अभियान के साथी

शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

मनोज भावुक की गजलें

मनोज भावुक को साखी पर प्रस्तुत करते हुए मुझे इसलिये प्रसन्नता हो रही है कि वे उम्र में छोटे होते हुए भी अपनी रचनाधर्मिता में अनुभवसम्पन्न और पके हुए दिखते हैं। साखी के पाठकों और रचनाधर्मी सहयोगियों के लिये यह एक नया अनुभव होगा क्योंकि इस कवि के जरिये मैं पहली बार हिंदी के  ही एक सशक्त और सम्पन्न भाषा रूप भोजपुरी में कही जा रही गजलें पेश करने जा रहा हूं।  2 जनवरी 1976 को सीवान (बिहार) में जन्मे और रेणुकूट (उत्तर प्रदेश ) में पले- बढ़े मनोज भावुक भोजपुरी के प्रसिद्ध युवा साहित्यकार हैं। पिछले 15 सालों से देश और देश के बाहर (अफ्रीका और यूके में) भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भावुक भोजपुरी सिनेमा, नाटक आदि के इतिहास पर किये गये अपने समग्र शोध के लिए भी पहचाने जाते हैं। अभिनय, एंकरिंग एवं पटकथा लेखन आदि विधाओं में गहरी रुचि रखने वाले मनोज दुनिया भर के भोजपुरी भाषा को समर्पित संस्थाओं के संस्थापक, सलाहकार और सदस्य हैं। तस्वीर जिंदगी के( ग़ज़ल-संग्रह) एवं चलनी में पानी ( गीत- संग्रह) मनोज की चर्चित पुस्तकें हैं। ‘तस्वीर जिन्दगी के’ तो इतनी  लोकप्रिय हुई कि इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित किया जा चुका है और इस पुस्तक को वर्ष 2006 के भारतीय भाषा परिषद सम्मान से नवाज़ा जा चुका है। एक भोजपुरी पुस्तक को पहली बार यह सम्मान दिया गया है। इसी २६-२७ सितम्बर को विरसामुंडा की पावन भूमि रांची में आयोजित सम्मेलन  में उन्हें सर्वसम्मति से विश्व भोजपुरी सम्मेलन की दिल्ली इकाई का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। वे भोजपुरी सम्मलेन की ग्रेट ब्रिटेन इकाई के अध्यक्ष रह चुके हैं। इस समय वे हमार टीवी नोयडा में क्रियेटिव हेड के पद पर काम कर रहे हैं।

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साखी परिवार को प्रसन्नता है कि गत दिनों मनोज भावुक को लखनऊ स्थित भाऊराव देवरस सेवा न्यास ने भोजपुरी भाषा में उल्लेखनीय योगदान के लिए पंडित प्रताप नारायण मिश्र स्मृति-युवा साहित्यकार सम्मान से नवाजा है। पहली बार किसी भोजपुरी साहित्यकार को यह सम्मान मिला है। भावुक को सम्मान स्वरूप पांच हजार रुपये, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह, माँ सरस्वती की प्रतिमा, अंगवस्त्रम एवं न्यास द्वारा प्रकाशित पुस्तकों का सेट भेंट किया गया।
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यहां प्रस्तुत हैं मनोज भावुक की कुछ भोजपुरी गजलें...
                                                        

                             1.
बचपन के हमरा याद के दरपन कहाँ गइल
माई रे, अपना घर के ऊ आँगन कहाँ गइल

खुशबू भरल सनेह के उपवन कहाँ गइल
भउजी हो, तहरा गाँव के मधुवन कहाँ गइल

खुलके मिले-जुले के लकम अब त ना रहल
विश्वास, नेह, प्रेम-भरल मन कहाँ गइल

हर बात पर जे रोज कहे दोस्त हम हईं
हमके डुबाके आज ऊ आपन कहाँ गइल


बरिसत रहे जे आँख से हमरा बदे कबो
आखिर ऊ इन्तजार के सावन कहाँ गइल


                             2.
 
भँवर में डूबियो के आदमी उबर जाला
मरे के बा तऽ ऊ दरिया किनारे मर जाला

पता ई बा कि महल ना टिके कबो अइसन
तबो त रेत प बुनियाद लोग धर जाला

जमीर चीख के सौ बार रोके-टोकेला
तबो त मन ई बेहया गुनाह कर जाला

बहुत बा लोग जे मरलो के बाद जीयत बा
बहुत बा लोग जे जियते में, यार, मर जाला

अगर जो दिल में लगन, चाह आ भरोसा बा
कसम से चाँद भी अँगना में तब उतर जाला


                                 3.
अबकी दियरी के परब अइसे मनावल जाये
मन के अँगना में एगो दीप जरावल जाये

रोशनी गाँव में, दिल्ली से ले आवल जाये
कैद सूरज के अब आजाद करावल जाये

हिन्दू, मुसलिम ना, ईसाई ना, सिक्ख ए भाई
अपना औलाद के इन्सान बनावल जाये

जेमें भगवान, खुदा, गॉड सभे साथ रहे
एह तरह के एगो देवास बनावल जाये

रोज दियरी बा कहीं, रोज कहीं भूखमरी
काश! दुनिया से विषमता के मिटावल जाये


सूप, चलनी के पटकला से भला का होई
श्रम के लाठी से दलिद्दर के भगावल जाये

लाख रस्ता हो कठिन, लाख दूर मंजिल हो
आस के फूल ही आँखिन में उगावल जाये


आम मउरल बा, जिया गंध से पागल बाटे
ए सखी, ए सखी 'भावुक' के बोलावल जाये




अनिमेष विश्वास की रचना 
                       4.

बहुत नाच जिनिगी नचावत रहल
हँसावत, खेलावत, रोआवत रहल

कहाँ खो गइल अब ऊ धुन प्यार के
जे हमरा के पागल बनावत रहल

बुरा वक्त में ऊ बदलिये गइल
जे हमरा के आपन बतावत रहल

बन्हाइल कहाँ ऊ कबो छंद में
जे हमरा के हरदम लुभावत रहल

उहो आज खोजत बा रस्ता, हजूर
जे सभका के रस्ता देखावत रहल

जमीने प बा आदमी के वजूद
तबो मन परिन्दा उड़ावत रहल

कबो आज ले ना रुकल ई कदम
भले मोड़ पर मोड़ आवत रहल

लिखे में बहुत प्राण तड़पल तबो
गजल-गीत 'भावुक' सुनावत रहल

                               5.
हियरा में फूल बन के खिले कौनो-कौनो बात
हियरा में शूल बन के हले कौनो-कौनो बात

जज्बात पर यकीन कइल भी बा अब गुनाह
दिल में उतर के दिल के छले कौनो-कौनो बात

अचके में पैर राख में पड़ते पता चलल
बरिसन ले आग बन के जले कौनो-कौनो बात

रख देला मन के मोड़ के, जिनिगी सँवार के
तत्काल दिल में लागे भले कौनो-कौनो बात

अनुभव नया-नया मिले 'भावुक' हो रोज़-रोज़
पर गीत आ गजल में ढ़ले कौनो-कौनो बात

6.

बात पर बात होता बात ओराते नइखे

कवनो दिक्कत के समाधान भेंटाते नइखे
 
भोर के आस में जे बूढ़ भइल, सोचत बा
मर गइल का बा सुरुज रात ई जाते नइखे

 
लोग सिखले बा बजावे के सिरिफ ताली का
सामने जुल्म के अब मुठ्ठी बन्हाते नइखे

 
कान में खोंट भरल बा तबे तs केहू के
कवनो अलचार के आवाज़ सुनाते नइखे

 
ओद काठी बा, हवा तेज बा,किस्मत देखीं
तेल भरले बा, दिया-बाती बराते नइखे

 
मन के धृतराष्ट्र के आँखिन से सभे देखत बा
भीम असली ह कि लोहा के, चिन्हाते नइखे

 
बर्फ हs, भाप हs, पानी हs कि कुछुओ ना हs
जिन्दगी का हवे, ई राज बुझाते नइखे

 
दफ्न बा दिल में तजुर्बा त बहुत, ए ‘भावुक’
छंद के बंध में सब काहें समाते नइखे



 


मेल-manojsinghbhawuk@yahoo.co.uk
बेबसाइट- WWW.MANOJBHAWUK.COM

Mobile no- 09958963981

56 टिप्‍पणियां:

  1. आपने कहा कि मनोज भावुक को साखी पर प्रस्तुत करते हुए मुझे इसलिये प्रसन्नता हो रही है कि वे उम्र में छोटे होते हुए भी अपनी रचनाधर्मिता में अनुभवसम्पन्न और पके हुए दिखते हैं। आपको जितनी प्रसन्‍नता प्रस्‍तुत करते हुए हुई उतनी ही प्रसन्‍नता मुझे पढ़कर हुई, कारण आपका और मेरा एक ही है।
    मैं भोजपुरी नहीं जानता लेकिन फिर भी कोई कठिनाई नहीं हुई आखिर है तो हिन्‍दी ही।
    ग़ज़ल 2 में शेर 3 की पंक्ति 2 में 'बेहया' शब्‍द पर वज्‍़न की ऑंशिक समस्‍या लग रही है।
    इसी तरह ग़ज़ल 6 में शेर 7 की पंक्ति 2 में राज की जगह राज़ होना चाहिये, हो सकता है यह टंकण त्रुटि रही हो। राज़ उर्दू से आया शब्‍द है इसलिये इसे यथावत लेना आवश्‍यक है।
    इनकी ग़ज़लों में भाव और भाषा-प्रवाह स्‍पष्‍ट हैं और तेवर भी मुखर हैं।

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  2. मनोज भावुक लाजवाब हैं -बहुत शुभकामनाएं ,आपको भी धन्यवाद !

