आप जानते हैं नीरज गोस्वामी को? अगर आप की दिलचस्पी शायरी में, कविता में है तो जरूर जानते होंगे| चौदह अगस्त उन्नीस सौ पचास को पठानकोट, जम्मू में जन्मे| वे खुद कहते हैं, याने हम ताज़ा ताज़ा सठियाये हैं| स्थाई निवास जयपुर में| इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, वर्तमान में भूषण स्टील लिमिटेड खोपोली, खंडाला के पास, में वाइस प्रेसिडेंट के पद पर कार्यरत हैं| साहित्य, सिनेमा, संगीत ,क्रिकेट, भ्रमण में रूचि है| साखी के लिए जब मैंने नीरज जी से परिचय माँगा तो उन्होंने सिर्फ इतना ही भेजा| मुझे लगा लोग कुछ और जानना चाहेंगे तो मैंने विस्तार से लिखने को कहा| पढ़िए उन्होंने क्या लिखा... भाई जान परिचय में क्या जानना चाहते हैं ये तो बताइए और वैसे भी परिचय पढ़ने की फुर्सत किसे होती है आज के ज़माने में। कोई फोटो देख ले वो ही गनीमत समझो फिर भी अगर आप कुछ विशेष जानकारी चाहते हैं तो लिख भेजें। अब और क्या परिचय दें सिवा इसके कि हमने शायरी अभी पिछले तीन साल से लिखनी शुरू की जबकि पढ़नी पचास साल पहले ही कर दी थी। इस लायक कभी कुछ लिखा नहीं कि उसे किसी रिसाले या अखबार में छपने के लिए भेजते। किताब छपवाने जैसी खतरनाक बात कभी सोची नहीं, ये सोच कर कि अगर कभी खुदा न खास्ता छप गयी तो पढ़ेगा कौन? पहले जब गज़लें लिखता था तो अपनी एक मात्र बीवी की शराफत का नाजायज फायदा उठा कर उसको सुनाया करता था, क्यूँ कि बेटा बहू ने पहले ही कह दिया था कि पापा गाली दे दो लेकिन ग़ज़ल मत सुनाना। गरीब मजलूम बीवी के हमारी गज़लें सुनते-सुनते जब कान पकने लगे, सब्र का बाँध टूटता नज़र आया और बात तलाक तक पहुँचने की नौबत आ गयी तो एक शरीफ मित्र ने समझाया कि भाई काहे नाहक सीधी-सादी एक मात्र बीवी की जान के पीछे पड़े हो| तुम्हारी ग़ज़लें यूँ तो कोई सुनेगा नहीं| ऐसा करो एक ब्लॉग खोलो और उस पर डाल दो| अगर कोई पढ़ कर नाराज़ भी हुआ तो ज्यादा से ज्यादा एक आध गाली लिख देगा लेकिन तुम्हारा घर तो नहीं टूटेगा। तब से अब तक ब्लॉग के माध्यम से भडांस निकल रहे हैं। और क्या बताएं...? भाई मैं तो इस भड़ास में गजल देखता हूँ| लीजिये उनकी भड़ास के चार अदद टुकड़े पेश हैं---
मान लूँ मैं ये करिश्मा प्यार का कैसे नहीं
वो सुनाई दे रहा सब जो कहा तुमने नहीं
इश्क का मैं ये सलीका जानता सब से सही
जान दे दो इस तरह की हो कहीं चरचे नहीं
तल्ख़ बातों को जुबाँ से दूर रखना सीखिए
घाव कर जाती हैं गहरे जो कभी भरते नहीं
अब्र लेकर घूमता है ढेर-सा पानी मगर
फ़ायदा कोई कहाँ गर प्यास पे बरसे नहीं
छोड़ देते मुस्कुरा कर भीड़ के संग दौड़ना
लोग ऐसे ज़िंदगी में हाथ फिर मलते नहीं
खुशबुएँ बाहर से 'नीरज' लौट वापस जाएँगी
घर के दरवाज़े अगर तुमने खुले रक्खे नहीं
था अपना ही साथी प्यारे
सच्चा तो सूली पर लटके
लुच्चे को है माफी प्यारे
उल्टी सीधी सब मनवा ले
रख हाथों में लाठी प्यारे
सोचो क्या होगा गुलशन का
माली रखते आरी प्यारे
इक तो राहें काटों वाली
दूजे दुश्मन राही प्यारे
भोला कहने से अच्छा है
दे दो मुझको गाली प्यारे
मन अमराई यादें कोयल
जब जी चाहे गाती प्यारे
तेरी पीड़ा से वो तड़पे
तब है सच्ची यारी प्यारे
तन्हा जीना ऐसा "नीरज"
ज्यूं बादल बिन पानी प्यारे
१.
मान लूँ मैं ये करिश्मा प्यार का कैसे नहीं
वो सुनाई दे रहा सब जो कहा तुमने नहीं
इश्क का मैं ये सलीका जानता सब से सही
जान दे दो इस तरह की हो कहीं चरचे नहीं
तल्ख़ बातों को जुबाँ से दूर रखना सीखिए
घाव कर जाती हैं गहरे जो कभी भरते नहीं
अब्र लेकर घूमता है ढेर-सा पानी मगर
फ़ायदा कोई कहाँ गर प्यास पे बरसे नहीं
छोड़ देते मुस्कुरा कर भीड़ के संग दौड़ना
लोग ऐसे ज़िंदगी में हाथ फिर मलते नहीं
खुशबुएँ बाहर से 'नीरज' लौट वापस जाएँगी
घर के दरवाज़े अगर तुमने खुले रक्खे नहीं
२.
जड़ जिसने थी काटी प्यारे था अपना ही साथी प्यारे
सच्चा तो सूली पर लटके
लुच्चे को है माफी प्यारे
उल्टी सीधी सब मनवा ले
रख हाथों में लाठी प्यारे
सोचो क्या होगा गुलशन का
माली रखते आरी प्यारे
इक तो राहें काटों वाली
दूजे दुश्मन राही प्यारे
भोला कहने से अच्छा है
दे दो मुझको गाली प्यारे
मन अमराई यादें कोयल
जब जी चाहे गाती प्यारे
तेरी पीड़ा से वो तड़पे
तब है सच्ची यारी प्यारे
तन्हा जीना ऐसा "नीरज"
ज्यूं बादल बिन पानी प्यारे
![]() |
| गूगल से साभार |
३.
