अभियान के साथी

शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2010

नीरज गोस्वामी की गजलें


  आप जानते हैं नीरज गोस्वामी को? अगर आप की दिलचस्पी शायरी में, कविता में है तो जरूर जानते होंगे| चौदह अगस्त उन्नीस सौ पचास को पठानकोट, जम्मू में जन्मे| वे खुद कहते हैं,  याने हम ताज़ा ताज़ा सठियाये हैं| स्थाई निवास जयपुर में|  इंजीनियरिंग  की पढ़ाई की, वर्तमान में भूषण स्टील लिमिटेड खोपोली, खंडाला के पास, में वाइस प्रेसिडेंट के पद पर कार्यरत हैं| साहित्य, सिनेमा, संगीत ,क्रिकेट, भ्रमण में रूचि है| साखी के लिए जब मैंने नीरज जी से परिचय माँगा तो उन्होंने सिर्फ इतना ही भेजा| मुझे लगा लोग कुछ और जानना चाहेंगे तो मैंने विस्तार से लिखने को कहा| पढ़िए उन्होंने क्या लिखा... भाई जान परिचय में क्या जानना चाहते हैं ये तो बताइए और वैसे भी परिचय पढ़ने की फुर्सत किसे होती है आज के ज़माने में। कोई फोटो देख ले वो ही गनीमत समझो फिर भी अगर आप कुछ विशेष जानकारी चाहते हैं तो लिख भेजें। अब और क्या परिचय दें सिवा इसके कि  हमने शायरी अभी  पिछले तीन साल से लिखनी शुरू की जबकि पढ़नी पचास साल पहले ही कर दी थी। इस लायक कभी कुछ लिखा नहीं कि  उसे किसी रिसाले या अखबार में छपने के लिए भेजते। किताब छपवाने जैसी खतरनाक बात कभी सोची नहीं, ये सोच कर कि  अगर कभी खुदा न खास्ता छप गयी तो पढ़ेगा कौन? पहले जब गज़लें लिखता था तो अपनी एक मात्र बीवी की शराफत का नाजायज फायदा उठा कर उसको सुनाया करता था, क्यूँ कि  बेटा बहू  ने पहले ही कह दिया था कि  पापा गाली दे दो लेकिन ग़ज़ल मत सुनाना। गरीब मजलूम बीवी के हमारी गज़लें सुनते-सुनते जब कान पकने लगे, सब्र का बाँध टूटता नज़र आया और बात तलाक तक पहुँचने की नौबत आ गयी तो एक शरीफ मित्र ने समझाया कि  भाई काहे नाहक सीधी-सादी एक मात्र बीवी की जान के पीछे पड़े हो| तुम्हारी ग़ज़लें यूँ तो कोई सुनेगा नहीं| ऐसा करो एक ब्लॉग खोलो और उस पर डाल दो| अगर कोई पढ़ कर नाराज़ भी हुआ तो ज्यादा से ज्यादा एक आध गाली लिख देगा लेकिन तुम्हारा घर तो नहीं टूटेगा। तब से अब तक ब्लॉग के माध्यम से भडांस निकल रहे हैं। और क्या बताएं...? भाई मैं तो इस भड़ास में गजल देखता हूँ| लीजिये उनकी भड़ास के चार अदद टुकड़े पेश हैं---
१.

मान लूँ मैं ये करिश्मा प्यार का कैसे नहीं
वो सुनाई दे रहा सब जो कहा तुमने नहीं

इश्क का मैं ये सलीका जानता सब से सही
जान दे दो इस तरह की हो कहीं चरचे नहीं

तल्ख़ बातों को जुबाँ से दूर रखना सीखिए
घाव कर जाती हैं गहरे जो कभी भरते नहीं

अब्र लेकर घूमता है ढेर-सा पानी मगर
फ़ायदा कोई कहाँ गर प्यास पे बरसे नहीं

छोड़ देते मुस्कुरा कर भीड़ के संग दौड़ना
लोग ऐसे ज़िंदगी में हाथ फिर मलते नहीं

खुशबुएँ बाहर से 'नीरज' लौट वापस जाएँगी  
घर के दरवाज़े अगर तुमने खुले रक्खे नहीं

२.
जड़ जिसने थी काटी प्यारे
था अपना ही साथी प्यारे

सच्चा तो सूली पर लटके
लुच्चे को है माफी प्यारे

उल्टी सीधी सब मनवा ले
रख हाथों में लाठी प्यारे

सोचो क्या होगा गुलशन का
माली रखते आरी प्यारे

इक तो राहें काटों वाली
दूजे दुश्मन राही प्यारे

भोला कहने से अच्छा है
दे दो मुझको गाली प्यारे

मन अमराई यादें कोयल
जब जी चाहे गाती प्यारे

तेरी पीड़ा से वो तड़पे
तब है सच्ची यारी प्यारे

तन्हा जीना ऐसा "नीरज"
ज्यूं बादल बिन पानी प्यारे


गूगल से साभार 
 ३.
तीर खंजर की ना अब तलवार की बातें करें
जिन्दगी में आइये बस प्यार की बातें करें

टूटते रिश्तों के कारण जो बिखरता जा रहा
अब बचाने को उसी घर बार की बातें करें

थक चुके हैं हम बढ़ा कर यार दिल की दूरियां
छोड़ कर तकरार अब मनुहार की बातें करें

दौड़ते फिरते रहें पर ये ज़रुरी है कभी
बैठ कर कुछ गीत की झंकार की बातें करें

तितलियों की बात हो या फिर गुलों की बात हो
क्या जरुरी है कि हरदम खार की बातें करें

कोई  समझा ही नहीं फितरत यहां इन्सान की
घाव जो देते वही उपचार की बातें करें

काश 'नीरज' हो हमारा भी जिगर इतना बड़ा 
जेब खाली हो मगर सत्कार की बातें करें

४.
दर्द दिल में मगर लब पे मुस्कान है
हौसलों की हमारे ये पहचान है

लाख कोशिश करो आके जाती नहीं
याद इक बिन बुलाई सी महमान है

खिलखिलाता है जो आज के दौर में
इक अजूबे से क्या कम वो इंसान है

ज़र ज़मीं सल्तनत से ही होता नहीं
जो दे भूखे को रोटी, वो सुलतान है

मीर, तुलसी, ज़फ़र, जोश, मीरा, कबीर
दिल ही ग़ालिब है और दिल ही रसखान है

पांच करता है जो, दो में दो जोड़ कर
आजकल सिर्फ उसका ही गुणगान है

ढूंढ़ता फिर रहा फूल पर तितलियां
शहर में वो नया है या नादान है

गर न समझा तो नीरज बहुत है कठिन
जान लो ज़िन्दगी को तो आसान है

संपर्क
neeraj1950@gmail.com

ब्लाग 
http://ngoswami.blogspot.com/

फोन : 9860211911



पता: नीरज गोस्वामी द्वारा भूषण स्टील लिमिटेड , 608, रीजेंट चेम्बर्स, नरीमन पोआइंट, मुंबई -400021 

गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

कैद सूरज के अब आजाद करावल जाए


साखी पर मनोज भावुक और उनकी भोजपुरी गजलों पर तो विद्वानों और रचना धर्मियों ने गहन चर्चा की ही, उनके बहाने भाषा-बोली के फर्क पर, विमर्श में गंभीरता और चुहलबाजी  के ताल-मेल पर, सलिल जी की बुद्धिसंपन्नता किंवा मूढ़ता पर और  चर्चा शब्द के लिंग पर भी जमकर माथापच्ची हुई| राजेश उत्साही की सलाह पर मुझे गुलमोहर  की छाया तले जाना पड़ा| मैंने गुलमोहर  के नीचे प्रेमियों को बैठते तो देखा-सुना था पर वहां तो भाषा के दंगाइयों से मुलाकात हुई| वहां झगडा इस बात पर हो रहा था कि चर्चा हुई ठीक है या चर्चा हुआ| समाधान भी था वहां पर, उर्दू में चर्चा होता है, हिंदी में चर्चा होती है| ऐसे कई शब्द हैं, जिनको लेकर उर्दू वाले हिंदी के लिंगबोध से सहमत नहीं हैं| ऐसे में यह सोचना कि इब्ने इंशा कमअक्ल थे, हमारी कमअक्ली के सिवा कुछ और नहीं होगा|  मैं तो यही कहूँगा कि साखी पर चर्चा रोचक भी रही(भी रहा नहीं ) और गंभीर भी| रोचक इस मायने में कि बीच-बीच में विषयांतर  होकर लोग एक-दूसरे से दिल्लगी भी करते रहे| मेरा मानना है कविता और शायरी की दुनिया के लोग बिना तंज और हंसी-मजाक के देर तक नहीं रह सकते|  ऐसे क्षणों का अपना आनंद होता है पर उनकी स्तरीयता भी अपेक्षित है| राजेश उत्साही इस मामले में हमेशा सजग रहते हैं। मैंने देखा है कि जब भी कोई भाषा में बेलगाम होने की कोशिश करता है, वे टोके बिना नहीं रहते|  जितेन्द्र जौहर ने जब कहा कि मेले में उतनी दूकानें नहीं आयीं...दूकानदारों की व्यस्तताएं होती हैं, तो राजेश ने उन्हें टोकने  में तनिक देरी नहीं की| चलो अच्छा हुआ कि जौहर साहब ने  इस चूक को हंसी-मजाक कहकर टाल दिया|

साखी पर पहली बार किसी क्षेत्रीय भाषा में गजलें आयीं थीं| मैं भोजपुरी को भाषा इसलिए कह रहा हूँ कि वह भाषा होने की सारी जरूरतें पूरा करती है| भाषा केवल वही नहीं है, जिसके पास अपनी लिपि है| इस तर्क पर तो मराठी और नेपाली को भाषा कहना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि उनकी अपनी लिपि नहीं है, ये दोनों भाषाएँ देवनागरी लिपि का उपयोग करती हैं| भाषा होने के लिए सबसे आवश्यक शर्त है, उसके साहित्य की समृद्ध परंपरा और उसका अद्यतन प्रवाह| कभी ब्रज सबसे संपन्न भाषा हुआ करती थी, उसे अब भी साहित्य के इतिहास में भाखा कहा जाता है पर आज वह बोली है| वह निरंतरता ब्रज भाषा में कायम नहीं रह सकी| केवल भारत में ही नहीं कई देशों में भोजपुरी में साहित्य रचना हो रही है| यह अच्छी बात रही कि किसी हिन्दी वाले ने इसे बेगानी नहीं समझा, ऐसा नहीं लगा कि भोजपुरी किसी की समझ में न आयी  हो| शायर तिलकराज जी ने कहा, मैं भोजपुरी नहीं जानता लेकिन फिर भी कोई कठिनाई नहीं हुई, आखिर है तो हिन्‍दी ही। ग़ज़ल 2 में शेर 3 की पंक्ति 2 में 'बेहया' शब्‍द पर वज्‍़न की ऑंशिक समस्‍या लग रही है। इसी तरह ग़ज़ल 6 में शेर 7 की पंक्ति 2 में राज की जगह राज़ होना चाहिये, हो सकता है, यह टंकण त्रुटि रही हो। राज़ उर्दू से आया शब्‍द है इसलिये इसे यथावत लेना आवश्‍यक है। मनोज की ग़ज़लों में भाव और भाषा-प्रवाह स्‍पष्‍ट हैं और तेवर भी मुखर हैं।


