अभियान के साथी

शनिवार, 18 जून 2011

हरे प्रकाश उपाध्याय की चार कविताएँ

 हरे प्रकाश उपाध्याय को साखी पर प्रस्तुत करते हुए मुझे संतोष और गर्व दोनों का अनुभव हो रहा है| वे एक ऐसे युवा कवि हैं, जिन्होंने अपनी और अपने पहले और बाद की पीढ़ियों को एक साथ आकर्षित और प्रभावित किया है| बिहार में ५ फरवरी १९८१ को जन्मे इस अग्निधर्मा युवक ने लम्बी अराजक भटकन के बाद अपना दीप्त पथ बना लिया है और उस पर अब आगे बढ़ना जारी  है| हरे के शब्दों में मैं हिन्दी का एक गरीब लेखक हूँ, रोटी के लिए पत्रकारिता करता हूँ| भारतीय ज्ञानपीठ से एक कविता संकलन प्रकाशित है| वे मेरे सहयोगी भी हैं और जनसंदेश टाइम्स के फीचर संपादक के रूप में काम कर रहे हैं| मेरे सपनों के पंख की तरह| पर मैंने उन्हें बेड़ियाँ डाल रखी हैं| काम, हर दम काम| योजना, संपर्क और उस पर अमल| बीवी, बच्चों तक के लिए समय नहीं| साखी के लिए रचनाएँ मांगी तो उन्होंने बदहवासी में एक साथ लिखी तीन कविताएँ मुझे मेल कर दीं| मैंने एक और रचना उनके संकलन से उठा ली, जो बदहवास समाज के बारे में है| प्रस्तुत है हरे प्रकाश उपाध्याय की चार कविताएँ....   


१.
माघ में गिरना
कविता मिली थी
बहुत दिनों के बाद
सावन के बाद माघ में
एक पेड़ के नीचे
पत्ते बुहार रही थी
चूल्हा जलाना था उसे शायद
हमने उलाहने नहीं दिए
उसने देखा एक नजर मेरी तरफ
मैं थोड़ी दूर पर शीतल हवा में कांपते हुए पत्तों सा
ठिठुरता अपने गिरने की प्रतीक्षा करते हुए
उसे देखता रहा भौंचक

हम यों तलाश रहे थे बरसों से
एक-दूसरे को हर सावन के मौसम में
ईश्वर की लीला ही कहिए जनाब कि
माघ में जब बिना ढूंढे मिले
अचानक
तब वह मुझे ठीक से देख नहीं पा रही थी
मैं रचता क्या उसे
रचा तो मुझे जाना था...

हम देर तक देखते रहे
नहीं पता क्या-क्या
उसकी आंखों के कोर भीग गए
और मैं गिरा तो उठ न सका...

जान-पहचान नये सिरे से हो रही थी।
२.
मायावी यह संसार
अधिकांश चीजें मायावी हैं
मार तमाम संकटों के बीच ही
हँसी की बारिश
मार गुर्राहटों के बीच
कोयल की विह्वल पुकार
ऐ कोयल तुम पागल हो और एक दिन तुम पागल बना दोगी समूची दुनिया को
ऐ नदी तुम जरा इधर नहीं आ सकती शहर में
ऐ हवा, तुम अपना मोबाइल नं. दोगी मुझे
सुनो, सुनो, सुनो....
अधिकांश चीजें मायावी हैं...

जिनकी आवाजों के शोर के बजे नगाड़े
उनसे भागे जिया
जिनकी आवाज न आए
उसी आवाज पर पागल पिया..
जहां रहने का ठौर, मन वहां न लागे मितवा
चल, यहां नहीं, यहां नहीं, यहां नहीं...
पता नहीं कहां
चल कहीं चल मितवा...
अधिकांश चीजें मायावी हैं...

जिन चीजों से प्रेम वे अत्यंत अधूरी
इन अधूरी चीजों की भी महिमा गजब

यह जीवन सुखी-दुःखी एक पहेली...

जी नहीं रहे हम
बस अपनी उम्र के घंटे-पल-छिन गिन रहे बस
और इसी गुणा-भाग में एक लंबी उम्र गुजार कर
जो गए
उनके लिए मर्सिया पढ़ रहे हैं हम...
३.
कविता के बारे में एक बड़बड़ाहट
कविता, ओ कविता
क्या तुम गरीब की जोरू हो...
नहीं तो क्यों इतने सारे लोग
तुम्हें भौजाई बनाए हुए हैं
कोई तुम्हें चिकोटी काट रहा है
कोई कागज के बिस्तर पर नचा रहा है तुम्हें

कोई माइक पर गूंजते
कुछ निहायत उपयोगी शब्दों के लिबास में तुम्हें पेश कर रहा है
कोई तुम्हें बेच रहा है
कोई खरीद रहा है
खाने-कमाने का काम भी ले रहे तुमसे कुछ लोग
क्या तुम ही हमारे समय की कामधेनु

तुमसे करते हैं इतने लोग जो प्रेम
क्या सब देह-संबंधी हैं तुम्हारे?
रहने दो कुछ गोपनीय प्रश्न और भी हो सकते हैं
कुछ लोग मां कहते होंगे तुम्हें, बुरा मान जाएंगे
जाओ जीयो अपनी जिंदगी, जाओ
नदी की तरह, हवा की तरह...चाहे जैसे

पर कविता को फसल की तरह
काटनेवाले कवियों
एक न एक दिन तुम्हें हिसाब देना ही होगा...

