अभियान के साथी

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

अरुणा राय की कविताएं

 अरुणा राय का नाम कविता के उन नये सशक्त हस्ताक्षरों में शामिल किया जा सकता है, जो अपनी रचनाओं से लगातार सबका ध्यान आकृष्ट कर रहे हैं। वे इलाहाबाद में जन्मीं, वहीं से स्नातक पूरा किया। पठन-पाठन और अपने मन के गहन कोने से उभरती आवाजों को शब्द देना उनकी अभिरुचियों में शामिल है। पत्र-पत्रिकाओं और वेब पत्रिकाओ में निरंतर उनकी उपस्थिति देखी जा सकती है। प्रथम काव्य संग्रह प्रकाशनाधीन है। सम्प्रति शासकीय सेवा में कार्यरत हैं । अरुणा राय की कुछ रचनायें प्रस्तुत हैं......
1. 
हाँ जी, इन दिनों हम
प्यार
में हैं 
अब यह मत पूछिएगा कि
किसके
हवाओं के, चांदनी के या
रेत के
बस प्यार है और हम
लिखते चल
रहे हैं कोई नाम
जहाँ-तहाँ और उसके आजू
बाजू
लिख दे रहे हैं पवित्र
मासूम निर्दोष
और यह सोचते हैं कि ये
उसे ज़ाहिर कर देंगे या
ढंक लेंगे


आजकल कभी भी खटखटा देते
हैं
एक दूसरे का हृदय
और हड़बड़ाए से कह
बैठते हैं
लगता है बेवक़्त आ गए
और ऐसा कहते हुए समाते
चले
जाते हैं
एक दूसरे के भीतर


फिर अचानक ख़ुद को
समेटते
चल देते हैं झटके से
कि फिर बात करते हैं
कि एक पूछता है
अरे, आपका कुछ छूटा जा
रहा है यहाँ
कोई दिल-विल-सा तो
नहीं


नहीं वह आपका ही है
मेरे तो किसी काम का
नहीं


ऐसा कहता मन मसोसता
झटके से छुपा लेता है
उसे मन


कभी यूँ ही बज उठता है
मोबाइल
पता चलता है ग़लती से दब
गया
था नंबर
कि घंटी बजती है दिमाग
की
वह लगता है चीख़ने
संभलो दिल दिल दिल
कि हत्था मार बंद करता
उसका हंगामा...




2. 
कैसी हैं आप
फोन पर
पूछता है कोई


क्‍या ...
हकलाती हूं मैं ...
ठीक हूं
ठीक तो हूं...


आप ठीक हैं ना ...
मैं कुछ कहता
कि ...
शिराओं का रक्‍त
उलीचने लगा
नमक और जल


आंसुओं की बाढ़  ने
हुमककर कहा
हां ... हां...
ठीक हूं बिल्‍कुल...


उसने कहा ...


कुछ सुनाई नहीं दे रहा
साफ


ओह ... हां ...
आंसू तो आंखों की भाषा है
आंखवालों के लिए है
कानों के लिए तो
सस्‍वर पाठ करना होगा
आंसुओं का ....


3. 
कुछ बूंदें टपका...
हल्की हो गई...
कि
कुछ हुआ ही ना हो...
फिर कुछ सुना...
फिर याद किया किसी को...
पर नहीं आए आँसू
फिर
गुज़र गई रात भी
गहरी नींद थी
स्वप्नहीन
सुबह जगी
तरोताज़ा
क़िताबें पढ़ीं.............
नहीं
अब यादें शेष नहीं
वाह - जादू हो गया आज
मुक्त हो गई वह तो...........


फिर बैठ गई कुर्सी पर
तभी दूर आकाश में
यूकेलिप्टस हिले
कि जाने कहाँ से फिर
छाने लगी धुंध
और छाती चली गई... 


सम्पर्क - ई-मेल-arunarai2010@gmail.com
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बुधवार, 28 जुलाई 2010