तीर खंजर की ना अब तलवार की बातें करें
जिन्दगी में आइये बस प्यार की बातें करें
टूटते रिश्तों के कारण जो बिखरता जा रहा
अब बचाने को उसी घर बार की बातें करें
थक चुके हैं हम बढ़ा कर यार दिल की दूरियां
छोड़ कर तकरार अब मनुहार की बातें करें
दौड़ते फिरते रहें पर ये ज़रुरी है कभी
बैठ कर कुछ गीत की झंकार की बातें करें
तितलियों की बात हो या फिर गुलों की बात हो
क्या जरुरी है कि हरदम खार की बातें करें
कोई समझा ही नहीं फितरत यहां इन्सान की
घाव जो देते वही उपचार की बातें करें
काश 'नीरज' हो हमारा भी जिगर इतना बड़ा
जेब खाली हो मगर सत्कार की बातें करें
हौसलों की हमारे ये पहचान है
लाख कोशिश करो आके जाती नहीं
याद इक बिन बुलाई सी महमान है
खिलखिलाता है जो आज के दौर में
इक अजूबे से क्या कम वो इंसान है
ज़र ज़मीं सल्तनत से ही होता नहीं
जो दे भूखे को रोटी, वो सुलतान है
मीर, तुलसी, ज़फ़र, जोश, मीरा, कबीर
दिल ही ग़ालिब है और दिल ही रसखान है
पांच करता है जो, दो में दो जोड़ कर
आजकल सिर्फ उसका ही गुणगान है
ढूंढ़ता फिर रहा फूल पर तितलियां
शहर में वो नया है या नादान है
गर न समझा तो नीरज बहुत है कठिन
जान लो ज़िन्दगी को तो आसान है
संपर्क
neeraj1950@gmail.com,
ब्लाग
http://ngoswami.blogspot.com/
फोन : 9860211911
पता: नीरज गोस्वामी द्वारा भूषण स्टील लिमिटेड , 608, रीजेंट चेम्बर्स, नरीमन पोआइंट, मुंबई -400021
तीर खंजर की ना अब तलवार की बातें करें
जिन्दगी में आइये बस प्यार की बातें करें
टूटते रिश्तों के कारण जो बिखरता जा रहा
अब बचाने को उसी घर बार की बातें करें
थक चुके हैं हम बढ़ा कर यार दिल की दूरियां
छोड़ कर तकरार अब मनुहार की बातें करें
दौड़ते फिरते रहें पर ये ज़रुरी है कभी
बैठ कर कुछ गीत की झंकार की बातें करें
तितलियों की बात हो या फिर गुलों की बात हो
क्या जरुरी है कि हरदम खार की बातें करें
कोई समझा ही नहीं फितरत यहां इन्सान की
घाव जो देते वही उपचार की बातें करें
काश 'नीरज' हो हमारा भी जिगर इतना बड़ा
जेब खाली हो मगर सत्कार की बातें करें
४.
दर्द दिल में मगर लब पे मुस्कान है हौसलों की हमारे ये पहचान है
लाख कोशिश करो आके जाती नहीं
याद इक बिन बुलाई सी महमान है
खिलखिलाता है जो आज के दौर में
इक अजूबे से क्या कम वो इंसान है
ज़र ज़मीं सल्तनत से ही होता नहीं
जो दे भूखे को रोटी, वो सुलतान है
मीर, तुलसी, ज़फ़र, जोश, मीरा, कबीर
दिल ही ग़ालिब है और दिल ही रसखान है
पांच करता है जो, दो में दो जोड़ कर
आजकल सिर्फ उसका ही गुणगान है
ढूंढ़ता फिर रहा फूल पर तितलियां
शहर में वो नया है या नादान है
गर न समझा तो नीरज बहुत है कठिन
जान लो ज़िन्दगी को तो आसान है
संपर्क
neeraj1950@gmail.com,
ब्लाग
http://ngoswami.blogspot.com/
फोन : 9860211911
पता: नीरज गोस्वामी द्वारा भूषण स्टील लिमिटेड , 608, रीजेंट चेम्बर्स, नरीमन पोआइंट, मुंबई -400021


बहुत ही नायाब ग़ज़लें हैं। सभी ग़ज़लें बेहतरीन हैं। यह शे‘र सबसे जयादा पसंद आया-
प्रत्युत्तर देंहटाएंतल्ख बातों को जुबां से दूर रखना सीखिए
घाव कर जाती हैं गहरे जो गभी भरते नहीं।
...और हां, आपका परिचय भी एक ग़ज़ल से कम नहीं।
...शुभकामनाएं।
आपके बारे में आज जाना, अच्छा लगा.
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपकी सारी रचनाये बहुत अच्छी लगी. एक से बढ़ कर एक.
बधाई...साखी पर इस प्रस्तुति के लिए.
नीरज भाई की ग़ज़लों में वो स्वयं स्पष्ट दिखते हैं भाव पक्ष में जब एक सीधे-सादे इंसान के रूप में सादगी से सीधी-सच्ची ज़बां में बात कर रहे होते हैं। स्वभाविक है कि इनकी ग़ज़लों में सोच और सरोकार स्पष्ट रूप से उभरकर आते हैं। यह तो हो गया इनकी ग़ज़लों का भाव पक्ष जो मैनें अब तक पढ़ा है लेकिन ग़ज़ल 2 में काफि़या लेने में चूक हो गयी है और ग़ज़ल 4 में हिन्दी के नजरिये से तो काफि़या दोष नहीं है लेकिन उर्दू के नज़रिये से दोष है कुछ अशआर के काफि़या में।
प्रत्युत्तर देंहटाएंग़ज़ल 2 के मत्ले के शेर में काफि़या से बढ़ा हुआ मात्रिक अंश हटा देने से समतुकान्त शब्द नहीं बचते हैं। इसके अतिरिक्त सभी काफि़या ऐसे नहीं हैं कि उनसे मात्रा हटाने पर विशुद्ध शब्द बचता हो। इसका निराकरण मात्र मत्ले के शेर को बदलने से हो जाता है।
ग़ज़ल 4 में आसान, नादान, मकान, इंसान आदि जो शब्द लिये गये हैं उनका उर्दू में जो रूप है उसमें पहचान, गुणगान, रसखान आदि मान्य नहीं हैं लेकिन हिन्दी में ये स्थिति अनुमत्य हैं और दोष नहीं मानी जाती।
मैं तो इन्हें बड़ा भाई मानता हूँ और जिंदादिल इंसान हैं इसलिये उत्पात मचाने का अधिकार रखता हूँ, सो शुरुआत कर दी है।
नीरज जी क्षमा याचना के साथ गज़ल के कहन पर संक्षेप में कुछ कहना चाहता हूँ ....
