदि भारत की मिट्टी में नहीं होते,
कोई  गाँधी नहीं होता,  कोई  गौतम  नहीं होता.

ज़माने  भर  के  आँसू उनकी आँखों में रहे तो क्या,
हमारे  वास्ते  दामन तो उनका नम नहीं होता.

परिंदों  ने  नहीं  जाँचीं  कभी  नस्लें दरख्तों  की,
दरख़्त उनकी नज़र में साल या शीशम नहीं होता.


2 

हमें  भी ख़ूबसूरत  ख़्वाब  आँखों में सजाने दो,
हमें  भी गुनगुनाने  दो, हमें  भी  मुस्कराने दो.

हमें  भी  टाँगने  दो चित्र  बैठक में उजालों के,
हमें  भी एक  पौधा  धूप का  घर में लगाने  दो.

हवाओं  को पहुँचने दो हमारी खिड़कियों तक भी,
हमारी  खिड़कियों  के  काँच टूटें  टूट जाने दो.

हवा इतना करेगी बस कि कुछ दीपक बुझा देगी,
मुँडेरों पर सजा दो और दियों को झिलमिलाने  दो.

समझने दो उसे माचिस का रिश्ता मोमबत्ती  से,
जलाता  है  जलाने  दो  बुझाता  है बुझाने दो.

हमें  कोशिश  तो करने  दो समंदर पार करने की
हमारी  नाव  जल में  डूबती है  डूब  जाने दो.


3. 

फूलों  का  अपना  कोई  परिवार  नहीं होता,
ख़ुशबू   का  अपना कोई घर द्वार नहीं होता.

हम गुज़रे कल की आँखों का सपना ही तो हैं,
क्यों  मानें  सपना  कोई  साकार  नहीं  होता.

इस दुनिया में अच्छे लोगों का ही बहुमत है,
ऐसा  अगर  न  होता  ये संसार नहीं  होता.

कितने ही  अच्छे  हों  काग़ज़ पानी के रिश्ते,
काग़ज़  की  नावों से  दरिया पार नहीं होता.

हिम्मत हारे तो सब कुछ नामुमकिन  लगता है,
हिम्मत  कर लें तो कुछ भी  दुश्वार नहीं होता.

वो  दीवारें  घर  जैसा  सम्मान  नहीं  पातीं,
जिनमें  कोई  खिड़की  कोई  द्वार  नहीं होता.

4.

जिन्हें अच्छा  नहीं  लगता हमारा मुस्कराना भी,
उन्हीं के साथ लगता है  हमें तो  ये ज़माना भी.

इसी  कोशिश  में दोनों  हाथ मेरे हो गये ज़ख़्मी,
चराग़ों को जलाना  भी, हवाओं  से  बचाना भी.

अगर  ऐसे  ही  आँखों   में जमा होते रहे आँसू,
किसी  दिन  भूल जायेंगे खुशी में मुसकराना भी.

उधर ईमान की ज़िद है कि समझौता  नहीं  कोई,
मुसीबत  है  इधर दो वक़्त की रोटी जुटाना  भी.

किसी ग़फ़लत में मत रहना, नज़र में आँधियों के है,
तुम्हारा   आशियाना   भी  हमारा  शामियाना  भी.

परिंदों  की  ज़रूरत है खुला आकाश  भी  लेकिन,
कहीं  पर शाम  ढलते ही  ज़रूरी है  ठिकाना भी.

ज़ियादा  सोचना  बेकार  है, इतना समझ लो  बस,
इसी  दुनिया  से लड़ना है, इसी से है निभाना भी.




गूगल से साभार

                                                      5. 

आख़िर मौसम की मनमानी क्यों स्वीकार करूँ.
क्यों  मैं  फूलों से नफ़रत काँटों से प्यार करूँ.

क्या  जैसी  दुनिया है  वैसा  ही हो जाऊँ मैं,
और इन  आँधी तूफ़ानों  की  जै-जैकार  करूँ.

काग़ज़  की  नावों  को लेकर माँझी बैठे  हैं,
इनके  बूते  मैं  दरिया को   कैसे पार करूँ.

इस मुद्दे  पर मैं अपनी ग़ज़लों के साथ नहीं,
ग़ज़लें  ये कहती  हैं मैं उनका व्यापार करूँ.

मेरे  अधिकारों  को लेकर सब के सब चुप हैं,
अपनों से ही झगड़ा आखिर  कितनी बार करूँ.

अपने  हाथों   के  पत्त्थर तो मैंने फ़ेंक  दिये,
लोगों  को  चुप  रहने  पर कैसे तैयार  करूँ.

गाँधी  के  हत्यारे  भी हैं   गाँधी  टोपी में,
इनके  प्रस्तावों  को  मैं  कैसे स्वीकर करूँ.

6.

ढूँढ़ने  पर भी नहीं मिलती  कहीं अच्छी ख़बर,
हादसे   ही   हादसे  अख़बार के हर पृष्ट  पर.

दिल में  बेचैनी  बढ़ाने वाली  घर की चिठ्ठियाँ,
खोलता हूँ जब लिफ़ाफ़ा तो मुझे लगता है डर.

अब  न लपटें ही निकलती हैं न उठता है धुआँ,
जल  रहा   है एक ऐसी  आग में मेरा शहर.

राहज़न  ही लूट  लेते इससे बेहतर  था हमें,
जिस   तरह  से  रास्ते में पेश आये राहबर.

उम्र  भर  के  फ़ासले पर हैं  हमारी मंज़िलें,
साथ  में  वीरानियाँ लेकर  चले हैं हमसफ़र.

ऐसा   लगता   है अँधेरे की तरफ़दारी में हो,
जिस तरह सूरज निकलता है यहाँ आकाश  पर.



रचनाकार  के बारे में


शिक्षा: बी. ई. (सिविल इंजी), अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़
जन्म: 15.नवम्बर 1953,  गाँव  मलिकपुर, ज़िला मथुरा में
भारतीय  खाद्य निगम ज़ोनल आफ़िस नोएडा  में डिप्टी जनरल मैनेजर  के पद पर  कार्यरत
थोड़ा सा ईमान ग़ज़ल संग्रह  प्रकाशित
हिंदी की प्रमुख राष्ट्रीय पत्र - पत्रिकाओं, ग़ज़ल संकलनों, इंटरनेट  पत्रिकाओं, में रचनाओं  का प्रकाशन.  काव्य समारोहों  में काव्य पाठ, रेडिओ और दूर-दर्शन से रचनाओं का प्रसारण.
स्थाई पता: 222, मानस नगर, शाहगंज, आगरा,  282010
E-mail:  
ashokdgmce@gmail.com    2. ashokrawat2222@gmail.com
फोन: नोएडा: 09013567499 ,  आगरा: 09458400433





गुरुवार, 28 जून 2012

अशोक रावत की गज़लें 8 जुलाई को

अशोक  रावत की गज़लें  
साखी के  अगले अंक में 
रविवार  8 जुलाई को। 

कविता, उसके स्वरुप, जीवन में उसकी जरूरत पर कवि  की टिप्पणी के साथ।

शुक्रवार, 22 जून 2012

जाइबे को जगह नहीं, रहिबै को नहिं ठौर


मित्रों, लम्बे अन्तराल के बाद साखी को फिर से आरम्भ दे रहा हूँ। लीजिये कबीर के कुछ दोहों का भावान्तर प्रस्तुत है। यह प्रयास मैंने खुद किया है। देखिये कैसा बना है। 

 
१. 
 कबीर यहु घर प्रेम का,
 खाला का घर नाहिं.
शीश  उतारे हाथि  करि,
 तब पैसे घर मांहि
--------------
नहीं तुम प्रवेश नहीं 
कर सकते यहाँ
दरवाजे बंद हैं तुम्हारे लिए

 यह खाला का घर नहीं
कि जब चाहा चले आये

 पहले साबित करो खुद को
जाओ चढ़ जाओ 
सामने खड़ी छोटी पर
कहीं रुकना नहीं
किसी से रास्ता मत पूछना
पानी पीने के लिए 
जलाशय पर ठहरना नहीं
सावधान रहना
आगे बढ़ते हुए  
फलों से लदे पेड़  देख 
चखने की आतुरता में
उलझना नहीं
भूख से आकुल न हो जाना

जब शिखर बिल्कुल पास हो
तब भी फिसल सकते हो
पांव जमाकर रखना
चोटी पर पहुँच जाओ तो
नीचे हजार फुट गहरी
खाई में छलांग लगा देना
और आ जाना 
दरवाजा खुला मिलेगा

 या फिर अपनी आँखें 
चढ़ा दो मेरे चरणों में
तुम्हारे अंतरचक्षु 
खोल दूंगा मैं
अपनी जिह्वा कतर दो
अजस्र स्वाद के 
स्रोत से जोड़ दूंगा तुझे 
कर्णद्वय  अलग कर दो
अपने शरीर से 
तुम्हारे भीतर बांसुरी 
बज उठेगी तत्क्षण
खींच लो अपनी खाल
भर  दूंगा तुम्हें 
आनंद  के स्पंदनस्पर्श  से

 परन्तु अंदर नहीं
आ सकोगे इतने भर से
जाओ, वेदी पर रखी 
तलवार उठा लो
अपना सर काटकर 
ले आओ अपनी हथेली
पर सम्हाले
दरवाजा खुला मिलेगा

