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गुरुवार, 17 नवंबर 2011

मदन मोहन का दंगल

शायर सर्वत जमाल की गजलों पर खूब मगजमारी हुई, मुचैटाबाजी हुई, ईंट-पत्थर चले| मदन मोहन शर्मा ने तय कर रखा था कि इस बार मैदान से किसी बीर-बबर को जाने नहीं देंगे| उन्होंने हर  किसी को रगडा, घसीटा, मारा, बिगडैल भैसे की तरह सबको डराते  रहे|  बहस शुरू की राजेश उत्साही ने| उन्होंने कहा,  सर्वत साहब की ग़ज़लें ऐसी लगीं जैसे कोई हमारे अंदर से ये बातें कह रहा हो। उनकी इन ग़ज़लों में सारा समकालीन दर्द जैसे उमड़कर सामने आ गया है। उल्‍लेखनीय बात यह भी है कि सर्वत साहब कहीं कहीं जिस अंदाज से कहते हैं, वह गहरे तक छीलकर रख देता है। जैसे यह शेर-तरक्कियां तुम्हारे पास हैं तो हैं, हमारे पास भूख है, अकाल है| उनकी इन गज़लों में दूसरी उल्‍लेखनीय बात यह भी लगी कि शब्‍दों का उपयोग बहुत किफायत के साथ किया गया है। ग़ज़ल कहने के लिए उन्‍होंने जो भी खाका चुना है, वह महत्‍वपूर्ण है। कई बार चमत्‍कार पैदा करने के लिए शब्‍दों का ढेर लगा दिया जाता है। सर्वत जी इससे बचते नजर आते हैं। यह सतर्कता उनकी ग़ज़लों को ऊंचाईयां देती है। 

तिलक राज कपूर के मुताबिक  सर्वत साहब की ग़ज़लें कुछ ऐसी हैं कि: शब्‍द अंदर से जब निकलता है, वक्‍त के साथ-साथ चलता है। ऑंधियॉं क्‍या डरायेंगी उसको,थाम कर जो मशाल चलता है। सर्वत साहब की लेखनी दीप नहीं मशाल है। आस पास के माहौल से अविचलित, सार को व्‍यक्‍त कर जाना सरल तो नहीं होता| नीरज गोस्वामी ने लिखा, ऐसे अशआर पढ़ कर किसकी बोलती बंद नहीं होगी| मुझे इस बात का फख्र  है कि  मैं सर्वत जमाल साहब को जानता हूँ, उन्हें सिर्फ सुना है लेकिन उस से कोई फर्क नहीं पड़ता| हमने जिसे देखा है उसे भी कहाँ जान पाते हैं| गज़ब के इंसान हैं और गज़ब के शेर कहते हैं, उनका फोन आ जाये तो समझिये आपकी सारी मुश्किलें उदासियाँ तल्खियाँ दुम दबा कर भाग खड़ी होंगीं| ठहाकों का सैलाब आ जायेगा| आपका मन फूलों सा हल्का हो जायेगा| हम खुदा के शुक्र गुज़ार हैं कि  आज की दुनिया में जहाँ मुर्दनी सब के ज़हनों पर हावी रहने की कोशिश में रहती है, हमारे पास सर्वत जमाल हैं| दुआ करता हूँ के वो अपने चाहने वालों को अपने कलाम से यूँ ही नवाजते रहें| अविनाश वाचस्पति नस कहा, पढ़ा तो जाना कि इनके पास अपनी कोई बात नहीं, ये तो सब हमारी बात ही कहते हैं। यह एक धुन है, फन है, हरेक के बस का नहीं यह जुनून है। 