प्रत्युत्तर देंहटाएंपहली गज़ल बहुत हल्की लगी, सीधी सादी बात को भी इतना लपेट कर कहा गया है की कहन खो जा रही है
दूसरी गज़ल में कई शेर रदीफ के साथ तालमेल ही नहीं बैठा पा रहे
जो गज़ल पर फिर से मेहनत की मांग कर रहे हैं
और यह मिसरा अपनी बात पूरी कर सकने में सक्षम नहीं है
दूजे दुश्मन राही प्यारे
दुश्मन राही को प्यारा बताए जाने का बोध हो रहा है
तीसरी गज़ल में भी काफी लोच है
थक चुके हैं हम बढ़ा कर यार दिल की दूरियां
में यार शब्द सीधे सीधे भर्ती का शब्द है इसे बहुत आसानी से सुधारा जा सकता था कुछ इस तरह
थक चुके हैं हम बढ़ा कर दिल से दिल की दूरियां
तितलियों की बात हो या फिर गुलों की बात हो
क्या जरुरी है कि हरदम खार की बातें करें
इस शेर में भी पहले और दूसरे मिसरे में तालमेल का झोल है
इसे भी इस तरह कहा जा सकता था
तितलियों की बात कर लें या गुलों की बात ही
क्यों जरुरी है कि हरदम खार की बातें करें
चौथी गज़ल के मक्ते में पहला मिसरा उलझा हुआ है
गर न समझा तो नीरज बहुत है कठिन
नीरज के कठिन होने का बोध हो रहा है
आप की अन्य ग़ज़लों का स्तर इन ४ ग़ज़लों से बहुत ऊंचा है
मुझे हैरानी हुई की आपने साखी के लिए यह ४ गज़ल ही क्यों दी
साथ ही थोड़ी निराशा भी हुई
- बेनामी
नीरज गोस्वामी की गजलों का स्थाई भाव प्रेम लगता है -
प्रत्युत्तर देंहटाएंमुझे इश्तिहार से लगती हैं ये मुहब्बतों की कहानियाँ
जो कहा नहीं वो सुना करो जो सुना नहीं वो कहा करो (बशीर बद्र )
की याद हो आयी पहली गजल पढ़ कर
अभी नीरज भाई को पढ रहा हूं. देखने आया था लेकिन एक चीज़ ने ठहरने पर मजबूर कर दिया. 'बेनामी' टिप्पणी की शुरूआत साखी पर होना दुख की बात है. अगर आप में किसी रचनाकार के गुण-दोष मुंह पर कहने की हिम्मत नहीं है तो खामोश ही रहें. एक 'पर्देदार' के चक्कर में हर कोई शक के दायरे में रहे, बेहद खराब मामला है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंमैं ने इन्हीं स्थितियों के मद्देनज़र माडरेशन के लिए कहा था. क्या मेरी आवाज़ सुनी जाएगी?
सर्वत भाई, मैं आप की तरफ से और साखी परिवार की तरफ से श्रीमान बेनामी से निवेदन करता हूं कि वे अपना परिचय दें अन्यथा उनकी टिप्पणी होते हुए भी नहीं मानी जायेगी. मैं किसी को भी बांधना नहीं चाहता लेकिन साखी की संगोष्ठी में शामिल होने वाले मित्रों से जरूर आग्रह करूंगा कि किसी भी बेनामी टिप्पणी को नोटिस न लें, न ही उस पर अपनी कोई बात कहें. बेनामी जी यहां होते हुए भी नहीं है, ऐसा समझा जाये.
प्रत्युत्तर देंहटाएंनीरज जी को कौन नही जानता। जब मै ब्लागजगत मे आयी थी तो मुझे उत्साहित करने वाले नीरज जी ही थे। उनकी गज़लों की और गज़ल पुस्तकों की समीक्षा की तो पहले ही कायल हूँ। आखिर मेरे पंजाब मे जन्मे पंजाब के शेर हैं। नीरज जी गम न करें हम भी सठियाये हुये ही है। आपकी शायरी पर तो केवल एक ही शब्द निकलता है वाह,, वाह । अनीरज जी को शुभकामनायें, आपका धन्यवाद।
प्रत्युत्तर देंहटाएंबेनामी भाई...काश आपका नाम होता, लेकिन बेनामी को नाम मानते हुए कहना चाहता हूँ के बंधू आलोचना कोई गाली नहीं होती बल्कि उस से लेखन में परिपक्वता आती है...बशर्ते आलोचना को सही ढंग से लिया जाए.आपने गज़लों को लेकर जो कहा वो मेरे लेखन के भले के लिए ही है लेकिन भली बात को कहने के लिए नाम को बेनाम करने की बात समझ में नहीं आई.
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपने जो कमियां गज़ल में बताई हैं वो वास्तव में हैं और ये ग़ज़लें सुधार की प्रक्रिया से गुजरने लायक हैं. मुझे अपने लेखन को लेकर कोई मुगालता नहीं है , मैं अभी सीखने की प्रथम सीढ़ी पर ही हूँ और आगे जाने के लिए बेनामी भाई जैसे आलोचकों की आवशयकता महसूस करता हूँ.
मेरी आप सब से येही गुज़ारिश है के गज़ल में आये दोषों की बेधड़क व्याख्या करें इस से मुझे अधिक लाभ होगा.