 यह प्रेम का घर है
यहाँ शीश उतारे बिना
कोई नहीं पाता प्रवेश
यहाँ इतनी  जगह नहीं 
कि दो समा जाएँ
आना ही है तो मिटकर आओ
दरवाजा खुला मिलेगा.
 २.
 कबीर पूछै राम सूं , 
सकल भुवनपति राइ।
सबहीं करि अलगा रहौ,
 सो विधि हमहिं बताइ।
----------------------
क्या करूं करघे का
कैसे छोड़ दूं इसे
सबका पेट पलता है
इसी के ताने-बाने से
बीवी बना ली हमने
झोपड़ी भी डाल ली
अब रोटी का क्या करूं
कौन जुटायेगा
नून, तेल, लकड़ी
कमाल तो अपना पुत्तर है
बात नहीं सुनता पर
कैसे घर से निकाल दूं
देखा नहीं जाता
पंडित, मुल्ला का पाखंड
वेद-कुरान का द्वंद्व
ढोंगियों का छल, फरेब
मन करता है
नोच लूं चुटिया
खुरच दूं त्रिपुंड
बाँग  देने वालों के मुंह
पर ताले जड़ दूँ
तुम्हीं बताओ
आखिर चुप कैसे रहूं
तुमने तो रची दुनिया
त्रिभुवनपति कहलाये
पर जगत के झगड़े
निपटाने तो कभी न आये
परिवार बनाकर भी
सबसे अलग धूनी रमाये
बता दो न, आखिर कैसे
मैं भी रहूँगा बिल्कुल वैसे 

   3.
जाइबे को जगह नहीं
रहिबै को नहिं ठौर
कहै कबीरा संत हौं
अविगति की गति और
----------------
सूर्य जलकर
रौशनी देता है विश्व को
चंद्रमा, ग्रह, तारे
निरालंब गतिमान हैं
निरंतर, बिना टकराये

पृथ्वी अपनी धुरी पर
नाचती रहती है
अविरल, अनथक
अन्तरिक्ष में है धरा
परंतु कौन जानता है
कहां टिकी है धुरी

सृजन और विनाश का
क्रम टूटता ही नहीं कभी
जड़-चेतन पैदा होते हैं
क्षरित होते हैं और
नष्ट हो जाते हैं
सृष्टि, स्थिति, लय
का सिलसिला रुकता नहीं

कौन है इसके पीछे
सक्रिय अव्यक्त
निराधार, निर्विकार
किधर से पहुंचें
कहां है रास्ता
कहां रखें पांव
नहीं सूझता कोई ठांव


  4.
जाका गुरु भी अंधला, 
चेला खरा निरंध
अंधा- अंधा ठेलिया
दून्यू कूप पड़ंत
---------------
किससे पूछते हो
पता मंजिल का
जो कभी चला
ही नहीं उधर
जो कभी शिखर पर
चढ़ा ही नहीं
जो अपना रास्ता भी
नहीं पहचानता ठीक से

जिसकी आंखों में
काली चमक है
धोखे की, पाखंड की
जो जानता ही नहीं
रौशनी का मतलब

अंधे हो तुम भी शायद
तुम्हें नहीं चाहिए सच
नहीं चाहिए सूरज
नहीं चाहिए भोर
तुम हिस्सा बंटाना
चाहते हो सिर्फ
छद्म की कमाई में

अंधे की लकड़ी
आखिर  कैसे बन
सकेगा दूसरा अंधा

दुर्गम पथ है यह
कांटों से भरा हुआ
सांप सी टेढ़ी-मेढ़ी
पसरी हैं जगह-जगह
गहरी घाटियां
सूखी घास में दबे हैं
मौत से मुंह बाये
निष्चेष्ट कुएं

न मंजिल का पता
न रास्ते की खबर
न द्रष्टा पथद्रष्टा
न विवेक की नजर

फिर जाओगे कैसे पार
दोनों एक दूसरे पर भार

5.
जीवन मृतक ह्वै रहे
तजै जगत की आस
तब हरि सेवा आपै करे
मति दुख पावै दास
---------------
मृत्यु का स्वागत
कर सकते हो जीतेजी
मार सकते हो
खुद को अपने ही
हाथ के खंजर से?
हां तो आओ तुम्हें
आवाज दे रहा है
परम योद्धा परम गुरु

कोई इच्छा तो शेष नहीं
है तो मत आना आगे
मर नहीं पाओगे तुम
ईर्ष्या, राग, द्वेष तो नहीं
मन के किसी कोने में
जांच लो ठीक से
अन्यथा श्वांस चलता
ही रहेगा निरंतर
बचे रहने की आस में

अनन्य भाव से आओ
कंचन, कीर्ति, कामिनी के
मोहांधकार को चीरकर
बिना चाह, बिना चिंता

आ जाओ संपूर्ण
समर्पण के साथ
तन, मन, प्राण
सौंप दो मुझे
तुम्हारे सारे कर्तव्य
ओढ़ लूंगा मैं
योग-क्षेम वहाम्यहम्

संपर्क --9455081894
विनीत खंड-6, गोमतीनगर, लखनऊ 

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

नसीम साकेती की रचनाएँ

खेत में भूख उगे फाकों के अंकुर फूटें, क्या इसी वास्ते खूनों से धरा सींची थी, ऐ मेरे देश के नेताओं बताओ इतना, क्या नए देश की तस्वीर यही खींची थी, अपने आग भरे अल्फाज से ये सवाल उठाने वाले नसीम साकेती को साहित्य की दुनिया में सभी जानते हैं| वे केवल शायर या कवि नहीं हैं, एक सरोकार संपन्न लेखक के रूप में भी उन्होंने अपनी पहचान बनाई है| इधर हंस, वागर्थ और लमही में आयी उनकी कहानियां काफी चर्चा में रही हैं| एक साफ-सुथरा नजरिया और जनपक्षधरता नसीम की पूंजी है, जिसके बूते वे अपना किरदार खड़ा करते हैं| उनकी सादगी में उनका बड़ा होना देखा जा सकता है| अम्बेडकर नगर  जिले के मिझौड़ा कसबे में जन्मे नसीम रेलवे में इंजीनिअर रहे| अब वे पूरी तरह लेखन में जुटे हैं| प्रारंभिक दौर में प्रेमचंद और अमृत लाल नागर की कहानियों तथा  साहिर, कैफ़ी और दुष्यंत की कविताओं ने उन्हें बहुत प्रभावित किया| नसीम की कविताएं भी कहानियों का आनंद देती हैं| यहाँ प्रस्तुत हैं उनकी कुछ रचनाएँ-- 

१. पत्थरों का शहर
-------------------
पहले आप..पहले आप
जेहन में उभरते ही
बिजली की तरह कौंध जाता है
शहर का नाम
जो कभी जाना जाता था
तहजीब और तमद्दुन के लिए
नजाकत और नफासत के लिए
प्यार और मुहब्बत के लिए
अम्न और शांति के लिए
भाई चारे के लिए
इंसानियत के लिए
सबसे बड़ी बात इज्जत के लिए

लेकिन आज...?
जिस शहर में खड़ा हूँ
ये तो वो शहर नहीं है
पहले आप..पहले आप के बजाय
पहले मैं..पहले मैं
मैं...माफिया हूँ, नेता हूँ
धन-कुबेर हूँ, तिकड़मी अफसर हूँ
मेरे हुक्म के बगैर
एक पत्ता नहीं हिलता
मैं...जो चाहता हूँ, करता हूँ
है किसी में हिम्मत
मुझ पर डाल दे हाथ
किया तो था मेरे बेटे ने उस
लड़की का अपहरण, हत्या
क्या हुआ
घूम तो रहा है वह बेख़ौफ़, निश्चिन्त
इसी शहर में

आँखें फाड़-फाड़ कर देखता हूँ
कुछ धुंधला-धुंधला सा दिखता है
शहर बहुत बड़ा हो गया है
पर आदमी छोटा
बागों के शहर में उग आये हैं
कंक्रीट के जंगल
अख़बार बोझिल हैं
अपराध की खबरों से
इसीलिये दीनानाथ ने छोड़ दिया
अख़बार पढ़ना
पर इससे क्या सब कुछ बदल जायेगा..?

पहले जब कोई मां, कोई बहन
कोई चाची-ताई
मनचले लड़कों को
किसी लड़की पर बुरी निगाह
डालते देखती थी
डांटती, फटकारती थी---
कलमुंहे तेरी यह मजाल
और लडके सर नीचा करके
रफू चक्कर हो जाते थे

लेकिन अब तो
सगी मां, बहन, चाची, ताई के
मना करने पर
आँखें तरेरकर खड़े हो जाते हैं
धमकाते, कट्टा  दिखाते
कई बार पूरी ढिठाई के साथ
खड़े हो जाते हैं

क्यों? क्योंकि अब पूरा शहर
पत्थरों का शहर हो गया है





२. मुल्क की बात करो
---------------------
मियां बीवी राजी
तुम क्यों दुबले हो रहे हो काजी..?

मचल रहे थे शब्द
दोनों पक्षों के जुबान की नोंक पर
अदालत के फैसले का सम्मान करेंगे

फैसला आ गया
मनहूस आशंकाएं काफूर हो गयीं
फिर तुम अपनी नाक क्यों
घुसेड़ते हो..मुसरचंदों..?