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  3. bhai subhash ray ji ko sadhu vad jo aap ne sakhi ke madhym se aanchlik khusboo ko itne vishal flk pr udela hai
    lok ya aanchlik bhashaonka bahut hi sshkt sahity hai aur yhi neh chhoh ko hnsi thitholi ko aangnko gliyare ko vykt kr skta hai yh isi sahity ki visheshta hai
    bhai mnoj lok ya aanchik sahity me nirntr vridhi krte rhen meri shubhkamnayen hain

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  4. बहुत लाजवाब .... भोजपुरी में तो ये ग़ज़ल कमाल की है ...

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  5. manoj bhaavuk ka ek ghazal sangrah " tasveer jindagi ke " mere pas hai ...adbhut rachnayen hain ...bhojpuri ke liye manoj ji ka yogdaan bahut hi srahniya hai ...inki kai ghazalon me craft aur art dono ka taalmel itna khubsurat hota hai ki bas padhne wala mantr mugdh ho jaye .... aur han abhi abhi yuva sahitykar ke samman se navaaje jaane ke liye unko shubhkaamnayen

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  6. मनोज भावुक जी
    को
    भाऊराव देवरस सेवा न्यास द्वारा पंडित प्रताप नारायण मिश्र स्मृति-युवा साहित्यकार सम्मान से सम्मानित होने पर
    हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  7. ए मनोज भाई,
    तनी एहर सुन‍ऽ... तू कइसन हवऽ? हमरा के तोहरा से एगो शिकाइत बा। सुनत हवे के नाहीं? हँऽऽऽऽ... त‌ लऽ अब सुनऽ...। अरे यार..., चल जाय दऽ...। पहिलिकी मुलाकात मऽ शिकाइत ठीक ना लागी। इ मैटरवा पर फेर कबो बात कइल जाई... ढेर बतियावे के हऽ तोहरा से ! याद रखिहऽ... ईमेल जरूर भिजिह,भाय ! ठीक बा...न?

    मनोज भाई, अब आपकी ग़ज़लों पर आता हूँ, लेकिन उससे पहले डॉ. तिलक राज कपूर जी की इस बात से सहमति प्रकट करना चाहूँगा कि-- "ग़ज़ल 2 में शेर 3 की पंक्ति 2 में 'बेहया' शब्‍द पर वज्‍़न की आंशिक समस्‍या लग रही है।"

    उक्तेतर, मैं डॉ. कपूर जी की इस बात से असहमत हूँ कि-- "ग़ज़ल 6 में शेर 7 की पंक्ति 2 में ’राज’ की जगह ’राज़’ होना चाहिये।" हिन्दी के ’राज’ और उर्दू के ’राज़’ में अर्थ का अंतर होने के बावजूद भी मैं कहना चाहूँगा कि भाषा सदैव संदर्भानुकूल अर्थ देती है। डॉ. साहब... दरअस्ल भोजपुरी भाषा में उर्दू से आयातित शब्दों पर नुक़्ता अपरिहार्य या आवश्यक नहीं है क्योंकि... (भोजपुरी की आपन एक अलगै दुनिया बा)। यहाँ ग़ौरतलब है कि मनोज भावुक ने ’राज़’ की जगह नुक़्ता-रहित ’राज’ का ही नहीं, प्रत्युत्‌ ’रोज’ , आखिर, खुशबू, इंतजार, जमीर, कसम, कैद, आजाद, वक्‍त, जमीन, कदम, गजल, जज्बात, दफ्न, यकीन, आदि बहुत से उर्दू शब्दों का नुक़्ता-विहीन इस्तेमाल किया है। हाँ... कुछेक जगहों पर मनोज भाई ने नुक़्ता लगा दिया है। यहीं पर वे थोड़ी ग़लती कर गये। उदाहरणार्थ,
    ग़ज़ल-5 के शे’र-5 में ’रोज़-रोज़’ के अतिरिक्त ग़ज़ल-6 के शे’र-4 में ’आवाज़’ शब्द का प्रयोग देखें।
    इसे दोहरा व्यवहार कहा जाएगा। मेरी विनम्र राय में, उन्हें या तो नुक़्ते का दामन पकड़ना ही नहीं चाहिए था या फिर बिल्कुल ही छोड़ देना चाहिए था (जैसा कि अधिकांश ग़ज़लों में उन्होंने किया भी)।

    आद. कपूर साहब,
    ऊपर मैंने जो एक बात कही है कि ‘भोजपुरी की आपन एक अलगै दुनिया बा’ , उसका आशय स्पष्ट करने के लिए कहीं दूर जाने की ज़रूरत नहीं है ; मनोज भावुक भाई की ग़ज़लों में से ही कुछेक शब्द उठा लेने से काम चल जाएगा। देखें... सर जी-

    ग़ज़ल-4 ( शे’र-1 व 5) में ’ज़िन्दगी’ और ’हुज़ूर’ शब्दों के लिए भोजपुरी में क्रमशः ’जिनिगी’ और ’हजूर’ का प्रयोग।
    ग़ज़ल-6 (शे’र-2) में ’सिर्फ़’ के लिए ’सिरिफ’ का प्रयोग। इसी तरह-
    ग़ज़ल-3 (शे’र- 6) में ’दरिद्रता’ की जगह ’दलिद्दर’। वहीं दूसरी ओर--
    ग़ज़ल-3 (शे’र-2) वाला ’सूरज’, ग़ज़ल-6 (शे’र-2) तक पहुँचकर ’सुरुज’ बनकर सामने आ गया।

    यह है भोजपुरी की एक अलग दुनिया की झलक!
    यहाँ कहना होगा कि कोई भी भाषा/ बोली Linguistic ground पर borrowed words को अपने अनुकूल ढाल लेती है। उपर्युक्त शब्दावली भोजपुरी भाषा के अनुकूलन का ही परिणाम है। इस संदर्भ में, अन्य भाषाओं में भी अनगिनत उदाहरण उपलब्ध हैं।

    सर जी, अरबी भाषा में एक शब्द है- ’maḵzan’ जिसका अर्थ है- 'भंडार-गृह' (Store-house)। जब ये शब्द इटैलिअन भाषा में गया, तो magazzino हो गया। वहाँ से जब ये फ़्रेंच भाषा में गया तो, तो magazin बन गया। और जब यही शब्द अंग्रेज़ी भाषा में पहुँचा, तो वहाँ ‘magazine’ के रूप में जाना गया जिसे हम सभी बख़ूबी चीह्नते-पहचानते हैं। इसी तरह 'Grass' और ‘घास’, 'Candle' और ‘कंदील’, 'Reportage' और ‘रिपोर्ताज’ तथा 'Philosophy' और ‘फलसफा’ के अलावा 'Mouse' और ‘मूस’/‘मूष’/‘मूषक’ के सह-संबंध (Co-relation) से हम सभी परिचित हैं। किसी भी भाषा में शब्द-संपदा के अनुकूलन / आत्मसातीकरण की प्रक्रिया अनवरत्‌ रूप से चलती रहती है। यह कोई आवश्यक नहीं कि कोई भी भाषा किसी आयातित शब्द को आत्मसात्‌ करते समय उस स्रोत-भाषा की Morphology या Phonology (वर्तनी-विधान या ध्वनि-विज्ञान) को स्वीकारे ही। ख़ैर.....।

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  8. मनोज भाई, आपके जो शे’र मेरे मन को गहरे तक छू सके, वे निम्नोद्धृत हैं:

    निजी तौर पर, एक रचनाकार के रूप में आपका यह Observation मुझे क़ाबिले-तारीफ़ लगा-
    1. भँवर में डूबियो के आदमी उबर जाला
    मरे के बा तऽ ऊ दरिया किनारे मर जाला

    और... इस शे’र में तो आप दर्शन की ऊँचाई छूते-से दिख रहे हैं। बर्फ (ठोस) , पानी (द्रव) और भाप (गैस)-- पदार्थ की तीनों अवस्थाओं के अलावा आपके इस ’कुछ भी नहीं’ (कुछुओ न) के बीच ज़िन्दगी के असली चेहरे की शिनाख़्त करने की यह आदमक़द कोशिश मुझे मनहर लगी :
    2. बर्फ हs, भाप हs, पानी हs कि कुछुओ ना हs
    जिन्दगी का हवे, ई राज बुझाते नइखे

    मानव-मन को ’परिन्दा’ का निम्न रूपक तो परम्परागत है, फिर भी बात अच्छी लगी-
    3. जमीने प बा आदमी के वजूद
    तबो मन परिन्दा उड़ावत रहल

