शनिवार, 30 सितंबर 2017

प्रो गिरीश चन्द्र त्रिपाठी के मनमाने पन और तानाशाही पूर्ण रवैये का नमूना



प्रो गिरीश चंद्र त्रिपाठी और आईआईटी बीएचयू,  वाराणसी के बोर्ड आफ गवर्नर की चौथी बैठक के मिनट्स का विवाद



(शिक्षकों और विद्यार्थियों के साथ ही साथ बनारस के आम लोगों का यह मानना है कि प्रो त्रिपाठी का अपने पद पर बने रहना ; कुलपति होने के नाते बीएचयू के कार्यपरिषद और साथ ही आईआईटी.बीएचयू के बीओजी का चेयरमैन बने रहना न सिर्फ़ इन दोनो प्रतिष्ठित संस्थाओं के हित में नहीं है बल्कि इन पदों की गरिमा का अवमूल्यन है। ऐसे में यह आवश्यक है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय राष्ट्रीय महत्व के इन दो संस्थानो के हितों की सुरक्षा के लिए तत्काल आवश्यक क़दम उठाये। )

कुमार अनिर्वाण 

बीएचयू के कुलपति प्रो गिरीश चन्द्र त्रिपाठी अपने प्रतिगामी रवैये से न केवल काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की गरिमा को नुकसान पहुंचा रहे हैं बल्कि अपने अड़ियल और तानाशाही पूर्ण रुख से विश्वविद्यालय के कई विभागों और संकायों के काम-काज को अवरुद्ध करने की रिग्रेसिव भूमिका भी निभा रहे हैं। ऐसा एक ज्वलंत मामला आई आई टी का पता चला है।
आईआईटी बीएचयू के बोर्ड आफ गवर्नर की चौथी बैठक 8 जुलाई 2016 को बीएचयू के कुलपति निवास पर हुई। ज्ञातव्य है कि बीएचयू के कुलपति आईआईटी बीएचयू के बोर्ड आफ गवर्नर के पदेन चेयरमैन भी हैं। इस बैठक में कतिपय महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। लेकिन खेद की बात है कि बैठक होने के चार महीने के बाद ; अब तो एक साल से भी अधिक हो गया है; भी इस बैठक का कार्यवृत (मिनट्स) अभी तक संपुष्ट नहीं हो सका है जिसकी वजह से बैठक में लिए गए तमाम निर्णय लागू नहीं हो पाए हैं। इस सम्बंध में कुलपति महोदय से बार.बार अनुरोध के बावजूद उनके कानों पर जूँ भी  न रेंगी। उन्हें इस बात का न कोई इल्म है न ही फ़िक्र  कि मिनट्स नहीं संपुष्ट होने से संस्थान के कामकाज में अवरोध पैदा हो रहा है। 
इस घटना-दुर्घटना का सिलसिलेवार संक्षिप्त विवरण कुछ इस प्रकार है। बोर्ड आफ गवर्नर के सदस्यों को मिनट्स का मसौदा भेजने में दो महीने से भी अधिक का समय लगा। यह पूरा घटनाक्रम ग़ौरतलब है।
दिनांक 8 जुलाई 2016 को बीओजी की बैठक सम्पन्न। 23 जुलाई 2016 को निदेशक द्वारा अग्रसारित मिनट्स का मसौदा चेयरमैन के पास अनुमोदन के लिये भेजा गया। 2 अगस्त 2016 को मिनट्स के मसौदे में हो रहे विलम्ब के सम्बंध में अनुस्मारक दिया गया‌। 5 सितम्बर 2016 को मसौदे में कतिपय परिवर्तन करने का निर्देश। 12 सितम्बर 2016 को चेयरमैन के द्वारा सुझाए गए परिवर्तनों को शामिल करने के बाद मिनट्स के मसौदे को भेजा गया। कई सदस्यों ने मिनट्स के भेजने में विलम्ब को लेकर चिंता जतायी और साथ ही उनको इस बात पर भी आपत्ति थी कि बैठक में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर जो निर्णय लिए गए थे, मिनट्स उनके बिलकुल विपरीत था।
इस सम्बंध में प्रो धनंजय पांडे ;13 सितम्बर 2016, प्रो जे एस राजपूत ;14 सितम्बर 2016,  प्रो राजीव संगल ;निदेशक; 15 सितम्बर 2016, प्रो ऒंकार सिंह ;16 सितम्बर 2016,  प्रो नरेंद्र आहूजा ; 20 सितम्बर 2016 और प्रो गणेश बागरिया ; 23 सितम्बर 2016 ने ईमेल लिखा।
