अभियान के साथी

शनिवार, 28 जुलाई 2012

तिलकराज कपूर की ग़ज़लें

रचनाकार का वक्तव्य
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तिलकराज कपूर
ग़ज़ल कहने की मेरी प्रक्रिया और किसी अन्‍य की प्रक्रिया में शायद ही कुछ अंतर हो। बस यकायक कोई शेर बन जाता है, कोशिश रहती है कि पहला ही शेर मत्‍ले के रूप में हो जाये। यदि ऐसा नहीं हुआ तो शेर के बाद मत्‍ले का शेर ही होता है। बस उसके बाद फ़ुर्सत का ही प्रश्‍न रह जाता है। एकाध हफ़्ते में ग़ज़ल का ढॉंचा तैयार हो जाता है। यदा-कदा उस ढॉंचे को देखता रहता हूँ और मंजाई चलती रहती है। कई ग़ज़ल ऐसी रहीं कि एक-दो महीने के अंतराल पर उन्‍हें देखने पर मज़ा नहीं आया और पूरी की पूरी खारिज हो गयीं। जब कोई 'तरही' का अवसर मिलता है तो समय बंधन ग़ज़ल लिखवा ही लेता है। मेरी रचना प्रक्रिया में एक भारी दोष है, जब तक नया शब्‍द काफि़या के लिये मिलता जाये, नया शेर बनता जाता है। उद्देश्‍य रहता है अधिक से अधिक शेर कहने का, जिससे बाद में कमज़ोर शेर हटाकर एक पुख्‍ता ग़ज़ल को अंतिम रूप दिया जा सके; लेकिन फिर कभी सम्‍पादन का अवसर ही नहीं मिल पाता और ग़ज़ल में कई शेर ऐसे छूट जाते हैं, जिन्‍हें भरती का माना जा सकता है। आदत की बात है, लगता है धीरे-धीरे जायेगी।
शेर कहने में सबसे अधिक मज़ा आता है चुनौती के रूप में। अक्‍सर घर में कहता हूँ कि कुछ शब्‍द दो। फिर कोशिश रहती है सभी शब्‍दों को एक ही शेर में लेने की। मुझे लगता है इससे शब्‍दों को  बॉंधने का अभ्‍यास अच्‍छी तरह होता है।





तिलकराज कपूर की ग़ज़लें

1.
ज़माने को हुआ क्‍या है, कोई निश्‍छल नहीं मिलता
किसी मासूम बच्‍चे सा कोई निर्मल नहीं मिलता।
युगों की प्‍यास का मतलब उसी से पूछिये साहब
जिसे मरुथल में मीलों तक कहीं बादल नहीं मिलता।
जुनूँ की हद से आगे जो निकल जाये शराफ़त में
हमें इस दौर में ऐसा कोई पागल नहीं मिलता।
यक़ीं कोशिश पे रखता हूँ, मगर मालूम है मुझको
अगर मर्जी़ न हो तेरी, किसी को फल नहीं मिलता।
जहॉं भी देखिये नक्‍़शे भरे होते हैं जंगल से
ज़मीं पर देखिये तो दूर तक जंगल नहीं मिलता।
समस्‍या में छुपा होगा, अगर कुछ हल निकलना है
नियति ही मान लें उसको, अगर कुछ हल नहीं मिलता।
हर इक पल जिंदगी का खुल के हमने जी लिया 'राही'
गुज़र जाता है जो इक बार फिर वो पल नहीं मिलता।

2.
हुस्‍नो-अदा के तीर के बीमार हम नहीं
ऐसी किसी भी शै के तलबगार हम नहीं।
हमको न इस की फि़क्र हमें किसने क्‍या कहा
जब तक तेरी नज़र में ख़तावार हम नहीं।
जैसा रहा है वक्‍त निबाहा वही सदा
हम जानते हैं वक्‍त की रफ़्तार हम नहीं
चेहरा पढ़ें हुजूर नहीं झूठ कुछ यहॉं
कापी, किताब, पत्रिका, अखबार हम नहीं।
हमको सुने निज़ाम ये मुमकिन नहीं हुआ
तारीफ़ में लिखे हुए अश'आर हम नहीं।
उम्‍मीद फ़ैसलों की न हमसे किया करें,
खुद ही खुदा बने हुए दरबार हम नहीं।
फि़क़्रे-सुखन हमारा ज़माने के ग़म लिये
हुस्‍नो अदा को बेचते बाज़ार हम नहीं।

