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गुरुवार, 23 सितंबर 2010

लगता है जरा बीमार नुक्ताचीं


राजेन्द्र स्वर्णकार की रचनाओं को प्रस्तुत करते समय मैंने उन्हें गजल कहकर नहीं रखा पर जब बहस शुरू हुई तो लोगों ने उन्हें गजल समझकर अपनी बातें रखीं, यह एक तरह से राजेन्द्र की इस काव्य-विधा पर पकड़ का प्रमाण तो है लेकिन पकड़ तभी संयत और मजबूत होती है, जब रचनाकार हर स्तर पर अपने को आलोचना के लिए न केवल खुला रखता है बल्कि आलोचना से विचलित होने की जगह निरंतर आत्म-परिष्कार के लिए तैयार रहता है| जाने-माने रचनाकार तिलकराज कपूर ने अगर अपनी बात किसी खास दायरे में बाँधकर पेश करने की जगह सभी गजलों पर बात की होती तो और बेहतर होता, फिर भी उन्होंने राजेन्द्र की गजलों को समझने का जो सिलसिला शुरू किया, उसे चंद्रभान भारद्वाज, राजेश उत्साही  और अशोक रावत ने सम्यक विस्तार दिया| तिलकराज जी की कुछ स्थापनाओं से कवि जितेन्द्र जौहर असहमत रहे, जो उनका अधिकार है, पर उन्हें कविता पर जो बात करनी चाहिए थी, उससे ज्यादा उन्होंने तिलकराज जी के व्यक्तित्व पर कदाचित  कटाक्ष करते हुए बात की, जिसने  राजेश उत्साही को दखल देने को विवश किया| इस नोक-झोंक से बातचीत ने काफी रोचक मोड़ ले लिया| राजेश को राजेन्द्र से कुछ ज्यादा अपेक्षा थी, वे निराश हुए| कवि और शायर प्राण शर्मा को  तिलक जी, चंद्रभान जी, अशोकजी और राजेश जी की टिप्पणियों में काफी वजन दिखा और उन्होंने उनकी खुलकर सराहना की| राजेन्द्र स्वर्णकार ने विनम्रता से सबका आभार भी प्रदर्शित किया और जहां जरूरत समझी, अपनी रचनाओं का बचाव भी किया| हां, मेरी समझ में राजेन्द्र जी ने टिप्पणियों को लेकर जो अटकलें लगायीं, वे जल्दबाजी का परिणाम थीं। उन्हें कुछ अनुमान करने की जगह थोड़ा इंतजार करना चाहिये था। अशोक रावत जी के बारे में की गयी टिप्पणियों से मैं  स्वयं निराश हुआ, क्यों कि मैं अशोक जी के जीवन और रचना कर्म को नजदीक से जानता हूं। 

तिलकराज कपूर ने चर्चा की सार्थकता और राजेन्‍द्र जी पर अपने विशेषाधिकार के नाते पहली गजल के कुछ अशआर पर अपना मत खुलकर दिया| उन्होंने कहा कि शब्‍द प्रयोग की दृष्टि से यह गजल है तो बहुत अच्‍छी लेकिन बारीकी से देखें तो कुछ खटकता दिखता है| न इक पत्ता हवा के संचरण से तब हिला होता, दिशा-निर्देश प्रभु का काम यदि ना कर रहा होता, इसमें पहली पंक्ति अधिक पुष्‍ट रहती यदि ऐसा कहते कि हवा के संचरण भर से न इक पत्‍ता हिला होता| चराचर सृष्टि जल ज्वाला पवन आकाश धरती में, हृदय चाहे तो पग-पग ईश का दर्शन हुआ होता, इसमें दूसरी पंक्ति अधिक पुष्‍ट रहती यदि ऐसा कहते कि हृदय गर चाहता तो ईश का दर्शन हुआ होतावनस्पति जीव रवि शशि काल ऋतु दिन रैन का सृष्टा, न क्षण भर; वह सनातन सर्वव्यापक सर्वदा होता, इसमें दूसरी पंक्ति भाव-विपरीत है, शायर  का भाव तो यहॉं यही अपेक्षित है कि  सनातन सर्वदा सर्वव्यापक है जबकि ध्‍वनित उल्‍टा हो रहा है। यही इससे अगले शेर में हो रहा है। अगले शेर में वह की पुनरावृत्ति भी दोषपूर्ण है। समाया सूक्ष्मतम् बन कर अखिल ब्रह्मांड में है जो,
कहकर दूसरी पंक्ति का निराकरण तो हो जाता है। शिला बनती अहिल्या, प्राण प्रस्तर ना पुनः पाता, न यदि निज चरण-रज से धन्य राघव ने किया होता, यह अधिक पुष्‍ट रहता यदि ऐसा कहते कि शिला र‍हती अहिल्‍या, प्राण प्रस्‍तर में नहीं आते, न गर उद्धार राघव ने चरण-रज से किया होता न अपनों को भुलाता है न अंतर-भेद कुछ करता, वो गज का, द्रोपदी प्रह्लाद ध्रुव का एक-सा होता, इसकी पहली पंक्ति को देखें, विरोधाभास है, जो अंतर या भेद नहीं करता है, उसके लिये अपना पराया कैसा (यहॉं अंतर ओर भेद भी समानार्थक हैं) | सच्चिदानंद की राजेन्द्र यदि मिलती न अनुकंपा, निरंतर जन्म लेता और मरता, मिट गया होता, इसमें भी  विरोधाभास है या तो ‘निरंतर जन्म लेता और मरता’ और ‘मिट गया होता’ परस्‍पर विरोधी हैं। ये बारीक बाते हैं जो अक्‍सर ध्‍यान में नहीं आतीं। 

जितेन्द्र जौहर ने ग़ज़ल-1 व 4 को अतिसुन्दर कहा। वे अपने कथन का और विस्तार करते कि ये रचनाएँ क्यों अति सुन्दर हैं तो कुछ और बात सामने आती पर राजेन्द्र के चिंतन-लोक की झलक, उनकी परिनिष्ठित व परिमार्जित भाषा की सराहना कर वे सीधे तिलक राज कपूर पर पिल पड़े और उनकी टिप्पणियों को कुछेक सार्थक बिन्दुओं के पार्श्व से ’आत्म-प्रक्षेपण’ की प्रबल चाह का विकल नर्तन करार दिया| यहाँ तक कहा कि  कपूर जी को मैंने कुछेक अन्य साइट्‌स एवं ब्लॉग्ज़ पर ठीक यही ’पुनरोक्ति-प्रकाशन’ करते देखा और पढ़ा है कि "सभी में आलोचना की सहज स्‍वीकार्यता नहीं होती, इसलिये मैं सामान्‍यत: आलोचनात्‍मक टिप्‍पणियाँ देने से बचने की कोशिश करता हूँ, लेकिन चर्चा की सार्थकता...।"  

गजल या कविता पर बात करते हुए इतना व्यक्तिगत होने की आवश्यकता नहीं लगती, अगर जौहर जी को तिलकराज जी की बातों का खंडन करना ही था तो तर्कपूर्वक करते, सबको अच्छा लगता| उन्होंने तो यहाँ तक सलाह दे डाली कि यदि आप राजेन्द्र भाई को उक्त सभी समझाइशें सीधे तौर पर पत्र या ईमेल से भेजते तो आपका व्यक्तित्व कुछ और ही झलकता। ध्यान रहे कि दृढ़ इच्छाशक्ति वाले लोग तो ऐसी सार्वजनिक धुलाई से चमक उठते हैं, लेकिन कमज़ोर लोग डरकर लेखनी सदा के लिए फेंक भी सकते हैं। ऐसे में स्थापितों का यह धर्म है कि वे नवोदितों को निखारें...किन्तु प्यार के साथ!
 