४. 
खिलाड़ी दोस्त 
खिलाड़ी दोस्तों के बारे में
बताने से पहले ही सावधान कर दूँ कि
मेरा इशारा ऐसे दोस्तों की तरफ़ नहीं है
जो ज़िन्दगी को ही एक खेल समझते हैं
बल्कि यह उन दोस्तों की बात है जो
खेल को ही ज़िन्दगी समझते हैं
जो कहीं भी खेलना शुरू कर देते हैं
जो अक़सर पारम्परिक मैदानों के बाहर
ग़ैर पारम्परिक खेल खेलते रहते हैं


वे दोस्त
खेल के बाहर भी खेलते रहते हैं खेल
जब भी जहाँ
मौक़ा मिलता है पदाने लगते हैं
पत्ते फेंकने लगते हैं
बुझौव्वल बुझाने लगते हैं
गोटी बिछाने लगते हैं
आँखों पर कसकर बाँध देते हैं रूमाल
और दुखती रग को दुखाने लगते हैं


वे दोस्त अच्छी तरह जानते हैं
दोस्ती में खेलना
सही तरह पैर फँसाना वे जानते हैं
जानते हैं वे कब
कहाँ से मारने पर रोक नहीं पाएगा गोल
जानते हैं कितनी देर दौड़ाएँगे
तो थककर गिर जाएगा दोस्त
वे हाथ मिलाते हुए अक़सर
हमारी भावनाएँ नहीं
हमारी ताक़त आँकते रहते हैं
अक़सर थके हुए दौर में
भूला हुआ गेम शुरू करते हैं दोस्त
वे आँसू नहीं मानते
तटस्थ वसूलते हैं क़ीमत
हमारे हारने की


सुख और ख़ुशी में भले भूल जाते हों
दुख में अकेला नहीं छोड़ते
आ जाते हैं डंडा सँभाले
उदासी और थकान में
शुरू करते हैं खेल
और नचा-नचा देते हैं


दोस्त अवसर देखते रहते हैं
काम आने का
और मुश्किल समय में अक़सर
ऐसे काम आते हैं कि भूल नहीं सकते हम


हमारे गहरे अभाव
टूटन और बर्बादी के दिनों में
जब दुश्मन उपेक्षा करते हैं हमारी
दोस्त आते हैं ख़ैरियत पूछने
और हास्य के शिल्प में पूछते हैं हाल
हमारे चेहरे की उड़ती हवाइयाँ देखकर
हताश नहीं होते
वे मूँछों में लिथड़ाती मुस्कान बिखेरते हैं


दोस्त हमें हारकर
बैठ नहीं जाने देते
वे हमें ललकारते हैं
चाहे जितने पस्त हों हम


उठाकर हमें मैदान में खड़ा कर देते हैं वे
और देखते रहते हैं हमारा दौड़ना
गिरना और हमारे घुटने का छिलना
ताली बजाते रहते हैं वे
मूँगफली खाते रहते हैं
और कहते हैं
धीरे-धीरे सीख जाओगे खेल


जो दोस्त खेल में पारंगत होते हैं
खेल से भागने पर कान उमेठ देते हैं
कहते हैं, कहाँ-कहाँ भागोगे
'भागकर जहाँ जाओगे
हमें वहीं पाओगे'


खेल में पारंगत दोस्त
खेल में अनाड़ी दोस्त से ही
अक़सर खेलते हैं खेल!  

संपर्क--08853002004

53 टिप्‍पणियां:

  1. देर आयद दुरुस्त आयद.. सारी कविताएँ अच्छी हैं, इनमें एक तंज है और यह ठीक जगह पर चोट करती हैं.