3.
किसी को मस्‍ती, मज़े का आलम, प्रभु तुम्‍हारे भजन में आए
हमें मज़ा ये ग़ज़ल में तेरे वचन की हर इक कहन में आए।
खिले हुए हैं, हज़ार रंगों के फ़ूल नज़रों की राह में पर,
जिसे न चाहत हो तोड़ने की, वही मेरे इस चमन में आए।
सभी पे छाया हुआ है जादू, बहुत कमाने की आरज़ू है
खुदा ही जाने, उधर गया जो, न जाने फिर कब वतन में आए।
तुझे पता है, मेरे किये में, सियाह कितना, सफ़ेद कितना
जो इनमें अंतर, करे उजागर, वो धूप मेरे सहन में आए।
कहा किसी ने बुरा कभी तो, चुभन हमेशा, रही दिलों में
कभी किसी को, लगे बुरा जो, न बोल ऐसा जहन में आए।
अगर जहां हो तेरे मुखालिफ़, कभी न डरना, कभी न झुकना
खुदा निगहबॉं बना हो जिसका तपिश न उस तक अगन में आये।
तुझे ऐ 'राही' कसम खुदा की, सभी को अपना, बना के रखना
मिलो किसी से, सुकूँ वो देना, जो दिल से दिल की छुअन में आये।

4.
सज्‍़दे में जो झुके हैं तेरे कर्ज़दार है
दीदार को तेरे ये बहुत बेकरार हैं।
मेरे खि़लाफ़ जंग में अपने शुमार हैं
हमशीर भी हैं, उनमे कई दिल के यार हैं।
ऑंधी चली, दरख्‍़त कई साथ ले गई
बाकी वही बचे जो अभी पाएदार हैं।
ऐसा न हो कि आखिरी लम्‍हों में हम कहें
अपने किये पे हम तो बहुत शर्मसार हैं।
बेचैनियों का राज़ बतायें हमें जरा
फ़ूलों भरी बहार में क्‍यूँ बेकरार हैं
किससे मिलायें हाथ यहॉं आप ही कहें
जब दिल ये जानता है सभी दाग़दार हैं।
सपने नये न और दिखाया करें हमें
दो वक्‍त रोटियों के सपन तार-तार हैं।
सौ चोट दीजिये, न मगर भूलिये कि हम
हारे न जो किसी से कभी वो लुहार हैं।
कपड़ों के, रोटियों के, मकानों के वासते
जाता हूँ जिस तरफ़ भी उधर ही कतार हैं।
तुम ही कहो कि छोड़ इसे जायें हम कहॉं
इस गॉंव में ही मॉं है सभी दोस्‍त यार हैं।
कहता नहीं कि हैं सभी 'राही' यहॉं बुरे
पर जानता हूँ इनमें बहुत से सियार हैं।



5.
इधर इक शम्‍अ तो उस ओर परवाना भी होता था
नसीबे-इश्‍क में मिलना-ओ-मिट जाना भी होता था।
अरे साकी हिकारत से हमें तू देखता क्‍या है
हमारी ऑंख की ज़ुम्बिश पे मयखाना भी होता था।
समय के साथ ये सिक्‍का पुराना हो गया तो क्‍या
कभी दरबार में लोगों ये नज़राना भी होता था।
हमारे बीच का रिश्‍ता हुआ क्‍यूँ तल्‍ख अब इतना
कभी मेरी मुहब्‍ब्‍त में तू दीवाना भी होता था।
मैं अरसे बाद लौटा हूँ तो दिन वो याद आये जब
यहॉं महफिल भी जमती थी तेरा आना भी होता था।
भला क्‍यूँ भीड़ में इस शह्र की हम आ गये लोगों
मुहब्‍बत कम नहीं थी गॉंव में दाना भी होता था।
सुनाये क्‍या नया 'राही', ठहर कर कौन सुनता है
हमें जब लोग सुनते थे तो अफ़साना भी होता था।

6.
रात हो या दिन, कभी सोता नहीं,
सूर्य का विश्राम पल होता नहीं।
चाहतें मुझ में भी तुमसे कम नहीं,
चाहिये पर, जो कभी खोता नहीं।
मोतियों की क्‍या कमी सागर में है,
पर लगाता, अब कोई गोता नहीं।
क्‍यूँ मैं दोहराऊँ सिखाये पाठ को
आदमी हूँ, मैं कोई तोता नहीं।
देख कर ये रूप निर्मल गंग का
पाप मैं संगम पे अब धोता नहीं।
जब से जानी है विवशता बाप की,
बात मनवाने को वो रोता नहीं।
हैं सभी तो व्‍यस्‍त 'राही' गॉंव में
मत शिकायत कर अगर श्रोता नहीं।