जितेन्द्र जौहर ने बात आगे बढ़ायी|  'बेहया' शब्‍द पर वे तिलकराज जी से सहमत दिखे पर उनकी इस  बात से असहमत कि-- "ग़ज़ल 6 में शेर 7 की पंक्ति 2 में ’राज’ की जगह ’राज़’ होना चाहिये।" हिन्दी के ’राज’ और उर्दू के ’राज़’ में अर्थ का अंतर होने के बावजूद भी मैं कहना चाहूँगा कि भाषा सदैव संदर्भानुकूल अर्थ देती है। भोजपुरी में उर्दू से आयातित शब्दों पर नुक़्ता अपरिहार्य या आवश्यक नहीं है| ग़ौरतलब है कि मनोज भावुक ने ’राज़’ की जगह नुक़्ता-रहित ’राज’ का ही नहीं, प्रत्युत्‌ ’रोज’ , आखिर, खुशबू, इंतजार, जमीर, कसम, कैद, आजाद, वक्‍त, जमीन, कदम, गजल, जज्बात, दफ्न, यकीन आदि बहुत से उर्दू शब्दों का नुक़्ता-विहीन इस्तेमाल किया है। हाँ... कुछेक जगहों पर मनोज भाई ने नुक़्ता लगा दिया है। यहीं पर वे थोड़ी ग़लती कर गये। ‘भोजपुरी की आपन एक अलगै दुनिया बा|’ देखें.. ’ज़िन्दगी’ और ’हुज़ूर’ शब्दों के लिए भोजपुरी में क्रमशः ’जिनिगी’ और ’हजूर’ का प्रयोग| ’सिर्फ़’ के लिए ’सिरिफ’ का प्रयोग। ’दरिद्रता’ की जगह ’दलिद्दर’। कोई भी भाषा/ बोली उधार लिए गये शब्दों को अपने अनुकूल ढाल लेती है। उपर्युक्त शब्दावली भोजपुरी भाषा के अनुकूलन का ही परिणाम है।  'ग्रास' और ‘घास’, 'कैंडिल' और ‘कंदील’ तथा 'फिलासोफी ' और ‘फलसफा’ के रूपांतरण  से हम सभी परिचित हैं। हर भाषा में शब्द-संपदा के अनुकूलन की प्रक्रिया अनवरत्‌ चलती रहती है।  मनोज के  जो शे’र मेरे मन को गहरे तक छू सके, वे हैं:
1. भँवर में डूबियो के आदमी उबर जाला
मरे के बा तऽ ऊ दरिया किनारे मर जाला
2. बर्फ हs, भाप हs, पानी हs कि कुछुओ ना हs
जिन्दगी का हवे, ई राज बुझाते नइखे
३.जमीने प बा आदमी के वजूद
तबो मन परिन्दा उड़ावत रहल
4. रोशनी गाँव में, दिल्ली से ले आवल जाये
कैद सूरज के अब आजाद करावल जाये
इस शे’र का तो, भाई... कहना ही क्या ! कितनी सुन्दर बात कह गए आप !
5. बहुत बा लोग जे मरलो के बाद जीयत बा
बहुत बा लोग जे जियते में, यार, मर जाला

 
जौहर के स्पष्टीकरण के बाद तिलकराज जी ने कहा, मुझसे त्रुटि हुई 'राज' को भेद के रूप में पढ़ने की|  मैंने दूसरी पंक्ति का आशय यह लिया था कि 'जि़दगी क्‍या है, यह भेद समझ नहीं आता है'। जबकि अब इसका आशय मुझे समझ आया कि 'जिन्‍दगी क्‍या है; इस प्रश्‍न को ये शासन हल ही नहीं करता है'।  जौहर ने और स्पष्ट किया कि इस राज का मतलब रहस्य है, जिन्दगी क्या है, इसका रहस्य समझ में ही नहीं आता| 


शायर सर्वत जमाल साहब ने कहा कि मनोज 'भावुक' की  गज़लें, भोजपुरी में नि:संदेह एक नया फलक रचने की कोशिश कर रही हैं|. ताज़गी से भरी इन गज़लों में वो सब कुछ है, जिन्हें पढ़ने  की इच्छा एक पाठक को होती है| लेकिन अभी मनोज के लिए मेहनत ज़रूरी है| मनोज की गज़लों में कुछ शब्द खटकते हैं---आंगन, दरपन, मधुवन, सावन, खुश्बू, विश्वास, आदमी, रेत, बुनियाद, ज़मीर, श्रम, वजूद, परिन्दा, जज़बात---भोजपुरी  में इन शब्दों के साथ 'वा' का इस्तेमाल कर इनका भोजपुरीकरण कर लिया जाता है| गज़ल-3 मुझे माधव मधुकर की गज़ल के  भोजपुरी रूपांतरण जैसी  लगी| हो सकता है, मनोज को इसका इल्म न हो लेकिन वह एक मशहूर गज़ल है| फिर भी मैं यह कहने पर मजबूर हूं कि यह गज़लें भोजपुरी के लिए एक नई खिड़की  खोल रही हैं, जहां से हवा के ताज़ा झोंके आ रहे हैं| गज़ल को गज़ल के ही रूप में बांधे रखने की कला मनोज के पास है और शायद आने वाला वक़्त इन्हें भोजपुरी का 'दुष्यंत' के नाम से याद करे|


सलिल जी मैदान में आये| उन्होंने भाषा-बोली का सवाल उठाया| एक सामान्य प्रतिक्रिया सबसे पहले कि यह ग़ज़लें भोजपुरी की श्रेणी में रखी जाएँ कि नहीं? मैं जिस भाषा में लिखता हूँ, उसे कई लोग भोजपुरी या कुछ और कह देते हैं, जबकि मैंने स्वयं यह सफाई दी है कि यह कोई भाषा नहीं, बोली है| पूरी तरह हिंदी, सिर्फ बोलने के अंदाज़ में लिखी हुई| लिहाज़ा इसे बतियाना माना जाना चाहिए, लेखन नहीं|  यह ग़ज़लें अपनी तमाम ख़ूबसूरती के बावजूद यह एलान करती हैं कि यह हिंदी/उर्दू में सोची हुई ग़ज़लें हैं यानि मौलिक रूप से यह भोजपुरी की गज़लें नहीं हैं| इसका प्रमाण इस बात से भी मिलता है कि सारी गज़लों में उर्दू के कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग है, जो भोजपुरी का अंग नहीं हैं| अमीर खुसरो की कुछ गज़लें फ़ारसी और हिंदवी का अद्भुत मेल प्रस्तुत करती हैं, जहाँ मिसराएऊला फ़ारसी में और सानी हिंदवी में कहा गया है| आप फ़ारसी का मतलब तो समझ सकते हैं  मगर उसी बहर में उसे ग़ज़ल में तर्जुमा करके नहीं पिरो सकते, क्योंकि शेर का वज़न उसी ज़ुबान में आता है, जिसमें वह कही गई हो और बहर भी वैसे ही सम्भाली जा सकती है| एक शेर के माध्यम से अपनी बात स्पष्ट करने की कोशिश करता हूँ. मनोज जी ने कहाः
बचपन के हमरा याद के दरपन कहाँ गइल
माई रे, अपना घर के ऊ आँगन कहाँ गइल.

और यह देखिएः
बचपन की मेरी याद का दर्पन कहाँ गया,
माई री, अपने घर का वो आँगन कहाँ गया.

किसी भी शेर को आप उठा कर देखिए, उसे आप बहुत आसानी से बिना मेहनत हिंदुस्तानी ज़ुबान में लिखते चले जाएँगे| यही बात ख़ुद उनकी दूसरी ग़ज़ल के मतले से साबित होती है| ज़रा ग़ौर करें...
भँवर में डूबियो के आदमी उबर जाला
मरे के बा तऽ ऊ दरिया किनारे मर जाला.

ग़ज़ल को बहर में रखने के लिए मनोज जी ने इसमें “भँवर में डूबियो” लिखा है, जबकि भोजपुरी में यही शब्द “डुबियो” हो जाता है| अगर इसे भोजपुरी  में लिखा जाता तो शेर की बहर छोटी हो जाती लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाए, क्योंकि उनकी सोच मूलतः हिंदी में थी| वैसे शायर ये ईमानदार हैं, मैं होता तो इस तरह बेईमानी कर जाताः
भँवर में डुबियो के अदमी कबो उबर जाला
मरे के बा तऽ ऊ दरिया किनारे मर जाला.

यहाँ “आदमी” को भोजपुरी के प्रचलित शब्द “अदमी” से बदल दिया है जो किसी भी पुरबिया व्यक्ति को आपत्तिजनक नहीं लगता और बहर के कारण कबो शब्द जोड़ना पड़ा| इन सबके बावजूद, मनोज जी की ग़ज़लें, एक युवा गज़लगो की क्षमता को स्थापित करती हैं | जितनी आसानी से इन्होंने इतने गहरे भाव बयान किए हैं, उनकी अद्भुत प्रतिभा का लोहा मनवाने को काफी है|  वे समस्त सम्मान, जो आपको मिले हैं, वह आपकी योग्यता का प्रमाण हैं और आपकी ग़ज़लें उसकी परिचायक हैं|


कवि संजीव गौतम ने कहा, मनोज जी की ग़ज़लें साखी पर प्रकाशित होना गर्व की बात है। सर्वत जी ने उनके लिए भोजपुरी का दुष्यन्त की संज्ञा दी है तो कुछ सोचकर ही दी है। ये ग़ज़लें एक सच्चे कवि की ग़ज़लें हैं। कुछ व्याकरणिक त्रुटियों की ओर भी विद्वानों ने इशारा किया है, लेकिन वो सब बेमानी है, क्योंकि ये ग़ज़लें इसका मौका नहीं देतीं। मैं तो सबसे पहले ग़ज़ल पढ़ते ही यह सोचने लगता हूं कि शायर ने इसे सोचा कहां से है। क्या किसी और का पढ़कर या वह जिन्दगी की पहेलियो को खुद सुलझाता है। अगर पहले वाली स्थिति पाता हूं तो उसकी कहन पर ध्यान जाता है कि उसने पहले ही हजार बार कही बात को कैसे कहा है। यदि दूसरी स्थिति पाता हूं तो सिर्फ वाह ही निकलती है और उसका मुरीद हो जाता हूं। मनोज जी ऐसे ही रचनाकार हैं जो अपनी नजर से इस दुनिया को देखते हैं। उनके ये अशआर इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं-

