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सोमवार, 13 अगस्त 2012

कहन की बारीकियाँ जरूरी

तिलक राज कपूर की गजलों पर चर्चा हुई. कुछ गंभीर बातें हुईं।  अशोक रावत ने कहा, ग़ज़ल कोई रचनाकार कैसे लिखता है, इस विषय को पाठक शायद ही कोई महत्व देते हों पाठक का सरोकार तो सिर्फ रचनाओं की गुणवत्ता से होता है. कुछ लोगो को यह बात बुरी लग सकती है लेकिन देवनागरी लिपि में बिना उर्दू जानने वाले उर्दूमिज़ाज के रचनाकारों की गज़लें हों या हिंदी के रचनाकारों की गज़लें,भाषा के मुहावरे के प्रति उदासीनता(शायद अज्ञानता) और अपनी ग़ज़लों को परखने के लिये अलग नज़र, कुछ ऐसे कारण हैं जिससे ख़याल अच्छा होते हुए भी बात बनते बनते रह जाती है.ग़ज़ल सदैव कहन के लिये याद की जाती रही है और रहेगी. कहन का सीधा रिश्ता भाषा के मुहावरे से है. कोई बच्चन जी के गीत पढ़ कर देखे और फिर ग़ज़ल की कहन से तुलना करे. इस कहन और हिंदी भाषा के सौंदर्य का सबसे सटीक उदाहरण मधुशाला है. हिंदी भाषा के वैभव को ग़ज़ल अभी छू भी नहीं पाई है. जिन्होंने कोशिश की वे सिर्फ़ भाषा की फ़िक्र में रहे, गज़ल को भूल गये. ग़ज़ल की बारीकियाँ कहन की बारीकियाँ ही हैं. मैं कोई उस्ताद नहीं इसलिये किसी की रचनाओं पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी करना उचित नहीं समझता, जब तक कि कोई ख़ुद ही न कहे. कोई किसी को नहीं समझा सकता.
तिलक राज कपूर ने विनम्रतापूर्वक कुछ कमियां, आज के जीवन की कुछ सीमाएं स्वीकार कीं। मुझे लगता है कि अच्‍छी ग़ज़ल या काव्‍य कहने के लिये विशद् शब्‍द-ज्ञान के साथ-साथ काव्‍य के तत्‍वों का भी गहन अध्‍ययन होना चाहिये और मुझे यह स्‍वीकारने में कोई संकोच नहीं कि इनके लिये मैं समय नहीं देता। बहुत हुआ तो किसी ने कोई कमी बताई तो उसका भविष्‍य में ध्‍यान रखने का प्रयास किया। शायद यही आज के अधिकॉंश ग़ज़ल या अन्‍य काव्‍य कहने वालों की स्थिति है अन्‍यथा सशक्‍त हस्‍ताक्षरों की कमी न होती। एक अंतर और है जो स्‍पष्‍ट है, वह यह कि इतिहास के सशक्‍त हस्‍ताक्षर साहित्‍य के अतिरिक्‍त किसी अन्‍य माध्‍यम से परिवार के पालन-पोषण की व्‍यवस्‍था करते भी थे तो वह भी लेखन के आस-पास का ही व्‍यवसाय होता था। मॉं सरस्‍वती की विशेष कृपा एक विशिष्‍ट स्थिति हो सकती है अन्‍यथा स्‍तरीय साहित्‍य सृजन समय मॉंगता है जबकि आज का युग मात्रा में अधिक विश्‍वास रखता है। रचना को कुछ समय छोड़कर फिर से पढ़ने से मुझे लगता है कि आत्‍ममुग्‍धता की स्थिति से बचा जा सकता है।

दिगंबर नासवा ने कहा कि शिल्प के माहिर और विशिष्ट अंदाज़ में अपनी बात रखने वाले तिलक जी नेट पे गज़ल कहने वालों में एक जाना पहचाना नाम हैं. उनकी गज़लों का खजाना एक साथ देख के मज़ा आ गया. हर गज़ल लाजवाब शेरों से सज्जित है. युगों की प्‍यास का मतलब उसी से पूछिये साहब जिसे मरुथल में मीलों तक कहीं बादल नहीं मिलता. कितनी आसानी से अपनी बात को रक्खा है. ये हुनर तिलक जी के पास ही है. हमको न इस की फि़क्र हमें किसने क्‍या कहा, जब तक तेरी नज़र में ख़तावार हम नहीं। बेबाकी से कही गई है यह बात. रात हो या दिन, कभी सोता नहीं, सूर्य का विश्राम पल होता नहीं। थक गये जब नौजवॉं, ये हल निकाला फिर से बूढ़ी बातियों में तेल डाला। मतले ही इतने लाजवाब हैं की दांतों तले ऊँगली अपने आप ही आ जाती है.