इन सबकी यह माँग थी कि मिनट्स में व्यतिक्रम के आलोक में बीओजी की बैठक तत्काल बुलायी जाये ताकि उसे सुधारा जा सके और उसकी पुष्टि की जा सके। इस सम्बंध में एक सुझाव यह भी था कि बीओजी की बैठक की कार्यवाही की  वीडियो  रिकॉर्डिंग की जाये ताकि ग़लत मिनट्स न दर्ज किए जायें। स्वयं निदेशक ने भी इस सम्बंध में चेयरमैन से कई बार अनुरोध किया कि वे मिनट्स को संपुष्ट करने के लिए बीओजी की बैठक बुलायें। 23 सितम्बर  2016 को चेयरमैन से  बीओजी की बैठक दो हफ़्ते के अंदर बुलाने के लिए अनुरोध  किया गया  क्योंकि  मिनट्स के संपुष्टि के अभाव में संस्थान का कामकाज प्रभावित हो रहा था । 8 अक्टूबर  2016 को चेयरमैन को बीओजी की बैठक दो हफ़्ते के अंदर बुलाने के लिए फिर से अनुरोध   किया गया चूँकि पिछली बैठक के मिनट्स तीन महीने बीत जाने के बाद भी अभी भी असंपुष्ट थे । 23 अक्टूबर 2016 और 4 नवम्बर 2016 को फिर अनुरोध किया गया।
चेयरमैन महोदय ने बीओजी के सदस्यों के ईमेल के जवाब में चुप्पी साध रखी है। यही नहीं, मौखिक अनुरोध के बावजूद उन्होंने अभी तक बीओजी की बैठक के लिए कोई तिथि मुकर्रर नहीं की है।
मिनट्स के संपुष्टि के अभाव में संस्थान के समक्ष एक संकटपूर्ण  स्थिति उत्पन्न हो गयी है क्योंकि चार महीने पहले हुए बीओजी की बैठक में जो निर्णय लिए गये थे वो अभी तक लागू नहीं हो पाए हैं।
8 जुलाई 2016 की बैठक के बाद बीओजी की अब तक सिर्फ़ एक विशेष बैठक हुई है। जबकि संस्थान के प्रावधान  के अनुसार प्रति वर्ष बीओजी की कम से कम दो साधारण बैठक होना अनिवार्य है।
सबसे बड़ी बात यह है कि चेयरमैन और सदस्यों के बीच न सिर्फ़ परस्पर गहरा मतभेद है बल्कि सदस्यों का चेयरमैन के प्रति गहरा अविश्वास है।
प्रो गिरीश चंद्र त्रिपाठी जो बीएचयू के कुलपति और आईआईटी.बीएचयू के बीओजी के चेयरमैन हैं, लगातार छात्रों और शिक्षकों से संबंधित तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश करते रहे हैं। अभी हुई तात्कालिक घटनाएं छात्राओं का विरोध और उन पर हुआ बर्बर लाठी चार्ज इस बात का प्रमाण है।   
अभी हाल में ही मीडिया के हवाले से ख़बरें आई हैं कि  हाल में बीएचयू की कार्यपरिषद की बैठक में प्रो गिरीश चंद्र त्रिपाठी ने अपने तानाशाही और निरंकुश रवैए का परिचय दिया। और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी उनके इसी रवैए के चलते कार्य परिषद के सदस्य प्रो  मीशेल दनिनो ने अपना इस्तीफ़ा दे दिया।
शिक्षकों और विद्यार्थियों के साथ ही साथ बनारस के आम लोगों का यह मानना है कि प्रो त्रिपाठी का अपने पद पर बने रहना ; कुलपति होने के नाते बीएचयू के कार्यपरिषद और साथ ही आईआईटी.बीएचयू के बीओजी का चेयरमैन बने रहना न सिर्फ़ इन दोनो प्रतिष्ठित संस्थाओं के हित में नहीं है बल्कि इन पदों की गरिमा का अवमूल्यन है। 
ऐसे में यह आवश्यक है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय राष्ट्रीय महत्व के इन दो संस्थानो के हितों की सुरक्षा के लिए तत्काल आवश्यक क़दम उठाये।    

