अभियान के साथी

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

नसीम साकेती की रचनाएँ

खेत में भूख उगे फाकों के अंकुर फूटें, क्या इसी वास्ते खूनों से धरा सींची थी, ऐ मेरे देश के नेताओं बताओ इतना, क्या नए देश की तस्वीर यही खींची थी, अपने आग भरे अल्फाज से ये सवाल उठाने वाले नसीम साकेती को साहित्य की दुनिया में सभी जानते हैं| वे केवल शायर या कवि नहीं हैं, एक सरोकार संपन्न लेखक के रूप में भी उन्होंने अपनी पहचान बनाई है| इधर हंस, वागर्थ और लमही में आयी उनकी कहानियां काफी चर्चा में रही हैं| एक साफ-सुथरा नजरिया और जनपक्षधरता नसीम की पूंजी है, जिसके बूते वे अपना किरदार खड़ा करते हैं| उनकी सादगी में उनका बड़ा होना देखा जा सकता है| अम्बेडकर नगर  जिले के मिझौड़ा कसबे में जन्मे नसीम रेलवे में इंजीनिअर रहे| अब वे पूरी तरह लेखन में जुटे हैं| प्रारंभिक दौर में प्रेमचंद और अमृत लाल नागर की कहानियों तथा  साहिर, कैफ़ी और दुष्यंत की कविताओं ने उन्हें बहुत प्रभावित किया| नसीम की कविताएं भी कहानियों का आनंद देती हैं| यहाँ प्रस्तुत हैं उनकी कुछ रचनाएँ-- 

१. पत्थरों का शहर
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पहले आप..पहले आप
जेहन में उभरते ही
बिजली की तरह कौंध जाता है
शहर का नाम
जो कभी जाना जाता था
तहजीब और तमद्दुन के लिए
नजाकत और नफासत के लिए
प्यार और मुहब्बत के लिए
अम्न और शांति के लिए
भाई चारे के लिए
इंसानियत के लिए
सबसे बड़ी बात इज्जत के लिए

लेकिन आज...?
जिस शहर में खड़ा हूँ
ये तो वो शहर नहीं है
पहले आप..पहले आप के बजाय
पहले मैं..पहले मैं
मैं...माफिया हूँ, नेता हूँ
धन-कुबेर हूँ, तिकड़मी अफसर हूँ
मेरे हुक्म के बगैर
एक पत्ता नहीं हिलता
मैं...जो चाहता हूँ, करता हूँ
है किसी में हिम्मत
मुझ पर डाल दे हाथ
किया तो था मेरे बेटे ने उस
लड़की का अपहरण, हत्या
क्या हुआ
घूम तो रहा है वह बेख़ौफ़, निश्चिन्त
इसी शहर में

आँखें फाड़-फाड़ कर देखता हूँ
कुछ धुंधला-धुंधला सा दिखता है
शहर बहुत बड़ा हो गया है
पर आदमी छोटा
बागों के शहर में उग आये हैं
कंक्रीट के जंगल
अख़बार बोझिल हैं
अपराध की खबरों से
इसीलिये दीनानाथ ने छोड़ दिया
अख़बार पढ़ना
पर इससे क्या सब कुछ बदल जायेगा..?

पहले जब कोई मां, कोई बहन
कोई चाची-ताई
मनचले लड़कों को
किसी लड़की पर बुरी निगाह
डालते देखती थी
डांटती, फटकारती थी---
कलमुंहे तेरी यह मजाल
और लडके सर नीचा करके
रफू चक्कर हो जाते थे

लेकिन अब तो
सगी मां, बहन, चाची, ताई के
मना करने पर
आँखें तरेरकर खड़े हो जाते हैं
धमकाते, कट्टा  दिखाते
कई बार पूरी ढिठाई के साथ
खड़े हो जाते हैं

क्यों? क्योंकि अब पूरा शहर
पत्थरों का शहर हो गया है





२. मुल्क की बात करो
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मियां बीवी राजी
तुम क्यों दुबले हो रहे हो काजी..?

मचल रहे थे शब्द
दोनों पक्षों के जुबान की नोंक पर
अदालत के फैसले का सम्मान करेंगे

फैसला आ गया
मनहूस आशंकाएं काफूर हो गयीं
फिर तुम अपनी नाक क्यों
घुसेड़ते हो..मुसरचंदों..?

पहले की तरह
आग लगा कर जमालो दूर खड़ी

लेकिन सुनो

नयी नस्लों को अब वैसा तमाशा नहीं
दिखा पाओगे मदारिओं ...?
जनमानस करवट बदल चुका है
अब तुम्हारी दाल नहीं गलेगी

कल की तरह आज भी

तुम्हारी सोच से
सियासत की बू आती है
तुम्हीं तो थे
विवाद की आंच पर
स्वार्थ की रोटियां सेंकते हुए
खून-खराबा को दावत देते हुए
अनेक शहरों में बम-ब्लास्ट करते हुए

छीन लेते थे क्षण भर में जिंदगियां

लूट लेते थे मां-बहनों की अस्मतें
बेबस मजबूर आँखों के सामने....
साठ साल का तवील अरसा....


हजारों साल पीछे चली गयी
अयोध्या के चेहरे पर उभरने वाली रौनक
विकास का मुंह टेढ़ा हो गया
अफवाहों के हाथ लम्बे हो गये
कारोबार बौने हो गये
घर के चूल्हे ठन्डे पड़ गये
फाके पर फाके

अयोध्या रो पडी

लेकिन इसका अफ़सोस
तुम्हें नहीं है शायद
अयोध्या को तो है
अयोध्यावासियों के जख्मीं दिलों से
पूछ कर तो देखो
सरयू की पावन धारा का
करुण क्रंदन तो सुनो
कलेजा मुंह को आ जायेगा

सद्य स्नाता दुल्हन सी लगती थी अयोध्या

लेकिन आज..?
किसी विधवा की मांग सी लगती है
चेहरा पीला मुरझाये फूल सा हो गया है
शरीर सूख कर कांटा हो गया है

शर्म करो..चुल्लू भर पानी में डूब मरो

क्योंकि सरयू तुम्हें स्वीकार नहीं करेगी

अभी भी वक्त है

गंगा-जमुनी तहजीब को निखारने का
कौमी एकता की डोर को मजबूत करने का
सदियों से अपनी सांझी शहादत की दास्ताँ
सुना रहा है जन्मस्थान रामकोट के पास
कुबेरटीला का ऐतिहासिक इमली का पेड़

जो साक्षी है

१८५७ के बागियों
रामदास, अच्छन खां, अमीर अली को
१८ मार्च १८५८ को एक साथ 

फांसी पर चढ़ा दिया गया था

वो इमली का पेड़

जब देशभक्तों के लिए
रोशनी का मीनार बनने लगा
१९३५ में अंग्रेजों ने उसे भी
शहीद कर दिया

चश्मदीद गवाह है

मणिपर्वत पर
पैगम्बर शीश की मजार
स्वर्ग द्वार पर शाहजहानी मस्जिद

आज भी उसी अयोध्या में

रामगुलाम, गुलाम हुसेन
अगल-बगल मकानों में रहते हैं
उनका राम-भरत जैसा प्यार
भाई-चारे की ऐसी मिसाल
चिराग लेकर ढूँढने पर भी
नहीं मिलेगी

भगवान के लिए

खुदा के वास्ते
बंद करो
पत्थर फेंकना
प्यार के ठहरे हुए  पानी में

बंद करो स्वार्थ की रोटियां सेंकना

सियासत के तवे पर
यहाँ की दरो-दीवार
हवा, फिजां
सरयू की धारा
की आवाजें सुनों

अमन के दीप जलाओ

नफ़रत के अँधेरे मिटाओ
दिल से दिल को मिलाओ
कौमी एकता के गीत गाओ
जय-पराजय की नहीं सौहार्द की बात करो
मंदिर-मस्जिद की
मिल्कियत के आईने में
मुल्क की बात करो

३. अंतिम अभिलाषा

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मुहब्बत के चिरागों को जला लूं तो चलूँ

नफ़रत के अंधेरों को मिटा लूं तो चलूँ
ऐ मौत मुझे थोड़ी सी मोहलत दे दे
वतन की खाक को आँखों में लगा लूं तो चलूँ 


संपर्क-१/७५६, आदिलनगर एन्क्लेव, लेन ५, कंचना विहारी मार्ग, कल्यानपुर पश्चिम लखनऊ
मोबाईल 09415458582

गुरुवार, 17 नवंबर 2011

मदन मोहन का दंगल

शायर सर्वत जमाल की गजलों पर खूब मगजमारी हुई, मुचैटाबाजी हुई, ईंट-पत्थर चले| मदन मोहन शर्मा ने तय कर रखा था कि इस बार मैदान से किसी बीर-बबर को जाने नहीं देंगे| उन्होंने हर  किसी को रगडा, घसीटा, मारा, बिगडैल भैसे की तरह सबको डराते  रहे|  बहस शुरू की राजेश उत्साही ने| उन्होंने कहा,  सर्वत साहब की ग़ज़लें ऐसी लगीं जैसे कोई हमारे अंदर से ये बातें कह रहा हो। उनकी इन ग़ज़लों में सारा समकालीन दर्द जैसे उमड़कर सामने आ गया है। उल्‍लेखनीय बात यह भी है कि सर्वत साहब कहीं कहीं जिस अंदाज से कहते हैं, वह गहरे तक छीलकर रख देता है। जैसे यह शेर-तरक्कियां तुम्हारे पास हैं तो हैं, हमारे पास भूख है, अकाल है| उनकी इन गज़लों में दूसरी उल्‍लेखनीय बात यह भी लगी कि शब्‍दों का उपयोग बहुत किफायत के साथ किया गया है। ग़ज़ल कहने के लिए उन्‍होंने जो भी खाका चुना है, वह महत्‍वपूर्ण है। कई बार चमत्‍कार पैदा करने के लिए शब्‍दों का ढेर लगा दिया जाता है। सर्वत जी इससे बचते नजर आते हैं। यह सतर्कता उनकी ग़ज़लों को ऊंचाईयां देती है। 

तिलक राज कपूर के मुताबिक  सर्वत साहब की ग़ज़लें कुछ ऐसी हैं कि: शब्‍द अंदर से जब निकलता है, वक्‍त के साथ-साथ चलता है। ऑंधियॉं क्‍या डरायेंगी उसको,थाम कर जो मशाल चलता है। सर्वत साहब की लेखनी दीप नहीं मशाल है। आस पास के माहौल से अविचलित, सार को व्‍यक्‍त कर जाना सरल तो नहीं होता| नीरज गोस्वामी ने लिखा, ऐसे अशआर पढ़ कर किसकी बोलती बंद नहीं होगी| मुझे इस बात का फख्र  है कि  मैं सर्वत जमाल साहब को जानता हूँ, उन्हें सिर्फ सुना है लेकिन उस से कोई फर्क नहीं पड़ता| हमने जिसे देखा है उसे भी कहाँ जान पाते हैं| गज़ब के इंसान हैं और गज़ब के शेर कहते हैं, उनका फोन आ जाये तो समझिये आपकी सारी मुश्किलें उदासियाँ तल्खियाँ दुम दबा कर भाग खड़ी होंगीं| ठहाकों का सैलाब आ जायेगा| आपका मन फूलों सा हल्का हो जायेगा| हम खुदा के शुक्र गुज़ार हैं कि  आज की दुनिया में जहाँ मुर्दनी सब के ज़हनों पर हावी रहने की कोशिश में रहती है, हमारे पास सर्वत जमाल हैं| दुआ करता हूँ के वो अपने चाहने वालों को अपने कलाम से यूँ ही नवाजते रहें| अविनाश वाचस्पति नस कहा, पढ़ा तो जाना कि इनके पास अपनी कोई बात नहीं, ये तो सब हमारी बात ही कहते हैं। यह एक धुन है, फन है, हरेक के बस का नहीं यह जुनून है। 