7.
थक गये जब नौजवॉं, ये हल निकाला
फिर से बूढ़ी बातियों में तेल डाला।
जो परिंदे थे नये, टपके वही बस
इस तरह बाज़ार को उसने उछाला।
देर मेरी ओर से भी हो गयी, पर
आपने भी ये विषय हरचन्‍द टाला।
जब उसे कॉंधा दिया दिल सोचता था
साथ कितना था सफ़र, क्‍यूँ बैर पाला।
भूख क्‍या होती है जबसे देख ली है
क्‍यूँ हलक में जा अटकता है निवाला।
एकलव्‍यों की कमी देखी नहीं पर
देश में दिखती नहीं इक द्रोणशाला।
तोड़कर दिल जो गया वो पूछता है
दिल हमारे बाद में कैसे संभाला।
जिंदगी तेरा मज़ा देखा अलग है
इक नशा दे जब खुशी औ दर्द हाला।
त्‍याग कर बीता हुआ इतिहास इसने
हरितिमा का आज ओढ़ा है दुशाला।
बस उसी 'राही' को मंजि़ल मिल सकी है
राह के अनुरूप जिसने खुद को ढाला।

रचनाकार का परिचय
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  1. जन्‍म-26 जुलाई 1956 श्‍योपुर कलॉं जिला मुरैना में। (अब श्‍योपुर भी एक जिला है)
  2. उच्‍चतर माध्‍यमिक तक अधिकॉंश शिक्षा मुरैना जिले में। 1976 में ग्‍वालियर के माधव
  3. इंस्‍टीट्यूट ऑफ़ टेक्‍नॉलॉजी एण्‍ड साईंस से सिविल इंजीनियरिंग में स्‍नातक
  4. 1980 से मध्‍यप्रदेश जल संसाधन विभाग में कार्यरत।
  5. वर्तमान में मध्‍यप्रदेश जल संसाधन विभाग में संचालक, जल मौसम विज्ञान के पद पर
  6. सूचना प्रबंधन, मानव संसाधन विकास, आर्गेनाईज़ेशनल डेव्‍हलपमेंट, चेंज मैनेजमेंट,
  7. इन्‍टीग्रेटेड रिवर बेसिन प्‍लॉनिंग आदि विषयों पर विशेष नियंत्रण।

बुधवार, 18 जुलाई 2012

सबसे बतियाती हुई गज़लें


अशोक  रावत की ग़ज़लों ने काव्यप्रेमियों  को आलोड़ित किया. रावत जी की रचनात्मक उर्जा उनके गहरे सामाजिक अनुभवों और सरोकारों की उपज है. वे ऐसे रचनाकार हैं, जो बहुत आसानी से अपने निजी अनुभवों को ऐसी जमीन दे देता है, जो निजीपन से बाहर निकलकर सबके अनुभव का हिस्सा बन जाते हैं. वे अपनी गंभीर और थका देने वाली कार्यालयीय  जिम्मेदारियों के बीच शब्दों से भी जूझते रहते हैं. कई बार ऐसे ही क्षणों में भीतर कुछ चमकता है और उनकी सारी थकन मिट जाती है. वे मानते  हैं कि  एक अच्छा कवि होने के लिए एक अच्छा आदमी होना बहुत जरूरी है. उनके व्यवहार में भी यह नजर आता है. इसीलिये उनकी गजलें सीधे अपने पाठक से बतियाती हुई प्रस्तुत होती हैं.
साखी पर उनकी गज़लें पढ़कर शायर नीरज गोस्वामी ने कहा, रावत जी की बेजोड़ ग़ज़लों के साथ, इससे बेहतर साखी का आगाज़ नहीं हो सकता था. सकारात्मक सोच और ज़माने की दुश्वारियों को निहायत ख़ूबसूरती से रावत जी ने अपनी ग़ज़लों में प्रस्तुत किया है. ग़ज़ल के कहन में ताजगी और रवानी है. मेरी ढेरों दाद उन तक पहुंचाए. साखी को इस लाजवाब प्रस्तुति पर मेरी ढेरों शुभकामनाएं . नीरज ने रावत जी को कोट किया, "सारी कलाएं जीवन में आनंद की सृष्टि के लिये हैं लेकिन न जाने क्यों और किन लोगों ने काव्य कला को घटनाओं और दुर्घटनाओं का गोदाम बनाकर रख दिया है जिसमें घुसते ही साँस घुटने लगती है. " "मेरा सफ़र किसी मंच पर जाकर ख़त्म नहीं होता. मेरी मंज़िल आदमी के मन तक पहुँचने की है. मैं जानता हूँ यह बहुत कठिन काम है लेकिन आसानियों में मुझे भी कोई आनंद नहीं आता." और कहा कि अशोक जी के  विचार उनकी ग़ज़लों की तरह ही प्रेरक हैं...कितनी सहजता से उन्होंने कितनी सच्ची बात कह दी है....नमन है उनकी  कलम को.
तिलक राज कपूर ने कहा कि इन लाजवाब ग़ज़लों को पढ़कर; समझकर नतमस्तक । खूबसूरत भाव, कथ्‍य व शिल्‍प। नि:शब्‍द हूँ। कहीं-कहीं जो अटकाव दिखा वह शायद आप स्‍पष्‍ट कर सकें।