आदमीयत अब है कहां

राजेश उत्साही की कविताओं पर जिस तरह की बातचीत हुई, वह साखी के उद्देश्यों को सार्थकता की दिशा में ले जाने के पाठकीय संकल्प को उजागर करने  के लिये काफी है। जिन रचनाधर्मियों, चिन्तकों और सजग पाठकों ने बहस में हिस्सा लिया, उनका आभार। प्रवासी गजलकार प्राण शर्मा ने कहा कि राजेश जी की कविताएं जादू करती हुई न केवल सर पर चढ़कर बोलती हैं बल्कि दिल में उतर जाती हैं। अधिकांश लोगों ने इन कविताओं में  समय की गूंज देखी। नीरज गोस्वामी जी, संजीव गौतम जी और बिहारी बाबू यानि सलिल जी की प्रतिक्रियाओं को एक साथ देखूं तो इन रचनाओं के बारे में एक प्रतिनिधि राय उभर कर सामने आती है। बकौल नीरज राजेश जी की रचनायें कहन में जितनी सरल हैं, उतनी ही मारक हैं...शब्द शब्द चोट करती हुई। आज की त्रासदियों और गिरते मूल्यों को बहुत बेबाकी से प्रदर्शित करती हैं। संजीव के मुताबिक ये कविताएं इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि राजेश जी तक पहुंचने के रास्ते बहुत सीधे-साधे हैं। कहीं कोई घुमाव या चक्करदार रास्ता नहीं। पहली पंक्ति पढ़िये और कवि से सीधे जुड़ जाइए। बड़ी बात भी सीधे-सादे शब्दों में कही जा सकती है, इस धारणा को इन पंक्तियों से बल मिलता है-पानी/ उतर गया है/ जमीन में नीचे/ बहुत नीचे/इतना जितना कि/आदमी अपनी आदमीयत से। क्या कविता की समीक्षा का एक पक्ष यह नहीं होना चाहिए कि उन कविताओं ने सबसे पहले अपने कवि का कितना निर्माण किया है- आश्चर्य/ कि मेरे शब्दकोश में/ दोस्त का अर्थ/  अब तक वही है। इनसे स्पष्ट है कि कविताएं अपने उद्देश्य में सफल हैं। बिहारी ब्लागर यानि खड्ग़ सिंह ने कहा, पहली अच्छी है, दूसरी उससे अच्छी और अगली और अच्छी।... अंत तक आते आते लगा कि हम नशा का सागर में डूब गए हैं... चाहे ऊ मर गया पानी हो या शिनाख्त के लिए आवारा दौड़।


मशहूर शायर सर्वत जमाल ने कहा कि इन कविताओं की ख़ास विशेषता यह है कि  कम शब्दों में बहुत कुछ कह जाती हैं। दिगम्बर नासवा क़े अनुसार राजेश जी की कविताएँ आज के समाज पर,  सामाजिक मान्यताओं पर करारी चोट करती हैं । कल रात ...नामक रचना में आज के माहौल का जीता जागता चित्रण है। अनामिका जी को ये पंक्तियां बहुत पसंद आई ..पानी उतर गया है.. इतना जितना कि आदमी अपनी आदमीयत से। सच में ये कवितायें आज के यथार्थ से परिचय करवा गयी। कविता रावत ने कहा कि इंसान अपनी भलमानुसता के लिए ही जाने जाते है,  फितरत बदलना मतलबी इंसानों को ही भाता है। समय के साथ अर्थ बदलते देर कहाँ लगती। उन्होंने इन कविताओं में संवेदनहीन होते और जीवन मूल्य खोते इंसान की आज की स्थिति की  यथार्थ प्रस्तुति देखी और कहा कि उत्साही जी ने इन कविताओं के माध्यम से समाज में व्याप्त अमानवीयता और इंसान के दर्द को बखूबी प्रस्तुत किया है। जाने माने लेखक समीर लाल जी ने कहा कि अंतिम रचना अद्भुत लगी, इसने झकझोर कर रख दिया। मशहूर व्यंग्यकार अविनाश वाचस्पति को शिनाख्ती कविता बहुत पुख्ता लगी। उन्होंने कहा, शब्दकोश रचने के लिए जीना पड़ता है। शब्दों का पानी घूंट घूंट भरकर पीना पड़ता है। पर जहां चुल्लू भर पानी नहीं मिलता मरने के लिए, हवा लेकर ही जीना पड़ता है। हवा जो दूषित हो गई है। मानसिकता मनुष्य की सूअर हो गई है। और कहें क्या,कहे बिन रहें क्या, समझ लें खुद ही। जीवन की गति का अहसास कराती कविताएं। उत्साह से लबरेज करती चलती हैं। एक एक शब्द में नए अर्थ भर देती हैं। विनोद कुमार पांडेय ने कहा कि सरल शब्दों में मानवीय भावनाओं का यह विश्लेषण कमाल का है।


रश्मिप्रभा का कहना है कि  हर रचना जीवन के रास्ते दिखाती हुई बहुत प्रभावशाली है। सतीश सक्सेना को रचनाएँ तो पसंद आयीं पर उनका  सुझाव है कि एक बार में किसी कवि की एक ही रचना हो तो बेहतर रहेगा। वंदना ने भी सतीश का समर्थन किया। साथ में यह भी जोड़ा कि रचनाएं अच्छी हैं और जीवन के दर्शन से रूबरू कराती हैं। सुनील गज्जाणी का कहना था कि ये कविताएँ दिल को छू लेती हैं। पानी की बात करें तो आज आदमी अपनी पहचान खोता जा रहा है। राम त्यागी ने इन्हें उम्दा बताया। शोभना चौरे ने इन्हें  मानवता का सही चित्रण करती सशक्त कवितायें कहा। उनका सोचना है कि आदमी के बदलते चरित्र का सही चित्रण किया गया है। राजनीति कण कण में समा गई है और विलोम अर्थ ही शेष रह गये हैं। जाकिर अली रजनीश, मुकेश कुमार सिन्हा, पारुल, शिखा वार्ष्णेय, संध्या गुप्ता, आभा, अविनाश चंद्रा, विवेक जैन और बेचैन आत्मा ने भी कविताओं की सराहना की। बेचैन आत्मा ने कहा कि सभी कविताएँ बेहतरीन हैं.पानी का दर्द, दोस्ती का अर्थ और ज़माने की सच्चाई बयान करती कविताओं के बीच संदेश देती क्षणिकाएँ मुग्ध करती हैं। शारदा अरोरा ने कहा कि  ये कवितायेँ थोड़े में ही बहुत कुछ कह गईं हैं। जब तक आदमी मुखौटे लगाए रहता है, लोग उसकी कीमत चढ़ाये रहते हैं, यह कैसी विडम्बना है। वाणीगीत ने कहा, अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए जरुरी है उनका विलोम होना, उल्टी बात कहना, यही सत्य है।