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  2. 1. एक नए सिरे से
    पहचान की लीला
    बनी दिल्‍ली में
    पुलिस लीला
    रोज लील रही है
    पुलिस खालिस
    इंसान को।

    2. मोबाइल नंबर तो देगी
    जरूर हवा और वो
    नहीं होगा हवाई
    पर सिग्‍नल रहे मजबूत
    करोगे या दोगे
    उन्‍हें कौन सी दवाई

    3. कविता की फसल
    रोज कटती है
    भावों में
    विचारों में
    उपजाऊपन जैसा
    अपनापन गढ़ती है
    रोज।

    4. वे दोस्‍त पहनाते भी हैं हार
    हारने पर और कहते हैं
    हारे हो चाहे
    पर फूलों के दुलारे हो
    गाहे बगाहे।

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  3. समय की तल्खियों से लैस एक ताजगी लिए ये कवितायेँ हरे भाई के विस्तृत दृष्टि परास को सामने लाती है .थोड़ी चुप्पी के बाद ही सही इस तरह आना अच्छा लगा .अच्छी प्रस्तुति हेतु आभार !

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  4. स्‍वागत है। कविताएं पढ़ ली हैं। प्रतिक्रिया के लिए दुबारा आऊंगा।

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  5. कवितायें बहुत अच्छी हैं दोस्त, और हर आदमी रोटी के लिये काम करता है,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  6. बहुत जीवंत... बधाई हरेप्रकाश जी...

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  7. कविता मिली थी
    बहुत दिनों के बाद
    पढ़ी और समझी गई
    बहुत दिनों के बाद
    भूल चुके थे लोग जिसे
    वह याद आई
    बहुत दिनों के बाद

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  8. कविता मिली थी
    बहुत दिनों के बाद
    पढ़ी और समझी गई
    बहुत दिनों के बाद
    भूल चुके थे लोग जिसे
    वह याद आई
    बहुत दिनों के बाद

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  9. badhiya kavitayen, Hare ki kavitaon ki jo khas baat hai use is tarah kaha ja sakta hai unka kavi sare shatirpane ko jante hue bhi shatiron se muskara kar milta hai lekin apni painin ankhon se aar paar dekh raha hota hai. Sundar kavitaon ke liye Hare aur chhapne ke liye Subhash ji ka aabhar..khiladi dost to meri tarah bahuton ki pasandida kavita hai hi...Vimal Chandra Pandey

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  10. बहुत दिनों बाद मित्र हरेप्रकाश की कविताएं पढने को मिलीं। शायद वे लगातार लिख रहे हों लेकिन इधर कुछ समय से मैंने ही शायद पढना छोड रखा है।
    हरे की बातों से गुजरना मेरे लिए हमेशा एक सुखद अहसास की तरह होता है, चाहे वह गपशप में हो, या कविता में।
    'मायावी यह संसार' के लिए बधाई

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  11. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  12. हरेप्रकाश उपाध्याय की कवितांएं निजी अनुबूतियों की सुन्दर अभिव्यक्ति हैं।किसी साहित्यि फैसन के वशीभूत होकर तिखी गयी कविताएं उब से भरी और केवल चमत्कार उत्पन्न करने की गरज से लिखी होती हैं।शुक्र है कि ये कविताएं इनसे बची हुई हैं।

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  13. कविता, ओ कविता
    क्या तुम गरीब की जोरू हो...
    नहीं तो क्यों इतने सारे लोग
    तुम्हें भौजाई बनाए हुए हैं
    कोई तुम्हें चिकोटी काट रहा है

    वास्‍तव में हरे प्रकाश जी संभावनाशील कवि हैं, उनकी कविता में अवमूल्‍यन के प्रति आक्रोश तथा यथास्थितिवाद के खिलाफ परिवर्तन का स्‍वर उदघोषित हो रहा है। हरे प्रकाश जी कविता लिखते नहीं बल्कि कविता में जीते हैं

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  14. कविता को नयी दिशा में ले जाती ... नये केनवास को तलाश करती ... हरे प्रकाश जी की चारों रचनाएँ बहुत लाजवाब हैं ...

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  15. आपकी कविताएँ देखकर तो झूमता रहता हूँ लेकिन आपसे बात करने को तरस रहा हूँ। नंबर बदल दिया है क्या आपने?

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  16. निराश न हों हिन्दी के लेखक ग़रीब ही होते हैं (प्रकाशकों की कोई गारंटी नहीं )

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  17. पर कविता को फसल की तरह
    काटनेवाले कवियों
    एक न एक दिन तुम्हें हिसाब देना ही होगा... बहुत अच्छी कविताएँ हरेप्रकाश बाबू... अच्छा लगा... आपकी कविताई तेवर को मैं हमेशा सलाम करता हूँ...

    शेषनाथ पाणडेय...

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  18. हरेप्रकश नई पीढी के ससक्त हस्ताक्षरों में से हैं.... इनकी कविता इस पीढी के द्वन्द और संक्रमण की कविता होती है.... जैसे मायावी संसार में वे लिखते हैं...
    "जहां रहने का ठौर, मन वहां न लागे मितवा
    चल, यहां नहीं, यहां नहीं, यहां नहीं...
    पता नहीं कहां
    चल कहीं चल मितवा...
    अधिकांश चीजें मायावी हैं..."... यह आज के समय का द्वन्द ही है...