नीरज
अगर ब्लॉग बेनामी टिप्पणियों की अनुमति देता है तो ये आयेंगी, और जब आयेंगी तो पढ़ी भी जायेंगी और सीधे-सीधे इनपर उत्तर न भी दिये जायें तो अप्रत्यक्ष रूप से इनपर बात भी रखी जायेगी। बेहतर विकल्प तो यह रहेगा कि ब्लॉग बेनामी टिप्पणियों की अनुमति ही न दे। सर्वत साहब मर्यादाओं के पक्षधर रहे हैं इसलिये वो बार-बार माडरेशन की बात करते हैं, सामान्य ब्लॉग (जहॉं केवल टिप्पणी प्राप्त होती हों) पर यह ग़ल़त भी नहीं है। लेकिन किसी चर्चा-मंच पर माडरेशन में एक समस्या है, वह यह कि जब तक माडरेटर स्वीकार न करे टिप्पणी दिखाई नहीं देगी। अब या तो माडरेटर दिन भर बैठा यह काम करता रहे या ब्लॉग विजि़टर्स को ज्ञात हो कि माडरेटर कब कब टिप्प्णी पर निर्णय लेता है जिससे वे उस समय सभी स्वीकृत टिप्पणियों को देखकर अपनी टिप्पणी दे सके। इसका एक और हल भी है जो मुझे लगता है शीघ्र ही हमें देखने को मिल सकता है।
प्रत्युत्तर देंहटाएं'गूगल की जासूसी' इसमें हमारी मदद करेगी। गूगल की जितनी भी सेवायें हैं उनमें कुछ ऐसी व्यवस्थायें हैं जिनके माध्यम से यह बात स्वत: उन तक पहुँच जायेगी और बहुत जल्दी इस पर कार्रवाई भी हो जायेगी।
यह हल है ब्लॉग पर चैट रूम की; अगर ब्लॉग पर चैट रूम उपलब्ध रहे तो समझिये ऑन लाईन काफ़ी हाउस मिल गया। अपनी-अपनी बात कहें सभी सुन रहे हैं और अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। हॉं तथाकथित विवाद की स्थिति तो कहीं भी बन सकती है।
विवाद को रोकने का सही विकल्प तो आत्मनियंत्रण है। अगर किसी ने ऐसा कुछ कहा है जो अनर्गल बकवास माना जा सकता है तो हमें उसपर ध्यान ही नहीं देना चाहिये और स्वयं को सीमित कर लेना चाहिये चर्चा के विषय पर।
अब प्रश्न आता है वर्तमान बेनामी साहब का; हो सकता है कि किसी मर्यादा के कारण वे खुलकर नीरज भाई की ग़ज़ल पर कुछ कहने से हिचक रहे हों। अगर इस टिप्पणी में ऐसा कुछ सार्थक न लगता हो जिसपर जवाब की आवश्यकता हो तो यह टिप्पणी निरर्थक है; अगर इसमें कुछ सार्थक अंश है तो उसपर चर्चा तो होनी ही चाहिये। इस तरह की बेनामी टिप्पणी दो ही स्थिति में दी जा सकती हैं; पहली तो यह कि टिप्पणी देनेवाला आश्वस्त नहीं है कि जो बात वह कह रहा है वह ठीक है अथवा नहीं, दूसरी यह कि वह किसी मर्यादा के कारण नीरज भाई के सामने यह बात खुलकर कहने का साहस नहीं कर पा रहा है।
ग़ज़ल का हर शेर स्वतंत्र कविता होता है इसलिए बेनामी जी की बात सही है कि शेर 'इक तो राहें .....राही प्यारे' अलग से पढ़ा जाये तो कोई भ्रम की स्थिति नहीं रहनी चाहिये। लेकिन यहॉं यह भी देखना जरूरी है कि किसी ग़ज़ल का हर शेर परिस्थिति साम्य के आधार पर मौज़ू हो सके, ऐसे में वह शेर स्वयं में अपनी बात पूरी तरह से कहेगा तो सही लेकिन ग़ज़ल के अंश के रूप में ही। इस दृष्टि से विवेचित शेर मौज़ू रूप में प्रस्तुत किये जाने योग्य न होने से कमज़ोर है।
जहॉं तक 'थक चुके हैं .....मनुहार की बातें करें' का प्रश्न है इसमें 'थक चुके हैं हम बढ़ा कर दिल से दिल की दूरियां' भी ठीक सुझाव नहीं है। दिल से दिल की दूरियॉं बढ़ाई नहीं जाती है, बढ़ जाती हैं
अगर यह कहा जाता कि 'तल्ख़ बातों से अभी तक पाई हमने दूरियॉं, छोड़कर तकरार अब मनुहार की बातें करें' तो बात बनती है। पहली पंक्ति में वर्तमान तक आकर दूसरी पंक्ति में सुखद भविष्य की बात है जिसमें कोई दूरी नहीं रहती।
तितलियों ......... खार की बातें करें में भी सुझाव कमज़ोर है
फ़ूल, पत्ती, तितलियों के रंग हैं औ रास है
फिर भला ग़लशन में क्यूँ हम खार की बातें करें।
क्यूँ न कहा जाये।
गर न समझा तो नीरज बहुत है कठिन
जान लो ज़िन्दगी को तो आसान है
'गर न समझे.... आसान है' में दोष ग़ल़त इंगित किया गया है। हॉं इसमें नीरज को व्यक्ति विशेष या तखल्लुस का रूप स्पष्ट करने के लिये 'नीरज' लिखा जाता तो ठीक रहता। यह शेर सरल हो सकता था अगर कहा जाता कि ' गर न समझे तो जीवन बहुत है कठिन; जान लीजे तो 'नीरज' ये आसान है'।
पिछले एक वर्ष के अनुभव में मैनें पाया है कि कहन सब की अलग अलग होती है इसलिये इसपर टिप्पणी देते समय सावधान रहना बहुत जरूरी है। कहन में केवल यह देखना पर्याप्त रहता है कि व्याकरणसम्मत है कि नहीं।
मेरे लिये गजल गीत कविता सब एक ही है क्योंकि इस विधा की समझ अपने को नही है. यहां सिर्फ़ एक ही बात कहना चाहता हुं कि श्री नीरज गोस्वामी जी की शायरी के भाव दिल को छू लेते हैं, मेरे जैसे आम आदमी को तकनीकी और मीटर से कुछ लेना देना नही है. नीरज जी एक शनादार और प्यारी सख्शियत के इंसान हैं. आपसे बात करके यूं लगता है मानों मुंह से फ़ूल झर रहे हों. नीरज जी का एक परिचयनामा मैने मेरे ब्लाग पर किया था, नीरज जी की खुद की गाई गजल सुनकर मैने उसे उस पोस्ट में भी लगायी थी.
प्रत्युत्तर देंहटाएंनीरज जी जैसे इंसान कम ही दिखाई देते हैं इस दुनियां में. बहुत अच्छा लगा यहां उनके बारे में पढना. आपका आभार और नीरज जी को बहुत शुभकामनाएं.
