अभियान के साथी

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

हादसों के शहर में हम


साखी  पर प्राण शर्मा जी की गजलें प्रस्तुत कर मैं भी तितलियों की  इन्द्रधनुषी  उड़ान में अलमस्त डोलने लगा था, अशोक रावत जी ने भीतर चलती आँधियों का जिक्र भी किया पर जैसे मैंने सुना ही नहीं| अली कली ही सो विध्यो, वाला हाल था, आगे कौन हवाल की चिंता ही नहीं थी पर जब तितलियाँ उड़ चलीं आकाश तो मेरी नींद टूटी|  अब लगता है कि सामना तो आँधियों से ही है, चाहे वो तितलियों के मासूम पंखों ने ही क्यों न पैदा की हो| राजेश उत्साही कहते हैं कि कापियां किसी तरह जँच ही जायेंगीं और कुछ लाल, पीला करके कक्षाध्यापक पेश कर ही देगा पर भाई चार सवालों के इतने जवाब हैं कि मैं क्या करूं, समझ में नहीं आता| हाँ,  पहली बार ये जरूर लगा कि सोचने के अपने-अपने तरीके रखने वाले शायरों, रचनाकर्मियों और चिंतनशील पाठकों को एक मंच पर खुलकर बतियाते देखना तो बहुत अच्छा लगता है लेकिन उनकी बतकही को एक धागे में पिरोकर रखना बहुत मुश्किल काम है| प्राण जी ने याद दिलाया, इस पार प्रिये तुम हो मधु है, उस पार न जाने क्या होगा, पर वे लोगों से यह भी कह गये कि इस पार आना, यानी मैं समझता हूँ उस पार न जाना, पता नहीं क्या हो, कहीं भटक गये तो| इस पार रहे तो इतने लोग हैं कि कम से कम भटकने तो नहीं देंगे| रावत जी हैं, तिलकराज जी हैं, राजेश उत्साही हैं, संजीव गौतम हैं, सलिल जी हैं, नीरज जी है, सर्वत जी हैं  और बहुत से चाहने वाले हैं| उस पार का क्या भरोसा|  प्राण जी की फूलों के आर-पार जाने वाली तितलियों ने भी लोगों को बहुत छकाया| किसी को सहज लगीं, किसी को असहज| फ़िल्मी गाने में तो वे आकाश चलीं थीं पर प्राण जी ने उन्हें फूलों के आर-पार जाते हुए देखा| यह प्राण जी की तितलियाँ हैं, वे उन्हें अपनी नजर से देख सकते हैं, इसमें असहज कुछ नहीं लगता, बशर्ते वे इस शेर की रचना का सन्दर्भ न देते| फिर भी कुछ फर्क नहीं पड़ता क्योंकि कविता में आये किसी सन्दर्भ को उसके यथातथ्य भौतिक रूप में देखने और समझने की कोशिश नहीं होनी चाहिए| किसी ने बहुत सही बात कही, इश्क दिल को चीर जाता है, आँखें मन के  भीतर तक झाँक लेती हैं तो तितलियाँ फूल को घायल किये बगैर उसके आर-पार क्यों नहीं जा सकतीं|

प्राण जी के बहाने इस बार गजलों पर बहुत सार्थक चर्चा हुई| जमकर बातें हुई| लगा साखी ने अपनी सार्थकता की दिशा में कुछ कदम बढ़ाए| तिलकराज जी खुश थे कि उन्हें तरही का मसाला  मिल गया| पर अपनी खुशी जाहिर करके ही वे चुप नहीं बैठे| उन्होंने कोई मौक़ा हाथ से जाने नहीं दिया| बोले, मैंने ग़ज़ल की चार आधार आवश्‍यकतायें पहचानी हैं, तखय्युल, तग़ज्‍़जुल, तवज्‍़ज़ुन, तगय्युल| प्राण साहब की ग़ज़लों में कोई उर्दू  शब्‍द आता भी है तो वह ऐसा होता है जो बोलचाल की हिन्‍दी में रच बस गया हो। सीधी सच्‍ची सी बातें, शब्‍दाडम्‍बर रहित। उन्होंने एक शेर पर चर्चा की--नफरत का भूत नित मेरे सर पर सवार है, क्या हर कोई ए दोस्तो इसका शिकार है| कहा, पहली पंक्ति पढ़कर शायर  जब ठहरता है तो मजबूर करता है दूसरी पंक्ति की प्रतीक्षा के लिये और दूसरी पंक्ति में जब वह कहता है कि 'क्या हर कोई ए दोस्तो इसका ' तो सुनने वाला बेसाख्‍ता बोल उठता है 'शिकार है'। यही एक पुष्‍ट शेर की पहचान है। शायर  के पास एक सवालाना खयाल है, वह  आपसे ही सवाल पूछकर आपको सोचने के लिये मजबूर कर रहा है। बाकी ग़ज़लों के अशआर भी देखें, कहीं सवाल तो कहीं दृश्यानुभूति की अभिव्‍यक्ति| 


सलिल जी साखी पर नहीं आयें  तो भी आये जैसे लगते हैं| शायद प्राण जी को ऐसा ही कुछ लगा होगा| उनके याद करते ही सलिल जी प्रकट हुए अपनी विनम्रता जताने, फिर अपने अंदाज में आये, पहली गजल एक मासूम सी गज़ल, बच्चों की मुस्कुराहट की मानिन्द|  “जब से जाना काम है मुझको बनाना आपका” में रोज़मर्रा की बोलचाल में इस्तेमाल होने वाले मुहावरे को इस क़दर ख़ूबसूरती से पिरोया है कि इस शेर की मासूमियत पर हँसी आ जाती है| वे कहते हैं कि पूरी ग़ज़ल में मुझे चोट पहुंचाया इस शेर ने---क्यों न लाता मँहगे- मँहगे तोहफे मैं परदेस से, वरना पड़ता देखना फिर मुँह फुलाना आपका| महँगे महँगे तोहफों की बात सारे जज़्बात को हल्का कर जाती है| दूसरी  ग़ज़ल किसी फुलवारी में बैठकर कही गई है, इसे मैं नर्सरी राईम कहना चाहूँगा| पर यहाँ मतले और चौथे शेर में कुछ खटक रहा है जब कि पाँचवें शेर में फूलों के आर-पार तितलियों का उड़ना अखरता है। फूलों के दर्मियान उड़ना तो सुना था पर आर पार नहीं सुना| तीसरी ग़ज़ल एक साँस में पढ़ी  जाने वाली, मकते  से मतले तक बाँध कर रखती है| चौथी गजल में  तंज़िया मिजाज़ है, तंज़ आज के माहौल पर, जहाँ नफ़रत का भूत सबके सिर पर सवार है| मकते पर तो इंतिहाँ कर दी, यह कहकर कि बच्चा इस दौर का होशियार है| प्राण साहब की ग़ज़लें एक ऐसा सफर हैं, जिसमें वक़्त का पता नहीं चलता| वे अपने आप में एक ईदारा हैं, उनकी ग़ज़लों पर बस इतना ही कहने को रह जाता है कि क्यों न मैं नित ही करूँ तारीफ़ उसकी,इल्म में वो आदमी मुझसे बड़ा है|
सलिल जी ने तिलकराज कपूर को फिर आने को विवश कर दिया, बिहारी ब्‍लॉगर साहब खूब सार्थक चर्चा करते हैं, उनके लिये कह सकता हूँ कि मेरा तो सर भी वहॉं तक नहीं पहुँच पाता, जहॉं कदम के निशॉं आप छोड़ आये हैं। प्राण साहब कभी निहायत निजी पलों में ले जाते हैं तो कभी बतियाने लगते हैं| 'क्‍यों न लाता ......मुँह फुलाना आपका' में यही दिखाई पड़ रहा है। फूल के आर-पार ति‍तलियों का उड़ना तो व्यावहारिक नहीं लेकिन बगीचे में बैठकर फूलों की चादर के आर-पार उड़ने की कल्‍पना करें तो इस शेर की कोमलता का आनंद ही कुछ और है। कपूर साहब ने बार-बार दखल दिया| राजेश उत्साही की टिप्पणी के बाद होशियार शब्‍द पर चर्चा करते हुए  कहा, यह अनेकार्थक है-बुद्धिमान, अक्‍लमंद, चतुर, सचेत, दक्ष, कुशल, जागरूक और माहिर जैसे अर्थ लिये हुए और चालाक, छली, ठग का अर्थ देते हुए भी । इसका अर्थ संदर्भ से जोड़कर ही देखा जा सकता है अन्‍यथा अर्थ का अनर्थ हो जायेगा। प्राण जी की उम्र में बैठा शायर अपने ज़माने के बच्‍चे को सरल और भोला-भाला मानते हुए भी मानता है कि उस दौर में भी बच्‍चे को होशियार होना चाहिये था जैसा कि आज का बच्‍चा है और उसी पृष्‍ठभूमि में आज के बच्‍चे के प्रति प्रसन्‍नता व्‍यक्‍त कर रहा है। हमारे बच्‍चे इतने होशियार हो गये हैं कि हमारे बिना भी अपना रास्‍ता बना लेंगे।
गिरेंगे, उठेंगे, फिर आगे बढ़ेंगे,
हमारे बिना भी ये जीवन जियेंगे।