    माघ में गिरना कविता में कविता को माघ, सावन में पाना दरअसल खुद को पाना है... खिलाडी साथी भी बेहतरीन कविता है....

    उत्तर देंहटाएं
  19. हरेप्रकश नई पीढी के ससक्त हस्ताक्षरों में से हैं.... इनकी कविता इस पीढी के द्वन्द और संक्रमण की कविता होती है.... जैसे मायावी संसार में वे लिखते हैं...
    "जहां रहने का ठौर, मन वहां न लागे मितवा
    चल, यहां नहीं, यहां नहीं, यहां नहीं...
    पता नहीं कहां
    चल कहीं चल मितवा...
    अधिकांश चीजें मायावी हैं..."... यह आज के समय का द्वन्द ही है...

    माघ में गिरना कविता में कविता को माघ, सावन में पाना दरअसल खुद को पाना है... खिलाडी साथी भी बेहतरीन कविता है....

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  20. हरेप्रकाश जी की संवेदना ठीक जगह पर पहुँचने में कामियाब होती है....साधु साधु....

    उत्तर देंहटाएं
  21. कवितायें बहुत अच्छी हैं हरे प्रकाश जी, आपकी कविताई तेवर में अवमूल्‍यन के प्रति आक्रोश तथा यथास्थितिवाद के खिलाफ परिवर्तन का स्‍वर उदघोषित हो रहा है। बधाई...!

    उत्तर देंहटाएं
  22. चारों रचनाएँ बहुत अच्छी लगी।
    --
    पितृ-दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ।

    उत्तर देंहटाएं
  23. हम देर तक देखते रहे
    नहीं पता क्या-क्या
    उसकी आंखों के कोर भीग गए
    और मैं गिरा तो उठ न सका...

    जान-पहचान नये सिरे से हो रही थी।
    + + =
    जिनकी आवाजों के शोर के बजे नगाड़े
    उनसे भागे जिया
    जिनकी आवाज न आए
    उसी आवाज पर पागल पिया.
    + + +

    रहने दो कुछ गोपनीय प्रश्न और भी हो सकते हैं
    कुछ लोग मां कहते होंगे तुम्हें, बुरा मान जाएंगे
    जाओ जीयो अपनी जिंदगी, जाओ
    नदी की तरह, हवा की तरह...चाहे जैसे
    ---------------------------------------
    -------------------------------

    मन को छू गईं ये पंक्तियाँ!
    सरल, सहज और संवेदनशील ! अ-कृत्रिम !!
    बढ़िया लगा हरे प्रकाश जी!

    उत्तर देंहटाएं
  24. मित्रों, माफ करें, मुझे अभी बीच में नहीं आना चाहिए था लेकिन यह सोचकर कि मैंने अगर हरे को उनके ही मैदान में घसीटकर खड़ा करने की कोशिश की है तो एक कोशिश यह भी करूं कि उनके तरकश, उनके धनुष और उनके वाण जिन्होंने देखे हैं, वे यह परीक्षा भी करें कि वे पहले जैसे ही हैं या कुछ तेज हुए हैं या फिर भोथरे। हरे प्रकाश उपाध्याय की ये कविताएं एक अंतराल के बाद आयी हैं, इस अंतराल ने उन्हें अपने को नये रूप में पाने का अवसर तो दिया लेकिन शायद इस प्रयास में उन्होंने कुछ खोया भी। कविता से उनकी पहचान धुँधलायी मगर अच्छी कविता के लिए नये अनुभव हासिल करने में वे कामयाब भी हुए। खिलाड़ी दोस्त को छोड़ दें तो पहली कविता में वे अपनी पहचान तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। कविता सामने है पर भीतर समाती नहीं। उसकी आंखें नम हैं, कवि की भी। बहुत दिनों बाद कवि रचना के बहाने खुद को रच रहा है, कविता रचने की कोशिश कर रहा है। दूसरी कविता में उसका द्वंद्व, नयी परिस्थितियों की मायावी झलक को समझने की कवि की कोशिश देखी जा सकती है। तीसरी कविता बहुत साफ है। कविता और कवि के संबंध को न समझने वाले लोग जिस तरह कविता का अपमान कर रहे हैं, उसकी बोली लगा रहे हैं, वह किसी भी संवेदनशील कवि को आहत करने वाला है। मैं चाहता हूं कि हरे की कविताओं पर खुलकर बात हो। अरसे बाद वे लौटे हैं, तो उनका उत्साह बढ़ाया जाना चाहिए।

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  25. यह ब्रेक भी अच्‍छा रहा। सुभाष जी की दृष्टि एक अलग ही प्रकाश बिखेरती है।

