अभियान के साथी

शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2010

नीरज गोस्वामी की गजलें


  आप जानते हैं नीरज गोस्वामी को? अगर आप की दिलचस्पी शायरी में, कविता में है तो जरूर जानते होंगे| चौदह अगस्त उन्नीस सौ पचास को पठानकोट, जम्मू में जन्मे| वे खुद कहते हैं,  याने हम ताज़ा ताज़ा सठियाये हैं| स्थाई निवास जयपुर में|  इंजीनियरिंग  की पढ़ाई की, वर्तमान में भूषण स्टील लिमिटेड खोपोली, खंडाला के पास, में वाइस प्रेसिडेंट के पद पर कार्यरत हैं| साहित्य, सिनेमा, संगीत ,क्रिकेट, भ्रमण में रूचि है| साखी के लिए जब मैंने नीरज जी से परिचय माँगा तो उन्होंने सिर्फ इतना ही भेजा| मुझे लगा लोग कुछ और जानना चाहेंगे तो मैंने विस्तार से लिखने को कहा| पढ़िए उन्होंने क्या लिखा... भाई जान परिचय में क्या जानना चाहते हैं ये तो बताइए और वैसे भी परिचय पढ़ने की फुर्सत किसे होती है आज के ज़माने में। कोई फोटो देख ले वो ही गनीमत समझो फिर भी अगर आप कुछ विशेष जानकारी चाहते हैं तो लिख भेजें। अब और क्या परिचय दें सिवा इसके कि  हमने शायरी अभी  पिछले तीन साल से लिखनी शुरू की जबकि पढ़नी पचास साल पहले ही कर दी थी। इस लायक कभी कुछ लिखा नहीं कि  उसे किसी रिसाले या अखबार में छपने के लिए भेजते। किताब छपवाने जैसी खतरनाक बात कभी सोची नहीं, ये सोच कर कि  अगर कभी खुदा न खास्ता छप गयी तो पढ़ेगा कौन? पहले जब गज़लें लिखता था तो अपनी एक मात्र बीवी की शराफत का नाजायज फायदा उठा कर उसको सुनाया करता था, क्यूँ कि  बेटा बहू  ने पहले ही कह दिया था कि  पापा गाली दे दो लेकिन ग़ज़ल मत सुनाना। गरीब मजलूम बीवी के हमारी गज़लें सुनते-सुनते जब कान पकने लगे, सब्र का बाँध टूटता नज़र आया और बात तलाक तक पहुँचने की नौबत आ गयी तो एक शरीफ मित्र ने समझाया कि  भाई काहे नाहक सीधी-सादी एक मात्र बीवी की जान के पीछे पड़े हो| तुम्हारी ग़ज़लें यूँ तो कोई सुनेगा नहीं| ऐसा करो एक ब्लॉग खोलो और उस पर डाल दो| अगर कोई पढ़ कर नाराज़ भी हुआ तो ज्यादा से ज्यादा एक आध गाली लिख देगा लेकिन तुम्हारा घर तो नहीं टूटेगा। तब से अब तक ब्लॉग के माध्यम से भडांस निकल रहे हैं। और क्या बताएं...? भाई मैं तो इस भड़ास में गजल देखता हूँ| लीजिये उनकी भड़ास के चार अदद टुकड़े पेश हैं---
१.

मान लूँ मैं ये करिश्मा प्यार का कैसे नहीं
वो सुनाई दे रहा सब जो कहा तुमने नहीं

इश्क का मैं ये सलीका जानता सब से सही
जान दे दो इस तरह की हो कहीं चरचे नहीं

तल्ख़ बातों को जुबाँ से दूर रखना सीखिए
घाव कर जाती हैं गहरे जो कभी भरते नहीं

अब्र लेकर घूमता है ढेर-सा पानी मगर
फ़ायदा कोई कहाँ गर प्यास पे बरसे नहीं

छोड़ देते मुस्कुरा कर भीड़ के संग दौड़ना
लोग ऐसे ज़िंदगी में हाथ फिर मलते नहीं

खुशबुएँ बाहर से 'नीरज' लौट वापस जाएँगी  
घर के दरवाज़े अगर तुमने खुले रक्खे नहीं

२.
जड़ जिसने थी काटी प्यारे
था अपना ही साथी प्यारे

सच्चा तो सूली पर लटके
लुच्चे को है माफी प्यारे

उल्टी सीधी सब मनवा ले
रख हाथों में लाठी प्यारे

सोचो क्या होगा गुलशन का
माली रखते आरी प्यारे

इक तो राहें काटों वाली
दूजे दुश्मन राही प्यारे

भोला कहने से अच्छा है
दे दो मुझको गाली प्यारे

मन अमराई यादें कोयल
जब जी चाहे गाती प्यारे

तेरी पीड़ा से वो तड़पे
तब है सच्ची यारी प्यारे

तन्हा जीना ऐसा "नीरज"
ज्यूं बादल बिन पानी प्यारे


गूगल से साभार 
 ३.
तीर खंजर की ना अब तलवार की बातें करें
जिन्दगी में आइये बस प्यार की बातें करें

टूटते रिश्तों के कारण जो बिखरता जा रहा
अब बचाने को उसी घर बार की बातें करें

थक चुके हैं हम बढ़ा कर यार दिल की दूरियां
छोड़ कर तकरार अब मनुहार की बातें करें

दौड़ते फिरते रहें पर ये ज़रुरी है कभी
बैठ कर कुछ गीत की झंकार की बातें करें

तितलियों की बात हो या फिर गुलों की बात हो
क्या जरुरी है कि हरदम खार की बातें करें