    विकास-किरण का दिल्ली (वस्तुतः कुछेक शहरों) तक सीमित हो जाना आपको पसंद नहीं, यहाँ समाजवाद का पक्षधरता परिलक्षित हो रही है :
    4. रोशनी गाँव में, दिल्ली से ले आवल जाये
    कैद सूरज के अब आजाद करावल जाये


    इस शे’र का तो, भाई... कहना ही क्या ! कितनी सुन्दर बात कह गए हैं आप ! सीधे दिल में जाकर ठहर गया है यह शे’र--
    5. बहुत बा लोग जे मरलो के बाद जीयत बा
    बहुत बा लोग जे जियते में, यार, मर जाला

    ग़म की स्याह रातों को लम्बे समय तक ओढ़कर जीवन बिताने वाला इंसान ख़ुशी के उजाले की प्रतीक्षा करते-करते एक दिन आख़िर ऊब ही जाता है। ऐसे में उसकी यह झुँझलाहट अनुचित नहीं, स्वाभाविक है-
    6. भोर के आस में जे बूढ़ भइल, सोचत बा
    मर गइल का बा सुरुज रात ई जाते नइखे

    ’श्रम’ को दिया गया लाठी का रूपक मुझे एकबारगी कुछ अटपटा-सा लगा, पुनः ग़ौर करने पर पाया कि ग़ज़लकार ठीक ही तो कह रहा है; दलिद्दर (यानी ’दरिद्रता’) बड़ी ढीठ होती है...प्यार से कहाँ हटाए हटती हैं, श्रम की कुछ दमदार लाठियाँ पड़ें तो भागे-
    7. सूप, चलनी के पटकला से भला का होई
    श्रम के लाठी से दलिद्दर के भगावल जाये

    बुराई के खिलाफ़ आवाज़ उठा सकने की हिम्मत का ह्रास चारों ओर दिख रहा है। ऐसे में, यह शे’र हमारे समय का एक चित्र बनकर उभरा है-
    8. लोग सिखले बा बजावे के सिरिफ ताली का
    सामने जुल्म के अब मुठ्ठी बन्हाते नइखे

    सद्‍भावना के साथ,

    जितेन्द्र ‘जौहर’
    आई आर - 13/6, रेणुसागर, सोनभद्र (उप्र) 231218.
    मोबा. + 91 9450320472

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  9. मनोज 'भावुक' के गज़लें, भोजपुरी में नि:संदेह एक नया फलक रचने की कोशिश कर रही हैं. ताज़गी से भरी इन गज़लों में वो सब कुछ है जिन्हें पढ्ने की इच्छा एक एक पाठक को होती है.
    मनोज को अभी लखनऊ में सम्मानित किया गया, मुझे दुख है यह खबर मुझे अगले दिन अखबारों से मिली. मेरे पास कोई सम्पर्क सूत्र नहीं था वर्ना मुलाक़ात हो जाती. मैं इस सम्मान के लिए उन्हें बधाई देत हूं.
    ........जारी

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  10. मनोज की गज़लें अच्छी हैं, यह तो मैं कह ही चुका हूं लेकिन 6 गज़लें देखने के बाद मुझे यह लगा कि अभी मनोज के लिए मेहनत ज़रूरी है. भोजपुरी एक अलग भाषा और इसका बरताव भी अलग है. मनोज की गज़लों में कुछ शब्द खटकते हैं---आंगन, दरपन, मधुवन, सावन, खुश्बू, विश्वास, आदमी, रेत, बुनियाद, ज़मीर, श्रम, वजूद, परिन्दा, जज़बात---भोज्पुरी में इन शब्दों प्राय: इनके साथ 'वा' का इस्तेमाल कर के इनका भोजपुरीकरण कर लिया जाता है.
    रचनाकार का किसी से प्रभावित होना अच्छी बात है. मनोज की गज़ल-3 मुझे स्वर्गीय माधव मधुकर की गज़ल क भोजपुरी रूपांतरण लगी. हो सकता है, मनोज को इसका इल्म न हो लेकिन वह एक मशहूर गज़ल है, लिहाज़ा रचनाकार को ऐसे साम्य से बचना चहिए.

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  11. मैं फिर भी यह कहने पर मज्रबूर हूं कि मनोज की यह गज़लें भोजपुरी के लिए एक नई खिड्की खोल रही हैं जहां से हवा के ताज़ा झोंके आ रहे हैं. अब तक भोजपुरी के रचनकार जिस अंगनव-घुंघटवा के साथ अशलीलता परोसते रहे हैं, मनोज की रचनाएं उनके मुंह पर एक तमांचा हैं. गज़ल को गज़ल के ही रूप में बांधे रखने की कला मनोज के पास है और शायद आने वाला वक़्त इन्हें भोजपुरी का 'दुष्यंत' के नाम से याद करे.

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  12. @जितेन्‍द्र भाई
    बर्फ हs, भाप हs, पानी हs कि कुछुओ ना हs
    जिन्दगी का हवे, ई राज बुझाते नइखे
    में वस्‍तुत: मुझसे त्रुटि हुई 'राज' को भेद के रूप में पढ़ने की, अब बात समझ में आई कि यहॉं इसका आशय शासन से है, ऐसी स्थिति में नुक्‍ते की जरूरत ही नहीं रह जाती है। उर्दू का राज़ शब्‍द अलग है, और मैनें दूसरी पंक्ति का आशय यह लिया था कि 'जि़ंदगी क्‍या है, यह भेद समझ नहीं आता है'। जबकि अब इसका आशय मुझे समझ आया कि 'जिन्‍दगी क्‍या है; इस प्रश्‍न को ये शासन हल ही नहीं करता है'। राज तो हिन्‍दी का शब्‍दकोषीय शब्‍द है इसलिये मुझे भ्रम होना नहीं चाहिये था मगर 'होता है-होता है' कभी-कभी हो जाता है।
    एक बात तो स्‍पष्‍ट है कि ग़ज़लें पुष्‍ट हैं।
    भोजपुरी मेरी बोल-चाल की भाषा नहीं है इसलिये अगर कोई ग़लती हुई तो मुझे लगता है कि क्षम्‍य है।

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  14. कोई भी हो भाषा बोली
    भावों की जब दगती है गोली
    मन बन जाता है यारो
    जीवन तरंग की निराली रंगोली

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  15. मनोज भावुक की गज़लें पहली बार पढ़ने का अवसर मिला ,इसके लिए डा.राय जी का आभार | भोजपुरी मुझे नहीं आती लेकिन इन ग़ज़लों का भावनात्मक बहाव ऐसा कि भाषा की दीवार महसूस ही नहीं होती है| संवेदना की दृष्टि से इन ग़ज़लों में आधुनिकता की आवाज़ है और मानवता की धड़कन है जो माटी की सोंधी गंध लिए है .बहुत बहुत बधाई |

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  16. मनोज जी के परिचय को पढकर एक सहज ही रिश्ता बन गया उनसे. मेरा ननिहाल एक पुश्त पहले तक बिहार का वही जनपद होता था जहाँ इनका जन्म हुआ और वर्त्तमान में वहाँ जहाँ ये रह रहे हैं. रेणुकूट को मैंने जंगल से शहर बनते देखा है. ख़ैर यह सब अपनी जगह. उनके परिचय ने बाँध लिया और मजबूर कर दिया इतना कहने पर.
    एक सामान्य प्रतिक्रिया सबसे पहले कि यह ग़ज़लें भोजपुरी की श्रेणी में रखी जाएँ कि नहीं, यह एक अलग विषय है चर्चा का. मैं जिस भाषा में लिखता हूँ उसे कई लोग भोजपुरी या कुछ और कह देते हैं, जबकि मैंने स्वयम यह सफाई दी है कि यह कोई भाषा नहीं, बोली है. पूरी तरह हिंदी, सिर्फ बोलने के अंदाज़ में लिखी हुई. लिहाज़ा इसे बतियाना माना जाना चाहिए, लेखन नहीं. मैंने यदा कदा कुछ कविताएँ और ग़ज़लें भी लिखी हैं और चाहता तो उन्हें भी उसी भाषा में लिख सकता था. लेकिन जिस भाषा में सोचता हूँ वह हिंदी है, अतः उसी भाषा में लिखना मुझे उचित लगा.
    ग़ज़ल भले कही जाती हो, किंतु जब इसे कलमबंद किया जाए, तो लेखन की श्रेणी में रखना पड़ता है और उस आधार पर ग़ज़ल को भाषाई पैमाने (हालाँकि पीछे इस पर बहस हो चुकी है कि हिंदी गज़ल, उर्दू गज़ल जैसा कुछ नहीं है) पर ही परखा जा सकता है, विशेषतः तब जब आप उसे भाषाई आधार पर कैटेगोराइज़ कर रहे हों.