एक सुंदर व्यक्तितव से रूबरू हुए, आभार
प्रत्युत्तर देंहटाएंगज़लें भी आनंदित कर गई।
बधाई निरज जी
्नीरज जी को पढना हमेशा सुकून देता है ………………उनकी गज़लों की रवानगी गज़ब की होती है अपने साथ बहाकर ले जाती है…………हर शेर ज़िन्दगी का आईना होता है कभी कभी तो खुद की शक्ल नज़र आती है…………………और देखिये ना आज की चारों गज़लें बेहतरीन हैं ……………।किस शेर को छोडूं और किसकी तारीफ़ करूँ……………एक अलग ही कशिश होती है उनके शेरों मे……………इसकी बानगी देखिये तो सही
प्रत्युत्तर देंहटाएंइश्क का मैं ये सलीका जानता सब से सही
जान दे दो इस तरह की हो कहीं चरचे नहीं
क्या खूब कहा है और कितनी संजीदगी से कहा है।
छोड़ देते मुस्कुरा कर भीड़ के संग दौड़ना
लोग ऐसे ज़िंदगी में हाथ फिर मलते नहीं
ओह ! क्या खूब ख्याल है यहाँ जो सोचने को मजबूर कर दे।
तितलियों की बात हो या फिर गुलों की बात हो
क्या जरुरी है कि हरदम खार की बातें करें
और यहाँ एक अलग ही अन्दाज़ लिये हैं।
लाख कोशिश करो आके जाती नहीं
याद इक बिन बुलाई सी महमान है
खिलखिलाता है जो आज के दौर में
इक अजूबे से क्या कम वो इंसान है
दोनो ही शेर एक अलग अन्दाज़ पेश करते हैं और हर अन्दाज़ मे उन्हे महारत हासिल है।
सुभाष राय जी, आपने आज नीरज जी के व्यक्तित्व पर रौशनी डाली बहुत बहुत आभार. उनके चाहने वालों को खुशी मिली होगी.
प्रत्युत्तर देंहटाएंदूसरे
तीर खंजर की ना अब तलवार की बातें करें
जिन्दगी में आइये बस प्यार की बातें करें
ये पंक्तियाँ उनका व्यक्तित्व ही बयाँ करती हैं.
सम्मानीय नीरज जी को बहुत समय से पढता आया हूँ..उनकी ग़ज़लों के आशारों के बारे में कुछ कहना सूरज को दीपक दिखने जैसा होगा..और मैं तो अभी दीपक भी नहीं बन पाया..हूँ! नीरज जी की सभी ग़ज़लें..बेहतरीन और मुकम्मल हैं..! (हालाँकि मैं ग़ज़लों के कलापक्ष से वाकिफ नहीं पर..इतना जरूर जनता हूँ कि ये गेय हैं..इसलिए बहर में प्रतीत हुई) एक निवेदन और करना चाहूँगा कि ग़ज़लों के उर्दू शब्दों का अर्थ भी अगर लिख दिया जाए तो मेरे जैसों को और भी अच्छी तरह समझ में आयेगी.
प्रत्युत्तर देंहटाएंमैं आदरणीय सर्वत साहब की बातों से अक्षरशः सहमत हूँ कि बेनामी टिप्पणियों को साखी जैसे मंच पर आना..अच्छा अनुभव नहीं है. आलोचना स्वयं में एक परिपक्वता को दर्शाती है..अगर आपमें परिपक्वता है और समस्त लेखन विधा को गहरे से जानते हाँ तो ही आलोचना कर सकते हैं..अन्यथा वो आलोचना ना होकर..सिर्फ एक गाली तक ही सीमित रह जाती है.. अगर आपमें क्षमता है आलोचना करने की तो कीजिये, बेशक कीजिये...पर सामने आकार कीजिये..ताकि जब आपकी आलोचना का लेखन या अन्य जब स्पष्टीकरण दें, तो आप सक्षम होने चाहिए उस स्पष्टीकरण का पुनः स्पष्टीकरण कर अपनी आलोचना के पक्षों को तार्किक और मजबूती से कर सकें..यूं बनामी टिपण्णी करने को तो मैं इस तरह व्यक्त करना चाहूँगा कि आलोचना तो करदी..पर स्वयं पर विश्वास नहीं है..इसलिए अपने आपको आपको परदे के पीछे रखा है...!
इस सन्दर्भ में मैं माननीय सुभाष राय जी से विनती और प्रार्थना करना चौंगा कि टिप्पणियों का moderation ओन करें..ताकि इस तरह की बेनामी टिप्पणियों से या अनौचित्य टिप्पणियों से बचा जासके...!
छोटा मुह बड़ी बातें कह तो दीं...माफ़ कर दीजियेगा..प्रणाम !
नीरजजी का नाम गझल क्षेत्र में नया नहीं है | दुनिया के मशहूर और खाँसाहब की गझलें पढी हैं, मगर ये आलोचना का तरीका नहीं | आलोचक की भी भाषा में भी नम्रता और सहजता होती है | ये नीचे गिराने की भाषा है | खुद को "बेनामी" बताकर पहचान छुपाना कायरता है | मैं कायरों से बात नहीं करता | डॉ. सुभाष जी और नीरजजी के प्रति आदर होने के कारण आना पडा | वैसे एक सम्पादक ने अपना कार्य बखूबी किया उसके लिएँ धन्यवाद |
प्रत्युत्तर देंहटाएंमैं आप सब के प्रेम से अभिभूत हूँ...एक साधारण से शायर को इतना मान देना एक असाधारण घटना ही कही जायेगी...मुझे समझ नहीं आ रहा मैं कैसे आपका आभार प्रगट करूँ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंनीरज
खुशबुएँ बाहर से 'नीरज' लौट वापस जाएँगी
प्रत्युत्तर देंहटाएंघर के दरवाज़े अगर तुमने खुले रक्खे नहीं
kamaal ki baat hai
मुझे तो गज़ल की अकल ही नहीं है ...बस हमेशा नीरज जी को पढ़ना अच्छा लगता है क्यों कि उनकी लिखी हर गज़ल सीधे मन पर दस्तक देती है ...कमियां क्या हैं यह नहीं बता सकती ...और आप मोडरेशन न भी लगाएं तो भी बेनामी की टिप्पणियों पर रोक लगा सकते हैं सेटिंग में जा कर ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंबेनामी साहब कहते हैं कि 'पहली गज़ल बहुत हल्की लगी, सीधी सादी बात को भी इतना लपेट कर कहा गया है की कहन खो जा रही है'। यह कुछ आधी-अधूरी सी बात हुई यह स्पष्ट होना चाहिये कि ग़ज़ल में हल्का क्या लगा और किस शेर से कहन नहीं निकल रही।