भँवर में डूबियो के आदमी उबर जाला
मरे के बा तऽ ऊ दरिया किनारे मर जाला
बहुत बा लोग जे मरलो के बाद जीयत बा
बहुत बा लोग जे जियते में, यार, मर जाला
बर्फ हs, भाप हs, पानी हs कि कुछुओ ना हs
जिन्दगी का हवे, ई राज बुझाते नइखे

ये ग़ज़लें उर्दू और हिन्दी के झगड़े का भी काफी हद तक उत्तर देती हैं| ये उर्दू की ग़ज़लें तो हैं नहीं, इसका अर्थ है कि फारसी और उर्दू के अतिरिक्त किसी और भाषा में भी ग़ज़लें सफलतापूर्वक कही जा सकती हैं। एक बड़ी मजेदार बात ध्यान में आ रही है कि ये सारी प्रतिभाएं नोएडा में क्यों एकत्रित होती जा रही हैं। अब देखिए न- अशोक रावत जी, सलिल वर्मा जी, आलोक श्रीवास्तव और अब मनोज जी। जिसे देखो वही नोएडा में निकलता है। क्या इसमें कुछ रहस्य है।  

संजीव की इस मधुर छेड़खानी से सलिल जी चुप नहीं रह सके, एक भूल सुधार की अनुमति चाहता हूँ... इस अनपढ़ का नाम (अभी अभी यह ख़िताब मिला है मुझे, या कहिए किसी ने पहली बार सही पहचाना है, इस बिहारी को) आपने प्रतिभावान लोगों में शामिल कर बड़ी भूल की है| अभी तक मुस्कुरा रहा हूँ आपकी इस टिप्पणी पर| जितेन्द्र जौहर भी लपके, .सलिल वर्मा जी (उर्फ़ ‘चला बिहारी...’), आप जैसे संतुलित/संयमित वाणी वाले व्यक्ति को किस ‘पढ़े-लिखे’ ने ‘अनपढ़’ कहा...हुज़ूर! मेरी राय में, यदि आप अनपढ़ हैं...तो फिर ‘पढ़ा-लिखा’ कौन है ? माहौल में चुहल की मिश्री घुली तो तिलकराज जी कैसे अपने को रोक पाते,  हुजूर 'नैन लड़ जइहैं तो मनवा मा कसक हुइवै करी' के ज़माने से हिन्‍दी के अन्‍य रूप सुनते आ रहें, अइसन बुडबक  न जानिये। इस तरह की गंभीर चर्चाओं में थोड़ी बहुत चुहल चलती रहनी चाहिये। वे बोले, भाषा का अपना व्‍याकरण और लिपि होना आवश्‍यक है जबकि बोली इनसे स्‍वतंत्र है|  पंजाबी मूल का होते हुए भी मेरे लिये पंजाबी और भोजपुरी एकसी हैं। दोनों में अर्थ समझ में आ जाता है, बोलते नहीं बनतीं। मनोज ने ऐसी रचनायें दी हैं कि कहने को कुछ छोड़ा ही नहीं, अब भाई कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा न, वरना ब्‍लॉग पर टिप्‍पणी-मेला कैसा लगेगा। लिव लाईफ़ किंग साईज़- जीवन के हर पल का आनंद लें।बस यहीं जौहर ने एक बखेड़ा खड़ा किया, हालाँकि बाद में उन्होंने अपनी गलती क़ुबूल की| उन्होंने कहा,  इस बार मेले में उतनी ‘दुकानें’ नहीं आयीं, जितनी कि आती रही हैं। ख़ैर...कभी-कभी ‘दुकानदारों’ की कुछ अन्य व्यस्तताएँ भी हो जाती हैं, संतुलन तो बनाना ही पड़ता है। राजेश उत्साही भाषा के संयम के प्रबल पक्षधर हैं, उन्होंने टोका, माफ करें जितेन्‍द्र जी, यहां जो लोग विमर्श कर रहे हैं वे 'दुकानदार' नहीं हैं। दुकानदार शब्‍द इस्‍तेमाल करके आप औरों के साथ-साथ अपना भी अपमान कर रहे हैं। आप जानते हैं दुकान में सामान बेचा जाता है। यहां कोई अपनी टिप्‍पणी बेचने नहीं आता है। तिलक जी ने मेले की बात की है। वह एक उत्‍सव की बात है। उसे आपको उसी संदर्भ में समझना चाहिए। जितेन्द्र ने गलती मानी, मैंने जानबूझकर हँसी-मज़ाक की मनःस्थिति में ‘दुकान/ दुकानदार’ शब्दों का प्रयोग किया है। आपकी बात पूरी तरह सही है। चूँकि डॉ.कपूर साहब मज़ाक में आ गये थे, सो मेरा भी मूड कर बन गया| उत्साही ने सचेत किया, कृपया साखी के इस मंच को मजाक और चुहल का मंच न बनाएं तो बेहतर होगा। यह एक सामूहिक विमर्श का मंच है। उन्होंने भाषा और बोली पर भी अपना मंतव्य  साफ़ किया, अब यह मान्यता पुरानी पड़ चुकी है कि भाषा और बोली अलग-अलग होती है या कि भाषा का व्या‍करण होता है और बोली का नहीं होता। मसला केवल लिपि का है। जिसकी लिपि है, उसे आप भाषा कहने लगते हैं। 

राजेश जी ने गजलों पर अपनी बात रखी, इसमें कोई शक नहीं है कि मनोज की ग़ज़लें उनके नाम के अनुरूप पढ़ने वाले को भावुक कर देती हैं पर मनोज मुझे दुविधाग्रस्त लगते हैं।  उनकी पहली ग़ज़ल केवल सवाल पूछती है, वह कोई उत्तर नहीं देती और न ही उत्तंर खोजने के लिए उकसाती है। दूसरी गजल में वे विरोधाभासी बातें कहते हैं। पहले यह शेर देखिए-
पता ई बा कि महल ना टिके कबो अइसन
तबो त रेत प बुनियाद लोग धर जाला और अब इसे पढ़ें- अगर जो दिल में लगन, चाह आ भरोसा बा
कसम से चाँद भी अँगना में तब उतर जाला
तीसरी ग़ज़ल में भी यही समस्या लगती है। पहले चार शेरों से बात जिस सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ती है, वह अचानक ही पांचवे शेर में आकर बिखर जाती है। शायर गहरे अवसाद में भर जाता है। और फिर छठें  शेर में वह अचानक अपने पुराने रूप में लौट आता है।चौथी ग़ज़ल में ऐसा लगता है कि मनोज अपने को दुहरा रहे हैं। पांचवी ग़ज़ल में वे जिंदगी के फलसफे की बात करते नजर आए लेकिन छठवीं गजल फिर एक बार निराशा में ले गई। तिलकराज जी ने राजेश को स्पष्ट करने के कोशिश की, ग़ज़ल में हर शेर का स्‍वतंत्र अस्‍तित्‍व होता है, एक पूर्ण कविता की तरह लेकिन हिन्‍दी काव्‍य प्रस्‍तुति में विषय निरंतरता की प्रथा के कारण ग़ज़ल में दृष्टिकोण बदलने की आवश्‍यकता पर ध्‍यान नहीं जाता है। यह स्थिति ग़ज़ल कहने वाले के लिये भी होती है| ग़ज़ल की मूल प्रकृति के अनुसार मनोज भाई ने अगर एक ही ग़ज़ल के अलग-अलग अशआर में विरोधाभासी बातें कही भी हैं तो वह अनुमन्य  है। पर तुरंत ही उन्होंने अपने विचार संशोधित किये, किसी भी रचनाधर्मी की रचनाओं में उसकी सोच स्‍पष्‍टत: दिखनी चाहिये। यहॉं सोच की मौलिकता का भी प्रश्‍न है, मौलिक सोच की दिशा एक सी ही रहेगी, अलग-अलग सोच दिखने से आभासित होता है कि बहुत सी जगह से पढ़ा हुआ मसाला रचनाधर्मी ने अपने शब्‍दों में प्रस्‍तुत कर दिया है। बाद में जितेन्द्र जौहर ने गजल के शेरों में अलग-अलग भाव पूर्णता के साथ प्रकट होने की सार्थकता को विस्तार से समझाया। 
 सलिल जी की पीड़ा फिर उभरी, हम बिहारी तो वैसे भी मूढ़ता के पर्याय माने जाते रहे हैं,  इसलिए मुझे अगर किसी ने मूढ़ कह दिया होता तो मुझे न ऐतराज़ होता, न ताज्जुब. लेकिन मेरे लपेटे में इब्ने इंशाँ जैसे अज़ीम शायर को कमअक़्ल कह दिया जाना नाक़ाबिले-बर्दाश्त है| अफ़सोस रहा कि मेरी वज़ह से उस महान शायर की तौहीन हुई| राजेश ने स्पष्ट किया, सलिल भाई की टिप्‍पणी को समझने के लिए आपको मेरे ब्‍लाग गुलमोहर पर आना पडे़गा। गुलमोहर पर जाकर आप भी चर्चा की लिंग-चर्चा का आनंद उठा सकते हैं| यह पुल्लिंग है या स्त्रीलिंग? भाई यह उभयलिंग है| उर्दू में पुल्लिंग और हिन्दी में स्त्रीलिंग| सलिल जी कौन कहता है कि आप मूढ़ हैं या बिहारी मूढ़ होते हैं? बुद्धि तो बिहार के दामन में ही कैद है भाई मेरे| जितेन्द्र की बात सुनें, राजकुमार सिद्धार्थ ने ’मूढ़ता’ की उसी धरती पर ’बोध’ पाया था| इसी धरती का  ’नालंदा विश्वविद्यालय’ दुनिया को रोशनी बाँटता था। सलिल द्रवित हो गये, भावुक हूँ इसलिए संयम न रख पाया, व्यथित था इसलिए असंदर्भ लिख गया| मनोज भावुक जी से क्षमा प्रार्थी हूँ कि मेरी बातों से दिशा भटक गई| 
 