    उत्तर देंहटाएं
  26. प्रेस जी की मेल जो मुझे मिली---
    प्रिय भाई
    आपने हरे प्रकाश उपाध्याय कि कवितायेँ पढने को दिन आभारी हूँ
    हरे प्रकाश उपाध्याय कि कविताओं कि स्वाभाविकता मुझे बहुत आकर्षित करती है
    माघ में गिरना कवित कि यह पंक्तियाँ --
    मैं रचता क्या उसे
    रचा तो मुझे जाना था...
    क्या कवि कर्म कि उस उचाई को साक्षात् नहीं करती हैं जहाँ कविता रची नहीं जाती अपितु वह कवि को रचनात्मकता प्रदान करती है और कवि उदात्त गुणों कि ओर अग्रसर होता है , अक्सर कवि सोचता है कि वह कविता को रच रहा है पर रचती तो कविता है कवि को
    संभवतः इसलिए कवि चेतावानिपूर्वक कहता है
    पर कविता को फसल की तरह
    काटनेवाले कवियों
    एक न एक दिन तुम्हें हिसाब देना ही होगा..
    Dr. Prem Janmejai

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  27. सुभाष जी, आप बहुत सारे नेक कर्म करते हैं और मैं समझता हूँ कि इन अद्भुत कविताओं से हम सभी लोगों को रूबरू कराना इन्ही नेक कर्मों की श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.
    मैं इन चार कविताओं को पढ़ने के बाद आराम से यह बात कह सकता हूँ कि एक विधा के रूप में कविता (या नयी कविता) किसी भी प्रकार से कमतर नहीं है, ना ही कविता की आवश्यकता और जरूरत ही हम लोगों के लिए कम हो रही है.
    यदि कोई जरूरत है तो मात्र इतना ही कि लिखने वाला व्यक्ति हरे प्रकाश उपाध्याय हों जो कविता नहीं लिखें, अपने मन की भावनाओं को उड़ेल दें और साथ ही इस बात का भी भरपूर ख्याल रखें कि उनकी बात उचित ढंग से और आसानी से पाठकों को संप्रेषित हो रही है.
    पुनः आपको और हरे प्रकाश जी को बहुत धन्यवाद.

    अमिताभ
    नेशनल पुलिस अकादमी, हैदराबाद से

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  28. charon kavitayen padhin achchhi lageen khaskar 'Magh men girana' aur 'kavita ke bare men ek badbadahat'. Kvita ko fasal ki tarah katane wale kaviyo ek na ek din tumhen hisab dena padega. Achchi shabd rachana hai.Badhai Hare ji ko bhi aur aapko bhi.

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  29. मेरी हरे प्रकाश जी से जो मुलाकात हुई थी उस दौरान वे जितने सरल और सहज दिखे थे, उनकी कविताओं में उतनी ही गहराई और संवेदनाओं की संश्लिष्टता है जो केवल उन्ही कवियों में हो सकती है जो बहुत अधिक गंभीरता से चीज़ों को देखते और समझते हैं.
    मैं यही चाहूंगी कि आगे भी हरे प्रकाश जी की कविताओं का ऐसा ही स्वर बना रहे.

    नूतन ठाकुर

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  30. हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताएँ भले ही अंतराल के बाद आयी हों मगर कुछ खोया है ऐसा नहीं लगता। शायद उन्होंने एक लंबी छलांग लगाने के लिये यह समय अपने को तैयार करने में लगाया। मैंने उनकी सब कविताएँ तो नहीं पढ़ी है पर जहाँ पहले वे सहज और सरल अभिव्यक्ति के कारण आकर्षित करते थे अब उसमें जीवन के अनुभव की संपन्नता व वैचारिक गहनता भी जुड़ने लगी है। और इसके लिये वे बधाई के पात्र हैं।

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  31. हरे भाई की ये कविताएं वैसी ही हैं, जैसी कविताओं के लिए उनकी पहचान बनी है। धारदार, असरदार, कपट को नंगा करतीं। बहुत अच्छा लगा उन्हें पढ़कर एक गैप के बाद्। प्रस्तुति के लिए धन्यवाद सुभाष जी।
    "पर कविता को फसल की तरह
    काटने वाले कवियों
    एक न एक दिन तुम्हें हिसाब देना ही होगा..." वाह क्या चोट है! बिरादरीवाद बिलकुल नहीं।

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  32. "जी नहीं रहे हम
    बस अपनी उम्र के घंटे-पल-छिन गिन रहे बस
    और इसी गुणा-भाग में एक लंबी उम्र गुजार कर
    जो गए
    उनके लिए मर्सिया पढ़ रहे हैं हम.."
    .....................
    "खेल में पारंगत दोस्त
    खेल में अनाड़ी दोस्त से ही
    अक़सर खेलते हैं खेल!"