कोई  समझा ही नहीं फितरत यहां इन्सान की
घाव जो देते वही उपचार की बातें करें

काश 'नीरज' हो हमारा भी जिगर इतना बड़ा 
जेब खाली हो मगर सत्कार की बातें करें

४.
दर्द दिल में मगर लब पे मुस्कान है
हौसलों की हमारे ये पहचान है

लाख कोशिश करो आके जाती नहीं
याद इक बिन बुलाई सी महमान है

खिलखिलाता है जो आज के दौर में
इक अजूबे से क्या कम वो इंसान है

ज़र ज़मीं सल्तनत से ही होता नहीं
जो दे भूखे को रोटी, वो सुलतान है

मीर, तुलसी, ज़फ़र, जोश, मीरा, कबीर
दिल ही ग़ालिब है और दिल ही रसखान है

पांच करता है जो, दो में दो जोड़ कर
आजकल सिर्फ उसका ही गुणगान है

ढूंढ़ता फिर रहा फूल पर तितलियां
शहर में वो नया है या नादान है

गर न समझा तो नीरज बहुत है कठिन
जान लो ज़िन्दगी को तो आसान है

संपर्क
neeraj1950@gmail.com

ब्लाग 
http://ngoswami.blogspot.com/

फोन : 9860211911



पता: नीरज गोस्वामी द्वारा भूषण स्टील लिमिटेड , 608, रीजेंट चेम्बर्स, नरीमन पोआइंट, मुंबई -400021 

गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

कैद सूरज के अब आजाद करावल जाए


साखी पर मनोज भावुक और उनकी भोजपुरी गजलों पर तो विद्वानों और रचना धर्मियों ने गहन चर्चा की ही, उनके बहाने भाषा-बोली के फर्क पर, विमर्श में गंभीरता और चुहलबाजी  के ताल-मेल पर, सलिल जी की बुद्धिसंपन्नता किंवा मूढ़ता पर और  चर्चा शब्द के लिंग पर भी जमकर माथापच्ची हुई| राजेश उत्साही की सलाह पर मुझे गुलमोहर  की छाया तले जाना पड़ा| मैंने गुलमोहर  के नीचे प्रेमियों को बैठते तो देखा-सुना था पर वहां तो भाषा के दंगाइयों से मुलाकात हुई| वहां झगडा इस बात पर हो रहा था कि चर्चा हुई ठीक है या चर्चा हुआ| समाधान भी था वहां पर, उर्दू में चर्चा होता है, हिंदी में चर्चा होती है| ऐसे कई शब्द हैं, जिनको लेकर उर्दू वाले हिंदी के लिंगबोध से सहमत नहीं हैं| ऐसे में यह सोचना कि इब्ने इंशा कमअक्ल थे, हमारी कमअक्ली के सिवा कुछ और नहीं होगा|  मैं तो यही कहूँगा कि साखी पर चर्चा रोचक भी रही(भी रहा नहीं ) और गंभीर भी| रोचक इस मायने में कि बीच-बीच में विषयांतर  होकर लोग एक-दूसरे से दिल्लगी भी करते रहे| मेरा मानना है कविता और शायरी की दुनिया के लोग बिना तंज और हंसी-मजाक के देर तक नहीं रह सकते|  ऐसे क्षणों का अपना आनंद होता है पर उनकी स्तरीयता भी अपेक्षित है| राजेश उत्साही इस मामले में हमेशा सजग रहते हैं। मैंने देखा है कि जब भी कोई भाषा में बेलगाम होने की कोशिश करता है, वे टोके बिना नहीं रहते|  जितेन्द्र जौहर ने जब कहा कि मेले में उतनी दूकानें नहीं आयीं...दूकानदारों की व्यस्तताएं होती हैं, तो राजेश ने उन्हें टोकने  में तनिक देरी नहीं की| चलो अच्छा हुआ कि जौहर साहब ने  इस चूक को हंसी-मजाक कहकर टाल दिया|

साखी पर पहली बार किसी क्षेत्रीय भाषा में गजलें आयीं थीं| मैं भोजपुरी को भाषा इसलिए कह रहा हूँ कि वह भाषा होने की सारी जरूरतें पूरा करती है| भाषा केवल वही नहीं है, जिसके पास अपनी लिपि है| इस तर्क पर तो मराठी और नेपाली को भाषा कहना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि उनकी अपनी लिपि नहीं है, ये दोनों भाषाएँ देवनागरी लिपि का उपयोग करती हैं| भाषा होने के लिए सबसे आवश्यक शर्त है, उसके साहित्य की समृद्ध परंपरा और उसका अद्यतन प्रवाह| कभी ब्रज सबसे संपन्न भाषा हुआ करती थी, उसे अब भी साहित्य के इतिहास में भाखा कहा जाता है पर आज वह बोली है| वह निरंतरता ब्रज भाषा में कायम नहीं रह सकी| केवल भारत में ही नहीं कई देशों में भोजपुरी में साहित्य रचना हो रही है| यह अच्छी बात रही कि किसी हिन्दी वाले ने इसे बेगानी नहीं समझा, ऐसा नहीं लगा कि भोजपुरी किसी की समझ में न आयी  हो| शायर तिलकराज जी ने कहा, मैं भोजपुरी नहीं जानता लेकिन फिर भी कोई कठिनाई नहीं हुई, आखिर है तो हिन्‍दी ही। ग़ज़ल 2 में शेर 3 की पंक्ति 2 में 'बेहया' शब्‍द पर वज्‍़न की ऑंशिक समस्‍या लग रही है। इसी तरह ग़ज़ल 6 में शेर 7 की पंक्ति 2 में राज की जगह राज़ होना चाहिये, हो सकता है, यह टंकण त्रुटि रही हो। राज़ उर्दू से आया शब्‍द है इसलिये इसे यथावत लेना आवश्‍यक है। मनोज की ग़ज़लों में भाव और भाषा-प्रवाह स्‍पष्‍ट हैं और तेवर भी मुखर हैं।