आशीष जी ने सवाल किया कि 'इच्छाएं' की पहली कविता की पहली पंक्ति में 'चुक' के स्थान पर 'चूक' सही होगा, जिस पर राजेश उत्साही ने साफ किया कि दोनों के अर्थ अलग हैं। यहां शब्दों के चुकने की बात हो रही है,जिसका अर्थ है कि आपके पास कुछ नहीं बचा। चूकने का प्रयोग इस तरह होता है, आपका निशाना चूक गया या   आप गाड़ी चूक गए। उत्साही जी  ने सतीश जी,वंदना जी तथा सर्वत जी के इस सुझाव पर  कि अगर एक बार में एक ही कविता प्रस्तुत की जाती तो बेहतर होता, स्पष्ट  किया कि साखी कवि के बहाने कविता की समीक्षा का मंच है। किसी एक कविता के आधार पर आप कवि के बारे में बात नहीं कर सकते। उसकी रचनाधर्मिता के बारे में बात करने के लिए आपके पास उसकी रचना की विविधता होनी चाहिए। एक और बात। यहां प्रस्तुत चार छोटी कविताएं स्वतंत्र हैं पर अगर उनको इसी क्रम में एक साथ पढ़ा जाए तो वह एक और कविता का अर्थ देती हैं। राजेश ने अपनी कविताओं पर बातचीत करने के लिए साखी पर आये सभी पाठकों, रचनाकर्मियों के प्रति हार्दिक आभार जताया।




अगले शनिवार को अरुणा राय की कविताएँ
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शनिवार, 24 जुलाई 2010

राजेश उत्साही की कविताएं

राजेश उत्साही लम्बे समय से रचना कर्म से जुड़े हुए हैं। उन्होंने मप्र की अग्रणी शैक्षिक संस्था एकलव्य में 1982 से 2008 तक कार्य किया। संस्‍था की बाल विज्ञान पत्रिका चकमक का 17 साल तक संपादन किया। संस्‍था की अन्‍य पत्रिकाओं में संपादन तथा प्रबंधन सहयोग के अलावा एकलव्‍य के प्रकाशन कार्यक्रम में भी उनका योगदान रहा। मप्र शिक्षा विभाग की पत्रिका गुल्‍लक तथा पलाश का संपादन भी सम्हाला। नालंदा, रुमटूरीड तथा मप्रशिक्षा विभाग के लिए बच्‍चों के लिए साहित्‍य निर्माण कार्यशालाओं में स्रोतव्‍यक्ति के रूप में जिम्मेदारी निभायी। कविताएं, कहानी, व्‍यंग्‍य लेखन खासकर बच्‍चों के लिए साहित्‍य निर्माण, संपादन तथा समीक्षा में उनकी गहरी रुचि है। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। फिलहाल आजीविका के सिलसिले में बंगलौर में हैं। यहां उनकी चार कविताएं प्रस्तुत हैं.... 


पानी
_________
पानी
अब कहीं नहीं है

पानी जो हम पीते थे
पानी जो हम जीते थे
पानी
मीठा पानी
पानी का मीठापन
अब नहीं है

न पानी रहा
न पानीदार लोग
पानी न आंखों में है
न चेहरे पर

पानी
उतर गया है
जमीन में नीचे
बहुत नीचे
इतना जितना कि
आदमी अपनी आदमीयत से।

विलोम अर्थ
वो
दुश्म
नहीं हैं मेरे
हां, मैं उनका दुश्मन हूं
चूंकि
अपना दोस्त कहा था उन्हें 
इसलिए मैं
उनका दुश्मन हुआ
क्योंकि 
उनके शब्द कोश में
मेरे हर शब्द के लिए एक विलोम अर्थ है
मेरे हर तर्क के लिए एक विलोम तर्क है
जैसे
मैं सूखा कहूं तो वे पानी कहेंगे
मैं दिन कहूं तो वे रात कहेंगे
रखूं अगर हल तो उलझन कहेंगे
शायद
अपना अस्तित्व बनाए
रखने के लिए
यह जरूरी है
उनकी अपनी रणनीति में

आश्चर्य
कि मेरे शब्दकोश में
दोस्त का अर्थ
अब तक वही है।

 इच्छाएं
1. 
चुक
जाने के भय से
अभिव्यक्ति के खतरे
उठाने से बचता रहा
यह अलग बात है कि
व्यक्त करने को कुछ भी नहीं है