    बेहतरीन कविताएँ। बधाई हरेप्रकाश भाई। सुभाष जी आभार इन्हें यहाँ पोस्ट करने के लिए।

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  33. सुभाष राय21 जून 2011 को 11:08 am

    प्रसिद्ध प्रवासी रचनाकार देवी नागरानी जी ने मेल पर अपनी बात भेजी---
    Manney Shubash ji
    aapke blog par bahut si aisi samgri se robaroo hote hain ki sagar par karna mushkil ho jata hai.....
    सावन के बाद माघ में
    एक पेड़ के नीचे
    पत्ते बुहार रही थी
    चूल्हा जलाना था उसे शायद
    हमने उलाहने नहीं दिए
    उसने देखा एक नजर मेरी तरफ
    मैं थोड़ी दूर पर शीतल हवा में कांपते हुए पत्तों सा
    ठिठुरता अपने गिरने की प्रतीक्षा करते हुए
    उसे देखता रहा भौंचक
    Soch ke udaan parindo ke par katrane mein saksham hui hai. Ati sunder shabdon ki shilpkari.
    yeh tippni post karne mein jane kyon nakamyaab rahi. Upadhyay ji ko padhkar bahut hi accha laga.
    sadar
    devi nangrani

    उत्तर देंहटाएं
  34. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  35. हरे प्रकाश की चारों कविताएं कई कई बार पढ़ डाली हैं। सुभाष भाई ने लिखा है कि बदहवासी में एक साथ लिखी तीन कविताएं हरे प्रकाश ने भेज दीं। यहां यह स्‍पष्‍ट नहीं हो रहा है कि कविताएं बदहवासी में लिखी गईं थीं, या भेजी गईं थीं। असल में यह सवाल मेरे मन में इसलिए भी उठ रहा है कि उनकी पहली तीन कविताओं में एक तरह की बदहवासी नजर आ रही है। कवि शायद बहुत आश्‍वस्‍त नहीं हुआ है कविता लिखते हुए। उसे संभवत: कविताओं पर कुछ और काम करने की जरूरत थी।
    *
    बावजूद इसके कि कविताओं में उठाए गए विषय नए हैं, पर कविताओं में पैनापन नजर नहीं आता। कविताएं चौंकाती नहीं हैं।

    पहली कविता इस अर्थ में सार्थक लगती है कि बहुत दिनों बाद कवि जब अपनी कविता में लौटता है तो कुछ इसी तरह से सोचता है। मुझे याद है कि मैंने भी एक लंबे अंतराल के बाद जब फिर से कविता लिखना शुरू किया था तो कुछ इसी तरह के भाव उभरे थे। पर हरे कि यह कविता अंत तक आते आते अपना मतंव्‍य बदल देती है, वह कुछ और भी कहने लगती है।

    दूसरी कविता मायावी यह संसार आपाधापी को समेटने का प्रयत्‍न करती हुई नजर आती है,पर मुझे लगता है कवि इसे समेटने में थोड़ा पिछड़ गया है।

    तीसरी कविता असल में उस नारे से आगे नहीं बढ़ती जिसका एक तरह से हरे विरोध कर रहे हैं। मेरा मानना है कि हरे को इस तरह की अभिव्‍यक्ति से शायद बचना चाहिए।

    चौथी कविता प्रकाशित संकलन से सुभाष जी ने ली है, दोस्‍तों के बारे में बिलकुल अलग नजरिए से रूबरू कराती है। हमने शायद दोस्‍तों को इस नजर से देखा ही नहीं। पर यहां भी लगता है कि जैसे हरे कुछ कहते कहते रूक जा रहे हैं। पूरी तरह खुल नहीं रहे हैं वे।

    उत्तर देंहटाएं
  36. हरे उपाध्याय की कवितायेँ एकदम नयी पेंटिंग जैसी हैं .नए ढंग की बिलकुल ताज़ी हवा की तरह .. आगे और भी पढ़ने की उम्मीद में .. बहुत बधाई..

    उत्तर देंहटाएं
  37. प्रिय राजेश, आजकल हरे कुछ बदहवास से हैं, अच्छी बात ये है कि इस बदहवासी के बावजूद वे बदहोशी में नहीं गये, अन्यथा कविता होती ही नहीं। उनकी बदहवासी का कारण मैं हूं और वे होश में रहते हैं, इसका महाकारण भी मैं ही हूं। दरअसल मैंने उनके सूली पर चढ़ने की तारीख घोषित कर रखी थी, इतना ही नहीं फंदा लिये बैठा भी था। रोज तलब करते हुए कि कविताएं दो भाई। मांग पर कविता लिखना आसान नहीं होता पर यह देखना होता है कि मांग किसकी तरफ से है, कितनी प्यारी है, कितनी नाजुक है। दिन करीब आता गया, बैठने का मौका नहीं, मांग ठुकराने की हिम्मत नहीं। फिर बदहवासी से कोई कैसे बचा सकता था। मगर कविता लिखनी थी, कोई झाड़ू तो लगाना नहीं था, सो हरे को अपना होश भी बनाये रखना पड़ा। कुल मिलाकर मैं तो इस बदहवास हरे को भी पसंद करता हूं।