कवि जितेन्द्र जौहर के मुताबिक सर्वत जमाल की ग़ज़लें अदब की उस श्रेष्ठ ‘जमात’ की ग़ज़लें हैं जो चिंतन को कुरेदती हैं। कई शे’र ऐसे कि मस्तिष्क में काफी देर तक ठहरे रह जाते हैं; यथा-तमांचा सा न जाने क्यों लगा है, वतन वालों को मेरा प्यार लिखना| ऐसी ग़ज़लें अपने समय और समाज से सतत्‌ संवाद स्थापित करते रहने वाला शायर   ही कह सकता है| दानिश  ने लिखा, सरवत जमाल साहब ग़ज़ल सिर्फ ग़ज़ल कहने के लिए नहीं कहते बल्कि हर उस इंसान की बात को कह देने के लिए कहते हैं, जो खुद आसानी से नहीं कह पाता| उनकी ग़ज़लियात में हमेशा हमेशा आमजन का दर्द नुमायाँ रहता है , आक्रोश रहता है , आह्वान रहता है| इन खूबसूरत ग़ज़लों के हवाले से हर हर पढने वाला उनसे मुतासिर हुए बिन न रह सकेगा| बकौल गिरीश पंकज, हर शेर काबिलेदाद हैं| एक और प्रतिभा से परिचित हुआ| ब्लॉगर रवीन्द्र प्रभात ने कहा, सर्बत ज़माल साहब की ग़ज़लों से गुजरना आम जनजीवन के कचोटते दर्द से गुजरना है, उनके हर अलफ़ाज़ में छिपी होती है| हमारे समय की ऐसी छटपटाहट जो जनपथ की पीड़ा को अभिव्यक्त कर सके ! यही अभिव्यक्ति उनकी ग़ज़लों को ऊँचाई देती है और शेर-दर-शेर एक नया मुकाम भी ! वेद व्यथित ने कहा, सर्वत जमाल ने अपना कवि कर्म पूरी शिद्दत से निभाया है| अबनीश सिंह चौहान ने, एक ही आसमान सदियों से, चंद ही खानदान सदियों से, को कोट करते हुए कहा कि यही हो रहा है हमारे देश में| वंशवाद की काली छाया हर जगह अपना अड्डा बनाये हुए है| सभी गज़लें बेमिशाल हैं| सुनील गज्जाणी ने कहा, हर शेर उम्दा है और इनमें कोई कसर निकाल दे, ये मुमकिन नहीं , हर शेर वजनी है और अपने आप में बहुत कुछ बया करता है ! 


बिहारी ब्लॉगर उर्फ़ सलिल  वर्मा की टिप्पणी थी,  ये सारी गज़लें सरकार बनाने और और हुकूमत बदल देने का माद्दा रखने वाली हैं|
पहली गज़ल एक ऐसी बहर में कही गयी है जो बड़ी ‘रेयर’ है| एक इन्किलाब और क्रान्ति की सदा गूंजती है हर शेर में और ‘बढे चलो बहादुरो बढे चलो’ की हमबहर| दूसरी गज़ल में दो शेर एक ऐसे वाकये की ओर इशारा करते हैं जिसकी हकीकत तो हमें मालूम है, लेकिन ज़ाती तौर पर मुझे अखरता है, इसका बार-बार कहा जाना, अब वो चाहे मुनव्वर राना साहब के शेर हों या सरवत जमाल साहब के| तीसरी गज़ल शानदार है और और मौजूदा सूरतेहाल पर एक गहरा तंज है| एक-एक शेर एक तमाचे की तरह लगता है... उन आकाओं को नींद से जगाने की नाकामयाब कोशिश सा करता हुआ| आख़िरी गज़ल छोटी बहर में एक ख़ूबसूरत गज़ल है, मौजूदा दौर की मायूसी की तर्जुमानी करती हुई| कुल मिलाकर बेहतरीन ग़ज़लों का गुलदस्ता... गुलदस्ते के गुलों में कुछ और रंग के गुल होते तो रौनक कुछ और ही होती|