कवि जितेन्द्र जौहर के मुताबिक सर्वत जमाल की ग़ज़लें अदब की उस श्रेष्ठ ‘जमात’ की ग़ज़लें हैं जो चिंतन को कुरेदती हैं। कई शे’र ऐसे कि मस्तिष्क में काफी देर तक ठहरे रह जाते हैं; यथा-तमांचा सा न जाने क्यों लगा है, वतन वालों को मेरा प्यार लिखना| ऐसी ग़ज़लें अपने समय और समाज से सतत्‌ संवाद स्थापित करते रहने वाला शायर   ही कह सकता है| दानिश  ने लिखा, सरवत जमाल साहब ग़ज़ल सिर्फ ग़ज़ल कहने के लिए नहीं कहते बल्कि हर उस इंसान की बात को कह देने के लिए कहते हैं, जो खुद आसानी से नहीं कह पाता| उनकी ग़ज़लियात में हमेशा हमेशा आमजन का दर्द नुमायाँ रहता है , आक्रोश रहता है , आह्वान रहता है| इन खूबसूरत ग़ज़लों के हवाले से हर हर पढने वाला उनसे मुतासिर हुए बिन न रह सकेगा| बकौल गिरीश पंकज, हर शेर काबिलेदाद हैं| एक और प्रतिभा से परिचित हुआ| ब्लॉगर रवीन्द्र प्रभात ने कहा, सर्बत ज़माल साहब की ग़ज़लों से गुजरना आम जनजीवन के कचोटते दर्द से गुजरना है, उनके हर अलफ़ाज़ में छिपी होती है| हमारे समय की ऐसी छटपटाहट जो जनपथ की पीड़ा को अभिव्यक्त कर सके ! यही अभिव्यक्ति उनकी ग़ज़लों को ऊँचाई देती है और शेर-दर-शेर एक नया मुकाम भी ! वेद व्यथित ने कहा, सर्वत जमाल ने अपना कवि कर्म पूरी शिद्दत से निभाया है| अबनीश सिंह चौहान ने, एक ही आसमान सदियों से, चंद ही खानदान सदियों से, को कोट करते हुए कहा कि यही हो रहा है हमारे देश में| वंशवाद की काली छाया हर जगह अपना अड्डा बनाये हुए है| सभी गज़लें बेमिशाल हैं| सुनील गज्जाणी ने कहा, हर शेर उम्दा है और इनमें कोई कसर निकाल दे, ये मुमकिन नहीं , हर शेर वजनी है और अपने आप में बहुत कुछ बया करता है ! 


बिहारी ब्लॉगर उर्फ़ सलिल  वर्मा की टिप्पणी थी,  ये सारी गज़लें सरकार बनाने और और हुकूमत बदल देने का माद्दा रखने वाली हैं|
पहली गज़ल एक ऐसी बहर में कही गयी है जो बड़ी ‘रेयर’ है| एक इन्किलाब और क्रान्ति की सदा गूंजती है हर शेर में और ‘बढे चलो बहादुरो बढे चलो’ की हमबहर| दूसरी गज़ल में दो शेर एक ऐसे वाकये की ओर इशारा करते हैं जिसकी हकीकत तो हमें मालूम है, लेकिन ज़ाती तौर पर मुझे अखरता है, इसका बार-बार कहा जाना, अब वो चाहे मुनव्वर राना साहब के शेर हों या सरवत जमाल साहब के| तीसरी गज़ल शानदार है और और मौजूदा सूरतेहाल पर एक गहरा तंज है| एक-एक शेर एक तमाचे की तरह लगता है... उन आकाओं को नींद से जगाने की नाकामयाब कोशिश सा करता हुआ| आख़िरी गज़ल छोटी बहर में एक ख़ूबसूरत गज़ल है, मौजूदा दौर की मायूसी की तर्जुमानी करती हुई| कुल मिलाकर बेहतरीन ग़ज़लों का गुलदस्ता... गुलदस्ते के गुलों में कुछ और रंग के गुल होते तो रौनक कुछ और ही होती|

फिर आये मदन मोहन शर्मा| ललकारते हुए, झपटते हुए| पहली गजल के पहले शेर की पहली ही पंक्ति एक साथ न जाने कितने सवालात से रूबरू करा देती है। मिसरा  है, ‘’एक एक जहन पर वही सवाल है, अब देखिये--पहला सवाल बयान की सफाई का, यहाँ बयान साफ नहीं है, पता नहीं लगता कौन सा ‘वही सवाल है’| दूसरी पंक्ति भी इस सवाल को स्पष्ट नहीं करती। दूसरा सवाल लय का, इस मिसरे  में लयात्मकता सिरे से गायब है। तीसरा सवाल बहर का, कम से कम पहले मिसरे से तो बहर की झलक नहीं मिलती। चौथा सवाल पहली और दूसरी पंक्ति का परस्पर सम्बन्ध? दोनों मिसरे  एक-दूसरे का साथ दें तो शेर मुकम्मल हो। पहला मिसरा  तो इन सारे सवालों को लेकर खामोश है। हाँ, दूसरी पंक्ति तक आते-आते बहर कुछ-कुछ साफ होती सी लगती है। गजल के रुक्न हैं- फ़ऊ फ़ऊ फ़ऊ फ़ऊ फ़ऊ फ़ऊ, अर्थात् 12 12 12 12 12 12। परम आदरणीय बिहारी ब्लागर के शब्दों में 'बढे चलो बहादुरों बढे चलो' का हम बहर लेकिन पहला मिसरा  इस बहर में बिलकुल ठीक नहीं बैठता| अब मन समझाने के लिये पहली पंक्ति के प्रारम्भ के ‘एक एक’ को मात्रा गिरा कर ‘इक इक’ मान लें तो मिसरा  तो दूर से देखने पर बहर में दिखाई देता है लेकिन लयात्मकता का सवाल इससे भी हल नहीं होता, हो भी नहीं सकता| वास्तव में तो बहर भी दुरुस्त नहीं होती। पहली पंक्ति को सही बहर में पढ़ने के लिये ‘इकइ कजह नपर वही सवाल है’ इस तरह पढ़ना होगा| फलस्वरूप कुछ शब्द पूरी तरह निरर्थक हो जायेंगे और अरूज़ ऐसा करने की इजाजत किसी भी हाल में नहीं देता। शब्दों में होने वाली ऐसी तोड़-फोड़ ही लयात्मकता को प्रभावित करती है और लयभंग दोष को जन्म देती है। अब इसी शेर को अगर यूं पढ़ लें-‘इक इक (इकिक) जहन पे फिर यही सवाल है,लहू लहू में आज क्यों उबाल है।’ तो इस तरह बयान में सफाई भी आती है, दूसरी पंक्ति पहली पंक्ति का समर्थन भी करती है, लय भी स्थापित होती है, शेर बहर से खारिज भी नहीं होता, साथ ही साथ पहली पंक्ति से ही बहर का निर्धारण करने में आसानी होती है। अब जरा दूसरा शेर देखें-इमारतों में बसने वाले बस गए, मगर वो जिसके हाथ में कुदाल है| यहाँ भी शेर का पहला मिसरा  दूसरे का साथ नहीं दे रहा| पहली पंक्ति में 'बसने वाले बस गए' बहु वचन है.मगर दूसरी वाली पंक्ति में 'वो जिसके हाथ में कुदाल है' एक वचन ही रह गया| यह वचन भिन्नता भी दोष उत्पन्न कर रही है| इसी ग़ज़ल के आखिरी शेर पर आते हैं-'तुम्हारी कोशिशें कुछ और थीं मगर, हम आदमी हैं ये भी एक कमाल है| कमाल तो कहीं नहीं हुआ पर इस कमाल के चक्कर में पूरा शेर ही अपने मकसद से गया| एक दूसरी ग़ज़ल के शेर हैं-'कोई बोले अगर तो क्या बोले, बंद है सारे कान सदियों से| और 'कारनामे नजर नहीं आते,उलटे सीधे बयान सदियों से| यहाँ रदीफ़ का अंतिम वर्ण 'ए' हुआ. अरूज़ के मुताबिक शेर के पहले मिसरे  का अन्त्य वर्ण (मात्रा) और रदीफ़ का अन्त्य वर्ण (मात्रा) एक नहीं होना चाहिए| अपरिहार्य कारणों से एकाध शेर में ऐसा करने की छूट है मगर यही छूट लगातार बार-बार ली जाये तो इसे दोष की संज्ञा दी जाती है| अन्यत्र भी निरंतर निराशाजनक अभिव्यक्तियों की पुनरावृत्ति नकारात्मक प्रभाव ही छोडती है| ऐसा लगता है जैसे आम के बाग का सपना दिखा कर किसी को करील के जंगलों में डाल दिया जाय|  


सलिल वर्मा जवाब देने की कोशिश करते हैं, मदन मोहन जी के प्रति नम्र प्रस्तुति, १. गज़ल वैसे तो मुक्तक शैली की विधा मानी जाती है, दोहे की तरह| हर शेर मुख्तलिफ फ़िक्र पेश करता हुआ लेकिन हाल में गज़लें एक ही फिक्र के अशआर से सजी देखी जाने लगी है| लिहाजा इस तरह की ग़ज़लों को सिर्फ मिसरे से जज नहीं किया जा सकता कि शायर का बयान क्या है| यहाँ भी शायर का कहना है कि हर ज़हन में एक ही सवाल है और हर शख्स के खून में उबाल है| वजूहात आगे के अशार में खुलकर सामने आती हैं| २. मैं भी अभी भी अपने बयान पर कायम हूँ कि इसमें लयात्मकता है और बिलकुल वही जो बढे चलो बहादुरों के पढ़ने में आती है! दोनों अलग-अलग ग्रामर से आते  हैं, इसलिए बुनियादी फर्क दिखता है मगर जहां तक लयात्मकता का सवाल है, शेर लय में है| ३. शेर को यूं पढ़ें तो बहर भी मिल जायेगी, एक-एक/ज़हन पर/वही सवाल है, लहू-लहू में/आज फिर/ उबाल है! ४. कितनी ख़ूबसूरत बात कही है शायर ने कि इमारतों में बसने वाले तो बस गए मगर वो जो मजदूर है (हाथ में कुदाल लिए इमारत तामीर करने वाला) उसका क्या? और ज़हन साथ दे तो खुद अंदर से जवाब आता है कि वो फुटपाथ पर सोने को मजबूर है! मानी ज़रूरी नहीं कि हर वक्त नुमायाँ हों, कभी-कभी पढ़ने वाले की सोच पर भी छोड़ दिया जाता है और यहाँ मज़दूर एक सिम्बल है, पूरी मजदूर कौम  का जो मजबूर है, फुटपाथ पर सोने को| इसलिए यहाँ एकवचन और बहुवचन का सवाल ही नहीं उठता| ५. और मकते में तो शायर ने ज़बरदस्त तंज किया है मौजूदा रहनुमाओं पर| कहते हैं कि उनकी कोशिश तो ये थी कि हमें जानवर बनाकर जैसे चाहेंगे हुकूमत करेंगे और हम जुबान बंद किये सहते रहेंगे सब चुपचाप लेकिन कमाल तो ये है कि हम इंसान साबित हुए और इतनी कोशिशों के बावजूद भी इंसान बने हैं| और जनाब आज के दौर में इतनी संजीदगी बचाकर रख लेना कमाल ही है| इससे भी ज़्यादा बड़ा कमाल जनाब अदम गोंडवी साहब का है| तेज़ाब लिए घूमते हैं ज़हन में, मगर हुकूमत की मैदे की लोई से गुरेज करते हैं|
 

