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शनिवार, 24 सितंबर 2011

सर्वत जमाल की गजलें

सर्वत जमाल पानी में आग बोने वाले शायर हैं| जिनका भी गजलों की दुनिया से साबका है, वे उन्हें अच्छी तरह जानते हैं| जिन्दगी कभी-कभी बहुत कठिन हो जाती है, आदमी घुटने टेकने के हालात में पहुँच जाता है लेकिन जिसने हमेशा ऐसी कठिन जिन्दगी अपने लिए चुन ली हो या जिसे परिस्थितियों ने झंझावातों में धकेल दिया हो फिर भी जो पराजय के ख्याल के बिना लड़ रहा हो, उसका नाम है सर्वत जमाल| गोरखपुर में जन्मे इस शायर ने अपनी जिन्दगी की शुरुआत पत्रकारिता से की पर वह रास्ता लम्बा नहीं चल सका| आजकल वे जिन्दगी चलाने के लिए परेशान हाल लोगों को जिन्दगी को समझने, स्वस्थ रहने  और कठिनाइयों का जमकर मुकाबला करने के  सलाह-मशवरे देने का काम करते हैं| उनकी कुछ गजलें पेश हैं....

1.
एक एक जहन पर वही सवाल है

लहू लहू में आज फिर उबाल है

इमारतों में बसने वाले बस गए 
मगर वो जिसके हाथ में कुदाल है ?

उजाले बाँटने की धुन तो आजकल
थकन से चूर चूर है, निढाल है 

तरक्कियां तुम्हारे पास हैं तो हैं 
हमारे पास भूख है, अकाल है 

कलम का सौदा कीजिये, न चूकिए 
सुना है कीमतों में फिर उछाल है 

गरीब मिट गये तो ठीक होगा सब 
अमीरी इस विचार पर निहाल है 

तुम्हारी कोशिशें कुछ और थीं, मगर
हम आदमी हैं, यह भी इक कमाल है

                          2.
कभी आका  कभी सरकार लिखना
हमें भी आ गया किरदार लिखना

ये मजबूरी है या व्यापार , लिखना

सियासी जश्न को त्यौहार लिखना

हमारे दिन गुज़र जाते हैं लेकिन
तुम्हें कैसी लगी दीवार, लिखना

गली कूचों में रह जाती हैं घुट कर
अब अफवाहें सरे बाज़ार लिखना

तमांचा सा न जाने क्यों लगा है
वतन वालों को मेरा प्यार लिखना

ये जीवन है कि बचपन की पढाई
एक एक गलती पे सौ सौ बार लिखना

कुछ इक उनकी नज़र में हों तो जायज़
मगर हर शख्स को गद्दार लिखना ?


3.
एक ही आसमान सदियों से

चंद ही खानदान सदियों से

धर्म, कानून और तकरीरें 
चल रही है दुकान सदियों से 

काफिले आज तक पड़ाव में हैं
इतनी लम्बी थकान, सदियों से !

सच, शराफत, लिहाज़, पाबंदी 
है न सांसत में जान सदियों से 

कोई बोले अगर तो क्या बोले 
बंद हैं सारे कान सदियों से 

कारनामे नजर नहीं आते 
उल्टे सीधे बयान सदियों से 

फायदा देखिये न दांतों का 
क़ैद में है जबान सदियों से 

झूठ, अफवाहें हर तरफ सर्वत 
भर रहे हैं उडान सदियों से
4.
हवा पर भरोसा रहा 
बहुत सख्त धोखा रहा 

जो बेपर के थे, बस गए 

परिंदा भटकता रहा 

कसौटी बदल दी गयी 
खरा फिर भी खोटा रहा 

कई सच तो सड़ भी गए 
मगर झूठ बिकता रहा 

मिटे सीना ताने हुए 
जो घुटनों के बल था, रहा 

कदम मैं भी चूमा करूं 
ये कोशिश तो की बारहा

चला था मैं ईमान पर 
कई रोज़ फाका रहा

संपर्क --05224105763

50 टिप्‍पणियां:

  1. सर्वत जमाल साहब की ग़ज़लें ऐसी लगीं जैसे कोई हमारे अंदर से ये बातें कह रहा हो। उनकी इन ग़ज़लों में सारा समकालीन दर्द जैसे उमड़कर सामने आ गया है। उल्‍लेखनीय बात यह भी है कि सर्वत साहब कहीं कहीं जिस अंदाज से कहते हैं, वह गहरे तक छीलकर रख देता है। जैसे यह शेर-
    तरक्कियां तुम्हारे पास हैं तो हैं
    हमारे पास भूख है, अकाल है

    उनकी इन गज़लों में दूसरी उल्‍लेखनीय बात यह भी लगी कि शब्‍दों का उपयोग बहुत किफायत के साथ किया गया है। ग़ज़ल कहने के लिए उन्‍होंने जो भी खाका चुना है वह महत्‍वपूर्ण है। कई बार चमत्‍कार पैदा करने के लिए शब्‍दों का ढेर लगा दिया जाता है। सर्वत जी इससे बचते नजर आते हैं। यह सतर्कता उनकी ग़ज़लों को ऊंचाईयां देती है। बधाई।

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  2. सुभाष जी सर्वत जी का नाम सुन रहा नहीं गया ....
    इनकी गजलें हमेशा लुभाती रही हैं मुझे ...
    कुछ चुनिन्दा शेर इनकी कलम को नमन देते हैं ...

    @ गरीब मिट गये तो ठीक होगा सब
    अमीरी इस विचार पर निहाल है

    @हमारे दिन गुज़र जाते हैं लेकिन
    तुम्हें कैसी लगी दीवार, लिखना

    @जो बेपर के थे, बस गए
    परिंदा भटकता रहा

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  3. सर्वत साहब की ग़ज़लें कुछ ऐसी हैं कि:
    शब्‍द अंदर से जब निकलता है
    वक्‍त के साथ-साथ चलता है।

    ऑंधियॉं क्‍या डरायेंगी उसको
    थाम कर जो मशाल चलता है।
    सर्वत साहब की लेखनी दीप नहीं मशाल है। आस पास के माहौल से अविचलित, सार को व्‍यक्‍त कर जाना सरल तो नहीं होताा

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  4. इमारतों में बसने वाले बस गए
    मगर वो जिसके हाथ में कुदाल है ?

    तरक्कियां तुम्हारे पास हैं तो हैं
    हमारे पास भूख है, अकाल है

    तुम्हारी कोशिशें कुछ और थीं, मगर
    हम आदमी हैं, यह भी इक कमाल है

    ***

    हमारे दिन गुज़र जाते हैं लेकिन
    तुम्हें कैसी लगी दीवार, लिखना

    तमांचा सा न जाने क्यों लगा है
    वतन वालों को मेरा प्यार लिखना

    ये जीवन है कि बचपन की पढाई
    एक एक गलती पे सौ सौ बार लिखना

    ***
    एक ही आसमान सदियों से
    चंद ही खानदान सदियों से

    सच, शराफत, लिहाज़, पाबंदी
    है न सांसत में जान सदियों से

    फायदा देखिये न दांतों का
    क़ैद में है जबान सदियों से

    ***

    जो बेपर के थे, बस गए
    परिंदा भटकता रहा

    कसौटी बदल दी गयी
    खरा फिर भी खोटा रहा

    मिटे सीना ताने हुए
    जो घुटनों के बल था, रहा

    ऐसे अशआर पढ़ कर किसकी बोलती बंद नहीं होगी. मुझे इस बात का फक्र है के मैं सर्वत जमाल साहब को जानता हूँ...देखा नहीं है उन्हें सिर्फ सुना है लेकिन उस से कोई फर्क नहीं पड़ता...हमने जिसे देखा है उसे भी कहाँ जान पाते हैं...गज़ब के इंसान हैं और गज़ब के शेर कहते हैं...उनका फोन आ जाये तो समझिये आपकी सारी मुश्किलें उदासियाँ तल्खियाँ दुम दबा कर भाग खड़ी होंगीं...ठहाकों का सैलाब आ जायेगा...आपका मन फूलों सा हल्का हो जायेगा......हम खुदा के शुक्र गुज़ार हैं के आज की दुनिया में जहाँ मुर्दनी सब के ज़हनों पर हावी रहने की कोशिश में रहती है हमारे पास सर्वत जमाल हैं...