फिर आये मदन मोहन शर्मा| ललकारते हुए, झपटते हुए| पहली गजल के पहले शेर की पहली ही पंक्ति एक साथ न जाने कितने सवालात से रूबरू करा देती है। मिसरा  है, ‘’एक एक जहन पर वही सवाल है, अब देखिये--पहला सवाल बयान की सफाई का, यहाँ बयान साफ नहीं है, पता नहीं लगता कौन सा ‘वही सवाल है’| दूसरी पंक्ति भी इस सवाल को स्पष्ट नहीं करती। दूसरा सवाल लय का, इस मिसरे  में लयात्मकता सिरे से गायब है। तीसरा सवाल बहर का, कम से कम पहले मिसरे से तो बहर की झलक नहीं मिलती। चौथा सवाल पहली और दूसरी पंक्ति का परस्पर सम्बन्ध? दोनों मिसरे  एक-दूसरे का साथ दें तो शेर मुकम्मल हो। पहला मिसरा  तो इन सारे सवालों को लेकर खामोश है। हाँ, दूसरी पंक्ति तक आते-आते बहर कुछ-कुछ साफ होती सी लगती है। गजल के रुक्न हैं- फ़ऊ फ़ऊ फ़ऊ फ़ऊ फ़ऊ फ़ऊ, अर्थात् 12 12 12 12 12 12। परम आदरणीय बिहारी ब्लागर के शब्दों में 'बढे चलो बहादुरों बढे चलो' का हम बहर लेकिन पहला मिसरा  इस बहर में बिलकुल ठीक नहीं बैठता| अब मन समझाने के लिये पहली पंक्ति के प्रारम्भ के ‘एक एक’ को मात्रा गिरा कर ‘इक इक’ मान लें तो मिसरा  तो दूर से देखने पर बहर में दिखाई देता है लेकिन लयात्मकता का सवाल इससे भी हल नहीं होता, हो भी नहीं सकता| वास्तव में तो बहर भी दुरुस्त नहीं होती। पहली पंक्ति को सही बहर में पढ़ने के लिये ‘इकइ कजह नपर वही सवाल है’ इस तरह पढ़ना होगा| फलस्वरूप कुछ शब्द पूरी तरह निरर्थक हो जायेंगे और अरूज़ ऐसा करने की इजाजत किसी भी हाल में नहीं देता। शब्दों में होने वाली ऐसी तोड़-फोड़ ही लयात्मकता को प्रभावित करती है और लयभंग दोष को जन्म देती है। अब इसी शेर को अगर यूं पढ़ लें-‘इक इक (इकिक) जहन पे फिर यही सवाल है,लहू लहू में आज क्यों उबाल है।’ तो इस तरह बयान में सफाई भी आती है, दूसरी पंक्ति पहली पंक्ति का समर्थन भी करती है, लय भी स्थापित होती है, शेर बहर से खारिज भी नहीं होता, साथ ही साथ पहली पंक्ति से ही बहर का निर्धारण करने में आसानी होती है। अब जरा दूसरा शेर देखें-इमारतों में बसने वाले बस गए, मगर वो जिसके हाथ में कुदाल है| यहाँ भी शेर का पहला मिसरा  दूसरे का साथ नहीं दे रहा| पहली पंक्ति में 'बसने वाले बस गए' बहु वचन है.मगर दूसरी वाली पंक्ति में 'वो जिसके हाथ में कुदाल है' एक वचन ही रह गया| यह वचन भिन्नता भी दोष उत्पन्न कर रही है| इसी ग़ज़ल के आखिरी शेर पर आते हैं-'तुम्हारी कोशिशें कुछ और थीं मगर, हम आदमी हैं ये भी एक कमाल है| कमाल तो कहीं नहीं हुआ पर इस कमाल के चक्कर में पूरा शेर ही अपने मकसद से गया| एक दूसरी ग़ज़ल के शेर हैं-'कोई बोले अगर तो क्या बोले, बंद है सारे कान सदियों से| और 'कारनामे नजर नहीं आते,उलटे सीधे बयान सदियों से| यहाँ रदीफ़ का अंतिम वर्ण 'ए' हुआ. अरूज़ के मुताबिक शेर के पहले मिसरे  का अन्त्य वर्ण (मात्रा) और रदीफ़ का अन्त्य वर्ण (मात्रा) एक नहीं होना चाहिए| अपरिहार्य कारणों से एकाध शेर में ऐसा करने की छूट है मगर यही छूट लगातार बार-बार ली जाये तो इसे दोष की संज्ञा दी जाती है| अन्यत्र भी निरंतर निराशाजनक अभिव्यक्तियों की पुनरावृत्ति नकारात्मक प्रभाव ही छोडती है| ऐसा लगता है जैसे आम के बाग का सपना दिखा कर किसी को करील के जंगलों में डाल दिया जाय|  


