अभियान के साथी

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

यही है साखी

कबीर ने कहा, आओ 
तुम्हें सच की भट्ठी में 
पिघला दूं, खरा बना दूं 


मैंने  उनके शबद की आंच पर 
रख दिया अपने आप को 
मेरी स्मृति खदबदाने लगी 
वेद, श्रुति, पुराण और उपनिषद 
तलछट की तरह बाहर हो गये 
जाति वाष्प बनकर उड़ गयी 
उंच-नीच का दर्प भस्म हो गया
शबद रह गया सिर्फ अनहद 
गूंजता हुआ मेरे महाकाश में 


कबीर ने पूछा, क्या देख रहे हो 
अब अपने भीतर, बताओ 
मैं चुप रहा, बिल्कुल खामोश 
जब मेरे भीतर-बाहर 
कबीर ही कबीर था 
जब मैं था ही नहीं तो 
कौन देता जवाब, किसे 


यही है साखी, कहा कबीर ने 
और मैं स्पंदन में बदल गया 
नाद में तबदील हो गया
अब मैं अपना घर 
फूंकने को तैयार हूँ, 
लुकाठा थामने को तैयार हूँ 





29 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत शानदार रचना...बधाई स्वीकारिये.

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  2. हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग
    एक लुकाठा ही है
    वर्तमान कबीर का।

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  3. जब मेरे भीतर-बाहर
    कबीर ही कबीर था
    जब मैं था ही नहीं तो
    कौन देता जवाब, किसे

    Bahut sundar Rachna..Satya ka darshar karati hui.

    Koshish kar rahi hun, iss satya ko aatmasaat kar sakun...kabir mein vileen ho jaun..

    Bheetar-bahar, bas kabir hi kabir ho..

    aabhar !

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  4. बाहर भीतर पानी -अच्छी रचना!

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  5. कबीर की साखियाँ ऐसी ही शिक्षा देती हैं...मन में जहाँ कबीर बस जाये तो "मैं" खत्म ....बहुत सुन्दर भाव हैं

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  6. मेरे भीतर-बाहर कबीर ही कबीर था

    मैं स्पंदन में बदल गया , नाद में तबदील हो गया

    वाह वाह डॉक्टर साहब ! गंभीर रचना के लिए बधाई !
    ब्लॉग संसार में भी आपका स्वागत !
    शस्वरं पर भी आपका हार्दिक स्वागत है , आइए…

    - राजेन्द्र स्वर्णकार
    शस्वरं

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  7. "मैंने उनके शबद की आँच पर
    रख दिया अपने आप को"
    .........@ बिलकुल ठीक किया.
    "मेरी स्मृति खदबदाने लगी"
    .........@ आँच पर रखने से यही होगा. ---- यहाँ भी ठीक है.
    "वेद, श्रुति, पुराण और उपनिषद
    तलछट की तरह बाहर हो गये"
    .........@ वेद और श्रुति में पुनरुक्ति दोष.
    .........@ वेद और उपनिषद की श्रेणी में आप पुराणों को नहीं रख सकते. दोनों की विषय-वस्तु भिन्न है.
    .........@ क्योंकि 'तलछट' है, नीचे बैठा हुआ गाद है, आँच के ऊपर जाने पर, खदबदाने पर कैसे बाहर आयेगा?... समझ से बाहर है.
    "जाति वाष्प बनकर उड़ गयी"
    .........@ जाति की बात नहीं करते आर्ष ग्रन्थ, वह केवल बात करता है वर्ण-आश्रम-व्यवस्था की.
    "ऊँच-नीच का दर्प भस्म हो गया"
    ........ @ आँच लगी थी नीचे फिर भस्म क्रिया कैसे संभव हुयी.. आश्चर्य की बात है.
    "शबद रह गया सिर्फ अनहद
    गूँजता हुआ मेरे महाकाश में"
    .........@ आग लगने की क्रिया में जो प्रथम स्वर हुआ वह खदबदाने का था, फिर वह सीधे अनहद में बदलता सुनाई दे रहा है. उसका कृमिक विकास नहीं हुआ. वह अनहद में कैसे तब्दील हुआ? इसे पाठक केवल सोचकर आध्यात्मिक आनंद लेने लगता है. भक्ति में यह मात्र सहयोगी भावनावश है.