    मुहब्बत से भरे इस इंसान की तारीफ़ के लिए मेरे पास लफ्ज़ नहीं हैं...दुआ करता हूँ के वो अपने चाहने वालों को अपने कलाम से यूँ ही नवाजते रहें...आमीन...

    नीरज

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  5. पढ़ा तो जाना कि इनके पास अपनी कोई बात नहीं, ये तो सब हमारी बात ही कहते हैं। यह एक धुन है, फन है, हरेक के बस का नहीं यह जुनून है। जिसमें सारे जहां का नून (नमक) है, पर वो नम नहीं है, बहुत सख्‍त है और तल्‍ख सच्‍चाईयों को स्‍वर देते हैं। इनके शब्‍दों के बसेरे हमारे दिल में होते हैं। यह बाहर नहीं सबके दिल में रहते हैं। हम गजलों में नहीं कह पाते और यह जो कहते हैं, उसमें सब कह देते हैं

    तरक्कियां तुम्हारे पास हैं तो हैं
    हमारे पास भूख है, अकाल है

    सरकार को समझना चाहिए कि जादू की छड़ी मिलने और जनता पर घुमाने से बात नहीं बनने वाली। इस बार तो शामत आएगी।

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  6. सर्वत जमाल की ग़ज़लें अदब की उस श्रेष्ठ ‘जमात’ की ग़ज़लें हैं जो चिंतन को कुरेदती हैं। कई शे’र ऐसे कि मस्तिष्क में काफी देर तक ठहरे रह जाते हैं; यथा-

    तमांचा सा न जाने क्यों लगा है
    वतन वालों को मेरा प्यार लिखना


    ‘फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन’ के अर्कान वाली यह गज़ल भी बड़ी ख़ूबसूरत है-

    एक ही आसमान सदियों से
    चंद ही खानदान सदियों से


    ऐसी ग़ज़लें अपने समय और समाज से सतत्‌ संवाद स्थापित करते रहने वाला शाइर ही कह सकता है...सर्वत जमाल-सरीखा शाइर!

    उन्हें हार्दिक बधाई...और ‘साखी’ को साधुवाद!

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  7. सरवत जमाल साहब
    ग़ज़ल सिर्फ ग़ज़ल कहने के लिए नहीं कहते
    बल्कि हर उस इंसान की बात को कह देने के लिए कहते हैं
    जो हर इंसान खुद आसानी से नहीं कह पाता
    उनकी ग़ज़लियात में हमेशा हमेशा
    आमजन का दर्द नुमायाँ रहता है , आक्रोश रहता है , आह्वान रहता है
    इन खूबसूरत ग़ज़लों के हवाले से
    हर हर पढने वाला उनसे मुतासिर हुए बिन न रह सकेगा ...
    मुबारकबाद .

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  8. हर शेर काबिलेदाद हैं. एक और प्रतिभा से परिचित हुआ. धन्यवाद आपको.

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  9. सर्बत ज़माल साहब की ग़ज़लों से गुजरना आम जनजीवन के कचोटते दर्द से गुजरना है, उनके हर अलफ़ाज़ में छिपी होती है हमारे समय की ऐसी छटपटाहट जो जनपथ की पीड़ा को अभिव्यक्त कर सके ! यही अभिव्यक्ति उनकी ग़ज़लों को ऊँचाई देती है और शेर-दर-शेर एक नया मुकाम भी ! उनकी ग़ज़लों को पढ़वाने के लिए सुभाष जी आपका शुक्रिया !

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  10. bhai srvt ji ne bhut si samajik buraiyon ko apne kavy me sthan diya hai unhone apne kvi krm ko bhrpoor shidt ka sath prstut kiya hai
    bdhai deta hoon
    aur nivedn yh bhi kr rha hoon ki
    aap ka ghr bhi bnaya tha jis ne
    bad us ke dekha nhi vo aashiyane me
    ye is trh ki rchnaye ghoshit prgtivad ka nara bhr bn kr rh gai n to koi kranti hui apitu bhrpoor mlai srkar ke smrthn se prapt ki jb unhe n to grib dikha aur n hi koi aur aur is srkar ko shara aur smrthn bhi inhi gribon ke msihaaon ka rha hai pr ab sb kuchh spsht ho gya hai is schchaai ko rchna kar swikar kren
    pun: bdhai bhai subhash ji ko bhi sadhuvad

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  11. एक ही आसमान सदियों से
    चंद ही खानदान सदियों से
    यही हो रहा है हमारे देश में. वंशवाद की काली छाया हर जगह अपना अड्डा बनाये हुए है. आपकी सभी गज़लें बेमिशाल हैं. बधाई स्वीकारें

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  12. सम्मानिय सुभाष जी !
    सम्मानिय जमाल साब !
    प्रणाम !
    हर शेर उम्दा है और इस प्रक्कर के धांसू शेरों में कोई कान कसर निकाल दे ये मुमकिन नहीं , हर शेर वजनी है और शेर अपने आप में बहुर कुछ बया करता है ! उम्दा अल्फाजो के कलाम कार को सलाम !
    सादर !

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  13. सरवत जमाल साहब के बारे में पहले पढ़ा था. एक ऐसे वाकये की बाबत जिसे पढकर अफसोस हुआ, मगर इस शायर के लिए इज्ज़त पैदा हुई. फिर “साखी” के एक दंगल में दो-दो हाथ आजमाईश हुई. आखिर मैंने इन्हें चारों खाने चित्त किया सिर्फ एक जुमले के ज़रिये... और वो जुमला था इनको ‘बुज़ुर्ग’ कहना. जनाब ने पहले तफसील से एक मेल लिखा, फिर फोन नंबर माँगा और फिर फोन करके सबसे पहली सफाई दी इस बात की कि वो बुज़ुर्ग नहीं हैं. अपनी उम्र बतायी, जो इत्तिफाकन मुझसे इक्कीस निकली. और जनाब की ये सारी गज़लें इक्कीस की लगती हैं. (हमारे ज़माने के हिसाब से) बालिग़, सरकार बनाने और और हुकूमत बदल देने का माद्दा रखने वाली. एक और बात जो उन्होंने अपनी पहली और (मुझसे) आख़िरी मुलाक़ात में (बजरिये टेलीफून) कही थी, मेरी जुबान के बारे में कि बिहारी जुबान में आपका लिखा अच्छा लगा इसलिए कि आप घुन्घटवा, अंचरवा और गोरिया से दूर हैं. लगभग ऐसी ही बात इन्होंने मनोज भावुक के लिए भी कही थी. किस्सा मुख़्तसर ये कि जनाब सरवत जमाल साहब एक नौजवान शायर हैं, जो अपने अशआर से मुल्क की तारीख बदलने का माद्दा रखती है और जिसे भोंडापन और मिलावट से सख्त नफ़रत है.
    ...जारी है