राजेश उत्साही को वार्ता की यह संकीर्णता पसंद नहीं आयी| उन्होंने बहुत साफ कहा कि कुछ साथियों को साखी को लेकर कुछ भ्रम हुआ है। जौहर जी  ने जो सलाह तिलक जी को दी है, अव्‍वल तो वह अनुचित है क्‍योंकि मेरे विचार में साखी मंच ही समीक्षा का है। दूसरी बात, जो बातें उन्होंने तिलक जी से कहीं, वे भी उन्‍हें ईमेल या पत्र के जरिए भेज सकते थे।अगर मैं यह कहूं कि ’आत्म-प्रक्षेपण’ की प्रबल चाह का विकल नर्तन तो आपमें भी दिखाई दे रहा है तो अन्‍यथा न लीजिएगा| उन्होंने सबसे पूछा, क्‍या जितेन्‍द्र जी जिस तरह से कपूर जी की आलोचना कर रहे हैं, वह शोभा देता है।फिर वे राजेन्द्र की गजलों पर आये, सुना है, राजेन्‍द्र जी मधुर वाणी के धनी हैं,  मोहित करने वाली शब्‍दावली भी उनके पास है पर यहां उनके साहित्यिक अवदान की बात उनकी रचनाओं के लिखित स्‍वरूप के आधार पर की जानी चाहिए। मैं अपनी बात इसी कसौटी पर कह रहा हूं। पहली, तीसरी,चौथी रचनाएं भजन की श्रेणी में रखी जा सकती हैं और भजन प्रभु मात्र की आराधना में गाया जाता है। वे इसमें सफल रहे हैं। दूसरी रचना कुछ अलग से तेवर की है। मैं रचनाओं में कुछ अलग बिम्‍ब या कहन का तरीका ढूंढता रहता हूं। इस स्‍तर पर मुझे राजेन्‍द्र जी की इन रचनाओं से निराशा ही हाथ लगी। उन्‍होंने जो बिम्‍ब लिए हैं, वे चमत्‍कृत नहीं करते हैं। हां, उनके लिए उन्‍होंने समृद्ध शब्‍दों का उपयोग किया है। मुझे उनमें आम आदमी और उसकी चिंताओं के दर्शन नहीं हुए।


गजलों के शिल्प और कथ्य पर पकड़ रखने वाले चंद्रभान भारद्वाज ने कहा कि इन ग़ज़लों में शब्द संयोजन, भाषा सौष्ठव, भावनात्मक सम्प्रेषण और कथन सभी ठीक हैं लेकिन कहीं कहीं तकनीकी और व्याकरण की दृष्टि से कुछ कमियाँ रह गईं हैं| लम्बी बहर की ग़ज़लों में भरती के जिन शब्दों का प्रयोग किया है, वे भी अखरते हैं| पहली ग़ज़ल के मतले के पहले मिसरे में 'तब' और दूसरे मिसरे में 'ना' शब्द अखरते हैं, अगर मतले को ऐसे लिखा जाता तो बहतर होता -न इक पत्ता हवा के संचरण से भी हिला होता, दिशा निर्देश यदि उसको नहीं प्रभु का रहा होता| चौथा शेर स्पष्ट नहीं है, 'शिला बनती अहिल्या ' वाला शेर भी स्पष्ट नहीं है, इसे यदि इस तरह लिखते तो स्पष्ट होता- शिला रहती अहिल्या प्राण प्रस्तर को न मिल पाते, न यदि निज चरण रज से धन्य राघव ने किया होता| तीसरे और चौथे शेर स्पष्ट नहीं हैं|. 'न राधा के ह्रदय ' वाला मिसरा भी व्याकरण की दृष्टि से गलत  हैं, इसमें 'प्रीत-लौ' स्त्रीलिंग है, अतः क्रिया 'जली होती' आता 'जला होता' नहीं| दूसरे राधा का सम्बन्ध  कृष्ण से है, भगवान से नहीं, अतः शेर यदि ऐसे लिखा जाता तो अधिक सटीक रहता-स्वयं कान्हा भी यदि उससे न करता स्नेह सच्चा तो, न राधा के ह्रदय में प्यार लौ बनकर जला होता| 'पुन्यवश वाले' शेर के भाव स्पष्ट नहीं हैं तथा ये बहर में भी नहीं है| इसी प्रकार सच्चिदानंद वाला मिसरा भी बहर में नहीं है| दूसरी ग़ज़ल में 'खस्ती' पस्ती' शब्द शब्दकोष के अनुसार नहीं हैं, ये केवल तुकबंदी के लिए गढ़े गए हैं|  सही शब्द 'खस्ता' और पस्त' हैं जो इस ग़ज़ल में कहीं भी फिट नहीं बैठते| .तीसरी और चौथी ग़ज़ल के अरकान हैं २ २ २ २ २ २ २ २ लेकिन दोनों ग़ज़लों में कई शेर अरकान में सही नहीं बैठते| चौथी ग़ज़ल में भी 'ना' शब्द का प्रयोग कई जगह किया है जो अखरता है| मकते में 'ऐसन बुरी बुराई बाबा ' में 'बुरी' शब्द निरर्थक है| इसी तरह 'बोल' 'बता' दोनों शब्दों का प्रयोग एक जगह उचित नहीं लगता| यह शेर भी अगर ऐसे होता तो अधिक उचित लगता- बोलो इस राजेंद्र में देखी, ऐसी कौन बुराई बाबा|


बात गजलकार अशोक रावत ने आगे बढ़ाई| उन्होंने कहा, चन्द्रभाल सुकुमार ने तत्सम शब्दावली में समकालीन परिवेश के साथ-साथ पौराणिक सांस्कृतिक वैभव को गजल के फ़ार्म में पूर्णता के साथ पिरोने का काम किया है| चंद्रसेन विराट और एहतराम इस्लाम के नाम भी गजलों में शुद्ध हिन्दी का प्रयोग करने वालों में सम्मान के साथ लिए जा सकते हैं| यहाँ तिलकराज जी और चंद्रभान जी की टिप्पणियों पर राजेन्द्र जी को सिर्फ ध्यान ही नहीं देना चाहिए बल्कि उनको धन्यवाद भी देना चाहिए| दोनों ने ही शालीनता के साथ टिप्पणी की है| मुझे नहीं लगता कि यह ब्लॉग लोगों की सिर्फ झूठी तारीफ़ करने के लिए है| यह भी सच है कि कभी लोग अपना सिक्का जमाने के लिए शालीनता की फ़िक्र नहीं करते लेकिन ऐसे लोग भीतर से कमजोर होते हैं और उनमें आत्मविश्वास की कमी होती है| रावत  जी ने यह भी सलाह दी कि डा. सुभाष राय को भी देखना चाहिए कि इस ब्लॉग पर कमजोर रचनाएँ न आयें, श्रेष्ठ गीतों और गजलों का बड़ा खजाना है, उसे लोगों तक पहुंचाएं| (रावत जी की यह सलाह बेहतर है, तब तो मुझे बहुत मेहनत भी नहीं करनी पड़ेगी, लेकिन अपने समकाल में जो लोग पहचान बनाने के लिए जूझ रहे हैं, अगर उन्हें सामने नहीं लाया जाएगा तो उन्हें कैसे पता चलेगा कि वे जो लिख रहे हैं, वह कितना ठीक हैं उन्हें कितनी मेहनत  की जरूरत है और वे कहाँ क्या गलतियां कर रहे हैं| तब तो वे अपनी दुनिया में मस्त रहेंगे अपने को खुदा समझते हुए| जो समझेंगे, उन्हें हम परिष्कार का मौका भी दे रहे हैं)| प्राण शर्मा जी ने कहा कि राजेन्द्र जी की गजलों में गुण भी हैं और दोष भी| कोई मुकम्मल शायर नहीं होता, सभी गलतियाँ करते हैं| तिलकराज जी, चंद्रभान भारद्वाज, राजेश उत्साही, अशोक रावत की टिप्पणियां सहेजने योग्य हैं| उन्होंने आग में घी डालने वाली टिप्पणियों से बचने की सलाह भी दी|
 