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  8. साखी देखकर अच्‍छा लगा। लीजिए कहानीवाला जी ने बहस शुरू भी कर दी। बात तो वे सही कर रहे हैं। बहस आगे चले।

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  9. http://www.youtube.com/watch?v=jRVEKxCylKw

    यही है साखी, कहा कबीर ने
    और मैं स्पंदन में बदल गया
    नाद में तबदील हो गया
    अब मैं अपना घर
    फूंकने को तैयार हूँ,
    लुकाठा थामने को तैयार हूँ ..

    लाज़वाब ,बहुत सुन्दर..
    http://www.youtube.com/mastkalandr

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  10. राजेश भाई, आप लुत्ती लगाकर मजा लेते हैं। चलिये कोई बात नहीं। प्रतुल जी ने बहुत मजेदार सवाल उठाये हैं। पहली बात तो यह कि श्रुति का मतलब वेद न लगायें। जब कागज जैसी चीज नहीं थी तो लोग बहुत सारी चीजें याद करके सुरक्षित रखते थे। इस तरह श्रुत परम्परा में सुरक्षित सभी ग्रंथ श्रुति के नाम से जाने गये। इसी अर्थ में वेद, पुराण और उपनिषद सभी श्रुति के अंतर्गत आते हैं। पर कबीर इतने शास्त्रीय नहीं थे। इसलिये वे इन सभी शब्दों का साथ-साथ प्रयोग करते हैं। मैं जो बात कह रहा हूं, उसकी व्याख्या कबीर के अनुसार करनी होगी, न कि वैदिक पंडितों की परम्परा के अनुसार। कबीर ने कोई शास्त्रीय विभाजन नहीं किया है, या तो उन्होंने इसकी जरूरत नहीं समझी या पंडितों का मजाक उड़ाने के लिये ऐसा किया। तलछट पहले से ही होती तो कबीर को इतना माथा क्यों पीटना पड़ता। कविता गद्य की तरह पूरी बात नहीं कहती, यह समझने की चीज है कि व्युत्थान के नियम के अनुसार कोई वस्तु गरम होगी तो ठंडी भी होगी। जैसे गन्दगी बाहर करने के लिये पानी को गरम करते हैं और छान लेते हैं, पानी का ताप कम होने पर सारी गन्दगी पेंदे में रह जाती है, उसी तरह की बात यहां कही गयी है। फिर मैं कहूंगा कि यहां मैं आर्ष ग्रंथों की बात नहीं कर रहा हूं। जब कबीर आये तो वर्ण व्य़वस्था जातियों में बदल चुकी थी। जाति से ही उंच-नीच था, आज भी है, अगर जातियां न हों तो यह भेद भाव भस्म ही हो जायेगा। किसी भी कविता की आलोचना और समझ के मानक होते हैं, कविता शब्दों का सीधा अर्थ करके नहीं समझी जा सकती। यह आंच चूल्हे वाली नहीं है पलानीवाला जी, जो नीचे से लगे, यह तो लगती है तो समूची चेतना को खरा बना देती है, सब गन्दगी जला देती है। साधना में सारी प्रक्रिया क्रमशः चलती है पर सिद्धि का क्षण, जलने का पल पहचाना नहीं जा सकता। आग लगती है तो एक साथ सब-कुछ जला देती है। विकराल आग हो तो आप यह नहीं कह सकते कि आंच नीचे से है या ऊपर से, दांये से है या बांये से, तब सिर्फ आग ही होती है और फिर बचता क्या है। यही कबीर का घर फूंकना है। इसका तर्क वही समझ सकता है, जो इस आग् में जला हो या कबीर को ठीक से समझता हो।
    मेरे इस ब्लाग का और इस पर पहली कविता का स्वागत करने के लिये सभी मित्रों के प्रति मेरा विनम्र आभार। हां, निरंकुश भाई से कहूंगा कि जगह और वक्त देख कर ही अपना नारा लिखा करें। इतनी निरंकुशता भी ठीक नहीं।

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  11. क्षमा करेंगे पलानीवाला जी नहीं, प्रतुल कहानीवाला जी पढें।

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  12. शानदार ब्लाग और उससे भी शानदार प्रतुल जी की टिप्पणी। बहस की गंभीरता जारी रहे...