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  14. इतने तार्रुफ के बाद यही कहने को बचता है कि इनकी ग़ज़लों पर तब्सिरे की गुंजायश ही नहीं.
    पहली गज़ल एक ऐसी बहर में कही गयी है जो बड़ी ‘रेयर’ है. एक इन्किलाब और क्रान्ति की सदा गूंजती है हर शेर में और ‘बढे चलो बहादुरो बढे चलो’ की हमबहर.
    दूसरी गज़ल में दो शेर एक ऐसे वाकये की ओर इशारा करते हैं जिसकी हकीकत तो हमें मालूम है, लेकिन ज़ाती तौर पर मुझे अखरता है, इसका बार-बार कहा जाना, अब वो चाहे मुनव्वर राना साहब के शेर हों या सरवत जमाल साहब के.
    तीसरी गज़ल शानदार है और और मौजूदा सूरतेहाल पर एक गहरा तंज है. एक-एक शेर एक तमाचे की तरह लगता है... उन आकाओं को नींद से जगाने की नाकामयाब कोशिश सा करता हुआ!
    आख़िरी गज़ल छोटी बहर में एक ख़ूबसूरत गज़ल है. एक मौजूदा दौर की मायूसी की तर्जुमानी करती हुई!
    कुल मिलाकर बेहतरीन ग़ज़लों का गुलदस्ता... गुलदस्ते के गुलों में कुछ और रंग के गुल होते तो रौनक कुछ और ही होती. माशूका के हुस्न का बयान घुन्घटवा और अंचरवा के बगैर भी किया जा सकता है और फिर “उसके” हुस्न का चर्चा!! शुक्रिया सुभाष जी, इस शानदार पेशकश के लिए!!

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  15. साखी पर शोभायमान चार गजलों में पहली गजल के पहले शेर की पहली ही पंक्ति एक साथ न जाने कितने सवालात से रूबरू करा देती है। मिस्रा है, ‘’एक एक जहन पर वही सवाल है, अब देखिये-
    -पहला सवाल बयान की सफाई का, यहाँ बयान साफ नहीं है, पता नहीं लगता कौन सा ‘वही सवाल है’, दूसरी पंक्ति भी इस सवाल को स्पष्ट नहीं करती।
    -दूसरा सवाल लय का, इस मिस्रे में लयात्मकता सिरे से गायब है।
    -तीसरा सवाल बहर का, कम से कम पहले मिस्रे से तो बहर की झलक नहीं मिलती।
    -चौथा सवाल पहली और दूसरी पंक्ति का परस्पर सम्बन्ध? दोनों मिस्रे एक-दूसरे का साथ दें तो शेर मुकम्मल हो।

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  16. पहला मिस्रा तो इन सारे सवालों को लेकर खामोश है। हाँ, दूसरी पंक्ति तक आते-आते बहर कुछ-कुछ साफ होती सी लगती है। गजल के रुक्न हैं- फ़ऊ फ़ऊ फ़ऊ फ़ऊ फ़ऊ फ़ऊ, अर्थात् 12 12 12 12 12 12। परम आदरणीय बिहारी ब्लोगर के शब्दों में 'बढे चलो बहादुरों बढे चलो' का हम बहर. लेकिन पहला मिस्रा इस बहर में बिलकुल ठीक नहीं बैठता. अब मन समझाने के लिये पहली पंक्ति के प्रारम्भ के ‘एक एक’ को मात्रा गिरा कर ‘इक इक’ मान लें तो मिस्रा तो दूर से देखने पर बहर में दिखाई देता है लेकिन लयात्मकता का सवाल इससे भी हल नहीं होता, हो भी नहीं सकता, वास्तव में तो बहर भी दुरुस्त नहीं होती। पहली पंक्ति को सही बहर में पढ़ने के लिये ‘इकइ कजह नपर वही सवाल है’ इस तरह पढ़ना होगा, फलस्वरूप कुछ शब्द पूरी तरह निरर्थक हो जायेंगे और अरूज़ ऐसा करने की इजाजत किसी भी हाल में नहीं देता। शब्दों में होने वाली ऐसी तोड़-फोड़ ही लयात्मकता को प्रभावित करती है और लयभंग दोष को जन्म देती है। अब इसी शेर को अगर यूं पढ़ लें-
    ‘इक इक (इकिक) जहन पे फिर यही सवाल है,
    लहू लहू में आज क्यों उबाल है।’ तो इस तरह बयान में सफाई भी आती है, दूसरी पंक्ति पहली पंक्ति का समर्थन भी करती है, लय भी स्थापित होती है, शेर बहर से खारिज भी नहीं होता, साथ ही साथ पहली पंक्ति से ही बहर का निर्धारण करने में आसानी होती है।

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  17. अब जरा दूसरा शेर देखें-
    इमारतों में बसने वाले बस गए
    मगर वो जिसके हाथ में कुदाल है.
    यहाँ भी शेर का पहला मिश्रा दूसरे का साथ नहीं दे रहा. पहली पंक्ति में 'बसने वाले बस गए' बहु वचन है.मगर दूसरी वाली पंक्ति में 'वो जिसके हाथ में कुदाल है' एक वचन ही राह गया. यह वचन भिन्नता भी दोष उत्पन्न कर रही है..इसी ग़ज़ल के आखिरी शेर पर आते हैं-
    'तुम्हारी कोशिशें कुछ और थीं मगर.
    हम आदमी हैं ये भी एक कमाल है.' कमाल तो कहीं नहीं हुआ पर इस कमाल के चक्कर में पूरा शेर ही अपने मकसद से गया.

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  18. एक दूसरी ग़ज़ल के शेर हैं-
    'कोई बोले अगर तो क्या बोले
    बंद है सारे कण सदियों से.'
    और
    'कारनामे नजर नहीं आते
    उलटे सीधे बयान सदियों से.'
    यहाँ रदीफ़ का अंतिम वर्ण 'ए' हुआ. अरूज़ के मुताबिक शेर के पहले मिस्रे का अन्त्य वर्ण (मात्रा) और रदीफ़ का अन्त्य वर्ण (मात्रा) एक नहीं होना चाहिए. अपरिहार्य कारणों से एकाध शेर में ऐसा करने की छूट है. मगर यही छूट लगातार. बार-बार ली जाये तो इसे दोष की संज्ञा दी जाती है.

    अन्यत्र भी निरंतर निराशाजनक अभिव्यक्तियों की पुनरावृत्ति नकारात्मक प्रभाव ही छोडती है. ऐसा लगता है जैसे आम के बाग का सपना दिखा कर किसी को करील के जंगलों में डाल दिया जाय.
    अंत में अपनी इस बाल सुलभ चेष्टा के कारण हुए किसी भी अपराध के लिए सभी से अग्रिम क्षमा याचना करता हूँ.