 
शायर संजीव गौतम ने सलाह दी अब तक जितनी बातें आदरणीय प्राण  जी, अशोक रावत जी, सर्वत जमाल जी, चन्द्रभान भारद्वाज जी, तिलकराज कपूर जी, सलिल जी और जिस-जिसने भी ग़ज़ल के ढांचे, उसकी आत्मा आदि के बारे में कहीं, उन सबके साथ अगर उदाहरण अगर किसी को समझने हों तो साखी पर आदरणीय ओमप्रकाश  नदीम जी, अशोक रावत जी और प्राण सर की ग़ज़लें गौर से पढ़ें। सारे भ्रम और अनसुलझे सवालों के उत्तर मिल जायेंगे। कपूर जी ने एक शेर ‘नफरत का भूत‘ में शिकार शब्द को लेकर जो कहा है, उसे मैं एक और शब्द देता हूं- जहां शायर पाठक की सोच से आगे जाकर अपनी बात कहता है, वहां उत्पन्न होता है, ‘अर्थ का विस्फोट‘ यही ग़ज़लपन है। यही ग़ज़ल की कहन है। यह अर्थ का विस्फोट रचना में जहां-जहां होगा, वहीं-वहीं कविता होगी। यही वो बात है जो साधना से आती है।  कपूर जी फिर आये और कहा कि संजीव गौतम ने बहुत अच्‍छी बात कही ग़ज़लियत के प्रस्‍फुटन की। काफि़या स्‍तर पर सामान्‍यतय: दो स्थितियां हो सकती हैं, एक तो यह कि वहॉं एक अनपेक्षित काफि़या निकले और शेर का अर्थ एकाएक प्रकट हो और श्रोता वाह-वाह कह उठे, दूसरी यह कि काफि़या श्रोता के मुख से निकले। पहली स्थिति बहुत कठिन होती है, हॉं ग़ज़लियत के लिये इतना जरूरी है कि पहली पंक्ति से श्रोता काफि़या का अनुमान न लगा पाये और दूसरी पंक्ति में भी काफि़या से जितनी दूरी हो उतनी ही दूरी काफि़या का अनुमान लगाने से हो, इतना भी कर लिया तो काफ़ी होगा। संजीव खुश है कि अच्छी बातें हो रही हैं| उन्होंने कहा,  इस बार रचनाएं अच्छी आयीं तो बातें भी अच्छी-अच्छी हो रहीं हैं। रिश्तों की डोर मजबूत से मजबूत होती जा रही है। आज तक आलोचनात्मक कविता पाठ की चौपाल  ज्यादा दिनों तक कभी चली नहीं है। ये चुनौती है हर कवि और कविता के पाठक के लिए। जो भी दिल से मनुष्य है, संवेदना से युक्त है और मन-प्राण से इस कायनात की खूबसूरती को बचे हुए देखना चाहता है, उसे अपनी पूरी ताकत से इसे बचाने के लिए अपना योगदान देना होगा। ये क्रम कभी टूटे नहीं, चेहरे बेशक बदल जायें उत्तरदायित्व में परिवर्तन नहीं होना चाहिए, क्योंकि ये सिलसिला अगर टूटा तो बहुत कुछ टूटेगा। हम सब समय के संक्रमण काल में जी रहे हैं। सच बोलने की तो बात दूर मुंह खोलने तक पर पाबन्दी लगाने के लिए सत्ता अपनी समूची ताकत के साथ तत्पर है। बुराई किसी विचार में नहीं बल्कि उसे क्रियान्वित करने वाले दिमागों में है। कुछ लोग अभी तक जंगल के कानून की मानसिकता से उबर नहीं पाये हैं। अकेले में अपने-अपने नाखूनों को  परखते रहते हैं और मौका मिलने पर उसके प्रयोग से चूकते नहीं हैं।  ढेर सारे अंधेरे को भगाने के लिए एक छोटा सा दीपक जलाना ही काफी होता है, मैं तो यहां बातचीत को एक और दिशा में  ले जाना चाहता हूं। छन्द, व्याकरण आदि तो प्रारम्भिक उपकरण हैं, उनको तो खैर होना ही चाहिए लेकिन आगे की वस्तु तो यही  है न कि हमारे द्वारा रचित पंक्तियां  हमें कितना संस्कारित कर रहीं हैं। हमारे पूर्वजों द्वारा हमें विरासत में जो चेतना का परिष्कृत रूप मिला   है, उसमें कितनी श्रीवृद्धि कर रहीं हैं।


कवि राजेश उत्साही ने कविताओं पर बात करने के अपने मानकों के बारे में स्पष्ट किया और प्राण जी से अपनी पहली मुठभेड़ के बारे में जानकारी दी| मैं किसी भी रचना पर अपनी बात- सामयिकता, वैचारिक प्रतिबद्धता, समकालीन सामाजिक सरोकार और शिल्प के आधार पर करता हूँ। मेरे लिए पहली तीन बातें कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। लेकिन मुश्किल यह भी है कि जब मैं पहली तीन बातें किसी रचना में पाता हूं तो चौथी कसौटी अनायास ही ज्यादा मुखर होने लगती है। जब पहली तीन बातों पर मैं रचना को कसता हूं, रचना के साथ-साथ वह मेरे लिए उस रचनाकार की समीक्षा भी होती है। साखी जैसे सार्वजनिक मंच पर कुछ कहने की सार्थकता तभी है जब आप औरों ने क्या् कहा, उसको भी ध्यान में रखें। इतना कहकर वे गजलों पर आये| पहली बात यह कि प्राण जी की ग़ज़लों में वैश्विक मानवीय संवदेनाएं और चिंताएं मुखरता के साथ मौजूद हैं। यह मुखरता सहज और सरल है। शहरीकरण के ऐब उनकी ग़ज़ल में दिख रहे हैं। दूसरी बात, उनकी ग़ज़लों में प्रकृति अपने सौदंर्य के साथ मौजूद है। ति‍‍तलियों का फूलों के आरपार जाना मुझे तो सहज लगा। तीसरी बात, कोई भी रचना वय की सीमाओं में बंधी नहीं होती है। इसलिए उनकी ग़ज़ल में जो रोमानियत नजर आती है, वह इस बात की परिचायक है कि वे मन से अब भी युवा हैं। पर हां मुझे भी लगता है कि मंहगे तोहफों की बात कुछ हल्कापन लाती है। चौथी बात, चूंकि वे लगभग पचास साल से भारत से बाहर रह रहे हैं, इसलिए मैं उनकी ग़ज़लों में समकालीन भारत की चिंताओं और सरोकारों को खोजने का प्रयास नहीं कर रहा हूं। अगर वे अपने रचनाकर्म में इस बात का ध्यान रखते भी हैं, तो वह इनमें परि‍लक्षित नहीं हो रहा है। हां, होशियार होते जिन बच्चों को देखकर वे हर्षित हैं| संभवत: वह उनके अपने परिवेश की बात है। कम से कम हम तो अपने परिवेश के बच्चों को देखकर एक पल के लिए हर्षित होते हैं और अगले ही पल उसके अंजाम से कांप उठते हैं। राजेश की  अपनी पसंद के तीन शेर ये हैं---
खुशबुओं को मेरे घर में छोड़ जाना आपका
कितना अच्छा लगता है हर रोज़ आना आपका


दिल भी हो उसका वैसा ज़रूरी तो ये नहीं
चेहरे पे जिसके माना कि दिलकश निखार है


हर किसी में होती हैं कुछ प्यारी-प्यारी चाहतें
क्यों न डूबे आदमी इन खुशबुओं के शहर में 

 
सर्वत जमाल साहब ने प्राण जी की गजलों पर कुछ कहने के पहले सोचा-- यह इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है| फिर भी कहने की हिम्मत की, प्राण जी की ये ४ रचनाएँ उनके शायर का पूरा व्यक्तित्व नहीं हैं| मुझे नहीं लगता कि रैंकिंग की दृष्टि से ये ४ गजलें अव्वल नम्बर की हकदार हैं लेकिन इनकी सरलता, भाव सम्प्रेषण और शायरी के सभी 'लवाजमात' से लैस होने की सच्चाई से इंकार करना तो सूरज को चराग दिखाने वाला मामला है| पर  प्राण जी के डिक्शन में एक जगह मैं सहमत नहीं हो पाया- उन्होंने तितलियाँ का जो उच्चारण इस्तेमाल किया है, मुझे ठीक नहीं लगा|  पढ़ते समय मुझे, मुआफ करें, बहुत कोफ़्त हुई| प्राण साहब खुद को रोक नहीं पाए, भाई सर्वत जी " तितलियाँ " शब्द को पढ़ कर आपको कोफ़्त हुई, मुझे अच्छा नहीं लगा है| बदली , झलकी , हस्ती , सिसकी आदि शब्दों का बहुवचन में उच्चारण बद + लियाँ , झल + कियाँ , हस + तियाँ , सिस + कियाँ होता है| इसी तरह तितली शब्द का बहुवचन में उच्चारण तित + लियाँ है और मैंने इसका प्रयोग इसी रूप में किया है| कृपया ध्यान से पढ़िए, यह कोफ़्त-वोफ्त को जाने दीजिये|