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  38. कवि का परिचय बहुत अच्छा लगा और कविताएँ भी बेजोड़ हैं . आप दोनों को मेरी हार्दिक बधाई

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  39. सुभाष भाई चलिए इतना तो स्‍पष्‍ट हो गया कि हरे इन दिनों कुछ बदहवास हैं। जाहिर है उनकी कविता में भी बदहवासी नजर आएगी ही। सच तो शायद यह है कि कौन बदहवास नहीं है। कुछ होते हैं जो बदहवासी के बावजूद अपने को इस तरह से व्‍यक्‍त करते हैं कि सब कुछ ठीक ठाक है, और कुछ होते हैं कि सब कुछ ठीक ठाक होने के बावजूद इस तरह प्रस्‍तुत हैं होते हैं जैसे सारी दुनिया का बोझ उन पर ही है। अच्‍छी बात यह है कि हरे इन दोनों श्रेणियों में नहीं आते हैं, वे जैसे हैं वैसे ही अभिव्‍यक्‍त हो रहे हैं। यह एक ईमानदार कोशिश है।
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    मेरी पूर्व टिप्‍पणी का यह अर्थ कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि हरे की कविता में ऐसा कुछ नहीं है जो आकर्षित नहीं करता या जिसे सराहा नहीं जाए। मैं रस्‍मअदायगी वाली टिप्‍पणियां नहीं करता हूं यह आप भी जानते हैं। क्‍योंकि उन टिप्‍पणियों से न तो रचनाकार को और न ही पाठक को कुछ प्राप्‍त होता है।
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    आपकी टिप्‍पणी से एक और बात उभरती है (यह हरे जी को भी समझनी चाहिए और अन्‍य कवियों को भी) कि कविता कभी भी मांग पर नहीं लिखी जा सकती। अगर लिखी जाएगी तो उसका हाल वही होगा जिसका विरोध हरे खुद अपनी कविता में कर रहे हैं।
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    मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि झाड़ू लगाना ऐसा काम है जिसमें होश की जरूरत नहीं होती है। वास्‍तव में झाड़ू लगाते समय होश ठिकाने रखने ही पड़ते हैं वरना आपका काम का और बिना काम का सब कुछ समेट कर फेंक देंगे। और मेरे हिसाब से कविता भी झाड़ू लगाती है, दिमागों में। वह दिमागों में जमा कचरे और जालों को निकाल फेंकती है। अंग्रेजी में शायद इसे ही हम ब्रेनवाश कहते हैं। हिन्‍दी में इसके लिए झाड़ू लगाना ही उपयुक्‍त होगा।
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    जहां तक पसंदगी का सवाल है तो पसंद तो हम व्‍यक्ति को करते हैं और कभी कभी उसकी बदहवासी को भी।

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  40. सुभाष राय22 जून 2011 को 1:59 pm

    मेरी भावुकता पर झाड़ू लगाकर तुमने अच्छा किया. बातें सही हैं।

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  41. हरेप्रकाश की कविताएं अपने शिल्पलोक में नए आस्वादन के साथ उपस्थित होती हैं. कविताओं में ताज़गी तो है ही, नई दृष्टि भी है लेकिन सबसे बड़ी बात यह है की आपने हरेप्रकाश की कवितायें अपने ब्लॉग पर दी. ऐसा बहुत कम होता है की एक संपादक अपने मातहत को इतना महत्त्व दे. हरे को छापना आपका बड़प्पन है. यह दर्शाता है के आप वैसे संपादक नहीं है, जैसे इस टुच्चे समय में बहुत से नज़र आते रहते है. आप का यह औदार्य दूसरों के लिए सबक है, जो अपने अधीन काम करने वाले उप संपादकों से ईर्ष्या करते है. उनका रास्ता रोकते हैं. आप उनमें से नहीं है. यह बड़ी बात है. आजकल ऊपर वाला ऐसे संपादको का उत्पादन ही बंद कर चुका है. अपवाद के रूप में आप है, तो संतोष होता है.

