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गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

कैद सूरज के अब आजाद करावल जाए


साखी पर मनोज भावुक और उनकी भोजपुरी गजलों पर तो विद्वानों और रचना धर्मियों ने गहन चर्चा की ही, उनके बहाने भाषा-बोली के फर्क पर, विमर्श में गंभीरता और चुहलबाजी  के ताल-मेल पर, सलिल जी की बुद्धिसंपन्नता किंवा मूढ़ता पर और  चर्चा शब्द के लिंग पर भी जमकर माथापच्ची हुई| राजेश उत्साही की सलाह पर मुझे गुलमोहर  की छाया तले जाना पड़ा| मैंने गुलमोहर  के नीचे प्रेमियों को बैठते तो देखा-सुना था पर वहां तो भाषा के दंगाइयों से मुलाकात हुई| वहां झगडा इस बात पर हो रहा था कि चर्चा हुई ठीक है या चर्चा हुआ| समाधान भी था वहां पर, उर्दू में चर्चा होता है, हिंदी में चर्चा होती है| ऐसे कई शब्द हैं, जिनको लेकर उर्दू वाले हिंदी के लिंगबोध से सहमत नहीं हैं| ऐसे में यह सोचना कि इब्ने इंशा कमअक्ल थे, हमारी कमअक्ली के सिवा कुछ और नहीं होगा|  मैं तो यही कहूँगा कि साखी पर चर्चा रोचक भी रही(भी रहा नहीं ) और गंभीर भी| रोचक इस मायने में कि बीच-बीच में विषयांतर  होकर लोग एक-दूसरे से दिल्लगी भी करते रहे| मेरा मानना है कविता और शायरी की दुनिया के लोग बिना तंज और हंसी-मजाक के देर तक नहीं रह सकते|  ऐसे क्षणों का अपना आनंद होता है पर उनकी स्तरीयता भी अपेक्षित है| राजेश उत्साही इस मामले में हमेशा सजग रहते हैं। मैंने देखा है कि जब भी कोई भाषा में बेलगाम होने की कोशिश करता है, वे टोके बिना नहीं रहते|  जितेन्द्र जौहर ने जब कहा कि मेले में उतनी दूकानें नहीं आयीं...दूकानदारों की व्यस्तताएं होती हैं, तो राजेश ने उन्हें टोकने  में तनिक देरी नहीं की| चलो अच्छा हुआ कि जौहर साहब ने  इस चूक को हंसी-मजाक कहकर टाल दिया|

साखी पर पहली बार किसी क्षेत्रीय भाषा में गजलें आयीं थीं| मैं भोजपुरी को भाषा इसलिए कह रहा हूँ कि वह भाषा होने की सारी जरूरतें पूरा करती है| भाषा केवल वही नहीं है, जिसके पास अपनी लिपि है| इस तर्क पर तो मराठी और नेपाली को भाषा कहना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि उनकी अपनी लिपि नहीं है, ये दोनों भाषाएँ देवनागरी लिपि का उपयोग करती हैं| भाषा होने के लिए सबसे आवश्यक शर्त है, उसके साहित्य की समृद्ध परंपरा और उसका अद्यतन प्रवाह| कभी ब्रज सबसे संपन्न भाषा हुआ करती थी, उसे अब भी साहित्य के इतिहास में भाखा कहा जाता है पर आज वह बोली है| वह निरंतरता ब्रज भाषा में कायम नहीं रह सकी| केवल भारत में ही नहीं कई देशों में भोजपुरी में साहित्य रचना हो रही है| यह अच्छी बात रही कि किसी हिन्दी वाले ने इसे बेगानी नहीं समझा, ऐसा नहीं लगा कि भोजपुरी किसी की समझ में न आयी  हो| शायर तिलकराज जी ने कहा, मैं भोजपुरी नहीं जानता लेकिन फिर भी कोई कठिनाई नहीं हुई, आखिर है तो हिन्‍दी ही। ग़ज़ल 2 में शेर 3 की पंक्ति 2 में 'बेहया' शब्‍द पर वज्‍़न की ऑंशिक समस्‍या लग रही है। इसी तरह ग़ज़ल 6 में शेर 7 की पंक्ति 2 में राज की जगह राज़ होना चाहिये, हो सकता है, यह टंकण त्रुटि रही हो। राज़ उर्दू से आया शब्‍द है इसलिये इसे यथावत लेना आवश्‍यक है। मनोज की ग़ज़लों में भाव और भाषा-प्रवाह स्‍पष्‍ट हैं और तेवर भी मुखर हैं।