 
शायर अशोक रावत ने कहा, किसी भी कविता पर बात करते समय शिल्प और कथ्य की अलग- अलग बात नहीं की जा सकती| दोनों के समन्वय से ही कविता का स्वरूप तय होता है लेकिन कभी जब ऐसा होता है कि शिल्प में कोई कमी नहीं होती और कथ्य में कोई मन की बात नहीं होती तो बात करने में मुश्किल तो होती है| प्राण शर्मा जी की ग़ज़लें एक नज़र में ठीक लगती हें लेकिन कथ्य अच्छा होते हुए भी बांधता नहीं है| उनकी सादगी की तारीफ करनी होगी| यह मेरी पसंद का मामला है तथा मैं यहाँ उनकी रचनाओं की साहित्यिक विवेचना नहीं कर रहा हूँ| जिन्दगी मेरे लिए कभी इतनी आसान नहीं रही कि नज़र तितलियों पर ठहर पाती.
चलती रहती है हरदम इक आँधी सी
एक ही मौसम मेरे भीतर रहता है.
लेखिका और शायर देवी नागरानी ने एक शेर से अपनी बात शुरू की, मेरा तो सर भी वहॉं तक नहीं पहुँच पाता, जहॉं कदम के निशॉं आप छोड़ आये हैं।गजल का सफ़र तो बहुत तवील है, जितना आगे बढ़िए, मंजिल उतनी ही दूर लगती है| हाँ इस सफ़र में अनेक गजलकारों से, समीक्षात्मक टिप्पणियों से शब्दों के इस्तेमाल और उनके रख-रखाव के बारे में मदद मिलती है| बावजूद इन सब बातों के प्राण जी की गजलों में एक ताजगी है, उनकी सोच की उड़ान परिंदों के पर काटती है| उनकी कलम आज, कल और आने वाले कल के नवीनतम बिम्ब खींचने में कामयाब होती है...सो रहा था चैन से मैं फुरसतों के शहर में ,जब जगा तो खुद को पाया हादसों के शहर में| मुझे भी यही कहना है--
चैन लूटा इस ग़ज़ल ने, लिखते लिखते सो गई
जागी तब जब शेर गरजे काग़ज़ों के शहर में

 
प्राण जी ने इस विमर्श में शामिल लोगों को धन्यवाद देने के लिए कलम उठायी तो तितलियों के परों से  कई रंग बिखरने लगे| प्राण जी ने कहा, मैं अपनी ग़ज़लों पर सभी टिप्पणियों का आदर करता हूँ| सभी गुणीजन मेरे लिए माननीय हैं|  मैं तो एक बच्चे की सीख का भी मान करता हूँ| मेरी ग़ज़लों में दो - तीन ऐसे शब्द आयें हैं जो मेरे अनुभव पर आधारित हैं| कभी रघुपति सहाय फ़िराक गोरखपुरी ने कहा था कि ग़ज़लों में प्रकृति गायब है| मेरे मन - मस्तिष्क में यह बात बैठ गयी| मैंने कुछेक ग़ज़लें बदलियाँ, पंछी, मातृभूमि, तितलियाँ आदि पर कह दीं| " तितलियाँ " ग़ज़ल के जन्म की बात करता हूँ| शेक्सपीयर के जन्मस्थान स्ट्रेट अपोन
ऐवोन में एक तितली घर है| तितलियों का फूलों के आसपास, बीच में और आर - पार उड़ना देखकर मुझे एक फ़िल्मी गीत याद आ गया - तितली उड़ी / उड़ जो चली/ फूल ने कहा/ आजा मेरे पास/ तितली कहे/ मैं चली उस पार| घर आया तो मेरा एक शेर " फूलों के आर - पार " तैयार हो गया| तिलक राज कपूर ने सही कहा है कि " होशियार " शब्द के अनेक अर्थ हैं|  मैंने इस शब्द को " कुशल और बुद्धिमान के अर्थ में लिया है अपने शेर में | शेर यूँ बना - एक बार मेरे घर में मेरी पत्नी की दो सहेलियाँ आयीं| बातचीत में एक ने दूसरी को कहा - आपके दोनों बच्चे कितने ज़्यादा होशियार और पढ़े - लिखे निकले है ! दूसरी ने जवाब में कहा - आपके बच्चे भी तो होशियार और पढ़े - लिखे हैं| बीस साल पहले मैं जयपुर गया था| पत्नी के लिए चार सौ रुपयों की जयपुरी साड़ी खरीद ली| पत्नी को दी तो उसका मुँह फूल गया| दस साल पहले दिल्ली गया तो उसके लिए मँहगी से मँहगी साड़ी खरीदी| पाकर वह खुश तो हुईं लेकिन कह उठीं - इतनी मँहगी साड़ी लाने की क्या जरूरत
थी ? मेरा यह शेर बन गया - क्यों न लाता मँहगे - मँहगे तोहफे मैं परदेस से, वर्ना पड़ता देखना फिर मुँह फुलाना आपका| इस शेर में ज़रा " फिर " शब्द " पर गौर फरमाएँ| सब का धन्यवाद|


प्राण जी की इस सफाई से मामला और रोचक हो गया| सलिल जी और राजेश उत्साही आ धमके और फिर वे आपस में भी मीठी-मीठी  कहासुनी करते दिखाई पड़े| सलिल जी ने कहा, आपने वे वाक़यात बयान किए हैं, लिहाजा मैं सफाई रखना चाहता हूँ| तितली उड़ी वाला गीत यूँ है,“तितली उड़ी, उड़ जो चली/फूल ने कहा, आजा मेरे पास,/तितली कहे मैं चली आकास!” होशियारी वाली बात तो मैं समझ गया, दरअसल जहाँ आपका शेर ख़त्म होता है, मैंने वहाँ से एक नया मानी गढ़ने की कोशिश की और तितली उड़ी  की तर्ज़ पर न सीखी होशियारी की बात कही| महँगे तोहफे की बात पर.....हमारी  बेग़म होतीं तो कहतीं--ख़ामख़ाह ले आए इतने महँगे तोहफे आप क्यूँ, बस यही अच्छा नहीं पैसे उड़ाना आपका|

राजेश ने कहा, मैंने अपनी पहली टिप्पणी में कहा था कि मुझे तो यह प्रयोग सहज लगा। पर प्राण जी द्वारा यह कैफियत देने से बात उलझ गई है। आपने जिस फिल्मी गीत से प्रेरणा ली है, उसमें पंक्ति है- तितली कहे मैं चली आकाश, न कि - तितली कहे मैं चली उस पार| हां आगे एक पंक्ति है- जाना है वहां मुझे बादलों के पार| पर बात शुरू हुई थी सलिल जी की टिप्पणी से। उन्होंने फूलों के आर-पार पर असहजता महसूस की थी। पर मेरी समझ है कि बादलों के पार पर तो उनको भी कोई समस्या नहीं होगी। राजेश जी ने उस गीत को पूरा का पूरा ही प्रस्तुत कर दिया| अब देखिए मंहगे तोहफे वाले शेर की कैफियत पर भी आप उलझ गए हैं। हमने माना कि आप प्रवासी हैं। पर सचमुच क्या भारत आपके लिए परदेस हो गया है। कम से मैं तो इस शेर को भारत से बाहर जाकर भारत में लौटकर किसी परिचित से मिलने के संदर्भ में ही समझ रहा था। सलिल जी भला क्यों मानते| सोते से उठ के आये, बोले..फ़िलहाल, “बादलों के पार पर आपको कोई आपत्ति नहीं होगी” की बात समझ नहीं आई.. दरअसल यह मेरी ज़ाती राय है, क्योंकि मैंने कहीं ऐसी बात नहीं सुनी... मुझे यह लगता है कि आर पार का मतलब पैबस्त होने से है| जैसे तीर निशाने के आर- पार होना| कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीरेनीमकश को, वो ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता| एक और गाना याद दिला दूं,  कभी आर कभी पार लागा तीरे नज़र, पिया घायल किया रे तूने मोरा जिगर| आर पार अगर हो गई तितलियाँ तो फूलों के घायल होने का ख़तरा है| राजेश बोले, गाना मैंने आपके लिए नहीं प्राण जी के लिए दिया है क्यों कि गाने में एक जगह बादलों के पार आता है। बहुत संभव है उन्हें वह पंक्ति याद रही हो। और आपको आपत्ति नहीं होगी, वह इस अर्थ में कहा कि यह बादलों के पार प्रयोग तो इतना प्रचलित है कि आप भी उसको लेकर सहज होंगे। सलिल भाई, आरपार होने के आपने बहुत से उदाहरण दे दिए। उनसे कतई असहमति नहीं है। प्राण जी का जो प्रयोग है वह काव्य की दृष्टि से ही है। इसीलिए उनसे भी कहा कि इस पर कैफियत की कोई जरूरत ही नहीं। और आपकी टिप्पणी की आखिरी पंक्ति की बात करें तो ति‍तलियां तो फूलों को घायल करने का काम करती ही हैं न। एक और बात, प्राण जी ने अपने तीन शेरों के बारे में जो कैफियत दी, वह उनके सोच के दायरे को सीमित कर देती है। मैंने अब तक यह सीखा है कि आपका कोई भी निजी अनुभव साहित्य में तभी काम का होता है जब वह सर्वव्यापी होने की क्षमता रखता हो। इस दृष्टि से इन शेरों में कही गई बात कमजोर पड़ रही है। 