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  13. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

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  14. आदरणीय सुभाष जी,
    नमस्ते, क्योंकि ब्लॉग पर यह आपकी पहली "साखी" है और मेरा भी आपसे यह पहला साक्षात्कार है.
    ना आपकी साखी विस्मृत होगी और ना ही यह साक्षात्कार. आपका स्पष्टीकरण तार्किक है.
    "..... किसी भी कविता की आलोचना और समझ के मानक होते हैं, कविता शब्दों का सीधा अर्थ करके नहीं समझी जा सकती। ...." सहमत हूँ.
    मानता हूँ. कि "कविता ना व्याकरण के कायदे पर चलना पसंद करती है और ना ही वैज्ञानिक-सूत्रों के अनुसार सांचों में ढलना उसे मंजूर है. उसे मन की मौज पसंद है. "
    परन्तु, दर्शन का आधार तो विज्ञान है, तर्क है, सूत्रबद्धता है, [बेशक कुछ दर्शन उलझाव लिए होते हैं,] लेकिन कबीर की उलटबांसियों का दर्शन भी बोधगम्य हो जाता है. फिर आप अपनी दार्शनिक कविताओं में इतनी व्याख्या सापेक्ष जटिलता क्यों भर रहे हैं. वैदिक कर्मकांड की जटिलता असह्य हो गयी तो कबीर का स्वर साधारण जन के लिए औषधि बन गया.
    हे कबीर-अनुगामी, सुन्दर भाषा के धनी [सुभाष], सु-दर्शन युक्त काव्य तभी माना जाएगा जब उसमें दुरूहता समाप्त हो जाए.

    "साधना में सारी प्रक्रिया क्रमशः चलती है पर सिद्धि का क्षण, जलने का पल पहचाना नहीं जा सकता। आग लगती है तो एक साथ सब-कुछ जला देती है। विकराल आग हो तो आप यह नहीं कह सकते कि आंच नीचे से है या ऊपर से, दांये से है या बांये से, तब सिर्फ आग ही होती है और फिर बचता क्या है।"
    @ सही बात, लेकिन कविता में कवि का आँच पर सप्रयास रखना दिख रहा है. यही बात हज़म नहीं हुयी थी. फिर भी आप गद्य में समझाते हैं तो समझ लेते हैं.
    — क्षमाप्राथी प्रतुल.

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  15. बहुत सुन्दर रचना है...पर जिस वाद-विवाद का अंकुर इससे फुटा है वह भी लाज़वाब है...किसी रचना एवं उसकी समालोचन का उद्गम स्थल अगर एक ही हो, तो आनंद की अनुभूति स्वाभाविक है...सभी टिप्पणीकारों को साधुवाद :)

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  16. प्रतुल भाई, अब अनायास कुछ नहीं होता, अब तो आंच पर हिम्मत से सप्रयास ही चढना पड़ेगा। सच कहने और सुनने की आदत डालनी होगी। दुष्यंत की ये पंक्तियां याद करिये--

    हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग
    रो-रो के बात कहने की आदल नहीं रही।
    हमें भी खुद को बचाये रखना है तो यह आदत डालनी होगी।