मनुष्यों की तरह यदि पत्थरों में चेतना होती,

कोई पत्थर मनुष्यों की तरह निर्मम नहीं होता.
इस शेर में कुछ गंभीर समस्‍या है, पहली बात तो यह है कि बावज्‍़न होते हुए भी पहला मिस्रा प्रवाह में नहीं है जिसका मुख्‍य कारण इस बह्र के रुक्‍न 'मफ़ाईलुन्' की प्रकृति है। दूसरी समस्‍या यह है कि दूसरी पंक्ति कहती है कि पत्‍थर चेतनाविहीन होते हुए भी मनुष्‍यों की तरह निर्मम होता है। अचेतन से निर्मम का यह संबंध असंगत है। अगर यह भी मान लिया जाये कि पत्‍थर को अचेतन नहीं मनुष्‍यों जैसी चेतना से विहीन माना गया है तो काव्‍य-प्रवाह की दृष्टि से सरलता की समस्‍या है। इस शेर की मूल भावना यह ध्‍वनित होती है कि मनुष्य निर्मम होता है और पत्‍थर नहीं लेकिन गठन में यह प्रभाव उत्‍पन्‍न नहीं हो पा रहा है। इस शेर से ध्‍वनित बात जो मुझे समझ आई वो कुछ ऐसे है कि:
अगर पत्‍थर में होती चेतना इन्‍सान के जैसी
कोई पत्‍थर किसी इन्‍सान सा निर्मम नहीं होता।
या
मनुष्‍यों सी नहीं है चेतना, फिर भी कोई पत्‍थर
किसी इंसान के जैसा कभी निर्मम नहीं होता।

एक और बात ---


परिंदों की ज़रूरत है खुला आकाश भी लेकिन,

कहीं पर शाम ढलते ही ज़रूरी है ठिकाना भी.
खुला आकाश परिंदों की मुख्‍य ज़रूरत है लेकिन पहली पहली पंक्ति में ये ज़रूरत सामान्‍य हो गयी है. शेर में जो कहना चाहा गया है वह कुछ ऐसा लगता है कि:
खुले आकाश की चाहत परिंदों को रही लेकिन
ढले जब शाम तो उनकी ज़रूरत है ठिकाना भी.

देवी नागरानी  का कहना है कि सब की सब ग़ज़लें अपने शायरी के फन से लबालब. पढ़ते हुए गुनगुनाहट का तत्व लिए हुए. रावत जी को मेरी शुभकमनयें इस सुंदर प्रस्तुति के लिए.


  प्रतुल वशिष्ठ के मुताबिक 'गज़लकार' अपनी ही गजलों का श्रोता या पाठक होना नहीं चाहता. कभी-कभी 'कविता' या 'ग़ज़ल' को श्रोताभाव से पढ़कर दोहरे सुख को लेना भी नहीं छोड़ना चाहिये.


बढ़े चलिये, अँधेरों में ज़ियादा दम नहीं होता,

निगाहों का उजाला भी दियों से कम नहीं होता. ......
को प्रतुल ने  बहुत उम्दा शेर कहा.