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  17. इतनी बड़ी भूमिका सिर्फ इतना बताने के लिए कि यह ग़ज़लें अपनी तमाम ख़ूबसूरती के बावजूद यह एलान करती हैं कि यह हिंदी/उर्दू में सोची हुई ग़ज़लें हैं. यानि मौलिक रूप से यह भोजपुरी की गज़लें नहीं हैं. इसका प्रमाण इस बात से भी मिलता है कि सारी गज़लों में उर्दू के कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग है, जो भोजपुरी का अंग नहीं हैं.
    एक और प्रमाण, अमीर खुसरो के माध्यम से. अमीर खुसरो की कुछ गज़लें फ़ारसी और हिंदवी का अद्भुत मेल प्रस्तुत करती हैं, जहाँ मिसराएऊला फ़ारसी में और सानी हिंदवी में कहा गया है. आप फ़ारसी का मतलब तो समझ सकते हैं (यदि भाषा जानते हों तो), मगर उसी बहर में उसे ग़ज़ल में तर्जुमा करके नहीं पिरो सकते, क्योंकि शेर का वज़न उसी ज़ुबान में आता है जिसमें वह कही गई हो और बहर भी वैसे ही सम्भाली जा सकती है. (मैंने एक बार यह हिमाकत करने की कोशिश की थी, क़ामयाबी भी मिली, लेकिन ख़ुद को तसल्ली नहीं हुई). इन ग़ज़लों में यह बात नहीं दिखाई देती, जो इनकी मौलिकता को चुनौती देती है, मौलिकता सोच की.
    एक शेर के माध्यम से अपनी बात स्पष्ट करने की कोशिश करता हूँ. मनोज जी ने कहाः
    बचपन के हमरा याद के दरपन कहाँ गइल
    माई रे, अपना घर के ऊ आँगन कहाँ गइल.

    और यह देखिएः
    बचपन की मेरी याद का दर्पन कहाँ गया,
    माई री, अपने घर का वो आँगन कहाँ गया.

    यही नहीं, किसी भी शेर को आप उठा कर देखिए, उसे आप बहुत आसानी से बिना मिहनत हिंदुस्तानी ज़ुबान में लिखते चले जाएँगे (ग़ौर करें तर्जुमा करते चले जाएँगे नहीं कहा मैंने).
    यही बात ख़ुद उनकी दूसरी ग़ज़ल के मतले से साबित होती है.

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  18. . ज़रा ग़ौर करेंः
    भँवर में डूबियो के आदमी उबर जाला
    मरे के बा तऽ ऊ दरिया किनारे मर जाला.

    ग़ज़ल को बहर में रखने के लिए मनोज जी ने इसमें “भँवर में डूबियो” लिखा है, जबकि भोजपुरी में यही शब्द “डुबियो” हो जाता है. यह शब्द इसलिए यहाँ लिखना उनकी मजबूरी बन गया, कि अगर इसे भोजपुरी रूप में लिखा जाता तो शेर की बहर छोटी हो जाती. लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाए, क्योंकि उनकी सोच मूलतः हिंदी में थी. वैसे शायर ये ईमानदार हैं, मैं होता तो इस तरह बेईमानी कर जाताः
    भँवर में डुबियो के अदमी कबो उबर जाला
    मरे के बा तऽ ऊ दरिया किनारे मर जाला.

    यहाँ “आदमी” को भोजपुरी के प्रचलित शब्द “अदमी” से बदल दिया है जो किसी भी पुरबिया व्यक्ति को आपत्तिजनक नहीं लगता और बहर के कारण कबो शब्द जोड़ना पड़ा.
    ख़ैर, इन सबके बावजूद, मनोज जी की ग़ज़लें, एक युवा गज़लगो की क्षमता को स्थापित करती हैं. जितनी आसानी से इन्होंने इतने गहरे भाव बयान किए हैं, उनकी अद्भुत प्रतिभा का लोहा मनवाने को काफी है. भोजपुरी भाषा को जो नहीं बोलता और समझता है, उन्हें यह भाषा सिर्फ फिल्मों के माध्यम से परोसी गई है, और यह सिर्फ इस भाषा के बोलने और समझने वाले जानते हैं कि वह कितनी दूषित होती है. ऐसे में भावुक जी की ग़ज़लें एक ठण्डी हवा के झोंके की तरह है. वे समस्त सम्मान, जो आपको मिले हैं वह आपकी योग्यता का प्रमाण हैं और आपकी ग़ज़लें उसकी परिचायक हैं.
    मेरी ओर से शुभकमनाएँ!

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  19. आद. डॉ. कपूर साहब,

    बर्फ हs, भाप हs, पानी हs कि कुछुओ ना हs
    जिन्दगी का हवे, ई राज बुझाते नइखे

    आपकी सुविधा के लिए, मनोज भावुक के उक्त संदर्भित शे’र का पदच्छेद व अन्वयपूर्ण शब्दार्थ / भावार्थ निम्नवत है :

    बर्फ हs = बर्फ है
    भाप हs = भाप है
    पानी हs = पानी है
    कि कुछुओ ना हs = या फिर कुछ भी नहीं है ;
    जिन्दगी का हवे = ज़िन्दगी क्या है ?
    ई राज = यह रहस्य / यह राज़ / Mystery / Secret
    बुझाते नइखे = समझ में ही नहीं आता है।

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  20. डॉ. साहब,
    ...इस प्रकार ग़ज़लकार यहाँ पदार्थ की तीनों अवस्थाओं (ठोस-द्रव-गैस) के अलावा ’कुछ भी नहीं’ (कुछुओ न) के बीच ज़िन्दगी के असली चेहरे की शिनाख़्त करने की एक आदमक़द कोशिश कर रहा है। वस्तुतः वह जानना चाहता है कि जीवन आख़िर है क्या ? इस प्रश्न के उत्तर की खोज में वह दर्शन के धरातल पर जा पहुँचा है। अंततः वह स्वयं को निष्कर्षविहीन ही पाता है, यह कहता हुआ कि -- ’ई राज बुझाते नइखे’। इस प्रकार उक्त शे’र में प्रयुक्त ‘राज’ शब्द वस्तुतः उर्दू वाला ‘राज़’ (रहस्य) ही है, न कि हिन्दी वाला `राज’ (शासन) । मैं समझता हूँ कि अब बात पूर्णतः स्पष्ट हो गयी है...न सर जी?

    यक़ीनन, आपको कहीं कोई भ्रम नहीं हुआ है। आपने अपनी पहली Post में ‘राज’ बनाम ‘राज़’ का जो मुद्दा उठाया था, वह अपनी जगह एकदम सही था। वहाँ मेरा आपसे (असहमतिपूर्वक)सिर्फ़ यह कहना था कि भोजपुरी भाषा में उर्दू नुक़्ते को महत्त्व नहीं दिया गया है। भोजपुरी ने उर्दू शब्द तो आयात किये हैं, लेकिन उनका अनुकूलन अपनी ख़ुद की परम्परा में किया है। आपसे अनुरोध है कि मेरी पहली Post पुनः ध्यान से पढ़ें। वहाँ, मेरी समझ से, कोई Confusion उत्पन्न नहीं हो रहा है।

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  21. मनोज जी की ग़ज़लें साखी पर प्रकाशित होना गर्व की बात है। सर्वत जी ने उनके लिए भाजेपुरी का दुष्यन्त की संज्ञा दी है तो कुछ सोचकर ही दी है। ये ग़ज़लें इस बात का प्रमाण हैं कि ये एक सच्चे कवि की ग़ज़लें हैं। कुछ व्याकरणिक त्रुटियों की ओर भी विद्वानों ने इशारा किया है, लेकिन वो सब बेमानी है, क्योंकि ये ग़ज़लें इसका मौका नहीं देतीं। मैं तो सबसे पहले ग़ज़ल पढ़ते ही यह सोचने लगता हूं कि शायर ने इसे सोचा कहां से है। क्या किसी और का पढ़कर या वह जिन्दगी की पहेलियो को खुद सुलझाता है। अगर पहले वाली स्थिति पाता हूं तो उसकी कहन पर ध्यान जाता है कि उसने पहले ही हजार बार कही बात को कैसे कहा है। यदि दूसरी स्थिति पाता हूं तो सिर्फ वाह ही निकलती है और उसका मुरीद हो जाता हूं। मनोज जी ऐसे ही रचनाकार हैं जो अपनी नजर से इस दुनिया को देखते हैं। उनके ये अशआर इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं-

    भँवर में डूबियो के आदमी उबर जाला
    मरे के बा तऽ ऊ दरिया किनारे मर जाला

    बहुत बा लोग जे मरलो के बाद जीयत बा
    बहुत बा लोग जे जियते में, यार, मर जाला

    बर्फ हs, भाप हs, पानी हs कि कुछुओ ना हs
    जिन्दगी का हवे, ई राज बुझाते नइखे


    इसके अतिरिक्त ये ग़ज़लें उर्दू और हिन्दी के झगड़े का भी काफी हद तक उत्तर देती हैं क्योंकि किसी भी कोण से ये उर्दू की ग़ज़लें तो हैं नहीं इसका अर्थ है कि फारसी और उर्दू के अतिरिक्त किसी और भाषा में भी ग़ज़लें सफलतापूर्वक कही जा सकती हैं। इस बात को कुछ लोग आज भी पता नहीं क्यों स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।
    एक बड़ी मजेदार बात ध्यान में आ रही है कि ये सारी प्रतिभाएं नोएडा में क्यों एकत्रित होती जा रही हैं। अब देखिए न- अशोक रावत जी, सलिल वर्मा जी, आलोक श्रीवास्तव और अब मनोज जी। जिसे देखो वही नोएडा में निकलता है। क्या इसमें कुछ रहस्य है।

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  22. @ संजीव गौतमः
    एक भूल सुधार की अनुमति चाहता हूँ... इस अनपढ़ का नाम (अभी अभी यह ख़िताब मिला है मुझे, या कहिए किसी ने पहली बार सही पहचाना है, इस बिहारी को) आपने प्रतिभावान लोगों में शामिल कर बड़ी भूल की है. वैसे, नोएडा में जमा होती सारी प्रतिभाओं का रिमोट कंट्रोल तो आगरा में है. डॉ. सुभाष राय हों या संजीव गौतम. अभी तक मुस्कुरा रहा हूँ आपकी इस टिप्पणी पर.
    गौतम जी, आभार आपका!