तिलकराज जी फिर मंच पर आ गये, प्राण साहब की तितलियॉं बेचारी उलझ गयी लगती हैं। प्राण साहब के अधिकॉंश शेर अपने आस-पास के अनुभवों से भरे होते हैं और आम बोल-चाल की सीधी-सादी भाषा से लिये गये होते हैं, जिसके कारण प्रथमदृष्‍ट्या ग़ज़ल बहुत सीधी-सादी सी लगती है। यहॉं फिर वही होता है कि जब इस बात पर ध्‍यान जाता है कि भाई एक परिपक्‍व उस्‍ताद शायर  की ग़ज़ल है तो शेर में उतरकर समझने की इच्‍छा होती है। अशोक रावत जी की टिप्‍पणी भी ग़ल़त नहीं लगती। इसी ब्‍लॉग पर रावत जी की एक अलग एहसास पर आधारित बेहतरीन ग़ज़लें हैं, जिन्‍हें देखने से स्‍पष्‍ट है कि उनकी शैली अलग तेवर लिये है। यहॉं समस्‍या कहन की शैली को लेकर है। मेरा अनुभव है कि  मुख्‍यत: सोच, संस्‍कार, संदर्भ और सरोकार खुलकर सामने आते हैं कहन में और इन्‍हें रूप देने में शब्‍द और शिल्‍प सामर्थ्‍य की महत्‍वपूर्ण भूमिका होती है| यही शैली रचनाकार की समीक्षात्‍मक भूमिका का प्रमुख आधार बनती है। ऐसी स्थिति में रचना के प्रति विविध विचार होना ग़लत तो नहीं लगता। संजीव ने जोड़ा, अद्भुत आनन्द आ रहा है चर्चा में। बड़े होकर भी तितलियों  के पीछे भागने में कितना आनन्द है आज जाना| तिलकराज जी ने बहुत खूबसूरती से बात को सामने रखा है, नजर आते हैं जो जैसे वो सब वैसे नहीं होते, जो फल पीले नहीं होते वो सब कच्चे नहीं होते| यहाँ तक आते-आते सलिलजी और राजेश जी की नोक-झोंक भी मद्धम पड़  चुकी थी और सलिल ने मधुर समर्पण से काम निकालने की तरकीब निकाली, दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह, या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं| आप की बात मेरे लिए आदेश है| राजेश भी मोम की तरह पिघल गए और बात उड़ाने के अंदाज में बोले, दिल जो भी कहेगा मानेंगे हम, दुनिया में हमारा दिल ही तो है| संजीव भाई ने भी खूब कही बड़े होकर भी हम तितलियों के पीछे भागना नहीं भूले।


चर्चित कवि सुरेश यादव ने कहा, प्राण शर्मा जी की गज़लें बहुत उम्दा शायरी का बेहतरीन नमूना हैं, इसमें कोई संदेह नहीं | सहजता इन ग़ज़लों का सौन्दर्य है, जैसे नदी का सौन्दर्य पानी के आवेग से बनता है, भावनाओं और विचारों का ऐसा ही आवेग इन ग़ज़लों में है| गजलकार नीरज गोस्वामी ने कहा, ज़बान की सादगी और भावनाओं का प्रवाह प्राण साहब की ग़ज़लों को एक अलग मुकाम देता है| उनकी ग़ज़लों की अपनी एक पहचान है,भीड़ में वो सबसे अलग खड़े नज़र आते हैं| जिंदगी की तल्खियाँ, खुशियाँ, दुश्वारियां, मसले निहायत ख़ूबसूरती से प्राण साहब अपनी ग़ज़लों में पिरोते हैं...उनका हर अशआर हमें जीना सिखाता है| गिरीश पंकज ने कहा, प्राण जी के हर शेर का अपना रंग है, उनके कहन का अपना अलग ढंग है| विमर्श में शामिल होकर समीरलाल जी, अविनाश जी, संजीव सलिल जी, अदा जी, निर्मला कपिला जी, सुनीता शानू जी, वेद व्यथित जी, रचना दीक्षित जी, लावण्या जी,  अरुण देव जी, शिखा वार्ष्णेय जी, डा टी एस दराल जी, रजी साहब जी, जितेन्द्र जौहर जी, सुनील गज्जाणी जी,  रंजना जी, दिगंबर नासवा जी ने साखी की गरिमा बढ़ाने में योगदान किया|

सूर्य का विश्राम पल होता नहीं
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इस बार की चर्चा बहुत गंभीर अंदाज में शुरू होकर बहुत मजेदार माहौल में ख़त्म हुई| प्राण जी के आदि-इत्यादि  और मेरे जागते रहने के प्रसंग ने सबको आनंद दिया| बात शुरू हुई राजेश उतसाही के बयान से, इस बार फिर हम सबने मिलकर सुभाष भाई का काम बढ़ा दिया। वे एक कुशल कक्षा अध्‍यापक की तरह हम सबकी कॉपियां जांचकर उसे लाल-हरा कर ही लेंगे। सर्वत ने बात बढ़ाई, डाक्टर सुभाष राय के लिए यह सब बाएं हाथ का खेल है. एक मुद्दत से अखबार के दफ्तर में कापियां ही तो जांचते रहे हैं|  एक राज़ की बात बताऊं, वह रात को भी नहीं सोते| तिलक राज जी ने जोड़ा, सर्वत साहब ने खूब कहा सुभाष राय जी के लिये| उन्‍हीं की बात पकड़कर कहता हूँ,रात हो या दिन, कभी सोता नहीं, सूर्य का विश्राम पल होता नहीं। इसी बीच प्राण जी ने एक प्यारा सा अनुरोध किया, मैं सभी से अनुरोध करता हूँ कि वे साखी ब्लॉग के इस पार आया करें| हंसी-हंसी में ही संजीव जी, राजेश जी, तिलक जी, सर्वत जी, पंकज जी, इत्यादि न  जाने कितने ज्ञान की बातें कर जाते हैं| सलिल जी ने चुटकी ली, प्राण साहब ने मुझे इत्यादि में सम्मिलित किया, पर उनकी बात से इत्तेफाक रखते हुए, सर्वत साहब के समर्थन में, तिलक राज जी के शेर को आगे बढाते हुए, अपनी तुकबंदी रखना चाहता हूँ--ब्लॉग-मरुथल में कहीं भी ढूँढ लो, “साखी” के अतिरिक्त, जल होता नहीं| फिर तो तिलक राज जी ने जो किया, वह आप  rastekeedhool.blogspot.com/2010/09/blog-post_29.html पर जाकर देख सकते हैं|  सलिल जी की आदि-इत्यादि में शामिल किये जाने की शिकायत संजीव ने दूर की, एक कहानी सुना कर---सलिल जी, प्रान सर ने आपको इत्यादि में यूं ही नहीं रखा है इसका खास कारण है। इसके पीछे एक किस्सा है। किस्सा भी असली है बस कवियों के नाम भूल गया हूँ । एक बार दो वरिष्ठ  कवि रेल से किसी कवि सम्मेलन में जा रहे थे। ट्रेन किसी स्टेशन जैसे ही रुकी, दोनों उतर गये। एक बोला,  पीने की तलब लग रही है। पास में ही दुकान है ले आते हैं। दोनों कविगण चल दिये। दुकान बड़ी मुश्किल से मिली। खैर समय कम था सो दोनों लोग बोतल कपड़ों में छुपाकर ले आये। ट्रेन  चली। अब समस्या सामने आयी कि लोगों के सामने कैसे पियें। तरकीब भिड़ाते हुए दोनों ने कविताएं पढ़नी शुरू कीं। लोग आनन्दित होने लगे। थोड़ी देर बाद उनमें से एक कवि पास बैठे सज्जन से बोले, भाई साहब ये सामने क्या लिखा है। सज्जन ने पढ़ा,‘ डिब्बे में बीड़ी आदि पीना सख्त मना है।‘ उन सज्जन ने सोचा कि कवि महोदय बीड़ी पीना चाहते है, सो बोले हां-हां क्यों नहीं आप बीड़ी पी लीजिए, हमें कोई तकलीफ नहीं है। कवि महोदय बोले नहीं बीड़ी नहीं पीनी है हमें तो आदि आदि पीना है। तो सलिल सर ये आदि इत्यादि कोई छोटी-मोटी चीज नहीं है। आप बड़े बड़भागी हैं। बधाई हो। 

 शनिवार को मनोज भावुक की भोजपुरी गजलें
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गुरुवार, 23 सितंबर 2010