वे आगे कहते हैं , कविता में बात शब्दों के माध्यम से होनी चाहिए, कोई चिन्ह लगाकर नहीं.इमारतों में बसने वाले बस गए, मगर वो जिसके हाथ में कुदाल है?  ये शेर अगर केवल पढने के लिए ही है तो प्रश्नवाचक चिन्ह अर्थ को थोडा बहुत साफ करने में मदद करता है लेकिन इस खूबसूरत ग़ज़ल को अगर कोई संगीत बद्ध करना चाहे तो अपने गायन में इस प्रश्न चिन्ह का उपयोग किस तरह करे? कोई सुनने वाला इस सवालिया निशान को कैसे देख पायेगा? सुनाने वाला इस निशान को किस तरह दिखायेगा?
हाल में जितने भी ग़ज़लों के संकलन प्रकाशित हुए हैं, उनमें तो किसी भी तरह के विराम चिह्न देने का प्रचलन नहीं है. और गज़लें “कही” जाती हैं और “सुनी” जाती हैं, लिखी या पढ़ी नहीं जातीं|  ग़ालिब की गज़ल “दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है/आखिर इस दर्द की दवा क्या है” कई लोगों ने गाई है| इस बात से मैं कतई सहमत नहीं कि कविता में बात चिह्न लगाकर नहीं होनी चाहिए| बात प्रश्न चिह्न की हो रही है तो पेश हैं चंद अशार मुख्तलिफ शायरों के: जाता है यार तेग-ब-कफ गैर की तरफ, ऐ कुश्त-ए-सितम तेरी गैरत को क्या हुआ? (मीर)| पूछकर अपनी निगाहों से बता दे मुझको, मेरी रातों के मुक़द्दर में सहर है कि नहीं? (साहिर)| परीशां हो गए शीराज़ा -ए-औराक-ए-इस्लामी, चलेंगी तुंद बादे कुफ्र की यह आंधियां कब तक? (कैफी)| सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है, दिल पे रखके हाथ कहिये देश क्या आज़ाद है? (अदम गोंडवी)| एक-एक/ज़हन पर/वही सवाल है,
लहू-लहू में/आज फिर/ उबाल है| 


अर्चना तिवारी ने फरमाया, बहुत दिनों से मुझे साखी के मंच पर श्री सर्वत जमाल जी की ग़ज़लों की प्रतीक्षा थी जो अब समाप्त हुई | यहाँ का वातावरण तो बहुत रोमांचक प्रतीत हो रहा है| एक ओर मेरे पसंदीदा शायर की दहाड़ती-ललकारती गज़लें हैं और दूसरी ओर उतनी ही चुनौती देती स्वस्थ्य समालोचनात्मक टिप्पणियां हैं | हम जैसे नवीन रचनाकारों के लिए ये मंच सदैव से मार्गदर्शक साबित हुआ है |सारे ब्लॉग जगत में केवल यही एकमात्र ऐसा मंच है जहाँ रचनाकारों की रचनाएँ अग्नि में तप कर कुंदन बनती हैं|श्री सुभाष राय जी का बहुत बहुत आभार इस मंच पर इतनी आदर्शवादी रचनाओं और रचनाकारों को प्रस्तुत करने का| श्रीमान मदन मोहन जी, मुझे ग़ज़ल के व्याकरण का ज्ञान तो नहीं है परन्तु कुछ कहने की हिम्मत कर रही हूँ| बात चीत के दौरान हम किसी चिन्ह का प्रयोग अवश्य नहीं करते परन्तु स्वर के माध्यम से हम अपने विचारों को व्यंग, क्रोध ,स्नेह ,आदर के भाव से प्रदर्शित करते हैं |  मदन मोहन शर्मा ने कहा, अपनी पिछली टिप्पणी में मुझसे भी एक शब्द की कंजूसी हुई और शायद यही कारण रहा कि मैं अपनी बात स्पष्ट नहीं कर पाया. मैंने लिखा 'कविता में बात शब्दों के माध्यम से होनी चाहिए, कोई चिन्ह लगाकर नहीं.' जबकि मुझे लिखना चाहिए था 'कविता में बात शब्दों के माध्यम से होनी चाहिए, केवल कोई चिन्ह लगाकर नहीं| परम आदरणीय बिहारी ब्लॉगर  द्वारा बताये गए हर शेर के अध्ययन से भी यही बात निकाल कर आती है कि हर शेर में प्रश्न वाचक चिन्ह से पहले कही न कहीं एक प्रश्न वाचक शब्द भी आवश्यक रूप से मौजूद है. देखिये- (१)ऐ कुश्त-ए-सितम तेरी गैरत को क्या हुआ? (मीर)| (२)पूछकर अपनी निगाहों से बता दे मुझको, मेरी रातों के मुक़द्दर में सहर है कि नहीं? (साहिर)| (3)परीशां हो गए शीराज़ा-ए-औराक-ए-इस्लामी, चलेंगी तुंद बादे कुफ्र की यह आंधियां कब तक? (कैफी) मगर वो जिसके हाथ में कुदाल है? यहाँ कोई प्रश्न वाचक शब्द प्रयुक्त नहीं हुआ|  परम आदरणीय बिहारी ब्लॉगर के इन विचारों से मैं भी सहमत हूँ 'हाल में जितने भी ग़ज़लों के संकलन प्रकाशित हुए हैं, उनमें तो किसी भी तरह के विराम चिह्न देने का प्रचलन नहीं है. और गज़लें “कही” जाती हैं और “सुनी” जाती हैं, लिखी या पढ़ी नहीं जातीं. लिहाजा किसी सुनने में तो भावों का सम्प्रेषण गज़ल पढने वाले की अभिव्यक्ति पर निर्भर करता है, न कि विराम चिह्न पर.' इस प्रकार प्रश्न चिन्ह तो स्वयं ही अप्रासंगिक हो गया, फिर अगर कोई प्रश्न वाचक शब्द बदले में नहीं आयेगा तो पाठक या श्रोता का मस्तिष्क दुविधा में पड़ेगा ही| अर्चना जी से भी मेरी यही प्रार्थना है की वे मेरे निवेदन को फिर से देखने की कृपा करें फिर भी अगर मेरी बात से सहमत न हो पायें तो मैं अपनी भूल के लिए  क्षमा प्रार्थी हूँ| 


आचार्य संजीव वर्मा सलिल ने कहा, भाषा के विविधांगों में शब्द, चिन्ह और उच्चारण सबका अपना-अपना महत्त्व है| विराम चिन्हों को नकारना मुझे उचित नहीं लगता| विराम चिन्ह न होने पर प्रश्नसूचक शब्द ही रचनाकार का मंतव्य तथा भाव स्पष्ट कर पाते हैं जबकि विराम चिन्ह हों तो बिना प्रश्नवाचक शब्द के भी भाव स्पष्ट हो जाता है| पाठक या गायक प्रश्नवाचक शब्द या प्रश्नचिन्ह या दोनों होने पर रचनाकार के मंतव्य को समझकर तदनुसार उच्चारण कर भाव संप्रेषित कर सकता है| यह मुद्दा बहस का कम, अनुभव का अधिक है| रचनाकार स्वयं निश्चित करता है कि उसे कहाँ क्या उपयोग करना है ताकि उसका भाव और कथ्य पाठक/श्रोता तक पहुँच सके| प्रस्तुत रचनाएँ सामयिक हैं. इनमें जमीनी सचाई का एक पहलू है किन्तु इसके अलावा भी बहुत कुछ है| रचनाकार और पाठक/श्रोता के मध्य इनसे सेतु बनता है किन्तु समीक्षक को सकल परिदृश्य को देखकर मूल्यांकन करना होता है| मदन मोहन शर्मा पलट कर आये, रचनाकार अगर स्वयं निश्चित कर सके कि उसे कहाँ क्या उपयोग करना है तो निश्चय ही यह बात अच्छी रचना और जागरूक रचनाकार के हित में होगी| मैं स्वयं इस विचारधारा का मानने वाला हूँ, परन्तु ग़ज़ल के अपने कुछ प्रतिबन्ध, अपने कुछ नियम हैं जो रचनाकार को छूट लेने की इजाजत नहीं देते| 

शायर सर्वत एम जमाल ने अपना पक्ष रखने की कोशिश की| मुझे इल्म ही नहीं था कि मेरे इतने चाहने वाले मौजूद हैं| मैं इन मुहब्बतों के लिए, राजेश उत्साही, हरकीरत हीर, सुमन, तिलक राज कपूर,नीरज गोस्वामी,  अविनाश वाचस्पति, जितेन्द्र जौहर, दानिश, रवीन्द्र प्रभात,वेद व्यथित, अबनीश सिंह चौहान, सुनील गज्जाणी, चला बिहारी...(सलिल), अर्चना तिवारी, संजीव वर्मा सलिल और मदन मोहन अरविन्द का शुक्रगुज़ार हूँ लेकिन एक निवेदन भी है- "अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी बहल जाए, अब इतना भी तो न चाहो कि दम निकल जाए| भाई, इतना प्यार समेट कर ले कैसे जाऊँगा| मदन मोहन अरविन्द जी, यह ग़ज़ल है| जब तक इस में महारत न हो, प्रश्न पूछे जाने चाहिए न कि आलोचना| जिस वजन को आप फऊ फऊ फऊ.....बता रहे हैं, वह अस्ल में मुफाइलुन मुफाइलुन मुफाइलुन है| जिस मिसरे को लेकर आप द्विविधा में हैं, एक एक ज़हन पर वही सवाल है, अगर वजन आपके ज़हन में होता तो उसे 'इकेक ज़हन पर वही सवाल है' पढ़ लेते| नाहक उसे ख़ारिज करार देने में इतनी ऊर्जा खर्च दी फिर मतले का अधूरापन भी सालता रहा आपको| ग़ज़ल शास्त्र का अध्ययन किया होता तो कतअ बंद अशआर के बारे में भी ज्ञान होता| मतला और पहला शेर कतअ बंद हैं| शायरी में ऐसे प्रयोग क़ुतुब कुली शाह-वाली दकनी के जमाने से चले आ रहे हैं, मीर-ग़ालिब तक ने इनकी पैरवी की है, अगर मैंने भी उनके नक्शे-कदम पर चलने की कोशिश की तो क्या गुनाह किया? रदीफ के अंत में 'ए' है और ऊपर के मिसरे में भी अंत में 'ए' आ रहा है, यह आपने तकाबुल-ए-रदीफ बताया जो एक दोष है| क़ुतुब कुली शाह से लेकर आज के मुज़फ्फर हनफी तक को आगाह कीजिए, यह कानून आपने किसी बहुत पुरानी   किताब से उद्धृत किया है जो अब कहीं अमल में नहीं है| आप की खिदमत में एक शेर पेश है-"दुनिया पहुँच रही है कहाँ से कहाँ से कहाँ अमीर, तुम हो शरीक-ए-महफिल-ए-शेर-ओ-सुखन अभी| आप साहित्यकार हैं, गज़लों से जुड़े हैं और मुझसे उम्र में दो वर्ष छोटे भी, इस नाते एक सलाह अवश्य देना चाहूँगा...अध्ययन कीजिए, ग़ज़ल तुकबंदी मात्र नहीं है, बहुत खून जलाती है, बहुत मेहनत मांगती है| मैं अगर आप से कह रहा हूँ तो यह मेरा अपना अनुभव है, मैंने खुद ऐसा किया है, ग़ज़लों में प्रयोग किए हैं लेकिन ऐसा तभी सम्भव हुआ, जब इस विधा   को पूरी तरह समझ पाने में कुछ सफलता पा सका| आलोचना के लिए विस्तृत अध्ययन आवश्यक है वरना स्थिति हास्यास्पद हो जाती है| 