जाने-माने शायर प्राण शर्मा जी और डा त्रिमोहन तरल भी आये| प्राण जी ने सारी गजलें पढ़ी   और जितेन्द्र जौहर की समीक्षा की तारीफ़ की| अच्छी और मर्मस्पर्शी गजलों के लिए उन्होंने मनोज भावुक को बधाई दी| साथ ही साथ यह भी कहा कि गजल का हर एक शेर स्वतंत्र होता है| गजल में एक शेर विरह पर भी कहा जा सकता है और दूसरा शेर संयोग पर भी| विभिन्न भावों से पिरोई होती है गजल की मालातरल जी ने कहा, किसी बागीचे की बगल से गुज़रते हुए कोई खुशगवार गंध नासिका-द्वार से होती हुई जब मन के भीतर अपना स्थान बना लेती है तो मन का स्वामी ये नहीं पूछता कि जिन फूलों से ये गंध आ रही है, उनका नाम क्या है। युवा रचनाकार मनोज भावुक की गज़लें गज़लियत की कसौटी पर कितनी खरी उतरतीं हैं, यह तो ग़ज़ल के तमाम बड़े उस्ताद ही जानें, लेकिन इतना कहना चाहता हूँ की मैंने भोजपुरी में गज़लें पहली बार पढ़ीं हैं और कई दूसरे लोगों की तरह ही मैं भी भोजपुरी नहीं जानता। बावजूद इसके इन्हें पढ़कर  तबियत प्रसन्न हो गयी। 
अबकी दियरी के परब अइसे मनावल जाए
मन के आँगन में एगो दीप जरावल जाए
रौशनी गाँव में, दिल्ली से ले आवल जाए
कैद सूरज के अब आजाद करावल जाए
हिन्दू, मुस्लिम ना, ईसाई ना, सिक्ख ई भाई
अपना औलाद के इन्सान बनावल जाए
ऐसे अशआर किसी भी भाषा में लिखे हुए हो सकते हैं। फर्क इससे नहीं पड़ता। फर्क इससे पड़ता है कि वे सीधे दिल में उतर रहे है या नहीं। मनोज भाई के शेर सीधे दिल में उतरकर अपनी गुणवत्ता सिद्ध कर रहे हैं।
कवि सुरेश यादव ने कहा कि मनोज भावुक की गज़लें पहली बार पढ़ने का अवसर मिला| भोजपुरी मुझे नहीं आती लेकिन इन ग़ज़लों का भावनात्मक बहाव ऐसा कि भाषा की दीवार महसूस ही नहीं होती है| संवेदना की दृष्टि से इन ग़ज़लों में आधुनिकता की आवाज़ है और मानवता की धड़कन है जो माटी की सोंधी गंध लिए है| बहस में शिरकत करके उत्साह बढ़ाने वालों में अरविन्द मिश्र, वेद व्यथित, दिगम्बर नासवा, स्वप्निल कुमार आतिश, राजेन्द्र स्वर्णकार और अविनाश वाचस्पति महत्वपूर्ण रहे। 
मनोज भावुक ने विनम्रतापूर्वक सभी सवालों के जवाब दिए|  भावुक ने कहा, बड़े भाई डा. सुभाष राय ने मुझे अपने दिल में और साखी पर जगह दी, मै उनका शुक्रगुजार हूँ|. साखी पर आना गर्व की बात है| मनोज ने साफ किया कि  'बेहया' शब्‍द में दरअसल टंकण त्रुटि है| भोजपुरी में यह शब्द ' बेहाया' होता है| शेर कुछ यूं है -
जमीर चीख के सौ बार रोके-टोकेला
तबो त मन ई बेहाया गुनाह कर जाला  भोजपुरी में हम नुक्ता  नहीं लगाते, इसलिए यह राज ही है, जिसका अर्थ है रहस्य| मेरी गजलों में जहाँ कहीं भी नुक़्ता लगा है, वह टंकण त्रुटि है| ऐसा किसने कहा कि 'वा' का इस्तेमाल कर के इनका भोजपुरीकरण कर लिया जाता है? जब हम भोजपुरी नाटक में किसी अनपढ़ आदमी के लिए संवाद लिखते हैं तो ऎसी भाषा का प्रयोग करते हैं | गजल और गीतों की भाषा अलग होती है| गजल में हम आदमी को अदमी और प्रेम को परेम नहीं लिखते| माधव मधुकर जी की वह गजल मै पढ़ना चाहूंगा| कृपया उस गजल को साखी पर प्रकाशित करें| सर्वत जी ने मुझे भोजपुरी का 'दुष्यंत' सम्बोधित किया है, शुक्रिया, भगवान करें ऐसा हो| सलिल जी  ये भोजपुरी गजलें हीं है|  मै भोजपुरी में ही सोचता हूँ| भोजपुरी मेरी मातृभाषा है | उर्दू या अंग्रेजी के कुछ शब्द आ जाने से ये गजलें उस भाषा की नहीं हो जातीं| मेरा मानना है भाषा की समृद्धि  के लिए रचनाओं में अन्य भाषाओं के उन शब्दों का प्रयोग होना चाहिए, जो भोजपुरी में रच-बस गये हैं| डूबियो शब्द सही है और भोजपुरी में डूबियो हीं लिखा जाता है| हम आदमी को आदमी हीं लिखते हैं अदमी नहीं| मै फिर कह रहा हूँ कि मै अभी गजल का विद्यार्थी हूँ| आप सबने जो रास्ता दिखाया है, उस पर चलने की कोशिश करूंगा| जो त्रुटियाँ रह गयीं हैं,उनको ठीक करूंगा| एक भोजपुरी गजल-संग्रह प्रकाशित है ' तस्वीर जिन्दगी के' उसका लिंक दे रहा हूँ, ताकि आप भोजपुरी गजलों का आस्वादन कर  सकें...
http://www.manojbhawuk.com/old/jindgi6.htm            
शनिवार को नीरज गोस्वामी की गजलें -------------------------------------------

शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

मनोज भावुक की गजलें

मनोज भावुक को साखी पर प्रस्तुत करते हुए मुझे इसलिये प्रसन्नता हो रही है कि वे उम्र में छोटे होते हुए भी अपनी रचनाधर्मिता में अनुभवसम्पन्न और पके हुए दिखते हैं। साखी के पाठकों और रचनाधर्मी सहयोगियों के लिये यह एक नया अनुभव होगा क्योंकि इस कवि के जरिये मैं पहली बार हिंदी के  ही एक सशक्त और सम्पन्न भाषा रूप भोजपुरी में कही जा रही गजलें पेश करने जा रहा हूं।  2 जनवरी 1976 को सीवान (बिहार) में जन्मे और रेणुकूट (उत्तर प्रदेश ) में पले- बढ़े मनोज भावुक भोजपुरी के प्रसिद्ध युवा साहित्यकार हैं। पिछले 15 सालों से देश और देश के बाहर (अफ्रीका और यूके में) भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भावुक भोजपुरी सिनेमा, नाटक आदि के इतिहास पर किये गये अपने समग्र शोध के लिए भी पहचाने जाते हैं। अभिनय, एंकरिंग एवं पटकथा लेखन आदि विधाओं में गहरी रुचि रखने वाले मनोज दुनिया भर के भोजपुरी भाषा को समर्पित संस्थाओं के संस्थापक, सलाहकार और सदस्य हैं। तस्वीर जिंदगी के( ग़ज़ल-संग्रह) एवं चलनी में पानी ( गीत- संग्रह) मनोज की चर्चित पुस्तकें हैं। ‘तस्वीर जिन्दगी के’ तो इतनी  लोकप्रिय हुई कि इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित किया जा चुका है और इस पुस्तक को वर्ष 2006 के भारतीय भाषा परिषद सम्मान से नवाज़ा जा चुका है। एक भोजपुरी पुस्तक को पहली बार यह सम्मान दिया गया है। इसी २६-२७ सितम्बर को विरसामुंडा की पावन भूमि रांची में आयोजित सम्मेलन  में उन्हें सर्वसम्मति से विश्व भोजपुरी सम्मेलन की दिल्ली इकाई का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। वे भोजपुरी सम्मलेन की ग्रेट ब्रिटेन इकाई के अध्यक्ष रह चुके हैं। इस समय वे हमार टीवी नोयडा में क्रियेटिव हेड के पद पर काम कर रहे हैं।

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साखी परिवार को प्रसन्नता है कि गत दिनों मनोज भावुक को लखनऊ स्थित भाऊराव देवरस सेवा न्यास ने भोजपुरी भाषा में उल्लेखनीय योगदान के लिए पंडित प्रताप नारायण मिश्र स्मृति-युवा साहित्यकार सम्मान से नवाजा है। पहली बार किसी भोजपुरी साहित्यकार को यह सम्मान मिला है। भावुक को सम्मान स्वरूप पांच हजार रुपये, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह, माँ सरस्वती की प्रतिमा, अंगवस्त्रम एवं न्यास द्वारा प्रकाशित पुस्तकों का सेट भेंट किया गया।
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यहां प्रस्तुत हैं मनोज भावुक की कुछ भोजपुरी गजलें...
                                                        

                             1.
बचपन के हमरा याद के दरपन कहाँ गइल
माई रे, अपना घर के ऊ आँगन कहाँ गइल

खुशबू भरल सनेह के उपवन कहाँ गइल
भउजी हो, तहरा गाँव के मधुवन कहाँ गइल

खुलके मिले-जुले के लकम अब त ना रहल
विश्वास, नेह, प्रेम-भरल मन कहाँ गइल

हर बात पर जे रोज कहे दोस्त हम हईं
हमके डुबाके आज ऊ आपन कहाँ गइल


बरिसत रहे जे आँख से हमरा बदे कबो
आखिर ऊ इन्तजार के सावन कहाँ गइल


                             2.
 
भँवर में डूबियो के आदमी उबर जाला
मरे के बा तऽ ऊ दरिया किनारे मर जाला

पता ई बा कि महल ना टिके कबो अइसन
तबो त रेत प बुनियाद लोग धर जाला

जमीर चीख के सौ बार रोके-टोकेला
तबो त मन ई बेहया गुनाह कर जाला

बहुत बा लोग जे मरलो के बाद जीयत बा
बहुत बा लोग जे जियते में, यार, मर जाला

अगर जो दिल में लगन, चाह आ भरोसा बा
कसम से चाँद भी अँगना में तब उतर जाला


                                 3.
अबकी दियरी के परब अइसे मनावल जाये
मन के अँगना में एगो दीप जरावल जाये

रोशनी गाँव में, दिल्ली से ले आवल जाये
कैद सूरज के अब आजाद करावल जाये

हिन्दू, मुसलिम ना, ईसाई ना, सिक्ख ए भाई
अपना औलाद के इन्सान बनावल जाये

जेमें भगवान, खुदा, गॉड सभे साथ रहे
एह तरह के एगो देवास बनावल जाये

रोज दियरी बा कहीं, रोज कहीं भूखमरी
काश! दुनिया से विषमता के मिटावल जाये


सूप, चलनी के पटकला से भला का होई
श्रम के लाठी से दलिद्दर के भगावल जाये

लाख रस्ता हो कठिन, लाख दूर मंजिल हो
आस के फूल ही आँखिन में उगावल जाये


आम मउरल बा, जिया गंध से पागल बाटे
ए सखी, ए सखी 'भावुक' के बोलावल जाये




अनिमेष विश्वास की रचना 
                       4.

बहुत नाच जिनिगी नचावत रहल
हँसावत, खेलावत, रोआवत रहल

कहाँ खो गइल अब ऊ धुन प्यार के
जे हमरा के पागल बनावत रहल

बुरा वक्त में ऊ बदलिये गइल
जे हमरा के आपन बतावत रहल

बन्हाइल कहाँ ऊ कबो छंद में
जे हमरा के हरदम लुभावत रहल

उहो आज खोजत बा रस्ता, हजूर
जे सभका के रस्ता देखावत रहल

जमीने प बा आदमी के वजूद
तबो मन परिन्दा उड़ावत रहल

कबो आज ले ना रुकल ई कदम
भले मोड़ पर मोड़ आवत रहल

लिखे में बहुत प्राण तड़पल तबो
गजल-गीत 'भावुक' सुनावत रहल

                               5.
हियरा में फूल बन के खिले कौनो-कौनो बात
हियरा में शूल बन के हले कौनो-कौनो बात

जज्बात पर यकीन कइल भी बा अब गुनाह
दिल में उतर के दिल के छले कौनो-कौनो बात

अचके में पैर राख में पड़ते पता चलल
बरिसन ले आग बन के जले कौनो-कौनो बात

रख देला मन के मोड़ के, जिनिगी सँवार के
तत्काल दिल में लागे भले कौनो-कौनो बात

अनुभव नया-नया मिले 'भावुक' हो रोज़-रोज़
पर गीत आ गजल में ढ़ले कौनो-कौनो बात

6.