शनिवार, 9 सितंबर 2017

स्मृतियां गढ़ती हैं समाज और देश का भविष्य





स्मृतियाँ स्टेटिक नहीं गत्यात्मक होतीं हैं। स्मृति अगर वर्तमान को रचती है, भविष्य को गढ़ती है तो उसका महत्त्व है। वह वैयक्तिक भी होती है और सामूहिक भी, जातीय भी। वैयक्तिक स्मृतियाँ बहुत लम्बी नहीं होतीं लेकिन सामूहिक स्मृतियाँ लम्बी होती हैं। स्मृति सुरक्षित रहे, आगे बढ़ती रहे, इसके लिए जरूरी है बार-बार उसका दुहराया जाना। ऐसा नहीं होने पर वे नष्ट हो जातीं  हैं। जब स्मृतियों के संरक्षण की बात उठती है तो तमाम तरह के सवाल भी उठते  हैं। किन स्मृतियों का संरक्षण, किसलिए, व्यक्तिगत हित  में या सामूहिक लाभ के लिए। स्मृतियाँ अदने गरीब आदमी की भी होती हैं और अमीरों की भी। वे नकारात्मक भी होतीं हैं और सकारात्मक भी। सवाल यह है कि हम किन स्मृतियों को आगे ले जाना चाहते हैं। वे समाज हित में हैं या समाजहित के विरुद्ध। स्मृतियाँ केवल मीठी और मधुर होतीं हैं या खतरनाक और  वंचक भी।
इस तरह के तमाम  सवाल उठे, उन पर चर्चा हुई, स्मृतियों के सफ़ेद- स्याह पक्षों को समझने की कोशिशें हुई छह सितम्बर को  मऊ में आयोजित एक गहन परिसंवाद में। इसका आयोजन रामगोविंद राय, रामायण राय स्मृति संस्थान  ने किया था।  विषय था, मनुष्यता के लिए क्यों जरूरी हैं स्मृतियाँ। विचार के क्रम में स्मृतियों के राजनीतिक मायने भी समझने के प्रयास हुए और बताया गया की किस तरह ताकतवर लोग या सत्ता संरचनाएं स्मृतियों का अपने पक्ष में इस्तेमाल करती हैं। देखा गया है कि जब भी सरकारें बदलती हैं, सबसे पहले इतिहास से छेड़छाड़ की कोशिश होती है। स्मृतियों का एक वस्तुनिष्ठ पक्ष होता है लेकिन उनके अनुकूल या प्रतिकूल अर्थ निकाले जाने  की संभावनाएं हमेशा बनी रहती हैं। स्मृतियाँ किसी देश का निर्माण कर सकती हैं तो उसे नष्ट भी कर सकती हैं। वे समाज को प्यार और सद्भाव के रास्ते पर भी ले जा सकती हैं और दंगे, मार- काट और अराजकता में भी धकेल सकती हैं। सत्ता हमेशा देश की स्मृतियों को कब्जे में लेने का अभियान छेड़ती हैं क्योंकि उसे  पता होता है कि उनकी अपने पक्ष में व्याख्या  लम्बे समय तक सत्ता में टिके  रहने का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।  जगहों के नाम बदलना, पाठ्यक्रम बदलना या नायकों के जीवन दर्शन के नए अर्थ करना इसी अभियान के हिस्से हैं। आजकल स्मृतियों को खतरनाक हथियार के रूप में इस्तेमाल करके एक ख़ास तरह के अधिनायकवाद की नींव मजबूत करने का अभियान चल रहा है।