गजलकार नीरज गोस्वामी का कहना है कि तिलक जी बहुत निराले शायर हैं...लाखों में एक...सबसे बढ़िया बात ये है के वो जितने अच्छे शायर हैं उस से भी अच्छे और प्यारे इंसान हैं और जैसी प्रतिभा उनमें है वैसी इश्वर हर किसी को नहीं देता...आसपास की चीजों पर उनकी पकड़ ग़ज़ब की है...मैंने कई बार देखा है जिस शेर पर माथापच्ची करने के बाद मैं उनकी शरण में मदद के लिए जाता हूँ वो उसे चुटकी में कह देते हैं....ये ग़ज़लें मेरी उनके बारे में व्यक्त की गयी धारणा की पुष्टि करती हैं... उनकी ग़ज़लें उनके व्यक्तित्व और सोच का आइना हैं... जुनूँ की हद से आगे जो निकल जाये शराफ़त में, हमें इस दौर में ऐसा कोई पागल नहीं मिलता। जैसा शेर जैसे उन्होंने ने अपने लिए ही कहा है. तिलक जी की रचना प्रक्रिया जटिल नहीं है वो आसान और ठोस शब्दों में अपनी बात कहते हैं और ये ही उनकी बहुत बड़ी खूबी है. चेहरा पढ़ें हुजूर नहीं झूठ कुछ यहॉं कापी, किताब, पत्रिका, अखबार हम नहीं। हमेशा हँसते हंसाने वाले तिलक जी ही ऐसा शेर कह सकते हैं कहा किसी ने बुरा कभी तो, चुभन हमेशा, रही दिलों में कभी किसी को, लगे बुरा जो, न बोल ऐसा जहन में आए। उनकी हर ग़ज़ल से हम ज़िन्दगी जीने का सलीका सीखते हैं।

तिलक जी की विनम्रता का कोई जोड़ नहीं है, कहते हैं, प्रशंसा तो इंसान को अतिरिक्‍त उर्जा देती ही है लेकिन कहीं कोई दोष छूट गया हो तो वह इंगित होने से भविष्‍य के लिये सुधार होता है।

मशहूर ब्लॉगर रविन्द्र प्रभात का मानना है की तिलक जी की गजलों का  स्वाद बेहद मीठा और कहने का अंदाज तीखा लगता है । विंब और कथ्य बिलकुल अलग किन्तु शिल्प से कोई समझौता न होना इनकी गज़लों की सबसे बड़ी विशेषता है । अपनी गज़लों की मजाई के बारे में इन्होंने साफ-साफ कह दिया है, इसलिए उसपर किसी भी प्रकार की टिप्पणी की आवश्यकता नहीं है । इनकी गज़लों को पढ़ने के बाद जुबान से आह भी निकलती है और बाह भी । बेहद सुंदर और सारगर्भित गजल के लिए आभार. मदन मोहन शर्मा ने कहा, सार्थक और सुन्दर रचनाएँ. निर्मला कपिला का मानना है, तिलक भाई की गज़लों के क्या कहने. मै तो उन्हे पढने को हमेशा लालायित रहती हूँ। अभी कम्प्यूटर बन्द करने वाली थी कि तिलक पढ कर बन्द नही कर पाई बस एक ब्लाग पढना ही सफल रहा। उनकी उस्तादाना गज़लों पर मै क्या कहूँगी। एक से बढ कर एक। उनसे बहुत कुछ सीखा है। आशा है आगे भी उनका योगदान बना रहेगा।


18 अगस्त शनिवार को ओम प्रकाश यती की ग़ज़लें
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3 टिप्‍पणियां:

  1. अशोक रावत जी और फिर तिलक राज जी ... दोनों ने ही अपने अपने अंदाज़ से अपनी बात को रक्खा है और दोनों बातें ही अपनी अपनी जगह सही हैं ... चर्चा की ये स्वस्थ परंपरा स्वागत योग्य है ..

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  2. ग़ज़ल का नाम आते ही जो सबसे पहली बात मेरे मस्तिष्क में आती है वह है झमेला, आप कितनी भी अच्छी ग़ज़ल कहिये, अपना खून निचोड़ दीजिए, समीक्षक के विचार से ग़ज़ल में कोई न कोई कमी अवश्य रह जायेगी, विद्वानों की दृष्टि ऐसी कमियों पर चाहे-अनचाहे पड़ ही जाती है, बात कितनी दूर तक जा सकती है स्वयं रचनाकार को भी आभास नहीं होता, शब्दों के प्रयोग से चल कर भाषा के मुहावरे तक ग़ज़ल लिखने वाले को सिवाय असमंजस के कुछ नहीं मिलता. लिखने वाला सिवाय विनम्रता से समालोचक की बात को स्वीकार करने के और कुछ कहने की स्थिति में कभी नहीं होता. क्या ऐसा नहीं हो सकता की हमारी दृष्टि ' दोषान्वेषण' से हट कर 'गुण ग्राहकता' का रुख कर ले, रचनाकार की रचना में यदि कहीं कविता है तो उस पर भी हमारा ध्यान जाय, यदि ऐसा नहीं होता है तो यह न केवल ग़ज़ल की प्रासंगिकता अपितु कविता के उद्देश्यों पर भी एक प्रकार से कुठाराघात जैसा होगा. मुझे यह निवेदन इस लिए प्रासंगिक लगा कि जब-जब ग़ज़ल की बात होती है तब-तब ग़ज़ल में इतने जबरदस्त तरीके से कमियां खोजी जाती हैं कि लिखने वाला बस पहली ही बार में तौबा कर ले. क्या हम बदलना चाहेंगे.

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  3. खरगोश का संगीत राग रागेश्री पर आधारित है जो कि
    खमाज थाट का सांध्यकालीन राग है, स्वरों में कोमल निशाद और बाकी स्वर शुद्ध लगते हैं,
    पंचम इसमें वर्जित है, पर हमने इसमें अंत में पंचम का प्रयोग भी किया है,
    जिससे इसमें राग बागेश्री भी झलकता है.

    ..

    हमारी फिल्म का संगीत वेद नायेर
    ने दिया है... वेद जी को अपने
    संगीत कि प्रेरणा जंगल में चिड़ियों कि चहचाहट से मिलती है.

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