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गुरुवार, 4 अगस्त 2011

जितेन्द्र जौहर की कवितायें

जितेन्द्र 'जौहर' का जन्म 20 जुलाई,1971 को कन्नौज में हुआ| उन्होंने अंग्रेजी भाषा एवं साहित्य में परास्नातक पूरा किया| सम्प्रति वे ए. बी. आई. कॉलेज, रेणुसागर (सोनभद्र) में अध्यापक के रूप में कार्यरत हैं| वे गीत, ग़ज़ल, दोहा, मुक्तछंद, हाइकू, मुक्तक, हास्य-व्यंग्य, लघुकथा समेत  साहित्य की अनेक विधाओं में लेखन कर रहे हैं| वे प्रेरणा के सम्पादकीय सलाहकार और प्रयास के विशेष सहयोगी के तौर पर भी काम कर रहे हैं| तमाम पत्र-पत्रिकाओं, वेब मैग्ज़ीन्स एवं न्यूज़ पोर्टल्स पर उनकी रचनात्मक उपस्थिति महसूस की जा सकती है। साहित्य श्री, नागार्जुन सम्मान, साहित्य भारती, महादेवी वर्मा सम्मान से उन्हें अलंकृत किया जा चुका है| जौहर की कुछ रचनाएँ प्रस्तुत हैं......

१.
लम्बी दूरी है


अम्मा ने आटे के नौ-दस,
लड्‌डू बाँध दिये।
बोलीं, 'रस्ते में खा लेना,
लम्बी दूरी है !'


'ठोस' प्रेम का 'तरल' रूप,
आँखों ने छ्लकाया।
माँ की ममता देख कलेजा,
हाथों में आया।
'दही-मछरिया' कहकर मेरे,
गाल-हाथ चूमे।
समझाया कि 'सिर पे गमछा
बाँध लियो लू में !'


बार-बार पल्लू से गीली,
आँखें पोंछ रहीं ;
दबे होंठ से टपक रही,
बेबस मंजूरी है।
बोलीं, 'रस्ते में खा लेना,
लम्बी दूरी है !'


पिता मुझे बस में बैठाने,
अड्‌डे तक आये।
गाड़ी में थी देर, जलेबी-
गरम-गरम लाये।


छोटू जाकर हैण्डपम्प से,
पानी भर लाया।
मुझे पिलाकर पाँव छुए,
कह 'चलता हूँ... भाया !'


तन की तन्दूरी ज्वाला,
दर-दर भटकाती है ;
गाँव छोड़के शहर जा रहा-
हूँ, मजबूरी है!
बोलीं, 'रस्ते में खा लेना,
लम्बी दूरी है !'


ज्यों ही गाड़ी छूटी, हाय!
पिता बहुत रोये।
झुर्री वाले गाल, आँख के-
पानी से धोये !


रुँधे गले से बोले, 'लल्ला
चिट्‌ठी लिख देना...
रस्ते में कोई कुछ खाने-
को दे, मत लेना।



ज़हरख़ुरानी का धंधा,
चलता है शहरों में ;
सोच-समझकर चलना, बेटा !
बहुत ज़रूरी है !'
बोलीं, 'रस्ते में खा लेना,
लम्बी दूरी है !'


शहर पहुँचकर मैंने दर-दर
की ठोकर खायी।
नदी किनारे बसे गाँव की,
याद बहुत आयी।


दरवाज़े का नीम, सामने-
शंकर की मठिया।
पीपल वाला पेड़ और वह,
कल्लू की बगिया।



मुखिया की बातें कानों में,
रह-रहकर गूँजी ;
'घर का चना-चबेना, बेटा !
हलवा-पूरी है!'
बोलीं, 'रस्ते में खा लेना,
लम्बी दूरी है !'


 
२.            
अम्मा की दुर्दशा 


रोज़ी-रोटी मिली शहर में,
कुनबा ले आया।
बड़ी बहू को रास न आया,
अम्मा का साया।



ये कह-कहकर अम्मा पे,
गुर्राय घड़ी-घड़ी।
'कौन बनाके दे बुढ़िया को,
चाय घड़ी-घड़ी ?'


बेटे के घर बोझ बनी,
माँ की बूढ़ी काया !
बड़ी बहू को रास न आया,
अम्मा का साया।



पत्नी की जंघा सहलाने,
वाले हाथों ने ।
अम्मा के पग नहीं दबाये,
दुखती रातों में !