संगोष्ठी की अध्यक्षता की अभिनव कदम के सम्पादक, लेखक और कवि जयप्रकाश धूमकेतु ने। प्रमुख वक्ता के रूप में मौजूद थे साहित्य, इतिहास, राजनीति और विज्ञान की समझ से लैस आई आई टी,बी एच यू के प्रोफ़ेसर डा आर के मंडल। साहित्य और समाज पर राजनीति के प्रभाव की समझ रखने वाले बी एच यू में अंग्रेजी विभाग के प्रोफ़ेसर डा संजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार और लेखक बंशीधर मिश्र और कथाकार एवं गाँव के लोग के सम्पादक रामजी यादव ने विशिष्ट वक्ता के रूप में अपनी भूमिका निभाई। विषय प्रतिपादन किया युवा कवयित्री और कथाकार सोनी पांडेय ने। रामगोविंद राय, रामायण राय स्मृति संस्थान के संयोजक राजेंद्र राय ने बताया कि इस वर्ष भारतीय शास्त्रीय संगीत के युवा गायक देवेश सिंह उर्फ़ राजा सिंह को सम्मानित किया गया।  उन्हें प्रशस्ति पत्र एवं 11  हजार रुपये की धनराशि पुरस्कार स्वरुप  प्रदान  की गयी। कार्यक्रम के उत्तरार्ध में प्रखर संगीत शिक्षक डा गिरिजा शंकर तिवारी के शिष्य देवेश और बलवंत सिंह ने सांगीतिक प्रस्तुति दी। 
श्री जयप्रकाश धूमकेतु ने बीज वक्तव्य के लिए सोनी पांडेय की सराहना की, फोक पर गंभीर काम के लिए प्रो संजय कुमार का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सबकी अपनी अपनी स्मृतियाँ होती हैं। गोडसे की भी स्मृति है और गांधी की भी।  एक हत्या की स्मृति है और दूसरी शांति की, एक धाँय-धाँय की, दूसरी हे राम की। मुझे दूसरी पसंद है। धूमकेतु जी ने माटी की गंध, भाई-भाई के प्यार और आम जन के सरोकार को आगे बढ़ाने वाली स्मृतियों को महत्वपूर्ण और रचनात्मक बताते हुए कहा कि ऐसी स्मृतियाँ रामगोविंद राय की भी हो सकती हैं, रामायण राय की भी और अन्य तमाम पिताओं के जीवन की भी। उन्होंने स्मृतियों के सकारात्मक पक्ष को जरूरी बताते हुए दिनकर को याद किया और कहा कि जो स्मृतियों का रचनात्मक उपयोग नहीं करेंगे, समय उनका अपराध दर्ज करेगा--जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध। 
प्रो आर के मंडल ने स्मृतियों  की जटिलताओं की ओर इशारा करते हुए कहा कि विज्ञान की भी अपनी मेमोरी है जैसे अन्य समाज विज्ञानों की। सवाल यह है कि मेमोरी कितनी  दूर तक जानी चाहिए। सच यह है कि हमारे पास जो भाषा है, जिसमें हम व्यक्त होते हैं, वह भी हमारी बनायी हुई नहीं है। वह भी स्मृति का ही हिस्सा है। हम जानते हैं कि  इतिहास समाज को कुछ न कुछ देता है, उसे बनाता है इसलिए इतिहास के प्रति हमें आदर रखना चाहिए। आप कुछ भी कह दें, बिना यह सोचे कि वह प्रामाणिक है या नहीं और जब उसकी व्याख्या का प्रश्न उठे तो चुप्पी साध लें तो खतरा बड़ा हो जाता है। कहते तो हैं कि हम सांझी स्मृतियों वाले लोग हैं लेकिन उन्हें ही ख़त्म कर देने की कोशिशें चल रहीं हैं। प्रयास है कि  स्मृतियाँ एकपक्षीय हों। विज्ञान किसी तथ्य के प्रति एकमत रहता है, हम सर्वसम्मति वाले लोग हैं लेकिन एक कविता की हर कोई अलग-अलग व्याख्या कर देगा। इसी तरह स्मृतियों की अलग-अलग तरह से व्याख्या की जा सकती है। अब फेथ को ही लीजिये। आप कहते हैं आप का फेथ है, कोई बात नहीं लेकिन आप कहें कि फेथ में वस्तुनिष्ठता है तो हम कहेंगे कि विज्ञान का इतिहास पढ़िए। कोई आप की आलोचना करे तो उसे मार दोगे, उस पर हमला कर दोगे, कहोगे स्टेट की आलोचना करना अपराध है। अरे भाई ये आजादी तो हमें हमारे संविधान ने दी है। जो गलत है उसे गलत कहने की आजादी तो देनी ही पड़ेगी। सम्मान के साथ जीने का अधिकार तो हमें मिला हुआ है।उससे आप हमें वंचित नहीं कर सकते।