शायर डी के मुफलिस साहब के मुताबिक अपने समय और समाज के सच को महसूस कर पाने, समझ पाने और व्यक्त कर पाने की कुशलता के आधार पर टिकी राजेंद्र जी की रचनाएं हमेशा ही अपने पाठक वर्ग को प्रभावित कर पाने में सफल रहती हैं। हालांकि.. मात्र दुर्बोध शब्द-संयोजन किसी भी काव्य के
उत्कृष्ट एवं सफल होने की कोई कसौटी नहीं है, फिर भी उनकी शैली विशिष्ट है। यह भी सच है कि शिल्प की अपरिपक्वता हमेशा जागरूक और सचेत पाठक को अखरती है लेकिन यह भी सच है कि किसी रचना-विशेष की सरंचना के आधार पर किसी लेखक की योग्यता की समग्रता का मूल्यांकन/प्रेक्षण कर पाना न तो संभव है और न ही प्रासंगिक। एक बहुत बड़ा सच यह भी है  कि  सिर्फ और सिर्फ विद्वान् पाठक ही अपनी तीक्ष्ण और पैनी दृष्टि से किसी रचनाकार की योग्यता को प्रमाणित करने की क्षमता रखता है और अधिकार भी। सलिल जी ने कहा, राजेंद्र स्वर्णकार की लगन देखकर यह मानना पड़ता है कि इनकी रचनाएँ हृदय से निकलती हैं और इनकी साहित्य के प्रति समर्पण की भावना का प्रतिनिधित्व करती हैं। समस्त रचनाएँ छोटी मोटी त्रुटियों के बावजूद पठनीय हैं और श्रेष्ठता की श्रेणी में रखी जाने योग्य हैं। राजेंद्र जी, चुँकि मूल रूप से अपनी रचनाओं की कल्पना गायन के माध्यम से करते हैं, इसलिए यह सभी गेय हैं. और यही कारण है कि इनकी कविताएँ लयबद्ध होती हैं तथा ग़ज़लें बहर में। विज्ञान कथाकार अरविन्द मिश्र ने कहा, राजेन्द्र जी की रचनाएं इस लिहाज से विशिष्ट हैं कि वे अपने में मानवीय भावों का एक सनातन बोध लिए होती हैं और उसी की पृष्ठभूमि में ही समकालीन विपर्ययों पर चोट करती हैं -एक संवेदना युक्त मनुष्य के समग्र आग्रहों को भी बखूबी अभिव्यक्ति देती हैं। प्रेम ,संयोग वियोग, अध्यात्म, सांसारिकता का अद्भुत मोजैक देखना हो तो इस कवि का आह्वान किया जाना चाहिए। डा महाराज सिंह परिहार ने कहा, स्‍वर्णकार जी की रचनाएं काव्‍य शिल्‍प और गेयता की कसौटी पर खरी उतरती हैं। इस्मत जैदी ने कहा, अंतिम दोनों रचनाएं सुंदर हैं, पहली रचना में हिंदी शब्दों का प्रयोग बहुत बढ़िया है।  निर्मला कपिला के मुताबिक मानवीय मूल्य विलुप्त हो रहे हैं, ऐसे में राजेन्द्र जी जैसे कवियों की बहुत जरूरत है, तिलक जी जैसों  का मार्ग दर्शन हो तो सोने पर सुहागा होगा। कवि गिरीश पंकज ने कहा, इस कवि में अद्भुत प्रतिभा है, ग़ज़ल और छंदशास्त्र पर अच्छी पकड़ है। धीरे-धीरे यह काव्य-प्रतिभा साहित्य की दुनिया में अपनी जगह बना लेगी, ऐसा विश्वास है। शायर नीरज गोस्वामी ने कहा, राजेंद्र जी की रचनाएँ उन्हीं की तरह विलक्षण हैं, उनका शब्द ज्ञान विस्मयकारी है। डा त्रिमोहन तरल ने कहा, ग़ज़ल कहने के लिए ज़रूरी बहरो-वज्न का पर्याप्त ज्ञान आपके पास है। वो तो विशुद्ध हिंदी की शब्द-सम्पदा का प्रयोग कर ग़ज़लें कहने की प्राथमिकता (जो निश्चित ही एक आदर्श है) ने कुछ सीमा रेखा खींच दी है। अन्यथा आप निश्चित रूप से बेहतर तगज्जुल वाली ग़ज़लें कहने की क्षमता रखते हैं। रचनाकार देवी नागरानी, शाहिद मिर्जा शाहिद, दिगम्बर नासवा, समीरलाल जी, हरकीरत हीर, डा चन्द्र प्रकाश राय, डा रूप चन्द्र शास्त्री मयंक, सुनील गज्जाणीअविनाश वाचस्पति, मदन मोहन अरविन्द, प्रतुल वशिष्ठ ने भी अपनी बातों से मजलिस की शोभा बढ़ाई।


तिलकराज जी पर जितेन्द्र जौहर की टिप्पणियों को लेकर राजेश उत्साही के दखल का राजेन्द्र जी ने जवाब देने का प्रयास किया और फिर दोनों की मुठभेड़ ने एक शब्द समर का रूप ले लिया। राजेन्द्र ने कहा, राजेश जी , अव्वल तो अंतर्जाल पर अब तक मेरा शत्रु कोई है नहीं । …और भगवान के भजन लिखने-गाने वाले का नुकसान कोई कर भी नहीं सकता, है ना ? अपनी बात कहने के लिए मेरे पास मेरी अपनी वाणी, लेखनी और सलाहीयत है। राजेश जी, आप मेरी सौ - पचास रचनाएं देख पाएं  तो आपकी अवधारणा बदल भी सकती है। आपने विलंब से ही सही, मेरी रचनाओं पर बात करने की कृपा की, अच्छा लगा । यदि आप ग़ज़ल की विभिन्न बह्रों को समझ पाते हैं तो  इस बारे में भी अपनी प्रतिक्रिया यहां रखते तो और अच्छा लगता। राजेन्द्र ने त्रिमोहन जी के लिये एक उर्दू गजल पेश की, बहुत राजेन्द्र ने समझा दिया फ़िर भी नहीं समझा, दिमागो - दिल से लगता है ज़रा बीमार नुक़्ताचीं और तिलकराज जी की ओर इंगित करते हुए कहा, कपूर साहब एक गुणी ग़ज़लगो हैं, यहां कही गई उनकी कई बातों से मैं स्वयं सहमत नहीं। किसी रचना का यह अंतिम आकलन भी नहीं, अंतिम अवसर भी नहीं, कपूर साहब या कोई अन्य अंतिम आलोचक - समीक्षक भी नहीं। उन्होंने अशोक रावत जी को भी हिदायत दे डाली, जितने गुणीजनों का आपने नाम लिया, उन तक ये रचनाएं पहुंचा कर उनमें से किन्हीं की प्रतिक्रिया भी यहां रखते तो उनके नाम का उल्लेख करना और भी सार्थक होता । यहां प्रस्तुत जिन ग़ज़लों पर विमर्श चल रहा है, आपकी बातों से आपकी कोई प्रतिक्रिया स्पष्ट नहीं हुई ।


राजेश उत्साही फिर आने को विवश हुए, राजेन्द्र जी आपने लिखा है अंतर्जाल पर अब तक मेरा शत्रु कोई है नहीं। यह तो आपके जवाबों से पता चला रहा है। जानकर प्रसन्नता हुई कि आप इतने अधिक अनुभवी हैं। फिर साखी पर हम सबके बीच क्यों आ खड़े हुए। राजेन्द्र जी ये कबीर बाबा का चौराहा है। यहां तीन हजार नहीं तीस हजार रचनाएं लिखने वालों का भी स्वागत इसी तरह होगा। क्योंकि मैंने पहले भी कहा कि मेरे‍ लिए तो यहां प्रस्तुत रचनाएं ही कसौटी हैं। अंत में यह कहना चाहूंगा कि हिन्दी या उर्दू या किसी भी भाषा के इतने भारी भरकम शब्द रखकर आप लोगों की वाह वाही तो लूट सकते हैं, दिल में नहीं उतर सकते। ठीक इसी तरह आपने सबके नाम के आगे आदरणीय लगा तो दिया, लेकिन केवल शब्द लगाने से आदर व्यक्‍त नहीं होता, उसे व्यवहार में भी लाना पड़ता है।