जितेन्द्र जौहर ने बात आगे बढ़ायी|  'बेहया' शब्‍द पर वे तिलकराज जी से सहमत दिखे पर उनकी इस  बात से असहमत कि-- "ग़ज़ल 6 में शेर 7 की पंक्ति 2 में ’राज’ की जगह ’राज़’ होना चाहिये।" हिन्दी के ’राज’ और उर्दू के ’राज़’ में अर्थ का अंतर होने के बावजूद भी मैं कहना चाहूँगा कि भाषा सदैव संदर्भानुकूल अर्थ देती है। भोजपुरी में उर्दू से आयातित शब्दों पर नुक़्ता अपरिहार्य या आवश्यक नहीं है| ग़ौरतलब है कि मनोज भावुक ने ’राज़’ की जगह नुक़्ता-रहित ’राज’ का ही नहीं, प्रत्युत्‌ ’रोज’ , आखिर, खुशबू, इंतजार, जमीर, कसम, कैद, आजाद, वक्‍त, जमीन, कदम, गजल, जज्बात, दफ्न, यकीन आदि बहुत से उर्दू शब्दों का नुक़्ता-विहीन इस्तेमाल किया है। हाँ... कुछेक जगहों पर मनोज भाई ने नुक़्ता लगा दिया है। यहीं पर वे थोड़ी ग़लती कर गये। ‘भोजपुरी की आपन एक अलगै दुनिया बा|’ देखें.. ’ज़िन्दगी’ और ’हुज़ूर’ शब्दों के लिए भोजपुरी में क्रमशः ’जिनिगी’ और ’हजूर’ का प्रयोग| ’सिर्फ़’ के लिए ’सिरिफ’ का प्रयोग। ’दरिद्रता’ की जगह ’दलिद्दर’। कोई भी भाषा/ बोली उधार लिए गये शब्दों को अपने अनुकूल ढाल लेती है। उपर्युक्त शब्दावली भोजपुरी भाषा के अनुकूलन का ही परिणाम है।  'ग्रास' और ‘घास’, 'कैंडिल' और ‘कंदील’ तथा 'फिलासोफी ' और ‘फलसफा’ के रूपांतरण  से हम सभी परिचित हैं। हर भाषा में शब्द-संपदा के अनुकूलन की प्रक्रिया अनवरत्‌ चलती रहती है।  मनोज के  जो शे’र मेरे मन को गहरे तक छू सके, वे हैं:
1. भँवर में डूबियो के आदमी उबर जाला
मरे के बा तऽ ऊ दरिया किनारे मर जाला
2. बर्फ हs, भाप हs, पानी हs कि कुछुओ ना हs
जिन्दगी का हवे, ई राज बुझाते नइखे
३.जमीने प बा आदमी के वजूद
तबो मन परिन्दा उड़ावत रहल
4. रोशनी गाँव में, दिल्ली से ले आवल जाये
कैद सूरज के अब आजाद करावल जाये
इस शे’र का तो, भाई... कहना ही क्या ! कितनी सुन्दर बात कह गए आप !
5. बहुत बा लोग जे मरलो के बाद जीयत बा
बहुत बा लोग जे जियते में, यार, मर जाला

 
जौहर के स्पष्टीकरण के बाद तिलकराज जी ने कहा, मुझसे त्रुटि हुई 'राज' को भेद के रूप में पढ़ने की|  मैंने दूसरी पंक्ति का आशय यह लिया था कि 'जि़दगी क्‍या है, यह भेद समझ नहीं आता है'। जबकि अब इसका आशय मुझे समझ आया कि 'जिन्‍दगी क्‍या है; इस प्रश्‍न को ये शासन हल ही नहीं करता है'।  जौहर ने और स्पष्ट किया कि इस राज का मतलब रहस्य है, जिन्दगी क्या है, इसका रहस्य समझ में ही नहीं आता| 


शायर सर्वत जमाल साहब ने कहा कि मनोज 'भावुक' की  गज़लें, भोजपुरी में नि:संदेह एक नया फलक रचने की कोशिश कर रही हैं|. ताज़गी से भरी इन गज़लों में वो सब कुछ है, जिन्हें पढ़ने  की इच्छा एक पाठक को होती है| लेकिन अभी मनोज के लिए मेहनत ज़रूरी है| मनोज की गज़लों में कुछ शब्द खटकते हैं---आंगन, दरपन, मधुवन, सावन, खुश्बू, विश्वास, आदमी, रेत, बुनियाद, ज़मीर, श्रम, वजूद, परिन्दा, जज़बात---भोजपुरी  में इन शब्दों के साथ 'वा' का इस्तेमाल कर इनका भोजपुरीकरण कर लिया जाता है| गज़ल-3 मुझे माधव मधुकर की गज़ल के  भोजपुरी रूपांतरण जैसी  लगी| हो सकता है, मनोज को इसका इल्म न हो लेकिन वह एक मशहूर गज़ल है| फिर भी मैं यह कहने पर मजबूर हूं कि यह गज़लें भोजपुरी के लिए एक नई खिड़की  खोल रही हैं, जहां से हवा के ताज़ा झोंके आ रहे हैं| गज़ल को गज़ल के ही रूप में बांधे रखने की कला मनोज के पास है और शायद आने वाला वक़्त इन्हें भोजपुरी का 'दुष्यंत' के नाम से याद करे|