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  17. सर, सबसे पहले तो नया ब्लॉग शुरू करने के लिए मेरी ओर से बधाई स्वीकार करें। एक नई और अच्छी पहले है जो संभवत: बहुत दूर तलक जाएगी।
    दूसरी बात मैं कभी-कभी कविता पढ़ लेता हूं और कभी-कभी लिख लेता हूं पर उसके अधिक विस्तार और सौन्दर्य पर नहीं जा पाता, शायद यह कमी है।
    पहली कविता में कबीर से आपका वार्तालाप बहुत शानदार रहा। दरअसल प्रतुल जी ने इसमें और भी चार चांद लगाने का काम किया है। जिस तरीके से उन्होंने कविता का विश्लेषण किया और आपने उनका जवाब दिया वह काबिले तारीफ है। हम जैसे प्रशिक्षुओं के लिए यह वरदान साबित होगा, ऐसी उम्मीद कर सकता हूं। दोनों जनों में कुछ भेद दिखे उसका कारण शायद यह रहा कि वह कहानीवाला हैं और आप कवितावाले। खैर, यह सब आगे भी जारी रहे तो अच्छा रहेगा।
    पहली ही पोस्ट पर इतनी टिप्पणियों का आना कहीं न कहीं यह साबित कर रहा है कि यह ब्लॉग भविष्य का ब्लॉग साबित होगा। हालांकि कुछ लोग कविता पढ़कर उसके बारे में बात करने नहीं बल्कि अपना विज्ञापन चिपकाने आते हैं। ईश्वर उनका भी भला करे।

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  18. नये ब्लाग का स्वागत है. मुझे नामकरण बहुत पसन्द आया. वाकई कवि कर्म साधारण हिम्मत और मानसिकता का कार्य नहीं है. ‘कविर्मनीषी परिभूस्वयंभू‘ यूं हीं नहीं कहा गया है. जो अपना घर फूंकने की हिम्मत रखते हों वही काव्य पथ पर चलने के अधिकारी हैं. चार पंक्तियों की तुक मिलाने से पद्य तो बन जायेगा लेकिन कविता नहीं. बाबा कबीर दास के व्यक्तित्व के साथ-साथ कवि कर्म की सच्चाई को बेहद सटीकता के साथ प्रस्तुत कविता अभिव्यक्त करती है. मुझे अपने एक युवा मित्र की पंक्तियां याद आ रही हैं, जिन्हें मैं आप सबके साथ साझा करना चाहता हूं. पंक्तियां फ्रीवर्स में थीं मैंने उन्हें लयबद्ध कर लिया था. देखें-
    विआदेष कुम्भ से थोड़ा हलाहल आज पीना चाहता हूं.
    हे प्रभो मैं मृत्यु के उपरान्त जीना चाहता हूं.
    हां माफ करियेगा अन्त की पंक्तियां‘ अब मैं अपना........फूंकने के लिए के लिए तैयार हूं‘ मेरी समझ में नहीं आयीं मुझे तो कविता ऊपर से पढ़ने पर लगा कि, (रचनाकार का दर्प भस्म होते ही उसका घर तो फुंक ही गया. सच्चा ज्ञान प्राप्त होते ही उसे वेद, पुरान आदि उसकी नजर में व्यर्थ हो गये, उसे जाति की श्रेष्ठता बेकार लगने लगी) इसका मतलब मैंने तो घर फूंकने से ही लगाया और जब रचनाकार का घर फुंक ही गया तो नीचे उसे यह कहने की आवष्यकता क्यों पड़ी कि वह अब अपना घर फूंकने के लिए तैयार है.
    यह सब मैं इसलिए लिख रहा हूं कि मैं इस कक्षा का सबसे नौसिखिया विद्यार्थी हूं. आपने इसे कविता का मंच बनाया है मुझे लगता है यहां इस प्रकार की बहसें की जा सकती हैं. ताकि बड़ों से कुछ सीखा जा सके. मैं इस मंच का हिस्सा बनकर गौरवान्वित हूं.