बात पर बात होता बात ओराते नइखे

कवनो दिक्कत के समाधान भेंटाते नइखे
 
भोर के आस में जे बूढ़ भइल, सोचत बा
मर गइल का बा सुरुज रात ई जाते नइखे

 
लोग सिखले बा बजावे के सिरिफ ताली का
सामने जुल्म के अब मुठ्ठी बन्हाते नइखे

 
कान में खोंट भरल बा तबे तs केहू के
कवनो अलचार के आवाज़ सुनाते नइखे

 
ओद काठी बा, हवा तेज बा,किस्मत देखीं
तेल भरले बा, दिया-बाती बराते नइखे

 
मन के धृतराष्ट्र के आँखिन से सभे देखत बा
भीम असली ह कि लोहा के, चिन्हाते नइखे

 
बर्फ हs, भाप हs, पानी हs कि कुछुओ ना हs
जिन्दगी का हवे, ई राज बुझाते नइखे

 
दफ्न बा दिल में तजुर्बा त बहुत, ए ‘भावुक’
छंद के बंध में सब काहें समाते नइखे



 


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गुरुवार, 30 सितंबर 2010

हादसों के शहर में हम


साखी  पर प्राण शर्मा जी की गजलें प्रस्तुत कर मैं भी तितलियों की  इन्द्रधनुषी  उड़ान में अलमस्त डोलने लगा था, अशोक रावत जी ने भीतर चलती आँधियों का जिक्र भी किया पर जैसे मैंने सुना ही नहीं| अली कली ही सो विध्यो, वाला हाल था, आगे कौन हवाल की चिंता ही नहीं थी पर जब तितलियाँ उड़ चलीं आकाश तो मेरी नींद टूटी|  अब लगता है कि सामना तो आँधियों से ही है, चाहे वो तितलियों के मासूम पंखों ने ही क्यों न पैदा की हो| राजेश उत्साही कहते हैं कि कापियां किसी तरह जँच ही जायेंगीं और कुछ लाल, पीला करके कक्षाध्यापक पेश कर ही देगा पर भाई चार सवालों के इतने जवाब हैं कि मैं क्या करूं, समझ में नहीं आता| हाँ,  पहली बार ये जरूर लगा कि सोचने के अपने-अपने तरीके रखने वाले शायरों, रचनाकर्मियों और चिंतनशील पाठकों को एक मंच पर खुलकर बतियाते देखना तो बहुत अच्छा लगता है लेकिन उनकी बतकही को एक धागे में पिरोकर रखना बहुत मुश्किल काम है| प्राण जी ने याद दिलाया, इस पार प्रिये तुम हो मधु है, उस पार न जाने क्या होगा, पर वे लोगों से यह भी कह गये कि इस पार आना, यानी मैं समझता हूँ उस पार न जाना, पता नहीं क्या हो, कहीं भटक गये तो| इस पार रहे तो इतने लोग हैं कि कम से कम भटकने तो नहीं देंगे| रावत जी हैं, तिलकराज जी हैं, राजेश उत्साही हैं, संजीव गौतम हैं, सलिल जी हैं, नीरज जी है, सर्वत जी हैं  और बहुत से चाहने वाले हैं| उस पार का क्या भरोसा|  प्राण जी की फूलों के आर-पार जाने वाली तितलियों ने भी लोगों को बहुत छकाया| किसी को सहज लगीं, किसी को असहज| फ़िल्मी गाने में तो वे आकाश चलीं थीं पर प्राण जी ने उन्हें फूलों के आर-पार जाते हुए देखा| यह प्राण जी की तितलियाँ हैं, वे उन्हें अपनी नजर से देख सकते हैं, इसमें असहज कुछ नहीं लगता, बशर्ते वे इस शेर की रचना का सन्दर्भ न देते| फिर भी कुछ फर्क नहीं पड़ता क्योंकि कविता में आये किसी सन्दर्भ को उसके यथातथ्य भौतिक रूप में देखने और समझने की कोशिश नहीं होनी चाहिए| किसी ने बहुत सही बात कही, इश्क दिल को चीर जाता है, आँखें मन के  भीतर तक झाँक लेती हैं तो तितलियाँ फूल को घायल किये बगैर उसके आर-पार क्यों नहीं जा सकतीं|

प्राण जी के बहाने इस बार गजलों पर बहुत सार्थक चर्चा हुई| जमकर बातें हुई| लगा साखी ने अपनी सार्थकता की दिशा में कुछ कदम बढ़ाए| तिलकराज जी खुश थे कि उन्हें तरही का मसाला  मिल गया| पर अपनी खुशी जाहिर करके ही वे चुप नहीं बैठे| उन्होंने कोई मौक़ा हाथ से जाने नहीं दिया| बोले, मैंने ग़ज़ल की चार आधार आवश्‍यकतायें पहचानी हैं, तखय्युल, तग़ज्‍़जुल, तवज्‍़ज़ुन, तगय्युल| प्राण साहब की ग़ज़लों में कोई उर्दू  शब्‍द आता भी है तो वह ऐसा होता है जो बोलचाल की हिन्‍दी में रच बस गया हो। सीधी सच्‍ची सी बातें, शब्‍दाडम्‍बर रहित। उन्होंने एक शेर पर चर्चा की--नफरत का भूत नित मेरे सर पर सवार है, क्या हर कोई ए दोस्तो इसका शिकार है| कहा, पहली पंक्ति पढ़कर शायर  जब ठहरता है तो मजबूर करता है दूसरी पंक्ति की प्रतीक्षा के लिये और दूसरी पंक्ति में जब वह कहता है कि 'क्या हर कोई ए दोस्तो इसका ' तो सुनने वाला बेसाख्‍ता बोल उठता है 'शिकार है'। यही एक पुष्‍ट शेर की पहचान है। शायर  के पास एक सवालाना खयाल है, वह  आपसे ही सवाल पूछकर आपको सोचने के लिये मजबूर कर रहा है। बाकी ग़ज़लों के अशआर भी देखें, कहीं सवाल तो कहीं दृश्यानुभूति की अभिव्‍यक्ति| 


सलिल जी साखी पर नहीं आयें  तो भी आये जैसे लगते हैं| शायद प्राण जी को ऐसा ही कुछ लगा होगा| उनके याद करते ही सलिल जी प्रकट हुए अपनी विनम्रता जताने, फिर अपने अंदाज में आये, पहली गजल एक मासूम सी गज़ल, बच्चों की मुस्कुराहट की मानिन्द|  “जब से जाना काम है मुझको बनाना आपका” में रोज़मर्रा की बोलचाल में इस्तेमाल होने वाले मुहावरे को इस क़दर ख़ूबसूरती से पिरोया है कि इस शेर की मासूमियत पर हँसी आ जाती है| वे कहते हैं कि पूरी ग़ज़ल में मुझे चोट पहुंचाया इस शेर ने---क्यों न लाता मँहगे- मँहगे तोहफे मैं परदेस से, वरना पड़ता देखना फिर मुँह फुलाना आपका| महँगे महँगे तोहफों की बात सारे जज़्बात को हल्का कर जाती है| दूसरी  ग़ज़ल किसी फुलवारी में बैठकर कही गई है, इसे मैं नर्सरी राईम कहना चाहूँगा| पर यहाँ मतले और चौथे शेर में कुछ खटक रहा है जब कि पाँचवें शेर में फूलों के आर-पार तितलियों का उड़ना अखरता है। फूलों के दर्मियान उड़ना तो सुना था पर आर पार नहीं सुना| तीसरी ग़ज़ल एक साँस में पढ़ी  जाने वाली, मकते  से मतले तक बाँध कर रखती है| चौथी गजल में  तंज़िया मिजाज़ है, तंज़ आज के माहौल पर, जहाँ नफ़रत का भूत सबके सिर पर सवार है| मकते पर तो इंतिहाँ कर दी, यह कहकर कि बच्चा इस दौर का होशियार है| प्राण साहब की ग़ज़लें एक ऐसा सफर हैं, जिसमें वक़्त का पता नहीं चलता| वे अपने आप में एक ईदारा हैं, उनकी ग़ज़लों पर बस इतना ही कहने को रह जाता है कि क्यों न मैं नित ही करूँ तारीफ़ उसकी,इल्म में वो आदमी मुझसे बड़ा है|
सलिल जी ने तिलकराज कपूर को फिर आने को विवश कर दिया, बिहारी ब्‍लॉगर साहब खूब सार्थक चर्चा करते हैं, उनके लिये कह सकता हूँ कि मेरा तो सर भी वहॉं तक नहीं पहुँच पाता, जहॉं कदम के निशॉं आप छोड़ आये हैं। प्राण साहब कभी निहायत निजी पलों में ले जाते हैं तो कभी बतियाने लगते हैं| 'क्‍यों न लाता ......मुँह फुलाना आपका' में यही दिखाई पड़ रहा है। फूल के आर-पार ति‍तलियों का उड़ना तो व्यावहारिक नहीं लेकिन बगीचे में बैठकर फूलों की चादर के आर-पार उड़ने की कल्‍पना करें तो इस शेर की कोमलता का आनंद ही कुछ और है। कपूर साहब ने बार-बार दखल दिया| राजेश उत्साही की टिप्पणी के बाद होशियार शब्‍द पर चर्चा करते हुए  कहा, यह अनेकार्थक है-बुद्धिमान, अक्‍लमंद, चतुर, सचेत, दक्ष, कुशल, जागरूक और माहिर जैसे अर्थ लिये हुए और चालाक, छली, ठग का अर्थ देते हुए भी । इसका अर्थ संदर्भ से जोड़कर ही देखा जा सकता है अन्‍यथा अर्थ का अनर्थ हो जायेगा। प्राण जी की उम्र में बैठा शायर अपने ज़माने के बच्‍चे को सरल और भोला-भाला मानते हुए भी मानता है कि उस दौर में भी बच्‍चे को होशियार होना चाहिये था जैसा कि आज का बच्‍चा है और उसी पृष्‍ठभूमि में आज के बच्‍चे के प्रति प्रसन्‍नता व्‍यक्‍त कर रहा है। हमारे बच्‍चे इतने होशियार हो गये हैं कि हमारे बिना भी अपना रास्‍ता बना लेंगे।
गिरेंगे, उठेंगे, फिर आगे बढ़ेंगे,
हमारे बिना भी ये जीवन जियेंगे।