2. 
अचोटिल रहे शरीर, इसलिए
दूर रहा छोटी-मोटी लड़ाइयों से
फिर भी
बचा नहीं पाया
सुई की नोक भर जगह
वार झेलने के लिए
हृदय पर

3. 
शब्दों
के खेल में बचाकर रखे थे
ढाई आखर
बारी आने तक
असली अर्थ खो चुके थे वे

4 . 
इच्छाएं
अनंत हैं, रहेंगी
ताउम्र अधूरी
फिर भी कुछ आदिम इच्छाएं
बची हैं
अंत के लिए। 


कल रात
कल रात
अपना कटा हुआ सिर
लिए घूमता रहा मैं
सड़क पर आवारा
कोई
नहीं था
जो करता शिनाख्त

देखा
जिसने भी
वह अपरिचय
के भाव से भर उठा
इस तरह
जैसे वर्षों से नहीं मिला
मुझसा कोई

पहचानने
से इंकार कर दिया
दोस्तों ने
रीझते थे
जो बातों पर मेरी
हमनिवाला हमप्याला थे

नहीं दौड़ा
उनकी नसों में भी खून
जो देखकर भर उठते थे
हिकारत से मुझे
वे
रहे
सहज ही
नजदीकियों से मेरी जो
हो उठते थे परेशान

चमक
उनकी आंखों में भी
नहीं दिखी
खिल उठती थीं बांछें जिनकी
मुझे देखकर
यहां
तक कि
भावशून्य रहा
चेहरा उनका, लबों पर
नहीं हुई जुंबिश
जिन पर थिरकती थीं
तितलियां मुस्कान की
मेरे होने भर के अहसास से
अपना
कटा हुआ सिर
लिए घूमता रहा मैं
सड़क पर बदहवास
कल रात

कहीं
कोई
नहीं था जो करता शिनाख्त
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सम्‍पर्क : मोबाइल  09611027788,
email:  utsahi@gmail.com
ब्‍लाग   
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गुरुवार, 22 जुलाई 2010

फकत एक घर मुहब्बत का


तन की सफाई ख़ूब है माना कि आज कल
लेकिन कमी है दोस्तो मन की सफाई में

 
यह शेर ब्रिटेन के कवि और शायर प्राण शर्मा का है। एक मनुष्य के लिये मन का साफ रहना बहुत जरूरी है। एक रचनाकार के लिये तो निहायत जरूरी क्योंकि भीतर से साफ-सुथरा  होने पर ही व्यक्ति में सच कहने और सच सुनने की हिम्मत पैदा होती है। ये दोनों  ही चीजें एक रचनाकार के व्यक्तित्व को रचने और निखारने में सहायक होतीं हैं। शिखर की ओर जाते समय पर्वतारोही को कई बार रुकना पड़ता है, पीछे भी लौटना पड़ता है। एक गलत कदम भी उसे गहरी खाई में दफ्न कर सकता है। पहली कोशिश तो यह होती है कि कोई गलती न हो और अगर हो ही गयी और उसमें  तुरंत सुधार नहीं किया गया तो शिखर के पहले ही यात्रा खत्म होने का खतरा  बना रहता है। रचनाकार को भी इसी तरह की सावधानी बरतने की जरूरत होती है। अपनी गलती स्वीकार करने का साहस रचनात्मकता को जीवन और गति प्रदान करता है। डा. त्रिमोहन तरल ने पूरी ईमानदारी से यह साहस किया। यही इस बात का द्योतक है कि उनमें शिखर की ओर बढने का जज्बा है, निरंतर खुद के परिष्कार से ऊर्जस्वित होते जाने का जुनून है। शायद यही उनकी ताकत है।