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  19. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  20. धन्यवाद संजीव, मैं एक आलोचक की तरह अपनी ही कविता को देखता हूं और आप के सवाल पर खुद से जवाब-तलब करता हूं तो फिर वही जवाब मिलता है। फूंकने की तैयारी में हूं। तो क्या ऊपर कही गयी बातें सही नहीं हैं, क्या जाति भस्म नहीं हुई, क्या परम्परा का मोह गया नहीं, ऊंच-नीच का भेद नष्ट नहीं हुआ? नहीं यह सब हुआ पर अंशतः, लेकिन संकल्प जगा पूर्ण रूप से इन्हें खत्म कर देने का। व्यवहार में बदलाव आने के पहले वह विचार के रूप में चेतना में कहीं गहरे जन्म लेता है। कविता भी उसी धरातल पर खुद को रचती है। इस प्रक्रिया में भीतर-बाहर का संघर्ष भी चलता रहता है। व्यक्ति भीतर तो होता ही है, बाहर भी होता है। भीतर का सब गन्दा नष्ट हो जाने के बाद भी बाहर की स्मृति बची रह जाती है। संकल्प जग जाने पर भी उसे व्यवहार में पूरी तरह आने में वक्त लगता है। अंतिम पंक्तियों में यही अंतर दिखायी पड़ रहा है। भीतर से तैयार होने के बावजूद कबीर बन कर बाहर निकल आने का संकोच खत्म होना बाकी है। कह सकते हो कि कबीर को गुरू तो कर लिया पर कबीर अभी बने नहीं। उसमें थोड़ा वक्त लगेगा।

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  21. निरंकुश जी माफ करियेगा, आप का यह उद्बोधन मेरे बात-बेबात ब्लाग पर कई जगह है। यहां इस मंच पर यह अच्छा नहीं लग रहा था, इसलिये हटाया गया। आप चाहें तो कविता पर बातचीत में शामिल हो सकते हैं। संजीव की टिप्पड़ी दो बार आ गयी थी।

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  22. वाह राय साहब ! क्या ब्लॉग शुरू किया है। वाकई आपकी सोच, आपकी दृष्टी और भविष्य के लिए सार्थक योजनायें बनाने की आपकी क्षमता को प्रणाम करने में ही भलाई है। आपको भूरि-भूरि बधाई इस संभावित भव्य इमारत के निर्माण हेतु भूमि-पूजन के लिए और नींव की पहली ईंट भी आपने रख ही दी। उसके लिए एक बधाई और। विशुद्ध कवि-कर्म को लोगों के सामने लाने वाले प्लेटफ़ॉर्म वाकई बहुत कम हैं। आपने एक मुहैया करा दिया कवियों को और क्या चाहिए। साथ ही आलोचना को भी उतना ही महत्व दे दिया ये और बड़ी बात है। खुद कुछ कहना फिर उस कहे हुए पर दूसरे को कहने की पूरी छूट दे देना ही व्यक्ति को बड़ा बनाता है। कवि-जीवन के बारे में तो बकौल कीट्स 'the most livable life is that of a poet'. कवि-जीवन श्रेष्ठतम जीवन है और उससे भी बड़ा सच यह है कि श्रेष्ठ जीवन जीने वाला ही श्रेष्ठ सृजन कर पाता है। अब एक बात आलोचना के लिए भी। आलोचना करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि आलोचना स्वस्थ, सार्थक, एवं अपरिहार्य रूप से ईमानदार हो। सिर्फ आलोचना कि खातिर की गयी आलोचना कवि और कविता दोनों को हानि पहुंचाती है। वर्ड्सवर्थ ने ऐसे ही आलोचकों के लिए कहा है 'They murder to dissect'. चूँकि यह शुरुआत है अतः मैं यहीं पर सावधान कर देना चाहता हूँ। स्वस्थ आलोचना काव्य-सृजन का जितना भला करती है अस्वस्थ उतना ही बुरा करती है।बहरहाल, बहस-मुबाहिसे की यह शुरुआत निश्तिच रूप से स्वागत योग्य है।

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  23. आपके ब्लॉग पर आना और पढना सुखद एवं अविस्मरणीय अनुभव रहा

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  24. कबीर ने पूछा, क्या देख रहे हो
    अब अपने भीतर, बताओ
    मैं चुप रहा, बिल्कुल खामोश
    जब मेरे भीतर-बाहर
    कबीर ही कबीर था
    जब मैं था ही नहीं तो
    कौन देता जवाब, किसे
    .......
    अद्वैत भावनाओं के परिवेश में आत्मा का विलीन होना

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  25. " बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित ज्ञान कभी क्रांति का जनक नहीं हो सकता "

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  26. जहाँ "मै" का भव मिट जाये सिर्फ़ एक ही नाद का गुंजार हो बस फिर वहाँ कुछ बचता कहाँ है………………गहन अभिव्यक्ति।

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