प्राण शर्मा की गजलें

कवेंट्री, यू.के निवासी प्राण शर्मा वजीराबाद (पाकिस्तान) में १३ जून १९३७ को जन्मे। प्राथमिक शिक्षा दिल्ली में हुई, पंजाब विश्वविद्यालय से एम. ए., बी.एड. किया। छोटी आयु से ही लेखन कार्य आरम्भ कर दिया था| मुंबई में फिल्मी दुनिया का भी तजुर्बा कर चुके हैं| १९५५ से उच्चकोटि की ग़ज़ल और कवितायें लिखते रहे हैं। वे १९६५ से यू.के. में प्रवास कर रहे हैं। यू.के. से निकलने वाली हिन्दी की एकमात्र पत्रिका ‘पुरवाई’ के ‘खेल निराले हैं दुनिया में’ स्थाई-स्तम्भ के लेखक हैं। आपकी रचनाएँ युवा अवस्था से ही पंजाब के दैनिक पत्र, ‘वीर अर्जुन’ एवं ‘हिन्दी मिलाप’, ज्ञानपीठ की पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ जैसी अनेक उच्चकोटि की पत्रिकाओं और अंतरजाल पर प्रकाशित होती रही हैं। वे देश-विदेश के कवि सम्मेलनों, मुशायरों तथा आकाशवाणी कार्यक्रमों में भी भाग ले चुके हैं। ग़ज़ल कहता हूँ , सुराही (मुक्तक-संग्रह) प्रकाशित पुस्तकें हैं। .‘अभिव्यक्ति’ में प्रकाशित ‘उर्दू ग़ज़ल बनाम हिंदी ग़ज़ल’ और साहित्य शिल्पी पर ‘ग़ज़ल: शिल्प और संरचना’ के १० लेख हिंदी और उर्दू ग़ज़ल लिखने वालों के लिए नायाब हीरे हैं। १९६१ में भाषा विभाग, पटियाला द्वारा आयोजित टैगोर निबंध प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार. १९८२ में कादम्बिनी द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कहानी प्रतियोगिता में सांत्वना पुरस्कार. १९८६ में ईस्ट मिडलैंड आर्ट्स, लेस्टर द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार। २००६ में हिन्दी समिति, लन्दन द्वारा सम्मानित।

                              1.
खुशबुओं को मेरे घर   में छोड़  जाना आपका
कितना अच्छा लगता है हर रोज़ आना आपका

जब से जाना, काम है मुझको बनाना  आपका
चल न पाया कोई भी तब से  बहाना  आपका

आते भी हैं आप तो बस मुँह दिखाने के  लिए
कब तलक  यूँ  ही  चलेगा  दिल दुखाना आपका 

क्यों न भाये  हर किसी को  मुस्कराहट  आपकी
एक  बच्चे  की तरह  है  मुस्कराना  आपका

मान लेता हूँ चलो मैं बात हर इक आपकी
कुछ अजब सा लगता है सौगंध खाना आपका

क्यों न लाता मँहगे- मँहगे तोहफे मैं परदेस से
वरना  पड़ता देखना फिर मुँह फुलाना आपका

बरसों ही हमने बिताये हैं दो यारो की तरह
" प्राण " मुमकिन ही नहीं अब तो भुलाना आपका
  
                       2.
होते ही प्रात:काल  आ जाती हैं तितलियाँ
मधुवन में खूब धूम  मचाती हैं तितलियाँ

फूलों से खेलती हैं कभी पत्तियों के  संग
कैसा अनोखा खेल दिखाती हैं तितलियाँ

बच्चे, जवान, बूढ़े नहीं थकते देखकर
किस सादगी के साथ लुभाती हैं तितलियाँ

सुन्दरता की ये  देवियाँ परियों से कम नहीं
मधुवन में स्वर्गलोक रचाती हैं तितलियाँ

उड़ती हैं किस कमाल से फूलों के आर-पार
दीवाना हर किसी को बनाती हैं तितलियाँ 

वैसा कहाँ  है जादू परिंदों का राम जी 
हर ओर जैसा जादू जगाती हैं तितलियाँ 

उनके ही दम से " प्राण " हैं फूलों की रौनकें 
फूलों को चार  चाँद लगाती हैं तितलियाँ 
                
प्रख्यात चित्रकार अनिमेष की रचना 


                                               ३.
सो रहा था चैन से मैं फुरसतों के शहर में 
जब जगा तो खुद को पाया हादसों के शहर में 

फासले तो फासले हैं दो किनारों की तरह 
फासले मिटते कहाँ हैं फासलों के शहर में 

दोस्तों का दोस्त है तो दोस्त बन कर ही तू रह 
दुश्मनों की कब चली है दोस्तों के शहर में 

थक गये  हैं आप तो आराम कर लीजै मगर 
काम क्या है पस्तियों का हौसलों के शहर में 

मिल नहीं पाया कोई सोने का घर तो क्या हुआ 
पत्थरों का घर सही अब पत्थरों के शहर में 

हर किसी में होती हैं कुछ प्यारी-प्यारी चाहतें 
क्यों न डूबे आदमी इन खुशबुओं के शहर में 

धरती-अम्बर,  चाँद-तारे, फूल-खुशबू, रात-दिन 
कैसा-कैसा रंग है इन बन्धनों के शहर में 

                             ४.
नफरत का भूत नित मेरे सर पर सवार है 
क्या हर कोई ए दोस्तो इसका शिकार है

दिल भी हो उसका वैसा ज़रूरी तो ये नहीं
चेहरे पे जिसके माना कि दिलकश निखार है

पूछो कभी तो दोस्तो उनके दिलों का हाल
जिनके सरों पे कर्जे की तीखी कटार है

धरती हो, चाँद हो या सितारे हों या हवा
हमको तो इस जहान की हर शै से प्यार है

आराम उनको क्या नहीं कुछ वक़्त के लिए
हमला दुखों का राम जी क्यों बार -बार है

जीते हैं  हम भी आस में हर कामयाबी की
हमको भी हर खुशी का सदा इंतज़ार है

ए  "प्राण"  देख- सुन के भला हर्ष क्यों न हो
हर बच्चा आजकल बड़ा ही होशियार है
                     




3 Crackston Close,
Coventry, CV2 5EB, UK
pransharma@talktalk.net   

लगता है जरा बीमार नुक्ताचीं


राजेन्द्र स्वर्णकार की रचनाओं को प्रस्तुत करते समय मैंने उन्हें गजल कहकर नहीं रखा पर जब बहस शुरू हुई तो लोगों ने उन्हें गजल समझकर अपनी बातें रखीं, यह एक तरह से राजेन्द्र की इस काव्य-विधा पर पकड़ का प्रमाण तो है लेकिन पकड़ तभी संयत और मजबूत होती है, जब रचनाकार हर स्तर पर अपने को आलोचना के लिए न केवल खुला रखता है बल्कि आलोचना से विचलित होने की जगह निरंतर आत्म-परिष्कार के लिए तैयार रहता है| जाने-माने रचनाकार तिलकराज कपूर ने अगर अपनी बात किसी खास दायरे में बाँधकर पेश करने की जगह सभी गजलों पर बात की होती तो और बेहतर होता, फिर भी उन्होंने राजेन्द्र की गजलों को समझने का जो सिलसिला शुरू किया, उसे चंद्रभान भारद्वाज, राजेश उत्साही  और अशोक रावत ने सम्यक विस्तार दिया| तिलकराज जी की कुछ स्थापनाओं से कवि जितेन्द्र जौहर असहमत रहे, जो उनका अधिकार है, पर उन्हें कविता पर जो बात करनी चाहिए थी, उससे ज्यादा उन्होंने तिलकराज जी के व्यक्तित्व पर कदाचित  कटाक्ष करते हुए बात की, जिसने  राजेश उत्साही को दखल देने को विवश किया| इस नोक-झोंक से बातचीत ने काफी रोचक मोड़ ले लिया| राजेश को राजेन्द्र से कुछ ज्यादा अपेक्षा थी, वे निराश हुए| कवि और शायर प्राण शर्मा को  तिलक जी, चंद्रभान जी, अशोकजी और राजेश जी की टिप्पणियों में काफी वजन दिखा और उन्होंने उनकी खुलकर सराहना की| राजेन्द्र स्वर्णकार ने विनम्रता से सबका आभार भी प्रदर्शित किया और जहां जरूरत समझी, अपनी रचनाओं का बचाव भी किया| हां, मेरी समझ में राजेन्द्र जी ने टिप्पणियों को लेकर जो अटकलें लगायीं, वे जल्दबाजी का परिणाम थीं। उन्हें कुछ अनुमान करने की जगह थोड़ा इंतजार करना चाहिये था। अशोक रावत जी के बारे में की गयी टिप्पणियों से मैं  स्वयं निराश हुआ, क्यों कि मैं अशोक जी के जीवन और रचना कर्म को नजदीक से जानता हूं। 