सलिल जी मैदान में आये| उन्होंने भाषा-बोली का सवाल उठाया| एक सामान्य प्रतिक्रिया सबसे पहले कि यह ग़ज़लें भोजपुरी की श्रेणी में रखी जाएँ कि नहीं? मैं जिस भाषा में लिखता हूँ, उसे कई लोग भोजपुरी या कुछ और कह देते हैं, जबकि मैंने स्वयं यह सफाई दी है कि यह कोई भाषा नहीं, बोली है| पूरी तरह हिंदी, सिर्फ बोलने के अंदाज़ में लिखी हुई| लिहाज़ा इसे बतियाना माना जाना चाहिए, लेखन नहीं|  यह ग़ज़लें अपनी तमाम ख़ूबसूरती के बावजूद यह एलान करती हैं कि यह हिंदी/उर्दू में सोची हुई ग़ज़लें हैं यानि मौलिक रूप से यह भोजपुरी की गज़लें नहीं हैं| इसका प्रमाण इस बात से भी मिलता है कि सारी गज़लों में उर्दू के कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग है, जो भोजपुरी का अंग नहीं हैं| अमीर खुसरो की कुछ गज़लें फ़ारसी और हिंदवी का अद्भुत मेल प्रस्तुत करती हैं, जहाँ मिसराएऊला फ़ारसी में और सानी हिंदवी में कहा गया है| आप फ़ारसी का मतलब तो समझ सकते हैं  मगर उसी बहर में उसे ग़ज़ल में तर्जुमा करके नहीं पिरो सकते, क्योंकि शेर का वज़न उसी ज़ुबान में आता है, जिसमें वह कही गई हो और बहर भी वैसे ही सम्भाली जा सकती है| एक शेर के माध्यम से अपनी बात स्पष्ट करने की कोशिश करता हूँ. मनोज जी ने कहाः
बचपन के हमरा याद के दरपन कहाँ गइल
माई रे, अपना घर के ऊ आँगन कहाँ गइल.

और यह देखिएः
बचपन की मेरी याद का दर्पन कहाँ गया,
माई री, अपने घर का वो आँगन कहाँ गया.

किसी भी शेर को आप उठा कर देखिए, उसे आप बहुत आसानी से बिना मेहनत हिंदुस्तानी ज़ुबान में लिखते चले जाएँगे| यही बात ख़ुद उनकी दूसरी ग़ज़ल के मतले से साबित होती है| ज़रा ग़ौर करें...
भँवर में डूबियो के आदमी उबर जाला
मरे के बा तऽ ऊ दरिया किनारे मर जाला.

ग़ज़ल को बहर में रखने के लिए मनोज जी ने इसमें “भँवर में डूबियो” लिखा है, जबकि भोजपुरी में यही शब्द “डुबियो” हो जाता है| अगर इसे भोजपुरी  में लिखा जाता तो शेर की बहर छोटी हो जाती लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाए, क्योंकि उनकी सोच मूलतः हिंदी में थी| वैसे शायर ये ईमानदार हैं, मैं होता तो इस तरह बेईमानी कर जाताः
भँवर में डुबियो के अदमी कबो उबर जाला
मरे के बा तऽ ऊ दरिया किनारे मर जाला.

यहाँ “आदमी” को भोजपुरी के प्रचलित शब्द “अदमी” से बदल दिया है जो किसी भी पुरबिया व्यक्ति को आपत्तिजनक नहीं लगता और बहर के कारण कबो शब्द जोड़ना पड़ा| इन सबके बावजूद, मनोज जी की ग़ज़लें, एक युवा गज़लगो की क्षमता को स्थापित करती हैं | जितनी आसानी से इन्होंने इतने गहरे भाव बयान किए हैं, उनकी अद्भुत प्रतिभा का लोहा मनवाने को काफी है|  वे समस्त सम्मान, जो आपको मिले हैं, वह आपकी योग्यता का प्रमाण हैं और आपकी ग़ज़लें उसकी परिचायक हैं|


कवि संजीव गौतम ने कहा, मनोज जी की ग़ज़लें साखी पर प्रकाशित होना गर्व की बात है। सर्वत जी ने उनके लिए भोजपुरी का दुष्यन्त की संज्ञा दी है तो कुछ सोचकर ही दी है। ये ग़ज़लें एक सच्चे कवि की ग़ज़लें हैं। कुछ व्याकरणिक त्रुटियों की ओर भी विद्वानों ने इशारा किया है, लेकिन वो सब बेमानी है, क्योंकि ये ग़ज़लें इसका मौका नहीं देतीं। मैं तो सबसे पहले ग़ज़ल पढ़ते ही यह सोचने लगता हूं कि शायर ने इसे सोचा कहां से है। क्या किसी और का पढ़कर या वह जिन्दगी की पहेलियो को खुद सुलझाता है। अगर पहले वाली स्थिति पाता हूं तो उसकी कहन पर ध्यान जाता है कि उसने पहले ही हजार बार कही बात को कैसे कहा है। यदि दूसरी स्थिति पाता हूं तो सिर्फ वाह ही निकलती है और उसका मुरीद हो जाता हूं। मनोज जी ऐसे ही रचनाकार हैं जो अपनी नजर से इस दुनिया को देखते हैं। उनके ये अशआर इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं-

भँवर में डूबियो के आदमी उबर जाला
मरे के बा तऽ ऊ दरिया किनारे मर जाला
बहुत बा लोग जे मरलो के बाद जीयत बा
बहुत बा लोग जे जियते में, यार, मर जाला
बर्फ हs, भाप हs, पानी हs कि कुछुओ ना हs
जिन्दगी का हवे, ई राज बुझाते नइखे

ये ग़ज़लें उर्दू और हिन्दी के झगड़े का भी काफी हद तक उत्तर देती हैं| ये उर्दू की ग़ज़लें तो हैं नहीं, इसका अर्थ है कि फारसी और उर्दू के अतिरिक्त किसी और भाषा में भी ग़ज़लें सफलतापूर्वक कही जा सकती हैं। एक बड़ी मजेदार बात ध्यान में आ रही है कि ये सारी प्रतिभाएं नोएडा में क्यों एकत्रित होती जा रही हैं। अब देखिए न- अशोक रावत जी, सलिल वर्मा जी, आलोक श्रीवास्तव और अब मनोज जी। जिसे देखो वही नोएडा में निकलता है। क्या इसमें कुछ रहस्य है।  