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  19. आदरणीय मदन मोहन जी के प्रति नम्र प्रस्तुति:
    १. गज़ल वैसे तो मुक्तक शैली की विधा मानी जाती है, दोहे की तरह. हर शेर मुख्तलिफ फ़िक्र पेश करता हुआ.. लेकिन हाल में गज़लें एक ही फिक्र के अशार से सजी देखी जाने लगी है. लिहाजा इस तरह की ग़ज़लों को सिर्फ मिसरे से जज नहीं किया जा सकता कि शायर का बयान क्या है. यहाँ भी शायर का कहना है कि हर ज़हन में एक ही सवाल है और हर शख्स के खून में उबाल है.. वजूहात आगे के अशार में खुलकर सामने आती हैं.
    २. मैं भी अभी भी अपने बयान पर कायम हूँ कि इसमें लयात्मकता है. और बिलकुल वही जो बढे चलो बहादुरों के पढ़ने में आती है! दोनों अलग-अलग ग्रामर से आटे हैं इसलिए बुनियादी फर्क दिखता है. मगर जहां तक लयात्मकता का सवाल है, शेर लय में है. आगे स्पष्ट करूँगा उसको.
    ३. शेर को यूं पढ़ें तो बहर भी मिल जायेगी:
    एक-एक/ज़हन पर/वही सवाल है,
    लहू-लहू में/आज फिर/ उबाल है!
    ४. कितनी ख़ूबसूरत बात कही है शायर ने कि इमारतों में बसने वाले तो बस गए मगर वो जो मजदूर है (हाथ में कुदाल लिए इमारत तामीर करने वाला) उसका क्या?? और ज़हन साथ दे तो खुद अंदर से जवाब आता है कि वो फुटपाथ पर सोने को मजबूर है! मानी ज़रूरी नहीं कि हर वक्त नुमायाँ हों, कभी-कभी पढ़ने वाले की सोच पर भी छोड़ दिया जाता है! और यहाँ मज़दूर एक सिम्बल है, पूरी मजदूर कॉम का जो मजबूर है फुटपाथ पर सोने को! इसलिए यहाँ एकवचन और बहुवचन का सवाल ही नहीं उठता.
    ... जारी

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  20. ...
    ५. और मकते में तो शायर ने ज़बरदस्त तंज किया है मौजूदा रहनुमाओं पर.. कहते हैं कि उनकी कोशिश तो ये थी कि हमें जानवर बनाकर जैसे चाहेंगे हुकूमत करेंगे. और हम जुबान बंद किये सहते रहेंगे सब चुपचाप. लेकिन कमाल तो ये है कि हम इंसान साबित हुए और इतनी कोशिशों के बावजूद भी इंसान बने हैं!! और जनाब आज के दौर में इतनी संजीदगी बचाकर रख लेना कमाल ही है. इससे भी ज़्यादा बड़ा कमाल जनाब अदम गोंडवी साहब का है. तेज़ाब लिए घूमते हैं ज़हन में, मगर हुकूमत की मैदे की लोई से गुरेज करते हैं!!

    बाकी की ग़ज़लों पर सरसरी नज़र डालकर चल देना भी अच्छी बात नहीं. उनके बारे में भी कह देते तो अच्छा लगता!!
    आख़िरी बयान तो सरवत साहब का है, मैंने तो बस एक पाठक की हैसियत से जो समझा वो कहा!! डिस्क्लेमर लगाना भूल गया था कि इतनी समझ नहीं है इस विषय की, बस कानों से समझ का काम लेता हूँ.

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  21. परम आदरणीय
    एक-एक/ज़हन पर/वही सवाल है,
    लहू-लहू में/आज फिर/ उबाल है!
    अगर शेर को यूं पढ़ें तो इसका पहला मिस्रा फ़ऊ फ़ऊ फ़ऊ फ़ऊ फ़ऊ फ़ऊ, अर्थात् 12 12 12 12 12 12। या 'बढे चलो बहादुरों बढे चलो' का हम बहर नहीं लगता.

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  22. एक और निवेदन, कविता में बात शब्दों के माध्यम से होनी चाहिए, कोई चिन्ह लगाकर नहीं.
    इमारतों में बसने वाले बस गए
    मगर वो जिसके हाथ में कुदाल है? ये शेर अगर केवल पढने के लिए ही है तो प्रश्नवाचक चिन्ह अर्थ को थोडा बहुत साफ करने में मदद करता है लेकिन इस खूबसूरत ग़ज़ल को अगर कोई संगीत बद्ध करना चाहे तो अपने गायन में इस प्रश्न चिन्ह का उपयोग किस तरह करे? कोई सुनने वाला इस सवालिया निशान को कैसे देख पायेगा? सुनने वाला इस निशान को किस तरह दिखायेगा? इस निशान पर अगर नजर नहीं जाती तो शेर का मतलब हुआ 'इमारतों में बसने वाले बस गए मगर वो, जिसके (जिनके?) हाथ में कुदाल है. अर्थात इमारतों में वे बसने वाले बस गए जिनके हाथ में कुदाल है. आजकल के हालात में जरुरी नहीं कुदाल केवल मजदूर के ही हाथ में हो, तोड़-फोड़ करने वाले के हाथ में भी कुदाल ही होगी. कविता की पहली शर्त यही है कि उसका शब्द-शब्द वही कहे जो कहने की कोशिश की गयी है. हिंदी छंद शास्त्र के अनुसार तो अर्थ की भ्रान्ति उत्पन्न करने वाली कविता में वाक्छल दोष माना जाता है, उर्दू शायरी तो इस से भी कई कदम आगे जाकर केवल और केवल स्पष्ट कथन की ही मांग करती है.

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  23. एक-एक/ज़हन पर/वही सवाल है,
    लहू-लहू में/आज फिर/ उबाल है!
    यहाँ 'एक एक' को 'एक-एक' ही पढ़ कर लय के मामले में कुछ बात बनती है, लेकिन इस तरह लय ठीक हुई तो बहर बिगड़ेगी और किसी तरह बहर सही हुई तो लय पर प्रभाव पड़ेगा. आदरणीय बिहारी ब्लोगर के कानों वाले फैसले से मैं भी सहमति रखता हूँ, जिस तरह उन्होंने लिखा उस तरह चाहेंगे तब भी नीचे की पंक्ति में एक जगह मात्रा गिरा कर और एक शब्द बढ़ा कर पढना पड़ेगा तब लय ठीक आएगी. देखें-
    एक-एक/ज़हन पर/--वही सवाल है,
    लहू-लहू में/आज फिर/-- क्यों उबाल है!
    मैं की मात्रा गिरा कर पढ़ते हुए दोनों पंक्तियाँ २० मात्रा के पैमाने पर ठीक हो जाएँगी. इतना करने पर भी यह केवल मुक्तक माना जायेगा, शेर की श्रेणी में आ सकता है या नहीं कहना कठिन है.

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  24. इमारतों में बसने वाले बस गए
    मगर वो जिसके हाथ में कुदाल है
    मैं मानता हूँ कि मानी जरुरी नहीं कि नुमाया हो फिर भी ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि कविता और पहेली में कोई अंतर ही न रहे. क्या कहने का इरादा है, कम से कम उस ओर पाठक/ श्रोता के विचारों को दिशा देने का काम तो कविता के शब्दों को ही करना चाहिए. यह शेर जिस प्रवाह की बहर में है अगर उसी प्रवाह में सुना जायेगा तो अर्थ की भ्रान्ति अवश्यम्भावी है. अंत में अपने बाल चापल्य के लिए एक बार पुनः क्षमा प्रार्थना और आप समस्त विद्वानों के शुभाशीष की कामना.