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  23. @ आद.श्री सलिल वर्मा जी (उर्फ़ ‘चला बिहारी...’),

    आप जैसे संतुलित/संयमित वाणी वाले व्यक्ति को किस ‘पढ़े-लिखे’ ने ‘अनपढ़’ कहा...हुज़ूर! मेरी राय में, यदि आप अनपढ़ हैं...तो फिर ‘पढ़ा-लिखा’ कौन है ?

    यक़ीनन, भ्राताश्री...!‘साखी’ पर मौजूद टिप्पणीकारों की आकाशगंगा में आप एक ख़ास स्थान रखते हैं...इस बात को मैं बड़ी शिद्दत से महसूस करता हूँ।

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  24. @जितेन्‍द्र भाई तथा संजीव भाई
    आप तो गंभीर हो गये एक मज़ाक के प्रति। हुजूर 'नैन लड़ जइहैं तो मनवा मा कसक हुइवै करी' के ज़माने से हिन्‍दी के अन्‍य रूप सुनते आ रहें, अइसन बुढ़बक न जानिये।
    इस तरह की गंभीर चर्चाओं में थोड़ी बहुत चुहल चलती रहनी चाहिये।

    बिहारी ब्‍लॉगर साहब और आपकी बात को ही आगे बढ़ा रहा हूँ कि भाषा का अपना व्‍याकरण और लिपि होना आवश्‍यक है जबकि बोली इनसे स्‍वतंत्र है (ऑंशिक स्‍थानीय रूप छोड़कर)। कहा जाता है कि हर आठ कोस (लगभग 25 किलोमीटर) पर बोली और पानी बदल जाते हैं, स्‍वाभाविक है कि मालवॉंचल से बिहार तक हिन्‍दी बोली के कई रूप हैं। पंजाबी मूल का होते हुए भी मेरे लिये पंजाबी और भोजपुरी एकसी हैं। दोनों में अर्थ समझ में आ जाता है बोलते नहीं बनतीं।
    हिन्‍दी, अंग्रेजी और उर्दू के अतिरिक्‍त विश्‍व की सभी भाषाओं पर मेरा एक सा नियंत्रण है- कोई भी नहीं आती।
    मनोज ने ऐसी रचनायें दी हैं कि कहने को कुछ छोड़ा ही नहीं, अब भाई कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा न वरना ब्‍लॉग पर टिप्‍पणी-मेला कैसा लगेगा। लिव लाईफ़ किंग साईज़- जीवन के हर पल का आनंद लें।

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  25. Bhai Salil n main remote hoon n mere haath men koi control hai. aap dekhate hee hain, sab kuchh aatm niyantrit aniyantran men chal raha hai.vaise Sanjeev ne kuchh galat naheen kaha hai shayad.

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  26. इसमें कोई शक नहीं है कि मनोज की ग़ज़लें उनके नाम के अनुरूप पढ़ने वाले को भावुक कर देती हैं। पर अगर थोड़ा ठहरकर पढ़ा जाए तो बहुत से आयाम खुलते हैं। उनके शिल्प पर बहुत बात हो चुकी है। ग़ज़लों का शिल्प वैसे भी मेरा क्षेत्र भी नहीं है। मैं उनके कथ्य पर अपनी बात कह रहा हूं।

    मनोज मुझे दुविधाग्रस्त लगते हैं। वे तय नहीं कर पा रहे हैं कि करना क्या है या कि कहना क्या है। उनकी पहली ग़ज़ल केवल सवाल पूछती है वह कोई उत्तर नहीं देती और न ही उत्तंर खोजने के लिए उकसाती है। मनोज जैसे विचारवान युवा से यह उम्मीद करना गलत नहीं होगा कि वे सवाल ऐसे पूछें जो लोगों को उत्तर खोजने के लिए, आत्मावलोकन करने के लिए मजबूर करें।

    दूसरी गजल में वे विरोधाभासी बातें कहते हैं। पहले यह शेर देखिए-
    पता ई बा कि महल ना टिके कबो अइसन
    तबो त रेत प बुनियाद लोग धर जाला

    और अब इसे पढ़ें-
    अगर जो दिल में लगन, चाह आ भरोसा बा
    कसम से चाँद भी अँगना में तब उतर जाला

    यूं देखने में दोनों ही बातें अपनी जगह सही हैं। पर एक ही ग़ज़ल में वे फिट नहीं बैठती।

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  27. तीसरी ग़ज़ल में भी यही समस्या लगती है। पहले चार शेरों से बात जिस सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ती है वह अचानक ही पांचवे शेर में आकर बिखर जाती है। शायर गहरे अवसाद में भर जाता है। और फिर छंटवे शेर में वह अचानक अपने पुराने रूप में लौट आता है। और इस पूरी ग़ज़ल में आखिरी का शेर तो सारी ग़ज़ल को हल्का कर देता है। जबकि मेरे हिसाब से यही ग़ज़ल उनकी सबसे बेहतरीन ग़ज़ल होनी चाहिए थी। इस ग़ज़ल से अगर पांचवे और आखिरी शेर को हटा दिया जाए तो ग़ज़ल कैसी बनती है देखिए।

    चौथी ग़ज़ल में ऐसा लगता है कि मनोज अपने को दुहरा रहे हैं। पांचवी ग़ज़ल में वे जिंदगी के फलसफे की बात करते नजर आए। लेकिन छठवीं गजल फिर एक बार निराशा में ले गई।

    बुरा न मानें मनोज के मुस्कराते और आशावान चेहरे के दर्शन इन गज़लों में नहीं हुए। पेशे से भी वे जिस क्षेत्र में हैं वह भी मेरे हिसाब से सकारात्मकता की मांग करता है। अगर यह हम उन जैसे युवाओं से यह उम्मीद नहीं लगाएंगे तो फिर किसकी तरफ देखेंगे।

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  28. @आद. डॉ. कपूर साहब,
    मोगैम्बो ख़ुश हुआ...! आपके sense of humour को सलाम!

    वैसे...हुज़ूर, इस बार मेले में उतनी ‘दुकानें’ नहीं आयीं,जितनी कि आती रही हैं। मैंने यह बात Google chat के माध्यम से डॉ. सुभाष राय जी से भी कही थी। ख़ैर...कभी-कभी ‘दुकानदारों’ की कुछ अन्य व्यस्तताएँ भी हो जाती हैं, संतुलन तो बनाना ही पड़ता है।

    पता नहीं क्यों, मैं श्री प्राण शर्मा जी का काफी इंतज़ार करता रहा,अभी भी कर रहा हूँ। आख़िर कुछ तो कहें मनोज भावुक जैसे फड़कते हुए भोजपुरी रचनाकार के सृजन पर। यदि मेरी बात उन तक पहुँच रही हो, तो हुज़ूर अवश्य पधारें।

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  29. यह बात कहने से मैं बचना चाह रहा था, पर तिलक जी की टिप्पणी आने के बाद लगता है कि इसे कहना ही चाहिए। मित्रो अब यह मान्यता पुरानी पड़ चुकी है कि भाषा और बोली अलग-अलग होती हैं। या कि भाषा का व्या‍करण होता है और बोली का नहीं होता। आप ध्यान से देखेंगे तो बोली का भी व्याकरण होता है। हो सकता है वह लिखित न हो। मसला केवल लिपि का है। बहुत संभव है हर बोली की अपनी लिपि नहीं होती है। जिस की लिपि है उसे आप भाषा कहने लगते हैं। यह बात मैं केवल यहां इसलिए कह रहा हूं कि इस मान्यता को लेकर बहुत काम हुआ है और भाषाविद् अब इससे इत्तफाक नहीं रखते हैं। फिलहाल यह मंच इस पर विमर्श करने का नहीं है। जिनकी रुचि हो उन्हें इस पर सामग्री खोजकर पढ़नी चाहिए।

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  30. यह वाक़ई चिंता की बात है कि टिप्पणीकार टिप्पणियां देते रहते हैं और रचनाकार गायब रहता है. कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे हम बिन बुलाए बाराती हों. मनोज भावुक का यह फर्ज़ है कि वह स्वयं आकर शंका-आशंका पर अपने विचार प्रकट करें. यह चिंताजनक ही नहीं, हम जैसों के लिए लज्जाजनक भी है.