शनिवार को प्रवासी शायर प्राण शर्मा की गजलें 
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27 टिप्‍पणियां:

  1. साखी पर प्रकाषित रचनाओं की समीक्षात्मक क्रियाओं पर प्रतिक्रियाओं के विश्लेषण से एक खराब बात जो सामने आ रही है वह यह कि टिप्पणी तो रचना पर की जाती है लेकिन उसका प्रतिउत्तर व्यक्तिगत दिया जाता है। यदि आप अशोक रावत जी जैसे रचनाकारों के विशय में नहीं जानते हैं तो एक बात स्पश्ट है कि आप वर्तमान के श्रेष्ठ साहित्य से नहीं जुड़े हैं। पहले पूछ लीजिए। उनके बारे में उल्टा-पुल्टा तो मत बोलिए। यह साखी का सौभाग्य है कि उन्होंने यहां टिप्पणी दी। वे नेट के बहुत ज्यादा जानकार नहीं हैं। उनका सिर्फ जीमेल खाता है, जिसे वे ‘ाायद ही महीनों में देखते हों। वो तो हम लोग हैं, जो उन्हें इस ओर जोड़ने के लिए प्रयास करते रहते हैं। मैंने उनके रूप में पहला ऐसा साहित्यकार देखा है जिसके आगे पीछे कोई किन्तु-परन्तु नहीं जुड़ा है। बड़े से बड़ा रचनाकार उनके इस गुण के आगे टिक नहीं सकता।
    जारी.....

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  2. मेरी समझ में एक बात नहीं आती कि यदि आप अपनी रचनाओं पर नकारात्मक(अपनी नजर में) टिप्पणियां सहन नहीं कर सकते हैं तो क्या कभी खुद से यह सवाल पूछा है कि आपकी रचनाओं ने आपके व्यक्तित्व में क्या बदलाव पैदा किये हैं। कौन-कौन सी कमियां दूर की हैं। यदि रचनाएं आपके व्यक्तित्व का ही परिश्कार नहीं कर पा रही हैं तो आपका लेखन किसके लिए है। क्या जानवरों और पेड़-पौधों के लिए। आपके इस दुनिया के जाने के बाद आपको किन संदर्भों में याद किया जायेगा। एक युवा रचनाकार मित्र था-संतोष “ार्मा बांधनू, उम्र कोई सोलह साल। उसकी एक कविता थी-
    विष कुम्भ से थोड़ा हलाहल आज पीना चाहता हूं।
    हे प्रभो मैं मृत्यु के उपरान्त जीना चाहता हूं।
    कितनी बड़ी बात कही है उसने कि आज भी मैं इन पंक्तियों को अपने लेखन के लिए आदर्श मानता हूं।
    जारी.....

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  3. पुस्तकों का “ातक और हजारों रचनाओं के लेखन से कुछ नहीं होता। ‘उसने कहा था‘ जैसी एक कहानी, बिहारी सतसई जैसी एक पुस्तक या ‘साये में धूप‘ जैसा एक ग़ज़ल संकलन ही युग को बदलने के लिए काफी है।
    आदरणीय राजेन्द्र जी की लेखकीय प्रतिभा के प्रति कोई ‘ांका नहीं है लेकिन यह तो मानना ही पड़ेगा कि साखी के लिए रचनाएं भेजने में उनका चयन अच्छा नहीं रहा। अगर उनके रचना संसार में यही प्रतिनिधि रचनाएं हैं तो ‘ाायद मैं गलत हूं।
    ये भी सही है कि राजेन्द्र जी की ये रचनाएं ग़ज़ल के नाम से प्रकाषित नहीं हुई थीं लेकिन ज्यादातर ने ग़ज़ल मानते हुए टिप्पणियां दी। ये भी कोई अच्छी बात नहीं है। हिन्दी में किसी भी द्विपदीय रचना को ग़ज़ल आसानी से मान लिया जाता है, जबकि ग़ज़ल सिर्फ दो पंक्तियों में एक विचार को बांधने का नाम नहीं है। ग़ज़ल एक कहन है। इसीलिए ये नहीं कहा जाता कि मैंने ग़ज़ल लिखी है बल्कि रचनाकार कहता है कि मैंने ग़ज़ल कही है। एक बात और कि हिन्दी में ग़ज़ल मात्र संस्कृत के तत्सम ‘ाब्दों के बाहुल्य से नहीं हो जायेगी वरन् हिन्दी काव्य की चेतना, उसकी संस्कृति उसकी सोच को ग़ज़ल के लहजे में व्यक्त करने से होगी। जयपुर के वरिष्ठ कवि आदरणीय गोपाल गर्ग जी का एक ‘ोर है-
    इस तरह पिछले जनम का ऋण चुकाती है नदी।
    पाप मेरे हैं मगर कार्तिक नहाती है नदी।
    इस ‘ोर में भाषा हिन्दी, सोच हिन्दी, संदर्भ हिन्दी और ग़ज़लपन भरपूर।
    मैंने ये बात किसी एक के संदर्भ में नहीं कहीं हैं। जो गलत लगा सिर्फ उसका विरोध किया है। समयाभाव के कारण समय से टिप्पणी नहीं दे पाया इसे ही मेरी टिप्पणी माना जाय।

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  4. आदरणीय राजेन्द्र जी से भी निवेेदन है कि जरा सी टिप्पणियों से इतना परेशान न हों। इससे आपका कद छोटा नहीं हो जायेगा। और सिर्फ प्रषंसा से आप महाकवि नहीं हो जायेंगे। क्रिया पर व्यक्तिगत प्रतिक्रिया कमजोरी की निशानी है। अगर आपकी समझ में कोई बात अच्छी लगे तो रख लीजिए और जो रूचिकर न लगे उसे हवा में उड़ा दीजिए। इससे आपका कद बड़ा ही होगा। जितनी आलोचनात्मक टिप्पणियां आपकी रचनाओं को प्राप्त हुईं उससे ये तो स्पश्ट है कि टिप्पणीकारों ने उन रचनाओं को ध्यान से पढ़ा, उन्हें आलोचना के लायक माना। उन्हेें धन्यवाद दीजिए। वे लोग उन टिप्पणीकारों से लाख गुना ज्यादा अच्छे थे जो सिर्फ अच्छी हैं, बढ़िया हैं कहकर चले गये। सोने की गुणवत्ता कसौटी पर ही परखी जाती है। उस कसौटी पर खड़े होने से हिचकिये मत। केई रचनाकार यदि खूब लिखेगा तो उसे खूब लिखने के लिए याद किया जायेगा और कोई रचनाकार अच्छा लिखेगा तो उसे अच्छा लिखने के लिए याद किया जायेगा। अब ये आपको तय करना है कि आपको किस बात के लिए जाना जाय।

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  5. मैं कुछ रोज़गार की दिक़्क़तों, लगातार यात्रा और बुखार की वजह से राजेन्द्र की रचनाओं पर हुई बातचीत में शामिल न होने का दुख, संजीव गौतम द्वारा की गई टिप्पणियों से दूर हो गया. मैं भी शायद इन्हीं शब्दों में अपनी बात कहता.
    सुभाष जी का आभार कि वह निरंतर अपनी क्रियाशीलता से 'साखी' को ऊंचाइयां प्रदान कर रहे हैं.