 
साखी के पिछले अंक में आगरा के शिक्षक, कवि और शायर डा. त्रिमोहन तरल की गज़लें प्रकाशित हुई थीं। आम तौर पर गज़ल के पाठक या श्रोता गज़ल की रिदम और उसके अर्थ-स्फोट पर ध्यान देते हैं। उसकी तकनीक पर नहीं। जब गज़ल काव्य मंचों पर प्रस्तुत की जाती है तब तो इसके लिये बिल्कुल ही अवकाश नहीं होता। पर प्रकाशित रचनाओं को बारीकी से देखने का समय होता है। गज़ल में तो रिदम और कथ्य के साथ काफिया, रदीफ, बह्र  आदि का  खास ध्यान रखना होता है। तरल की गज़लों की अनेक पाठकों ने खुलकर सराहना की। आशा जोगलेकर ने उन्हें सुंदर, चुटीली और कटीली कहा। मशहूर लेखक  समीरलाल ने उनमें गज़ब की धार देखी तो कवि राजेश उत्साही ने प्रशंसा करते हुए सजग भी किया, दिल्‍ली वाली गज़ल में कथ्‍य के लिहाज से कुछ नया नहीं मिला,  न ही कहने के अंदाज से । जो बातें उसमें हैं, हम कहीं न कहीं सुनते ही रहते हैं। शायर  संजीव गौतम ने इन्हें परम्परा और नई सोच का मिक्स कहा। जहां पहली और तीसरी ग़ज़ल में अपने समय का बोध है वहीं दूसरी और चौथी ग़ज़ल में पारम्परिकता ज्यादा है। उन्होंने जोड़ा, तरल जी का मूल स्वर रोमानी है। गज़लों से स्पष्ट है... तेरे सँग चलने में तपती हुई सड़क पर भी। ख़ुशनुमा रहता है सारा सफ़र मुहब्बत का। संजीव को दिल्ली वाली रदीफ से किसी नामालूम शायर का एक शेर याद आया- दिल की बस्ती पुरानी दिल्ली है, जो भी आया है उसने लूटा है। कवयित्री रश्मिप्रभा ने कहा, किसी कवि की यह ख़ास विशेषता होती है कि वह अपनी कलम ज़िन्दगी के हर मोड़ से गुज़ारे, ज़िन्दगी के हर मायनों की स्याही से अपनी कलम को भरे और डॉ त्रिमोहन जी ने अपनी कलम को यह अर्थ दिया है। हर रचना की अपनी अहमियत है, लेकिन 'प्यार'  का ज़िक्र आते ही खुदा से रूबरू होने का मौका मिलता है और अपना आप भी खुदा हो जाता है।....तेरे सँग चलने में तपती हुई सड़क पर भी, ख़ुशनुमा रहता है सारा सफ़र मुहब्बत का, इन पंक्तियों में जलती सड़क को शीतल किया है प्यार के एहसास ने ! गज़लकार और कवि मदन मोहन अरविंद ज्यादा खुश नजर आये, उन्हें हर गज़ल गुलदस्ते के फूल जैसी दिखी। नवगीतिकाकार वेद व्यथित, लेखक जाकिर अली  रजनीश और आखर कलश के सुनील गज्जाणी ने भी गज़लों पर अपने मत रखे। 

आप्रवासी कवि और शायर प्राण शर्मा ने कुछ त्रुटियों की ओर संकेत किया। उन्होंने कहा कि त्रिमोहन जी की गजलों में भाव अच्छे हैं लेकिन कहीं-कहीं बह्र, काफिया और शब्द के वज्न के दोष हैं। पहली गज़ल 32 मात्राओं के छंद में कही गयी है। इसमें 16,16 पर यति होती है। तरल जी के अधिकांश शेरों की पहली पंक्तियों में 15,14 पर यति है। दूसरी गज़ल में रुकी और चली के साथ जमीं काफिया सही नहीं है। तीसरी गज़ल के एक शेर में सुकून शब्द बह्र  में सही नहीं है। सुकून शब्द का  वज्न है-12, वज्न चाहिये 21, लिहाजा शेर खारिज है।  डा त्रिमोहन तरल ने अति विनम्र भाव से प्रशंसाये और आलोचनायें स्वीकारीं। उन्होंने क़हा, आप सभी यहाँ आये, मेरी ग़ज़लनुमा रचनाओं को पढ़ा, अपनी बहुमूल्य राय दी,  उसके लिए मैं आप सभी का ह्रदय से आभारी हूँ। मेरा विशिष्ट धन्यवाद आदरणीय प्राण शर्माजी को, जिन्होंने मेरी गलतियों/कमजोरियों की ओर सही उँगली उठाकर दूर से ही एक बड़ा भाई होने का बड़ा दायित्व निभाया है। अपनी ओर से इतना ही कहना चाहता हूँ कि  दरअस्ल मैं मूलतः गीतकार हूँ और ग़ज़ल कहने की मैंने शुरुआत ही की है। लड़खड़ाना तो था ही। लेकिन मित्रों,  एक वादा ज़रूर करना चाहता हूँ आपसे कि जब शुरुआत कर ही दी है तो ग़ज़ल कहना बंद नहीं करूंगा। कमजोरियों को दूर करना सीख कर अपनी नयी कोशिशों के साथ आप से फिर यहीं भेंट करूंगा, ताकि एक बड़े भाई का सही वक़्त पर उँगली उठाना जाया न चला जाय। 


शनिवार को बंगलूर के कवि राजेश उत्साही की रचनाएं

शनिवार, 17 जुलाई 2010

डा त्रिमोहन तरल की गज़लें


डा त्रिमोहन तरल के गीत किसी को भी बांध लेते हैं, उनकी गजलें एक नया संसार रचतीं सी दिखाई पड़तीं हैं| वे वक्त की आँख में आँख डालकर उससे सवाल करने में संकोच नहीं करते| आदमी से अपनी प्रतिबद्धता के कारण उसके दुःख-दर्द को बांटने का कोई मौक़ा नहीं चूकते| उनकी गजलों में समय के कवच को भेदकर जमीनी सचाई से रूबरू होने की हिम्मत देखी जा सकती  है| वे यद्यपि आगरा कालेज में अंग्रेजी के  एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं, लेकिन हिंदी के लिए जीने-मरने की जैसे कसम खाई हो| उन्हीं से सुने तो.., मैं हिन्दी में गीत, दोहे, मुक्तक लिखता हूँ और हिन्दुस्तानी में गज़लें कहता हूँ । कभी-कभार छंद मुक्त रचनाएं भी फूट पड़ती हैं। दुनियाँ और दुनियांदारी की विसंगतियां देखकर जब रहा नहीं जाता तो कलम अपने आप हाथ में आ जाती है और कागज़ पर जो भी उतरता चला जाता है वह कविता की विभिन्न विधाओं का रूप ले लेता है। देश,समाज और मानव-जीवन के सरोकारों को अभिव्यक्ति देने वाली रचनाओं को ही मैं कविता मानता हूँ|

