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बुधवार, 18 मई 2011

चंद्रभान भारद्वाज की ग़ज़लें

चंद्रभान भारद्वाज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. गजलों की दुनिया में उनका एक बड़ा नाम है. ४ जनवरी १९३८ को इंदौर में जन्मे श्री भारद्वाज ने अपनी पढ़ाई-लिखाई आगरा विश्वविद्यालय और हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से पूरी की. हिंदी गजलों को नयी ऊंचाई देने में उनके योगदान को सभी लोग स्वीकार करते हैं. वही सीधी-सादी बातें, जो सबके अनुभव में रहतीं हैं, भारद्वाज जी की कलम का स्पर्श पाते ही इस तरह चमक उठतीं हैं कि पाठक सम्मोहित हुए बगैर नहीं रहता. यहाँ प्रस्तुत हैं चंद्रभान भारद्वाज की चार गजलें---                           

                               (१)


बुझे दीये में भी इक बार रोशनी होती
किसी के नाम से यदि ज़िन्दगी जुड़ी होती

कड़कती धूप में तपता भले ही सिर अपना
मगर पाँवों के नीचे आज चाँदनी होती

भले मौसम बहारों का कभी नहीं आता
किसी की चाह की बगिया मगर हरी होती 

नज़र में दूर तक फैला सदा अँधेरा ही
मगर विश्वास की कोई किरण दिखी होती

डगर में पाँव के छाले कहीं पे सहलाने
किसी भी पेड़ की इक छाँह तो मिली होती

कभी  ये ज़िन्दगी ऐसे न धुँधवाती रहती
सुलगने  को कहीं थोड़ी हवा रही होती

जगह देती न 'भारद्वाज' को अगर दुनिया
नई दुनिया किसी दिल में अलग बसी  होती  

  (२)

फूस पर चिनगारियों का नाम हो जैसे
ज़िन्दगी दुश्वारियों का नाम हो जैसे

पेड़ जब होने लगे हैं छाँह के काबिल
हर तने पर आरियों का नाम हो जैसे

आह आँसू  करवटें तड़पन प्रतीक्षाएँ
प्यार ही सिसकारियों का नाम हो जैसे

कुर्सियों पर लिख रहे हैं लूट के किस्से
हर डगर पिंडारियों का नाम हो जैसे

नाम अपना भी वसीयत में लिखा था कल
आज सत्ताधारियों का नाम हो जैसे

दुश्मनी तो दुश्मनी है क्या कहें उसकी
यारियाँ गद्दारियों का नाम हो जैसे

लोग 'भारद्वाज' कहते हों भले जनपथ
पर वो अब अतिचारियों का नाम हो जैसे


 (३)

राह में जिसकी जलते शमा की तरह
वो गुजरता है पागल हवा की तरह

छलछलाते हैं आँसू अगर आँख में
पीते रहते हैं कड़वी दवा की तरह

करना मुश्किल उसे धड़कनों से अलग
प्राण लिपटे तने से लता की तरह

प्यार का पुट न हो ज़िन्दगी में अगर
तो वो लगती है बंजर धरा की तरह

इक नियामत सी लगती थी जो ज़िन्दगी
कट रही एक लम्बी सजा की तरह

उड़ गए संग झोंकों के बरसे बिना
जो  घुमड़ते रहे थे घटा की तरह

एक पत्थर की मूरत पसीजी नहीं
पूजते हम रहे देवता की तरह

हमने प्रस्ताव ठुकरा दिया इसलिए
प्यार भी मिल रहा था दया की तरह

सूझता ही न अब कुछ 'भरद्वाज' को
प्यार सिर पर चढ़ा है नशा की तरह 

(४)

आदमी की सिर्फ इतनी सी निशानी देखना
आग सीने में जली आँखों में पानी देखना

जब किसी को प्यार की कोमल कसौटी पर कसो
बात में ठहराव नज़रों में रवानी देखना

आँख के आगे घटा जो सिर्फ उतना सच नहीं
आँख के पीछे घटी वह भी कहानी देखना

वक़्त ने कितनी बदल डाली है सूरत आपकी
एलबम में अपनी तसवीरें पुरानी देखना

देखना क्या नफरतें क्या गफ्लतें क्या रंजिशें
जो किसी ने तुम पे की वह मेहरबानी देखना

गैर के दुःख दर्द अपनी खुशियाँ हर दम बाँटना
हर कदम पर ज़िन्दगी सुंदर सुहानी देखना

वक़्त 'भारद्वाज' अपने आप बदलेगा नज़र
बेटियों में शारदा कमला शिवानी देखना

संपर्क--०९८२६०२५०१६
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शनिवार १८ जून को साखी पर 
हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताएं

19 टिप्‍पणियां:

  1. वरिष्ठ और विद्वान् साहित्यकारों की महफिलों में
    चन्द्र भान भारद्वाज जी का नाम
    बड़े ही अदब और अहतराम से लिया जाता है
    उन्हें पढ़ना
    हर बार एक नया-सा तज्र्बा रहता है..
    हमेशा इक नए अहसास से रु ब रु होना ही होता है

    इस अनुपम प्रस्तुति के लिए
    आपको आभार कहता हूँ .

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  2. चंद्रभान भारद्वाज की ग़ज़लें पढ़वाने के लिए आभार!

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  3. आपकी घर (ब्लॉग) वापसी पर सुखद आश्चर्य हुआ, चन्द्रभान जी की गज़लें समय और जीवन की सामानांतर धुरी पर संतुलन बनाती नज़र आती है और यही उनकी ग़ज़लों की सबसे बड़ी विशेषता है, एक सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति हेतु आपको पुन: बधाईयाँ !

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  4. बाद की तीन गजलें पुर असर हैं, लेकिन पहली गजल में कुछ छूटता सा लग रहा है, शायद मुद्रण की त्रुटि हो.
    साखी की फिर से वापसी पर बधाई.
    कड़कती धूप में तपता भले ही सिर अपना
    मगर पाँवों के नीचे आज चाँदनी होती

    नज़र में दूर तक फैला सदा अँधेरा ही
    मगर विश्वास की कोई किरण दिखी होती

    कभी ये ज़िन्दगी ऐसे न धुधवाती रहती
    सुलगने को कहीं थोड़ी हवा रही होती

    उत्तर देंहटाएं
  5. लोग 'भारद्वाज' कहते हों भले जनपथ
    पर वो अब अतिचारियों का नाम हो जैसे

    जय हो..

    आदमी की सिर्फ इतनी सी निशानी देखना
    आग सीने में जली आँखों में पानी देखना


    सुभानअल्लाह
    अति सुन्दर

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  6. सुभाष जी , चंदर भान साब !
    प्रणाम !
    सभी गज़ले उम्दा है , अच्छे शेर . सभी गज़ले एक उम्मीद . एक विश्वास प्रदान करने वाली है अपने शेरों में .जो मन को सुकून देते है .साधुवाद
    सादर !

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  7. जब किसी को प्यार की कोमल कसौटी पर कसो
    बात में ठहराव नज़रों में रवानी देखना
    सभी गज़लें यूँ तो अच्छी लगीं, और कई शेर यहाँ दिये भी जा सकते हैं: किन्तु ऊपर डी गई पंक्तियाँ मन में पैठ बना गई. इस हेतु भारद्वाज जी तथा राय साहब - आप दोनों को बधाई

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  8. देश-व्यापी पत्र-पत्रिकाओं में तो चन्द्रभान भारद्वाज जी को ख़ूब पढ़ा है, आज ‘साखी’ पर पढ़कर भी सुखद अनुभूति हो रही है। मैं सदैव भारद्वाज जी का प्रशंसक रहा हूँ।

    एक-से-बढकर-एक अश्‍आर...हार्दिक बधाई!

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  9. फूस पर चिनगारियों का नाम हो जैसे
    ज़िन्दगी दुश्वारियों का नाम हो जैसे
    maanney Chandrabhan ji ko hamesha padhti rahi hoon, har bimb zindagi se jodta hua, man ki tahon ko jhakjodhta, man se nata jodta hua lagta hai.matle ka sunder agaaz, tammam sher apne aap mein mukamil bimb kheench rahe hai. sunder abhivyakti ke liye Saakhi ka abhaar

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  10. आदरणीय चन्द्र भान जी ग़ज़लें महज़ ग़ज़लें नहीं हैं जीवन जीने की प्रेरणायें हैं...ज़िन्दगी के चटक और धूसर रंगों को वो बेहद सादा ज़बान में अपने अशआरों में ढाल देते हैं. मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा है और लगातार सीखता रहता हूँ...अपनी लेखनी से वो हमेशा चमत्कृत कर जाते हैं...उनकी चारों ग़ज़लें बेहद खूबसूरत हैं और मेरी कही बात की तस्दीक करती हैं. इश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वो सालों साल स्वस्थ रह कर इसी तरह अपनी ग़ज़लों से हमें राह दिखाते रहें.