सलिल वर्मा जवाब देने की कोशिश करते हैं, मदन मोहन जी के प्रति नम्र प्रस्तुति, १. गज़ल वैसे तो मुक्तक शैली की विधा मानी जाती है, दोहे की तरह| हर शेर मुख्तलिफ फ़िक्र पेश करता हुआ लेकिन हाल में गज़लें एक ही फिक्र के अशआर से सजी देखी जाने लगी है| लिहाजा इस तरह की ग़ज़लों को सिर्फ मिसरे से जज नहीं किया जा सकता कि शायर का बयान क्या है| यहाँ भी शायर का कहना है कि हर ज़हन में एक ही सवाल है और हर शख्स के खून में उबाल है| वजूहात आगे के अशार में खुलकर सामने आती हैं| २. मैं भी अभी भी अपने बयान पर कायम हूँ कि इसमें लयात्मकता है और बिलकुल वही जो बढे चलो बहादुरों के पढ़ने में आती है! दोनों अलग-अलग ग्रामर से आते  हैं, इसलिए बुनियादी फर्क दिखता है मगर जहां तक लयात्मकता का सवाल है, शेर लय में है| ३. शेर को यूं पढ़ें तो बहर भी मिल जायेगी, एक-एक/ज़हन पर/वही सवाल है, लहू-लहू में/आज फिर/ उबाल है! ४. कितनी ख़ूबसूरत बात कही है शायर ने कि इमारतों में बसने वाले तो बस गए मगर वो जो मजदूर है (हाथ में कुदाल लिए इमारत तामीर करने वाला) उसका क्या? और ज़हन साथ दे तो खुद अंदर से जवाब आता है कि वो फुटपाथ पर सोने को मजबूर है! मानी ज़रूरी नहीं कि हर वक्त नुमायाँ हों, कभी-कभी पढ़ने वाले की सोच पर भी छोड़ दिया जाता है और यहाँ मज़दूर एक सिम्बल है, पूरी मजदूर कौम  का जो मजबूर है, फुटपाथ पर सोने को| इसलिए यहाँ एकवचन और बहुवचन का सवाल ही नहीं उठता| ५. और मकते में तो शायर ने ज़बरदस्त तंज किया है मौजूदा रहनुमाओं पर| कहते हैं कि उनकी कोशिश तो ये थी कि हमें जानवर बनाकर जैसे चाहेंगे हुकूमत करेंगे और हम जुबान बंद किये सहते रहेंगे सब चुपचाप लेकिन कमाल तो ये है कि हम इंसान साबित हुए और इतनी कोशिशों के बावजूद भी इंसान बने हैं| और जनाब आज के दौर में इतनी संजीदगी बचाकर रख लेना कमाल ही है| इससे भी ज़्यादा बड़ा कमाल जनाब अदम गोंडवी साहब का है| तेज़ाब लिए घूमते हैं ज़हन में, मगर हुकूमत की मैदे की लोई से गुरेज करते हैं|
 

वे आगे कहते हैं , कविता में बात शब्दों के माध्यम से होनी चाहिए, कोई चिन्ह लगाकर नहीं.इमारतों में बसने वाले बस गए, मगर वो जिसके हाथ में कुदाल है?  ये शेर अगर केवल पढने के लिए ही है तो प्रश्नवाचक चिन्ह अर्थ को थोडा बहुत साफ करने में मदद करता है लेकिन इस खूबसूरत ग़ज़ल को अगर कोई संगीत बद्ध करना चाहे तो अपने गायन में इस प्रश्न चिन्ह का उपयोग किस तरह करे? कोई सुनने वाला इस सवालिया निशान को कैसे देख पायेगा? सुनाने वाला इस निशान को किस तरह दिखायेगा?
हाल में जितने भी ग़ज़लों के संकलन प्रकाशित हुए हैं, उनमें तो किसी भी तरह के विराम चिह्न देने का प्रचलन नहीं है. और गज़लें “कही” जाती हैं और “सुनी” जाती हैं, लिखी या पढ़ी नहीं जातीं|  ग़ालिब की गज़ल “दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है/आखिर इस दर्द की दवा क्या है” कई लोगों ने गाई है| इस बात से मैं कतई सहमत नहीं कि कविता में बात चिह्न लगाकर नहीं होनी चाहिए| बात प्रश्न चिह्न की हो रही है तो पेश हैं चंद अशार मुख्तलिफ शायरों के: जाता है यार तेग-ब-कफ गैर की तरफ, ऐ कुश्त-ए-सितम तेरी गैरत को क्या हुआ? (मीर)| पूछकर अपनी निगाहों से बता दे मुझको, मेरी रातों के मुक़द्दर में सहर है कि नहीं? (साहिर)| परीशां हो गए शीराज़ा -ए-औराक-ए-इस्लामी, चलेंगी तुंद बादे कुफ्र की यह आंधियां कब तक? (कैफी)| सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है, दिल पे रखके हाथ कहिये देश क्या आज़ाद है? (अदम गोंडवी)| एक-एक/ज़हन पर/वही सवाल है,
लहू-लहू में/आज फिर/ उबाल है| 


