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शनिवार, 3 सितंबर 2011

पाँच रंगों की रंगोली


साखी पर जितेन्द्र जौहर के गीत कुछ आलोचनाओं के साथ आम तौर पर सराहे गये| विमर्श की गंभीरता दिखाई पडी| कविता की खासी समझ रखने वाले सलिल वर्मा उर्फ़ बिहारी ब्लॉगर की बात गौर करने लायक रही| उन्होंने कहा, आज ब्लॉग लेखन में या अन्यत्र भी कविता लिखना इतना सहज और सामान्य समझा जाने लगा है कि हर व्यक्ति कविताई करता दिखाई देता है| उन्हें ऐसी कविता लिखते समय तनिक भी भान नहीं होता कि मूर्ख उन जगहों पर धड़ल्ले  से प्रवेश कर जाते हैं, जहां पाँव धरते हुए देवदूत भी भयभीत होते हैं| जितेन्द्र  जी की कवितायेँ जब-जब पढ़ी हैं, तब-तब यह प्रतीत हुआ है कि इनकी कविताओं में इनका अनुभव और ज्ञान दोनों परिलक्षित होता है| एक और विशेषता यह दिखाई देती है कि भाषा के विद्यार्थी होने के कारण अंगरेजी एवं हिन्दी दोनों भाषाओं पर समान प्रभाव दिखाई देता है| ऐसे में शब्दों का चयन, भावों का सम्प्रेषण, विषय का चयन और शब्दों की मितव्ययिता देखी जा सकती है| 

साखी के अंक में उनकी पाँच कविताओं का संकलन स्वागत योग्य है| जब मैंने पहली  कविता पढ़ना प्रारम्भ किया तो लगा कि अपने ही गाँव में बैठा हूँ, आस पड़ोस की कहानी सुन देख रहा हूँ, अपनी माता को मुझे विदा करते हुए और अंचरा के कोर से आँखें पोंछते देख रहा हूँ| गाँव से शहर की ओर पलायन करते लोगों के साथ परिवार मनोविज्ञान का जीवंत चित्रण देखने को मिलता है| बाद की दोनों कविताओं में अम्मा की व्यथा और बंटवारे का दुःख मन को झकझोर गया किन्तु साथ ही लगा कि तीनों कविताओं की पृष्ठभूमि और परिवेश एक से हैं और व्यथा भी| जौहर जी की रचनाओं में इतनी विविधता है कि उनकी पाँच रचनाएँ पाँच रंगों की रंगोली प्रस्तुत कर सकती हैं| हमारे नपुंसक दौर के वर्णन में जिस ओज का परिचय जौहर जी ने दिया है, वह उनके ही नहीं इस दौर की हर संवेदनशील मन की सोच है| इस कविता में जिन शब्दों का चयन किया गया है वे शब्द उस आक्रोश को व्यक्त करने में सफल रहे हैं. और इतने उचित हैं कि उनके स्थानापन्न शब्दों की कल्पना भी उस आक्रोश को कम करती सी लगती है|
अंतिम रचना एक व्यंग्य रचना है इसलिए उसे हलके फुल्के अंदाज़ की ही रचना कहना उचित होगा| कुल मिलाकर जितेन्द्र जौहर साहब का रचना संसार मुग्ध करता है|
 

कवि और आलोचक राजेश  उत्साही जितेन्द्र की रचनाओं की जी भर तारीफ से संभवत: और लेकिन के साथ सहमत हैं| वे कहते हैं, कई बार कुछ बातें और कुछ ऐसे पहलू भी होते हैं जो हमें प्रत्यक्ष नजर नहीं आते। इन कविताओं में भी ऐसा कुछ है। यह भी बहुत संभव है कि कई पाठकों ने उन्हें देखा भी हो, पर साथ ही नजरअंदाज कर दिया हो। मैं अभिव्यक्ति के इस खतरे को जानते हुए भी अपनी बात रख रहा हूं। मेरी इस टिप्पणी को सिक्के के दूसरे पहलू के रूप में ही लिया जाए। सारी ही कविताएं जो गीत की तर्ज पर लिखी गई हैं, इन्हें निश्चित तौर पर व्यापक जनसमूह के सामने मंच से पढ़ा जाएगा तो वन्स मोर, वन्स मोर की ध्वनि सुनाई देगी। इस कसौटी पर वे खरी उतरती हैं। लेकिन यहीं इनमें एक गंभीर बात छिपी है। पहली तीन कविताएं आंसू बहाऊ फिल्मों की स्क्रिप्ट लगती हैं। 