संजीव की इस मधुर छेड़खानी से सलिल जी चुप नहीं रह सके, एक भूल सुधार की अनुमति चाहता हूँ... इस अनपढ़ का नाम (अभी अभी यह ख़िताब मिला है मुझे, या कहिए किसी ने पहली बार सही पहचाना है, इस बिहारी को) आपने प्रतिभावान लोगों में शामिल कर बड़ी भूल की है| अभी तक मुस्कुरा रहा हूँ आपकी इस टिप्पणी पर| जितेन्द्र जौहर भी लपके, .सलिल वर्मा जी (उर्फ़ ‘चला बिहारी...’), आप जैसे संतुलित/संयमित वाणी वाले व्यक्ति को किस ‘पढ़े-लिखे’ ने ‘अनपढ़’ कहा...हुज़ूर! मेरी राय में, यदि आप अनपढ़ हैं...तो फिर ‘पढ़ा-लिखा’ कौन है ? माहौल में चुहल की मिश्री घुली तो तिलकराज जी कैसे अपने को रोक पाते,  हुजूर 'नैन लड़ जइहैं तो मनवा मा कसक हुइवै करी' के ज़माने से हिन्‍दी के अन्‍य रूप सुनते आ रहें, अइसन बुडबक  न जानिये। इस तरह की गंभीर चर्चाओं में थोड़ी बहुत चुहल चलती रहनी चाहिये। वे बोले, भाषा का अपना व्‍याकरण और लिपि होना आवश्‍यक है जबकि बोली इनसे स्‍वतंत्र है|  पंजाबी मूल का होते हुए भी मेरे लिये पंजाबी और भोजपुरी एकसी हैं। दोनों में अर्थ समझ में आ जाता है, बोलते नहीं बनतीं। मनोज ने ऐसी रचनायें दी हैं कि कहने को कुछ छोड़ा ही नहीं, अब भाई कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा न, वरना ब्‍लॉग पर टिप्‍पणी-मेला कैसा लगेगा। लिव लाईफ़ किंग साईज़- जीवन के हर पल का आनंद लें।बस यहीं जौहर ने एक बखेड़ा खड़ा किया, हालाँकि बाद में उन्होंने अपनी गलती क़ुबूल की| उन्होंने कहा,  इस बार मेले में उतनी ‘दुकानें’ नहीं आयीं, जितनी कि आती रही हैं। ख़ैर...कभी-कभी ‘दुकानदारों’ की कुछ अन्य व्यस्तताएँ भी हो जाती हैं, संतुलन तो बनाना ही पड़ता है। राजेश उत्साही भाषा के संयम के प्रबल पक्षधर हैं, उन्होंने टोका, माफ करें जितेन्‍द्र जी, यहां जो लोग विमर्श कर रहे हैं वे 'दुकानदार' नहीं हैं। दुकानदार शब्‍द इस्‍तेमाल करके आप औरों के साथ-साथ अपना भी अपमान कर रहे हैं। आप जानते हैं दुकान में सामान बेचा जाता है। यहां कोई अपनी टिप्‍पणी बेचने नहीं आता है। तिलक जी ने मेले की बात की है। वह एक उत्‍सव की बात है। उसे आपको उसी संदर्भ में समझना चाहिए। जितेन्द्र ने गलती मानी, मैंने जानबूझकर हँसी-मज़ाक की मनःस्थिति में ‘दुकान/ दुकानदार’ शब्दों का प्रयोग किया है। आपकी बात पूरी तरह सही है। चूँकि डॉ.कपूर साहब मज़ाक में आ गये थे, सो मेरा भी मूड कर बन गया| उत्साही ने सचेत किया, कृपया साखी के इस मंच को मजाक और चुहल का मंच न बनाएं तो बेहतर होगा। यह एक सामूहिक विमर्श का मंच है। उन्होंने भाषा और बोली पर भी अपना मंतव्य  साफ़ किया, अब यह मान्यता पुरानी पड़ चुकी है कि भाषा और बोली अलग-अलग होती है या कि भाषा का व्या‍करण होता है और बोली का नहीं होता। मसला केवल लिपि का है। जिसकी लिपि है, उसे आप भाषा कहने लगते हैं। 