अर्चना तिवारी ने फरमाया, बहुत दिनों से मुझे साखी के मंच पर श्री सर्वत जमाल जी की ग़ज़लों की प्रतीक्षा थी जो अब समाप्त हुई | यहाँ का वातावरण तो बहुत रोमांचक प्रतीत हो रहा है| एक ओर मेरे पसंदीदा शायर की दहाड़ती-ललकारती गज़लें हैं और दूसरी ओर उतनी ही चुनौती देती स्वस्थ्य समालोचनात्मक टिप्पणियां हैं | हम जैसे नवीन रचनाकारों के लिए ये मंच सदैव से मार्गदर्शक साबित हुआ है |सारे ब्लॉग जगत में केवल यही एकमात्र ऐसा मंच है जहाँ रचनाकारों की रचनाएँ अग्नि में तप कर कुंदन बनती हैं|श्री सुभाष राय जी का बहुत बहुत आभार इस मंच पर इतनी आदर्शवादी रचनाओं और रचनाकारों को प्रस्तुत करने का| श्रीमान मदन मोहन जी, मुझे ग़ज़ल के व्याकरण का ज्ञान तो नहीं है परन्तु कुछ कहने की हिम्मत कर रही हूँ| बात चीत के दौरान हम किसी चिन्ह का प्रयोग अवश्य नहीं करते परन्तु स्वर के माध्यम से हम अपने विचारों को व्यंग, क्रोध ,स्नेह ,आदर के भाव से प्रदर्शित करते हैं |  मदन मोहन शर्मा ने कहा, अपनी पिछली टिप्पणी में मुझसे भी एक शब्द की कंजूसी हुई और शायद यही कारण रहा कि मैं अपनी बात स्पष्ट नहीं कर पाया. मैंने लिखा 'कविता में बात शब्दों के माध्यम से होनी चाहिए, कोई चिन्ह लगाकर नहीं.' जबकि मुझे लिखना चाहिए था 'कविता में बात शब्दों के माध्यम से होनी चाहिए, केवल कोई चिन्ह लगाकर नहीं| परम आदरणीय बिहारी ब्लॉगर  द्वारा बताये गए हर शेर के अध्ययन से भी यही बात निकाल कर आती है कि हर शेर में प्रश्न वाचक चिन्ह से पहले कही न कहीं एक प्रश्न वाचक शब्द भी आवश्यक रूप से मौजूद है. देखिये- (१)ऐ कुश्त-ए-सितम तेरी गैरत को क्या हुआ? (मीर)| (२)पूछकर अपनी निगाहों से बता दे मुझको, मेरी रातों के मुक़द्दर में सहर है कि नहीं? (साहिर)| (3)परीशां हो गए शीराज़ा-ए-औराक-ए-इस्लामी, चलेंगी तुंद बादे कुफ्र की यह आंधियां कब तक? (कैफी) मगर वो जिसके हाथ में कुदाल है? यहाँ कोई प्रश्न वाचक शब्द प्रयुक्त नहीं हुआ|  परम आदरणीय बिहारी ब्लॉगर के इन विचारों से मैं भी सहमत हूँ 'हाल में जितने भी ग़ज़लों के संकलन प्रकाशित हुए हैं, उनमें तो किसी भी तरह के विराम चिह्न देने का प्रचलन नहीं है. और गज़लें “कही” जाती हैं और “सुनी” जाती हैं, लिखी या पढ़ी नहीं जातीं. लिहाजा किसी सुनने में तो भावों का सम्प्रेषण गज़ल पढने वाले की अभिव्यक्ति पर निर्भर करता है, न कि विराम चिह्न पर.' इस प्रकार प्रश्न चिन्ह तो स्वयं ही अप्रासंगिक हो गया, फिर अगर कोई प्रश्न वाचक शब्द बदले में नहीं आयेगा तो पाठक या श्रोता का मस्तिष्क दुविधा में पड़ेगा ही| अर्चना जी से भी मेरी यही प्रार्थना है की वे मेरे निवेदन को फिर से देखने की कृपा करें फिर भी अगर मेरी बात से सहमत न हो पायें तो मैं अपनी भूल के लिए  क्षमा प्रार्थी हूँ| 