रूप-जाल में कामुकता ने,
इतना उलझाया।
बड़ी बहू को रास न आया,
अम्मा का साया।

 

माँसहीन हाड़ों पे सर्दी,
ने मारे चाँटे।
अगहन-पूस-माघ अम्मा ने,
कथरी में काटे।


बहू, बहू है, बेटे को भी,
तरस नहीं आया।
बड़ी बहू को रास न आया,
अम्मा का साया।



खटिया पे लेटीं अम्मा,
सिरहाने पीर खड़ी।
बहू मज़े से डबल-बेड पर,
सोये पड़ी-पड़ी।


क्या मतलब, अम्मा ने खाना-
खाया, न खाया !
बड़ी बहू को रास न आया,
अम्मा का साया।


रात-रातभर खाँस-खाँसकर,
साँस उखड़ जाती।
नींद न आती, करवट बदलें,
पकड़-पकड़ छाती।


जीवन पर मँडराती, पतझर-
की काली छाया !
बड़ी बहू को रास न आया,
अम्मा का साया।





३.
बँटवारा 
  

बेटों ने आँगन में इक
दीवार खड़ी कर दी ;
पिता बहुत हैरान,
उधर महतारी सिसक रही !



बड़कू बोला, "अम्मा के
सारेऽऽऽ गहने लेंगे !"
मझला पूछे, "बगिया वाला
खेत किसे देंगे ?"



ये सवाल सुन, मइया का दिल
चकनाचूर हुआ ;
बूढ़े पाँवों के नीचे की
धरती खिसक रही।
पिता बहुत हैरान,
उधर महतारी सिसक रही !



बँटवारे ने, देखो! कितनी
राह गही सँकरी।
बड़कू ने गइया खोली, तो
मझले ने बकरी !



रस्सी थामे निकल पड़े, ले
नये ठिकाने पर ;
मुड़-मुड़ खूँटा ताके बेबस
बछिया बिदक रही !
पिता बहुत हैरान,
उधर महतारी सिसक रही!



छोटू तो छोटा ठहरा,
कुछ बोल नहीं पाया।
उसके हिस्से आया,
अम्मा- दद्‌दा का साया।



"गइया और मड़इया तो
दे दो बड़के भइया !"
इतना भी कहने में उसको
लगती झिझक रही।
पिता बहुत हैरान,
उधर महतारी सिसक रही!

 
४.
हमारा दौर : कुछ चित्र


काल-वक्ष पर टाँक रहे हो,
कायरता के मंज़र जैसे !
बाहर से हलचल-विहीन पर,
भीतर एक बवंडर जैसे !



क्रोध-ज्वार मुट्‌ठी में भींचे,
साहस थर-थर काँप रहा है।
ध्वनि-विहीन विप्लव का स्वर,
अम्बर की दूरी नाप रहा है।


श्वेत-श्याममय लाल कोष्ठकों-
से विषाद-सा टपक रहा है।
भित्ति-वक्ष से सटा सिसकता,
टँगा कील पर फड़क रहा है।


मरी हुई तारीख़ों वाला,
जीवन एक कलण्डर जैसे !
बाहर से हलचलविहीन पर,
भीतर एक बवंडर जैसे !



चाटुकारिता के कौशल ने,
नाप लिये हैं शिखर समूचे।
जीवनभर तुम रहे कर्मरत्
एक इंच ऊपर न पहुँचे।


गतिमय स्थिरता के साधक !
लहर-वलय में ख़ूब विचरते।
सीमाओं में बँधे निरंतर,
पर असीम का अभिनय करते।



ठहरे हुए जलाशय-से हो,
सपने किन्तु समुन्दर जैसे!
बाहर से हलचल-विहीन पर,
भीतर एक बवंडर जैसे!



धरा-धाम की प्यास विकल है,
मेघ सिंधु में बरस रहे हैं।
वृक्ष खड़े निर्पात, सरोवर-
बूँद-बूँद को तरस रहे हैं।


सीख लिया है आँख मूँदना,
कर्ण-कुहर अब नहीं खोलते।
कुछ भी होता रहे कहीं पर,
अधर तुम्हारे नहीं डोलते।



विकृत अनुयायी-स्वरूप में,
गाँधी जी के बंदर जैसे।
बाहर से हलचल-विहीन पर,
भीतर एक बवंडर जैसे !



             ५.
चुनावी मौसम
 

फिर चुनाव का मौसम आया,
इश्तिहार आये!
आकर्षक-मनभावन वादे,
बेशुमार आये!


गली-गली, चौखट, चौराहे
पर लटके वादे।
एकनिष्ठ हो सभी निशाना
वोटों पर साधे।


हंस-वेश में बग़ुले काफी
होशियार आये!
फिर चुनाव का मौसम आया,
इश्तिहार आये।


अस्पताल, सड़कें, तकनीकी
विद्यालय होंगे।
और झोपड़ी में अँगरेज़ी
शौचालय होंगे!


खादी के मन में विकास के
सद्‌विचार आये।
फिर चुनाव का मौसम आया
इश्तिहार आये।


संपर्क .....
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