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  6. त्‍वरित टिप्‍पणी:

    हम विवादों से जरा उपर उठे तो पायेंगे
    इक समय आयेगा जब ये गीत गाये जायेंगे।
    हमने गर इतिहास से सीखा नहीं कोई सबक
    गल्तियॉं दर गल्तियॉं दर गल्तियॉं दोहरायेंगे।
    चलिये व्‍यक्तिगत विवादों से उपर उठकर अपनी अपनी क्षमतानुसार मॉं सरस्‍वती की सेवा करते रहें।
    जिसने जो भी कहा वह उसकी निजि सोच और अभिव्‍यक्ति का प्रश्‍न है इसपर किसी प्रकार की उत्‍तेजना अच्‍छी नहीं।

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  9. जितेन्द्र जौहर जी का मन भरा नहीं है। वे अपने नाम के अनुरूप कतरब दिखाने बाज नहीं आ रहे हैं। या यूं कह सकते हैं कि वे 'जौहर’ करने पर तुले हैं। पिछली पोस्टर की अंतिम टिप्पणी उनकी ही है। गलती से यह मेरी नजर में आ गई। अब इतना सब हो ही चुका है तो इसका आनंद भी ले लें। यहां उनकी टिप्पणी के साथ मेरा जवाब संवादात्मक शैली में है। लम्बी टिप्पणी एक बार में पोस्ट नहीं हो पाती है,इसलिए इसे चार हिस्सों में पोस्ट कर रहा हूं।

    जितेन्द्र जी-
    भैया राजेश उत्साही जी,
    नमस्कारम्‌!
    कल से मैं बिस्तर-ग्रस्त चल रहा हूँ। काफी ज़्यादा बुख़ार है। बड़ी कठिनाई से इतना लिखकर आपकी अमृतवाणी (या यूँ कहें कि आप्त-वचनावली) का नोटिस ले चुकने का शिष्टाचार-मात्र निभा रहा हूँ। विस्तार से लिखूँगा...भाई! वैसे राजेन्द्र जी आपको काफी ठीक-ठाक ढंग से ‘नमस्कार’ कह चुके हैं।

    राजेश उत्साही --
    जी जितेन्द्र जी। और उस नमस्कार का प्रत्युत्तरर उन्हें मिल गया है। आप भी जिस तरह से नमस्कार कर रहे हैं, उसका जवाब भी ले लें। कम से कम भैया शब्द को तो अपवित्र न करें। आपके मुखारबिन्द से अपने लिए ये संबोधन मुझे ठीक नहीं लग रहा।

    उत्तर देंहटाएं
  10. जितेन्द्र जी-
    फिलवक़्त अव्वल तो सिर्फ़ यही कि मुझे नहीं पता था कि‘साखी’ पर समीक्षा भी होती है। बंधुवर... इस मंच पर पहली बार आया था मैं।

    राजेश उत्साही --
    जितेन्द्र जी,कोई बात नहीं जिन्दगी में कई बातें पहली बार होती हैं। हमसे भी पाला पहली बार पड़ा है। अब साखी पर सोच समझकर आइएगा।

    जितेन्द्र जी-
    दूसरे यह कि, बेहतर होता कि आप तिलक राज जी को स्वयं अपनी बात कहने देते। "दवा किसी को, असर किसी पर !!!???" वाह भई, वाह...अद्भुत चिकित्सा-विज्ञान है साहित्य का।

    राजेश उत्साही --
    आश्चर्य है आप कैसे साहित्य के ‘स्वनामधन्य" शिरोमणि हैं। साहित्य के इस चिकित्सा‍ विज्ञान को भी नहीं जानते। सही बात है, जानते होते तो मेरी अमृतवाणी पढ़कर बिस्तरग्रस्त नहीं हो जाते।

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  11. जितेन्द्र जी-
    और... हाँ, सच्ची बोलिएगा कि कहीं तिलक राज जी ने तो अपनी जगह पर आपको नहीं खड़ा कर दिया। "तू मुझे बचा, मैं तुझे बचाऊँ" की तर्ज पर। ध्यान रहे बंधुवर कि यह आरोप नहीं, प्रत्युत्‌ एक सहज प्रश्न है!

    राजेश उत्साही --
    जी, अब इस पर क्या कहूं, आप साखी पर ही पहली बार आए हैं। पहले आए होते तो देखते कि कौन किसको बचाता है। अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, आगे कुछ कहने से पहले साखी की पिछली पोस्टें खोलकर देख लें। अभी तो मुझमें इतना दम है कि अपनी रक्षा खुद कर सकूं। वैसे आप बताएं कि जिनके सम्मान में आप जौहर करने पर तुले हैं,उनसे क्या आपने यही सौदा किया है? या और कुछ भी है ?

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  12. जितेन्द्र जी-
    राजेन्द्र स्वर्णकार जी, आप ऐसे यथाकथित स्वनामधन्यों की ‘धन्यता’ से परेशान न हों। इनमें जो सार दिखे, उसे ग्रहण कर लें। बाक़ी बचे कचरे के लिए डस्टबिन तो होगा ही आपके घर में। साहित्य में हर जगह ‘स्वयंभुओं’ की भरमार-सी हो चली है आजकल!

    राजेश उत्साही --
    लीजिए ताजुब्ब है ‘स्वनामधन्यं‘ दूसरों की धन्यता से परेशान होने लगे। और अपनी तारीफ खुद ही करने लगे। वैसे आपने सलाह सही दी है। जितेन्द्र जी कचरे के लिए ‘बिन’ से काम चला जाता है ‘डस्ट’ की जरूरत नहीं होती है। बहरहाल डस्टबिन हमारे घर में नहीं हैं। हां,आंगन में क्यारियां हैं। आप जैसे ‘स्वयंभुओं और उनके सड़े कचरे’ को हम उसमें डाल देते हैं ताकि बढि़या खाद बने।

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  13. सुभाषजी , आपको विद्वान गुणी और गुणग्राहक मानने के कारण ही आपके ब्लॉग पर आया था ,
    नहीं मा'लूम था कि आपके ब्लॉग पर आपने किसी अन्य को आगत के स्वागत के लिए नियुक्त किया हुआ है …

    " फिर ऐसी क्या गरज आन पड़ी कि आप साखी पर हम सबके बीच आ खड़े हुए। "
    दंभ की ऐसी पराकाष्टा !! …और क्षेपक का ये तुर्रा ?!
    जो झेलने को विवश होगा , वह दुबारा यहां आएगा …

    फळ लागी डाळी झुकै , निंवण मांय गुण वास !
    थोथा फुगना गैस रा , अकड़्यां उडै अकास !!


    राजस्थानी भाषा में सृजित मेरे इस दोहे का अर्थ है -

    फल लगी हुई डाली ही झुकती है , नम्रता में ही गुणों का निवास होता है ।
    अन्यथा … खोखले लोग दंभ में गैस के गुब्बारे की तरह आसमान में उड़ते हुए पाए जाते हैं ।


    प्रियवर संजीव जी आपका प्रशंसक हूं , रहूंगा … लेकिन आवश्यकता हुई तो इस मंच पर बात करने की अपेक्षा मैं आपसे मेल माध्यम से विचारों का आदान प्रदान करता रहूंगा ।
    सु्भाषजी , आपकी छवि साखी की पहली पोस्ट पर लगी रचना के रचनाकार के रूप में ही सहेजे हुए विदा लेता हूं …

    मंच आपका , आप जिसे जो कहना - कहलाना चाहें !