प्रत्युत्तर देंहटाएंमत्ले का शेर कह रहा है 'जो तुमने कहा नहीं है वह सुनाई दे रहा है तो मैं कैसे मान लूँ कि यह प्यार का करिश्मा नहीं है'
दूसरे शेर में कहा गया है कि 'मुझे तो इश्क का यही तरीका सबसे सही लगता है कि जान भी दो तो कहीं चर्चा न हो'। यहॉं चर्चा शब्द रुस्वाई की बात कर रहा है।
कहने की जरूरत नहीं कि पहली ग़ज़ल के औजान हैं 2122, 2122, 2122, 212
अगर बेनामी जी आप बेनाम रहते हुए ही यही दो बातें इसी मीटर में अपने तरीके से कहें तो बात कुछ समझ में आये। हो सकता है आपकी बात में दम हो लेकिन संकोचवश न कह पा रहे हों।
दूसरी गज़ल में केवल मत्ले का शेर बदलने से सारी ग़ज़ल में काफि़या दोष दूर हो जाता है। 'जड़ जिसने थी काटी, प्यारे; था अपना ही साथी, प्यारे' की जगह 'जड़ जिसने काटी थी, प्यारे; था साथी अपना ही, प्यारे' । इस ग़ज़ल में जो रदीफ़ प्रयोग किया गया है वह सामान्य बोलचाल की भाषा से है। और इस तरह की कहन हो सकती है।
तीसरी और चौथी ग़ज़ल पर तो मैं अपनी बात पहले ही रख चुका हूँ।
मुझे लग रहा है कि समस्या की जड़ विराम चिह्नों की अनुपस्थिति में है। विराम चिह्नों के बारे में मेरा ज्ञान इतना कम है कि मैं आश्वस्त हूँ कि मैं स्वयं बहुत सी ग़ल्तियॉं विराम चिह्न उापयोग में करता हूँ।
बेनामी साहब ने जिस तरह बात समाप्त की है उससे यह तो स्पष्ट है वो नीरज भाई की अन्य ग़ज़लों को अच्छे स्तर का मानते हैं लेकिन इन ग़ज़लों के चयन पर उन्हें एतराज़ है और इस चयन से उन्हें निराशा हुई है।
मुझे ज्ञात नहीं कि यहॉं चर्चा के लिये रचनाओं का चयन ब्लॉगस्वामी द्वारा किया जाता है या रचनाकार स्वयं रचनायें चुनकर देते हैं।
वही मैं सोचा करता था कि आखिर नीरज भाई ने ब्लॉग क्यूँ खोला..आदमी तो ठीक ठाक लगते हैं..आज कारण जाना तो दिल को करार आया...
प्रत्युत्तर देंहटाएंवैसे गज़ले तो एक से एक उम्दा हैं, कितनी तारीफ करुँ...
(यथाकथित/तथाकथित) श्री ‘बेनामी’ साहब,
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपका यूँ ‘बेनामी’ रूप में प्रकट होना ‘बे-मानी’ है!मुझे आपका यह अवतार देखकर ऐसा लगा कि जैसे अचानक कोई UFO (Unidentified Flying Object,यानी- उड़नतश्तरी)‘साखी’ पर उतरकर कुछ ज़रूरी/ग़ैर-ज़रूरी सामान रखके ‘उड़नछू’ हो गया/गयी हो।
भैया, वो तो अच्छा हुआ कि आपने अपनी वचनावली के एक आरम्भिक वाक्य-- "...संक्षेप में कुछ कहना चाहता हूँ ...." में कृपापूर्वक अपने ‘पुल्लिग’ होने स्पष्ट संकेत कर दिया, वरना मुझे आप उलझन में डाल देते कि आपके आदर में ‘श्री’ लिखूँ अथवा ‘श्रीमती’?
आद. श्री नीरज जी एवं डॉ. सुभाष राय जी,
मैं जल्दी लौटूँगा...‘साखी’ पर। फिलहाल कुछ ज़रूरी काम में लग गया हूँ। ज़रूर आऊँगा...वादा।
नमस्कार मित्रों,
प्रत्युत्तर देंहटाएंकल रात कमेन्ट करने के बाद आज अब नेट पर वापसी हुई
साखी पर सक्रिय ब्लागरों की प्रतिक्रिया को पढ़ कर मैं और निराश हुआ हूँ
बड़ा अजीब लगा की मुझे जो आप्शन दिए गए उनमें से एक चुनने पर मैं आपकी नज़रों में चोर, भगोड़ा, अमर्यादित और डरा सहमा सा कैसे हो गया :)
भई अगर नामी और बेनामी दोनों का आप्शन दिया गया और मैंने बेनामी चुन लिया तो कम से कम इसमें नैतिकता - अनैतिकता का प्रशन तो नहीं ही खड़ा होना चाहिए था
मगर प्रशन खड़ा किया गया
मैं कुछ और भी कहना चाहता हूँ मगर देखा तो तिलक जी के कमेन्ट में भी वही बात कही गई है तो उस कमेन्ट का ही एक अंश यहाँ कापी पेस्ट कर रहा हूँ
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" तिलक राज कपूर ने कहा…
अगर ब्लॉग बेनामी टिप्पणियों की अनुमति देता है तो ये आयेंगी, बेहतर विकल्प तो यह रहेगा कि ब्लॉग बेनामी टिप्पणियों की अनुमति ही न दे।
सर्वत साहब मर्यादाओं के पक्षधर रहे हैं इसलिये वो बार-बार माडरेशन की बात करते हैं, सामान्य ब्लॉग (जहॉं केवल टिप्पणी प्राप्त होती हों) पर यह ग़ल़त भी नहीं है। लेकिन किसी चर्चा-मंच पर माडरेशन में एक समस्या है, वह यह कि जब तक माडरेटर स्वीकार न करे टिप्पणी दिखाई नहीं देगी।
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सुभाष जी आपसे निवेदन है की यदि आप बेनामी कमेन्ट नहीं चाहते तो आपको यह आप्शन हटा देना चाहिए
एक विनती है माडरेशन न लगाएं
--- ज़ारी