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  42. सत्येंद्र25 जून 2011 को 1:28 am

    मुझे नहीं लगता कि हरे कविता रचते हैं
    साथ काम करते हुए लगा जैसे कविता
    माध्यम बनाती है उन्हें अपने प्रकट होने का
    कविता उनके लिए ड्राइंग रूम में रखा शोपीस नहीं
    वास्तविकता है जीवन की जो प्रकट होती है विभिन्न रूपों मे
    कविता की नहीं जाती, कविता उपजती है
    जिसके माध्यम होते हैं हरे जैसे लोग
    यह तीनों कविताएं उसी का प्रतीक हैं
    कविता की कसौटी पर खरे उतरते हैं हरे
    ठीक उसी तरह जैसे
    राजनीति की कसौटी पर खरे थे
    लाल बहादुर शास्त्री
    राजनीति इसलिए कि इसके बारे में कहा जाता है-
    कैतको सयानो जाए काजर तो लागिहें ही लागिहें
    पर लालबहादुर अकेला ऐसा व्यक्तित्व है जो राजनीति में भी बेदाग है
    हरे की कविताओं की तरह।
    -सत्येंद्र

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  43. मेरे विचार में हरे प्रकाश जी उन लोगों में से हैं, जो हर काम डूब कर करते हैं, चाहे वह कविता लिखना हो या फिर पेज बनाना। कई बार ऐसा हुआ है कि मैं उससे मिलने पहुंचा, और उन्‍होंने छमा मांग ली कि अभी पेज जाना है, फिर कभी आइएगा। एक बार तो सुभाष जी आपके ही पास बैठा हुआ था और आपके बुलाने पर भी वे आए तो जरूर, फिर काम का हवाला देकर चले गये। मुझे ऐसे लोग प्रेरित करते हैं।
    और हां, उनकी कविता भी गहरे अर्थों को बयां करती हैं। उन्‍हें समझने के लिए एकाग्रता की जरूरत होती है, अन्‍यथा ऊपरी तौर पर देखने पर लोग कुछ का कुछ समझ लेते हैं।

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  44. सुभाष जी, ब्‍लॉग खोलने पर काफी देर तक फॉलोअर विजेट नहीं दिखता है, इसीलिए मुझे कन्‍फ्यूजन हुआ। हो सकता है वह सर्वर की प्राब्‍लम हो, क्‍योंकि अक्‍सर ब्‍लागों से यह विजेट गायब भी रहता है। इसीलिए मुझे लगा कि इस ब्‍लॉग पर विजेट नहीं लगा है।

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  45. हरे प्रकाश जी की कई कविताएँ मैं पहले भी पढ़ चुकी हूँ...। बिना भारी-भरकम शब्दों के प्रयोग के, सहज-सामान्य भाषा के बावजूद वे अपने में डुबो लेने की क्षमता रखती हैं...। अपनी रचना प्रक्रिया तो उन्होंने स्वयं बयान कर दी- वे कविता को नहीं, कविता उन्हें रचती है...और यही उनकी रचनाओं को सार्थक बनाती है...।
    मेरी बधाई और आभार...।
    प्रियंका गुप्ता

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  46. वाह.... खिलाड़ी दोस्त... शानदार कविता
    बहुत खूब

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  47. हरे प्रकाश जी की कविताएँ शिल्प और कथ्य में अद्भुत हैं। कविताओं में सामजिक मूल्यों के साथ-साथ साहित्यिक मूल्यों के क्षरण पर चिन्ताएँ हैं। संतोष और राहत इसस बात को लेकर भी है कि अवमूल्यन की आँधी में कोई तो है जो दिया जलाकर आँधी की चुनौतियों को स्वीकार कर रहा है। हरे प्रकाश जी की कविताओं में आस्वादनीय इतना कुछ है कि पाठक को तृप्ति अवश्य होती है। अच्छी और मूल्याधारित सृजन के लिए बधाई।

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  48. हरे प्रकाश जी की कविताएँ शिल्प और कथ्य में अद्भुत हैं। कविताओं में सामजिक मूल्यों के साथ-साथ साहित्यिक मूल्यों के क्षरण पर चिन्ताएँ हैं। संतोष और राहत इसस बात को लेकर भी है कि अवमूल्यन की आँधी में कोई तो है जो दिया जलाकर आँधी की चुनौतियों को स्वीकार कर रहा है। हरे प्रकाश जी की कविताओं में आस्वादनीय इतना कुछ है कि पाठक को तृप्ति अवश्य होती है। अच्छी और मूल्याधारित सृजनात्मकता के लिए बधाई।

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  50. जबर्दस्त कविताएँ। 'कविता' का मानवीकरण और 'खिलाड़ी दोस्त' सम्बन्धी कविता, आपकी उम्दा कविताएँ हैं। पढ़ कर ऐसा लगता है, जैसे यह कविताएँ मेरे जीवन से जुड़ी कविताएँ हैं।

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  51. हरे प्रकाश हिंदी के खिलाड़ कवि हैं. उनकी शैली असाधारण है. यहां प्रस्तुत सभी कविताएं बेहतरीन हैं. साधुवाद.

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