भरोसा जीतना है तो ये ख़ंजर फैंकने होंगे,

किसी हथियार से अम्नो- अमाँ क़ायम नहीं होता
को  लाजवाब बताया.
डा त्रिमोहन तरल ने कहा, हिन्दी भाषा के संस्कारों और मानवीय सरोकारों से सराबोर ग़ज़लें आदरणीय रावतजी की ही हो सकतीं थीं . पढ़ने  वालों को आनंद आना ही था. रावतजी को बधाई और राय साहब को धन्यवाद
.
संजीव गौतम और सुमन ने भी साखी के पुनरारंभ की सराहना की. 







२८ जुलाई शनिवार को पढ़िए शायर तिलकराज कपूर की रचनाएँ

शनिवार, 7 जुलाई 2012

अशोक रावत की ग़ज़लें

रचनाकार का वक्तव्य 
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अशोक रावत
अपनी ही ग़ज़लों पर कोई टिप्पणी करना  मुझे  मुनासिब नहीं लगता.  कभी कोई मुकाम  ज़िंदगी  में हासिल हो तो कुछ कहने  की हिमाक़त भी करूँ  लेकिन  जितना वक़्त गुज़रता चला जाता है ऐसा लगता है,  कुछ बात बन नहीं रही.   मै क्यों लिखता  हूँ  और कैसे लिखता हूँ  ये जिज्ञासाएं भी  किसी के  मन में  आख़िर क्यों उठती होगीं ?  वैसे भी ग़ज़ल कोई  छोटा और आसान विषय नहीं  है. अभिव्यक्ति की  बारीक़ियाँ  इतनी कि  उनमें डूबते जाइए और लगेगा कि अभी और  न  जाने कितनी गहराइयाँ  बाक़्री हैं.  ये  जो बारीक़ियाँ  हैं , कविता  के   किसी भी फार्म के लिये ज़रूरी हैं.   काफ़ी  लोग  इस बात पर  कुतर्क भी करते हैं. किसी भी विचार का कविता होना  इन बारीक़ियाँ  से गुज़रना  ही है वरना  गद्य और कविता में अंतर  ही क्या है.  ये बारीक़ियाँ  ही कला के  अनुशासन की  रचना करती है.  अनुशासन ही  विचार में   सौंदर्य की स्थापना  करता है.  और अभिव्यक्ति का सौंदर्य ही  कविता और पाठक के बीच एक रिश्ता है. जब ये रिश्ता टूट जाता है, तो पाठक कविता को फूटी आँख से नहीं  देखता. गद्य या पद्य में अभिव्यक्त  होने से  विचार की श्रेष्ठता   प्रभावित नहीं होती.  यह  अनुशासन  या छंद का  दायित्व नहीं कि वह  विचार को  श्रेष्ठ बना दे. सारी कलाएं जीवन में आनंद  की सृष्टि के लिये हैं  लेकिन न जाने क्यों और किन लोगों ने काव्य  कला  को घटनाओं और  दुर्घटनाओं का गोदाम बनाकर रख  दिया है  जिसमें घुसते ही  साँस  घुटने लगती है.  यद्यपि  कविता पर  इस प्रकार की टिप्पणी करना  ठीक नहीं क्यों कि लेखन कोई सामुदायिक या संस्थागत कार्य न होकर एक व्यक्तिगत कार्य है और एक या कुछ कवियों   द्वारा लिखी कविता के लिये पूरे कवि  समुदाय को ज़िम्मेदार नहीं  ठहराया जा सकता.  लेकिन समकालीनता   के नाम पर  कविता को ऐसे संदर्भों के  बोझ से  लाद   दिया गया है कि  उसकी ओर देखने का भी मन नहीं करता.
बिना कलात्मकता के  कोई कविता कविता नहीं हो सकती. जैसे  बिना चीनी के कोई मिठाई, मिठाई नहीं हो सकती. लिखना मेरे लिये एक ज़िम्मेदारी का काम है,  जिसे मैं ने लापरवाही  से कभी नहीं निभाया. जो मैं ने जिया है वही लिखा है.  मेरा लेखन किसी प्रतिबद्ध  विचारधारा का वफ़ादार  नहीं रहा.  मेरी वफ़ादारी  सिर्फ़ मानवीय सरोकारों से रही.  मेरा सफ़र  किसी मंच पर जाकर ख़त्म नहीं होता. मेरी मंज़िल आदमी के मन तक पहुँचने की है.  मैं जानता हूँ यह बहुत कठिन काम है लेकिन आसानियों में मुझे भी कोई आनंद नहीं आता. मैं अपने लिये सिर्फ़ चुनौतियाँ चुनता हूँ और उनका सामना करने में अपने आप को  खपा देता हूँ. सारे खतरे उठाकर सिर्फ़  सामना करता हूँ. जानता हूँ आदमी की ज़िंदगी में न कोई  विजय अंतिम है न  कोई पराजय. उसे तो हर रोज़ एक युद्ध करना है बिना हार जीत की परवाह करते हुए.  कल  की कभी ज़्यादा परवाह नहीं की. आज को जिया  और  पूरी निष्ठा से जिया.   मेरी ग़ज़लें मेरी ज़िंदगी का हिस्सा  हैं. हाँ, इतना  ज़रूर है कि मैं  उन पर मेहनत करता हूँ.  मैंने कितना लिखा , इस बात का मेरे लिये कोई अर्थ नहीं है, मेरे  लिये इस बात का अर्थ है कि मैंने क्या लिखा है.  कभी  कभी ऐसा लगता है ये समाज और सारी  संस्थाएं   आदमी के शोषण का  साधन बनके  रह गई हैं.मेरी कविता  मुझे हमेशा इनसे लड़ने का साहस देती है. मैं ने अपनी ग़ज़लों  से इससे ज़्यादा  कभी  कुछ चाहा भी नहीं.