पहले की तरह
आग लगा कर जमालो दूर खड़ी

लेकिन सुनो

नयी नस्लों को अब वैसा तमाशा नहीं
दिखा पाओगे मदारिओं ...?
जनमानस करवट बदल चुका है
अब तुम्हारी दाल नहीं गलेगी

कल की तरह आज भी

तुम्हारी सोच से
सियासत की बू आती है
तुम्हीं तो थे
विवाद की आंच पर
स्वार्थ की रोटियां सेंकते हुए
खून-खराबा को दावत देते हुए
अनेक शहरों में बम-ब्लास्ट करते हुए

छीन लेते थे क्षण भर में जिंदगियां

लूट लेते थे मां-बहनों की अस्मतें
बेबस मजबूर आँखों के सामने....
साठ साल का तवील अरसा....


हजारों साल पीछे चली गयी
अयोध्या के चेहरे पर उभरने वाली रौनक
विकास का मुंह टेढ़ा हो गया
अफवाहों के हाथ लम्बे हो गये
कारोबार बौने हो गये
घर के चूल्हे ठन्डे पड़ गये
फाके पर फाके

अयोध्या रो पडी

लेकिन इसका अफ़सोस
तुम्हें नहीं है शायद
अयोध्या को तो है
अयोध्यावासियों के जख्मीं दिलों से
पूछ कर तो देखो
सरयू की पावन धारा का
करुण क्रंदन तो सुनो
कलेजा मुंह को आ जायेगा

सद्य स्नाता दुल्हन सी लगती थी अयोध्या

लेकिन आज..?
किसी विधवा की मांग सी लगती है
चेहरा पीला मुरझाये फूल सा हो गया है
शरीर सूख कर कांटा हो गया है

शर्म करो..चुल्लू भर पानी में डूब मरो

क्योंकि सरयू तुम्हें स्वीकार नहीं करेगी

अभी भी वक्त है

गंगा-जमुनी तहजीब को निखारने का
कौमी एकता की डोर को मजबूत करने का
सदियों से अपनी सांझी शहादत की दास्ताँ
सुना रहा है जन्मस्थान रामकोट के पास
कुबेरटीला का ऐतिहासिक इमली का पेड़

जो साक्षी है

१८५७ के बागियों
रामदास, अच्छन खां, अमीर अली को
१८ मार्च १८५८ को एक साथ 

फांसी पर चढ़ा दिया गया था

वो इमली का पेड़

जब देशभक्तों के लिए
रोशनी का मीनार बनने लगा
१९३५ में अंग्रेजों ने उसे भी
शहीद कर दिया

चश्मदीद गवाह है

मणिपर्वत पर
पैगम्बर शीश की मजार
स्वर्ग द्वार पर शाहजहानी मस्जिद

आज भी उसी अयोध्या में

रामगुलाम, गुलाम हुसेन
अगल-बगल मकानों में रहते हैं
उनका राम-भरत जैसा प्यार
भाई-चारे की ऐसी मिसाल
चिराग लेकर ढूँढने पर भी
नहीं मिलेगी

भगवान के लिए

खुदा के वास्ते
बंद करो
पत्थर फेंकना
प्यार के ठहरे हुए  पानी में

बंद करो स्वार्थ की रोटियां सेंकना

सियासत के तवे पर
यहाँ की दरो-दीवार
हवा, फिजां
सरयू की धारा
की आवाजें सुनों

अमन के दीप जलाओ

नफ़रत के अँधेरे मिटाओ
दिल से दिल को मिलाओ
कौमी एकता के गीत गाओ
जय-पराजय की नहीं सौहार्द की बात करो
मंदिर-मस्जिद की
मिल्कियत के आईने में
मुल्क की बात करो

३. अंतिम अभिलाषा

-------------------

मुहब्बत के चिरागों को जला लूं तो चलूँ

नफ़रत के अंधेरों को मिटा लूं तो चलूँ
ऐ मौत मुझे थोड़ी सी मोहलत दे दे
वतन की खाक को आँखों में लगा लूं तो चलूँ 


संपर्क-१/७५६, आदिलनगर एन्क्लेव, लेन ५, कंचना विहारी मार्ग, कल्यानपुर पश्चिम लखनऊ
मोबाईल 09415458582

गुरुवार, 17 नवंबर 2011

मदन मोहन का दंगल

शायर सर्वत जमाल की गजलों पर खूब मगजमारी हुई, मुचैटाबाजी हुई, ईंट-पत्थर चले| मदन मोहन शर्मा ने तय कर रखा था कि इस बार मैदान से किसी बीर-बबर को जाने नहीं देंगे| उन्होंने हर  किसी को रगडा, घसीटा, मारा, बिगडैल भैसे की तरह सबको डराते  रहे|  बहस शुरू की राजेश उत्साही ने| उन्होंने कहा,  सर्वत साहब की ग़ज़लें ऐसी लगीं जैसे कोई हमारे अंदर से ये बातें कह रहा हो। उनकी इन ग़ज़लों में सारा समकालीन दर्द जैसे उमड़कर सामने आ गया है। उल्‍लेखनीय बात यह भी है कि सर्वत साहब कहीं कहीं जिस अंदाज से कहते हैं, वह गहरे तक छीलकर रख देता है। जैसे यह शेर-तरक्कियां तुम्हारे पास हैं तो हैं, हमारे पास भूख है, अकाल है| उनकी इन गज़लों में दूसरी उल्‍लेखनीय बात यह भी लगी कि शब्‍दों का उपयोग बहुत किफायत के साथ किया गया है। ग़ज़ल कहने के लिए उन्‍होंने जो भी खाका चुना है, वह महत्‍वपूर्ण है। कई बार चमत्‍कार पैदा करने के लिए शब्‍दों का ढेर लगा दिया जाता है। सर्वत जी इससे बचते नजर आते हैं। यह सतर्कता उनकी ग़ज़लों को ऊंचाईयां देती है। 

तिलक राज कपूर के मुताबिक  सर्वत साहब की ग़ज़लें कुछ ऐसी हैं कि: शब्‍द अंदर से जब निकलता है, वक्‍त के साथ-साथ चलता है। ऑंधियॉं क्‍या डरायेंगी उसको,थाम कर जो मशाल चलता है। सर्वत साहब की लेखनी दीप नहीं मशाल है। आस पास के माहौल से अविचलित, सार को व्‍यक्‍त कर जाना सरल तो नहीं होता| नीरज गोस्वामी ने लिखा, ऐसे अशआर पढ़ कर किसकी बोलती बंद नहीं होगी| मुझे इस बात का फख्र  है कि  मैं सर्वत जमाल साहब को जानता हूँ, उन्हें सिर्फ सुना है लेकिन उस से कोई फर्क नहीं पड़ता| हमने जिसे देखा है उसे भी कहाँ जान पाते हैं| गज़ब के इंसान हैं और गज़ब के शेर कहते हैं, उनका फोन आ जाये तो समझिये आपकी सारी मुश्किलें उदासियाँ तल्खियाँ दुम दबा कर भाग खड़ी होंगीं| ठहाकों का सैलाब आ जायेगा| आपका मन फूलों सा हल्का हो जायेगा| हम खुदा के शुक्र गुज़ार हैं कि  आज की दुनिया में जहाँ मुर्दनी सब के ज़हनों पर हावी रहने की कोशिश में रहती है, हमारे पास सर्वत जमाल हैं| दुआ करता हूँ के वो अपने चाहने वालों को अपने कलाम से यूँ ही नवाजते रहें| अविनाश वाचस्पति नस कहा, पढ़ा तो जाना कि इनके पास अपनी कोई बात नहीं, ये तो सब हमारी बात ही कहते हैं। यह एक धुन है, फन है, हरेक के बस का नहीं यह जुनून है। 

कवि जितेन्द्र जौहर के मुताबिक सर्वत जमाल की ग़ज़लें अदब की उस श्रेष्ठ ‘जमात’ की ग़ज़लें हैं जो चिंतन को कुरेदती हैं। कई शे’र ऐसे कि मस्तिष्क में काफी देर तक ठहरे रह जाते हैं; यथा-तमांचा सा न जाने क्यों लगा है, वतन वालों को मेरा प्यार लिखना| ऐसी ग़ज़लें अपने समय और समाज से सतत्‌ संवाद स्थापित करते रहने वाला शायर   ही कह सकता है| दानिश  ने लिखा, सरवत जमाल साहब ग़ज़ल सिर्फ ग़ज़ल कहने के लिए नहीं कहते बल्कि हर उस इंसान की बात को कह देने के लिए कहते हैं, जो खुद आसानी से नहीं कह पाता| उनकी ग़ज़लियात में हमेशा हमेशा आमजन का दर्द नुमायाँ रहता है , आक्रोश रहता है , आह्वान रहता है| इन खूबसूरत ग़ज़लों के हवाले से हर हर पढने वाला उनसे मुतासिर हुए बिन न रह सकेगा| बकौल गिरीश पंकज, हर शेर काबिलेदाद हैं| एक और प्रतिभा से परिचित हुआ| ब्लॉगर रवीन्द्र प्रभात ने कहा, सर्बत ज़माल साहब की ग़ज़लों से गुजरना आम जनजीवन के कचोटते दर्द से गुजरना है, उनके हर अलफ़ाज़ में छिपी होती है| हमारे समय की ऐसी छटपटाहट जो जनपथ की पीड़ा को अभिव्यक्त कर सके ! यही अभिव्यक्ति उनकी ग़ज़लों को ऊँचाई देती है और शेर-दर-शेर एक नया मुकाम भी ! वेद व्यथित ने कहा, सर्वत जमाल ने अपना कवि कर्म पूरी शिद्दत से निभाया है| अबनीश सिंह चौहान ने, एक ही आसमान सदियों से, चंद ही खानदान सदियों से, को कोट करते हुए कहा कि यही हो रहा है हमारे देश में| वंशवाद की काली छाया हर जगह अपना अड्डा बनाये हुए है| सभी गज़लें बेमिशाल हैं| सुनील गज्जाणी ने कहा, हर शेर उम्दा है और इनमें कोई कसर निकाल दे, ये मुमकिन नहीं , हर शेर वजनी है और अपने आप में बहुत कुछ बया करता है ! 