मदन मोहन शर्मा बोले, अधिक विस्तार में न जाकर केवल एक ही निवेदन पुनः करना चाहूँगा कि कुछ हिदायतों के अतिरिक्त कोई संतोष जनक समाधान उपरोक्त टिप्पणियों से नहीं मिलता| प्रश्न जैसे पहले थे अब भी हैं| बीच  में बेनामी ने दखल दिया, मुझे लगता है जनाब सर्वत जमाल की टिप्पणियों में घमंड अधिक है, सार कम| यह सही है कि 'एक-एक जहन' वाले मिसरे  को ठीक से समझने में जोर पड़ता है, फिर भी रूकावट आती है| सवालिया निशान वाली बात भी पूरी तरह सही है| पुरानी किताबों के कानून से आपको आपत्ति क्यों है| जिन बड़े शायरों के नाम आप ले रहे हैं, सोच कर देखिये आप उनके पासंग बराबर भी हैं क्या? और गलती सिर्फ गलती होती है, चाहे छोटा करे या बड़ा| ग़ज़ल कहते हैं तो सफाई से कहनी ही होगी, सौ बातें बनाने से काम  नहीं चलने वाला|

प्राण शर्मा जी ने कहा, सर्वत जी अच्छे शायर हैं, उनकी शायरी में नयापन है| उनका कहना सही है कि गजल बहुत खून जलती है| इस बारे में मैंने कभी कहा था, सोच की भट्ठी में सौ-सौ बार दहता है, तब कहीं जाकर कोई इक शेर कहता है| मदन मोहन शर्मा ने कहा, सोच रहा था, कुछ कहूँ या चुप रहूँ, इसी कशमकश में एक शेर याद आया-'जब लगेगी आशियाँ जल जायगा, आग को बेशक हवा कह दीजिये| अपनी मर्जी से हम जो चाहे कहते रहें, सच की तासीर नहीं बदलने वाली| बेनामी के आगमन हुआ, गली कूचों में रह जाती हैं घुट कर, अब अफवाहें सरे बाज़ार लिखना| ये क्या? 'लिखना?', अफवाहें फैलाना और अफवाहें उडाना तो सुना था, लिखना पहली बार देखा है| संजीव गौतम ने समापन किया, जी खुश हो गया सर्वत जी की गजलें पढ़कर, हमेशा के तरह सुपर फाइन| हरकीरत हीर ने भी प्रशंशा की| 


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नसीम साकेती की कवितायेँ नववर्ष पर ३१ दिसंबर के आधी रात को  

शनिवार, 24 सितंबर 2011

सर्वत जमाल की गजलें

सर्वत जमाल पानी में आग बोने वाले शायर हैं| जिनका भी गजलों की दुनिया से साबका है, वे उन्हें अच्छी तरह जानते हैं| जिन्दगी कभी-कभी बहुत कठिन हो जाती है, आदमी घुटने टेकने के हालात में पहुँच जाता है लेकिन जिसने हमेशा ऐसी कठिन जिन्दगी अपने लिए चुन ली हो या जिसे परिस्थितियों ने झंझावातों में धकेल दिया हो फिर भी जो पराजय के ख्याल के बिना लड़ रहा हो, उसका नाम है सर्वत जमाल| गोरखपुर में जन्मे इस शायर ने अपनी जिन्दगी की शुरुआत पत्रकारिता से की पर वह रास्ता लम्बा नहीं चल सका| आजकल वे जिन्दगी चलाने के लिए परेशान हाल लोगों को जिन्दगी को समझने, स्वस्थ रहने  और कठिनाइयों का जमकर मुकाबला करने के  सलाह-मशवरे देने का काम करते हैं| उनकी कुछ गजलें पेश हैं....

1.
एक एक जहन पर वही सवाल है

लहू लहू में आज फिर उबाल है

इमारतों में बसने वाले बस गए 
मगर वो जिसके हाथ में कुदाल है ?

उजाले बाँटने की धुन तो आजकल
थकन से चूर चूर है, निढाल है 

तरक्कियां तुम्हारे पास हैं तो हैं 
हमारे पास भूख है, अकाल है 

कलम का सौदा कीजिये, न चूकिए 
सुना है कीमतों में फिर उछाल है 

गरीब मिट गये तो ठीक होगा सब 
अमीरी इस विचार पर निहाल है 

तुम्हारी कोशिशें कुछ और थीं, मगर
हम आदमी हैं, यह भी इक कमाल है

                          2.
कभी आका  कभी सरकार लिखना
हमें भी आ गया किरदार लिखना

ये मजबूरी है या व्यापार , लिखना

सियासी जश्न को त्यौहार लिखना

हमारे दिन गुज़र जाते हैं लेकिन
तुम्हें कैसी लगी दीवार, लिखना

गली कूचों में रह जाती हैं घुट कर
अब अफवाहें सरे बाज़ार लिखना

तमांचा सा न जाने क्यों लगा है
वतन वालों को मेरा प्यार लिखना

ये जीवन है कि बचपन की पढाई
एक एक गलती पे सौ सौ बार लिखना

कुछ इक उनकी नज़र में हों तो जायज़
मगर हर शख्स को गद्दार लिखना ?


3.
एक ही आसमान सदियों से

चंद ही खानदान सदियों से

धर्म, कानून और तकरीरें 
चल रही है दुकान सदियों से 

काफिले आज तक पड़ाव में हैं
इतनी लम्बी थकान, सदियों से !

सच, शराफत, लिहाज़, पाबंदी 
है न सांसत में जान सदियों से 

कोई बोले अगर तो क्या बोले 
बंद हैं सारे कान सदियों से 

कारनामे नजर नहीं आते 
उल्टे सीधे बयान सदियों से 

फायदा देखिये न दांतों का 
क़ैद में है जबान सदियों से 

झूठ, अफवाहें हर तरफ सर्वत 
भर रहे हैं उडान सदियों से
4.
हवा पर भरोसा रहा 
बहुत सख्त धोखा रहा 

जो बेपर के थे, बस गए 

परिंदा भटकता रहा 

कसौटी बदल दी गयी 
खरा फिर भी खोटा रहा 

कई सच तो सड़ भी गए 
मगर झूठ बिकता रहा 

मिटे सीना ताने हुए 
जो घुटनों के बल था, रहा 

कदम मैं भी चूमा करूं 
ये कोशिश तो की बारहा

चला था मैं ईमान पर 
कई रोज़ फाका रहा

संपर्क --05224105763

शनिवार, 3 सितंबर 2011

पाँच रंगों की रंगोली


साखी पर जितेन्द्र जौहर के गीत कुछ आलोचनाओं के साथ आम तौर पर सराहे गये| विमर्श की गंभीरता दिखाई पडी| कविता की खासी समझ रखने वाले सलिल वर्मा उर्फ़ बिहारी ब्लॉगर की बात गौर करने लायक रही| उन्होंने कहा, आज ब्लॉग लेखन में या अन्यत्र भी कविता लिखना इतना सहज और सामान्य समझा जाने लगा है कि हर व्यक्ति कविताई करता दिखाई देता है| उन्हें ऐसी कविता लिखते समय तनिक भी भान नहीं होता कि मूर्ख उन जगहों पर धड़ल्ले  से प्रवेश कर जाते हैं, जहां पाँव धरते हुए देवदूत भी भयभीत होते हैं| जितेन्द्र  जी की कवितायेँ जब-जब पढ़ी हैं, तब-तब यह प्रतीत हुआ है कि इनकी कविताओं में इनका अनुभव और ज्ञान दोनों परिलक्षित होता है| एक और विशेषता यह दिखाई देती है कि भाषा के विद्यार्थी होने के कारण अंगरेजी एवं हिन्दी दोनों भाषाओं पर समान प्रभाव दिखाई देता है| ऐसे में शब्दों का चयन, भावों का सम्प्रेषण, विषय का चयन और शब्दों की मितव्ययिता देखी जा सकती है| 

साखी के अंक में उनकी पाँच कविताओं का संकलन स्वागत योग्य है| जब मैंने पहली  कविता पढ़ना प्रारम्भ किया तो लगा कि अपने ही गाँव में बैठा हूँ, आस पड़ोस की कहानी सुन देख रहा हूँ, अपनी माता को मुझे विदा करते हुए और अंचरा के कोर से आँखें पोंछते देख रहा हूँ| गाँव से शहर की ओर पलायन करते लोगों के साथ परिवार मनोविज्ञान का जीवंत चित्रण देखने को मिलता है| बाद की दोनों कविताओं में अम्मा की व्यथा और बंटवारे का दुःख मन को झकझोर गया किन्तु साथ ही लगा कि तीनों कविताओं की पृष्ठभूमि और परिवेश एक से हैं और व्यथा भी| जौहर जी की रचनाओं में इतनी विविधता है कि उनकी पाँच रचनाएँ पाँच रंगों की रंगोली प्रस्तुत कर सकती हैं| हमारे नपुंसक दौर के वर्णन में जिस ओज का परिचय जौहर जी ने दिया है, वह उनके ही नहीं इस दौर की हर संवेदनशील मन की सोच है| इस कविता में जिन शब्दों का चयन किया गया है वे शब्द उस आक्रोश को व्यक्त करने में सफल रहे हैं. और इतने उचित हैं कि उनके स्थानापन्न शब्दों की कल्पना भी उस आक्रोश को कम करती सी लगती है|
अंतिम रचना एक व्यंग्य रचना है इसलिए उसे हलके फुल्के अंदाज़ की ही रचना कहना उचित होगा| कुल मिलाकर जितेन्द्र जौहर साहब का रचना संसार मुग्ध करता है|
 