जितेन्द्र जौहर ने बात आगे बढ़ायी|  'बेहया' शब्‍द पर वे तिलकराज जी से सहमत दिखे पर उनकी इस  बात से असहमत कि-- "ग़ज़ल 6 में शेर 7 की पंक्ति 2 में ’राज’ की जगह ’राज़’ होना चाहिये।" हिन्दी के ’राज’ और उर्दू के ’राज़’ में अर्थ का अंतर होने के बावजूद भी मैं कहना चाहूँगा कि भाषा सदैव संदर्भानुकूल अर्थ देती है। भोजपुरी में उर्दू से आयातित शब्दों पर नुक़्ता अपरिहार्य या आवश्यक नहीं है| ग़ौरतलब है कि मनोज भावुक ने ’राज़’ की जगह नुक़्ता-रहित ’राज’ का ही नहीं, प्रत्युत्‌ ’रोज’ , आखिर, खुशबू, इंतजार, जमीर, कसम, कैद, आजाद, वक्‍त, जमीन, कदम, गजल, जज्बात, दफ्न, यकीन आदि बहुत से उर्दू शब्दों का नुक़्ता-विहीन इस्तेमाल किया है। हाँ... कुछेक जगहों पर मनोज भाई ने नुक़्ता लगा दिया है। यहीं पर वे थोड़ी ग़लती कर गये। ‘भोजपुरी की आपन एक अलगै दुनिया बा|’ देखें.. ’ज़िन्दगी’ और ’हुज़ूर’ शब्दों के लिए भोजपुरी में क्रमशः ’जिनिगी’ और ’हजूर’ का प्रयोग| ’सिर्फ़’ के लिए ’सिरिफ’ का प्रयोग। ’दरिद्रता’ की जगह ’दलिद्दर’। कोई भी भाषा/ बोली उधार लिए गये शब्दों को अपने अनुकूल ढाल लेती है। उपर्युक्त शब्दावली भोजपुरी भाषा के अनुकूलन का ही परिणाम है।  'ग्रास' और ‘घास’, 'कैंडिल' और ‘कंदील’ तथा 'फिलासोफी ' और ‘फलसफा’ के रूपांतरण  से हम सभी परिचित हैं। हर भाषा में शब्द-संपदा के अनुकूलन की प्रक्रिया अनवरत्‌ चलती रहती है।  मनोज के  जो शे’र मेरे मन को गहरे तक छू सके, वे हैं:
1. भँवर में डूबियो के आदमी उबर जाला
मरे के बा तऽ ऊ दरिया किनारे मर जाला
2. बर्फ हs, भाप हs, पानी हs कि कुछुओ ना हs
जिन्दगी का हवे, ई राज बुझाते नइखे
३.जमीने प बा आदमी के वजूद
तबो मन परिन्दा उड़ावत रहल
4. रोशनी गाँव में, दिल्ली से ले आवल जाये
कैद सूरज के अब आजाद करावल जाये
इस शे’र का तो, भाई... कहना ही क्या ! कितनी सुन्दर बात कह गए आप !
5. बहुत बा लोग जे मरलो के बाद जीयत बा
बहुत बा लोग जे जियते में, यार, मर जाला

 
जौहर के स्पष्टीकरण के बाद तिलकराज जी ने कहा, मुझसे त्रुटि हुई 'राज' को भेद के रूप में पढ़ने की|  मैंने दूसरी पंक्ति का आशय यह लिया था कि 'जि़दगी क्‍या है, यह भेद समझ नहीं आता है'। जबकि अब इसका आशय मुझे समझ आया कि 'जिन्‍दगी क्‍या है; इस प्रश्‍न को ये शासन हल ही नहीं करता है'।  जौहर ने और स्पष्ट किया कि इस राज का मतलब रहस्य है, जिन्दगी क्या है, इसका रहस्य समझ में ही नहीं आता| 


शायर सर्वत जमाल साहब ने कहा कि मनोज 'भावुक' की  गज़लें, भोजपुरी में नि:संदेह एक नया फलक रचने की कोशिश कर रही हैं|. ताज़गी से भरी इन गज़लों में वो सब कुछ है, जिन्हें पढ़ने  की इच्छा एक पाठक को होती है| लेकिन अभी मनोज के लिए मेहनत ज़रूरी है| मनोज की गज़लों में कुछ शब्द खटकते हैं---आंगन, दरपन, मधुवन, सावन, खुश्बू, विश्वास, आदमी, रेत, बुनियाद, ज़मीर, श्रम, वजूद, परिन्दा, जज़बात---भोजपुरी  में इन शब्दों के साथ 'वा' का इस्तेमाल कर इनका भोजपुरीकरण कर लिया जाता है| गज़ल-3 मुझे माधव मधुकर की गज़ल के  भोजपुरी रूपांतरण जैसी  लगी| हो सकता है, मनोज को इसका इल्म न हो लेकिन वह एक मशहूर गज़ल है| फिर भी मैं यह कहने पर मजबूर हूं कि यह गज़लें भोजपुरी के लिए एक नई खिड़की  खोल रही हैं, जहां से हवा के ताज़ा झोंके आ रहे हैं| गज़ल को गज़ल के ही रूप में बांधे रखने की कला मनोज के पास है और शायद आने वाला वक़्त इन्हें भोजपुरी का 'दुष्यंत' के नाम से याद करे|