पहली कविता हिन्दुस्तान के किसी ऐसे गांव का वर्णन लगता है जो शहर को लेकर अति पूर्वाग्रही है। ऐसे गांव शायद फिल्मों में ही नजर आते हैं। दूसरी कविता अम्मा की दुर्दशा जबरन संवदेना से भर देती है। लेकिन जरा रुककर आप इसे पढ़ें। यह घोर स्त्री विरोधी कविता है। स्त्री को स्त्री के खिलाफ खड़ी करती कविता। वही बहू और सास के टाइप्ड स्टीरियो। जीवन का सच यही भर नहीं है याकि इतना सफेद और काला नहीं है कि आप किसी भी एक पक्ष में खड़े हो जाएं। तीसरी कविता बंटवारा पढ़ते हुए फिर एक बार लि‍जलिजी संवदेना उभर आती है। चौथी कविता में शब्दों से चमत्कार पैदा करने की कोशिश है जिसमें कवि सफल भी हुआ है। पर बात जैसे कुछ बनती नहीं है। अंतिम कविता चुनावी मौसम भी चुनाव के नारों की तरह ही लगती है। इन कविताओं में मूल स्वर निराशा ही पकड़ में आता है। पांच कविताओं में से एक भी ऐसी नहीं है जो जीवन के प्रति किसी तरह की आशा जगाती हो। कम से कम कवि अपनी इन कविताओं में तो कोई नई जमीन नहीं खोज पा रहा है। 

अरुण चन्द्र राय  कहते हैं, जौहर जी की पांचो कवितायेँ पढ़ ली हैं| कुछ कवितायेँ कई बार पढ़ी हैं| लम्बी दूरी है, अम्मा की दुर्दशा और बंटवारा एक मिजाज़ और विषय की कवितायेँ हैं और हमारा दौर और चुनावी मौसम अलग चित्र प्रस्तुत करते हैं| इन दिनों अच्छी कविता का अर्थ गूढ़ और उलझी हुई, जटिल कविता से होता है| इस रुझान से अलग ये पांचो कवितायेँ सरल हैं, सहज हैं. स्पष्ट हैं, बड़ी बातें नहीं, आम बात कह रही हैं| हिंदी कविता आज कई खेमो में खड़ी है| कुछ कविता इंडिया में और इंडिया के लिए लिखी जा रही हैं, कुछ कवितायेँ भारत के लिए लिखी जा रही हैं|  इस वर्चुअल स्पेस में भारत की कविता, ठेठ छोटे शहर और गाँव से लिखी गई और गाँव के लिए लिखी गई कवितायेँ है| ये पांचो कवितायें उसी भारत की हैं| माएं आज भी लम्बी दूरी के लिए, ठेठ गरीबी में भी लड्डू बाँध देती हैं, भले बेसन और चीनी उधार की हो| कविता में गाँव की महक और संवेदना यत्र तत्र सर्वत्र है| पहली कविता मुझे व्यक्तिगत तौर पर अधिक महत्वपूर्ण लग रही है क्योंकि अभी आंकड़े  आये हैं कि देश में शहरीकरण बढ़ा है| आज़ादी के बाद से ही शहरों के विकेंद्रीकरण की बात चल रही है लेकिन बहुत लाभ नहीं मिला है| गाँव से पलायन जारी है| यह लम्बी दूरी महज भौतिक दूरी नहीं है बल्कि दूरी सामाजिक, संस्कृति और अवसर की उपलब्धता की है|