 
शायर संजीव गौतम ने सलाह दी अब तक जितनी बातें आदरणीय प्राण  जी, अशोक रावत जी, सर्वत जमाल जी, चन्द्रभान भारद्वाज जी, तिलकराज कपूर जी, सलिल जी और जिस-जिसने भी ग़ज़ल के ढांचे, उसकी आत्मा आदि के बारे में कहीं, उन सबके साथ अगर उदाहरण अगर किसी को समझने हों तो साखी पर आदरणीय ओमप्रकाश  नदीम जी, अशोक रावत जी और प्राण सर की ग़ज़लें गौर से पढ़ें। सारे भ्रम और अनसुलझे सवालों के उत्तर मिल जायेंगे। कपूर जी ने एक शेर ‘नफरत का भूत‘ में शिकार शब्द को लेकर जो कहा है, उसे मैं एक और शब्द देता हूं- जहां शायर पाठक की सोच से आगे जाकर अपनी बात कहता है, वहां उत्पन्न होता है, ‘अर्थ का विस्फोट‘ यही ग़ज़लपन है। यही ग़ज़ल की कहन है। यह अर्थ का विस्फोट रचना में जहां-जहां होगा, वहीं-वहीं कविता होगी। यही वो बात है जो साधना से आती है।  कपूर जी फिर आये और कहा कि संजीव गौतम ने बहुत अच्‍छी बात कही ग़ज़लियत के प्रस्‍फुटन की। काफि़या स्‍तर पर सामान्‍यतय: दो स्थितियां हो सकती हैं, एक तो यह कि वहॉं एक अनपेक्षित काफि़या निकले और शेर का अर्थ एकाएक प्रकट हो और श्रोता वाह-वाह कह उठे, दूसरी यह कि काफि़या श्रोता के मुख से निकले। पहली स्थिति बहुत कठिन होती है, हॉं ग़ज़लियत के लिये इतना जरूरी है कि पहली पंक्ति से श्रोता काफि़या का अनुमान न लगा पाये और दूसरी पंक्ति में भी काफि़या से जितनी दूरी हो उतनी ही दूरी काफि़या का अनुमान लगाने से हो, इतना भी कर लिया तो काफ़ी होगा। संजीव खुश है कि अच्छी बातें हो रही हैं| उन्होंने कहा,  इस बार रचनाएं अच्छी आयीं तो बातें भी अच्छी-अच्छी हो रहीं हैं। रिश्तों की डोर मजबूत से मजबूत होती जा रही है। आज तक आलोचनात्मक कविता पाठ की चौपाल  ज्यादा दिनों तक कभी चली नहीं है। ये चुनौती है हर कवि और कविता के पाठक के लिए। जो भी दिल से मनुष्य है, संवेदना से युक्त है और मन-प्राण से इस कायनात की खूबसूरती को बचे हुए देखना चाहता है, उसे अपनी पूरी ताकत से इसे बचाने के लिए अपना योगदान देना होगा। ये क्रम कभी टूटे नहीं, चेहरे बेशक बदल जायें उत्तरदायित्व में परिवर्तन नहीं होना चाहिए, क्योंकि ये सिलसिला अगर टूटा तो बहुत कुछ टूटेगा। हम सब समय के संक्रमण काल में जी रहे हैं। सच बोलने की तो बात दूर मुंह खोलने तक पर पाबन्दी लगाने के लिए सत्ता अपनी समूची ताकत के साथ तत्पर है। बुराई किसी विचार में नहीं बल्कि उसे क्रियान्वित करने वाले दिमागों में है। कुछ लोग अभी तक जंगल के कानून की मानसिकता से उबर नहीं पाये हैं। अकेले में अपने-अपने नाखूनों को  परखते रहते हैं और मौका मिलने पर उसके प्रयोग से चूकते नहीं हैं।  ढेर सारे अंधेरे को भगाने के लिए एक छोटा सा दीपक जलाना ही काफी होता है, मैं तो यहां बातचीत को एक और दिशा में  ले जाना चाहता हूं। छन्द, व्याकरण आदि तो प्रारम्भिक उपकरण हैं, उनको तो खैर होना ही चाहिए लेकिन आगे की वस्तु तो यही  है न कि हमारे द्वारा रचित पंक्तियां  हमें कितना संस्कारित कर रहीं हैं। हमारे पूर्वजों द्वारा हमें विरासत में जो चेतना का परिष्कृत रूप मिला   है, उसमें कितनी श्रीवृद्धि कर रहीं हैं।


कवि राजेश उत्साही ने कविताओं पर बात करने के अपने मानकों के बारे में स्पष्ट किया और प्राण जी से अपनी पहली मुठभेड़ के बारे में जानकारी दी| मैं किसी भी रचना पर अपनी बात- सामयिकता, वैचारिक प्रतिबद्धता, समकालीन सामाजिक सरोकार और शिल्प के आधार पर करता हूँ। मेरे लिए पहली तीन बातें कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। लेकिन मुश्किल यह भी है कि जब मैं पहली तीन बातें किसी रचना में पाता हूं तो चौथी कसौटी अनायास ही ज्यादा मुखर होने लगती है। जब पहली तीन बातों पर मैं रचना को कसता हूं, रचना के साथ-साथ वह मेरे लिए उस रचनाकार की समीक्षा भी होती है। साखी जैसे सार्वजनिक मंच पर कुछ कहने की सार्थकता तभी है जब आप औरों ने क्या् कहा, उसको भी ध्यान में रखें। इतना कहकर वे गजलों पर आये| पहली बात यह कि प्राण जी की ग़ज़लों में वैश्विक मानवीय संवदेनाएं और चिंताएं मुखरता के साथ मौजूद हैं। यह मुखरता सहज और सरल है। शहरीकरण के ऐब उनकी ग़ज़ल में दिख रहे हैं। दूसरी बात, उनकी ग़ज़लों में प्रकृति अपने सौदंर्य के साथ मौजूद है। ति‍‍तलियों का फूलों के आरपार जाना मुझे तो सहज लगा। तीसरी बात, कोई भी रचना वय की सीमाओं में बंधी नहीं होती है। इसलिए उनकी ग़ज़ल में जो रोमानियत नजर आती है, वह इस बात की परिचायक है कि वे मन से अब भी युवा हैं। पर हां मुझे भी लगता है कि मंहगे तोहफों की बात कुछ हल्कापन लाती है। चौथी बात, चूंकि वे लगभग पचास साल से भारत से बाहर रह रहे हैं, इसलिए मैं उनकी ग़ज़लों में समकालीन भारत की चिंताओं और सरोकारों को खोजने का प्रयास नहीं कर रहा हूं। अगर वे अपने रचनाकर्म में इस बात का ध्यान रखते भी हैं, तो वह इनमें परि‍लक्षित नहीं हो रहा है। हां, होशियार होते जिन बच्चों को देखकर वे हर्षित हैं| संभवत: वह उनके अपने परिवेश की बात है। कम से कम हम तो अपने परिवेश के बच्चों को देखकर एक पल के लिए हर्षित होते हैं और अगले ही पल उसके अंजाम से कांप उठते हैं। राजेश की  अपनी पसंद के तीन शेर ये हैं---
खुशबुओं को मेरे घर में छोड़ जाना आपका
कितना अच्छा लगता है हर रोज़ आना आपका


दिल भी हो उसका वैसा ज़रूरी तो ये नहीं
चेहरे पे जिसके माना कि दिलकश निखार है


हर किसी में होती हैं कुछ प्यारी-प्यारी चाहतें
क्यों न डूबे आदमी इन खुशबुओं के शहर में 

 
सर्वत जमाल साहब ने प्राण जी की गजलों पर कुछ कहने के पहले सोचा-- यह इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है| फिर भी कहने की हिम्मत की, प्राण जी की ये ४ रचनाएँ उनके शायर का पूरा व्यक्तित्व नहीं हैं| मुझे नहीं लगता कि रैंकिंग की दृष्टि से ये ४ गजलें अव्वल नम्बर की हकदार हैं लेकिन इनकी सरलता, भाव सम्प्रेषण और शायरी के सभी 'लवाजमात' से लैस होने की सच्चाई से इंकार करना तो सूरज को चराग दिखाने वाला मामला है| पर  प्राण जी के डिक्शन में एक जगह मैं सहमत नहीं हो पाया- उन्होंने तितलियाँ का जो उच्चारण इस्तेमाल किया है, मुझे ठीक नहीं लगा|  पढ़ते समय मुझे, मुआफ करें, बहुत कोफ़्त हुई| प्राण साहब खुद को रोक नहीं पाए, भाई सर्वत जी " तितलियाँ " शब्द को पढ़ कर आपको कोफ़्त हुई, मुझे अच्छा नहीं लगा है| बदली , झलकी , हस्ती , सिसकी आदि शब्दों का बहुवचन में उच्चारण बद + लियाँ , झल + कियाँ , हस + तियाँ , सिस + कियाँ होता है| इसी तरह तितली शब्द का बहुवचन में उच्चारण तित + लियाँ है और मैंने इसका प्रयोग इसी रूप में किया है| कृपया ध्यान से पढ़िए, यह कोफ़्त-वोफ्त को जाने दीजिये|

 
शायर अशोक रावत ने कहा, किसी भी कविता पर बात करते समय शिल्प और कथ्य की अलग- अलग बात नहीं की जा सकती| दोनों के समन्वय से ही कविता का स्वरूप तय होता है लेकिन कभी जब ऐसा होता है कि शिल्प में कोई कमी नहीं होती और कथ्य में कोई मन की बात नहीं होती तो बात करने में मुश्किल तो होती है| प्राण शर्मा जी की ग़ज़लें एक नज़र में ठीक लगती हें लेकिन कथ्य अच्छा होते हुए भी बांधता नहीं है| उनकी सादगी की तारीफ करनी होगी| यह मेरी पसंद का मामला है तथा मैं यहाँ उनकी रचनाओं की साहित्यिक विवेचना नहीं कर रहा हूँ| जिन्दगी मेरे लिए कभी इतनी आसान नहीं रही कि नज़र तितलियों पर ठहर पाती.
चलती रहती है हरदम इक आँधी सी
एक ही मौसम मेरे भीतर रहता है.
लेखिका और शायर देवी नागरानी ने एक शेर से अपनी बात शुरू की, मेरा तो सर भी वहॉं तक नहीं पहुँच पाता, जहॉं कदम के निशॉं आप छोड़ आये हैं।गजल का सफ़र तो बहुत तवील है, जितना आगे बढ़िए, मंजिल उतनी ही दूर लगती है| हाँ इस सफ़र में अनेक गजलकारों से, समीक्षात्मक टिप्पणियों से शब्दों के इस्तेमाल और उनके रख-रखाव के बारे में मदद मिलती है| बावजूद इन सब बातों के प्राण जी की गजलों में एक ताजगी है, उनकी सोच की उड़ान परिंदों के पर काटती है| उनकी कलम आज, कल और आने वाले कल के नवीनतम बिम्ब खींचने में कामयाब होती है...सो रहा था चैन से मैं फुरसतों के शहर में ,जब जगा तो खुद को पाया हादसों के शहर में| मुझे भी यही कहना है--
चैन लूटा इस ग़ज़ल ने, लिखते लिखते सो गई
जागी तब जब शेर गरजे काग़ज़ों के शहर में