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  31. माफ करें जितेन्‍द्र जी अभी तक आपकी टिप्‍पणियां मर्यादित लग रही थीं। पर अचानक ही आप यह कौन-सी भाषा बोलने लगे। यहां जो लोग विमर्श कर रहे हैं वे 'दुकानदार' नहीं हैं। दुकानदार शब्‍द इस्‍तेमाल करके आप औरों के साथ-साथ अपना भी अपमान कर रहे हैं। आप जानते हैं दुकान में सामान बेचा जाता है। यहां कोई अपनी टिप्‍पणी बेचने नहीं आता है। तिलक जी ने मेले की बात की है। वह एक उत्‍सव की बात है। उसे आपको उसी संदर्भ में समझना चाहिए।

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  32. जौहर साहब! आपने जो सम्मान दिया उसका आभार. हम बिहारी तो वैसे भी मूढ़ता के पर्याय माने जाते रहे हैं. इसलिए मुझे अगर किसी ने मूढ़ कह दिया होता तो मुझे न ऐतराज़ होता, न ताज्जुब. लेकिन मेरे लपेटे में इब्ने इंशाँ जैसे अज़ीम शायर को कमअक़्ल कह दिया जाना नाक़ाबिलेबर्दाश्त है. एक बार फिर अफ़सोस दो बातों का रहा कि मेरी वज़ह से उस महान शायर की तौहीन हुई. और दूसरी बात के लिए यह जगह मुनासिब नहीं.
    डॉ. सुभाष राय जी, जिस रिमोट की बात और जिसका चर्चा मैंने किया वह तो वाक़ई आपके हाथ में है, मोहब्बत का रिमोट. अब तो यह हाल है कि
    बात तुम पर ही ख़त्म होती है,
    हमसे चाहे कहीं की बात करो.

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  33. आद. श्री उत्साही जी,

    मैंने जानबूझकर हँसी-मज़ाक की मनःस्थिति में ‘दुकान/ दुकानदार’ शब्दों का प्रयोग किया है। आपकी बात पूरी तरह सही है। उधर चूँकि डॉ.कपूर साहब मज़ाक में आ गये थे, सो मेरा भी मूड कर बन गया "Live life, king size"... भाई!

    पुनश्च, मेरे उस आरम्भिक उद्धरण " मोगैम्बो ख़ुश हुआ" से मेरी उक्त संदर्भित post का इरादा समझा जा सकता है।

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  34. @राजेश भाई
    ग़ज़ल में एक समस्‍या तो है कि हर शेर का स्‍वतंत्र अस्‍तित्‍व होता है एक पूर्ण कविता की तरह लेकिन हिन्‍दी काव्‍य प्रस्‍तुति में विषय निरंतरता की प्रथा के कारण ग़ज़ल में दृष्टिकोण बदलने की आवश्‍यकता पर ध्‍यान नहीं जाता है। यह स्थिति ग़ज़ल कहने वाले के लिये भी होती है, मेरी बहुत सी ग़ज़ल ऐसी हैं जिनमें विषय निरंतरता है; इसके कारण कई ग़ज़लों में मुझे गुणात्‍मक समझौते भी करने पड़े हैं लेकिन कठिन लगता है इस विषय निरंतरता को तोड़ना।
    ग़ज़ल की मूल प्रकृति के अनुसार मनोज भाई ने अगर एक ही ग़ज़ल के अलग-अलग अशआर में विरोधाभासी बातें कही भी हैं तो वह अनुमत्‍य है।

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  35. यदि मेरे उद्धरण "मोगैम्बो ख़ुश हुआ" पर विचार करें तो पाएँगे कि मोगैम्बो ’मि. इंडिया’ फ़िल्म का एक घोर Negative Character था। है कि नहीं?

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  36. @राजेश भाई
    पिछली टिप्‍पणी में मुझ से ग़ल्‍ती हो गयी और पोस्‍ट करते ही ध्‍यान गया इस बात पर कि आप सोच की दिशा की बात िकर रहे हैं। मैं पूरी तरह से सहमत हूँ। कोई भी रचनाधर्मी हो उसकी रचनाओं में उसकी सोच स्‍पष्‍टत: दिखनी चाहिये। यहॉं सोच की मौलिकता का भी प्रश्‍न है, मौलिक सोच की दिशा एक सी ही रहेगी, अलग-अलग सोच दिखने से आभासित होता है कि बहुत सी जगह से पढ़ा हुआ मसाला रचनाधर्मी ने अपने शब्‍दों में प्रस्‍तुत कर दिया है। समीक्षकों की नज़र से यह स्थिति छुपती नहीं है।

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  37. @बिहारी ब्‍लॉगर साहब
    क्षमा बड़न को चाहिये, छोटन को उत्‍पात। मैं तो इसका लाभ बहुत लेता हूँ उँचे कद वालों के साथ।

    उत्तर देंहटाएं
  38. सब महानुभावों से आदर के साथ यह कहने आया हूं कि कृपया साखी के इस मंच को मजाक और चुहल का मंच न बनाएं तो बेहतर होगा। यह मैं इसलिए भी कह रहा हूं कि यह एक सामूहिक विमर्श का मंच है।

    व्‍यक्तिगत ब्‍लाग पर यह सब चलता रहता है और शायद अच्‍छा भी लगता है। मेरा मानना है कि वह भी अच्‍छी बात नहीं है।

    उत्तर देंहटाएं
  39. एक और बात सलिल भाई ने यहां टिप्‍पणी की है,
    'हम बिहारी तो वैसे भी मूढ़ता के पर्याय माने जाते रहे हैं. इसलिए मुझे अगर किसी ने मूढ़ कह दिया होता तो मुझे न ऐतराज़ होता, न ताज्जुब. लेकिन मेरे लपेटे में इब्ने इंशाँ जैसे अज़ीम शायर को कमअक़्ल कह दिया जाना नाक़ाबिलेबर्दाश्त है. एक बार फिर अफ़सोस दो बातों का रहा कि मेरी वज़ह से उस महान शायर की तौहीन हुई.'

    यह टिप्‍पणी आपमें से बहुत सों को समझ नहीं आएगी। इसे समझने के लिए आपको मेरे ब्‍लाग गुलमोहर पर आना पडे़गा। माफ करें यह मेरे ब्‍लाग का विज्ञापन नहीं है। पर यहां मुझे यह लिखना पड़ रहा है।
    क्‍योंकि इसका संदर्भ वहीं से आया है।

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  40. @ आद.श्री सलिल वर्मा जी (उर्फ़ ‘चला बिहारी...’),

    आपके इस कथन-

    "...हम बिहारी तो वैसे भी मूढ़ता के पर्याय माने जाते रहे हैं..."

    -के आलोक में कहना चाहूँगा कि राजकुमार सिद्धार्थ ने यथाकथित ’मूढ़ता’ की उसी धरती (अर्थात्‌ ’बिहार’) में जाकर ’बोध’ पाया था; उसी धरती ने ’सिद्धार्थ’ के अंदर एक ’गौतम बौद्ध’ सिरजा था।

    यथाकथित ’मूढ़ता’ की इसी धरती का एक ’नालंदा विश्वविद्यालय’ अज्ञान के गहन तम में डूबी दुनिया को रोशनी बाँटता था।

    जब सारी दुनिया हस्ताक्षर करना सीखने के लिए अक्षर-ज्ञान अर्जित कर रही थी, तब ’मूढ़ता’ की इसी धरती के उक्त शिक्षा-केन्द्र में ज्ञान के उद्दाम सागर की उत्ताल तरंगें अंबर से बतियाने जाती थीं।

    ’मूढ़ता’ की इसी धरती का एक सम्राट ’राजा अशोक’ का चोला उतारकर ’भिक्षुक अशोक’ बन गया था।

    आप भारत की उसी गौरव-भूमि के लाल हैं! अब जब भी उधर जाना, तो वहाँ की मिट्‌टी का एक चुटकी चंदन मेरे लिए भी लेते आना...भाई!

    उत्तर देंहटाएं
  41. भावुक हूँ इसलिए संयम न रख पाया, व्यथित था इसलिए असंदर्भ लिख गया. मनोज भावुक जी से क्षमा प्रार्थी हूँ कि मेरी बातों से दिशा भटक गई समीक्षा की. पुनः सम्मान तिलक राज साहब और जौहर साहब का.

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  42. सबको मनोज भावुक का प्रणाम . रांची,रेनुकूट और लखनऊ की सात दिन की यात्रा के बाद नोएडा वापस लौटा हूँ. रांची में विश्व भोजपुरी सम्मलेन की कार्यकारिणी की दो दिवसीय बैठक थी , रेनुकूट घर है और लखनऊ में एक सम्मान समारोह था.
    अब बात गजलों की. बड़े भाई डा. सुभाष राय ने मुझे अपने दिल में और साखी पर जगह दी, मै उनका शुक्रगुजार हूँ . साखी पर आना गर्व की बात है.
    वरिष्ठ साहित्यकारों ने जो प्रतिक्रियाएं दीं है, जो आशीर्वाद दिया है उससे मेरा मनोबल बढ़ा है .
    यहाँ मै सभी प्रतिक्रियाओं का जबाब दे रहा हूँ .