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  25. बहुत दिनों से मुझे साखी के मंच पर श्री सर्वत जमाल सर जी की ग़ज़लों की प्रतीक्षा थी जो अब समाप्त हुई | यहाँ का वातावरण तो बहुत रोमांचक प्रतीत हो रहा है| एक ओर मेरे पसंदीदा शायर श्री सर्वत जमाल सर जी की दहाड़ती-ललकारती गज़लें हैं और दूसरी ओर उतनी ही चुनौती देती स्वस्थ्य समालोचनात्मक टिप्पणियां हैं | हम जैसे नवीन रचनाकारों के लिए ये मंच सदैव से मार्गदर्शक साबित हुआ है |सारे ब्लॉग जगत में केवल यही एकमात्र ऐसा मंच है जहाँ रचनाकारों की रचनाएँ अग्नि में तप कर कुंदन बनती हैं|श्री सुभाष राय जी का बहुत बहुत आभार इस मंच पर इतनी आदर्शवादी रचनाओं और रचनाकारों को प्रस्तुत करने का....धन्यवाद !!!

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  26. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  27. श्रीमान मदन मोहन जी मुझे ग़ज़ल के व्याकरण का ज्ञान तो नहीं है परन्तु आपकी कही बात (कविता में बात शब्दों के माध्यम से होनी चाहिए, कोई चिन्ह लगाकर नहीं.इमारतों में बसने वाले बस गए...सुनने वाला इस निशान को किस तरह दिखायेगा?)के बारे में अवश्य कुछ कहने की हिम्मत कर रही हूँ| मदन मोहन जी बात चीत के दौरान हम किसी चिन्ह का प्रयोग अवश्य नहीं करते परन्तु स्वर के माध्यम से हम अपने विचारों को व्यंग, क्रोध ,स्नेह ,आदर के भाव से प्रदर्शित करते हैं |मैं आपकी इस बात से सहमत नहीं हूँ

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  28. @एक और निवेदन, कविता में बात शब्दों के माध्यम से होनी चाहिए, कोई चिन्ह लगाकर नहीं.
    इमारतों में बसने वाले बस गए
    मगर वो जिसके हाथ में कुदाल है?
    ये शेर अगर केवल पढने के लिए ही है तो प्रश्नवाचक चिन्ह अर्थ को थोडा बहुत साफ करने में मदद करता है लेकिन इस खूबसूरत ग़ज़ल को अगर कोई संगीत बद्ध करना चाहे तो अपने गायन में इस प्रश्न चिन्ह का उपयोग किस तरह करे? कोई सुनने वाला इस सवालिया निशान को कैसे देख पायेगा? सुनने वाला इस निशान को किस तरह दिखायेगा?

    हाल में जितने भी ग़ज़लों के संकलन प्रकाशित हुए हैं, उनमें तो किसी भी तरह के विराम चिह्न देने का प्रचलन नहीं है. और गज़लें “कही” जाती हैं और “सुनी” जाती हैं, लिखी या पढ़ी नहीं जातीं. लिहाजा किसी सुनने में तो भावों का सम्प्रेषण गज़ल पढाने वाले की अभिव्यक्ति पर निर्भर करता है, न कि विराम चिह्न पर. ग़ालिब की गज़ल “दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है/आखिर इस दर्द की दवा क्या है” कई लोगों ने गाई है.

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  29. इस बात से मैं कतई सहमत नहीं कि कविता में बात चिह्न लगाकर नहीं होनी चाहिए. बात प्रश्न चिह्न की हो रही है तो पेश हैं चंद अशार मुख्तलिफ शायरों के:
    जाता है यार तेग-ब-कफ गैर की तरफ,
    ऐ कुश्त-ए-सितम तेरी गैरत को क्या हुआ? (मीर)
    पूछकर अपनी निगाहों से बता दे मुझको,
    मेरी रातों के मुक़द्दर में सहर है कि नहीं? (साहिर)
    परीशां हो गए शीराज़ा-ए-औराक-ए-इस्लामी,
    चलेंगी तुंद बादे कुफ्र की यह आंधियां कब तक? (कैफी)
    सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है,
    दिल पे रखके हाथ कहिये देश क्या आज़ाद है? (अदम गोंडवी)
    दिलों का हाल आसानी से कब मालूम होता है,
    कि पेशानी पे चन्दन तो सभी साधू लगाते हैं? (मुनव्वर राना)
    इतना कहकर मैं इस मुबाहिसे से तखलिया होता हूँ. बाकी की सफाई जनाब सरवत जमाल साहब के जिम्मे, क्योंकि उनका कहा “फ्रॉम होर्सेस माउथ” होगा! हम तो बस अपनी समझ से बयान दे रहे हैं!!

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  30. अपनी पिछली टिप्पणी में मुझसे भी एक शब्द की कंजूसी हुई और शायद यही कारण रहा कि मैं अपनी बात स्पष्ट नहीं कर पाया. मैंने लिखा 'कविता में बात शब्दों के माध्यम से होनी चाहिए, कोई चिन्ह लगाकर नहीं.' जबकि मुझे लिखना चाहिए था 'कविता में बात शब्दों के माध्यम से होनी चाहिए, केवल मात्र कोई चिन्ह लगाकर नहीं. परम आदरणीय बिहारी ब्लोगर द्वारा बताये गए हर शेर के अध्ययन से भी यही बात निकाल कर आती है कि हर शेर में प्रश्न वाचक चिन्ह से पहले कही न कहीं एक प्रश्न वाचक शब्द भी आवश्यक रूप से मौजूद है. देखिये-
    (१)ऐ कुश्त-ए-सितम तेरी गैरत को क्या हुआ? (मीर)
    (२)पूछकर अपनी निगाहों से बता दे मुझको,
    मेरी रातों के मुक़द्दर में सहर है कि नहीं? (साहिर)
    (3)परीशां हो गए शीराज़ा-ए-औराक-ए-इस्लामी,
    चलेंगी तुंद बादे कुफ्र की यह आंधियां कब तक? (कैफी)
    (4)सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है,
    दिल पे रखके हाथ कहिये देश क्या आज़ाद है? (अदम गोंडवी)
    (5)दिलों का हाल आसानी से कब मालूम होता है,
    कि पेशानी पे चन्दन तो सभी साधू लगाते हैं? (मुनव्वर राना)
    यहाँ शेर (१) में 'क्या हुआ', शेर (२) में 'पूछ कर' और 'है कि नहीं', शेर (3) में 'कब तक' शेर (4) में 'क्या' और शेर (5) में 'कब' प्रश्न वाचक शब्द हैं, लेकिन
    इमारतों में बसने वाले बस गए
    मगर वो जिसके हाथ में कुदाल है? यहाँ कोई प्रश्न वाचक शब्द प्रयुक्त नहीं हुआ.