(1)
कभी हँसाती, कभी रुलाती, कभी-कभी फुसलाती दिल्ली
देती गहरे घाव बाद में घावों को सहलाती दिल्ली

लाखों-लाख जमूड़े रहते हर सूबे हर कसबे में
एक मदारी बनी हुई है सबको नाच नचाती दिल्ली

हमसे कहती जीवन देते पेड़ लगाओ धरती पर
पर चुपके-चुपके पीछे से खुद आरी चलवाती दिल्ली

जिसने नज़रें नीची कर ली उसको ऊँची गद्दी दी
जिसने नज़र उठाई उसके ऊपर ग़ाज़ गिराती दिल्ली

सांपनाथ या नागनाथ हों ज़हर नहीं तो दूध नहीं
जिसमें जितना ज़हर भरा है उतना दूध पिलाती दिल्ली

इधर-उधर का सभी तरह का खाकर इतना फ़ैल गई
सारे भारत से आता जो सब लोहू पी जाती दिल्ली

जो आता बस जाता इसमें इसका होकर रह जाता
जाने कैसा नशा कराती जाने क्या सुंघवाती दिल्ली

दिल्ली बहुत जवाँ होती है रात क्लबों, कैसीनों में
दौलत की उँगली के बल पर उलझी लट सुलझाती दिल्ली

कुर्सी पर रहती है तब तक भूले देशवासियों को
कुर्सी से उतरी तो देश बचाने को अकुलाती दिल्ली

सुनते हैं पहले तो दिल वालों की भी हो जाती थी
अब तो केवल दौलत वालों के ही दिल बहलाती दिल्ली

दिल्ली दिल्ली है आख़िर तू क्या समझेगा इसे 'तरल'
कभी-कभी तो दिल्ली वालों को भी आँख दिखाती दिल्ली

(2)
आँखों से निकल कर के गालों पे रुकी होगी
अश्क़ों की सवारी पर इक पीर चली होगी

तुम सामने थे फिर भी उसने न तुम्हें देखा
वो राधा कन्हाई की यादों में रमी होगी

जो दिल में बसाए था अब बात नहीं करता
किरदार में मेरे ही कुछ ख़ास कमी होगी

वो घर में नहीं रुकता बाज़ार में रहता है
दूकान कोई घर से ज़्यादा ही सजी होगी

कल जिसपे खड़े होकर चूमा था फ़लक उसने
वो उसके इरादों की पुरसख्त ज़मीं होगी

मुर्दे की मुट्ठियाँ भी भिंचने लगीं थी उस दम
क़ातिल के गले में जब जयमाल पड़ी होगी

(3)
शब्द चुभते हैं किसी के कई भालों की तरह
फूट जाता हूँ मैं तब अधपके छालों की तरह

मुफ़लिसी भूख मिटाती   है अश्क़ पी-पीकर
मुल्क़ को खा रहे कुछ लोग निवालों की तरह

दोस्त पीते हैं मेरी दोस्ती को मय की तरह
छोड़ देते है मुझे खाली पियालों की तरह

सुकूँ का मुश्क मेरी रूह में मौजूद रहा
मैं भटकता रहा जंगल में गज़ालों की तरह

महफ़िलें अश्क़ की लगतीं हैं रोज़ आँखों में
आ भी जाओ कभी हाथों में रुमालों की तरह

हल तो ढूंढे हैं बहुत आदमी ने इसके 'तरल'
ज़िन्दगी आज भी है उलझे सवालों की तरह

(4)
रफ़्ता-रफ़्ता है मगर है असर मुहब्बत का
यों ही आता है सभी को हुनर मुहब्बत का

ये हमें ज़िन्दगी की धूप से बचाएगा
पनपने दो तो दिलों में शजर मुहब्बत का

तेरे सँग चलने में तपती हुई सड़क पर भी
ख़ुशनुमा रहता है सारा सफ़र मुहब्बत का

क्या ज़रुरत है चाँद को ज़मीं पे लाने की
इस ज़मीं को ही आसमान कर मुहब्बत का

चाहिए जिनको उन्हें दे दो कई ताजमहल
मेरी चाहत है फ़क़त एक घर मुहब्बत का

ज़िन्दगी और हसीं इस ज़मीन पर होगी
नफ़रतों पर हो जो बरपा क़हर मुहब्बत का

यहाँ तो रह के दिखा नफ़रतों से दूर 'तरल'
ये नगर ताज का है ये शहर मुहब्बत का

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 आकृति, २७०, सेक्टर-५, आवास-विकास, सिकंदरा, आगरा 
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डा त्रिमोहन तरल का ब्लाग
फोन ..०९७६०४४३८२२
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बुधवार, 14 जुलाई 2010