    १. डा. कपूर -
    ग़ज़ल 2 में शेर 3 की पंक्ति 2 में 'बेहया' शब्‍द पर वज्‍़न की ऑंशिक समस्‍या लग रही है।
    सही कहा आपने दरअसल यह टंकण त्रुटि है . भोजपुरी में यह शब्द ' बेहाया' होता है.
    शेर कुछ यूं है -
    जमीर चीख के सौ बार रोके-टोकेला
    तबो त मन ई बेहाया गुनाह कर जाला
    यह गजल यहाँ पढ़ सकते हैं - http://www.manojbhawuk.com/old/4.हतं
    भोजपुरी गजल -संग्रह 'तस्वीर जिन्दगी के' यहाँ पढ़ सकते हैं - http://www.manojbhawuk.com/old/jindgi6.htm

    इसी तरह ग़ज़ल 6 में शेर 7 की पंक्ति 2 में राज की जगह राज़ होना चाहिये,
    कपूर साहब भोजपुरी में हम नुख्ता नहीं लगाते . इसलिए यह राज ही है जिसका अर्थ है रहस्य .......जारी

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  43. भाई Arvind Mishra, vedvyathit ,दिगम्बर नासवा,स्वप्निल कुमार 'आतिश', और राजेन्द्र स्वर्णकार को बहुत-बहुत धन्यवाद.

    जितेन्द्र ‘जौहर’ -
    जौहर भाई, आपने तो मेरे मुंह की बात छीन ली है. जो मै कहता वो आपने कह दिया है.
    भोजपुरी गजलें नुक़्ता-विहीन होती हैं . मेरी गजलों में जहाँ कहीं भी नुक़्ता लगा है वह टंकण त्रुटि है.

    सर्वत एम० - बधाई के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद . आपसे न मिल पाने का मुझे भी अफसोस है. कृपया अपना मोबाइल न दें.....जारी

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  44. सर्वत एम० -सर! ऐसा किसने कहा कि 'वा' का इस्तेमाल कर के इनका भोजपुरीकरण कर लिया जाता है?
    जब हम भोजपुरी नाटक में किसी अनपढ़ आदमी के लिए संवाद लिखते हैं तो ऎसी भाषा का प्रयोग करते हैं .
    गजल और गीतों की भाषा अलग होती है .
    गजल में हम आदमी को अदमी और प्रेम को परेम नहीं लिखते.
    माधव मधुकर जी की वह गजल मै पढ़ना चाहूंगा . आप कृपया उस गजल को साखी पर प्रकाशित करें
    सर, आपने मुझे भोजपुरी का 'दुष्यंत' सम्बोधित किया है . शुक्रिया. भगवान करें ऐसा हो. लेकिन अभी तो मै गजल का विद्यार्थी ही हूँ .जारी

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  45. अविनाश वाचस्पति और सुरेश यादव को बहुत-बहुत धन्यवाद .सलिल जी भोजपुरी की ही श्रेणी में रखी जाएँ . ये भोजपुरी गजलें हीं है.आप की इस बात से मैं बिल्कुल सहमत नहीं हूं कि यह हिंदी/उर्दू में सोची हुई ग़ज़लें हैं. यानि मौलिक रूप से यह भोजपुरी की गज़लें नहीं हैं. मौलिक रूप से यह भोजपुरी की गज़लें हैं. मै भोजपुरी में ही सोचता हूँ. भोजपुरी मेरी मातृभाषा है. उर्दू या अंग्रेजी के कुछ शब्द आ जाने से ये गजलें उस भाषा की नहीं हो जातीं. ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है. उर्दू, अंग्रेजी, फारसी या अन्य भाषा के वे शब्द जो भोजपुरी में पच गए हैं ,रच-बस गए हैं, जो बोलचाल में हैं. मेरा मानना है भाषा कि समृधि के लिए रचनाओं में उनका प्रयोग होना चाहिए/ आप एक शेर की बात करते हैं . मैंने अपनी कई गजलों का भोजपुरी से हिंदी में अनुवाद किया है तो क्या हो गया ? भोजपुरी भी तो आखिर हिंदुस्तानी ज़ुबान हीं है .
    माँ पर मेरी एक भोजपुरी गजल है -
    http://www.manojbhawuk.com/old/47.हतं
    इस गजल का हिंदी अनुवाद है -
    http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/mamtamayi/maa1.हतं
    एक और भोजपुरी गजल , हिंदी अनुवाद के साथ यहाँ प्रकाशित है -
    http://manojbhawuk.com/?p=२२४
    डूबियो शब्द सही है और भोजपुरी में डूबियो हीं लिखा जाता है . हम आदमी को आदमी हीं लिखते हैं अदमी नहीं. jaaree

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  46. भाई जितेन्द्र ‘जौहर’ जी का मै बहुत शुक्रगुजार हूँ. बहुत अच्छी समीक्षा की है उन्होंने मेरे गजलों की. धन्यवाद साखी कि जौहर जी से मेरा परिचय हुआ. वो मेरे हीं शहर के हैं लेकिन हम दोनों अपरिचित थे.

    संजीव गौतम -
    शुक्रिया संजीव भाई , आपने सच कहा साखी पर प्रकाशित होना गर्व की बात है। तारीफ़ के लिए शुक्रिया .

    वैसे और भी बहुत सारे सवाल उठे हैं जिसका जबाब सुधी- विद्वान पाठको ने हीं दे दिया है . अब मुझे कुछ कहने की जरुरत नहीं.
    मै फिर कह रहा हूँ कि मै अभी गजल का विद्यार्थी हूँ . सिख रहा हूँ. आप सबने जो रास्ता दिखाया है उस पर चलने की कोशिश करूंगा . जो त्रुटियाँ रह गयीं हैं,उनको ठीक करूंगा.
    एक भोजपुरी गजल-संग्रह प्रकाशित है ' तस्वीर जिन्दगी के' उसका लिंक दे रहा हूँ. ताकि आप भोजपुरी गजलों का आस्वादन कर सकें
    http://www.manojbhawuk.com/old/jindgi6.htm

    स्नेह- दुलार और मार्गदर्शन के लिए आप सबके प्रति आभार व्यक्त करता हूँ.

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  47. maoj bhai
    namaksaar !
    aap ko apni matra bhasha ke liye samman prapt hone pe hardik badhai .
    dhanywad

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  48. Shri Manoj Bhavuk kee sabhee gazal padh gaayaa
    hoon . Main bhojpuree ke vyakaran aur muhavre se parichit nahin hoon phir bhee janaab Jitendra
    Johree kee sameeksha ke sahaare in gazalon kee
    bhasha aur bhavon ko samajhne mein mujhe koee
    pareshanee nahin huee. kisee kee gazalon par aesaa saarthak aur taarkik likhne waale bahut kam hain . Johree sahib prashansa ke haqdaar hain .Achchhee aur marmsparshee gazalon ke liye
    shri Manoj ko main hardik badhaaee detaa hoon.
    Ant mein ek baat kahnaa chaahoonga vah yah ki
    gazal kaa har sher swatanra hotaa hai . Gazal mein ek sher virah par bhee kahaa jaa sakta hai aur dooja sher sanyog par bhee . vibhinn bhaavon se piroee huee hotee hai gazal kee maalaa .

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  49. किसी बागीचे की बगल से गुज़रते हुए कोई खुशगवार गंध नासिका-द्वार से होती हुई जब मन के भीतर अपना स्थान बना लेती है तो मन का स्वामी ये नहीं पूंछता की जिन फूलों से ये गंध आ रही है उनका नाम क्या है। गंध का भरपूर आनंद लेने के लिए फूलों के नाम जानना उतना ज़रूरी भी नहीं है जितना की गंध का खुशगवार होना। युवा रचनाकार मनोज भावुक की गज़लें गज़लियत की कसौटी पर कितनी खरी उतरतीं हैं यह तो ग़ज़ल के तमाम बड़े उस्ताद ही जानें अपने राम तो भावुक की तरह ही अभी तक गज़ल के विद्यार्थी ही हैं। लेकिन इतना कहना चाहता हूँ की मैंने भोजपुरी में गज़लें पहली बार पढ़ीं हैं और कई दूसरे लोगों की तरह ही मैं भी भोजपुरी नहीं जानता। बावजूद इसके इन्हें पड़कर तबियत प्रसन्न हो गयी। खुशगवार गंध सीधे दिल में उतर गयी।
    अबकी दियरी के परब अइसे मनावल जाए
    मन के आँगन में एगो दीप जरावल जाए

    रौशनी गाँव में, दिल्ली से ले आवल जाए
    कैद सूरज के अब आजाद करावल जाए

    हिन्दू, मुस्लिम ना, ईसाई ना, सिक्ख ई भाई
    अपना औलाद के इन्सान बनावल जाए
    ऐसे अशआर किसी भी भाषा में लिखे हुए हो सकते हैं। फर्क इससे नहीं पड़ता। फर्क इससे पड़ता है कि वे सीधे दिल में उतर रहे है या नहीं। मनोज भाई के शेर सीधे दिल में उतरकर अपनी गुणवत्ता सिद्ध कर रहे हैं। ग़ज़ल का यह विद्यार्थी (उन्हीं की स्वीकारोक्ति) निश्चित रूप से प्रखर विद्यार्थी है और लेखन की यात्रा में काफी आगे जाएगा। मेरा ऐसा विश्वास है और कामना भी।

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  50. @ आ.भाई मनोज भावुक जी,
    आपने जो कृतज्ञता-ज्ञापन किया, उसके लिए हार्दिक ‘धन्यवाद’ स्वीकारें!मेरे विचार आपकी अभिव्यक्ति बनकर सामने आ सके, यह जानकर ख़ुशी हुई। ‘साखी’...! शुक्रिया...मुझे मनोज जैसे भावुक एवं संजीदा कवि से मिलवाने के लिए!