कवि और आलोचक राजेश  उत्साही जितेन्द्र की रचनाओं की जी भर तारीफ से संभवत: और लेकिन के साथ सहमत हैं| वे कहते हैं, कई बार कुछ बातें और कुछ ऐसे पहलू भी होते हैं जो हमें प्रत्यक्ष नजर नहीं आते। इन कविताओं में भी ऐसा कुछ है। यह भी बहुत संभव है कि कई पाठकों ने उन्हें देखा भी हो, पर साथ ही नजरअंदाज कर दिया हो। मैं अभिव्यक्ति के इस खतरे को जानते हुए भी अपनी बात रख रहा हूं। मेरी इस टिप्पणी को सिक्के के दूसरे पहलू के रूप में ही लिया जाए। सारी ही कविताएं जो गीत की तर्ज पर लिखी गई हैं, इन्हें निश्चित तौर पर व्यापक जनसमूह के सामने मंच से पढ़ा जाएगा तो वन्स मोर, वन्स मोर की ध्वनि सुनाई देगी। इस कसौटी पर वे खरी उतरती हैं। लेकिन यहीं इनमें एक गंभीर बात छिपी है। पहली तीन कविताएं आंसू बहाऊ फिल्मों की स्क्रिप्ट लगती हैं। 

पहली कविता हिन्दुस्तान के किसी ऐसे गांव का वर्णन लगता है जो शहर को लेकर अति पूर्वाग्रही है। ऐसे गांव शायद फिल्मों में ही नजर आते हैं। दूसरी कविता अम्मा की दुर्दशा जबरन संवदेना से भर देती है। लेकिन जरा रुककर आप इसे पढ़ें। यह घोर स्त्री विरोधी कविता है। स्त्री को स्त्री के खिलाफ खड़ी करती कविता। वही बहू और सास के टाइप्ड स्टीरियो। जीवन का सच यही भर नहीं है याकि इतना सफेद और काला नहीं है कि आप किसी भी एक पक्ष में खड़े हो जाएं। तीसरी कविता बंटवारा पढ़ते हुए फिर एक बार लि‍जलिजी संवदेना उभर आती है। चौथी कविता में शब्दों से चमत्कार पैदा करने की कोशिश है जिसमें कवि सफल भी हुआ है। पर बात जैसे कुछ बनती नहीं है। अंतिम कविता चुनावी मौसम भी चुनाव के नारों की तरह ही लगती है। इन कविताओं में मूल स्वर निराशा ही पकड़ में आता है। पांच कविताओं में से एक भी ऐसी नहीं है जो जीवन के प्रति किसी तरह की आशा जगाती हो। कम से कम कवि अपनी इन कविताओं में तो कोई नई जमीन नहीं खोज पा रहा है। 

अरुण चन्द्र राय  कहते हैं, जौहर जी की पांचो कवितायेँ पढ़ ली हैं| कुछ कवितायेँ कई बार पढ़ी हैं| लम्बी दूरी है, अम्मा की दुर्दशा और बंटवारा एक मिजाज़ और विषय की कवितायेँ हैं और हमारा दौर और चुनावी मौसम अलग चित्र प्रस्तुत करते हैं| इन दिनों अच्छी कविता का अर्थ गूढ़ और उलझी हुई, जटिल कविता से होता है| इस रुझान से अलग ये पांचो कवितायेँ सरल हैं, सहज हैं. स्पष्ट हैं, बड़ी बातें नहीं, आम बात कह रही हैं| हिंदी कविता आज कई खेमो में खड़ी है| कुछ कविता इंडिया में और इंडिया के लिए लिखी जा रही हैं, कुछ कवितायेँ भारत के लिए लिखी जा रही हैं|  इस वर्चुअल स्पेस में भारत की कविता, ठेठ छोटे शहर और गाँव से लिखी गई और गाँव के लिए लिखी गई कवितायेँ है| ये पांचो कवितायें उसी भारत की हैं| माएं आज भी लम्बी दूरी के लिए, ठेठ गरीबी में भी लड्डू बाँध देती हैं, भले बेसन और चीनी उधार की हो| कविता में गाँव की महक और संवेदना यत्र तत्र सर्वत्र है| पहली कविता मुझे व्यक्तिगत तौर पर अधिक महत्वपूर्ण लग रही है क्योंकि अभी आंकड़े  आये हैं कि देश में शहरीकरण बढ़ा है| आज़ादी के बाद से ही शहरों के विकेंद्रीकरण की बात चल रही है लेकिन बहुत लाभ नहीं मिला है| गाँव से पलायन जारी है| यह लम्बी दूरी महज भौतिक दूरी नहीं है बल्कि दूरी सामाजिक, संस्कृति और अवसर की उपलब्धता की है|

ब्लाग की दुनिया के महारथी अविनाश वाचस्पति कहते हैं, कविता का यही चित्र सच्‍चा है। सच्‍ची बात कहने का अपना आनंद है। इन कविताओं में जो महसूसन है, वह सबकी है। सब जानते हैं। पर करते वही हैं जो कविता में कहा गया है। इसे बदलना संभव नहीं है। कविता चाहे लंबी हैं पर एक बार पढ़ने में ही पूरा आनंद देती हैं। बार बार पढ़ने का मन करता है। सच सच ही रहता है। सच सच ही कहता है। यही जौहर है इन कविताओं का। कवि ने कविताओं का सृजन कर नामानुरूप सुख दिया है।


लेखक और व्यंग्यकार रवीन्द्र प्रभात कहते हैं, जौहर की रचनाएँ पढ़ने के बाद गहरी संवेदनाओं को अपने अंतर्मन में उतारकर बार-बार मानव जीवन की व्यथा को महसूस करते हुए नए सृजन को तलाशने की इच्छा बलवती होती  है, सचमुच यह इन रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता है ...बहुत सुन्दर,बहुत सारगर्भित और बहुत ही उम्दा रचनाएँ ! कवयित्री हरकीरत हीर कहती हैं, जितेन्द्र जी के ये गीत सीधे दिल में उतरते हैं| पारिवारिक रिश्तों की मार्मिकता को कितनी गहराई से उतारा है उनकी कलम ने | ये गीत महज़ गीत नहीं हैं पारिवारिक रिश्तों में हो रहे विघटन को भी दर्शा रहे हैं, हमें भविष्य के लिए सचेत भी कर रहे हैं| सीधी सरल भाषा में गाँव का परिवेश बाँध कर रख दिया है उन्होंने| शब्दों में भी गाँव की भीनी-भीनी सी मिठास है, जो गीत को बार-बार पढने का आग्रह करती है|  अश्विनी राय प्रखर कहते हैं, जौहर के गीतों में मिठास, निश्छल प्रेम, करुणा, सम्मान तथा सुन्दर शब्दों का धारा प्रवाह देखते ही बनता है|  माँ बाप की अपने बेटे के प्रति ममता अत्यन्त प्रभावी ढंग से मुखरित हुई है| अम्मा की दुर्दशा का जो सजीव चित्रण किया है, वह आज घर घर की कहानी है| ‘बंटवारा’ में एक और कड़वे सच को अनूठे गीत के माध्यम से प्रस्तुत किया है| जीवन में जिस तीव्रता से सामाजिक मूल्यों में गिरावट आई है, उसकी झांकी  इन गीतों में स्पष्ट दिखाई देती है| गीतकार ने जिस उद्देश्य से इन गीतों की रचना की है, वह सर्वजन हिताय एवं सर्वजन सुखाय होने के साथ साथ मनोरंजक एवं मनमोहक भी है|


कवि और गजलगो प्राण शर्मा लिखते हैं, कविवर जितेन्द्र की कवितायें मैं बड़े मनोयोग से पढ़ गया| उत्कृष्ट भावाभिव्यक्ति ने मन को छू लिया| डॉ महाराज सिंह परिहार कहते हैं, जितेन्‍द्र जौहर की कविताओं में मानवीय संवेदना के साथ ही पारिवारिक आत्‍मीयता है। बदलते परिवेश में जबकि आदमी आत्‍मकेन्द्रित हो गया है, इस तरह की अनुभूतिपरक  रचनाएं कविता के जीवंत होने का प्रमाण हैं| अलबेला खत्री के अनुसार मैंने कविता पढ़नी  शुरू की, गीत की रौ में मैं यों बहता गया कि जितेन्द्र जी बहुत पीछे छूट गये और उनके गीत बहुत आगे निकल गये| इस अनुपम काव्य-यात्रा को मैं लम्बे समय तक अपने भीतर महसूसता रहूँगा| देवेन्द्र पाण्डेय को जौहर की कवितायें पढ़कर प्रेमचंद की कहानियाँ याद हो आईं। सुशील बाकलीवाल  कहते हैं, जीवन में संयुक्त परिवार की कठोर वास्तविकताओं को रेखांकित करती इन सुन्दर कविताओं के वाचन का अवसर उपलब्ध करवाने हेतु साधुवाद| लेखक जाकिर अली रजनीश कहते हैं, जितेन्‍द्र जौहर उन रचनाकारों में हैं, जो दिल से लिखते हैं और जो लोग दिल से लिखते हैं, वे सीधे पाठकों के दिल में उतर जाते हैं। दिगंबर नासवा लिखते हैं, सभी रचनाये  ज़मीन से जुड़े सत्य को लक्षित कर के लिखी गयी हैं|


भोजपुरी के सशक्त रचनाकार मनोज भावुक के अनुसार सरल, सहज लेकिन सारगर्भित व मानवीय संवेदनाओं से लबालब ये कवितायेँ सीधे दिल को छूती हैं और कुछ सोचने - समझने को विवश करती हैं| राजेश जी क्षमा करेंगे, स्त्री-स्त्री के बीच खाई बढाने जैसी कोई बात है ही नहीं.....यथार्थ का बयान है यह| सत्य को उपेक्षित कर एक काल्पनिक सुखद चित्र खींचने से अधिक प्रेरक है वास्तविक दुखद चित्र खींचना| कल्पना हमें भटकाती है, वास्तविकता चिंतन के लिए प्रेरित करती है,  इसलिए रचना धर्मिता का उद्देश्य तो इसी में पूर्ण हो पाता है| अंतिम रचना में भी फ़िल्मी जैसा कुछ नहीं लगा मुझे| सरल सहज रचनाओं के लिए जीतेन्द्र जी को साधुवाद ! कन्नौजी बोली के आंचलिक शब्दों की मिठास और आंचलिक शब्दों को संरक्षित करने के अनुकरणीय प्रयास के लिए जौहर जी को विशेष बधाई| हिन्दी की समृद्धि तो आंचलिक अगढ़ शब्दों से ही है| हिन्दी के प्राण बसते हैं इनमें| कन्नौजी बोली की ग्राम्य सरलता आकर्षक है| 