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  31. परम आदरणीय बिहारी ब्लोगर के इन विचारों से मैं भी सहमत हूँ 'हाल में जितने भी ग़ज़लों के संकलन प्रकाशित हुए हैं, उनमें तो किसी भी तरह के विराम चिह्न देने का प्रचलन नहीं है. और गज़लें “कही” जाती हैं और “सुनी” जाती हैं, लिखी या पढ़ी नहीं जातीं. लिहाजा किसी सुनने में तो भावों का सम्प्रेषण गज़ल पढने वाले की अभिव्यक्ति पर निर्भर करता है, न कि विराम चिह्न पर.' इस प्रकार प्रश्न चिन्ह तो स्वयं ही अप्रासंगिक हो गया, फिर अगर कोई प्रश्न वाचक शब्द बदले में नहीं आयेगा तो पाठक या श्रोता का मस्तिष्क दुविधा में पड़ेगा ही.
    आदरणीया अर्चना जी से भी मेरी यही प्रार्थना है की वे मेरे निवेदन को आदरणीय बिहारी ब्लोगर द्वारा बताई गयी उपरोक्त ग़ज़लों पर मेरे नम्र निवेदन के परिप्रेक्ष्य में एक बार फिर से देखने की कृपा करें फिर भी अगर मेरी बात से सहमत न हो पायें तो में अपनी भूल के लिए अभी से क्षमा प्रार्थी हूँ. इस मंच पर उपस्थित विद्वानों से एक विद्यार्थी के रूप में अभी मुझे बहुत कुछ सीखना है. सादर.

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  32. प्रस्तुत रचनाओं का वाचन किया.
    भाषा के विविधांगों में शब्द, चिन्ह और उच्चारण सबका अपना-अपना महत्त्व है. विराम चिन्हों को नकारना मुझे उचित नहीं लगता. विराम चिन्ह न होने पर प्रश्नसूचक शब्द ही रचनाकार का मंतव्य तथा भाव स्पष्ट कर पाते हैं जबकि विराम चिन्ह हों तो बिना प्रश्नवाचक शब्द के भी भाव स्पष्ट हो जाता है. पाठक या गायक प्रश्नवाचक शब्द या प्रश्नचिन्ह या दोनों होने पर रचनाकार के मंतव्य को समझकर तदनुसार उच्चारण कर भाव संप्रेषित कर सकता है. यह मुद्दा बहस का कम, अनुभव का अधिक है. रचनाकार स्वयं निश्चित करता है कि उसे कहाँ क्या उपयोग करना है ताकि उसका भाव और कथ्य पाठक/श्रोता तक पहुँच सके.
    प्रस्तुत रचनाएँ सामयिक हैं. इनमें जमीनी सचाई का एक पहलू है किन्तु इसके अलावा भी बहुत कुछ है. रचनाकार और पाठक/श्रोता के मध्य इनसे सेतु बनता है किन्तु समीक्षक को सकल परिदृश्य को देखकर मूल्यांकन करना होता है.
    पत्रों में कहीं पाठकीय प्रतिक्रिया और कहीं समीक्षकीय दृष्टि हो तो विभिन्नता स्वाभाविक है किन्तु वे विरोधी नहीं पूरक हैं.
    Acharya Sanjiv Salil

    http://divyanarmada.blogspot.com

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  33. रचनाकार अगर स्वयं निश्चित कर सके कि उसे कहाँ क्या उपयोग करना है तो निश्चय ही यह बात अच्छी रचना और जागरूक रचनाकार के हित में होगी, मैं स्वयं इस विचारधारा का मानने वाला हूँ, परन्तु ग़ज़ल के अपने कुछ प्रतिबन्ध, अपने कुछ नियम हैं जो रचनाकार को छूट लेने की इजाजत नहीं देते. इसके अतिरिक्त पाठक और श्रोता का अंतर तो हमें करना ही चाहिए. संभव है यह मेरा पूर्वाग्रह ही हो, मुझे ऐसी कोई ग़ज़ल अब तक पढने को नहीं मिली जिसमें प्रश्नवाचक शब्द को न रख कर प्रश्न करने के लिए केवल प्रश्नचिन्ह का ही उपयोग हुआ हो , प्रश्न अगर किया जाये तो प्रश्नवाचक शब्द ही उसे सम्पूर्णता प्रदान करता है, मैं फिर निवेदन करना चाहता हूँ, चिन्ह केवल देखे जा सकते हैं, कहे या सुने नहीं जा सकते. एक-दो नहीं, ऊपर उद्धृत पांच-पांच शेर इस बात के प्रमाण हैं, ग़ज़ल के अनुशासन की यही मांग भी है.

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  34. मुझे इल्म ही नहीं था कि मेरे इतने चाहने वाले मौजूद हैं. मैं इन मुहब्बतों के लिए, राजेश उत्साही, हरकीरत हीर, सुमन, तिलक राज कपूर,नीरज गोस्वामी, उड़न तश्तरी (समीर), अविनाश वाचस्पति, जितेन्द्र जौहर, दानिश, रवीन्द्र प्रभात,वेद व्यथित, अब्निश सिंह चौहान, सुनील गज्जाणी, चला बिहारी...(सलिल), अर्चना तिवारी संजीव वर्मा सलिल और मदन मोहन अरविन्द का शुक्रगुज़ार हूँ लेकिन एक निवेदन भी है-------------
    "अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी बहल जाए
    अब इतना भी तो न चाहो कि दम निकल जाए"
    भाई, इतना प्यार समेट कर ले कैसे जाऊँगा!

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  35. मदन मोहन अरविन्द जी, यह ग़ज़ल है. जब तक इस में महारत न हो, प्रश्न पूछे जाने चाहिए न कि आलोचना. जिस वजन को आप फऊ फऊ फऊ.....बता रहे हैं, वह अस्ल में मुफाईलुन मुफाइलुन मुफाइलुन है. जिस मिसरे को लेकर आप द्विविधा में हैं, एक एक ज़हन पर वही सवाल है अगर वजन आपके ज़हन में होता तो उसे 'इकेक ज़हन पर वही सवाल है' पढ़ लेते. नाहक उसे भर से ख़ारिज करार देने में इतनी ऊर्जा खर्च दी.
    फिर मतले का अधूरापन भी सालता रहा आपको. ग़ज़ल शास्त्र का अध्ययन किया होता तो कतअ बंद अशआर के बारे में भी ज्ञान होता. मतला और पहला शेर कतअ बंद हैं. शायरी में ऐसे प्रयोग क़ुतुब कुली शाह-वाली दकनी के जमाने से चले आ रहे हैं, मीर-ग़ालिब तक ने इनकी पैरवी की है, अगर मैं ने भी उनके नक्शे-कदम पर चलने की कोशिश की तो क्या गुनाह किया?

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  36. टंकण दोष---मिसरा मुफाइलुन मुफाइलुन मुफाइलुन है.