तिलकराज कपूर ने चर्चा की सार्थकता और राजेन्‍द्र जी पर अपने विशेषाधिकार के नाते पहली गजल के कुछ अशआर पर अपना मत खुलकर दिया| उन्होंने कहा कि शब्‍द प्रयोग की दृष्टि से यह गजल है तो बहुत अच्‍छी लेकिन बारीकी से देखें तो कुछ खटकता दिखता है| न इक पत्ता हवा के संचरण से तब हिला होता, दिशा-निर्देश प्रभु का काम यदि ना कर रहा होता, इसमें पहली पंक्ति अधिक पुष्‍ट रहती यदि ऐसा कहते कि हवा के संचरण भर से न इक पत्‍ता हिला होता| चराचर सृष्टि जल ज्वाला पवन आकाश धरती में, हृदय चाहे तो पग-पग ईश का दर्शन हुआ होता, इसमें दूसरी पंक्ति अधिक पुष्‍ट रहती यदि ऐसा कहते कि हृदय गर चाहता तो ईश का दर्शन हुआ होतावनस्पति जीव रवि शशि काल ऋतु दिन रैन का सृष्टा, न क्षण भर; वह सनातन सर्वव्यापक सर्वदा होता, इसमें दूसरी पंक्ति भाव-विपरीत है, शायर  का भाव तो यहॉं यही अपेक्षित है कि  सनातन सर्वदा सर्वव्यापक है जबकि ध्‍वनित उल्‍टा हो रहा है। यही इससे अगले शेर में हो रहा है। अगले शेर में वह की पुनरावृत्ति भी दोषपूर्ण है। समाया सूक्ष्मतम् बन कर अखिल ब्रह्मांड में है जो,
कहकर दूसरी पंक्ति का निराकरण तो हो जाता है। शिला बनती अहिल्या, प्राण प्रस्तर ना पुनः पाता, न यदि निज चरण-रज से धन्य राघव ने किया होता, यह अधिक पुष्‍ट रहता यदि ऐसा कहते कि शिला र‍हती अहिल्‍या, प्राण प्रस्‍तर में नहीं आते, न गर उद्धार राघव ने चरण-रज से किया होता न अपनों को भुलाता है न अंतर-भेद कुछ करता, वो गज का, द्रोपदी प्रह्लाद ध्रुव का एक-सा होता, इसकी पहली पंक्ति को देखें, विरोधाभास है, जो अंतर या भेद नहीं करता है, उसके लिये अपना पराया कैसा (यहॉं अंतर ओर भेद भी समानार्थक हैं) | सच्चिदानंद की राजेन्द्र यदि मिलती न अनुकंपा, निरंतर जन्म लेता और मरता, मिट गया होता, इसमें भी  विरोधाभास है या तो ‘निरंतर जन्म लेता और मरता’ और ‘मिट गया होता’ परस्‍पर विरोधी हैं। ये बारीक बाते हैं जो अक्‍सर ध्‍यान में नहीं आतीं। 

जितेन्द्र जौहर ने ग़ज़ल-1 व 4 को अतिसुन्दर कहा। वे अपने कथन का और विस्तार करते कि ये रचनाएँ क्यों अति सुन्दर हैं तो कुछ और बात सामने आती पर राजेन्द्र के चिंतन-लोक की झलक, उनकी परिनिष्ठित व परिमार्जित भाषा की सराहना कर वे सीधे तिलक राज कपूर पर पिल पड़े और उनकी टिप्पणियों को कुछेक सार्थक बिन्दुओं के पार्श्व से ’आत्म-प्रक्षेपण’ की प्रबल चाह का विकल नर्तन करार दिया| यहाँ तक कहा कि  कपूर जी को मैंने कुछेक अन्य साइट्‌स एवं ब्लॉग्ज़ पर ठीक यही ’पुनरोक्ति-प्रकाशन’ करते देखा और पढ़ा है कि "सभी में आलोचना की सहज स्‍वीकार्यता नहीं होती, इसलिये मैं सामान्‍यत: आलोचनात्‍मक टिप्‍पणियाँ देने से बचने की कोशिश करता हूँ, लेकिन चर्चा की सार्थकता...।"  

गजल या कविता पर बात करते हुए इतना व्यक्तिगत होने की आवश्यकता नहीं लगती, अगर जौहर जी को तिलकराज जी की बातों का खंडन करना ही था तो तर्कपूर्वक करते, सबको अच्छा लगता| उन्होंने तो यहाँ तक सलाह दे डाली कि यदि आप राजेन्द्र भाई को उक्त सभी समझाइशें सीधे तौर पर पत्र या ईमेल से भेजते तो आपका व्यक्तित्व कुछ और ही झलकता। ध्यान रहे कि दृढ़ इच्छाशक्ति वाले लोग तो ऐसी सार्वजनिक धुलाई से चमक उठते हैं, लेकिन कमज़ोर लोग डरकर लेखनी सदा के लिए फेंक भी सकते हैं। ऐसे में स्थापितों का यह धर्म है कि वे नवोदितों को निखारें...किन्तु प्यार के साथ!
 
राजेश उत्साही को वार्ता की यह संकीर्णता पसंद नहीं आयी| उन्होंने बहुत साफ कहा कि कुछ साथियों को साखी को लेकर कुछ भ्रम हुआ है। जौहर जी  ने जो सलाह तिलक जी को दी है, अव्‍वल तो वह अनुचित है क्‍योंकि मेरे विचार में साखी मंच ही समीक्षा का है। दूसरी बात, जो बातें उन्होंने तिलक जी से कहीं, वे भी उन्‍हें ईमेल या पत्र के जरिए भेज सकते थे।अगर मैं यह कहूं कि ’आत्म-प्रक्षेपण’ की प्रबल चाह का विकल नर्तन तो आपमें भी दिखाई दे रहा है तो अन्‍यथा न लीजिएगा| उन्होंने सबसे पूछा, क्‍या जितेन्‍द्र जी जिस तरह से कपूर जी की आलोचना कर रहे हैं, वह शोभा देता है।फिर वे राजेन्द्र की गजलों पर आये, सुना है, राजेन्‍द्र जी मधुर वाणी के धनी हैं,  मोहित करने वाली शब्‍दावली भी उनके पास है पर यहां उनके साहित्यिक अवदान की बात उनकी रचनाओं के लिखित स्‍वरूप के आधार पर की जानी चाहिए। मैं अपनी बात इसी कसौटी पर कह रहा हूं। पहली, तीसरी,चौथी रचनाएं भजन की श्रेणी में रखी जा सकती हैं और भजन प्रभु मात्र की आराधना में गाया जाता है। वे इसमें सफल रहे हैं। दूसरी रचना कुछ अलग से तेवर की है। मैं रचनाओं में कुछ अलग बिम्‍ब या कहन का तरीका ढूंढता रहता हूं। इस स्‍तर पर मुझे राजेन्‍द्र जी की इन रचनाओं से निराशा ही हाथ लगी। उन्‍होंने जो बिम्‍ब लिए हैं, वे चमत्‍कृत नहीं करते हैं। हां, उनके लिए उन्‍होंने समृद्ध शब्‍दों का उपयोग किया है। मुझे उनमें आम आदमी और उसकी चिंताओं के दर्शन नहीं हुए।


गजलों के शिल्प और कथ्य पर पकड़ रखने वाले चंद्रभान भारद्वाज ने कहा कि इन ग़ज़लों में शब्द संयोजन, भाषा सौष्ठव, भावनात्मक सम्प्रेषण और कथन सभी ठीक हैं लेकिन कहीं कहीं तकनीकी और व्याकरण की दृष्टि से कुछ कमियाँ रह गईं हैं| लम्बी बहर की ग़ज़लों में भरती के जिन शब्दों का प्रयोग किया है, वे भी अखरते हैं| पहली ग़ज़ल के मतले के पहले मिसरे में 'तब' और दूसरे मिसरे में 'ना' शब्द अखरते हैं, अगर मतले को ऐसे लिखा जाता तो बहतर होता -न इक पत्ता हवा के संचरण से भी हिला होता, दिशा निर्देश यदि उसको नहीं प्रभु का रहा होता| चौथा शेर स्पष्ट नहीं है, 'शिला बनती अहिल्या ' वाला शेर भी स्पष्ट नहीं है, इसे यदि इस तरह लिखते तो स्पष्ट होता- शिला रहती अहिल्या प्राण प्रस्तर को न मिल पाते, न यदि निज चरण रज से धन्य राघव ने किया होता| तीसरे और चौथे शेर स्पष्ट नहीं हैं|. 'न राधा के ह्रदय ' वाला मिसरा भी व्याकरण की दृष्टि से गलत  हैं, इसमें 'प्रीत-लौ' स्त्रीलिंग है, अतः क्रिया 'जली होती' आता 'जला होता' नहीं| दूसरे राधा का सम्बन्ध  कृष्ण से है, भगवान से नहीं, अतः शेर यदि ऐसे लिखा जाता तो अधिक सटीक रहता-स्वयं कान्हा भी यदि उससे न करता स्नेह सच्चा तो, न राधा के ह्रदय में प्यार लौ बनकर जला होता| 'पुन्यवश वाले' शेर के भाव स्पष्ट नहीं हैं तथा ये बहर में भी नहीं है| इसी प्रकार सच्चिदानंद वाला मिसरा भी बहर में नहीं है| दूसरी ग़ज़ल में 'खस्ती' पस्ती' शब्द शब्दकोष के अनुसार नहीं हैं, ये केवल तुकबंदी के लिए गढ़े गए हैं|  सही शब्द 'खस्ता' और पस्त' हैं जो इस ग़ज़ल में कहीं भी फिट नहीं बैठते| .तीसरी और चौथी ग़ज़ल के अरकान हैं २ २ २ २ २ २ २ २ लेकिन दोनों ग़ज़लों में कई शेर अरकान में सही नहीं बैठते| चौथी ग़ज़ल में भी 'ना' शब्द का प्रयोग कई जगह किया है जो अखरता है| मकते में 'ऐसन बुरी बुराई बाबा ' में 'बुरी' शब्द निरर्थक है| इसी तरह 'बोल' 'बता' दोनों शब्दों का प्रयोग एक जगह उचित नहीं लगता| यह शेर भी अगर ऐसे होता तो अधिक उचित लगता- बोलो इस राजेंद्र में देखी, ऐसी कौन बुराई बाबा|