बिहारी ब्लॉगर उर्फ़ सलिल  वर्मा की टिप्पणी थी,  ये सारी गज़लें सरकार बनाने और और हुकूमत बदल देने का माद्दा रखने वाली हैं|
पहली गज़ल एक ऐसी बहर में कही गयी है जो बड़ी ‘रेयर’ है| एक इन्किलाब और क्रान्ति की सदा गूंजती है हर शेर में और ‘बढे चलो बहादुरो बढे चलो’ की हमबहर| दूसरी गज़ल में दो शेर एक ऐसे वाकये की ओर इशारा करते हैं जिसकी हकीकत तो हमें मालूम है, लेकिन ज़ाती तौर पर मुझे अखरता है, इसका बार-बार कहा जाना, अब वो चाहे मुनव्वर राना साहब के शेर हों या सरवत जमाल साहब के| तीसरी गज़ल शानदार है और और मौजूदा सूरतेहाल पर एक गहरा तंज है| एक-एक शेर एक तमाचे की तरह लगता है... उन आकाओं को नींद से जगाने की नाकामयाब कोशिश सा करता हुआ| आख़िरी गज़ल छोटी बहर में एक ख़ूबसूरत गज़ल है, मौजूदा दौर की मायूसी की तर्जुमानी करती हुई| कुल मिलाकर बेहतरीन ग़ज़लों का गुलदस्ता... गुलदस्ते के गुलों में कुछ और रंग के गुल होते तो रौनक कुछ और ही होती|

फिर आये मदन मोहन शर्मा| ललकारते हुए, झपटते हुए| पहली गजल के पहले शेर की पहली ही पंक्ति एक साथ न जाने कितने सवालात से रूबरू करा देती है। मिसरा  है, ‘’एक एक जहन पर वही सवाल है, अब देखिये--पहला सवाल बयान की सफाई का, यहाँ बयान साफ नहीं है, पता नहीं लगता कौन सा ‘वही सवाल है’| दूसरी पंक्ति भी इस सवाल को स्पष्ट नहीं करती। दूसरा सवाल लय का, इस मिसरे  में लयात्मकता सिरे से गायब है। तीसरा सवाल बहर का, कम से कम पहले मिसरे से तो बहर की झलक नहीं मिलती। चौथा सवाल पहली और दूसरी पंक्ति का परस्पर सम्बन्ध? दोनों मिसरे  एक-दूसरे का साथ दें तो शेर मुकम्मल हो। पहला मिसरा  तो इन सारे सवालों को लेकर खामोश है। हाँ, दूसरी पंक्ति तक आते-आते बहर कुछ-कुछ साफ होती सी लगती है। गजल के रुक्न हैं- फ़ऊ फ़ऊ फ़ऊ फ़ऊ फ़ऊ फ़ऊ, अर्थात् 12 12 12 12 12 12। परम आदरणीय बिहारी ब्लागर के शब्दों में 'बढे चलो बहादुरों बढे चलो' का हम बहर लेकिन पहला मिसरा  इस बहर में बिलकुल ठीक नहीं बैठता| अब मन समझाने के लिये पहली पंक्ति के प्रारम्भ के ‘एक एक’ को मात्रा गिरा कर ‘इक इक’ मान लें तो मिसरा  तो दूर से देखने पर बहर में दिखाई देता है लेकिन लयात्मकता का सवाल इससे भी हल नहीं होता, हो भी नहीं सकता| वास्तव में तो बहर भी दुरुस्त नहीं होती। पहली पंक्ति को सही बहर में पढ़ने के लिये ‘इकइ कजह नपर वही सवाल है’ इस तरह पढ़ना होगा| फलस्वरूप कुछ शब्द पूरी तरह निरर्थक हो जायेंगे और अरूज़ ऐसा करने की इजाजत किसी भी हाल में नहीं देता। शब्दों में होने वाली ऐसी तोड़-फोड़ ही लयात्मकता को प्रभावित करती है और लयभंग दोष को जन्म देती है। अब इसी शेर को अगर यूं पढ़ लें-‘इक इक (इकिक) जहन पे फिर यही सवाल है,लहू लहू में आज क्यों उबाल है।’ तो इस तरह बयान में सफाई भी आती है, दूसरी पंक्ति पहली पंक्ति का समर्थन भी करती है, लय भी स्थापित होती है, शेर बहर से खारिज भी नहीं होता, साथ ही साथ पहली पंक्ति से ही बहर का निर्धारण करने में आसानी होती है। अब जरा दूसरा शेर देखें-इमारतों में बसने वाले बस गए, मगर वो जिसके हाथ में कुदाल है| यहाँ भी शेर का पहला मिसरा  दूसरे का साथ नहीं दे रहा| पहली पंक्ति में 'बसने वाले बस गए' बहु वचन है.मगर दूसरी वाली पंक्ति में 'वो जिसके हाथ में कुदाल है' एक वचन ही रह गया| यह वचन भिन्नता भी दोष उत्पन्न कर रही है| इसी ग़ज़ल के आखिरी शेर पर आते हैं-'तुम्हारी कोशिशें कुछ और थीं मगर, हम आदमी हैं ये भी एक कमाल है| कमाल तो कहीं नहीं हुआ पर इस कमाल के चक्कर में पूरा शेर ही अपने मकसद से गया| एक दूसरी ग़ज़ल के शेर हैं-'कोई बोले अगर तो क्या बोले, बंद है सारे कान सदियों से| और 'कारनामे नजर नहीं आते,उलटे सीधे बयान सदियों से| यहाँ रदीफ़ का अंतिम वर्ण 'ए' हुआ. अरूज़ के मुताबिक शेर के पहले मिसरे  का अन्त्य वर्ण (मात्रा) और रदीफ़ का अन्त्य वर्ण (मात्रा) एक नहीं होना चाहिए| अपरिहार्य कारणों से एकाध शेर में ऐसा करने की छूट है मगर यही छूट लगातार बार-बार ली जाये तो इसे दोष की संज्ञा दी जाती है| अन्यत्र भी निरंतर निराशाजनक अभिव्यक्तियों की पुनरावृत्ति नकारात्मक प्रभाव ही छोडती है| ऐसा लगता है जैसे आम के बाग का सपना दिखा कर किसी को करील के जंगलों में डाल दिया जाय|  


सलिल वर्मा जवाब देने की कोशिश करते हैं, मदन मोहन जी के प्रति नम्र प्रस्तुति, १. गज़ल वैसे तो मुक्तक शैली की विधा मानी जाती है, दोहे की तरह| हर शेर मुख्तलिफ फ़िक्र पेश करता हुआ लेकिन हाल में गज़लें एक ही फिक्र के अशआर से सजी देखी जाने लगी है| लिहाजा इस तरह की ग़ज़लों को सिर्फ मिसरे से जज नहीं किया जा सकता कि शायर का बयान क्या है| यहाँ भी शायर का कहना है कि हर ज़हन में एक ही सवाल है और हर शख्स के खून में उबाल है| वजूहात आगे के अशार में खुलकर सामने आती हैं| २. मैं भी अभी भी अपने बयान पर कायम हूँ कि इसमें लयात्मकता है और बिलकुल वही जो बढे चलो बहादुरों के पढ़ने में आती है! दोनों अलग-अलग ग्रामर से आते  हैं, इसलिए बुनियादी फर्क दिखता है मगर जहां तक लयात्मकता का सवाल है, शेर लय में है| ३. शेर को यूं पढ़ें तो बहर भी मिल जायेगी, एक-एक/ज़हन पर/वही सवाल है, लहू-लहू में/आज फिर/ उबाल है! ४. कितनी ख़ूबसूरत बात कही है शायर ने कि इमारतों में बसने वाले तो बस गए मगर वो जो मजदूर है (हाथ में कुदाल लिए इमारत तामीर करने वाला) उसका क्या? और ज़हन साथ दे तो खुद अंदर से जवाब आता है कि वो फुटपाथ पर सोने को मजबूर है! मानी ज़रूरी नहीं कि हर वक्त नुमायाँ हों, कभी-कभी पढ़ने वाले की सोच पर भी छोड़ दिया जाता है और यहाँ मज़दूर एक सिम्बल है, पूरी मजदूर कौम  का जो मजबूर है, फुटपाथ पर सोने को| इसलिए यहाँ एकवचन और बहुवचन का सवाल ही नहीं उठता| ५. और मकते में तो शायर ने ज़बरदस्त तंज किया है मौजूदा रहनुमाओं पर| कहते हैं कि उनकी कोशिश तो ये थी कि हमें जानवर बनाकर जैसे चाहेंगे हुकूमत करेंगे और हम जुबान बंद किये सहते रहेंगे सब चुपचाप लेकिन कमाल तो ये है कि हम इंसान साबित हुए और इतनी कोशिशों के बावजूद भी इंसान बने हैं| और जनाब आज के दौर में इतनी संजीदगी बचाकर रख लेना कमाल ही है| इससे भी ज़्यादा बड़ा कमाल जनाब अदम गोंडवी साहब का है| तेज़ाब लिए घूमते हैं ज़हन में, मगर हुकूमत की मैदे की लोई से गुरेज करते हैं|
 