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  14. Priy Rajendr,
    Hamen is tarah naheen sochana chahiye. sakhi par log kuchh bhee kahate hue jhijhaken naheen, main aisa chahata hoon. isee nate jo bhee saakhi ko samajhte hain, us par apana adhikaar bhee maanate hain. Rajesh shreshth kavi hain, main unke swabhav se parichit hoon. aap bhee jaanate ko Rajesh ne Jitendr jee kee kis baat par aapatti kee. phir ek yuddh sa shuru ho gaya. uske liye keval Rajesh jimmedar naheen hain. Jitendr bhee kahaan peechhe hatane vaale. isliye bat badhatee gayee. yah baat hee to hai, ismen bura maanane jaisee koi baat naheen hai.
    Main itana jaroor chahata hoon ki rachanaaon par khoob baat ho, shabd-yuddh ho, lekin jab tak rachana vivash na kare tab tak rachanakar ke vykti par n jayen. aur jab baat ho to usaka javab den, n ki naraj hon, pareshan hon. Jab ham rachana karate hain aur yah maanate hain ki rachanaayen lok ko prabhaavit karatee hain, to lok kee pratikriyaaon ko sahajata se grahan karane ka sahas bhee rakhana chahiye. jab koi kavi ya saahitykaar aalochak kee haisiyat se kalam uthaata hai to vah usee lok ka ek sajag pratinidhi hota hai. vah chahe Rajesh hon ya Jitendr hon ya koi aur. han kisee ke prati aagrah naheen rahana chahiye baat karte hue.
    Rajendr mujhse naraj hon, main unse naraj ho jaaoon, isse kya phark padata hai. par main aisa naheen chahata. sakhi ka yah matavy bhee naheen hai.jo bhee saakhi ke mantavy ko samajhata hai, vah iskee raksha men svath sannaddh hoga. Rajesh hain, Sanjeev hain, aur bhee log hain. main manata hoon ki Rajendr bhee honge. unhen honaa hee chahiye. astu.

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  15. डॉ. सुभाष राय ने जो रोमन में लिखा है-

    हमें इस तरह नहीं सोचना चाहिए। साखी पर लोग कुछ भी कहते हुए झिझकें नहीं,मैं ऐसा चाहता हूं। इस नाते जो भी साखी को समझते हैं,उस पर अपना अधिकार भी मानते हैं। राजेश श्रेष्ठ कवि हैं,मैं उनके स्वभाव से परिचित हूं। आप भी जानते हैं राजेश ने जी‍तेन्द्र जी की किस बात पर आपत्ति की । फिर एक युद्ध सा शुरू हो गया। उसके लिए केवल राजेश जिम्मेदार नहीं हैं। जितेन्द्र भी कहां पीछे हटने वाले। इसलिए बात बढ़ती गई। ये बात ही तो है,इसमें बुरा मानने जैसी कोई बात नहीं है।

    मैं इतना जरूर चाहता हूं कि रचनाओं पर खूब बात हो,शब्द-युद्ध हो,लेकिन जब तक रचना विवश न करे तब तक रचनाकार के व्यक्तित्व पर न जाएं। और जब बात हो तो उसका जवाब दें, न कि नाराज हों, परेशान हों। जब हम रचना करते हैं,तो लोक की प्रतिक्रियाओं को सहजता से ग्रहण करने का साहस भी रखना चाहिए। जब कोई कवि या साहित्यकार आलोचक की हैसियत से कलम उठाता है तो वह उसी लोक का एक सजग प्रतिनिधि होता है। वह चाहे राजेश हों या जीतेन्द्र हों या कोई और। हां किसी के प्रति आग्रह नहीं रखना चाहिए बात करते हुए।

    राजेन्द्र मुझ से नाराज हों,मैं उनसे नाराज हो जाऊं, इससे क्या फर्क पड़ता है,पर मैं ऐसा नहीं चाहता । साखी का यह मन्तव्य भी नहीं है। जो भी साखी के मन्तव्य को समझता है, वह इसकी रक्षा में स्वत sannaddh होगा। राजेश हैं, संजीव हैं, और भी लोग हैं। मैं मानता हूं की राजेन्द्र भी होंगे। उन्हें होना ही चाहिए। अस्तु।

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  16. मैं आज भी अपनी बात पर कायम हूँ कि समीक्षा कविता की होनी चाहिए न कि कवि की और न ही समीक्षा की समीक्षा. क्योंकि हर व्यक्ति के विचार उसके निजी हैं और सांख्यिकी का सिद्धांत भी यही कहता है कि किसी के दबाव, विरोध या प्रभाव के कारण दिए गए या परिवर्तित वक्तव्य की कोई गिनती नहीं होती. जो नहीं सहमत हैं, न हों. अपनी बात वज़न से रखें. भला मेरी कमीज़ उसकी कमीज़ से सफेद कैसे या मेरी लाइन उससे छोटी क्यों के कारण किसी की कमीज़ पर पान थूकना या लाईन को काटकर छोटा करना सर्वथा अनुचित है.
    क्षमा चाहूँगा बड़े भाई राजेश उत्साही जी से, जो इस बात से नहीं कि समीक्षा कविता की होनी चाहिए न कि कवि की. कवि की समीक्षा उसी सीमा तक उचित है जहाँ तक उसके लेखन, ज्ञान, भाव या अभिव्यक्ति का प्रश्न है. फ़णीश्वर नाथ रेणु की रचानाएँ साहित्य की धरोहर हैं. एक तरफ उनके नॉवेल में नारी का उत्कृष्टतम चित्रण, दूसरी ओर यह सच कि पटना में उन्होंने एक दूसरी औरत रख छोड़ी थी, जबकि गाँव में ब्याहता को छोड़ आए थे.

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  17. जब साहित्य की चर्चा होगी तो उनको एक बेहतरीन उपन्यासकार के रूप में याद किया जाएगा, किंतु जब साहित्यकारों के विवाहेतर सम्बंधों पर चर्चा हो रही हो तो उनको वह स्थान शायद नहीं मिले जो बतौर लेखक उनको दिया गया. लिहाज़ा किलोमीटर की किलोग्राम से तुलना करना कहीं से भी सही नहीं.
    रिलेटिविटी के समय में सब सापेक्ष है. क्या अच्छा, क्या बुरा. अब मुझे ही देख लें. कविता,ग़ज़ल या साहित्य की किसी विधा का ज्ञान नहीं. लेकिन संजीव गौतम जी की बातें समझ में आती हैं, सर्वत जी, प्राण साहब, नीरज जी, उत्साही जी को पढता हूँ तो दिल कहता है कि अच्छा है. और जिस पेशे में हूँ, वहाँ पहला सबक़ जो सिखाया गया था वो यही था कि जब सारी नॉलेज काम न आए तो बस दिल की सुनो. काम बिगड़ा भी तो तुम्हें खुशी होगी कि तुमन वो किया जो दिल ने कहा.
    एक और सबक़ कि अपने काम के प्रति मुस्लिम हो जाओ. पालो, पोसो, प्यार करो और जब क़ुर्बानी का दिन आ जाए तो बिना मोह के क़ुर्बान कर दो. वैसे भी किसी की रचना जब लोकार्पित कर दी गई तो वह उसकी कहाँ रह जाती हैं.अब वो चाहे प्यार पे क़ुर्बान हो जाए या किसी की कटु समीक्षा पर. भाई जब तारीफ़ पर हमारा हक़ है, तो तंक़ीद पर पड़ोसी का क्यों. भगवान को मानने वाले जब धन वैभव पाया तो भगवान का शुक्रिया अदा किया और कष्ट मिला तो अमिताभ बच्चन का डायलाग बोल गए!!
    साखी तो साखी है.. चाखी तो खटमिट्ठी.. और चोखी जैसे सोना!!

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  18. agar ye blog HINDYUGK ke naye yunikavi subhah ji kaa hai..
    to is par kavitaa ghazal ki koi bahas nahin ki jaani chaahiye

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  19. sirf unhein thanks kahiye..
    ki unhone abhi moderation nahin lagaayaa hai...

    :)

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  20. जितेन्द्र ‘जौहर’ ने कहा....

    वाह...वाह! भैया राजेश उत्साही जी, ... मज़ा आ गया-- आपकी स्वघोषित ‘महानता’ एवं ’मूर्धन्य साहित्यिकार’ का स्व-निर्मित ’आभामण्डल’ देखकर! इस संवाद-क्रम में आपकी छिटपुट बिखरी स्वारोपित ’महाकवीय’ मुद्राएँ मेरे सम्मुख एक ’कोलाज’ के रूप में एकत्रित हैं। सहेजकर रख रहा हूँ।

    बंधुवर, आपने परत-दर-परत स्वयं ही अपनी पूरी कलई खोल डाली! ...है कि नहीं? आपका शब्द-शब्द दर्पानुवाद-सा भासित हो रहा है! दर्प का ऐसा ’दैदीप्यमान’ जुगनू शायद ही कहीं दिखे। संदर्भित बिन्दु को यदि कोई रूपक देना हो तो सिर्फ़ एक मिसरा उद्धृत करना ही काफी होगा कि : "वह परिन्दा दम्भ पाले है बहुत उल्लास में...।" ख़ैर...