बात गजलकार अशोक रावत ने आगे बढ़ाई| उन्होंने कहा, चन्द्रभाल सुकुमार ने तत्सम शब्दावली में समकालीन परिवेश के साथ-साथ पौराणिक सांस्कृतिक वैभव को गजल के फ़ार्म में पूर्णता के साथ पिरोने का काम किया है| चंद्रसेन विराट और एहतराम इस्लाम के नाम भी गजलों में शुद्ध हिन्दी का प्रयोग करने वालों में सम्मान के साथ लिए जा सकते हैं| यहाँ तिलकराज जी और चंद्रभान जी की टिप्पणियों पर राजेन्द्र जी को सिर्फ ध्यान ही नहीं देना चाहिए बल्कि उनको धन्यवाद भी देना चाहिए| दोनों ने ही शालीनता के साथ टिप्पणी की है| मुझे नहीं लगता कि यह ब्लॉग लोगों की सिर्फ झूठी तारीफ़ करने के लिए है| यह भी सच है कि कभी लोग अपना सिक्का जमाने के लिए शालीनता की फ़िक्र नहीं करते लेकिन ऐसे लोग भीतर से कमजोर होते हैं और उनमें आत्मविश्वास की कमी होती है| रावत  जी ने यह भी सलाह दी कि डा. सुभाष राय को भी देखना चाहिए कि इस ब्लॉग पर कमजोर रचनाएँ न आयें, श्रेष्ठ गीतों और गजलों का बड़ा खजाना है, उसे लोगों तक पहुंचाएं| (रावत जी की यह सलाह बेहतर है, तब तो मुझे बहुत मेहनत भी नहीं करनी पड़ेगी, लेकिन अपने समकाल में जो लोग पहचान बनाने के लिए जूझ रहे हैं, अगर उन्हें सामने नहीं लाया जाएगा तो उन्हें कैसे पता चलेगा कि वे जो लिख रहे हैं, वह कितना ठीक हैं उन्हें कितनी मेहनत  की जरूरत है और वे कहाँ क्या गलतियां कर रहे हैं| तब तो वे अपनी दुनिया में मस्त रहेंगे अपने को खुदा समझते हुए| जो समझेंगे, उन्हें हम परिष्कार का मौका भी दे रहे हैं)| प्राण शर्मा जी ने कहा कि राजेन्द्र जी की गजलों में गुण भी हैं और दोष भी| कोई मुकम्मल शायर नहीं होता, सभी गलतियाँ करते हैं| तिलकराज जी, चंद्रभान भारद्वाज, राजेश उत्साही, अशोक रावत की टिप्पणियां सहेजने योग्य हैं| उन्होंने आग में घी डालने वाली टिप्पणियों से बचने की सलाह भी दी|
 

शायर डी के मुफलिस साहब के मुताबिक अपने समय और समाज के सच को महसूस कर पाने, समझ पाने और व्यक्त कर पाने की कुशलता के आधार पर टिकी राजेंद्र जी की रचनाएं हमेशा ही अपने पाठक वर्ग को प्रभावित कर पाने में सफल रहती हैं। हालांकि.. मात्र दुर्बोध शब्द-संयोजन किसी भी काव्य के
उत्कृष्ट एवं सफल होने की कोई कसौटी नहीं है, फिर भी उनकी शैली विशिष्ट है। यह भी सच है कि शिल्प की अपरिपक्वता हमेशा जागरूक और सचेत पाठक को अखरती है लेकिन यह भी सच है कि किसी रचना-विशेष की सरंचना के आधार पर किसी लेखक की योग्यता की समग्रता का मूल्यांकन/प्रेक्षण कर पाना न तो संभव है और न ही प्रासंगिक। एक बहुत बड़ा सच यह भी है  कि  सिर्फ और सिर्फ विद्वान् पाठक ही अपनी तीक्ष्ण और पैनी दृष्टि से किसी रचनाकार की योग्यता को प्रमाणित करने की क्षमता रखता है और अधिकार भी। सलिल जी ने कहा, राजेंद्र स्वर्णकार की लगन देखकर यह मानना पड़ता है कि इनकी रचनाएँ हृदय से निकलती हैं और इनकी साहित्य के प्रति समर्पण की भावना का प्रतिनिधित्व करती हैं। समस्त रचनाएँ छोटी मोटी त्रुटियों के बावजूद पठनीय हैं और श्रेष्ठता की श्रेणी में रखी जाने योग्य हैं। राजेंद्र जी, चुँकि मूल रूप से अपनी रचनाओं की कल्पना गायन के माध्यम से करते हैं, इसलिए यह सभी गेय हैं. और यही कारण है कि इनकी कविताएँ लयबद्ध होती हैं तथा ग़ज़लें बहर में। विज्ञान कथाकार अरविन्द मिश्र ने कहा, राजेन्द्र जी की रचनाएं इस लिहाज से विशिष्ट हैं कि वे अपने में मानवीय भावों का एक सनातन बोध लिए होती हैं और उसी की पृष्ठभूमि में ही समकालीन विपर्ययों पर चोट करती हैं -एक संवेदना युक्त मनुष्य के समग्र आग्रहों को भी बखूबी अभिव्यक्ति देती हैं। प्रेम ,संयोग वियोग, अध्यात्म, सांसारिकता का अद्भुत मोजैक देखना हो तो इस कवि का आह्वान किया जाना चाहिए। डा महाराज सिंह परिहार ने कहा, स्‍वर्णकार जी की रचनाएं काव्‍य शिल्‍प और गेयता की कसौटी पर खरी उतरती हैं। इस्मत जैदी ने कहा, अंतिम दोनों रचनाएं सुंदर हैं, पहली रचना में हिंदी शब्दों का प्रयोग बहुत बढ़िया है।  निर्मला कपिला के मुताबिक मानवीय मूल्य विलुप्त हो रहे हैं, ऐसे में राजेन्द्र जी जैसे कवियों की बहुत जरूरत है, तिलक जी जैसों  का मार्ग दर्शन हो तो सोने पर सुहागा होगा। कवि गिरीश पंकज ने कहा, इस कवि में अद्भुत प्रतिभा है, ग़ज़ल और छंदशास्त्र पर अच्छी पकड़ है। धीरे-धीरे यह काव्य-प्रतिभा साहित्य की दुनिया में अपनी जगह बना लेगी, ऐसा विश्वास है। शायर नीरज गोस्वामी ने कहा, राजेंद्र जी की रचनाएँ उन्हीं की तरह विलक्षण हैं, उनका शब्द ज्ञान विस्मयकारी है। डा त्रिमोहन तरल ने कहा, ग़ज़ल कहने के लिए ज़रूरी बहरो-वज्न का पर्याप्त ज्ञान आपके पास है। वो तो विशुद्ध हिंदी की शब्द-सम्पदा का प्रयोग कर ग़ज़लें कहने की प्राथमिकता (जो निश्चित ही एक आदर्श है) ने कुछ सीमा रेखा खींच दी है। अन्यथा आप निश्चित रूप से बेहतर तगज्जुल वाली ग़ज़लें कहने की क्षमता रखते हैं। रचनाकार देवी नागरानी, शाहिद मिर्जा शाहिद, दिगम्बर नासवा, समीरलाल जी, हरकीरत हीर, डा चन्द्र प्रकाश राय, डा रूप चन्द्र शास्त्री मयंक, सुनील गज्जाणीअविनाश वाचस्पति, मदन मोहन अरविन्द, प्रतुल वशिष्ठ ने भी अपनी बातों से मजलिस की शोभा बढ़ाई।