                                 अशोक रावत की ग़ज़लें
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1.

बढ़े   चलिये,  अँधेरों  में ज़ियादा दम नहीं होता,
निगाहों  का  उजाला भी दियों से कम नहीं होता.

भरोसा  जीतना  है  तो  ये ख़ंजर   फैंकने होंगे,
किसी हथियार से अम्नो- अमाँ क़ायम नहीं होता.

मनुष्यों की  तरह  यदि पत्थरों में चेतना  होती,
कोई पत्थर मनुष्यों की तरह  निर्मम  नहीं होता.

तपस्या  त्याग  यदि भारत की मिट्टी में नहीं होते,
कोई  गाँधी नहीं होता,  कोई  गौतम  नहीं होता.

ज़माने  भर  के  आँसू उनकी आँखों में रहे तो क्या,
हमारे  वास्ते  दामन तो उनका नम नहीं होता.

परिंदों  ने  नहीं  जाँचीं  कभी  नस्लें दरख्तों  की,
दरख़्त उनकी नज़र में साल या शीशम नहीं होता.



हमें  भी ख़ूबसूरत  ख़्वाब  आँखों में सजाने दो,
हमें  भी गुनगुनाने  दो, हमें  भी  मुस्कराने दो.

हमें  भी  टाँगने  दो चित्र  बैठक में उजालों के,
हमें  भी एक  पौधा  धूप का  घर में लगाने  दो.

हवाओं  को पहुँचने दो हमारी खिड़कियों तक भी,
हमारी  खिड़कियों  के  काँच टूटें  टूट जाने दो.

हवा इतना करेगी बस कि कुछ दीपक बुझा देगी,
मुँडेरों पर सजा दो और दियों को झिलमिलाने  दो.

समझने दो उसे माचिस का रिश्ता मोमबत्ती  से,
जलाता  है  जलाने  दो  बुझाता  है बुझाने दो.

हमें  कोशिश  तो करने  दो समंदर पार करने की
हमारी  नाव  जल में  डूबती है  डूब  जाने दो.


3. 

फूलों  का  अपना  कोई  परिवार  नहीं होता,
ख़ुशबू   का  अपना कोई घर द्वार नहीं होता.

हम गुज़रे कल की आँखों का सपना ही तो हैं,
क्यों  मानें  सपना  कोई  साकार  नहीं  होता.

इस दुनिया में अच्छे लोगों का ही बहुमत है,
ऐसा  अगर  न  होता  ये संसार नहीं  होता.

कितने ही  अच्छे  हों  काग़ज़ पानी के रिश्ते,
काग़ज़  की  नावों से  दरिया पार नहीं होता.

हिम्मत हारे तो सब कुछ नामुमकिन  लगता है,
हिम्मत  कर लें तो कुछ भी  दुश्वार नहीं होता.

वो  दीवारें  घर  जैसा  सम्मान  नहीं  पातीं,
जिनमें  कोई  खिड़की  कोई  द्वार  नहीं होता.