    आपमें कितनी साहित्यिकता है, यह समझ लिया गया है; आपके स्वयं के जीवन में साहित्य ने कितना बदलाव किया है, यह जाना जा चुका है; ‘आपमें’ कितना साहित्य स्पन्दित हो रहा है, यह जाँचा-परखा जा चुका है; और ‘साहित्य’ में आप कितनी गहराई में खड़े हैं, यह भी नापा जा चुका है। वर्जनीय आत्म-रति / आत्म-मुग्धता में आपादमस्तक आप्लावित किसी "स्वयंभू" के दर्प का ’एको‍ऽम्‌ द्वितीयो नास्ति’ की तर्ज पर यह एक अनोखा उदाहरण है! सृजन में उच्चादर्शों की बात करने के साथ ही निज जीवन में भी उन्हें आत्मसात्‌ करके चलने वाले साहित्यकारों की आकाशगंगा से दूर...बहुत दूर, आप कथ्य और कृत्य के बीच तबील फ़ासला रखने वाले खोखली उपदेशकीय मुद्रा के रचनाकार बनकर उभरे हैं। नखशिख... दर्प की हास्यास्पद प्रतिमूर्ति! मेरा एक मुक्तक प्रसंगवश प्रस्तुत है :

    श्रेय-पथ का वरण किया होता।
    शुद्ध अंतःकरण किया होता ।
    ज्ञान-वितरण बहुत किया तुमने,
    ज्ञान का अनुसरण किया होता !!

    राजेश जी! पुनः आपकी ही यथाकथित संवादात्मक शैली में प्रस्तुत हूँ। लेकिन, बंधु... उससे पहले आपको बताता चलूँ कि मैं किसी एकदम ‘फुरसतिया इंसान’ के चक्कर में अपने अतिशय व्यस्त समय के अमूल्य पल गँवाने के लिए ‘साखी’ पर नहीं आया हूँ, प्रत्युत्‌ मैं साहित्यकारों के जीवन पर एक महत्त्वपूर्ण परियोजना पर कार्य कर रहा हूँ जिसके लिए सकारात्मक व नकारात्मक दोनों ही बानगी खोजनी थी! कई सप्ताहों से न जाने किन-किन साट्‍स, वेब-मैग़्ज़ीन्स, ब्लॉग्ज़, न्यूज़-पोर्टल्ज़, से गुज़रता हुआ उस दिन यहाँ आ पहुँचा था। जहाँ आपके रूप में एक ’महाज्ञानी’ / ’ दम्भग्रस्त शास्त्रार्थ-महारथी’/ आप्त-वचनों वाला ’अजेय दिग्विजेता’ / काव्य के ’चक्रवर्ती सम्राट’ का सुन्दर सैम्प्‌ल (नमूना) मिल गया। अब आप मेरे एक साहित्यक-मनोवैज्ञानिक रिसर्च-पेपर/ का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं! बधाई........!

    इस पूरे संवाद-क्रम में, डॉ.(श्री) तिलक राज कपूर जी काफी गुरु-गम्भीर इंसान दिखे! मेरे द्वारा (अनुचित एवं क्रत्रिम उग्रता के साथ) चिकोटी काटे जाने पर भी उन्होंने गम्भीरता एवं मर्यादा का दामन नहीं छोड़ा, मौन रहकर अपने गाम्भीर्य की झलक देते रहे! बंधुवर, ...इसे कहते हैं-- सच्चे साहित्यकार का व्यक्तित्त्व! यहीं पर उड़न तश्तरी, भाई संजीव गौतम, अशोक रावत जी, चला बिहारी..., जैसे सुलझे विचारों वाले अनेकानेक अच्छे इंसान और लेखक भी दिखे। राजेन्द्र स्वर्णकार जी को तो कुछ दिन पहले से जान चुका था-- ‘रचनाकार’ पर।

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  21. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  22. जितेन्द्र ’जौहर’27 सितंबर 2010 को 1:09 pm

    वाह...वाह! भैया राजेश उत्साही जी, ... मज़ा आ गया-- आपकी स्वघोषित ‘महानता’ एवं ’मूर्धन्य साहित्यिकार’ का स्व-निर्मित ’आभामण्डल’ देखकर! इस संवाद-क्रम में आपकी छिटपुट बिखरी स्वारोपित ’महाकवीय’ मुद्राएँ मेरे सम्मुख एक ’कोलाज’ के रूप में एकत्रित हैं। सहेजकर रख रहा हूँ।

    बंधुवर, आपने परत-दर-परत स्वयं ही अपनी पूरी कलई खोल डाली! ...है कि नहीं? आपका शब्द-शब्द दर्पानुवाद-सा भासित हो रहा है! दर्प का ऐसा ’दैदीप्यमान’ जुगनू शायद ही कहीं दिखे। संदर्भित बिन्दु को यदि कोई रूपक देना हो तो सिर्फ़ एक मिसरा उद्धृत करना ही काफी होगा कि : "वह परिन्दा दम्भ पाले है बहुत उल्लास में...।" ख़ैर...

    आपमें कितनी साहित्यिकता है, यह समझ लिया गया है; आपके स्वयं के जीवन में साहित्य ने कितना बदलाव किया है, यह जाना जा चुका है; ‘आपमें’ कितना साहित्य स्पन्दित हो रहा है, यह जाँचा-परखा जा चुका है; और ‘साहित्य’ में आप कितनी गहराई में खड़े हैं, यह भी नापा जा चुका है। वर्जनीय आत्म-रति / आत्म-मुग्धता में आपादमस्तक आप्लावित किसी "स्वयंभू" के दर्प का ’एको‍ऽम्‌ द्वितीयो नास्ति’ की तर्ज पर यह एक अनोखा उदाहरण है! सृजन में उच्चादर्शों की बात करने के साथ ही निज जीवन में भी उन्हें आत्मसात्‌ करके चलने वाले साहित्यकारों की आकाशगंगा से दूर...बहुत दूर, आप कथ्य और कृत्य के बीच तबील फ़ासला रखने वाले खोखली उपदेशकीय मुद्रा के रचनाकार बनकर उभरे हैं। नखशिख... दर्प की हास्यास्पद प्रतिमूर्ति! मेरा एक मुक्तक प्रसंगवश प्रस्तुत है :

    श्रेय-पथ का वरण किया होता।
    शुद्ध अंतःकरण किया होता ।
    ज्ञान-वितरण बहुत किया तुमने,
    ज्ञान का अनुसरण किया होता !!

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  23. राजेश जी! पुनः आपकी ही यथाकथित संवादात्मक शैली में प्रस्तुत हूँ। लेकिन, बंधु... उससे पहले आपको बताता चलूँ कि मैं किसी एकदम ‘फुरसतिया इंसान’ के चक्कर में अपने अतिशय व्यस्त समय के अमूल्य पल गँवाने के लिए ‘साखी’ पर नहीं आया हूँ, प्रत्युत्‌ मैं साहित्यकारों के जीवन पर एक महत्त्वपूर्ण परियोजना पर कार्य कर रहा हूँ जिसके लिए सकारात्मक व नकारात्मक दोनों ही बानगी खोजनी थी! कई सप्ताहों से न जाने किन-किन साट्‍स, वेब-मैग़्ज़ीन्स, ब्लॉग्ज़, न्यूज़-पोर्टल्ज़, से गुज़रता हुआ उस दिन यहाँ आ पहुँचा था। जहाँ आपके रूप में एक ’महाज्ञानी’ / ’ दम्भग्रस्त शास्त्रार्थ-महारथी’/ आप्त-वचनों वाला ’अजेय दिग्विजेता’ / काव्य के ’चक्रवर्ती सम्राट’ का सुन्दर सैम्प्‌ल (नमूना) मिल गया। अब आप मेरे एक साहित्यक-मनोवैज्ञानिक रिसर्च-पेपर/ का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं! बधाई........!