आचार्य संजीव वर्मा सलिल ने कहा, भाषा के विविधांगों में शब्द, चिन्ह और उच्चारण सबका अपना-अपना महत्त्व है| विराम चिन्हों को नकारना मुझे उचित नहीं लगता| विराम चिन्ह न होने पर प्रश्नसूचक शब्द ही रचनाकार का मंतव्य तथा भाव स्पष्ट कर पाते हैं जबकि विराम चिन्ह हों तो बिना प्रश्नवाचक शब्द के भी भाव स्पष्ट हो जाता है| पाठक या गायक प्रश्नवाचक शब्द या प्रश्नचिन्ह या दोनों होने पर रचनाकार के मंतव्य को समझकर तदनुसार उच्चारण कर भाव संप्रेषित कर सकता है| यह मुद्दा बहस का कम, अनुभव का अधिक है| रचनाकार स्वयं निश्चित करता है कि उसे कहाँ क्या उपयोग करना है ताकि उसका भाव और कथ्य पाठक/श्रोता तक पहुँच सके| प्रस्तुत रचनाएँ सामयिक हैं. इनमें जमीनी सचाई का एक पहलू है किन्तु इसके अलावा भी बहुत कुछ है| रचनाकार और पाठक/श्रोता के मध्य इनसे सेतु बनता है किन्तु समीक्षक को सकल परिदृश्य को देखकर मूल्यांकन करना होता है| मदन मोहन शर्मा पलट कर आये, रचनाकार अगर स्वयं निश्चित कर सके कि उसे कहाँ क्या उपयोग करना है तो निश्चय ही यह बात अच्छी रचना और जागरूक रचनाकार के हित में होगी| मैं स्वयं इस विचारधारा का मानने वाला हूँ, परन्तु ग़ज़ल के अपने कुछ प्रतिबन्ध, अपने कुछ नियम हैं जो रचनाकार को छूट लेने की इजाजत नहीं देते| 

शायर सर्वत एम जमाल ने अपना पक्ष रखने की कोशिश की| मुझे इल्म ही नहीं था कि मेरे इतने चाहने वाले मौजूद हैं| मैं इन मुहब्बतों के लिए, राजेश उत्साही, हरकीरत हीर, सुमन, तिलक राज कपूर,नीरज गोस्वामी,  अविनाश वाचस्पति, जितेन्द्र जौहर, दानिश, रवीन्द्र प्रभात,वेद व्यथित, अबनीश सिंह चौहान, सुनील गज्जाणी, चला बिहारी...(सलिल), अर्चना तिवारी, संजीव वर्मा सलिल और मदन मोहन अरविन्द का शुक्रगुज़ार हूँ लेकिन एक निवेदन भी है- "अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी बहल जाए, अब इतना भी तो न चाहो कि दम निकल जाए| भाई, इतना प्यार समेट कर ले कैसे जाऊँगा| मदन मोहन अरविन्द जी, यह ग़ज़ल है| जब तक इस में महारत न हो, प्रश्न पूछे जाने चाहिए न कि आलोचना| जिस वजन को आप फऊ फऊ फऊ.....बता रहे हैं, वह अस्ल में मुफाइलुन मुफाइलुन मुफाइलुन है| जिस मिसरे को लेकर आप द्विविधा में हैं, एक एक ज़हन पर वही सवाल है, अगर वजन आपके ज़हन में होता तो उसे 'इकेक ज़हन पर वही सवाल है' पढ़ लेते| नाहक उसे ख़ारिज करार देने में इतनी ऊर्जा खर्च दी फिर मतले का अधूरापन भी सालता रहा आपको| ग़ज़ल शास्त्र का अध्ययन किया होता तो कतअ बंद अशआर के बारे में भी ज्ञान होता| मतला और पहला शेर कतअ बंद हैं| शायरी में ऐसे प्रयोग क़ुतुब कुली शाह-वाली दकनी के जमाने से चले आ रहे हैं, मीर-ग़ालिब तक ने इनकी पैरवी की है, अगर मैंने भी उनके नक्शे-कदम पर चलने की कोशिश की तो क्या गुनाह किया? रदीफ के अंत में 'ए' है और ऊपर के मिसरे में भी अंत में 'ए' आ रहा है, यह आपने तकाबुल-ए-रदीफ बताया जो एक दोष है| क़ुतुब कुली शाह से लेकर आज के मुज़फ्फर हनफी तक को आगाह कीजिए, यह कानून आपने किसी बहुत पुरानी   किताब से उद्धृत किया है जो अब कहीं अमल में नहीं है| आप की खिदमत में एक शेर पेश है-"दुनिया पहुँच रही है कहाँ से कहाँ से कहाँ अमीर, तुम हो शरीक-ए-महफिल-ए-शेर-ओ-सुखन अभी| आप साहित्यकार हैं, गज़लों से जुड़े हैं और मुझसे उम्र में दो वर्ष छोटे भी, इस नाते एक सलाह अवश्य देना चाहूँगा...अध्ययन कीजिए, ग़ज़ल तुकबंदी मात्र नहीं है, बहुत खून जलाती है, बहुत मेहनत मांगती है| मैं अगर आप से कह रहा हूँ तो यह मेरा अपना अनुभव है, मैंने खुद ऐसा किया है, ग़ज़लों में प्रयोग किए हैं लेकिन ऐसा तभी सम्भव हुआ, जब इस विधा   को पूरी तरह समझ पाने में कुछ सफलता पा सका| आलोचना के लिए विस्तृत अध्ययन आवश्यक है वरना स्थिति हास्यास्पद हो जाती है| 