प्रो संजय कुमार ने स्मृति के महत्त्व को गंभीरता से रेखांकित करने की कोशिश की। उन्होंने सवाल किया कि स्मृति केवल अतीत भर है या भविष्य में भी उसका कोई योगदान है। जवाब देते हुए कहा कि  व्यक्तिगत स्मृतियाँ दो-तीन पीढ़ियों तक रहतीं हैं जबकि जातीय स्मृतियाँ हजारों साल तक। जातीय स्मृतियाँ इसलिए लम्बे समय तक रहती हैं क्योंकि वे बार-बार दुहराई जाती हैं। हम जो भी देखते हैं उसका अर्थ करने की कोशिश करते हैं। अगर जीवन का कोई अर्थ नहीं है तो हम क्यों जियें। इसी मायने में अर्थपूर्ण होना ही मनुष्य होना है। हम इसी अर्थ को अपनी स्मृतियों के सहारे रचते हैं। यहीं एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि स्मृति का कल्पना से कोई सम्बन्ध है या नहीं। सच यह है कि बिना  स्मृति के कल्पना संभव नहीं है और बिना कल्पना के स्मृति भी नहीं। भविष्य की परिकल्पना हमें अपनी स्मृतियों के प्रति सतर्क करती है।  ऐसा न हो तो हम सतत वर्तमान में रहने को अभिशप्त हो जाएँ। अतीत की स्मृतियाँ और भविष्य की परिकल्पना वर्तमान को गढ़ती हैं। इसी अर्थ में स्मृतियाँ महत्वपूर्ण हैं।  प्रो संजय कुमार ने स्मृतियों के एक खतरनाक पक्ष का भी संकेत किया। सत्ता संरचनाएं हमेशा देश की स्मृतियों पर नियंत्रण की कोशिश करती हैं।  उन्हें पता होता है कि इनकी अनुकूल व्याख्या कर वे अपनी नींव मजबूत कर सकती हैं। 
श्री बंशीधर मिश्र ने इतिहास, संस्कृति और साहित्य का हवाला देते हुए कहा कि युद्ध और मौतें जिनके हाथ का खिलौना हैं, उनके हाथ में हमारी सभ्यता को खतरा है। क्या हम सचमुच ऐसे मुकाम पर पहुँच गए हैं जहां सभ्यता नष्ट हो जाने के कगार पर है। जिस यूरोप में ईसा आये थे, जिन्होंने अपने हत्यारों के लिए भी प्रार्थना की।  हे ईश्वर उन्हें माफ़ करना क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। उसी यूरोप में दो हजार साल बाद औद्योगिक क्रान्ति की वीभत्सता दिखाई पडी। उसी की नींव पर रखा गया विकास का सपना आखिर कितना लंबा चलने वाला है। श्री रामजी यादव ने कहा कि हमें तय करना होगा कि  हम किस तरह की स्मृतियाँ सुरक्षित रखना चाहते हैं। वे नकारात्मक भी हैं, सकारात्मक भी। सत्ता से सांठ -गाँठ कर हत्याएं, लूट के  जरिये देश को ख़त्म कर देने की कोशिशें हो रहीं हैं, अन्याय को न्याय लिखा जा रहा है। देश में  गरीब भी हैं, शिल्पकार भी हैं, वे भी देश बनाते हैं, केवल नारे लगाने वाले देश नहीं बनाते। आम जनता किनारे है, हताश है, आत्म हत्या करने पर विवश है। अच्छी स्मृतियों से शोषण, अपमान और अन्याय का प्रतिकार होना चाहिए। अच्छी स्मृतियों को बनाये रखने के लिए बुरी स्मृतियों से लड़ने की जरूरत है।










युवा कथाकार और कवयित्री सोनी पांडेय ने विषय रखते हुए स्मृतियों में बेटियों की जगह का प्रश्न उठाया, इतिहास और साहित्य के सबक की चर्चा की और स्मृतियों के रचनात्मक उपयोग की सलाह दी। इस अवसर पर श्री राजेंद्र राय, दीनानाथ राय, हरे राम सिंह, रवींद्र  राय, डा झारखंडे राय, प्रभात कुमार राय, संदीप कुमार राय, शशिप्रकाश राय, रंजीत राय, रवि प्रकाश, वेदप्रकाश ने अपने विचार रखे। पहले सत्र का संचालन वरिष्ठ पत्रकार सुभाष राय ने और दूसरे सत्र का संगीत के जानकार प्रमोद राय ने किया।  स्मृति सभा में बड़ागांव तथा आस-पास के गाँवों और मऊ के सैकड़ों लोग मौजूद थे। 