उमेश महादोषी लिखते हैं, जितेन्द्र जौहर जी को इस रूप में देखकर कुछ अलग ही अनुभूति हुई। गांव का वह परिदृश्य भी जीवन का हिस्सा रहा है और वे परिस्थितियां भी, जिन्हें पहले तीनो गीतों में शब्द-चित्रों में बांधा है। नज़दीक से देखी-भोगी यह अनुभूति संवेदना को भी झंकृत कर गई और स्मृतियों को भी। समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है। गांव अब गांव नहीं रह गये हैं, उनमें भी शहर की आत्मा बस गई है और शहर आज हमारी भौतिक जरूरत बन गये हैं। पर आत्मिक जरूरतें पूरी नहीं हो पाती, सो मन उस सबको याद करता ही है, जो भले नहीं रहा, पर हमारे अन्तर्मन में कौंधता जरूर है। पहला गीत पढ़कर करीब पच्चीस वर्ष पूर्व पढ़े एक गीत की अनुभूति भी मेरी स्मृति में ताजा हो आई है, सम्भवत डा. अश्वघोष जी का गीत है- ‘बहुत दिनों के बाद मिला है, अम्मां का खत गांव से’समीर लाल उर्फ़ उड़नतश्तरी, अवनीश चौहान, वेद व्यथित, नीरज गोस्वामी, धर्मेन्द्र सिंह सज्जन, मनोज कुमार , रामेश्वर काम्बोज, बी एस पाबला, ज्ञान चन्द्र मर्मज्ञ , डॉ श्याम गुप्ता, गीता पंडित, गिरिजा कुलश्रेष्ठ , कौशलेन्द्र, पंकज सारस्वत ने भी इन गीतों को सराहा| 


रचनाकार जितेन्द्र जौहर ने अपना पक्ष रखते हुए कहा, सभी टिप्पणियाँ/अभिमत किसी-न-किसी रूप में महत्त्वपूर्ण हैं; इनमें जो भी मुझे विशेष रूप से ग्राह्य लग रहा है, उसे मैं आभार सहित सिर-माथे स्वीकार करता हूँ। इस टिप्पणी  "...तीसरी कविता ‘बँटवारा’ पढ़ते हुए फिर एक बार लि‍जलिजी संवदेना उभर आती है..." -में प्रयुक्त ‘लि‍जलिजी संवदेना’ नामक वाक्यांश अरसा-पूर्व गीत के खिलाफ़ छेड़े गये एक आन्दोलन में प्रयोग किये गये ‘लिजलिजी भावुकता’ नामक आक्षेप का ‘उच्छिष्‍ट-चर्वण’ है। ध्यातव्य है कि जो लोग गीतिकाव्य पर ‘लिजलिजी भावुकता’ का आरोप लगाते रहे हैं, उनकी बोझिल कविताएँ वृहत्तर पाठक-वर्ग ने नकार दी थीं। उनमें बिम्ब और प्रतीक इतने जटिल थे कि कविता जो कि हृदय-प्रधान मानी जाती है (और ‘है’ भी), बुद्धिवादी होकर रह गयी थी। कुछेक कवि अपने उक्ति-वैचित्र्य एवं खनकती हुई भाषा के प्रयोग से अपनी छाप अवश्य छोड़ गये, लेकिन उनकी भी कविताएँ आम आदमी की ज़ुबान अथवा कण्ठ पर आसीन होने का गौरव नहीं पा सकीं। 


हम स्वयं अपनी स्मृति को टटोलकर देखें कि हमें कितनी ‘मुक्तछंद’ अथवा ‘छंदमुक्त’ कविताएँ कंठस्थ हैं। मेरा आशय यह कदापि नहीं कि उन या इन वर्षों में छंदोबद्ध काव्य में जो कुछ लिखा गया, वह सब सराहनीय रहा...कचरा तो कमोबेश  हर जगह होता ही है। टिप्पणीकार का यह कथन कि:"...सारी ही कविताएं जो गीत की तर्ज पर लिखी गई हैं"-पूर्णतः अनौचित्यपूर्ण है। ये ‘गीति रचनाएँ’ हैं, न कि किसी "गीत की तर्ज" पर लिखी गयी हैं| टिप्पणीकार का यह कथन कि: "दूसरी कविता ‘अम्मा की दुर्दशा’...घोर स्त्री विरोधी कविता है। स्त्री को स्त्री के खिलाफ खड़ी करती कविता -टिप्पणीकार इसे सही परिप्रेक्ष्य में ग्रहण करने में असफल रहा। इस गीत में वस्तुस्थिति का यथातथ्य/यथासत्य चित्रण है, न कि ‘स्त्री को स्त्री के खिलाफ खड़ा करने’ की कोशिश। क्या ऐसी घटनाएँ हमारे घर-परिवार में नहीं घटतीं? यदि हाँ...तो उनके चित्रण से गुरेज/परहेज कैसा? यहाँ ‘अम्मा की दुर्दशा’ का यथातथ्य चित्रण गीतकार का अभीष्‍ट रहा है...न कि वह जिसे टिप्पणीकार ज़बरन घसीट लाया है। उसे फतवा-शैली में जजमेण्टल नहीं होना चाहिए... आप्‍त-वचनीय मुद्रा संवाद की स्वस्थ परम्परा को आहत कर देती है।

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२४ सितम्बर शनिवार को सर्वत जमाल की गज़लें

गुरुवार, 4 अगस्त 2011

जितेन्द्र जौहर की कवितायें

जितेन्द्र 'जौहर' का जन्म 20 जुलाई,1971 को कन्नौज में हुआ| उन्होंने अंग्रेजी भाषा एवं साहित्य में परास्नातक पूरा किया| सम्प्रति वे ए. बी. आई. कॉलेज, रेणुसागर (सोनभद्र) में अध्यापक के रूप में कार्यरत हैं| वे गीत, ग़ज़ल, दोहा, मुक्तछंद, हाइकू, मुक्तक, हास्य-व्यंग्य, लघुकथा समेत  साहित्य की अनेक विधाओं में लेखन कर रहे हैं| वे प्रेरणा के सम्पादकीय सलाहकार और प्रयास के विशेष सहयोगी के तौर पर भी काम कर रहे हैं| तमाम पत्र-पत्रिकाओं, वेब मैग्ज़ीन्स एवं न्यूज़ पोर्टल्स पर उनकी रचनात्मक उपस्थिति महसूस की जा सकती है। साहित्य श्री, नागार्जुन सम्मान, साहित्य भारती, महादेवी वर्मा सम्मान से उन्हें अलंकृत किया जा चुका है| जौहर की कुछ रचनाएँ प्रस्तुत हैं......

१.
लम्बी दूरी है


अम्मा ने आटे के नौ-दस,
लड्‌डू बाँध दिये।
बोलीं, 'रस्ते में खा लेना,
लम्बी दूरी है !'


'ठोस' प्रेम का 'तरल' रूप,
आँखों ने छ्लकाया।
माँ की ममता देख कलेजा,
हाथों में आया।
'दही-मछरिया' कहकर मेरे,
गाल-हाथ चूमे।
समझाया कि 'सिर पे गमछा
बाँध लियो लू में !'


बार-बार पल्लू से गीली,
आँखें पोंछ रहीं ;
दबे होंठ से टपक रही,
बेबस मंजूरी है।
बोलीं, 'रस्ते में खा लेना,
लम्बी दूरी है !'


पिता मुझे बस में बैठाने,
अड्‌डे तक आये।
गाड़ी में थी देर, जलेबी-
गरम-गरम लाये।


छोटू जाकर हैण्डपम्प से,
पानी भर लाया।
मुझे पिलाकर पाँव छुए,
कह 'चलता हूँ... भाया !'


तन की तन्दूरी ज्वाला,
दर-दर भटकाती है ;
गाँव छोड़के शहर जा रहा-
हूँ, मजबूरी है!
बोलीं, 'रस्ते में खा लेना,
लम्बी दूरी है !'


ज्यों ही गाड़ी छूटी, हाय!
पिता बहुत रोये।
झुर्री वाले गाल, आँख के-
पानी से धोये !


रुँधे गले से बोले, 'लल्ला
चिट्‌ठी लिख देना...
रस्ते में कोई कुछ खाने-
को दे, मत लेना।



ज़हरख़ुरानी का धंधा,
चलता है शहरों में ;
सोच-समझकर चलना, बेटा !
बहुत ज़रूरी है !'
बोलीं, 'रस्ते में खा लेना,
लम्बी दूरी है !'


शहर पहुँचकर मैंने दर-दर
की ठोकर खायी।
नदी किनारे बसे गाँव की,
याद बहुत आयी।


दरवाज़े का नीम, सामने-
शंकर की मठिया।
पीपल वाला पेड़ और वह,
कल्लू की बगिया।



मुखिया की बातें कानों में,
रह-रहकर गूँजी ;
'घर का चना-चबेना, बेटा !
हलवा-पूरी है!'
बोलीं, 'रस्ते में खा लेना,
लम्बी दूरी है !'


 
२.            
अम्मा की दुर्दशा 


रोज़ी-रोटी मिली शहर में,
कुनबा ले आया।
बड़ी बहू को रास न आया,
अम्मा का साया।



ये कह-कहकर अम्मा पे,
गुर्राय घड़ी-घड़ी।
'कौन बनाके दे बुढ़िया को,
चाय घड़ी-घड़ी ?'


बेटे के घर बोझ बनी,
माँ की बूढ़ी काया !
बड़ी बहू को रास न आया,
अम्मा का साया।



पत्नी की जंघा सहलाने,
वाले हाथों ने ।
अम्मा के पग नहीं दबाये,
दुखती रातों में !


रूप-जाल में कामुकता ने,
इतना उलझाया।
बड़ी बहू को रास न आया,
अम्मा का साया।

 

माँसहीन हाड़ों पे सर्दी,
ने मारे चाँटे।
अगहन-पूस-माघ अम्मा ने,
कथरी में काटे।


बहू, बहू है, बेटे को भी,
तरस नहीं आया।
बड़ी बहू को रास न आया,
अम्मा का साया।



खटिया पे लेटीं अम्मा,
सिरहाने पीर खड़ी।
बहू मज़े से डबल-बेड पर,
सोये पड़ी-पड़ी।


क्या मतलब, अम्मा ने खाना-
खाया, न खाया !
बड़ी बहू को रास न आया,
अम्मा का साया।


रात-रातभर खाँस-खाँसकर,
साँस उखड़ जाती।
नींद न आती, करवट बदलें,
पकड़-पकड़ छाती।


जीवन पर मँडराती, पतझर-
की काली छाया !
बड़ी बहू को रास न आया,
अम्मा का साया।





३.
बँटवारा 
  

बेटों ने आँगन में इक
दीवार खड़ी कर दी ;
पिता बहुत हैरान,
उधर महतारी सिसक रही !



बड़कू बोला, "अम्मा के
सारेऽऽऽ गहने लेंगे !"
मझला पूछे, "बगिया वाला
खेत किसे देंगे ?"



ये सवाल सुन, मइया का दिल
चकनाचूर हुआ ;
बूढ़े पाँवों के नीचे की
धरती खिसक रही।
पिता बहुत हैरान,
उधर महतारी सिसक रही !



बँटवारे ने, देखो! कितनी
राह गही सँकरी।
बड़कू ने गइया खोली, तो
मझले ने बकरी !



रस्सी थामे निकल पड़े, ले
नये ठिकाने पर ;
मुड़-मुड़ खूँटा ताके बेबस
बछिया बिदक रही !
पिता बहुत हैरान,
उधर महतारी सिसक रही!



छोटू तो छोटा ठहरा,
कुछ बोल नहीं पाया।
उसके हिस्से आया,
अम्मा- दद्‌दा का साया।



"गइया और मड़इया तो
दे दो बड़के भइया !"
इतना भी कहने में उसको
लगती झिझक रही।
पिता बहुत हैरान,
उधर महतारी सिसक रही!