राजेश जी ने गजलों पर अपनी बात रखी, इसमें कोई शक नहीं है कि मनोज की ग़ज़लें उनके नाम के अनुरूप पढ़ने वाले को भावुक कर देती हैं पर मनोज मुझे दुविधाग्रस्त लगते हैं।  उनकी पहली ग़ज़ल केवल सवाल पूछती है, वह कोई उत्तर नहीं देती और न ही उत्तंर खोजने के लिए उकसाती है। दूसरी गजल में वे विरोधाभासी बातें कहते हैं। पहले यह शेर देखिए-
पता ई बा कि महल ना टिके कबो अइसन
तबो त रेत प बुनियाद लोग धर जाला और अब इसे पढ़ें- अगर जो दिल में लगन, चाह आ भरोसा बा
कसम से चाँद भी अँगना में तब उतर जाला
तीसरी ग़ज़ल में भी यही समस्या लगती है। पहले चार शेरों से बात जिस सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ती है, वह अचानक ही पांचवे शेर में आकर बिखर जाती है। शायर गहरे अवसाद में भर जाता है। और फिर छठें  शेर में वह अचानक अपने पुराने रूप में लौट आता है।चौथी ग़ज़ल में ऐसा लगता है कि मनोज अपने को दुहरा रहे हैं। पांचवी ग़ज़ल में वे जिंदगी के फलसफे की बात करते नजर आए लेकिन छठवीं गजल फिर एक बार निराशा में ले गई। तिलकराज जी ने राजेश को स्पष्ट करने के कोशिश की, ग़ज़ल में हर शेर का स्‍वतंत्र अस्‍तित्‍व होता है, एक पूर्ण कविता की तरह लेकिन हिन्‍दी काव्‍य प्रस्‍तुति में विषय निरंतरता की प्रथा के कारण ग़ज़ल में दृष्टिकोण बदलने की आवश्‍यकता पर ध्‍यान नहीं जाता है। यह स्थिति ग़ज़ल कहने वाले के लिये भी होती है| ग़ज़ल की मूल प्रकृति के अनुसार मनोज भाई ने अगर एक ही ग़ज़ल के अलग-अलग अशआर में विरोधाभासी बातें कही भी हैं तो वह अनुमन्य  है। पर तुरंत ही उन्होंने अपने विचार संशोधित किये, किसी भी रचनाधर्मी की रचनाओं में उसकी सोच स्‍पष्‍टत: दिखनी चाहिये। यहॉं सोच की मौलिकता का भी प्रश्‍न है, मौलिक सोच की दिशा एक सी ही रहेगी, अलग-अलग सोच दिखने से आभासित होता है कि बहुत सी जगह से पढ़ा हुआ मसाला रचनाधर्मी ने अपने शब्‍दों में प्रस्‍तुत कर दिया है। बाद में जितेन्द्र जौहर ने गजल के शेरों में अलग-अलग भाव पूर्णता के साथ प्रकट होने की सार्थकता को विस्तार से समझाया। 
 सलिल जी की पीड़ा फिर उभरी, हम बिहारी तो वैसे भी मूढ़ता के पर्याय माने जाते रहे हैं,  इसलिए मुझे अगर किसी ने मूढ़ कह दिया होता तो मुझे न ऐतराज़ होता, न ताज्जुब. लेकिन मेरे लपेटे में इब्ने इंशाँ जैसे अज़ीम शायर को कमअक़्ल कह दिया जाना नाक़ाबिले-बर्दाश्त है| अफ़सोस रहा कि मेरी वज़ह से उस महान शायर की तौहीन हुई| राजेश ने स्पष्ट किया, सलिल भाई की टिप्‍पणी को समझने के लिए आपको मेरे ब्‍लाग गुलमोहर पर आना पडे़गा। गुलमोहर पर जाकर आप भी चर्चा की लिंग-चर्चा का आनंद उठा सकते हैं| यह पुल्लिंग है या स्त्रीलिंग? भाई यह उभयलिंग है| उर्दू में पुल्लिंग और हिन्दी में स्त्रीलिंग| सलिल जी कौन कहता है कि आप मूढ़ हैं या बिहारी मूढ़ होते हैं? बुद्धि तो बिहार के दामन में ही कैद है भाई मेरे| जितेन्द्र की बात सुनें, राजकुमार सिद्धार्थ ने ’मूढ़ता’ की उसी धरती पर ’बोध’ पाया था| इसी धरती का  ’नालंदा विश्वविद्यालय’ दुनिया को रोशनी बाँटता था। सलिल द्रवित हो गये, भावुक हूँ इसलिए संयम न रख पाया, व्यथित था इसलिए असंदर्भ लिख गया| मनोज भावुक जी से क्षमा प्रार्थी हूँ कि मेरी बातों से दिशा भटक गई| 
 