वे आगे कहते हैं , कविता में बात शब्दों के माध्यम से होनी चाहिए, कोई चिन्ह लगाकर नहीं.इमारतों में बसने वाले बस गए, मगर वो जिसके हाथ में कुदाल है?  ये शेर अगर केवल पढने के लिए ही है तो प्रश्नवाचक चिन्ह अर्थ को थोडा बहुत साफ करने में मदद करता है लेकिन इस खूबसूरत ग़ज़ल को अगर कोई संगीत बद्ध करना चाहे तो अपने गायन में इस प्रश्न चिन्ह का उपयोग किस तरह करे? कोई सुनने वाला इस सवालिया निशान को कैसे देख पायेगा? सुनाने वाला इस निशान को किस तरह दिखायेगा?
हाल में जितने भी ग़ज़लों के संकलन प्रकाशित हुए हैं, उनमें तो किसी भी तरह के विराम चिह्न देने का प्रचलन नहीं है. और गज़लें “कही” जाती हैं और “सुनी” जाती हैं, लिखी या पढ़ी नहीं जातीं|  ग़ालिब की गज़ल “दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है/आखिर इस दर्द की दवा क्या है” कई लोगों ने गाई है| इस बात से मैं कतई सहमत नहीं कि कविता में बात चिह्न लगाकर नहीं होनी चाहिए| बात प्रश्न चिह्न की हो रही है तो पेश हैं चंद अशार मुख्तलिफ शायरों के: जाता है यार तेग-ब-कफ गैर की तरफ, ऐ कुश्त-ए-सितम तेरी गैरत को क्या हुआ? (मीर)| पूछकर अपनी निगाहों से बता दे मुझको, मेरी रातों के मुक़द्दर में सहर है कि नहीं? (साहिर)| परीशां हो गए शीराज़ा -ए-औराक-ए-इस्लामी, चलेंगी तुंद बादे कुफ्र की यह आंधियां कब तक? (कैफी)| सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है, दिल पे रखके हाथ कहिये देश क्या आज़ाद है? (अदम गोंडवी)| एक-एक/ज़हन पर/वही सवाल है,
लहू-लहू में/आज फिर/ उबाल है| 


अर्चना तिवारी ने फरमाया, बहुत दिनों से मुझे साखी के मंच पर श्री सर्वत जमाल जी की ग़ज़लों की प्रतीक्षा थी जो अब समाप्त हुई | यहाँ का वातावरण तो बहुत रोमांचक प्रतीत हो रहा है| एक ओर मेरे पसंदीदा शायर की दहाड़ती-ललकारती गज़लें हैं और दूसरी ओर उतनी ही चुनौती देती स्वस्थ्य समालोचनात्मक टिप्पणियां हैं | हम जैसे नवीन रचनाकारों के लिए ये मंच सदैव से मार्गदर्शक साबित हुआ है |सारे ब्लॉग जगत में केवल यही एकमात्र ऐसा मंच है जहाँ रचनाकारों की रचनाएँ अग्नि में तप कर कुंदन बनती हैं|श्री सुभाष राय जी का बहुत बहुत आभार इस मंच पर इतनी आदर्शवादी रचनाओं और रचनाकारों को प्रस्तुत करने का| श्रीमान मदन मोहन जी, मुझे ग़ज़ल के व्याकरण का ज्ञान तो नहीं है परन्तु कुछ कहने की हिम्मत कर रही हूँ| बात चीत के दौरान हम किसी चिन्ह का प्रयोग अवश्य नहीं करते परन्तु स्वर के माध्यम से हम अपने विचारों को व्यंग, क्रोध ,स्नेह ,आदर के भाव से प्रदर्शित करते हैं |  मदन मोहन शर्मा ने कहा, अपनी पिछली टिप्पणी में मुझसे भी एक शब्द की कंजूसी हुई और शायद यही कारण रहा कि मैं अपनी बात स्पष्ट नहीं कर पाया. मैंने लिखा 'कविता में बात शब्दों के माध्यम से होनी चाहिए, कोई चिन्ह लगाकर नहीं.' जबकि मुझे लिखना चाहिए था 'कविता में बात शब्दों के माध्यम से होनी चाहिए, केवल कोई चिन्ह लगाकर नहीं| परम आदरणीय बिहारी ब्लॉगर  द्वारा बताये गए हर शेर के अध्ययन से भी यही बात निकाल कर आती है कि हर शेर में प्रश्न वाचक चिन्ह से पहले कही न कहीं एक प्रश्न वाचक शब्द भी आवश्यक रूप से मौजूद है. देखिये- (१)ऐ कुश्त-ए-सितम तेरी गैरत को क्या हुआ? (मीर)| (२)पूछकर अपनी निगाहों से बता दे मुझको, मेरी रातों के मुक़द्दर में सहर है कि नहीं? (साहिर)| (3)परीशां हो गए शीराज़ा-ए-औराक-ए-इस्लामी, चलेंगी तुंद बादे कुफ्र की यह आंधियां कब तक? (कैफी) मगर वो जिसके हाथ में कुदाल है? यहाँ कोई प्रश्न वाचक शब्द प्रयुक्त नहीं हुआ|  परम आदरणीय बिहारी ब्लॉगर के इन विचारों से मैं भी सहमत हूँ 'हाल में जितने भी ग़ज़लों के संकलन प्रकाशित हुए हैं, उनमें तो किसी भी तरह के विराम चिह्न देने का प्रचलन नहीं है. और गज़लें “कही” जाती हैं और “सुनी” जाती हैं, लिखी या पढ़ी नहीं जातीं. लिहाजा किसी सुनने में तो भावों का सम्प्रेषण गज़ल पढने वाले की अभिव्यक्ति पर निर्भर करता है, न कि विराम चिह्न पर.' इस प्रकार प्रश्न चिन्ह तो स्वयं ही अप्रासंगिक हो गया, फिर अगर कोई प्रश्न वाचक शब्द बदले में नहीं आयेगा तो पाठक या श्रोता का मस्तिष्क दुविधा में पड़ेगा ही| अर्चना जी से भी मेरी यही प्रार्थना है की वे मेरे निवेदन को फिर से देखने की कृपा करें फिर भी अगर मेरी बात से सहमत न हो पायें तो मैं अपनी भूल के लिए  क्षमा प्रार्थी हूँ| 


आचार्य संजीव वर्मा सलिल ने कहा, भाषा के विविधांगों में शब्द, चिन्ह और उच्चारण सबका अपना-अपना महत्त्व है| विराम चिन्हों को नकारना मुझे उचित नहीं लगता| विराम चिन्ह न होने पर प्रश्नसूचक शब्द ही रचनाकार का मंतव्य तथा भाव स्पष्ट कर पाते हैं जबकि विराम चिन्ह हों तो बिना प्रश्नवाचक शब्द के भी भाव स्पष्ट हो जाता है| पाठक या गायक प्रश्नवाचक शब्द या प्रश्नचिन्ह या दोनों होने पर रचनाकार के मंतव्य को समझकर तदनुसार उच्चारण कर भाव संप्रेषित कर सकता है| यह मुद्दा बहस का कम, अनुभव का अधिक है| रचनाकार स्वयं निश्चित करता है कि उसे कहाँ क्या उपयोग करना है ताकि उसका भाव और कथ्य पाठक/श्रोता तक पहुँच सके| प्रस्तुत रचनाएँ सामयिक हैं. इनमें जमीनी सचाई का एक पहलू है किन्तु इसके अलावा भी बहुत कुछ है| रचनाकार और पाठक/श्रोता के मध्य इनसे सेतु बनता है किन्तु समीक्षक को सकल परिदृश्य को देखकर मूल्यांकन करना होता है| मदन मोहन शर्मा पलट कर आये, रचनाकार अगर स्वयं निश्चित कर सके कि उसे कहाँ क्या उपयोग करना है तो निश्चय ही यह बात अच्छी रचना और जागरूक रचनाकार के हित में होगी| मैं स्वयं इस विचारधारा का मानने वाला हूँ, परन्तु ग़ज़ल के अपने कुछ प्रतिबन्ध, अपने कुछ नियम हैं जो रचनाकार को छूट लेने की इजाजत नहीं देते| 