4.

जिन्हें अच्छा  नहीं  लगता हमारा मुस्कराना भी,
उन्हीं के साथ लगता है  हमें तो  ये ज़माना भी.

इसी  कोशिश  में दोनों  हाथ मेरे हो गये ज़ख़्मी,
चराग़ों को जलाना  भी, हवाओं  से  बचाना भी.

अगर  ऐसे  ही  आँखों   में जमा होते रहे आँसू,
किसी  दिन  भूल जायेंगे खुशी में मुसकराना भी.

उधर ईमान की ज़िद है कि समझौता  नहीं  कोई,
मुसीबत  है  इधर दो वक़्त की रोटी जुटाना  भी.

किसी ग़फ़लत में मत रहना, नज़र में आँधियों के है,
तुम्हारा   आशियाना   भी  हमारा  शामियाना  भी.

परिंदों  की  ज़रूरत है खुला आकाश  भी  लेकिन,
कहीं  पर शाम  ढलते ही  ज़रूरी है  ठिकाना भी.

ज़ियादा  सोचना  बेकार  है, इतना समझ लो  बस,
इसी  दुनिया  से लड़ना है, इसी से है निभाना भी.




गूगल से साभार

                                                      5. 

आख़िर मौसम की मनमानी क्यों स्वीकार करूँ.
क्यों  मैं  फूलों से नफ़रत काँटों से प्यार करूँ.

क्या  जैसी  दुनिया है  वैसा  ही हो जाऊँ मैं,
और इन  आँधी तूफ़ानों  की  जै-जैकार  करूँ.

काग़ज़  की  नावों  को लेकर माँझी बैठे  हैं,
इनके  बूते  मैं  दरिया को   कैसे पार करूँ.

इस मुद्दे  पर मैं अपनी ग़ज़लों के साथ नहीं,
ग़ज़लें  ये कहती  हैं मैं उनका व्यापार करूँ.

मेरे  अधिकारों  को लेकर सब के सब चुप हैं,
अपनों से ही झगड़ा आखिर  कितनी बार करूँ.

अपने  हाथों   के  पत्त्थर तो मैंने फ़ेंक  दिये,
लोगों  को  चुप  रहने  पर कैसे तैयार  करूँ.

गाँधी  के  हत्यारे  भी हैं   गाँधी  टोपी में,
इनके  प्रस्तावों  को  मैं  कैसे स्वीकर करूँ.

6.

ढूँढ़ने  पर भी नहीं मिलती  कहीं अच्छी ख़बर,
हादसे   ही   हादसे  अख़बार के हर पृष्ट  पर.

दिल में  बेचैनी  बढ़ाने वाली  घर की चिठ्ठियाँ,
खोलता हूँ जब लिफ़ाफ़ा तो मुझे लगता है डर.

अब  न लपटें ही निकलती हैं न उठता है धुआँ,
जल  रहा   है एक ऐसी  आग में मेरा शहर.

राहज़न  ही लूट  लेते इससे बेहतर  था हमें,
जिस   तरह  से  रास्ते में पेश आये राहबर.

उम्र  भर  के  फ़ासले पर हैं  हमारी मंज़िलें,
साथ  में  वीरानियाँ लेकर  चले हैं हमसफ़र.

ऐसा   लगता   है अँधेरे की तरफ़दारी में हो,
जिस तरह सूरज निकलता है यहाँ आकाश  पर.



रचनाकार  के बारे में


शिक्षा: बी. ई. (सिविल इंजी), अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़
जन्म: 15.नवम्बर 1953,  गाँव  मलिकपुर, ज़िला मथुरा में
भारतीय  खाद्य निगम ज़ोनल आफ़िस नोएडा  में डिप्टी जनरल मैनेजर  के पद पर  कार्यरत
थोड़ा सा ईमान ग़ज़ल संग्रह  प्रकाशित
हिंदी की प्रमुख राष्ट्रीय पत्र - पत्रिकाओं, ग़ज़ल संकलनों, इंटरनेट  पत्रिकाओं, में रचनाओं  का प्रकाशन.  काव्य समारोहों  में काव्य पाठ, रेडिओ और दूर-दर्शन से रचनाओं का प्रसारण.
स्थाई पता: 222, मानस नगर, शाहगंज, आगरा,  282010
E-mail:  
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फोन: नोएडा: 09013567499 ,  आगरा: 09458400433