जाने-माने शायर प्राण शर्मा जी और डा त्रिमोहन तरल भी आये| प्राण जी ने सारी गजलें पढ़ी   और जितेन्द्र जौहर की समीक्षा की तारीफ़ की| अच्छी और मर्मस्पर्शी गजलों के लिए उन्होंने मनोज भावुक को बधाई दी| साथ ही साथ यह भी कहा कि गजल का हर एक शेर स्वतंत्र होता है| गजल में एक शेर विरह पर भी कहा जा सकता है और दूसरा शेर संयोग पर भी| विभिन्न भावों से पिरोई होती है गजल की मालातरल जी ने कहा, किसी बागीचे की बगल से गुज़रते हुए कोई खुशगवार गंध नासिका-द्वार से होती हुई जब मन के भीतर अपना स्थान बना लेती है तो मन का स्वामी ये नहीं पूछता कि जिन फूलों से ये गंध आ रही है, उनका नाम क्या है। युवा रचनाकार मनोज भावुक की गज़लें गज़लियत की कसौटी पर कितनी खरी उतरतीं हैं, यह तो ग़ज़ल के तमाम बड़े उस्ताद ही जानें, लेकिन इतना कहना चाहता हूँ की मैंने भोजपुरी में गज़लें पहली बार पढ़ीं हैं और कई दूसरे लोगों की तरह ही मैं भी भोजपुरी नहीं जानता। बावजूद इसके इन्हें पढ़कर  तबियत प्रसन्न हो गयी। 
अबकी दियरी के परब अइसे मनावल जाए
मन के आँगन में एगो दीप जरावल जाए
रौशनी गाँव में, दिल्ली से ले आवल जाए
कैद सूरज के अब आजाद करावल जाए
हिन्दू, मुस्लिम ना, ईसाई ना, सिक्ख ई भाई
अपना औलाद के इन्सान बनावल जाए
ऐसे अशआर किसी भी भाषा में लिखे हुए हो सकते हैं। फर्क इससे नहीं पड़ता। फर्क इससे पड़ता है कि वे सीधे दिल में उतर रहे है या नहीं। मनोज भाई के शेर सीधे दिल में उतरकर अपनी गुणवत्ता सिद्ध कर रहे हैं।
कवि सुरेश यादव ने कहा कि मनोज भावुक की गज़लें पहली बार पढ़ने का अवसर मिला| भोजपुरी मुझे नहीं आती लेकिन इन ग़ज़लों का भावनात्मक बहाव ऐसा कि भाषा की दीवार महसूस ही नहीं होती है| संवेदना की दृष्टि से इन ग़ज़लों में आधुनिकता की आवाज़ है और मानवता की धड़कन है जो माटी की सोंधी गंध लिए है| बहस में शिरकत करके उत्साह बढ़ाने वालों में अरविन्द मिश्र, वेद व्यथित, दिगम्बर नासवा, स्वप्निल कुमार आतिश, राजेन्द्र स्वर्णकार और अविनाश वाचस्पति महत्वपूर्ण रहे। 
मनोज भावुक ने विनम्रतापूर्वक सभी सवालों के जवाब दिए|  भावुक ने कहा, बड़े भाई डा. सुभाष राय ने मुझे अपने दिल में और साखी पर जगह दी, मै उनका शुक्रगुजार हूँ|. साखी पर आना गर्व की बात है| मनोज ने साफ किया कि  'बेहया' शब्‍द में दरअसल टंकण त्रुटि है| भोजपुरी में यह शब्द ' बेहाया' होता है| शेर कुछ यूं है -
जमीर चीख के सौ बार रोके-टोकेला
तबो त मन ई बेहाया गुनाह कर जाला  भोजपुरी में हम नुक्ता  नहीं लगाते, इसलिए यह राज ही है, जिसका अर्थ है रहस्य| मेरी गजलों में जहाँ कहीं भी नुक़्ता लगा है, वह टंकण त्रुटि है| ऐसा किसने कहा कि 'वा' का इस्तेमाल कर के इनका भोजपुरीकरण कर लिया जाता है? जब हम भोजपुरी नाटक में किसी अनपढ़ आदमी के लिए संवाद लिखते हैं तो ऎसी भाषा का प्रयोग करते हैं | गजल और गीतों की भाषा अलग होती है| गजल में हम आदमी को अदमी और प्रेम को परेम नहीं लिखते| माधव मधुकर जी की वह गजल मै पढ़ना चाहूंगा| कृपया उस गजल को साखी पर प्रकाशित करें| सर्वत जी ने मुझे भोजपुरी का 'दुष्यंत' सम्बोधित किया है, शुक्रिया, भगवान करें ऐसा हो| सलिल जी  ये भोजपुरी गजलें हीं है|  मै भोजपुरी में ही सोचता हूँ| भोजपुरी मेरी मातृभाषा है | उर्दू या अंग्रेजी के कुछ शब्द आ जाने से ये गजलें उस भाषा की नहीं हो जातीं| मेरा मानना है भाषा की समृद्धि  के लिए रचनाओं में अन्य भाषाओं के उन शब्दों का प्रयोग होना चाहिए, जो भोजपुरी में रच-बस गये हैं| डूबियो शब्द सही है और भोजपुरी में डूबियो हीं लिखा जाता है| हम आदमी को आदमी हीं लिखते हैं अदमी नहीं| मै फिर कह रहा हूँ कि मै अभी गजल का विद्यार्थी हूँ| आप सबने जो रास्ता दिखाया है, उस पर चलने की कोशिश करूंगा| जो त्रुटियाँ रह गयीं हैं,उनको ठीक करूंगा| एक भोजपुरी गजल-संग्रह प्रकाशित है ' तस्वीर जिन्दगी के' उसका लिंक दे रहा हूँ, ताकि आप भोजपुरी गजलों का आस्वादन कर  सकें...
http://www.manojbhawuk.com/old/jindgi6.htm            
शनिवार को नीरज गोस्वामी की गजलें -------------------------------------------

शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

मनोज भावुक की गजलें

मनोज भावुक को साखी पर प्रस्तुत करते हुए मुझे इसलिये प्रसन्नता हो रही है कि वे उम्र में छोटे होते हुए भी अपनी रचनाधर्मिता में अनुभवसम्पन्न और पके हुए दिखते हैं। साखी के पाठकों और रचनाधर्मी सहयोगियों के लिये यह एक नया अनुभव होगा क्योंकि इस कवि के जरिये मैं पहली बार हिंदी के  ही एक सशक्त और सम्पन्न भाषा रूप भोजपुरी में कही जा रही गजलें पेश करने जा रहा हूं।  2 जनवरी 1976 को सीवान (बिहार) में जन्मे और रेणुकूट (उत्तर प्रदेश ) में पले- बढ़े मनोज भावुक भोजपुरी के प्रसिद्ध युवा साहित्यकार हैं। पिछले 15 सालों से देश और देश के बाहर (अफ्रीका और यूके में) भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भावुक भोजपुरी सिनेमा, नाटक आदि के इतिहास पर किये गये अपने समग्र शोध के लिए भी पहचाने जाते हैं। अभिनय, एंकरिंग एवं पटकथा लेखन आदि विधाओं में गहरी रुचि रखने वाले मनोज दुनिया भर के भोजपुरी भाषा को समर्पित संस्थाओं के संस्थापक, सलाहकार और सदस्य हैं। तस्वीर जिंदगी के( ग़ज़ल-संग्रह) एवं चलनी में पानी ( गीत- संग्रह) मनोज की चर्चित पुस्तकें हैं। ‘तस्वीर जिन्दगी के’ तो इतनी  लोकप्रिय हुई कि इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित किया जा चुका है और इस पुस्तक को वर्ष 2006 के भारतीय भाषा परिषद सम्मान से नवाज़ा जा चुका है। एक भोजपुरी पुस्तक को पहली बार यह सम्मान दिया गया है। इसी २६-२७ सितम्बर को विरसामुंडा की पावन भूमि रांची में आयोजित सम्मेलन  में उन्हें सर्वसम्मति से विश्व भोजपुरी सम्मेलन की दिल्ली इकाई का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। वे भोजपुरी सम्मलेन की ग्रेट ब्रिटेन इकाई के अध्यक्ष रह चुके हैं। इस समय वे हमार टीवी नोयडा में क्रियेटिव हेड के पद पर काम कर रहे हैं।