शायर सर्वत एम जमाल ने अपना पक्ष रखने की कोशिश की| मुझे इल्म ही नहीं था कि मेरे इतने चाहने वाले मौजूद हैं| मैं इन मुहब्बतों के लिए, राजेश उत्साही, हरकीरत हीर, सुमन, तिलक राज कपूर,नीरज गोस्वामी,  अविनाश वाचस्पति, जितेन्द्र जौहर, दानिश, रवीन्द्र प्रभात,वेद व्यथित, अबनीश सिंह चौहान, सुनील गज्जाणी, चला बिहारी...(सलिल), अर्चना तिवारी, संजीव वर्मा सलिल और मदन मोहन अरविन्द का शुक्रगुज़ार हूँ लेकिन एक निवेदन भी है- "अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी बहल जाए, अब इतना भी तो न चाहो कि दम निकल जाए| भाई, इतना प्यार समेट कर ले कैसे जाऊँगा| मदन मोहन अरविन्द जी, यह ग़ज़ल है| जब तक इस में महारत न हो, प्रश्न पूछे जाने चाहिए न कि आलोचना| जिस वजन को आप फऊ फऊ फऊ.....बता रहे हैं, वह अस्ल में मुफाइलुन मुफाइलुन मुफाइलुन है| जिस मिसरे को लेकर आप द्विविधा में हैं, एक एक ज़हन पर वही सवाल है, अगर वजन आपके ज़हन में होता तो उसे 'इकेक ज़हन पर वही सवाल है' पढ़ लेते| नाहक उसे ख़ारिज करार देने में इतनी ऊर्जा खर्च दी फिर मतले का अधूरापन भी सालता रहा आपको| ग़ज़ल शास्त्र का अध्ययन किया होता तो कतअ बंद अशआर के बारे में भी ज्ञान होता| मतला और पहला शेर कतअ बंद हैं| शायरी में ऐसे प्रयोग क़ुतुब कुली शाह-वाली दकनी के जमाने से चले आ रहे हैं, मीर-ग़ालिब तक ने इनकी पैरवी की है, अगर मैंने भी उनके नक्शे-कदम पर चलने की कोशिश की तो क्या गुनाह किया? रदीफ के अंत में 'ए' है और ऊपर के मिसरे में भी अंत में 'ए' आ रहा है, यह आपने तकाबुल-ए-रदीफ बताया जो एक दोष है| क़ुतुब कुली शाह से लेकर आज के मुज़फ्फर हनफी तक को आगाह कीजिए, यह कानून आपने किसी बहुत पुरानी   किताब से उद्धृत किया है जो अब कहीं अमल में नहीं है| आप की खिदमत में एक शेर पेश है-"दुनिया पहुँच रही है कहाँ से कहाँ से कहाँ अमीर, तुम हो शरीक-ए-महफिल-ए-शेर-ओ-सुखन अभी| आप साहित्यकार हैं, गज़लों से जुड़े हैं और मुझसे उम्र में दो वर्ष छोटे भी, इस नाते एक सलाह अवश्य देना चाहूँगा...अध्ययन कीजिए, ग़ज़ल तुकबंदी मात्र नहीं है, बहुत खून जलाती है, बहुत मेहनत मांगती है| मैं अगर आप से कह रहा हूँ तो यह मेरा अपना अनुभव है, मैंने खुद ऐसा किया है, ग़ज़लों में प्रयोग किए हैं लेकिन ऐसा तभी सम्भव हुआ, जब इस विधा   को पूरी तरह समझ पाने में कुछ सफलता पा सका| आलोचना के लिए विस्तृत अध्ययन आवश्यक है वरना स्थिति हास्यास्पद हो जाती है| 


मदन मोहन शर्मा बोले, अधिक विस्तार में न जाकर केवल एक ही निवेदन पुनः करना चाहूँगा कि कुछ हिदायतों के अतिरिक्त कोई संतोष जनक समाधान उपरोक्त टिप्पणियों से नहीं मिलता| प्रश्न जैसे पहले थे अब भी हैं| बीच  में बेनामी ने दखल दिया, मुझे लगता है जनाब सर्वत जमाल की टिप्पणियों में घमंड अधिक है, सार कम| यह सही है कि 'एक-एक जहन' वाले मिसरे  को ठीक से समझने में जोर पड़ता है, फिर भी रूकावट आती है| सवालिया निशान वाली बात भी पूरी तरह सही है| पुरानी किताबों के कानून से आपको आपत्ति क्यों है| जिन बड़े शायरों के नाम आप ले रहे हैं, सोच कर देखिये आप उनके पासंग बराबर भी हैं क्या? और गलती सिर्फ गलती होती है, चाहे छोटा करे या बड़ा| ग़ज़ल कहते हैं तो सफाई से कहनी ही होगी, सौ बातें बनाने से काम  नहीं चलने वाला|

प्राण शर्मा जी ने कहा, सर्वत जी अच्छे शायर हैं, उनकी शायरी में नयापन है| उनका कहना सही है कि गजल बहुत खून जलती है| इस बारे में मैंने कभी कहा था, सोच की भट्ठी में सौ-सौ बार दहता है, तब कहीं जाकर कोई इक शेर कहता है| मदन मोहन शर्मा ने कहा, सोच रहा था, कुछ कहूँ या चुप रहूँ, इसी कशमकश में एक शेर याद आया-'जब लगेगी आशियाँ जल जायगा, आग को बेशक हवा कह दीजिये| अपनी मर्जी से हम जो चाहे कहते रहें, सच की तासीर नहीं बदलने वाली| बेनामी के आगमन हुआ, गली कूचों में रह जाती हैं घुट कर, अब अफवाहें सरे बाज़ार लिखना| ये क्या? 'लिखना?', अफवाहें फैलाना और अफवाहें उडाना तो सुना था, लिखना पहली बार देखा है| संजीव गौतम ने समापन किया, जी खुश हो गया सर्वत जी की गजलें पढ़कर, हमेशा के तरह सुपर फाइन| हरकीरत हीर ने भी प्रशंशा की| 


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नसीम साकेती की कवितायेँ नववर्ष पर ३१ दिसंबर के आधी रात को  

शनिवार, 24 सितंबर 2011

सर्वत जमाल की गजलें

सर्वत जमाल पानी में आग बोने वाले शायर हैं| जिनका भी गजलों की दुनिया से साबका है, वे उन्हें अच्छी तरह जानते हैं| जिन्दगी कभी-कभी बहुत कठिन हो जाती है, आदमी घुटने टेकने के हालात में पहुँच जाता है लेकिन जिसने हमेशा ऐसी कठिन जिन्दगी अपने लिए चुन ली हो या जिसे परिस्थितियों ने झंझावातों में धकेल दिया हो फिर भी जो पराजय के ख्याल के बिना लड़ रहा हो, उसका नाम है सर्वत जमाल| गोरखपुर में जन्मे इस शायर ने अपनी जिन्दगी की शुरुआत पत्रकारिता से की पर वह रास्ता लम्बा नहीं चल सका| आजकल वे जिन्दगी चलाने के लिए परेशान हाल लोगों को जिन्दगी को समझने, स्वस्थ रहने  और कठिनाइयों का जमकर मुकाबला करने के  सलाह-मशवरे देने का काम करते हैं| उनकी कुछ गजलें पेश हैं....

1.
एक एक जहन पर वही सवाल है

लहू लहू में आज फिर उबाल है

इमारतों में बसने वाले बस गए 
मगर वो जिसके हाथ में कुदाल है ?

उजाले बाँटने की धुन तो आजकल
थकन से चूर चूर है, निढाल है 

तरक्कियां तुम्हारे पास हैं तो हैं 
हमारे पास भूख है, अकाल है 

कलम का सौदा कीजिये, न चूकिए 
सुना है कीमतों में फिर उछाल है 

गरीब मिट गये तो ठीक होगा सब 
अमीरी इस विचार पर निहाल है 

तुम्हारी कोशिशें कुछ और थीं, मगर
हम आदमी हैं, यह भी इक कमाल है

                          2.
कभी आका  कभी सरकार लिखना
हमें भी आ गया किरदार लिखना

ये मजबूरी है या व्यापार , लिखना

सियासी जश्न को त्यौहार लिखना

हमारे दिन गुज़र जाते हैं लेकिन
तुम्हें कैसी लगी दीवार, लिखना

गली कूचों में रह जाती हैं घुट कर
अब अफवाहें सरे बाज़ार लिखना

तमांचा सा न जाने क्यों लगा है
वतन वालों को मेरा प्यार लिखना

ये जीवन है कि बचपन की पढाई
एक एक गलती पे सौ सौ बार लिखना

कुछ इक उनकी नज़र में हों तो जायज़
मगर हर शख्स को गद्दार लिखना ?


3.
एक ही आसमान सदियों से

चंद ही खानदान सदियों से

धर्म, कानून और तकरीरें 
चल रही है दुकान सदियों से 

काफिले आज तक पड़ाव में हैं
इतनी लम्बी थकान, सदियों से !

सच, शराफत, लिहाज़, पाबंदी 
है न सांसत में जान सदियों से 

कोई बोले अगर तो क्या बोले 
बंद हैं सारे कान सदियों से 

कारनामे नजर नहीं आते 
उल्टे सीधे बयान सदियों से 

फायदा देखिये न दांतों का 
क़ैद में है जबान सदियों से 

झूठ, अफवाहें हर तरफ सर्वत 
भर रहे हैं उडान सदियों से
4.
हवा पर भरोसा रहा 
बहुत सख्त धोखा रहा 