ब्लाग की दुनिया के महारथी अविनाश वाचस्पति कहते हैं, कविता का यही चित्र सच्‍चा है। सच्‍ची बात कहने का अपना आनंद है। इन कविताओं में जो महसूसन है, वह सबकी है। सब जानते हैं। पर करते वही हैं जो कविता में कहा गया है। इसे बदलना संभव नहीं है। कविता चाहे लंबी हैं पर एक बार पढ़ने में ही पूरा आनंद देती हैं। बार बार पढ़ने का मन करता है। सच सच ही रहता है। सच सच ही कहता है। यही जौहर है इन कविताओं का। कवि ने कविताओं का सृजन कर नामानुरूप सुख दिया है।


लेखक और व्यंग्यकार रवीन्द्र प्रभात कहते हैं, जौहर की रचनाएँ पढ़ने के बाद गहरी संवेदनाओं को अपने अंतर्मन में उतारकर बार-बार मानव जीवन की व्यथा को महसूस करते हुए नए सृजन को तलाशने की इच्छा बलवती होती  है, सचमुच यह इन रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता है ...बहुत सुन्दर,बहुत सारगर्भित और बहुत ही उम्दा रचनाएँ ! कवयित्री हरकीरत हीर कहती हैं, जितेन्द्र जी के ये गीत सीधे दिल में उतरते हैं| पारिवारिक रिश्तों की मार्मिकता को कितनी गहराई से उतारा है उनकी कलम ने | ये गीत महज़ गीत नहीं हैं पारिवारिक रिश्तों में हो रहे विघटन को भी दर्शा रहे हैं, हमें भविष्य के लिए सचेत भी कर रहे हैं| सीधी सरल भाषा में गाँव का परिवेश बाँध कर रख दिया है उन्होंने| शब्दों में भी गाँव की भीनी-भीनी सी मिठास है, जो गीत को बार-बार पढने का आग्रह करती है|  अश्विनी राय प्रखर कहते हैं, जौहर के गीतों में मिठास, निश्छल प्रेम, करुणा, सम्मान तथा सुन्दर शब्दों का धारा प्रवाह देखते ही बनता है|  माँ बाप की अपने बेटे के प्रति ममता अत्यन्त प्रभावी ढंग से मुखरित हुई है| अम्मा की दुर्दशा का जो सजीव चित्रण किया है, वह आज घर घर की कहानी है| ‘बंटवारा’ में एक और कड़वे सच को अनूठे गीत के माध्यम से प्रस्तुत किया है| जीवन में जिस तीव्रता से सामाजिक मूल्यों में गिरावट आई है, उसकी झांकी  इन गीतों में स्पष्ट दिखाई देती है| गीतकार ने जिस उद्देश्य से इन गीतों की रचना की है, वह सर्वजन हिताय एवं सर्वजन सुखाय होने के साथ साथ मनोरंजक एवं मनमोहक भी है|


कवि और गजलगो प्राण शर्मा लिखते हैं, कविवर जितेन्द्र की कवितायें मैं बड़े मनोयोग से पढ़ गया| उत्कृष्ट भावाभिव्यक्ति ने मन को छू लिया| डॉ महाराज सिंह परिहार कहते हैं, जितेन्‍द्र जौहर की कविताओं में मानवीय संवेदना के साथ ही पारिवारिक आत्‍मीयता है। बदलते परिवेश में जबकि आदमी आत्‍मकेन्द्रित हो गया है, इस तरह की अनुभूतिपरक  रचनाएं कविता के जीवंत होने का प्रमाण हैं| अलबेला खत्री के अनुसार मैंने कविता पढ़नी  शुरू की, गीत की रौ में मैं यों बहता गया कि जितेन्द्र जी बहुत पीछे छूट गये और उनके गीत बहुत आगे निकल गये| इस अनुपम काव्य-यात्रा को मैं लम्बे समय तक अपने भीतर महसूसता रहूँगा| देवेन्द्र पाण्डेय को जौहर की कवितायें पढ़कर प्रेमचंद की कहानियाँ याद हो आईं। सुशील बाकलीवाल  कहते हैं, जीवन में संयुक्त परिवार की कठोर वास्तविकताओं को रेखांकित करती इन सुन्दर कविताओं के वाचन का अवसर उपलब्ध करवाने हेतु साधुवाद| लेखक जाकिर अली रजनीश कहते हैं, जितेन्‍द्र जौहर उन रचनाकारों में हैं, जो दिल से लिखते हैं और जो लोग दिल से लिखते हैं, वे सीधे पाठकों के दिल में उतर जाते हैं। दिगंबर नासवा लिखते हैं, सभी रचनाये  ज़मीन से जुड़े सत्य को लक्षित कर के लिखी गयी हैं|