 
प्राण जी ने इस विमर्श में शामिल लोगों को धन्यवाद देने के लिए कलम उठायी तो तितलियों के परों से  कई रंग बिखरने लगे| प्राण जी ने कहा, मैं अपनी ग़ज़लों पर सभी टिप्पणियों का आदर करता हूँ| सभी गुणीजन मेरे लिए माननीय हैं|  मैं तो एक बच्चे की सीख का भी मान करता हूँ| मेरी ग़ज़लों में दो - तीन ऐसे शब्द आयें हैं जो मेरे अनुभव पर आधारित हैं| कभी रघुपति सहाय फ़िराक गोरखपुरी ने कहा था कि ग़ज़लों में प्रकृति गायब है| मेरे मन - मस्तिष्क में यह बात बैठ गयी| मैंने कुछेक ग़ज़लें बदलियाँ, पंछी, मातृभूमि, तितलियाँ आदि पर कह दीं| " तितलियाँ " ग़ज़ल के जन्म की बात करता हूँ| शेक्सपीयर के जन्मस्थान स्ट्रेट अपोन
ऐवोन में एक तितली घर है| तितलियों का फूलों के आसपास, बीच में और आर - पार उड़ना देखकर मुझे एक फ़िल्मी गीत याद आ गया - तितली उड़ी / उड़ जो चली/ फूल ने कहा/ आजा मेरे पास/ तितली कहे/ मैं चली उस पार| घर आया तो मेरा एक शेर " फूलों के आर - पार " तैयार हो गया| तिलक राज कपूर ने सही कहा है कि " होशियार " शब्द के अनेक अर्थ हैं|  मैंने इस शब्द को " कुशल और बुद्धिमान के अर्थ में लिया है अपने शेर में | शेर यूँ बना - एक बार मेरे घर में मेरी पत्नी की दो सहेलियाँ आयीं| बातचीत में एक ने दूसरी को कहा - आपके दोनों बच्चे कितने ज़्यादा होशियार और पढ़े - लिखे निकले है ! दूसरी ने जवाब में कहा - आपके बच्चे भी तो होशियार और पढ़े - लिखे हैं| बीस साल पहले मैं जयपुर गया था| पत्नी के लिए चार सौ रुपयों की जयपुरी साड़ी खरीद ली| पत्नी को दी तो उसका मुँह फूल गया| दस साल पहले दिल्ली गया तो उसके लिए मँहगी से मँहगी साड़ी खरीदी| पाकर वह खुश तो हुईं लेकिन कह उठीं - इतनी मँहगी साड़ी लाने की क्या जरूरत
थी ? मेरा यह शेर बन गया - क्यों न लाता मँहगे - मँहगे तोहफे मैं परदेस से, वर्ना पड़ता देखना फिर मुँह फुलाना आपका| इस शेर में ज़रा " फिर " शब्द " पर गौर फरमाएँ| सब का धन्यवाद|


प्राण जी की इस सफाई से मामला और रोचक हो गया| सलिल जी और राजेश उत्साही आ धमके और फिर वे आपस में भी मीठी-मीठी  कहासुनी करते दिखाई पड़े| सलिल जी ने कहा, आपने वे वाक़यात बयान किए हैं, लिहाजा मैं सफाई रखना चाहता हूँ| तितली उड़ी वाला गीत यूँ है,“तितली उड़ी, उड़ जो चली/फूल ने कहा, आजा मेरे पास,/तितली कहे मैं चली आकास!” होशियारी वाली बात तो मैं समझ गया, दरअसल जहाँ आपका शेर ख़त्म होता है, मैंने वहाँ से एक नया मानी गढ़ने की कोशिश की और तितली उड़ी  की तर्ज़ पर न सीखी होशियारी की बात कही| महँगे तोहफे की बात पर.....हमारी  बेग़म होतीं तो कहतीं--ख़ामख़ाह ले आए इतने महँगे तोहफे आप क्यूँ, बस यही अच्छा नहीं पैसे उड़ाना आपका|

राजेश ने कहा, मैंने अपनी पहली टिप्पणी में कहा था कि मुझे तो यह प्रयोग सहज लगा। पर प्राण जी द्वारा यह कैफियत देने से बात उलझ गई है। आपने जिस फिल्मी गीत से प्रेरणा ली है, उसमें पंक्ति है- तितली कहे मैं चली आकाश, न कि - तितली कहे मैं चली उस पार| हां आगे एक पंक्ति है- जाना है वहां मुझे बादलों के पार| पर बात शुरू हुई थी सलिल जी की टिप्पणी से। उन्होंने फूलों के आर-पार पर असहजता महसूस की थी। पर मेरी समझ है कि बादलों के पार पर तो उनको भी कोई समस्या नहीं होगी। राजेश जी ने उस गीत को पूरा का पूरा ही प्रस्तुत कर दिया| अब देखिए मंहगे तोहफे वाले शेर की कैफियत पर भी आप उलझ गए हैं। हमने माना कि आप प्रवासी हैं। पर सचमुच क्या भारत आपके लिए परदेस हो गया है। कम से मैं तो इस शेर को भारत से बाहर जाकर भारत में लौटकर किसी परिचित से मिलने के संदर्भ में ही समझ रहा था। सलिल जी भला क्यों मानते| सोते से उठ के आये, बोले..फ़िलहाल, “बादलों के पार पर आपको कोई आपत्ति नहीं होगी” की बात समझ नहीं आई.. दरअसल यह मेरी ज़ाती राय है, क्योंकि मैंने कहीं ऐसी बात नहीं सुनी... मुझे यह लगता है कि आर पार का मतलब पैबस्त होने से है| जैसे तीर निशाने के आर- पार होना| कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीरेनीमकश को, वो ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता| एक और गाना याद दिला दूं,  कभी आर कभी पार लागा तीरे नज़र, पिया घायल किया रे तूने मोरा जिगर| आर पार अगर हो गई तितलियाँ तो फूलों के घायल होने का ख़तरा है| राजेश बोले, गाना मैंने आपके लिए नहीं प्राण जी के लिए दिया है क्यों कि गाने में एक जगह बादलों के पार आता है। बहुत संभव है उन्हें वह पंक्ति याद रही हो। और आपको आपत्ति नहीं होगी, वह इस अर्थ में कहा कि यह बादलों के पार प्रयोग तो इतना प्रचलित है कि आप भी उसको लेकर सहज होंगे। सलिल भाई, आरपार होने के आपने बहुत से उदाहरण दे दिए। उनसे कतई असहमति नहीं है। प्राण जी का जो प्रयोग है वह काव्य की दृष्टि से ही है। इसीलिए उनसे भी कहा कि इस पर कैफियत की कोई जरूरत ही नहीं। और आपकी टिप्पणी की आखिरी पंक्ति की बात करें तो ति‍तलियां तो फूलों को घायल करने का काम करती ही हैं न। एक और बात, प्राण जी ने अपने तीन शेरों के बारे में जो कैफियत दी, वह उनके सोच के दायरे को सीमित कर देती है। मैंने अब तक यह सीखा है कि आपका कोई भी निजी अनुभव साहित्य में तभी काम का होता है जब वह सर्वव्यापी होने की क्षमता रखता हो। इस दृष्टि से इन शेरों में कही गई बात कमजोर पड़ रही है। 


तिलकराज जी फिर मंच पर आ गये, प्राण साहब की तितलियॉं बेचारी उलझ गयी लगती हैं। प्राण साहब के अधिकॉंश शेर अपने आस-पास के अनुभवों से भरे होते हैं और आम बोल-चाल की सीधी-सादी भाषा से लिये गये होते हैं, जिसके कारण प्रथमदृष्‍ट्या ग़ज़ल बहुत सीधी-सादी सी लगती है। यहॉं फिर वही होता है कि जब इस बात पर ध्‍यान जाता है कि भाई एक परिपक्‍व उस्‍ताद शायर  की ग़ज़ल है तो शेर में उतरकर समझने की इच्‍छा होती है। अशोक रावत जी की टिप्‍पणी भी ग़ल़त नहीं लगती। इसी ब्‍लॉग पर रावत जी की एक अलग एहसास पर आधारित बेहतरीन ग़ज़लें हैं, जिन्‍हें देखने से स्‍पष्‍ट है कि उनकी शैली अलग तेवर लिये है। यहॉं समस्‍या कहन की शैली को लेकर है। मेरा अनुभव है कि  मुख्‍यत: सोच, संस्‍कार, संदर्भ और सरोकार खुलकर सामने आते हैं कहन में और इन्‍हें रूप देने में शब्‍द और शिल्‍प सामर्थ्‍य की महत्‍वपूर्ण भूमिका होती है| यही शैली रचनाकार की समीक्षात्‍मक भूमिका का प्रमुख आधार बनती है। ऐसी स्थिति में रचना के प्रति विविध विचार होना ग़लत तो नहीं लगता। संजीव ने जोड़ा, अद्भुत आनन्द आ रहा है चर्चा में। बड़े होकर भी तितलियों  के पीछे भागने में कितना आनन्द है आज जाना| तिलकराज जी ने बहुत खूबसूरती से बात को सामने रखा है, नजर आते हैं जो जैसे वो सब वैसे नहीं होते, जो फल पीले नहीं होते वो सब कच्चे नहीं होते| यहाँ तक आते-आते सलिलजी और राजेश जी की नोक-झोंक भी मद्धम पड़  चुकी थी और सलिल ने मधुर समर्पण से काम निकालने की तरकीब निकाली, दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह, या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं| आप की बात मेरे लिए आदेश है| राजेश भी मोम की तरह पिघल गए और बात उड़ाने के अंदाज में बोले, दिल जो भी कहेगा मानेंगे हम, दुनिया में हमारा दिल ही तो है| संजीव भाई ने भी खूब कही बड़े होकर भी हम तितलियों के पीछे भागना नहीं भूले।


चर्चित कवि सुरेश यादव ने कहा, प्राण शर्मा जी की गज़लें बहुत उम्दा शायरी का बेहतरीन नमूना हैं, इसमें कोई संदेह नहीं | सहजता इन ग़ज़लों का सौन्दर्य है, जैसे नदी का सौन्दर्य पानी के आवेग से बनता है, भावनाओं और विचारों का ऐसा ही आवेग इन ग़ज़लों में है| गजलकार नीरज गोस्वामी ने कहा, ज़बान की सादगी और भावनाओं का प्रवाह प्राण साहब की ग़ज़लों को एक अलग मुकाम देता है| उनकी ग़ज़लों की अपनी एक पहचान है,भीड़ में वो सबसे अलग खड़े नज़र आते हैं| जिंदगी की तल्खियाँ, खुशियाँ, दुश्वारियां, मसले निहायत ख़ूबसूरती से प्राण साहब अपनी ग़ज़लों में पिरोते हैं...उनका हर अशआर हमें जीना सिखाता है| गिरीश पंकज ने कहा, प्राण जी के हर शेर का अपना रंग है, उनके कहन का अपना अलग ढंग है| विमर्श में शामिल होकर समीरलाल जी, अविनाश जी, संजीव सलिल जी, अदा जी, निर्मला कपिला जी, सुनीता शानू जी, वेद व्यथित जी, रचना दीक्षित जी, लावण्या जी,  अरुण देव जी, शिखा वार्ष्णेय जी, डा टी एस दराल जी, रजी साहब जी, जितेन्द्र जौहर जी, सुनील गज्जाणी जी,  रंजना जी, दिगंबर नासवा जी ने साखी की गरिमा बढ़ाने में योगदान किया|