मदन मोहन शर्मा बोले, अधिक विस्तार में न जाकर केवल एक ही निवेदन पुनः करना चाहूँगा कि कुछ हिदायतों के अतिरिक्त कोई संतोष जनक समाधान उपरोक्त टिप्पणियों से नहीं मिलता| प्रश्न जैसे पहले थे अब भी हैं| बीच  में बेनामी ने दखल दिया, मुझे लगता है जनाब सर्वत जमाल की टिप्पणियों में घमंड अधिक है, सार कम| यह सही है कि 'एक-एक जहन' वाले मिसरे  को ठीक से समझने में जोर पड़ता है, फिर भी रूकावट आती है| सवालिया निशान वाली बात भी पूरी तरह सही है| पुरानी किताबों के कानून से आपको आपत्ति क्यों है| जिन बड़े शायरों के नाम आप ले रहे हैं, सोच कर देखिये आप उनके पासंग बराबर भी हैं क्या? और गलती सिर्फ गलती होती है, चाहे छोटा करे या बड़ा| ग़ज़ल कहते हैं तो सफाई से कहनी ही होगी, सौ बातें बनाने से काम  नहीं चलने वाला|

प्राण शर्मा जी ने कहा, सर्वत जी अच्छे शायर हैं, उनकी शायरी में नयापन है| उनका कहना सही है कि गजल बहुत खून जलती है| इस बारे में मैंने कभी कहा था, सोच की भट्ठी में सौ-सौ बार दहता है, तब कहीं जाकर कोई इक शेर कहता है| मदन मोहन शर्मा ने कहा, सोच रहा था, कुछ कहूँ या चुप रहूँ, इसी कशमकश में एक शेर याद आया-'जब लगेगी आशियाँ जल जायगा, आग को बेशक हवा कह दीजिये| अपनी मर्जी से हम जो चाहे कहते रहें, सच की तासीर नहीं बदलने वाली| बेनामी के आगमन हुआ, गली कूचों में रह जाती हैं घुट कर, अब अफवाहें सरे बाज़ार लिखना| ये क्या? 'लिखना?', अफवाहें फैलाना और अफवाहें उडाना तो सुना था, लिखना पहली बार देखा है| संजीव गौतम ने समापन किया, जी खुश हो गया सर्वत जी की गजलें पढ़कर, हमेशा के तरह सुपर फाइन| हरकीरत हीर ने भी प्रशंशा की| 


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नसीम साकेती की कवितायेँ नववर्ष पर ३१ दिसंबर के आधी रात को  

9 टिप्‍पणियां:

  1. लिख आए जितना लिखना थी फिर भी यह पढ़ कर लिखे बिना रहा नहीं जा रहा है कि गागर में पूरा सागर ही निचोड़ दिया है आपने अपनी हुनरमंदी से। आभार।

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  2. Is me koyee shak nahee,ki,Sarvat jee kamaal kee gazal kahte hai!