भोजपुरी के सशक्त रचनाकार मनोज भावुक के अनुसार सरल, सहज लेकिन सारगर्भित व मानवीय संवेदनाओं से लबालब ये कवितायेँ सीधे दिल को छूती हैं और कुछ सोचने - समझने को विवश करती हैं| राजेश जी क्षमा करेंगे, स्त्री-स्त्री के बीच खाई बढाने जैसी कोई बात है ही नहीं.....यथार्थ का बयान है यह| सत्य को उपेक्षित कर एक काल्पनिक सुखद चित्र खींचने से अधिक प्रेरक है वास्तविक दुखद चित्र खींचना| कल्पना हमें भटकाती है, वास्तविकता चिंतन के लिए प्रेरित करती है,  इसलिए रचना धर्मिता का उद्देश्य तो इसी में पूर्ण हो पाता है| अंतिम रचना में भी फ़िल्मी जैसा कुछ नहीं लगा मुझे| सरल सहज रचनाओं के लिए जीतेन्द्र जी को साधुवाद ! कन्नौजी बोली के आंचलिक शब्दों की मिठास और आंचलिक शब्दों को संरक्षित करने के अनुकरणीय प्रयास के लिए जौहर जी को विशेष बधाई| हिन्दी की समृद्धि तो आंचलिक अगढ़ शब्दों से ही है| हिन्दी के प्राण बसते हैं इनमें| कन्नौजी बोली की ग्राम्य सरलता आकर्षक है| 


उमेश महादोषी लिखते हैं, जितेन्द्र जौहर जी को इस रूप में देखकर कुछ अलग ही अनुभूति हुई। गांव का वह परिदृश्य भी जीवन का हिस्सा रहा है और वे परिस्थितियां भी, जिन्हें पहले तीनो गीतों में शब्द-चित्रों में बांधा है। नज़दीक से देखी-भोगी यह अनुभूति संवेदना को भी झंकृत कर गई और स्मृतियों को भी। समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है। गांव अब गांव नहीं रह गये हैं, उनमें भी शहर की आत्मा बस गई है और शहर आज हमारी भौतिक जरूरत बन गये हैं। पर आत्मिक जरूरतें पूरी नहीं हो पाती, सो मन उस सबको याद करता ही है, जो भले नहीं रहा, पर हमारे अन्तर्मन में कौंधता जरूर है। पहला गीत पढ़कर करीब पच्चीस वर्ष पूर्व पढ़े एक गीत की अनुभूति भी मेरी स्मृति में ताजा हो आई है, सम्भवत डा. अश्वघोष जी का गीत है- ‘बहुत दिनों के बाद मिला है, अम्मां का खत गांव से’समीर लाल उर्फ़ उड़नतश्तरी, अवनीश चौहान, वेद व्यथित, नीरज गोस्वामी, धर्मेन्द्र सिंह सज्जन, मनोज कुमार , रामेश्वर काम्बोज, बी एस पाबला, ज्ञान चन्द्र मर्मज्ञ , डॉ श्याम गुप्ता, गीता पंडित, गिरिजा कुलश्रेष्ठ , कौशलेन्द्र, पंकज सारस्वत ने भी इन गीतों को सराहा| 