जो बेपर के थे, बस गए 

परिंदा भटकता रहा 

कसौटी बदल दी गयी 
खरा फिर भी खोटा रहा 

कई सच तो सड़ भी गए 
मगर झूठ बिकता रहा 

मिटे सीना ताने हुए 
जो घुटनों के बल था, रहा 

कदम मैं भी चूमा करूं 
ये कोशिश तो की बारहा

चला था मैं ईमान पर 
कई रोज़ फाका रहा

संपर्क --05224105763

शनिवार, 3 सितंबर 2011

पाँच रंगों की रंगोली


साखी पर जितेन्द्र जौहर के गीत कुछ आलोचनाओं के साथ आम तौर पर सराहे गये| विमर्श की गंभीरता दिखाई पडी| कविता की खासी समझ रखने वाले सलिल वर्मा उर्फ़ बिहारी ब्लॉगर की बात गौर करने लायक रही| उन्होंने कहा, आज ब्लॉग लेखन में या अन्यत्र भी कविता लिखना इतना सहज और सामान्य समझा जाने लगा है कि हर व्यक्ति कविताई करता दिखाई देता है| उन्हें ऐसी कविता लिखते समय तनिक भी भान नहीं होता कि मूर्ख उन जगहों पर धड़ल्ले  से प्रवेश कर जाते हैं, जहां पाँव धरते हुए देवदूत भी भयभीत होते हैं| जितेन्द्र  जी की कवितायेँ जब-जब पढ़ी हैं, तब-तब यह प्रतीत हुआ है कि इनकी कविताओं में इनका अनुभव और ज्ञान दोनों परिलक्षित होता है| एक और विशेषता यह दिखाई देती है कि भाषा के विद्यार्थी होने के कारण अंगरेजी एवं हिन्दी दोनों भाषाओं पर समान प्रभाव दिखाई देता है| ऐसे में शब्दों का चयन, भावों का सम्प्रेषण, विषय का चयन और शब्दों की मितव्ययिता देखी जा सकती है| 

साखी के अंक में उनकी पाँच कविताओं का संकलन स्वागत योग्य है| जब मैंने पहली  कविता पढ़ना प्रारम्भ किया तो लगा कि अपने ही गाँव में बैठा हूँ, आस पड़ोस की कहानी सुन देख रहा हूँ, अपनी माता को मुझे विदा करते हुए और अंचरा के कोर से आँखें पोंछते देख रहा हूँ| गाँव से शहर की ओर पलायन करते लोगों के साथ परिवार मनोविज्ञान का जीवंत चित्रण देखने को मिलता है| बाद की दोनों कविताओं में अम्मा की व्यथा और बंटवारे का दुःख मन को झकझोर गया किन्तु साथ ही लगा कि तीनों कविताओं की पृष्ठभूमि और परिवेश एक से हैं और व्यथा भी| जौहर जी की रचनाओं में इतनी विविधता है कि उनकी पाँच रचनाएँ पाँच रंगों की रंगोली प्रस्तुत कर सकती हैं| हमारे नपुंसक दौर के वर्णन में जिस ओज का परिचय जौहर जी ने दिया है, वह उनके ही नहीं इस दौर की हर संवेदनशील मन की सोच है| इस कविता में जिन शब्दों का चयन किया गया है वे शब्द उस आक्रोश को व्यक्त करने में सफल रहे हैं. और इतने उचित हैं कि उनके स्थानापन्न शब्दों की कल्पना भी उस आक्रोश को कम करती सी लगती है|
अंतिम रचना एक व्यंग्य रचना है इसलिए उसे हलके फुल्के अंदाज़ की ही रचना कहना उचित होगा| कुल मिलाकर जितेन्द्र जौहर साहब का रचना संसार मुग्ध करता है|
 

कवि और आलोचक राजेश  उत्साही जितेन्द्र की रचनाओं की जी भर तारीफ से संभवत: और लेकिन के साथ सहमत हैं| वे कहते हैं, कई बार कुछ बातें और कुछ ऐसे पहलू भी होते हैं जो हमें प्रत्यक्ष नजर नहीं आते। इन कविताओं में भी ऐसा कुछ है। यह भी बहुत संभव है कि कई पाठकों ने उन्हें देखा भी हो, पर साथ ही नजरअंदाज कर दिया हो। मैं अभिव्यक्ति के इस खतरे को जानते हुए भी अपनी बात रख रहा हूं। मेरी इस टिप्पणी को सिक्के के दूसरे पहलू के रूप में ही लिया जाए। सारी ही कविताएं जो गीत की तर्ज पर लिखी गई हैं, इन्हें निश्चित तौर पर व्यापक जनसमूह के सामने मंच से पढ़ा जाएगा तो वन्स मोर, वन्स मोर की ध्वनि सुनाई देगी। इस कसौटी पर वे खरी उतरती हैं। लेकिन यहीं इनमें एक गंभीर बात छिपी है। पहली तीन कविताएं आंसू बहाऊ फिल्मों की स्क्रिप्ट लगती हैं। 

पहली कविता हिन्दुस्तान के किसी ऐसे गांव का वर्णन लगता है जो शहर को लेकर अति पूर्वाग्रही है। ऐसे गांव शायद फिल्मों में ही नजर आते हैं। दूसरी कविता अम्मा की दुर्दशा जबरन संवदेना से भर देती है। लेकिन जरा रुककर आप इसे पढ़ें। यह घोर स्त्री विरोधी कविता है। स्त्री को स्त्री के खिलाफ खड़ी करती कविता। वही बहू और सास के टाइप्ड स्टीरियो। जीवन का सच यही भर नहीं है याकि इतना सफेद और काला नहीं है कि आप किसी भी एक पक्ष में खड़े हो जाएं। तीसरी कविता बंटवारा पढ़ते हुए फिर एक बार लि‍जलिजी संवदेना उभर आती है। चौथी कविता में शब्दों से चमत्कार पैदा करने की कोशिश है जिसमें कवि सफल भी हुआ है। पर बात जैसे कुछ बनती नहीं है। अंतिम कविता चुनावी मौसम भी चुनाव के नारों की तरह ही लगती है। इन कविताओं में मूल स्वर निराशा ही पकड़ में आता है। पांच कविताओं में से एक भी ऐसी नहीं है जो जीवन के प्रति किसी तरह की आशा जगाती हो। कम से कम कवि अपनी इन कविताओं में तो कोई नई जमीन नहीं खोज पा रहा है। 

अरुण चन्द्र राय  कहते हैं, जौहर जी की पांचो कवितायेँ पढ़ ली हैं| कुछ कवितायेँ कई बार पढ़ी हैं| लम्बी दूरी है, अम्मा की दुर्दशा और बंटवारा एक मिजाज़ और विषय की कवितायेँ हैं और हमारा दौर और चुनावी मौसम अलग चित्र प्रस्तुत करते हैं| इन दिनों अच्छी कविता का अर्थ गूढ़ और उलझी हुई, जटिल कविता से होता है| इस रुझान से अलग ये पांचो कवितायेँ सरल हैं, सहज हैं. स्पष्ट हैं, बड़ी बातें नहीं, आम बात कह रही हैं| हिंदी कविता आज कई खेमो में खड़ी है| कुछ कविता इंडिया में और इंडिया के लिए लिखी जा रही हैं, कुछ कवितायेँ भारत के लिए लिखी जा रही हैं|  इस वर्चुअल स्पेस में भारत की कविता, ठेठ छोटे शहर और गाँव से लिखी गई और गाँव के लिए लिखी गई कवितायेँ है| ये पांचो कवितायें उसी भारत की हैं| माएं आज भी लम्बी दूरी के लिए, ठेठ गरीबी में भी लड्डू बाँध देती हैं, भले बेसन और चीनी उधार की हो| कविता में गाँव की महक और संवेदना यत्र तत्र सर्वत्र है| पहली कविता मुझे व्यक्तिगत तौर पर अधिक महत्वपूर्ण लग रही है क्योंकि अभी आंकड़े  आये हैं कि देश में शहरीकरण बढ़ा है| आज़ादी के बाद से ही शहरों के विकेंद्रीकरण की बात चल रही है लेकिन बहुत लाभ नहीं मिला है| गाँव से पलायन जारी है| यह लम्बी दूरी महज भौतिक दूरी नहीं है बल्कि दूरी सामाजिक, संस्कृति और अवसर की उपलब्धता की है|

ब्लाग की दुनिया के महारथी अविनाश वाचस्पति कहते हैं, कविता का यही चित्र सच्‍चा है। सच्‍ची बात कहने का अपना आनंद है। इन कविताओं में जो महसूसन है, वह सबकी है। सब जानते हैं। पर करते वही हैं जो कविता में कहा गया है। इसे बदलना संभव नहीं है। कविता चाहे लंबी हैं पर एक बार पढ़ने में ही पूरा आनंद देती हैं। बार बार पढ़ने का मन करता है। सच सच ही रहता है। सच सच ही कहता है। यही जौहर है इन कविताओं का। कवि ने कविताओं का सृजन कर नामानुरूप सुख दिया है।


लेखक और व्यंग्यकार रवीन्द्र प्रभात कहते हैं, जौहर की रचनाएँ पढ़ने के बाद गहरी संवेदनाओं को अपने अंतर्मन में उतारकर बार-बार मानव जीवन की व्यथा को महसूस करते हुए नए सृजन को तलाशने की इच्छा बलवती होती  है, सचमुच यह इन रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता है ...बहुत सुन्दर,बहुत सारगर्भित और बहुत ही उम्दा रचनाएँ ! कवयित्री हरकीरत हीर कहती हैं, जितेन्द्र जी के ये गीत सीधे दिल में उतरते हैं| पारिवारिक रिश्तों की मार्मिकता को कितनी गहराई से उतारा है उनकी कलम ने | ये गीत महज़ गीत नहीं हैं पारिवारिक रिश्तों में हो रहे विघटन को भी दर्शा रहे हैं, हमें भविष्य के लिए सचेत भी कर रहे हैं| सीधी सरल भाषा में गाँव का परिवेश बाँध कर रख दिया है उन्होंने| शब्दों में भी गाँव की भीनी-भीनी सी मिठास है, जो गीत को बार-बार पढने का आग्रह करती है|  अश्विनी राय प्रखर कहते हैं, जौहर के गीतों में मिठास, निश्छल प्रेम, करुणा, सम्मान तथा सुन्दर शब्दों का धारा प्रवाह देखते ही बनता है|  माँ बाप की अपने बेटे के प्रति ममता अत्यन्त प्रभावी ढंग से मुखरित हुई है| अम्मा की दुर्दशा का जो सजीव चित्रण किया है, वह आज घर घर की कहानी है| ‘बंटवारा’ में एक और कड़वे सच को अनूठे गीत के माध्यम से प्रस्तुत किया है| जीवन में जिस तीव्रता से सामाजिक मूल्यों में गिरावट आई है, उसकी झांकी  इन गीतों में स्पष्ट दिखाई देती है| गीतकार ने जिस उद्देश्य से इन गीतों की रचना की है, वह सर्वजन हिताय एवं सर्वजन सुखाय होने के साथ साथ मनोरंजक एवं मनमोहक भी है|