    नीरज

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  11. हमने प्रस्ताव ठुकरा दिया इसलिए
    प्यार भी मिल रहा था दया की तरह
    *
    चन्‍द्रभान जी का यह एक शेर ही यह बता देता है कि वे आमजन के खास शायर हैं। शायर मोहब्‍बत भी इज्‍जत और खुद्दारी के साथ करना चाहता है। वह किसी के रहमोकरम पर जिंदा नहीं रहना चाहता। यह भी नोट करने वाली बात है कि उनकी ग़ज़लों में मायूसी के साथ साथ उम्‍मीद भी है। और जो शायद उम्‍मीद बंधाए वह असली है।
    तो ऐसे उम्‍मीद बंधाने वाले शायर को सलाम।

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  12. Subhash ji ,aaj achanak aapke priy blog par
    jaane kaa suavsar milaa hai. Bhardwaj ke sabhee
    gazalen bade manoyog se padh gayaa hoon .
    Achchhe bhavon ke liye unhen badhaaee aur
    shubh kamna. Vah pahlee gazal mein is bahar
    121 21 122 1 2 12 22 ko theek tarah se nibaah
    nahin paaye hain . Kaee misre bewazan hain.

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  13. Bhai Pran Sharma ji, namaskar,
    Apni ghazal par aapki tippadi padhakar sukhad laga.Apne bahar ke baare men jo arkaan diye hain ve sahi nahin hasin. Is ghazal ke arkan nimnanusar hain. inke anusar aap padhenge to ghazal sahi bahar men lagegi.
    bujhe deeye men bhee ik baar roshanee hoti
    1 2 2 2 1 2 2 2 1 2 1 2 2 2
    ---------- ------------- --------- ---
    punah aapki tippadi ke liye abhari hoon
    Chandrabhan Bhardwaj

    उत्तर देंहटाएं
  14. Priy Bhardwaj ji , aapke bataaye arkaan ke
    hisab se aapka ye misra " bhale bahaar kaa mausam kabhee nahin hota " wazan mein nahin
    hai . ye misra 121 21 122 12 12 22 mein hai.
    aapkee saaree gazal inheen ruknon mein honee
    chaahiye thee . kripya sochiyega .

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  15. Bhai Pran Sharma ji, namaskar,
    Maine bahr ke jo arkaan bataye the ve sahi hain. Apne jis misare men galati batai hai wah bhi sahi batai hai. Asal men is misare ko likhane men mere se hi galati ho gai hai. yah misra neeche likhe anusar hai-
    bhale mausam baharon ka kabhi nahin aata
    1 2 2 2 1 2 2 2 1 2 1 2 2 2
    ----------- --------- --------- ---
    Apki batai hui galati ke liye apka abhari hoon.
    Bhai Subhash rai ji se nivedan karoonga ki is galati ko sudharne ki kripa karen. Galati ko batane ke liye apka punah abhari hoon.
    Chandrabhan Bhardwaj

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  16. मित्रों, आदरणीय भारद्वाज जी ने कुछ संशोधन सुझाया है. वह कर दिया गया है. असुविधा के लिए क्षमा चाहूँगा. भारद्वाज जी का पत्र इस प्रकार है.

    भइ सुभाष राय जी , नमस्कार,
    साखी में मेरी जो ग़ज़लें आपने प्रकाशित की हैं
    उनमें पहली गज़ल के एक मिसरे में कुछ गलती
    रह गई है जिसकी ओर भाई प्राण शर्मा जी ने संकेत किया
    है। असल में यह गलती मेरे लिखने में रह गई थी। यदि हो सके तो इस
    मिसरे को सुधारने की कॄपा करें।मिसरा निम्नानुसार है-
    'भले मौसम बहारों का कभी नही आता '
    'किसी की चाह की बगिया मगर हरी होती'
    सुधारने के बाद अगर हो सके तो मुझे सूचित करने की क्रिपस करें।
    धन्यवाद सहित
    चन्द्रभान भारद्वाज

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  17. सभी गज़लों को पढना सुखद रहा । दूसरी गज़ल तो क़माल की है ।

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  18. चंद्रभान भारद्वाज जी वाकई किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. गजलों की दुनिया में उनका एक बड़ा नाम है. कोई शक नहीं की हिंदी गजलों को नयी ऊंचाई देने में उनके योगदान आदरयोग्य है... प्रस्तुत चारों ग़ज़ल अपने आप में लाजवाब हैं. शानदार प्रस्तुति के लिए आभार.

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