रचनाकार जितेन्द्र जौहर ने अपना पक्ष रखते हुए कहा, सभी टिप्पणियाँ/अभिमत किसी-न-किसी रूप में महत्त्वपूर्ण हैं; इनमें जो भी मुझे विशेष रूप से ग्राह्य लग रहा है, उसे मैं आभार सहित सिर-माथे स्वीकार करता हूँ। इस टिप्पणी  "...तीसरी कविता ‘बँटवारा’ पढ़ते हुए फिर एक बार लि‍जलिजी संवदेना उभर आती है..." -में प्रयुक्त ‘लि‍जलिजी संवदेना’ नामक वाक्यांश अरसा-पूर्व गीत के खिलाफ़ छेड़े गये एक आन्दोलन में प्रयोग किये गये ‘लिजलिजी भावुकता’ नामक आक्षेप का ‘उच्छिष्‍ट-चर्वण’ है। ध्यातव्य है कि जो लोग गीतिकाव्य पर ‘लिजलिजी भावुकता’ का आरोप लगाते रहे हैं, उनकी बोझिल कविताएँ वृहत्तर पाठक-वर्ग ने नकार दी थीं। उनमें बिम्ब और प्रतीक इतने जटिल थे कि कविता जो कि हृदय-प्रधान मानी जाती है (और ‘है’ भी), बुद्धिवादी होकर रह गयी थी। कुछेक कवि अपने उक्ति-वैचित्र्य एवं खनकती हुई भाषा के प्रयोग से अपनी छाप अवश्य छोड़ गये, लेकिन उनकी भी कविताएँ आम आदमी की ज़ुबान अथवा कण्ठ पर आसीन होने का गौरव नहीं पा सकीं। 


हम स्वयं अपनी स्मृति को टटोलकर देखें कि हमें कितनी ‘मुक्तछंद’ अथवा ‘छंदमुक्त’ कविताएँ कंठस्थ हैं। मेरा आशय यह कदापि नहीं कि उन या इन वर्षों में छंदोबद्ध काव्य में जो कुछ लिखा गया, वह सब सराहनीय रहा...कचरा तो कमोबेश  हर जगह होता ही है। टिप्पणीकार का यह कथन कि:"...सारी ही कविताएं जो गीत की तर्ज पर लिखी गई हैं"-पूर्णतः अनौचित्यपूर्ण है। ये ‘गीति रचनाएँ’ हैं, न कि किसी "गीत की तर्ज" पर लिखी गयी हैं| टिप्पणीकार का यह कथन कि: "दूसरी कविता ‘अम्मा की दुर्दशा’...घोर स्त्री विरोधी कविता है। स्त्री को स्त्री के खिलाफ खड़ी करती कविता -टिप्पणीकार इसे सही परिप्रेक्ष्य में ग्रहण करने में असफल रहा। इस गीत में वस्तुस्थिति का यथातथ्य/यथासत्य चित्रण है, न कि ‘स्त्री को स्त्री के खिलाफ खड़ा करने’ की कोशिश। क्या ऐसी घटनाएँ हमारे घर-परिवार में नहीं घटतीं? यदि हाँ...तो उनके चित्रण से गुरेज/परहेज कैसा? यहाँ ‘अम्मा की दुर्दशा’ का यथातथ्य चित्रण गीतकार का अभीष्‍ट रहा है...न कि वह जिसे टिप्पणीकार ज़बरन घसीट लाया है। उसे फतवा-शैली में जजमेण्टल नहीं होना चाहिए... आप्‍त-वचनीय मुद्रा संवाद की स्वस्थ परम्परा को आहत कर देती है।

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२४ सितम्बर शनिवार को सर्वत जमाल की गज़लें

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की लगाई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की लगाई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  3. डॉ. सुभाष रॉय की ब्‍लॉगिंग की तरंग का रंग फिर से खिलखिला उठा है। साखी जगमगा उठा है। इतना गहन विवेचन डॉ. रॉय की विशेषता है। हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के एक महत्‍वपूर्ण कालखंड में निश्चित ही अपनी ऊर्जामयी उपस्थिति दर्ज कर हो रही है। गहन गुंफित गरिमामयी पर गरिष्‍ठ नहीं, सहज चिंतन मानस में उद्वेग रचता है।

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  4. २४ सितम्बर शनिवार को सर्वत जमाल की गज़लें

    बड़ी मायूसी हुई गज़लें ना पाकर...

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