कि ये गूंगी सदी होने न पाये


साखी के पहले अंक में आगरा के युवा कवि और शायर संजीव गौतम की गज़लों पर खुलकर बातचीत हुई। अनेक सहित्यप्रेमियों, कवियों,शायरों और उर्दू साहित्य के पारखियों ने जहाँ संजीव के तेवर की तारीफ की, वहीं उनकी गज़लों के बहाने गज़ल के व्याकरण पर भी चर्चा हुई। शुरुआत की कनाडा के जाने-माने व्यंग्यकार और लेखक समीर लाल ने। उन्हें यह शेर बहुत पसंद आया... मुल्क अपना निजाम भी अपना,मुश्किलों में किसान है फिर भी। पहली गज़ल में उन्होंने काफिये की गड़बड़ी की ओर संकेत किया पर कहा कि इस पर जानकार लोग बेहतर प्रकाश डाल सकते हैं। बात आगे बढ़ाते हुए सिंगापुर की मशहूर गज़लकारा श्रद्धा जैन ने कहा, संजीव की गज़लें सामयिक और गहरी होती हैं। उनकी गज़ल का हर शेर उनके कलाम की ताकत का अन्दाजा देता है।

बंगलूर के कवि राजेश उत्साही ने संजीव गौतम के तेवर को समसामयिक बताते हुए कहा, यह सुकून देने वाली बात है। उन्होंने गज़लों में बेहतरीन शेर की पहचान करते हुए सलाह दी कि सबसे अच्छी बात आखिरी शेर में होती तो ज्यादा अच्छा होता। पणजी के इस्मत जैदी ने गज़लों की तारीफ करते हुए समीर लाल के एतराज का समर्थन किया। लुधियाना से डी.के. मुफलिस  ने कहा कि संजीव को समय की नब्ज़ पहचान कर उसे खूबसूरत अलफ़ाज़ में ढालने का हुनर मालूम है और ये गज़लें पढ़ते हुए यक़ीन पक्का होने लगता है। पर उन्होंने एक गुज़ारिश कर बात उलझा दी, समीर जी और इस्मत जी की बात पर भी गौर फरमाएं। काफिये को लेकर इन सारे सन्देहों को साफ करने की पुरजोर  कोशिश की ब्रितानी प्रवासी शायर प्राण शर्मा ने। उन्होंने बात स्पष्ट  की, उर्दू शायरी के व्याकरण में दे, ने और रे का ए स्वर काफिया है। आ (मुद्दा, लगा, दगा) की तरह ए भी काफिया के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसे पर्चे के दूसरे काफिये बदले, सस्ते, कैसे, उजले, धन्धे, कितने, दूजे इत्यादि हो सकते हैं।
 
चर्चा को गति देते हुए  आगरा के शायर और अंग्रेजी साहित्य के विद्वान डा. त्रिमोहन तरल ने कहा कि शायरी की पूरी ताक़त अपने समय को गूंगेपन से बचाने के लिए झोंक दी जानी चाहिए। शायरी व्यवस्था के महासागर में भटकते ज़िन्दगी के जहाज को रास्ता दिखाने वाली 'बीकन लाइट' है, शायर के सीने में जलती है। चूंकि बाहर बहुत अँधेरा है, शायर के मन की रौशनी अँधेरे को चीरकर व्यवस्था का असली चेहरा उजागर करने का काम करती है। जहाँ तक काफियों का मुआमला है मैं समझता हूँ की संजीव के काफिये सही हैं।

चर्चा में सबसे महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया इंग्लैंड से प्रकाशित होने वाली ई-पत्रिका मंथन और महावीर के सम्पादक और शायर महावीर शर्मा ने। उन्होंने कहा, पहली ग़ज़ल में 'मुझे दे दे' और तीसरी ग़ज़ल में 'रेज़ा-रेज़ा' लफज़ी-तक़रारे- मुवक्कद ( مُؤکّد) की अच्छी मिसालें हैं. हालांकि कुछ लोग लफज़ी-तक़रार को ऐब-ए-कलाम मानते हैं लेकिन मौलाना हसरत मोहानी ने इसे बाज़ हालात में हुस्ने-बयान क़रार दिया है. संजीव की ग़ज़लों में इन तकरार से ग़ज़ल की ग़ज़लियत में इज़ाफ़ा ही हुआ है. बहर-ओ- वज़न को भी निभाया है. ख़याल और बयान का भी ध्यान रखा गया है. हिन्दी भाषा में लफ़्ज़ों के लहजे में फ़र्क़ आने से कभी कभी वज़न में फ़र्क़ महसूस होने लगता है लेकिन हिन्दी में लिखने से उर्दू वालों को एक समझौता तो करना ही चाहिए. दुष्यंत कुमार ने भी एक बार 'महल' का वज़न हिन्दी के उच्चारण से ही इस्तेमाल किया था हालांकि कुछ उर्दू के शायरों ने इसे ग़लत माना था.