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साखी परिवार को प्रसन्नता है कि गत दिनों मनोज भावुक को लखनऊ स्थित भाऊराव देवरस सेवा न्यास ने भोजपुरी भाषा में उल्लेखनीय योगदान के लिए पंडित प्रताप नारायण मिश्र स्मृति-युवा साहित्यकार सम्मान से नवाजा है। पहली बार किसी भोजपुरी साहित्यकार को यह सम्मान मिला है। भावुक को सम्मान स्वरूप पांच हजार रुपये, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह, माँ सरस्वती की प्रतिमा, अंगवस्त्रम एवं न्यास द्वारा प्रकाशित पुस्तकों का सेट भेंट किया गया।
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यहां प्रस्तुत हैं मनोज भावुक की कुछ भोजपुरी गजलें...
                                                        

                             1.
बचपन के हमरा याद के दरपन कहाँ गइल
माई रे, अपना घर के ऊ आँगन कहाँ गइल

खुशबू भरल सनेह के उपवन कहाँ गइल
भउजी हो, तहरा गाँव के मधुवन कहाँ गइल

खुलके मिले-जुले के लकम अब त ना रहल
विश्वास, नेह, प्रेम-भरल मन कहाँ गइल

हर बात पर जे रोज कहे दोस्त हम हईं
हमके डुबाके आज ऊ आपन कहाँ गइल


बरिसत रहे जे आँख से हमरा बदे कबो
आखिर ऊ इन्तजार के सावन कहाँ गइल


                             2.
 
भँवर में डूबियो के आदमी उबर जाला
मरे के बा तऽ ऊ दरिया किनारे मर जाला

पता ई बा कि महल ना टिके कबो अइसन
तबो त रेत प बुनियाद लोग धर जाला

जमीर चीख के सौ बार रोके-टोकेला
तबो त मन ई बेहया गुनाह कर जाला

बहुत बा लोग जे मरलो के बाद जीयत बा
बहुत बा लोग जे जियते में, यार, मर जाला

अगर जो दिल में लगन, चाह आ भरोसा बा
कसम से चाँद भी अँगना में तब उतर जाला


                                 3.
अबकी दियरी के परब अइसे मनावल जाये
मन के अँगना में एगो दीप जरावल जाये

रोशनी गाँव में, दिल्ली से ले आवल जाये
कैद सूरज के अब आजाद करावल जाये

हिन्दू, मुसलिम ना, ईसाई ना, सिक्ख ए भाई
अपना औलाद के इन्सान बनावल जाये

जेमें भगवान, खुदा, गॉड सभे साथ रहे
एह तरह के एगो देवास बनावल जाये

रोज दियरी बा कहीं, रोज कहीं भूखमरी
काश! दुनिया से विषमता के मिटावल जाये


सूप, चलनी के पटकला से भला का होई
श्रम के लाठी से दलिद्दर के भगावल जाये

लाख रस्ता हो कठिन, लाख दूर मंजिल हो
आस के फूल ही आँखिन में उगावल जाये


आम मउरल बा, जिया गंध से पागल बाटे
ए सखी, ए सखी 'भावुक' के बोलावल जाये




अनिमेष विश्वास की रचना 
                       4.

बहुत नाच जिनिगी नचावत रहल
हँसावत, खेलावत, रोआवत रहल

कहाँ खो गइल अब ऊ धुन प्यार के
जे हमरा के पागल बनावत रहल

बुरा वक्त में ऊ बदलिये गइल
जे हमरा के आपन बतावत रहल

बन्हाइल कहाँ ऊ कबो छंद में
जे हमरा के हरदम लुभावत रहल

उहो आज खोजत बा रस्ता, हजूर
जे सभका के रस्ता देखावत रहल

जमीने प बा आदमी के वजूद
तबो मन परिन्दा उड़ावत रहल

कबो आज ले ना रुकल ई कदम
भले मोड़ पर मोड़ आवत रहल

लिखे में बहुत प्राण तड़पल तबो
गजल-गीत 'भावुक' सुनावत रहल

                               5.
हियरा में फूल बन के खिले कौनो-कौनो बात
हियरा में शूल बन के हले कौनो-कौनो बात

जज्बात पर यकीन कइल भी बा अब गुनाह
दिल में उतर के दिल के छले कौनो-कौनो बात

अचके में पैर राख में पड़ते पता चलल
बरिसन ले आग बन के जले कौनो-कौनो बात

रख देला मन के मोड़ के, जिनिगी सँवार के
तत्काल दिल में लागे भले कौनो-कौनो बात

अनुभव नया-नया मिले 'भावुक' हो रोज़-रोज़
पर गीत आ गजल में ढ़ले कौनो-कौनो बात

6.

बात पर बात होता बात ओराते नइखे

कवनो दिक्कत के समाधान भेंटाते नइखे
 
भोर के आस में जे बूढ़ भइल, सोचत बा
मर गइल का बा सुरुज रात ई जाते नइखे

 
लोग सिखले बा बजावे के सिरिफ ताली का
सामने जुल्म के अब मुठ्ठी बन्हाते नइखे

 
कान में खोंट भरल बा तबे तs केहू के
कवनो अलचार के आवाज़ सुनाते नइखे

 
ओद काठी बा, हवा तेज बा,किस्मत देखीं
तेल भरले बा, दिया-बाती बराते नइखे

 
मन के धृतराष्ट्र के आँखिन से सभे देखत बा
भीम असली ह कि लोहा के, चिन्हाते नइखे

 
बर्फ हs, भाप हs, पानी हs कि कुछुओ ना हs
जिन्दगी का हवे, ई राज बुझाते नइखे

 
दफ्न बा दिल में तजुर्बा त बहुत, ए ‘भावुक’
छंद के बंध में सब काहें समाते नइखे



 


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