    @ आ. भाई PRAN (प्राण) जी,
    मेरी विचाराभिव्यक्ति मनोज जी की ग़ज़लों को समझने की दिशा में आपके कुछ काम आ सकी, मेरा सौभाग्य! वह तमाम श्रम सार्थक हुआ। आपकी सद्‌भावना/सदाशयता को सलाम करता हूँ, जी... !क़ुबूल करें!

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  51. भावुक भाई की ग़ज़लों पर प्रस्तुत श्री राजेश उत्साही जी के कुछेक तर्कों से मैं सहमत नहीं हो पा रहा हूँ, मैं कल इस बावत अपनी टिप्प्णी Box में Type कर रहा था कि उसी समय डॉ. कपूर साहब की यह प्रतिक्रिया आ गयी : "@राजेश भाई, ग़ज़ल में एक समस्‍या तो है कि हर शेर का स्‍वतंत्र अस्‍तित्‍व होता है एक पूर्ण कविता की तरह ..." जिसे पढ़कर मुझे लगा कि जब मेरा कथ्य किसी अन्य साथी ने पेश कर ही दिया है , तब पुनरोक्ति-प्रकाशन क्या करना। अतः मैंने अपने लिखे-लिखाए Matter को delete कर दिया। मुझे बाद में पढ़ने पर लगा कि अभी बात पूरी नहीं हुई है। अस्तु, भाई... मैं पुनः आ गया हूँ ।

    श्री उत्साही जी के अनुसार :

    "दूसरी गजल में वे (यानी कि मनोज) विरोधाभासी बातें कहते हैं। पहले यह शेर देखिए-
    १.पता ई बा कि महल ना टिके कबो अइसन
    तबो त रेत प बुनियाद लोग धर जाला

    और अब इसे पढ़ें-
    २.अगर जो दिल में लगन, चाह आ भरोसा बा
    कसम से चाँद भी अँगना में तब उतर जाला
    यूं देखने में दोनों ही बातें अपनी जगह सही हैं। पर एक ही ग़ज़ल में वे फिट नहीं बैठती।"

    प्रथमतः तो यही कि ग़ज़ल का हर शे’र अपने आपमें एक स्वतंत्र इकाई होता है। अतः यह कोई ज़रूरी नहीं कि पूरी ग़ज़ल का हर शे’र अर्थ/भाव/विचार की दृष्टि से परस्पर संबद्ध हो...Co-related हो। बड़े-बड़े उस्ताद शाइरों से लेकर नवोदितों तक इसके उदाहरण भरे पड़े हैं। ...ऐसे में समीक्षा-कर्म के अंतर्गत समूची ग़ज़ल में Unity & Coherence की तलाश करना, शाइर के साथ सरासर अन्याय होगा ; फिर चाहे वह शाइर स्वयं उत्साही जी हों या फिर मनोज भावुक जी अथवा मैं जितेन्द्र ‘जौहर’ या फिर कोई अन्य। यदि भाव की परस्पर सम्बद्धता चाहिए, तो उसके लिए गीत है, कविता है, सॉनेट है। ग़ज़ल के हर शे’र का एक स्वतंत्र इकाई होना भी ग़ज़ल के प्रति कवियों के आकर्षण का एक कारण है!

    ऐसे में, उत्साही जी का यह कथन कि : "...दोनों ही बातें अपनी जगह सही हैं। पर एक ही ग़ज़ल में वे फिट नहीं बैठती" मुझे कहीं से भी तर्कसंगत / न्यायोचित नहीं लगता। मनोज भावुक के ये दोनों शे’र अच्छे ही नहीं, बल्कि एक ही ग़ज़ल में पूरे आत्मविश्वास के साथ रखे जा सकते हैं, इसमें कहीं किसी ‘किन्तु-परन्तु’ की गुंजाइश नहीं है। मेरा तर्क यह कि - उपरांकित संदर्भित शे’र-१ के कथ्य का शे’र-२ के कथ्य से कोई भी लेना-देना नहीं ; दोनों अलग-अलग बातें हैं । ...Contd...

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  52. शे’र-१ के पार्श्व से कतिपय लोगों के खोखले कृत्यों (जिनका कोई ठोस/ मजबूत आधार न हो) के प्रति ग़ज़लकार का ‘अफ़सोस’ भाव दर्शाता हुआ चेहरा झाँक रहा है। स्प्ष्टतः वह इस शे’र में उक्त कोटि के लोगों के प्रति विरोध-मुद्रा में खड़ा है ! उसने अपनी इस विरोधाभिव्यक्ति में ‘रेत पर बुनियाद रखना’ वाला मुहावरा प्रयोग किया है।

    शे’र-२ में वह समाज को यह प्रेरणा देता हुआ दिख रहा है कि इंसान के दिल में अगर चाह, लगन और भरोसा हो तो वह चाँद-तारे भी पा सकता है, (बल्कि संदर्भित शे’र में अनुस्यूत भावानुसार कहना चाहिए कि) चाँद-तारे ख़ुद-ब-ख़ुद उसके पास चले आएँगे। ऐसे में, मैं श्री उत्साही जी से (यदि वे मेरा आग्रह स्वीकार करें तो) तफ़्सील से एवं समुचित उदाहरणपूर्वक समझना चाहूँगा कि आख़िर वह कौन-सा आधार है जो उन्हें इस निष्कर्ष तक ले आया कि : " दोनों ... बातें ...एक ही ग़ज़ल में ... फिट नहीं बैठती ।" मेरी राय में, उन दोनों बातों के बीच यदि कोई Contradiction उत्पन्न हो रहा होता ,तो श्री उत्साही जी की बात विचारणीय हो सकती थी।

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  53. भाई मनोज भावुक जी से अपेक्षा है कि वे स्वयं भी उत्साही जी द्वारा उठाए गए उक्त सवालों पर अपना पक्ष रखें...और रखना भी चाहिए।

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  54. ‘साखी’ के सम्मानित पाठकगण व लेखकगण,
    सादर अभिवादन!
    यदि आ.श्री राजेश उत्साही जी की निम्नांकित टिप्पणी (जिस पर ऊपर मैंने अपनी निजी वैचारिक असहमति व्यक्त की है) को सही मान लिया जाए, तो (पुराने नामचीन शोअरा को तो छोड़िये)समकालीन शाइर बशीर बद्र जी, नीरज जी एवं निदा फाज़ली जी से लेकर वसीम बरेलवी जी, उर्मिलेश जी, अशोक अंजुम जी एवं उनके बाद तक के हज़ारों नवोदित शोअरा (शाइरों)की ग़ज़लों में से असंख्य अशआर निकालकर बाहर कर देने पड़ेंगे! क्या उस स्थिति के लिए हमारा ग़ज़ल-संसार तैयार है? इस पर विचार करें, व्यक्तिगत तौर पर मुझे लगता है कि इस बिन्दु पर विस्तृत विमर्श की आवश्यकता है।

    पुनः देखें-(श्री उत्साही जी के अनुसार):

    "१.पता ई बा कि महल ना टिके कबो अइसन
    तबो त रेत प बुनियाद लोग धर जाला

    २.अगर जो दिल में लगन, चाह आ भरोसा बा
    कसम से चाँद भी अँगना में तब उतर जाला

    यूं देखने में दोनों ही बातें अपनी जगह सही हैं। पर एक ही ग़ज़ल में वे फिट नहीं बैठती।"

    मैं विनम्रतापूर्वक पूछना चाहूँगा(यदि श्री उत्साही जी यह बता सकें) कि आख़िर उक्त दोनों ही बातें किस आधार पर एक ही ग़ज़ल में फ़िट नहीं बैठती ? मुझे प्रतीक्षा रहेगी...जी!

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  55. manoj bhai hamen aapse kuchh kam hai

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  56. भाई मनोज भावुक के ग़ज़ल संसार से गुजरे के मौका मीलल. मन रमल बा. भोजपुरी भासा में अतना सांस्कारिक आ बाबह्र ग़ज़ल कमहीं देखे में आइल बाड़ी स. त ओह हिसाब से हम भावुकजी के दिल से बधाई देत बानीं.
    एह पोस्ट पर हम बड़ा विलम्ब से आ रहल बानीं. बाकी ई बात जरूर भइल बा जे सभ विद्वानन के टिप्पणी पढ़े आ गुने के मीलल.
    निकहा सार्थक चर्चा भइल. मन खूस बा.
    शुभ-शुभ

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