रविवार, 3 सितंबर 2017

मनुष्यता के लिए क्यों जरूरी हैं स्मृतियां

रामगोविंद राय, रामायण राय स्मृति संस्थान के तत्वावधान में छह सितंबर को मऊ में संगोष्ठी, साहित्य और समाजशास्त्र के विद्वानों का जमावड़ा, युवा संगीतकार देवेश का सम्मान    स्मृतियाँ ही सभ्य समाज का निर्माण करती हैं। स्मृति विहीन समाज क्रूर, हिंसक और दुस्साहसी हो जाता है। पूंजी निरंतर हमें हमारी स्मृतियों से काटने का षड्यन्त्र कर रही है। मनुष्य बचा रहे, इसके लिए स्मृतियों का बचे रहना जरूरी है। मनुष्यता के लिए क्यों जरूरी हैं स्मृतियां,  इस विषय पर छह सितम्बर 2017, बुधवार  को अपराह्न दो बजे से एस आर प्लाजा भुजौटी, मऊ में एक संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। चर्चा में शामिल होंगे काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आई आई टी के प्रोफेसर और विग्यान एवं साहित्य के अध्येता प्रो आर के मंडल, काहिविवि में अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर एवं साहित्य के विद्वान प्रो संजय कुमार, पत्रकारिता विभाग झांसी विवि के पूर्व विभागाध्यक्ष बंशीधर मिश्र तथा प्रख्यात कथाकार शिवशंकर मिश्र। बीज वक्तव्य प्रस्तुत करेंगी युवा कवयित्री और कथाकार सोनी पांडेय। अध्यक्षता करेंगे अभिनव कदम के सम्पादक और निरंतर अपने   सार्थक   हस्तक्षेप के लिए चर्चित  लेखक और चिंतक जयप्रकाश धूमकेतु।  इस अवसर पर अनेक पुरस्कारों से सम्मानित और मुम्बई विश्वविद्यालय में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में एम फिल कर रहे  प्रखर और प्रतिभासम्पन्न युवा गायक देवेश सिंह (राजा बाबू) को सम्मानित किया जायेगा। उन्हे प्रशस्ति पत्र और ११ हजार रुपये की राशि सम्मान स्वरूप प्रदान की जायेगी। यह आयोजन रामगोविंद राय, रामायण राय स्मृति संस्थान, बड़ागांव, मऊ के तत्वावधान में होने जा रहा है। संस्थान के संयोजक राजेंद्र राय के अनुसार पूरा समारोह दो चरणों में आयोजित किया जायेगा। पहले चरण में सम्मान कार्यक्रम और विचार गोष्ठी होगी और दूसरे चरण में देवेश अपना संगीत प्रस्तुत करेंगे।  जिनकी स्मृति में यह आयोजन हो रहा है, वे   रामगोविंद राय और रामायण राय साधारण आदमी थे। सच बसत यह है कि  हर   साधारण में कुछ असाधारण  जरूर होता  है।  रामगोविंद राय और रामायण राय के व्यक्तित्व में जो कुछ असाधारण रहा होगा, वही हमारी धरोहर है, वही हमारी स्मृति में ठहरने योग्य है, वही और सिर्फ वही याद किया जाना चाहिए। ये दोनों ही बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में मऊ से लगभग दस किलोमीटर दूर बड़ा गाँव में जन्मे। उनके स्मरण में उस आदि मनुज का भी स्मरण है, जिसकी हम सब संतानें हैं और इस तरह अपने मनुष्य होने का भी स्मरण है।

मैं समय हूं

कभी समकालीन सरोकार  का लोगों को इंतज़ार रहता था। हर महीने कुछ नया लेकर आती थी। कुछ बड़े नाम। कुछ बड़ी बातें। नए रास्ते। नयी मंजिलें। बहुत उत...