 
४.
हमारा दौर : कुछ चित्र


काल-वक्ष पर टाँक रहे हो,
कायरता के मंज़र जैसे !
बाहर से हलचल-विहीन पर,
भीतर एक बवंडर जैसे !



क्रोध-ज्वार मुट्‌ठी में भींचे,
साहस थर-थर काँप रहा है।
ध्वनि-विहीन विप्लव का स्वर,
अम्बर की दूरी नाप रहा है।


श्वेत-श्याममय लाल कोष्ठकों-
से विषाद-सा टपक रहा है।
भित्ति-वक्ष से सटा सिसकता,
टँगा कील पर फड़क रहा है।


मरी हुई तारीख़ों वाला,
जीवन एक कलण्डर जैसे !
बाहर से हलचलविहीन पर,
भीतर एक बवंडर जैसे !



चाटुकारिता के कौशल ने,
नाप लिये हैं शिखर समूचे।
जीवनभर तुम रहे कर्मरत्
एक इंच ऊपर न पहुँचे।


गतिमय स्थिरता के साधक !
लहर-वलय में ख़ूब विचरते।
सीमाओं में बँधे निरंतर,
पर असीम का अभिनय करते।



ठहरे हुए जलाशय-से हो,
सपने किन्तु समुन्दर जैसे!
बाहर से हलचल-विहीन पर,
भीतर एक बवंडर जैसे!



धरा-धाम की प्यास विकल है,
मेघ सिंधु में बरस रहे हैं।
वृक्ष खड़े निर्पात, सरोवर-
बूँद-बूँद को तरस रहे हैं।


सीख लिया है आँख मूँदना,
कर्ण-कुहर अब नहीं खोलते।
कुछ भी होता रहे कहीं पर,
अधर तुम्हारे नहीं डोलते।



विकृत अनुयायी-स्वरूप में,
गाँधी जी के बंदर जैसे।
बाहर से हलचल-विहीन पर,
भीतर एक बवंडर जैसे !



             ५.
चुनावी मौसम
 

फिर चुनाव का मौसम आया,
इश्तिहार आये!
आकर्षक-मनभावन वादे,
बेशुमार आये!


गली-गली, चौखट, चौराहे
पर लटके वादे।
एकनिष्ठ हो सभी निशाना
वोटों पर साधे।


हंस-वेश में बग़ुले काफी
होशियार आये!
फिर चुनाव का मौसम आया,
इश्तिहार आये।


अस्पताल, सड़कें, तकनीकी
विद्यालय होंगे।
और झोपड़ी में अँगरेज़ी
शौचालय होंगे!


खादी के मन में विकास के
सद्‌विचार आये।
फिर चुनाव का मौसम आया
इश्तिहार आये।


संपर्क .....
 IR- 13/6, रेणुसागर, सोनभद्र (उ प्र) 231218.
 मो नं. +919450320472
 ईमेल :  jjauharpoet@gmail.com

सोमवार, 18 जुलाई 2011

रचती तो कविता है कवि को

साखी पर हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताओं पर गंभीर चर्चा भले न हुई हो लेकिन लम्बे अन्तराल के बाद उनकी रचनाओं ने लोगों का ध्यान खींचा| उनकी बदहवासी पर बात हुई, उनकी बदहवासी में उनके होश पर बात हुई| अनुभूति की संपादक पूर्णिमा वर्मन, व्यंग्य यात्रा के संपादक  डा प्रेम जनमेजय, वरिष्ठ कवि उमेश सिंह चौहान  की उपस्थिति महत्वपूर्ण रही| 

  मेरे अनुज और कवि राजेश उत्साही ने हरे प्रकाश के परिचय और मनस्थिति पर कुछ सवाल उठाये| स्‍पष्‍ट नहीं हो रहा है कि कविताएं बदहवासी में लिखी गईं थीं या भेजी गईं थीं। उनकी पहली तीन कविताओं में एक तरह की बदहवासी नजर आ रही है। कवि शायद बहुत आश्‍वस्‍त नहीं हुआ है कविता लिखते हुए। उसे संभवत: कविताओं पर कुछ और काम करने की जरूरत थी। बावजूद इसके कि कविताओं में उठाए गए विषय नए हैं, पर कविताओं में पैनापन नजर नहीं आता। कविताएं चौंकाती नहीं हैं। पहली कविता इस अर्थ में सार्थक लगती है कि बहुत दिनों बाद कवि जब अपनी कविता में लौटता है तो कुछ इसी तरह से सोचता है। यह कविता अंत तक आते आते अपना मतंव्‍य बदल देती है, वह कुछ और भी कहने लगती है।
दूसरी कविता आपाधापी को समेटने का प्रयत्‍न करती हुई नजर आती है,पर मुझे लगता है कवि इसे समेटने में थोड़ा पिछड़ गया है। तीसरी कविता असल में उस नारे से आगे नहीं बढ़ती जिसका एक तरह से हरे विरोध कर रहे हैं। हरे को इस तरह की अभिव्‍यक्ति से बचना चाहिए। चौथी कविता प्रकाशित संकलन से सुभाष जी ने ली है, दोस्‍तों के बारे में बिलकुल अलग नजरिए से रूबरू कराती है। हमने शायद दोस्‍तों को इस नजर से देखा ही नहीं। पर यहां भी लगता है कि जैसे हरे कुछ कहते कहते रूक जा रहे हैं। पूरी तरह खुल नहीं रहे हैं वे।
राजेश के सवालों पर मैंने सफाई देने की कोशिश की,  आजकल हरे कुछ बदहवास से हैं, अच्छी बात ये है कि इस बदहवासी के बावजूद वे बदहोशी में नहीं गये, अन्यथा कविता होती ही नहीं। उनकी बदहवासी का कारण मैं हूं और वे होश में रहते हैं, इसका महाकारण भी मैं ही हूं। दरअसल मैंने उनके सूली पर चढ़ने की तारीख घोषित कर रखी थी, इतना ही नहीं फंदा लिये बैठा भी था। रोज तलब करते हुए कि कविताएं दो भाई। मांग पर कविता लिखना आसान नहीं होता पर यह देखना होता है कि मांग कितनी प्यारी है, कितनी नाजुक है। दिन करीब आता गया, बैठने का मौका नहीं, मांग ठुकराने की हिम्मत नहीं। फिर बदहवासी से कोई कैसे बचा सकता था। मगर कविता लिखनी थी, कोई झाड़ू तो लगाना नहीं था, सो हरे को अपना होश भी बनाये रखना पड़ा। कुल मिलाकर मैं तो इस बदहवास हरे को भी पसंद करता हूं।
राजेश चूकने वाले कहाँ,  कौन बदहवास नहीं है। कुछ होते हैं जो बदहवासी के बावजूद अपने को इस तरह से व्‍यक्‍त करते हैं कि सब कुछ ठीक ठाक है, और कुछ होते हैं कि सब कुछ ठीक ठाक होने के बावजूद इस तरह प्रस्‍तुत होते हैं जैसे सारी दुनिया का बोझ उन पर ही है। अच्‍छी बात यह है कि हरे इन दोनों श्रेणियों में नहीं आते हैं, वे जैसे हैं वैसे ही अभिव्‍यक्‍त हो रहे हैं। यह एक ईमानदार कोशिश है।  एक और बात कि कविता कभी भी मांग पर नहीं लिखी जा सकती। अगर लिखी जाएगी तो उसका हाल वही होगा, जिसका विरोध हरे खुद अपनी कविता में कर रहे हैं। मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि झाड़ू लगाना ऐसा काम है जिसमें होश की जरूरत नहीं होती है। मेरे हिसाब से कविता भी झाड़ू लगाती है, दिमागों में।


सद्भावना दर्पण के   संपादक और लेखक गिरीश पंकज ने कहा, हरेप्रकाश की कविताएं अपने शिल्पलोक में नए आस्वादन के साथ उपस्थित होती हैं| कविताओं में ताज़गी तो है ही, नई दृष्टि भी है| पत्रकार सत्येन्द्र  मिश्र ने कहा, कविता हरे प्रकाश के लिए ड्राइंग रूम में रखा शोपीस नहीं, वास्तविकता है जीवन की जो प्रकट होती है विभिन्न रूपों मे| प्रसिद्ध प्रवासी रचनाकार देवी नागरानी जी ने कहा, हरे के सोच की उड़ान परिंदों के पर कतरने वाली है|


वरिष्ठ कवि उमेश सिंह चौहान ने कहा कि हरे की ये कविताएं वैसी ही हैं, जैसी कविताओं के लिए उनकी पहचान बनी है। धारदार, असरदार, कपट को नंगा करतीं। बहुत अच्छा लगा उन्हें पढ़कर एक अन्तराल के बाद। पूर्णिमा वर्मन ने कहा, हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताएँ भले ही अंतराल के बाद आयी हों मगर कुछ खोया है ऐसा नहीं लगता। शायद उन्होंने एक लंबी छलांग लगाने के लिये यह समय अपने को तैयार करने में लगाया। जहाँ पहले वे सहज और सरल अभिव्यक्ति के कारण आकर्षित करते थे, अब उसमें जीवन के अनुभव की संपन्नता व वैचारिक गहनता भी जुड़ने लगी है। लेखक और जनसेवक अमिताभ ठाकुर कहते है, मैं इन चार कविताओं को पढ़ने के बाद आराम से यह कह सकता हूँ कि एक विधा के रूप में कविता (या नयी कविता) किसी भी प्रकार से कमतर नहीं है, न ही कविता की आवश्यकता और जरूरत ही हम लोगों के लिए कम हो रही है| यदि कोई जरूरत है तो मात्र इतनी  ही कि लिखने वाला व्यक्ति हरे प्रकाश उपाध्याय हों जो कविता नहीं लिखें, अपने मन की भावनाओं को उड़ेल दें और साथ ही इस बात का भी भरपूर ख्याल रखें कि उनकी बात उचित ढंग से और आसानी से पाठकों को संप्रेषित हो रही है| लेखिका नूतन ठाकुर ने कहा, हरे प्रकाश की कविताओं में गहराई और संवेदनाओं की संश्लिष्टता है जो केवल उन्ही कवियों में हो सकती है जो बहुत अधिक गंभीरता से चीज़ों को देखते और समझते हैं|

प्रख्यात व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय ने कहा कि  हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताओं की स्वाभाविकता मुझे बहुत आकर्षित करती है| माघ में गिरना कविता की यह पंक्तियाँ --मैं रचता क्या उसे,रचा तो मुझे जाना था...क्या कवि कर्म कि उस ऊँचाई को साक्षात  नहीं करती हैं जहाँ कविता रची नहीं जाती अपितु वह कवि को रचनात्मकता प्रदान करती है और कवि उदात्त गुणों की ओर अग्रसर होता है| अक्सर कवि सोचता है कि वह कविता को रच रहा है पर रचती तो कविता है कवि को| सुनील अमर ने कहा, मन को छू गईं ये पंक्तियाँ! सरल, सहज और संवेदनशील ! अ-कृत्रिम ! 