    इस पूरे संवाद-क्रम में, डॉ.(श्री) तिलक राज कपूर जी काफी गम्भीर इंसान दिखे! मेरे द्वारा (अनुचित एवं क्रत्रिम उग्रता के साथ) चिकोटी काटे जाने पर भी उन्होंने गम्भीरता एवं मर्यादा का दामन नहीं छोड़ा, मौन रहकर अपने गाम्भीर्य की झलक देते रहे! बंधुवर, ...इसे कहते हैं-- सच्चे साहित्यकार का व्यक्तित्त्व! यहीं पर उड़न तश्तरी, भाई संजीव गौतम, अशोक रावत जी, चला बिहारी..., जैसे सुलझे विचारों वाले अनेकानेक अच्छे इंसान और लेखक भी दिखे। राजेन्द्र स्वर्णकार जी को तो कुछ दिन पहले से जान चुका था-- ‘रचनाकार’ पर।

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  24. भाईवर, ये चार दिन की छोटी-सी ज़िन्दगी है...अपुन काहे को झगड़ा करें??? यह बहुत बड़ा प्रश्न है हम समस्त इंसानों के लिए! सौभाग्यशाली मानता हूँ स्वयं को कि मेरा जीवन घर-परिवार,मित्रों, विद्यार्थियों,परिचितों एवं सहधर्मी कवियों यहाँ तक कि यात्रादि के दौरान मिले तमाम ज्ञात-अज्ञात सहयात्रियों आदि के अपरिमित प्रेम से भरा-पूरा जीवन है। जीवन में प्रेम जैसे अद्‌भुत अवयव/तत्त्व को ही सहेजकर रख सकूँ, यही बहुत है। नफ़रत को स्थान कोई तब देगा, जब दिल में प्रेम से जगह ख़ाली बचेगी! तो... बंधु, लीजिए ये रहे आपके कुछेक बिन्दुओं पर मेरा प्रति-उत्तर, आपकी उसी प्रिय ‘संवादात्मक शैली’ में :

    राजेश उत्साही -
    "...अब इतना सब हो ही चुका है तो इसका आनंद भी ले लें..."

    जितेन्द्र ‘जौहर’:
    बंधुवर, इसका मतलब आप ‘साखी’ पर चर्चा करने के लिए कम, ’प्रपंच’ तथा वाक्‌-प्रलाप द्वारा ‘आनन्द’ लेने के लिए ज़्यादा आते हैं! वाह, भई..वाह! आपके ’आनन्दित’ होने का यह स्तर...आपको मुबारक हो। आप अपने उक्त वचन से स्वयं ही अपना स्तर नाप लें। खैर... प्रभु आपको यूँ ही ’चिरानन्दित’ रखें.... तथस्तु! आमीन! So be it!

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  25. राजेश उत्साही --
    जी, अब इस पर क्या कहूं, आप साखी पर ही पहली बार आए हैं। पहले आए होते तो देखते....। अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, आगे कुछ कहने से पहले साखी की पिछली पोस्टें खोलकर देख लें। ....हमसे भी पाला पहली बार पड़ा है।

    जितेन्द्र ‘जौहर’ :
    वाह रे... पहलवान, अति-सुन्दर! ‘साखी’ महरबान, तो ’उत्साही’ पहलवान! लगे रहो....मुन्ना भाई! टाइप करते-करते मेरी हँसी फूट पड़ रही है आपकी इस बालोचित वाणी पर! आप कविताई के कम, कुश्ती के ज़्यादा नजदीक हैं! ‘साखी’ के पाठकगण उक्त ‘वचनामृत’ में से ‘दम्भ’ नामक तत्त्व की बहुलता को चिह्नित कर चुके होंगे। और हाँ... उत्साही जी, यह जो आपके द्वारा ऊपर प्रयुक्त "पोस्टें" शब्द् है न, वह ठीक है क्या... ???? ??? यदि हाँ, तब तो इसका मतलब ‘शर्ट्‌स’ अथवा ’कमीजें’/ ’कमीजों’ के स्थान पर ‘शर्टें’ शब्द भी किसी रचना में प्रयोग किया जा सकता है...शायद??? है कि नहीं...?

    राजेश उत्साही --
    ...वैसे आपने सलाह सही दी है। जितेन्द्र जी कचरे के लिए ‘बिन’ से काम चला जाता है ‘डस्ट’ की जरूरत नहीं होती है।

    जितेन्द्र ‘जौहर’:
    चूँकि, उत्साही जी... आपकी बातों में ‘कचरे’ के साथ ‘डस्ट’ भी बहुत-सी थी, अतः ‘डस्टबिन’ शब्द वहाँ सन्दर्भानुकूल ही नहीं, सही भी है, वैसे भी ‘डस्टबिन’ शब्द एकदम ‘कॅरेक्ट’ है। वैसे केवल ‘बिन’ से भी काम चल सकता है...लेकिन, बंधुवर.... ‘बिन’ की कु्छेक अन्य meanings भी होती हैं। नहीं मालूम क्या? इन छोटे-छोटे शब्दों के अर्थ आपकी आयु-वर्ग के व्यक्ति को ‘साखी’ सरीखे सार्वजनिक मंच पर बताने पड़ेंगे...न बाबा न... शोभनम्‌ नास्ति! शऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ....य़ह बालोचित सवाल तो चुपके-से पूछ लेना चाहिए था...आप भी न! मैं जानता हूँ कि अब आप डिक्शनरी ज़रूर ढूढ़ेंगे या किसी जानकार से...!!!!!!!!!?????????? है न...?????

    राजेश उत्साही --
    ....जानते होते तो मेरी अमृतवाणी पढ़कर बिस्तरग्रस्त नहीं हो जाते।

    जितेन्द्र ‘जौहर’:
    अच्छा कवि/ लेखक होने के लिए पहले अच्छा इंसान होना पड़ता है...यदि आपकी बीमारी का संदेश (प्रभु न करे कि आप बीमार हों, तथास्तु!! ...बहस-मुबाहिसा‍ कितना भी हो, किन्तु मानवीय सद्भावनाएँ अक्षत्‌-अनाहत्‌ रहनी चाहिए, ख़ैर...) मुझ तक पहुँचता तो मैं आपकी तरह घटिया टिप्पणी करने के बजाय यक़ीनन ‘Get well, soon.’ का संदेश भेजता!

    इत्यलम्‌‍!

    उत्तर देंहटाएं
  26. आद. डॉ. तिलक राज जी,
    नमस्कारम्‌!

    राजेन्द्र जी की ग़ज़लों पर आपकी जो भी राय थी, उसको फिलहाल थोड़ा परे हटाते हैं! आप उस मनोवैज्ञानिक-साहित्यिक ‘सिचुएशन’ में नितांत संतुलित और संयमित ही नहीं, अपितु अत्यंत गंभीर इंसान के रूप में उभरकर सामने आये हैं। आपकी संजीदगी और व्यक्तित्त्व की सुनम्यता के साथ ही वाणी की मितव्ययिता आपको एक सच्चा साहित्यकार कहलाने का सुपात्र बनाती है! विपरीत/विषम परिस्थितियों में व्यक्ति का जो चरित्र/आचरण/व्यवहार उभरकर आता है, वह असली होता है। बाक़ी जगह (सामान्य स्थितियों,आदि में) तो व्यवहार में छ्द्‌मभरी मिलावट/सजावट हो सकती है...कभी impression डालने के लिए, तो कभी किसी तात्कालिक Gain या किसी hidden interest की संपूर्ति के लिए...आदि-आदि। खैर... मैं पुनः मिलूँगा कहीं-न-कहीं...! धन्यवाद!!!

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