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  37. मदन मोहन अरविन्द जी-रदीफ के अंत में 'ए' है और ऊपर के मिसरे में भी अंत में 'ए' आ रहा है, यह आपने तकाबुल-ए-रदीफ बताया जो एक दोष है. क़ुतुब कुली शाह से लेकर आज के मुज़फ्फर हनफी तक को आगाह कीजिए, यह कानून आपने किसी बहुत पुराणी किताब से उद्धृत किया है जो अब कहीं अमल में नहीं है. आप की खिदमत में एक शेर पेश है---
    "दुनिया पहुँच रही है कहाँ से कहाँ से कहाँ अमीर
    तुम हो शरीक-ए-महफिल-ए-शेर-ओ-सुखन अभी"

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  38. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  39. मदन जी, आपके आरोपों की बौछार का पहले मैं ने कोई जवाब न देने का फैसला किया था. फिर जब आपने कहा..."संभव है यह मेरा पूर्वाग्रह ही हो", तो मुझे यह मुआमला कुछ संगीन लगा. मैं ने 'साखी' के पुराने पन्ने पलटे और एक वर्ष पूर्व आपकी रचनाओं पर मेरे द्वारा की गई समीक्षा नज़र आई तो सारा मसअला समझ में आ गया.
    आप साहित्यकार हैं, गज़लों से जुड़े हैं और मुझसे उम्र में दो वर्ष छोटे भी, इस नाते एक सलाह अवश्य देना चाहूँगा...अध्ययन कीजिए, ग़ज़ल तुकबंदी मात्र नहीं है, बहुत खून जलाती है, बहुत मेहनत मांगती है. मैं अगर आप से कह रहा हूँ तो यह मेरा अपना अनुभव है, मैं ने खुद ऐसा किया है, ग़ज़लों में प्रयोग किए हैं लेकिन ऐसा तभी सम्भव हुआ जब इस विद्या को पूरी तरह समझ पाने में कुछ सफलता पा सका.
    आलोचना बहुत बड़ा काम है. इसके लिए विस्तृत अध्ययन आवश्यक है वरना स्थिति हास्यास्पद हो जाती है.

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  40. अधिक विस्तार में न जाकर केवल एक ही निवेदन पुनः करना चाहूँगा कि कुछ हिदायतों के अतिरिक्त कोई संतोष जनक समाधान उपरोक्त टिप्पणियों से नहीं मिलता. प्रश्न जैसे पहले थे अब भी हैं. अति आत्मविश्वास के फेर में हम अक्सर अपने विचार दूसरों पर लादने की कोशिश कर जाते हैं. यह तथ्य मुझ पर तो लागू होता ही है , पर ऐसे उदहारण अन्यत्र भी संभव हैं. कैसा अजीब उल्लेख है, 'एक वर्ष पूर्व आपकी रचनाओं पर मेरे द्वारा की गई समीक्षा नज़र आई तो सारा मसअला समझ में आ गया.', इसे क्या कहूँ? बात रचनाओं पर थी, वहीँ तक सीमित रहती तो प्रसन्नता होती. इतनी लम्बी गांठ?
    फायदा कुछ न हुआ पी के बहक जाने से,
    बात मैखाने की बाहर गयी मैखाने से.

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  41. मुझे लगता है जनाब सर्वत जमाल की टिप्पणियों में घमंड अधिक है, सार कम. यह सही है कि 'एक-एक जहन' वाले मिस्रे को ठीक से समझने में जोर पड़ता है, फिर भी रूकावट आती है. सवालिया निशान वाली बात भी पूरी तरह सही है. पुरानी किताबों के कानून से आपको आपत्ति क्यों है. जिन बड़े शायरों के नाम आप ले रहे हैं, सोच कर देखिये आप उनके पासंग बराबर भी हैं क्या? और गलती सिर्फ गलती होती है, चाहे छोटा करे या बड़ा. ग़ज़ल कहते हैं तो सफाई से कहनी ही होगी, सौ बातें बनाने से कम नहीं चलने वाला.

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  42. मुझे लगता है जनाब सर्वत जमाल की टिप्पणियों में घमंड अधिक है, सार कम. यह सही है कि 'एक-एक जहन' वाले मिस्रे को ठीक से समझने में जोर पड़ता है, फिर भी रूकावट आती है. सवालिया निशान वाली बात भी पूरी तरह सही है. पुरानी किताबों के कानून से आपको आपत्ति क्यों है. जिन बड़े शायरों के नाम आप ले रहे हैं, सोच कर देखिये आप उनके पासंग बराबर भी हैं क्या? और गलती सिर्फ गलती होती है, चाहे छोटा करे या बड़ा. ग़ज़ल कहते हैं तो सफाई से कहनी ही होगी, सौ बातें बनाने से कम नहीं चलने वाला.

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  43. Sarwat ji bade achchhe shayar hain .unkee shayree mein nayaapan hai . Unka kahnaa sahee
    hai ki gazal bahut khoon jalaatee hai , bahut
    mehnat maangtee hai . Is sandarbh mein maine
    kabhee kahaa thaa -

    SOCH KEE BHATTEE MEIN SAU - SAU BAAR DAHTAA HAI
    TAB KAHEEN JAA KAR KOEE IK SHER KAHTAA HAI

    Main Sarwat ji kee gazalen bade manoyog se padh
    gyaa hoon . Adhikaansh ashaar kee abhivyakti
    khoob lekin unke un ashaar mein mujhe bhee khaamiyan nazar aayee hain jinko Madan Mohan
    ` arvind` ne rekhankit kiyaa hai .

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  44. सोच रहा था, कुछ कहूँ या चुप रहूँ. इसी कशमकश में एक शेर याद आया-
    'जब लगेगी आशियाँ जल जायगा,
    आग को बेशक हवा कह दीजिये.' अपनी मर्जी से हम जो चाहे कहते रहें, सच की तासीर नहीं बदलने वाली.
    'मैं जानता हूँ, तुम नहीं जानते' बल्कि उसके भी आगे 'मैं सब जानता ,हूँ तुम कुछ नहीं जानते', बातचीत का आगाज अगर इस अंदाज में हो तो कहने को कुछ खास नहीं बचता, फिर भी एकबार ग़ज़ल की ओर वापस लौटने की हिम्मत करता हूँ.
    'कोई बोले अगर तो क्या बोले
    बंद है सारे कान सदियों से.'
    और
    'कारनामे नजर नहीं आते
    उलटे सीधे बयान सदियों से.'
    'यह आपने तकाबुल-ए-रदीफ बताया जो एक दोष है. क़ुतुब कुली शाह से लेकर आज के मुज़फ्फर हनफी तक को आगाह कीजिए, यह कानून आपने किसी बहुत पुराणी किताब से उद्धृत किया है', एकदम सही बात है, बहुत पुरानी किताबों में लिखा है इसलिए बेकार है, इस हिसाब से तो 'क़तअ बंद अशआर' भी बहुत पुरानी किताबों में लिखे हैं, बहर और अरकान भी, इन्हें भी क्यों न ख़ारिज कर दिया जाये? थोडा और आगे चलिए-