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  4. दंगल के दांवपेंच एक जगह देखकर कई बातें पता चलीं।
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    सर्वत जी की यह अदा पसंद आई कि जो कहो खम ठोककर कहो।
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    बेनामी जी ने कहा कि उनमें घंमड ज्‍यादा है। मेरा कहना है कि यह घंमड यानी अभिमान नहीं बल्कि स्‍वाभिमान है। और लेखक को स्‍वाभिमानी तो होना ही चाहिए।
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    जहां तक गलतियों का सवाल है तो चाहे कोई उन्‍हें स्‍वीकारे या न स्‍वीकारे, गलतियां,गलतियां ही रहेंगी।

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  5. bahut sundar prastitui. Isee blog par is tarak ke alekh dekhane ko milate hain, shayad anyatra kaheen naheen.

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  6. लम्बे प्रवास से लौटा, और आपके ब्लाग को देखने का मन हुआ. ''दंगल-रपट'' भी पढ़ी. रचना के गुण-दोषों पर विर्मश करना ही चाहिए, पर मैं जानता हूँ, और यह शाश्वत सत्य है की कोई रचना इसलिए अमर नहीं होती, की वह नियमानुसार लिखी गयी है, या मीटर-रदीफ़ काफिया कितना चाक-चौबंद है. रचना अपने कथ्य के कारण अमर होती है. कबीर, तुलसी जैसे महान कवियों में भी कहीं-कहीं शिल्पगत दोष मिल जाते हैं. मगर उनका चिंतन इतना महान है, की वे अमर हैं. मेरा अनुभव है, और मैंने पढ़ा भी है कि निंदक ''मर-खप'' जाते हैं, मगर अच्छे सर्जक अमर हो जाते है. आप के ब्लाग के माध्यम से अनेक अच्छे सर्जक आ रहे है, यह संतोष की बात है.

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  7. परम पूज्य श्रीयुत पंकज जी ने बड़ी उम्दा बात कही. मैं पूरी तरह सहमत हूँ. निंदक मर-खप जाते हैं, जी हाँ, सच कहने वाले को तो सूली चढ़ना ही पड़ता है, वैसे भी आज के समय में कम ही लोग हैं जो सच और निंदा में फर्क कर पाते हैं. वैसे ये दुआ अगर आपने इस नाचीज के लिए की है तो तहे दिल से कबूल.एक बात गौर करने की है, छोटे से उदहारण से समझ में आती है, क्रिकेट के मैदान पर कोई नया बल्लेबाज शून्य पर भी आउट हो जाय तो क्रिकेट प्रेमी चुप रह सकते हैं, लेकिन सचिन अगर ४०-५० रन बना कर भी आउट होते हैं तो उन्हें आलोचना सहनी पड़ती है. यही बात जीवन के हर क्षेत्र में लागू है, मेरे जैसे नौसिखियों की गलती माफ़ हो सकती है लेकिन वे लोग जो मीर, ग़ालिब और मोमिन से बराबरी मानते हैं उनसे लोगों की उम्मीदें भी उसी स्तर की होती हैं, वहां अगर कोई ढील-ढाल नजर आये तो उस पर किसी का कुछ कह उठाना स्वाभाविक है. मुझे इस बार की टिप्पणियों में प्रयोग हुए दोनों शब्द 'आलोचना' और 'निंदा' एकदम अनुपयुक्त लगे, वास्तव में एक पाठकीय प्रतिक्रिया को निंदा या आलोचना का नाम दिया जाना मेरी समझ से बाहर की बात है. ध्यान दीजियेगा, ग़ज़ल के जाने-माने हस्ताक्षर प्राण शर्मा जी के इन शब्दों पर, अपनी टिप्पणी में वे लिखते हैं - 'उन अशआर में मुझे भी खामियां नजर आयीं जिन्हें मदन मोहन 'अरविन्द' ने रेखांकित किया है.' क्या किसी को अपना अभिमत इसी लिए व्यक्त नहीं करना चाहिए कि उसके कथन में ठकुर सुहाती का अभाव है.

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  8. भाई साहब, घमंड और स्वाभिमान में बड़ा बारीक़ अंतर है. स्वाभिमानी न तो ख़म ठोक कर आत्मप्रशंसा करता है, न किसी को गैर जरुरी नसीहत देता है. आप तो उच्च कोटि के विद्वान हैं, खुद समझते होंगे.

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  9. सुभाष जी, बहुत अच्छे ढंग से समापन किया, बहुत मेहनत करते हैं आप इन रचना और समीक्षाओं की.

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