लेखक और ब्लागर रवीन्द्र प्रभात ने लिखा,  हरे प्रकाश की कविताई तेवर में अवमूल्‍यन के प्रति आक्रोश तथा यथास्थितिवाद के खिलाफ परिवर्तन का स्‍वर उदघोषित हो रहा है। रूप चन्द्र शास्त्री मयंक , प्रमोद ताम्बट, आहट,  काजल कुमार, प्रकाश बादल, दिगंबर नासवा , गीता पंडित , आशुतोष, कौशल किशोर, वंदना शुक्ल , श्याम बिहारी श्यामल, विवेक जैन, डंडा लखनवी, अवनीश सिंह चौहान , फरीद खान ने भी इन कविताओं की सराहना की| प्रज्ञा पाण्डेय ने कहा, ये कवितायेँ एकदम नयी पेंटिंग जैसी हैं| नए ढंग की बिलकुल ताज़ी हवा की तरह .. आगे और भी पढ़ने की उम्मीद रहेगी| ब्रजेश कुमार पाण्डेय के अनुसार समय की तल्खियों से लैस एक ताजगी लिए ये कवितायेँ हरे भाई के विस्तृत दृष्टि परास को सामने लाती है| थोड़ी चुप्पी के बाद ही सही इस तरह आना अच्छा लगा| अरुण चन्द्र राय ने कहा, हरेप्रकश नई पीढी के सशक्त हस्ताक्षरों में से हैं|  इनकी कविता इस पीढी के द्वंद्व  और संक्रमण की कविता होती है|  जैसे मायावी संसार में वे लिखते हैं..."जहां रहने का ठौर, मन वहां न लागे मितवा/चल, यहां नहीं, यहां नहीं, यहां नहीं../ पता नहीं कहां/ चल कहीं चल मितवा...अधिकांश चीजें मायावी हैं| माघ में गिरना कविता में कविता को माघ, सावन में पाना दरअसल खुद को पाना है... खिलाडी साथी भी बेहतरीन कविता है..| 

लेखक जाकिर अली कहते हैं, उनकी कविता भी गहरे अर्थों को बयां करती हैं। उन्‍हें समझने के लिए एकाग्रता की जरूरत होती है, अन्‍यथा ऊपरी तौर पर देखने पर लोग कुछ का कुछ समझ लेते हैं।  प्रमोद रंजन कहते हैं, हरे की बातों से गुजरना मेरे लिए हमेशा एक सुखद अहसास की तरह होता है, चाहे वह गपशप में हो, या कविता में। 'मायावी यह संसार' के लिए बधाई|  लेखक विमल चंद पाण्डेय कहते हैं, हरे का कवि सारे शातिरपने को जानते हुए भी शातिरों से मुस्करा कर मिलता है लेकिन अपनी पैनी आँखों से आर-पर देख रहा होता है|

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६ अगस्त शनिवार को साखी पर जितेन्द्र जौहर की रचनाएँ 

शनिवार, 18 जून 2011

हरे प्रकाश उपाध्याय की चार कविताएँ

 हरे प्रकाश उपाध्याय को साखी पर प्रस्तुत करते हुए मुझे संतोष और गर्व दोनों का अनुभव हो रहा है| वे एक ऐसे युवा कवि हैं, जिन्होंने अपनी और अपने पहले और बाद की पीढ़ियों को एक साथ आकर्षित और प्रभावित किया है| बिहार में ५ फरवरी १९८१ को जन्मे इस अग्निधर्मा युवक ने लम्बी अराजक भटकन के बाद अपना दीप्त पथ बना लिया है और उस पर अब आगे बढ़ना जारी  है| हरे के शब्दों में मैं हिन्दी का एक गरीब लेखक हूँ, रोटी के लिए पत्रकारिता करता हूँ| भारतीय ज्ञानपीठ से एक कविता संकलन प्रकाशित है| वे मेरे सहयोगी भी हैं और जनसंदेश टाइम्स के फीचर संपादक के रूप में काम कर रहे हैं| मेरे सपनों के पंख की तरह| पर मैंने उन्हें बेड़ियाँ डाल रखी हैं| काम, हर दम काम| योजना, संपर्क और उस पर अमल| बीवी, बच्चों तक के लिए समय नहीं| साखी के लिए रचनाएँ मांगी तो उन्होंने बदहवासी में एक साथ लिखी तीन कविताएँ मुझे मेल कर दीं| मैंने एक और रचना उनके संकलन से उठा ली, जो बदहवास समाज के बारे में है| प्रस्तुत है हरे प्रकाश उपाध्याय की चार कविताएँ....   


१.
माघ में गिरना
कविता मिली थी
बहुत दिनों के बाद
सावन के बाद माघ में
एक पेड़ के नीचे
पत्ते बुहार रही थी
चूल्हा जलाना था उसे शायद
हमने उलाहने नहीं दिए
उसने देखा एक नजर मेरी तरफ
मैं थोड़ी दूर पर शीतल हवा में कांपते हुए पत्तों सा
ठिठुरता अपने गिरने की प्रतीक्षा करते हुए
उसे देखता रहा भौंचक

हम यों तलाश रहे थे बरसों से
एक-दूसरे को हर सावन के मौसम में
ईश्वर की लीला ही कहिए जनाब कि
माघ में जब बिना ढूंढे मिले
अचानक
तब वह मुझे ठीक से देख नहीं पा रही थी
मैं रचता क्या उसे
रचा तो मुझे जाना था...

हम देर तक देखते रहे
नहीं पता क्या-क्या
उसकी आंखों के कोर भीग गए
और मैं गिरा तो उठ न सका...

जान-पहचान नये सिरे से हो रही थी।
२.
मायावी यह संसार
अधिकांश चीजें मायावी हैं
मार तमाम संकटों के बीच ही
हँसी की बारिश
मार गुर्राहटों के बीच
कोयल की विह्वल पुकार
ऐ कोयल तुम पागल हो और एक दिन तुम पागल बना दोगी समूची दुनिया को
ऐ नदी तुम जरा इधर नहीं आ सकती शहर में
ऐ हवा, तुम अपना मोबाइल नं. दोगी मुझे
सुनो, सुनो, सुनो....
अधिकांश चीजें मायावी हैं...

जिनकी आवाजों के शोर के बजे नगाड़े
उनसे भागे जिया
जिनकी आवाज न आए
उसी आवाज पर पागल पिया..
जहां रहने का ठौर, मन वहां न लागे मितवा
चल, यहां नहीं, यहां नहीं, यहां नहीं...
पता नहीं कहां
चल कहीं चल मितवा...
अधिकांश चीजें मायावी हैं...

जिन चीजों से प्रेम वे अत्यंत अधूरी
इन अधूरी चीजों की भी महिमा गजब

यह जीवन सुखी-दुःखी एक पहेली...

जी नहीं रहे हम
बस अपनी उम्र के घंटे-पल-छिन गिन रहे बस
और इसी गुणा-भाग में एक लंबी उम्र गुजार कर
जो गए
उनके लिए मर्सिया पढ़ रहे हैं हम...
३.
कविता के बारे में एक बड़बड़ाहट
कविता, ओ कविता
क्या तुम गरीब की जोरू हो...
नहीं तो क्यों इतने सारे लोग
तुम्हें भौजाई बनाए हुए हैं
कोई तुम्हें चिकोटी काट रहा है
कोई कागज के बिस्तर पर नचा रहा है तुम्हें

कोई माइक पर गूंजते
कुछ निहायत उपयोगी शब्दों के लिबास में तुम्हें पेश कर रहा है
कोई तुम्हें बेच रहा है
कोई खरीद रहा है
खाने-कमाने का काम भी ले रहे तुमसे कुछ लोग
क्या तुम ही हमारे समय की कामधेनु

तुमसे करते हैं इतने लोग जो प्रेम
क्या सब देह-संबंधी हैं तुम्हारे?
रहने दो कुछ गोपनीय प्रश्न और भी हो सकते हैं
कुछ लोग मां कहते होंगे तुम्हें, बुरा मान जाएंगे
जाओ जीयो अपनी जिंदगी, जाओ
नदी की तरह, हवा की तरह...चाहे जैसे

पर कविता को फसल की तरह
काटनेवाले कवियों
एक न एक दिन तुम्हें हिसाब देना ही होगा...

४. 
खिलाड़ी दोस्त 
खिलाड़ी दोस्तों के बारे में
बताने से पहले ही सावधान कर दूँ कि
मेरा इशारा ऐसे दोस्तों की तरफ़ नहीं है
जो ज़िन्दगी को ही एक खेल समझते हैं
बल्कि यह उन दोस्तों की बात है जो
खेल को ही ज़िन्दगी समझते हैं
जो कहीं भी खेलना शुरू कर देते हैं
जो अक़सर पारम्परिक मैदानों के बाहर
ग़ैर पारम्परिक खेल खेलते रहते हैं


वे दोस्त
खेल के बाहर भी खेलते रहते हैं खेल
जब भी जहाँ
मौक़ा मिलता है पदाने लगते हैं
पत्ते फेंकने लगते हैं
बुझौव्वल बुझाने लगते हैं
गोटी बिछाने लगते हैं
आँखों पर कसकर बाँध देते हैं रूमाल
और दुखती रग को दुखाने लगते हैं


वे दोस्त अच्छी तरह जानते हैं
दोस्ती में खेलना
सही तरह पैर फँसाना वे जानते हैं
जानते हैं वे कब
कहाँ से मारने पर रोक नहीं पाएगा गोल
जानते हैं कितनी देर दौड़ाएँगे
तो थककर गिर जाएगा दोस्त
वे हाथ मिलाते हुए अक़सर
हमारी भावनाएँ नहीं
हमारी ताक़त आँकते रहते हैं
अक़सर थके हुए दौर में
भूला हुआ गेम शुरू करते हैं दोस्त
वे आँसू नहीं मानते
तटस्थ वसूलते हैं क़ीमत
हमारे हारने की


सुख और ख़ुशी में भले भूल जाते हों
दुख में अकेला नहीं छोड़ते
आ जाते हैं डंडा सँभाले
उदासी और थकान में
शुरू करते हैं खेल
और नचा-नचा देते हैं


दोस्त अवसर देखते रहते हैं
काम आने का
और मुश्किल समय में अक़सर
ऐसे काम आते हैं कि भूल नहीं सकते हम


हमारे गहरे अभाव
टूटन और बर्बादी के दिनों में
जब दुश्मन उपेक्षा करते हैं हमारी
दोस्त आते हैं ख़ैरियत पूछने
और हास्य के शिल्प में पूछते हैं हाल
हमारे चेहरे की उड़ती हवाइयाँ देखकर
हताश नहीं होते
वे मूँछों में लिथड़ाती मुस्कान बिखेरते हैं


दोस्त हमें हारकर
बैठ नहीं जाने देते
वे हमें ललकारते हैं
चाहे जितने पस्त हों हम


उठाकर हमें मैदान में खड़ा कर देते हैं वे
और देखते रहते हैं हमारा दौड़ना
गिरना और हमारे घुटने का छिलना
ताली बजाते रहते हैं वे
मूँगफली खाते रहते हैं
और कहते हैं
धीरे-धीरे सीख जाओगे खेल


जो दोस्त खेल में पारंगत होते हैं
खेल से भागने पर कान उमेठ देते हैं
कहते हैं, कहाँ-कहाँ भागोगे
'भागकर जहाँ जाओगे
हमें वहीं पाओगे'


खेल में पारंगत दोस्त
खेल में अनाड़ी दोस्त से ही
अक़सर खेलते हैं खेल!  

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