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  45. 'प्रश्न पूछे जाने चाहिए न कि आलोचना.', अब अगर बात साफ हो तो सीधे-सीधे कही जाती है, जब कोई दुविधा नहीं तो सवाल क्यों? 'इकेक जहन पर वही सवाल है' इस मिस्रे को 'इमारतों में बसने वाले बस गए', तुम्हारी कोशिशें कुछ और थीं मगर' और .'हम आदमी हैं ये भी इक कमाल है' इत्यादि के साथ पढ़ कर देखिये, लयभंग है या नहीं,.कहावत है आग के बिना धुआं नहीं होता, अटकाव है, भटकाव है, शिद्दत से महसूस भी होता है, ये अलग बात है कि कौन कितनी बारीकी से देख पाता है. झोल देख कर किसी को भी अचरज होगा, वह भी खास तौर से मतले के मिस्रे उल़ा में! कहते तो ये हैं कि ग़ज़ल में मतला बड़ा महत्वपूर्ण होता है और इसी पर सबसे अधिक परिश्रम की आवश्यकता होती है, पर छोडिये, अब और आगे चलते हैं-
    'अगर वजन आपके ज़हन में होता तो उसे 'इकेक ज़हन पर वही सवाल है' पढ़ लेते. ', एकदम सही, तो क्या ये ग़ज़ल सिर्फ बहर के जानकारों के लिए ही थी? इससे भी बड़ा सवाल ये कि क्या ग़ज़ल सबके लिए नहीं होनी चाहिए? और अगर सबके लिए है, तो सिर्फ इस हिदायत से काम नहीं चलेगा कि पढने वाला पहले बहर सीख कर आये. शायद इसी लिए मतले को एकदम साफ सुथरा रखने की परिपाटी बनाये रखने पर (पुरानी किताबों में?) जोर दिया जाता था. अब जरा नीचे दी गयी तीन पंक्तियों पर गौर फरमाइए-
    एक एक जहन पर वही सवाल है (पहली ग़ज़ल की पहली पंक्ति.)
    हम आदमी हैं, यह भी इक कमाल है (पहली ग़ज़ल की अंतिम पंक्ति.)
    कुछ इक उनकी नज़र में हों तो जायज़ (तीसरी ग़ज़ल के आखिरी शेर का पहला मिस्रा)
    नीचे की दोनों पंक्तियों में ' इक कमाल' और 'कुछ इक' में 'एक' की जगह साफ-साफ 'इक' लिखा गया और सबसे पहली पंक्ति में साफ-साफ 'एक-एक'. मतलब भी साफ कि जहाँ 'इक' पढवाना था वहां 'इक' और जहाँ 'एक' पढवाना था वहां 'एक' ही लिखा गया. अगर कुछ और पढवाना जरुरी था तो नीचे की दोनों पंक्तियों की तरह ऊपर वाली पंक्ति के पहले शब्द को भी 'इक एक' लिख दिया होता. पढने वाला ठीक ही पढता. जब लिखने में स्वयं ही 'इ' और 'ए' का अंतर करके लिखा जा रहा हो तो पढने वाला अपने दिमाग पर जोर क्यों दे?
    बावजूद इसके ग़ज़ल अगर देवनागरी में लिखी हो तो पढने वाले का उच्चारण 'जैसा लिखा वैसा पढ़ा' की तर्ज पर होना स्वाभाविक है, अब ग़ज़ल के पहले ही मिस्रे के पहले ही शब्दों के उच्चारण में परिवर्तन के लिए कितनी कसरत होती है, सिलसिलेवार देखिये-
    १. 'एक-एक' ('मगर वो जिसके हाथ में कुदाल है?' यहाँ अगर प्रश्न चिन्ह जरुरी है तो 'एक-एक' भी इसी तरह अलग-अलग लिखा जायेगा, अब मेल कैसे हो?)
    २. एकेक. (चलिए मनमानी करली.)
    3. 'इकिक' ( तीसरा नंबर इसी का है. 'एकेक' में दोनों जगह 'ए' है, बदलाव करते समय दोनों पर 'common rule' लागू होगा.)
    ४. इकेक (यह सबसे बाद में आयेगा, क्योंकि पहले अगर पहली 'ए' को 'इ' में बदला जायेगा तो स्वाभाविक रूप से दूसरी 'ए' का उच्चारण भी स्वतः 'इ' जैसा हो जायेगा. अगर उच्चारण में बदलाव लाना हो तो इस बात का ध्यान तो रखा ही जाना चाहिए कि एक ही शब्द में परिवर्तन समानधर्मी हो.) अभी इसका पांचवां रूप 'एकिक' भी हो सकता है. ऐसे में चुनाव करना आसान तो नहीं. जाहिर है सारी बातें किताबों में तो लिखी नहीं जाएँगी, कुछ ऐसा भी हो जाये कि हम दूसरों के लिए आसानी कर के चलें, अब मेरा दिल भी यही शेर कहने की जिद कर रहा है-
    "दुनिया पहुँच रही है कहाँ से कहाँ से कहाँ अमीर
    तुम हो शरीक-ए-महफिल-ए-शेर-ओ-सुखन अभी" , अब आगे-

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  46. 'ग़ज़ल शास्त्र का अध्ययन किया होता तो कतअ बंद अशआर के बारे में भी ज्ञान होता.', बिलकुल दुरुस्त, बहुत ज्ञान वर्धन हुआ. विधाए अनेकों हैं, ग़ज़ल है. हज़ल है. कतअ भी है. और भी बहुत कुछ है. अशआर तो इन सभी में होते हैं. लेकिन जरा सा मिजाज और अंदाज बदलते ही नाम भी बदल जाते हैं. अलग-अलग खासियत के मुताबिक किसी को ग़जल. किसी को हजल तो किसी को कतअ का नाम दे दिया जाता है. अब कोई बताशे को रसगुल्ला कहकर परोसना चाहे तो उसकी मर्जी. सुना और पढ़ा तो ये था कि 'कतअ' वास्तव में एक स्वतंत्र विधा है, 'ग़ज़ल' और 'कतअ' दोनों के मिजाज अलग-अलग हैं, इसलिए 'ग़ज़ल' को 'ग़ज़ल' और 'कतअ' को 'कतअ' ही कहा जाये तो अच्छा, दोनों एक दूसरे से बिलकुल अलग चलते हैं, एक में 'अशआर' एक दूसरे से जुड़े होते है और दूसरे में हर शेर स्वतंत्र, या फिर मुसलसल ग़ज़ल होती है. मज़बूरी में 'कतअ' का उपयोग अगर ग़ज़ल में हो तो बड़ी सावधानी से होना चाहिए, एक और बात जान लेनी चाहिए, 'कतअ' को अक्सर ग़ज़ल के बाद बाकायदा (क़) निशानी लगाकर लिखा जाता था, मद्दाह के शब्दकोश में बताया गया है कि कत्‌अः उर्दू-फ़ारसी शाइरी में नज़्म की एक किस्म है जिसमें ग़ज़ल की ही तरह क़ाफ़िये की पाबन्दी होती है और जो एक ही विषय पर होती है। इसके अलावा सिर्फ कतअ बंद अशआर में होने से ही ग़ज़ल के बुनियादी कायदे कानूनों से किसी तरह की छूट हासिल नहीं हो जाती. विद्वत्ता इस में है कि कही गयी बात इतनी स्पष्टता से कही जाये कि नादान से नादान भी उसे समझ सके. इस पर किसी शायर का एक बड़ा पुराना(?) शेर है-
    अगर अपना कहा हम आप ही समझे तो क्या समझे,
    मजा कहने का तब है एक कहे और दूसरा समझे.
    आम आदमी की बात खास लहजे में कही जाएगी तो उसका असर कुछ खास नहीं होगा, अगर इस बारे में कोई बच्चा भी अपनी राय रखता है तो उसकी राय पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए, कोरी नसीहत नहीं-
    'ऐ शेख न कर तू वादाकाशों को नसीहत,
    सब नेक बनेंगे तो खता कौन करेगा.'

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  47. गली कूचों में रह जाती हैं घुट कर
    अब अफवाहें सरे बाज़ार लिखना
    ये क्या? 'लिखना?', अफवाहें फैलाना और अफवाहें उडाना तो सुना था, लिखना पहली बार देखा है.

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  48. 4month ke baad net se juda hoon isliye sabse pahale sabhi ko pranaam. ji khush ho gaya dada sarwat ji ki ghazalen padhkar. hamesha ki tarah super fine. mera pranam.
    kurtidev ko unicode men badalne ka link koi bata den to meharbani.

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