अभी मैं बेनामी जी का पक्ष लेने आया हूं। जब तक बेनामी टिप्पणियों में मर्यादित रूप में तर्कसंगत बात कही जा रही हो तब तक मुझे तो कोई समस्या नहीं लगती। यहां बेनामी जी के नाम से जो टिप्पणियां आई हैं उनमें तो काम की ही बात कही गई है। माफ करें यह उन नामचीनों से तो अच्छे ही हैं जो बात बात पर एक दूसरे को गाली देने लगते हैं। अगर तर्क की बात परदे के पीछे से भी कही जाए तो क्या फर्क पड़ता है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंजहां तक मॉडरेटर लगाने की बात है तो मैंने तो सुभाष जी को साखी के पहले एपीसोड के बाद ही यह सलाह दे डाली थी।
पर मेरी राय है कि कम से कम साखी पर तो उसे नहीं लगाया जाना चाहिए। अगर कोई अमर्यादित टिप्पणी आती है चाहे वह नाम के साथ हो उसे सेंटिंग में जाकर हटाया जा सकता है।
सुभाष जी,
प्रत्युत्तर देंहटाएंमेरा परिचय बहुत छोटा सा है
आम आदमी हूँ छोटे से शहर में रहता हूँ
साहित्यिक रुझान है
लगभग एक साल से अंतरजाल पर एक पाठक के तौर पर सक्रीय हूँ
कोई ब्लॉग नहीं है
साखी से भी एक अनाम पाठक के तौर पर ही जुडा, साखी पर कल नीरज जी की पोस्ट को पढ़ कर रहा नहीं गया और पहला कमेन्ट किया |
अब इस बात से किसी को क्या फर्क पड़ता है की मैं
सरजू प्रसाद, रमेश तिवारी, विकास चावला, अनुज शर्मा में से एक हूँ या नहीं
और मेरी उम्र २३, ३३, ४३, ५३ में से कोई या नहीं
साखी मंच को जिस उद्देश्य से खड़ा किया गया है उसमें यह सफल है लोग जुड रहे हैं बिना हिचक के अपनी बात कह रहे है
मगर पिछले दोनों व्यग्तिगत आक्षेप का जो दौर चला, लोग एक दूसरे को किसी व्यक्ति विशेष का पिट्ठू साबित करने पर तुले हुए थे, शायर आलोचना को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे, और टिप्पणी करने वालों नें जिस तरह सिलाई उधेडू टिप्पडीयाँ की थी वह सब बहुत अफ़सोस जनक था
खुल कर समीक्षा करने वालों की बखिया उधेड़ दी गई और भी बहुत कुछ हुआ जो किसी से छुपा नहीं है
ऐसी माहौल में जब व्यग्तिगत आक्षेपों को अमर्यादा की श्रेणी में रखा जाना चाहिए था और लोगों को सचेत करने की जरूरत थी तब आप का चुप रहना मुझ अनाम को बहुत अखरा
साखी के सम्मानित सक्रिय सदस्यों व गुणीजन से मेरा विनम्र निवेदन है की मंच की गरिमा को बरकरार रखते हुए यह ध्यान दें की क्या कहा जा रहा है क्यों कहा जा रहा है, और जो कहा जा रहा है वह कितना उचित है
न की यह, की कहने वाला कौन है ,,,
... नामी है या बेनामी है
... ज़ारी
मैं नीरज जी के ब्लॉग को एक साल से पढ़ रहा हूँ आपके व्यक्तित्व पर अगर यहाँ चर्चा की गई होती तो मैं ऐसा कमेन्ट करता की लोग भौचक्के रह जाते और फिर शायद मुझे भी उनका पिट्ठू घोषित कर दिया जाता
प्रत्युत्तर देंहटाएंफिलहाल यही कहूँगा की आप मिलनसार, हंसमुख, सीखने को तत्पर, रोते हो हसा देने वाले, दिलकश व्यक्तित्व के स्वामी हैं
आपकी गजलें लोगों को अवसाद से बाहर निकालने का माद्दा रखती हैं
आप गजलों में जीवन के हर उस रंग को समेटने की कोशिश करते हैं जो दिलकश है दिलफरेब है
और यही कारण है की मुझे कमेन्ट करने पर विवश होना पड़ा
मैंने इसलिए नीरज जी से पहले ही क्षमा याचना कर ली की मैं जानता हूँ नीरज जी बात को अन्यथा नहीं लेंगे
मेरी बात को "आत्म सम्मान में ठेंस लग गई" के नजरिये से तो कदापि नहीं देखेंगे
मुझे बहुत हैरानी हुई की गज़ल के चुनाव के समय आप सोच क्या रहे थे
नीरज जी के पास इतने दिलकश नगीने हैं की देखने वालों की आँखें चौंधिया जाए फिर ऐसा क्यों की चार ग़ज़लों को भेजते समय इन्हें चुना जो थोडा अन गढ़ हैं
@ नीरज जी - आपने मेरे लिए जो कहा उसके लिए मैं पहले से आश्वस्त था, धन्यवाद
प्रत्युत्तर देंहटाएं@ तिलक जी - गज़ल के व्याकरण दोष पर चर्चा ही जरूरी नहीं है कहन पर भी चर्चा होनी चाहिए बशर्ते शायर के कहन से आप बिलकुल ही असंतुस्ट हों
पहली गज़ल के बारे में मेरा आशय यह था की बात बहुत उलझा कर कही गई है
दुष्यंत जी के चार मिसरे हैं
मैं जिसे ओढता बिछता हूँ
वो गज़ल आपको सुनाता हूँ
तू किसी रेल सी गुजराती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ
अब इस सादा कहन को जलेबी की तरह लपेट लपेट कर कहा जाए तो क्या वही आनंद आ पायेगा जो अभी मिल रहा है
मेरे कहने का यही भाव था की गज़ल बहुत उलझी हुई लग रही है
आपने खुद दुसरे शेर के लिए कह दिया
“मुझे तो इश्क का यही तरीका सबसे सही लगता है कि जान भी दो तो कहीं चर्चा न हो'”
मगर शेर को देखें कितना उलझा हुआ है
इश्क का मैं ये सलीका जानता सब से सही
जान दे दो इस तरह की हो कहीं चरचे नहीं
मेरा सोचना है की अगर बात ज्यादा उलझ रही हो तो उस शेर को कहने से बचना चाहिए
बाकी अगर आप मुझसे चाहते हैं की मैं भी बखिया उधेडू तो मुझसे यह न हो पायेगा
ग़ज़लों पर चर्चा मुझ पर ही खत्म नहीं हो जानी थी