कवि और गजलगो प्राण शर्मा लिखते हैं, कविवर जितेन्द्र की कवितायें मैं बड़े मनोयोग से पढ़ गया| उत्कृष्ट भावाभिव्यक्ति ने मन को छू लिया| डॉ महाराज सिंह परिहार कहते हैं, जितेन्‍द्र जौहर की कविताओं में मानवीय संवेदना के साथ ही पारिवारिक आत्‍मीयता है। बदलते परिवेश में जबकि आदमी आत्‍मकेन्द्रित हो गया है, इस तरह की अनुभूतिपरक  रचनाएं कविता के जीवंत होने का प्रमाण हैं| अलबेला खत्री के अनुसार मैंने कविता पढ़नी  शुरू की, गीत की रौ में मैं यों बहता गया कि जितेन्द्र जी बहुत पीछे छूट गये और उनके गीत बहुत आगे निकल गये| इस अनुपम काव्य-यात्रा को मैं लम्बे समय तक अपने भीतर महसूसता रहूँगा| देवेन्द्र पाण्डेय को जौहर की कवितायें पढ़कर प्रेमचंद की कहानियाँ याद हो आईं। सुशील बाकलीवाल  कहते हैं, जीवन में संयुक्त परिवार की कठोर वास्तविकताओं को रेखांकित करती इन सुन्दर कविताओं के वाचन का अवसर उपलब्ध करवाने हेतु साधुवाद| लेखक जाकिर अली रजनीश कहते हैं, जितेन्‍द्र जौहर उन रचनाकारों में हैं, जो दिल से लिखते हैं और जो लोग दिल से लिखते हैं, वे सीधे पाठकों के दिल में उतर जाते हैं। दिगंबर नासवा लिखते हैं, सभी रचनाये  ज़मीन से जुड़े सत्य को लक्षित कर के लिखी गयी हैं|


भोजपुरी के सशक्त रचनाकार मनोज भावुक के अनुसार सरल, सहज लेकिन सारगर्भित व मानवीय संवेदनाओं से लबालब ये कवितायेँ सीधे दिल को छूती हैं और कुछ सोचने - समझने को विवश करती हैं| राजेश जी क्षमा करेंगे, स्त्री-स्त्री के बीच खाई बढाने जैसी कोई बात है ही नहीं.....यथार्थ का बयान है यह| सत्य को उपेक्षित कर एक काल्पनिक सुखद चित्र खींचने से अधिक प्रेरक है वास्तविक दुखद चित्र खींचना| कल्पना हमें भटकाती है, वास्तविकता चिंतन के लिए प्रेरित करती है,  इसलिए रचना धर्मिता का उद्देश्य तो इसी में पूर्ण हो पाता है| अंतिम रचना में भी फ़िल्मी जैसा कुछ नहीं लगा मुझे| सरल सहज रचनाओं के लिए जीतेन्द्र जी को साधुवाद ! कन्नौजी बोली के आंचलिक शब्दों की मिठास और आंचलिक शब्दों को संरक्षित करने के अनुकरणीय प्रयास के लिए जौहर जी को विशेष बधाई| हिन्दी की समृद्धि तो आंचलिक अगढ़ शब्दों से ही है| हिन्दी के प्राण बसते हैं इनमें| कन्नौजी बोली की ग्राम्य सरलता आकर्षक है| 


उमेश महादोषी लिखते हैं, जितेन्द्र जौहर जी को इस रूप में देखकर कुछ अलग ही अनुभूति हुई। गांव का वह परिदृश्य भी जीवन का हिस्सा रहा है और वे परिस्थितियां भी, जिन्हें पहले तीनो गीतों में शब्द-चित्रों में बांधा है। नज़दीक से देखी-भोगी यह अनुभूति संवेदना को भी झंकृत कर गई और स्मृतियों को भी। समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है। गांव अब गांव नहीं रह गये हैं, उनमें भी शहर की आत्मा बस गई है और शहर आज हमारी भौतिक जरूरत बन गये हैं। पर आत्मिक जरूरतें पूरी नहीं हो पाती, सो मन उस सबको याद करता ही है, जो भले नहीं रहा, पर हमारे अन्तर्मन में कौंधता जरूर है। पहला गीत पढ़कर करीब पच्चीस वर्ष पूर्व पढ़े एक गीत की अनुभूति भी मेरी स्मृति में ताजा हो आई है, सम्भवत डा. अश्वघोष जी का गीत है- ‘बहुत दिनों के बाद मिला है, अम्मां का खत गांव से’। समीर लाल उर्फ़ उड़नतश्तरी, अवनीश चौहान, वेद व्यथित, नीरज गोस्वामी, धर्मेन्द्र सिंह सज्जन, मनोज कुमार , रामेश्वर काम्बोज, बी एस पाबला, ज्ञान चन्द्र मर्मज्ञ , डॉ श्याम गुप्ता, गीता पंडित, गिरिजा कुलश्रेष्ठ , कौशलेन्द्र, पंकज सारस्वत ने भी इन गीतों को सराहा| 


रचनाकार जितेन्द्र जौहर ने अपना पक्ष रखते हुए कहा, सभी टिप्पणियाँ/अभिमत किसी-न-किसी रूप में महत्त्वपूर्ण हैं; इनमें जो भी मुझे विशेष रूप से ग्राह्य लग रहा है, उसे मैं आभार सहित सिर-माथे स्वीकार करता हूँ। इस टिप्पणी  "...तीसरी कविता ‘बँटवारा’ पढ़ते हुए फिर एक बार लि‍जलिजी संवदेना उभर आती है..." -में प्रयुक्त ‘लि‍जलिजी संवदेना’ नामक वाक्यांश अरसा-पूर्व गीत के खिलाफ़ छेड़े गये एक आन्दोलन में प्रयोग किये गये ‘लिजलिजी भावुकता’ नामक आक्षेप का ‘उच्छिष्‍ट-चर्वण’ है। ध्यातव्य है कि जो लोग गीतिकाव्य पर ‘लिजलिजी भावुकता’ का आरोप लगाते रहे हैं, उनकी बोझिल कविताएँ वृहत्तर पाठक-वर्ग ने नकार दी थीं। उनमें बिम्ब और प्रतीक इतने जटिल थे कि कविता जो कि हृदय-प्रधान मानी जाती है (और ‘है’ भी), बुद्धिवादी होकर रह गयी थी। कुछेक कवि अपने उक्ति-वैचित्र्य एवं खनकती हुई भाषा के प्रयोग से अपनी छाप अवश्य छोड़ गये, लेकिन उनकी भी कविताएँ आम आदमी की ज़ुबान अथवा कण्ठ पर आसीन होने का गौरव नहीं पा सकीं। 


हम स्वयं अपनी स्मृति को टटोलकर देखें कि हमें कितनी ‘मुक्तछंद’ अथवा ‘छंदमुक्त’ कविताएँ कंठस्थ हैं। मेरा आशय यह कदापि नहीं कि उन या इन वर्षों में छंदोबद्ध काव्य में जो कुछ लिखा गया, वह सब सराहनीय रहा...कचरा तो कमोबेश  हर जगह होता ही है। टिप्पणीकार का यह कथन कि:"...सारी ही कविताएं जो गीत की तर्ज पर लिखी गई हैं"-पूर्णतः अनौचित्यपूर्ण है। ये ‘गीति रचनाएँ’ हैं, न कि किसी "गीत की तर्ज" पर लिखी गयी हैं| टिप्पणीकार का यह कथन कि: "दूसरी कविता ‘अम्मा की दुर्दशा’...घोर स्त्री विरोधी कविता है। स्त्री को स्त्री के खिलाफ खड़ी करती कविता -टिप्पणीकार इसे सही परिप्रेक्ष्य में ग्रहण करने में असफल रहा। इस गीत में वस्तुस्थिति का यथातथ्य/यथासत्य चित्रण है, न कि ‘स्त्री को स्त्री के खिलाफ खड़ा करने’ की कोशिश। क्या ऐसी घटनाएँ हमारे घर-परिवार में नहीं घटतीं? यदि हाँ...तो उनके चित्रण से गुरेज/परहेज कैसा? यहाँ ‘अम्मा की दुर्दशा’ का यथातथ्य चित्रण गीतकार का अभीष्‍ट रहा है...न कि वह जिसे टिप्पणीकार ज़बरन घसीट लाया है। उसे फतवा-शैली में जजमेण्टल नहीं होना चाहिए... आप्‍त-वचनीय मुद्रा संवाद की स्वस्थ परम्परा को आहत कर देती है।

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२४ सितम्बर शनिवार को सर्वत जमाल की गज़लें

हां, आज ही, जरूर आयें

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