शर्मा जी ने राजेश उत्साही की टिप्पणी का जिक्र करते हुए कहा कि ग़ज़ल के सब से अच्छे शेर (बैत-उल-ग़ज़ल) के लिए ज़रूरी नहीं कि वह आखिरी शेर या मक़ता ही हो, वह कहीं भी हो सकता है. काफ़िये के बारे में डॉ. त्रिमोहन तरल जी और प्राण शर्मा के  तर्कों का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि काफ़िये बिल्कुल सही हैं. जिस तरह अलिफ़ का काफ़िया इस्तेमाल किया जाता है, उसी तरह ए, ई, ऊ वगैरह के काफ़िये भी सही होते हैं .इस पूरे विचार विमर्श के दौरान  नुक्कड़ के अविनाश वाचस्पति, ललितवानी के ललित शर्मा तथा संगीता स्वरूप की अपनी शुभकामनाओं के साथ उपस्थिति महत्वपूर्ण रही। 
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अगले अंक में शनिवार को डा. त्रिमोहन तरल की गज़लें 

रविवार, 11 जुलाई 2010

संजीव गौतम की गज़लें

संजीव गौतम ग़ज़लों और गीतों की दुनिया में एक जाना पहचाना नाम है| वे मिजाज से निहायत संजीदा और पुरखुलूस इंसान हैं. जिन्दगी को बहुत सादगी, सच  और स्वाभिमान के साथ जीते हैं. अपने बाहर के नंगे सच को बहुत बारीकी से देखते हैं और उसे समझने की कोशिश करते हैं| समाज और  सियासत की दुविधा, आडम्बर और पाखंड को न केवल महसूस करते हैं बल्कि  उसे शब्द देने की भी कोशिश करते हैं| उनकी तीन गज़लें हम साखी के जरिये आप के सामने रख रहे हैं. हम चाहते हैं कि इन गज़लों के कथ्य पर, इनकी तकनीक पर और इनके प्रभाव पर आप बात करें| बात तार्किक, स्पष्ट और साफ लहजे में होनी चाहिए|

 १.
सजा मेरी खताओं की मुझे दे दे
मेरे ईश्वर मेरे बच्चों को हंसने दे

इशारे पर चला आया यहाँ तक मैं
यहाँ से अब कहाँ जाऊं  इशारे दे


विरासत में मिलीं हैं खुशबुएँ  मुझको
ये दौलत तू मुझे यूँ ही लुटाने दे


मैं खुश हूँ इस गरीबी में, फकीरी में
मैं जैसा हूँ मुझे वैसा ही रहने दे


उजालों के समर्थन की दे ताकत तू
अंधेरों से उसी ताकत से लड़ने दे


२.
प्रयासों में कमी होने न पाए
विजय बेशक अभी होने न पाए


इसी कोशिश में हर इक पल लगा हूँ
कि गूंगी ये सदी होने न पाए

तुम्हें भी सोचना तो चाहिए था
कि रिश्ता अजनबी होने न पाए


वतन की बेहतरी इसमें छिपी है
सियासत मजहबी होने न पाए


जुदा हैं हम यहाँ से देखना पर
मुहब्बत में कमी होने न पाए


३.
हर कदम इम्तेहान है फिर भी
वो बड़ा सख्तजान है फिर भी


रेज़ा-रेज़ा बिखर गये सपने
उसकी हिम्मत जवान है फिर भी


झूठ ने पर कतर दिए सच के
इस परिंदे में जान है फिर भी


मुल्क अपना निजाम भी अपना
मुश्किलों में किसान है फिर भी


रंक, राजा, फकीर सब फानी
तुझको किसका गुमान है फिर भी

संवाद, ११ ब, गौरीकुंज, गैलाना रोड, आगरा-२८२००७
(फोन 09456239706)
संजीव का ब्लाग -- http://kabhi-to.blogspot.com/

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

यही है साखी

कबीर ने कहा, आओ 
तुम्हें सच की भट्ठी में 
पिघला दूं, खरा बना दूं 


मैंने  उनके शबद की आंच पर 
रख दिया अपने आप को 
मेरी स्मृति खदबदाने लगी 
वेद, श्रुति, पुराण और उपनिषद 
तलछट की तरह बाहर हो गये 
जाति वाष्प बनकर उड़ गयी 
उंच-नीच का दर्प भस्म हो गया
शबद रह गया सिर्फ अनहद 
गूंजता हुआ मेरे महाकाश में 


कबीर ने पूछा, क्या देख रहे हो 
अब अपने भीतर, बताओ 
मैं चुप रहा, बिल्कुल खामोश 
जब मेरे भीतर-बाहर 
कबीर ही कबीर था 
जब मैं था ही नहीं तो 
कौन देता जवाब, किसे 


यही है साखी, कहा कबीर ने 
और मैं स्पंदन में बदल गया 
नाद में तबदील हो गया
अब मैं अपना घर 
फूंकने को तैयार हूँ, 
लुकाठा थामने को तैयार हूँ