तिलकराज जी पर जितेन्द्र जौहर की टिप्पणियों को लेकर राजेश उत्साही के दखल का राजेन्द्र जी ने जवाब देने का प्रयास किया और फिर दोनों की मुठभेड़ ने एक शब्द समर का रूप ले लिया। राजेन्द्र ने कहा, राजेश जी , अव्वल तो अंतर्जाल पर अब तक मेरा शत्रु कोई है नहीं । …और भगवान के भजन लिखने-गाने वाले का नुकसान कोई कर भी नहीं सकता, है ना ? अपनी बात कहने के लिए मेरे पास मेरी अपनी वाणी, लेखनी और सलाहीयत है। राजेश जी, आप मेरी सौ - पचास रचनाएं देख पाएं  तो आपकी अवधारणा बदल भी सकती है। आपने विलंब से ही सही, मेरी रचनाओं पर बात करने की कृपा की, अच्छा लगा । यदि आप ग़ज़ल की विभिन्न बह्रों को समझ पाते हैं तो  इस बारे में भी अपनी प्रतिक्रिया यहां रखते तो और अच्छा लगता। राजेन्द्र ने त्रिमोहन जी के लिये एक उर्दू गजल पेश की, बहुत राजेन्द्र ने समझा दिया फ़िर भी नहीं समझा, दिमागो - दिल से लगता है ज़रा बीमार नुक़्ताचीं और तिलकराज जी की ओर इंगित करते हुए कहा, कपूर साहब एक गुणी ग़ज़लगो हैं, यहां कही गई उनकी कई बातों से मैं स्वयं सहमत नहीं। किसी रचना का यह अंतिम आकलन भी नहीं, अंतिम अवसर भी नहीं, कपूर साहब या कोई अन्य अंतिम आलोचक - समीक्षक भी नहीं। उन्होंने अशोक रावत जी को भी हिदायत दे डाली, जितने गुणीजनों का आपने नाम लिया, उन तक ये रचनाएं पहुंचा कर उनमें से किन्हीं की प्रतिक्रिया भी यहां रखते तो उनके नाम का उल्लेख करना और भी सार्थक होता । यहां प्रस्तुत जिन ग़ज़लों पर विमर्श चल रहा है, आपकी बातों से आपकी कोई प्रतिक्रिया स्पष्ट नहीं हुई ।


राजेश उत्साही फिर आने को विवश हुए, राजेन्द्र जी आपने लिखा है अंतर्जाल पर अब तक मेरा शत्रु कोई है नहीं। यह तो आपके जवाबों से पता चला रहा है। जानकर प्रसन्नता हुई कि आप इतने अधिक अनुभवी हैं। फिर साखी पर हम सबके बीच क्यों आ खड़े हुए। राजेन्द्र जी ये कबीर बाबा का चौराहा है। यहां तीन हजार नहीं तीस हजार रचनाएं लिखने वालों का भी स्वागत इसी तरह होगा। क्योंकि मैंने पहले भी कहा कि मेरे‍ लिए तो यहां प्रस्तुत रचनाएं ही कसौटी हैं। अंत में यह कहना चाहूंगा कि हिन्दी या उर्दू या किसी भी भाषा के इतने भारी भरकम शब्द रखकर आप लोगों की वाह वाही तो लूट सकते हैं, दिल में नहीं उतर सकते। ठीक इसी तरह आपने सबके नाम के आगे आदरणीय लगा तो दिया, लेकिन केवल शब्द लगाने से आदर व्यक्‍त नहीं होता, उसे व्यवहार में भी लाना पड़ता है।




शनिवार को प्रवासी शायर प्राण शर्मा की गजलें 
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शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

राजेन्द्र स्वर्णकार की रचनाएँ|



राजेन्द्र स्वर्णकार का जन्म २१ सितम्बर १९५९ को बीकानेर में पिता श्री शंकर लाल और मां श्रीमती  भंवरी देवी के घर हुआ| लगभग सभी विधाओं में छंदबद्ध काव्य-सृजन और काव्य मंचों पर निरंतर सक्रियता| आकाशवाणी से रचनाओं का प्रसारण और प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन| अनेक महत्वपूर्ण संकलनों में भी शामिल| विश्व साहित्य के स्थल कविता-कोश में रचनाएँ शामिल| विभिन्न ब्लाग्स, साइट्स और ई-मैगज़ीन्स में रचनाएँ| राजस्थानी और हिन्दी में दो गजल संग्रह, रूई मांई सूई और आईनों में देखिये प्रकाशित| साहित्य और रचना कर्म के लिए अनेक संस्थाओं की ओर से सम्मान| राजेन्द्र की कुछ रचनाएँ यहाँ पेश हैं......
                                                     १.
न इक पत्ता हवा के संचरण से तब हिला होता
दिशा-निर्देश प्रभु का काम यदि ना कर रहा होता 
चराचर सृष्टि जल ज्वाला पवन आकाश धरती में
हृदय चाहे तो पग-पग ईश का दर्शन हुआ होता 
वनस्पति जीव रवि शशि काल ऋतु दिन रैन का स्रष्टा 
न क्षण भर; वह सनातन सर्वव्यापक सर्वदा होता 
समाया सूक्ष्मतम् बन कर अखिल ब्रह्मांड में जो, वह
अनश्वर, वह अजन्मा शुद्ध हृदयों में बसा होता  
स्वयं भगवान यदि जग से न करता स्नेह सच्चा, तब
न राधा के हृदय में प्रीत-लौ बनकर जला होता 
शिला बनती अहिल्या, प्राण प्रस्तर ना पुनः पाता
न यदि निज चरण-रज से धन्य राघव ने किया होता 
न अपनों को भुलाता है न अंतर-भेद कुछ करता
वो गज का, द्रोपदी प्रह्लाद ध्रुव का एक-सा होता 
लगा लौ, ईश से यह मोक्ष पाने का सुअवसर है
पुण्यवश योनि यह मिलती, न मानव अन्यथा होता 
सच्चिदानंद की राजेन्द्र यदि मिलती न अनुकंपा
निरंतर जन्म लेता और मरता, मिट गया होता 

2

द्वारिका में राग-रस-मद रत हर इक बस्ती रही
बस सुदामाओं की ही हालत यहां ख़स्ती रही
वृत्ति असुरों की है फलती स्वर्ण-लंका-सदन में
जो हरिश्चंदर बने उनके ही घर पस्ती रही
हर इक युग धृतराष्ट्र  अंधे ही रहे सुत-मोह में
अस्मिता पांचालियों की हर इक युग सस्ती रही
थे जटायु कट गए, गज फंस गए, हय हत हुए
मात्र कुछ रंगा-सियारों की बहुत मस्ती रही
हां, हुए मंसूर ईसा भी कई सुकरात भी
क्या हुआ राजेन्द्र उनका, उनकी क्या हस्ती रही










३.
 मन है बहुत उदास रे जोगी !
आज नहीं प्रिय पास रे जोगी !
पूछ ! प्रीत का दीप जला कर
कौन चला बनवास रे जोगी !
जी घुटता है ; बाहर चलती
लाख पवन उनचास रे जोगी !
अब सम्हाले' संभल पाती
श्वास सहित उच्छ्वास रे जोगी !
पी' मन में रम - रच गया ; जैसे
पुष्प में रंग - सुवास रे जोगी !
प्रेम - अगन में जलने का तो
हमको था अभ्यास रे जोगी !
किंतु विरह - धूनी तपने का
है पहला आभास रे जोगी !
धार लिया तूने तो डर कर
इस जग से सन्यास रे जोगी !
कौन पराया - अपना है रे !
क्या घर और प्रवास रे जोगी !
चोट लगी तो तड़प उठेगा
मत कर तू उपहास रे जोगी !
प्रणय विनोद नहीं रे ! तप है !
और सिद्धि संत्रास रे जोगी !
छोड़ हमें राजेन्द्र अकेला
है इतनी अरदास रे जोगी !

४.
हमसे कौन लड़ाई बाबा ?
हो अब तो सुनवाई बाबा !
सबकी सुनता ; हमरी अब तक
बारी क्यों ना आई बाबा ?
हमसे नाइंसाफ़ी करते '
तनिक रहम ना खाई बाबा ?
इक बारी मं कान ढेरे
कितनी बार बताई बाबा ?
बार-बार का बोलें ? सुसरी
हमसे हो ढिठाई बाबा !
नहीं अनाड़ी तुम कोई ; हम
तुमको का समझाई बाबा ?
दु: से हमरा कौन मेल था,
काहे करी सगाई बाबा ?
बिन बेंतन ही सुसरी हमरी
पग-पग होय ठुकाई बाबा !
तीन छोकरा, इक घरवाली,
है इक हमरी माई ; बाबा !
परइनकी खातिर भी हमरी
कौड़ी नहीं कमाई बाबा !
बिना मजूरी गाड़ी घर की
कैसन बता चलाई बाबा ?
हमरा कौनो और जग मं
हम सबका अजमाई बाबा !
ना हमरा अपना भैया है,
ना जोरू का भाई ; बाबा !
और मुई दुनिया आगे हम
हाथ नहीं फैलाई बाबा !
जानके भी अनजान बने ;  है
इसमें तो' बड़ाई बाबा ?
नींद में हो का बहरे हो ? हम
कितना ढोल बजाई बाबा ?
हम भी ज़िद का पूरा पक्का
गरदन इहां कटाई बाबा !
तुम्हरी चौखट छोड़' दूजी
चौखट हम भी जाई बाबा !
कहदे, हमरी कब तक होगी
यूं ही हाड-पिंजाई बाबा ?
बोल ! बता, राजेन्द्र मं का है
ऐसन बुरी बुराई बाबा ?!


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बीकानेर 334001 ( राजस्थान )
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ब्लॉग : शस्वरं