बल्कि मैंने तो चौथा ही कमेन्ट किया था और मैंने कहीं भी यह नहीं कहा था की मैं जो कह रहा हूँ, जो सुझाव दे रहा हूँ वो बिलकुल सटीक है
बल्कि मैंने तो कहा ही यह था की संक्षेप में अपनी बात रख रहा हूँ
बाकी आपने मेरे दिल की बात कह दी की नीरज जी की अन्य ग़ज़लों को अच्छे स्तर का मानता हूँ और इन ग़ज़लों के चयन से मुझे निराशा हुई है।
रही बात पोस्ट के लिए गज़ल के चुनाव की तो, यकीनन गज़लकार ही चुन कर देते हैं
आदरणीय बेनामी जी,
प्रत्युत्तर देंहटाएंब्लॉगिंग की दुनिया में एक वर्ष में बहुत कुछ देखने को मिला है, यह एक नया अनुभव रहा। आपकी टिप्पणी से लगता तो नहीं, लेकिन अगर मेरे किसी कथन से आपको कोई चोट पहुँची हो तो क्षमाप्रार्थी हूँ। आपकी बाद की टिप्पणियों ने मेरी यह धारणा और मजबूत कर दी है कि आप नीरज भाई के बहुत निकट हितैषी हैं और उनकी ग़ज़लों के प्रशंसक भी।
अब जब इतना कुछ कह दिया है तो जो कुछ दिल में बचा रह गया है वह भी कह ही दूं
प्रत्युत्तर देंहटाएंआज आप सभी के कमेन्ट पढ़ कर मुझे बहुत निराशा हुई
सर्वत जी नें बेनामी कमेन्ट पर दुःख व्यक्त किया
और सुभाष जी नें बेनामी पर ध्यान न देने को कहा
मगर इन बातों का सबसे बड़ा प्रभाव तो नीरज जी की गजलों पर पड़ा
लोग बेनामी का विरोध ही करते रह गए, किसी ने गज़ल पर कुछ खास नहीं कहा | सभी बेनामी कमेन्ट के विरोध में नीरज जी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते रह गए
यह मंच यहाँ पर पोस्ट की गई गज़ल पर चर्चा के लिए बनाया गया है | गज़लकार कितना ही छोटा हो, अनजान हो अथवा नामी हो, विश्व विख्यात हो, चर्चा “गज़ल” पर होनी चाहिए और उन गज़ल पर ही होनी चाहिए जो यहाँ पर पोस्ट की गई हैं, उनके अतिरिक्त गज़लकार ने गंगा ही क्यों न उतारी हो, उसके प्रभाव से मुक्त रहना चाहिए
मगर अभी यहाँ “यही” न हो कर बाकी सब कुछ हो रहा है
सुभाष जी ने मेरे कमेन्ट पर चर्चा करने को मना कर दिया तो लोग यह भी नहीं कर सके की मेरी बात को ही सही ढंग से आगे बढ़ा पाते, जो की मैं बहुत स्पष्ट रूप से कह पाने में सफल “नहीं” हुआ था
तिलक जी नें बाद में प्रयास किया परन्तु वो भी सभी के रंग में रंग गए और बेनामी के विरोध की पटरी पर आ गए
मेरा आप सभी से विनम्र निवेदन है की नामी बेनामी प्रकरण को समाप्त करें व नीरज जी की उन गजलों पर बात करें जो यहाँ पर प्रकाशित की गई हैं
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आप सभी से एक और विनती है की नामधारियों की गलत बात का खुल कर विरोध किया करें और बेनामी की तर्कसंगत बात को खुले ह्रदय से स्वीकार करने का मन बनाएँ
और यदि बेनामी स्वीकार्य नहीं हैं तो सुभाष जी से कहें वो बेनामी का आप्शन खत्म करें
आशा करता हूँ अब आप सभी संतुष्ट होंगे और मैं यथासंभव प्रयास करूँगा की अब साखी कर कमेन्ट न करना पड़े
धन्यवाद
- बेनामी
इस बीच बेनामी जी की एक और टिप्पणी आ गयी और मेरी उनसे इस बात पर पूरी सहमति है कि नीरज भाई अपनी बेहतरीन ग़ज़लों में से भी कुछ भेज सकते थे। साथ ही नीरज भाई की सरलता भी गौर करने लायक है कि उन्होंने बड़ी सादगी से ऐसी ग़ज़लें भेजीं जो हो सकता है उन्होंने आरंभिक काल में कही हों या जिन्हे अभी पूरी तरह तराशा न हो। अजीब शख्सियत हैं ये भी, कभी मिले नहीं लेकिन दिल से जुड़े हैं। बहुत कम ऐसे सच्चे इंसान मिल पाते हैं।
प्रत्युत्तर देंहटाएंनीरज जी को पढ़ते हुए काफी समय हो गया, कविता कोश पर भी और इनके अपने ब्लॉग पर भी. इनकी सबसे बड़ी ख़ासियत यह रही है कि ये बड़े मामूली शब्दों में बहुत ही गहरे भाव व्यक्त कर जाते हैं. लेकिन आज यहाँ पर मैं भी बेनामी साहब का पक्ष लेते हुए सर्वप्रथम एक प्रश्न पूछ्ने की अनुमति चाहूँगा माननीय सुभाष जी से कि साखी के लिए ग़ज़लों, गीतों या कविताओं का चयन कौन करता है? क्या कवि स्वेच्छा से अपनी चार रचनाएँ सौंप देता है या आप चयन करते हैं? चयन कवि का हो या सुभाष जी का, जल्दबाज़ी में नहीं होना चाहिए अर्थात कुछ रचनाएँ पढकर तब चयनित की जानी चाहिये. कवि तो कवि है और आप स्वयम पारखी हैं, अतः ऐसी रचनाएँ प्रस्तुत की जाएँ जिनमें समीक्षा की गुंजाइश बने. यानि उनमें कविता का शिल्प, व्याकरण, भाव, अभिव्यक्ति आदि पर चर्चा की जा सके. ऐसा न हो कि बस रस्म अदायगी बन कर रह जाए पूरी परिचर्चा.
प्रत्युत्तर देंहटाएंस्मरण हो कि मैंने अपनी आरम्भिक टिप्पणियों में कहा था कि रचनाएँ अलग अलग भाव प्रदर्शन करने वाली हों ताकि कवि की अलग अलग अभिव्यक्ति समझ में आए. यदि सारी ग़ज़लें सिर्फ रूमानियत की बातें कहे तो आप क्या अंदाज़ा लगाएंगे उस शायर के बारे में, यही कि वो रूमानीशायर है, जबकि हो सकता है कि वह शायर अपने दीगर अशार मेæ