सूर्य का विश्राम पल होता नहीं
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इस बार की चर्चा बहुत गंभीर अंदाज में शुरू होकर बहुत मजेदार माहौल में ख़त्म हुई| प्राण जी के आदि-इत्यादि  और मेरे जागते रहने के प्रसंग ने सबको आनंद दिया| बात शुरू हुई राजेश उतसाही के बयान से, इस बार फिर हम सबने मिलकर सुभाष भाई का काम बढ़ा दिया। वे एक कुशल कक्षा अध्‍यापक की तरह हम सबकी कॉपियां जांचकर उसे लाल-हरा कर ही लेंगे। सर्वत ने बात बढ़ाई, डाक्टर सुभाष राय के लिए यह सब बाएं हाथ का खेल है. एक मुद्दत से अखबार के दफ्तर में कापियां ही तो जांचते रहे हैं|  एक राज़ की बात बताऊं, वह रात को भी नहीं सोते| तिलक राज जी ने जोड़ा, सर्वत साहब ने खूब कहा सुभाष राय जी के लिये| उन्‍हीं की बात पकड़कर कहता हूँ,रात हो या दिन, कभी सोता नहीं, सूर्य का विश्राम पल होता नहीं। इसी बीच प्राण जी ने एक प्यारा सा अनुरोध किया, मैं सभी से अनुरोध करता हूँ कि वे साखी ब्लॉग के इस पार आया करें| हंसी-हंसी में ही संजीव जी, राजेश जी, तिलक जी, सर्वत जी, पंकज जी, इत्यादि न  जाने कितने ज्ञान की बातें कर जाते हैं| सलिल जी ने चुटकी ली, प्राण साहब ने मुझे इत्यादि में सम्मिलित किया, पर उनकी बात से इत्तेफाक रखते हुए, सर्वत साहब के समर्थन में, तिलक राज जी के शेर को आगे बढाते हुए, अपनी तुकबंदी रखना चाहता हूँ--ब्लॉग-मरुथल में कहीं भी ढूँढ लो, “साखी” के अतिरिक्त, जल होता नहीं| फिर तो तिलक राज जी ने जो किया, वह आप  rastekeedhool.blogspot.com/2010/09/blog-post_29.html पर जाकर देख सकते हैं|  सलिल जी की आदि-इत्यादि में शामिल किये जाने की शिकायत संजीव ने दूर की, एक कहानी सुना कर---सलिल जी, प्रान सर ने आपको इत्यादि में यूं ही नहीं रखा है इसका खास कारण है। इसके पीछे एक किस्सा है। किस्सा भी असली है बस कवियों के नाम भूल गया हूँ । एक बार दो वरिष्ठ  कवि रेल से किसी कवि सम्मेलन में जा रहे थे। ट्रेन किसी स्टेशन जैसे ही रुकी, दोनों उतर गये। एक बोला,  पीने की तलब लग रही है। पास में ही दुकान है ले आते हैं। दोनों कविगण चल दिये। दुकान बड़ी मुश्किल से मिली। खैर समय कम था सो दोनों लोग बोतल कपड़ों में छुपाकर ले आये। ट्रेन  चली। अब समस्या सामने आयी कि लोगों के सामने कैसे पियें। तरकीब भिड़ाते हुए दोनों ने कविताएं पढ़नी शुरू कीं। लोग आनन्दित होने लगे। थोड़ी देर बाद उनमें से एक कवि पास बैठे सज्जन से बोले, भाई साहब ये सामने क्या लिखा है। सज्जन ने पढ़ा,‘ डिब्बे में बीड़ी आदि पीना सख्त मना है।‘ उन सज्जन ने सोचा कि कवि महोदय बीड़ी पीना चाहते है, सो बोले हां-हां क्यों नहीं आप बीड़ी पी लीजिए, हमें कोई तकलीफ नहीं है। कवि महोदय बोले नहीं बीड़ी नहीं पीनी है हमें तो आदि आदि पीना है। तो सलिल सर ये आदि इत्यादि कोई छोटी-मोटी चीज नहीं है। आप बड़े बड़भागी हैं। बधाई हो। 

 शनिवार को मनोज भावुक की भोजपुरी गजलें
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गुरुवार, 23 सितंबर 2010

प्राण शर्मा की गजलें

कवेंट्री, यू.के निवासी प्राण शर्मा वजीराबाद (पाकिस्तान) में १३ जून १९३७ को जन्मे। प्राथमिक शिक्षा दिल्ली में हुई, पंजाब विश्वविद्यालय से एम. ए., बी.एड. किया। छोटी आयु से ही लेखन कार्य आरम्भ कर दिया था| मुंबई में फिल्मी दुनिया का भी तजुर्बा कर चुके हैं| १९५५ से उच्चकोटि की ग़ज़ल और कवितायें लिखते रहे हैं। वे १९६५ से यू.के. में प्रवास कर रहे हैं। यू.के. से निकलने वाली हिन्दी की एकमात्र पत्रिका ‘पुरवाई’ के ‘खेल निराले हैं दुनिया में’ स्थाई-स्तम्भ के लेखक हैं। आपकी रचनाएँ युवा अवस्था से ही पंजाब के दैनिक पत्र, ‘वीर अर्जुन’ एवं ‘हिन्दी मिलाप’, ज्ञानपीठ की पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ जैसी अनेक उच्चकोटि की पत्रिकाओं और अंतरजाल पर प्रकाशित होती रही हैं। वे देश-विदेश के कवि सम्मेलनों, मुशायरों तथा आकाशवाणी कार्यक्रमों में भी भाग ले चुके हैं। ग़ज़ल कहता हूँ , सुराही (मुक्तक-संग्रह) प्रकाशित पुस्तकें हैं। .‘अभिव्यक्ति’ में प्रकाशित ‘उर्दू ग़ज़ल बनाम हिंदी ग़ज़ल’ और साहित्य शिल्पी पर ‘ग़ज़ल: शिल्प और संरचना’ के १० लेख हिंदी और उर्दू ग़ज़ल लिखने वालों के लिए नायाब हीरे हैं। १९६१ में भाषा विभाग, पटियाला द्वारा आयोजित टैगोर निबंध प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार. १९८२ में कादम्बिनी द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कहानी प्रतियोगिता में सांत्वना पुरस्कार. १९८६ में ईस्ट मिडलैंड आर्ट्स, लेस्टर द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार। २००६ में हिन्दी समिति, लन्दन द्वारा सम्मानित।

                              1.
खुशबुओं को मेरे घर   में छोड़  जाना आपका
कितना अच्छा लगता है हर रोज़ आना आपका

जब से जाना, काम है मुझको बनाना  आपका
चल न पाया कोई भी तब से  बहाना  आपका

आते भी हैं आप तो बस मुँह दिखाने के  लिए
कब तलक  यूँ  ही  चलेगा  दिल दुखाना आपका 

क्यों न भाये  हर किसी को  मुस्कराहट  आपकी
एक  बच्चे  की तरह  है  मुस्कराना  आपका

मान लेता हूँ चलो मैं बात हर इक आपकी
कुछ अजब सा लगता है सौगंध खाना आपका

क्यों न लाता मँहगे- मँहगे तोहफे मैं परदेस से
वरना  पड़ता देखना फिर मुँह फुलाना आपका

बरसों ही हमने बिताये हैं दो यारो की तरह
" प्राण " मुमकिन ही नहीं अब तो भुलाना आपका
  
                       2.
होते ही प्रात:काल  आ जाती हैं तितलियाँ
मधुवन में खूब धूम  मचाती हैं तितलियाँ

फूलों से खेलती हैं कभी पत्तियों के  संग
कैसा अनोखा खेल दिखाती हैं तितलियाँ

बच्चे, जवान, बूढ़े नहीं थकते देखकर
किस सादगी के साथ लुभाती हैं तितलियाँ

सुन्दरता की ये  देवियाँ परियों से कम नहीं
मधुवन में स्वर्गलोक रचाती हैं तितलियाँ

उड़ती हैं किस कमाल से फूलों के आर-पार
दीवाना हर किसी को बनाती हैं तितलियाँ 

वैसा कहाँ  है जादू परिंदों का राम जी 
हर ओर जैसा जादू जगाती हैं तितलियाँ 

उनके ही दम से " प्राण " हैं फूलों की रौनकें 
फूलों को चार  चाँद लगाती हैं तितलियाँ 
                
प्रख्यात चित्रकार अनिमेष की रचना 


                                               ३.
सो रहा था चैन से मैं फुरसतों के शहर में 
जब जगा तो खुद को पाया हादसों के शहर में 

फासले तो फासले हैं दो किनारों की तरह 
फासले मिटते कहाँ हैं फासलों के शहर में 

दोस्तों का दोस्त है तो दोस्त बन कर ही तू रह 
दुश्मनों की कब चली है दोस्तों के शहर में 

थक गये  हैं आप तो आराम कर लीजै मगर 
काम क्या है पस्तियों का हौसलों के शहर में 

मिल नहीं पाया कोई सोने का घर तो क्या हुआ 
पत्थरों का घर सही अब पत्थरों के शहर में 

हर किसी में होती हैं कुछ प्यारी-प्यारी चाहतें 
क्यों न डूबे आदमी इन खुशबुओं के शहर में 

धरती-अम्बर,  चाँद-तारे, फूल-खुशबू, रात-दिन 
कैसा-कैसा रंग है इन बन्धनों के शहर में 

                             ४.
नफरत का भूत नित मेरे सर पर सवार है 
क्या हर कोई ए दोस्तो इसका शिकार है

दिल भी हो उसका वैसा ज़रूरी तो ये नहीं
चेहरे पे जिसके माना कि दिलकश निखार है

पूछो कभी तो दोस्तो उनके दिलों का हाल
जिनके सरों पे कर्जे की तीखी कटार है

धरती हो, चाँद हो या सितारे हों या हवा
हमको तो इस जहान की हर शै से प्यार है

आराम उनको क्या नहीं कुछ वक़्त के लिए
हमला दुखों का राम जी क्यों बार -बार है

जीते हैं  हम भी आस में हर कामयाबी की
हमको भी हर खुशी का सदा इंतज़ार है

ए  "प्राण"  देख- सुन के भला हर्ष क्यों न हो
हर बच्चा आजकल बड़ा ही होशियार है
                     




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