सलिल जी मैदान में आये| उन्होंने भाषा-बोली का सवाल उठाया| एक सामान्य प्रतिक्रिया सबसे पहले कि यह ग़ज़लें भोजपुरी की श्रेणी में रखी जाएँ कि नहीं? मैं जिस भाषा में लिखता हूँ, उसे कई लोग भोजपुरी या कुछ और कह देते हैं, जबकि मैंने स्वयं यह सफाई दी है कि यह कोई भाषा नहीं, बोली है| पूरी तरह हिंदी, सिर्फ बोलने के अंदाज़ में लिखी हुई| लिहाज़ा इसे बतियाना माना जाना चाहिए, लेखन नहीं|  यह ग़ज़लें अपनी तमाम ख़ूबसूरती के बावजूद यह एलान करती हैं कि यह हिंदी/उर्दू में सोची हुई ग़ज़लें हैं यानि मौलिक रूप से यह भोजपुरी की गज़लें नहीं हैं| इसका प्रमाण इस बात से भी मिलता है कि सारी गज़लों में उर्दू के कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग है, जो भोजपुरी का अंग नहीं हैं| अमीर खुसरो की कुछ गज़लें फ़ारसी और हिंदवी का अद्भुत मेल प्रस्तुत करती हैं, जहाँ मिसराएऊला फ़ारसी में और सानी हिंदवी में कहा गया है| आप फ़ारसी का मतलब तो समझ सकते हैं  मगर उसी बहर में उसे ग़ज़ल में तर्जुमा करके नहीं पिरो सकते, क्योंकि शेर का वज़न उसी ज़ुबान में आता है, जिसमें वह कही गई हो और बहर भी वैसे ही सम्भाली जा सकती है| एक शेर के माध्यम से अपनी बात स्पष्ट करने की कोशिश करता हूँ. मनोज जी ने कहाः
बचपन के हमरा याद के दरपन कहाँ गइल
माई रे, अपना घर के ऊ आँगन कहाँ गइल.

और यह देखिएः
बचपन की मेरी याद का दर्पन कहाँ गया,
माई री, अपने घर का वो आँगन कहाँ गया.

किसी भी शेर को आप उठा कर देखिए, उसे आप बहुत आसानी से बिना मेहनत हिंदुस्तानी ज़ुबान में लिखते चले जाएँगे| यही बात ख़ुद उनकी दूसरी ग़ज़ल के मतले से साबित होती है| ज़रा ग़ौर करें...
भँवर में डूबियो के आदमी उबर जाला
मरे के बा तऽ ऊ दरिया किनारे मर जाला.

ग़ज़ल को बहर में रखने के लिए मनोज जी ने इसमें “भँवर में डूबियो” लिखा है, जबकि भोजपुरी में यही शब्द “डुबियो” हो जाता है| अगर इसे भोजपुरी  में लिखा जाता तो शेर की बहर छोटी हो जाती लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाए, क्योंकि उनकी सोच मूलतः हिंदी में थी| वैसे शायर ये ईमानदार हैं, मैं होता तो इस तरह बेईमानी कर जाताः
भँवर में डुबियो के अदमी कबो उबर जाला
मरे के बा तऽ ऊ दरिया किनारे मर जाला.

यहाँ “आदमी” को भोजपुरी के प्रचलित शब्द “अदमी” से बदल दिया है जो किसी भी पुरबिया व्यक्ति को आपत्तिजनक नहीं लगता और बहर के कारण कबो शब्द जोड़ना पड़ा| इन सबके बावजूद, मनोज जी की ग़ज़लें, एक युवा गज़लगो की क्षमता को स्थापित करती हैं | जितनी आसानी से इन्होंने इतने गहरे भाव बयान किए हैं, उनकी अद्भुत प्रतिभा का लोहा मनवाने को काफी है|  वे समस्त सम्मान, जो आपको मिले हैं, वह आपकी योग्यता का प्रमाण हैं और आपकी ग़ज़लें उसकी परिचायक हैं|


कवि संजीव गौतम ने कहा, मनोज जी की ग़ज़लें साखी पर प्रकाशित होना गर्व की बात है। सर्वत जी ने उनके लिए भोजपुरी का दुष्यन्त की संज्ञा दी है तो कुछ सोचकर ही दी है। ये ग़ज़लें एक सच्चे कवि की ग़ज़लें हैं। कुछ व्याकरणिक त्रुटियों की ओर भी विद्वानों ने इशारा किया है, लेकिन वो सब बेमानी है, क्योंकि ये ग़ज़लें इसका मौका नहीं देतीं। मैं तो सबसे पहले ग़ज़ल पढ़ते ही यह सोचने लगता हूं कि शायर ने इसे सोचा कहां से है। क्या किसी और का पढ़कर या वह जिन्दगी की पहेलियो को खुद सुलझाता है। अगर पहले वाली स्थिति पाता हूं तो उसकी कहन पर ध्यान जाता है कि उसने पहले ही हजार बार कही बात को कैसे कहा है। यदि दूसरी स्थिति पाता हूं तो सिर्फ वाह ही निकलती है और उसका मुरीद हो जाता हूं। मनोज जी ऐसे ही रचनाकार हैं जो अपनी नजर से इस दुनिया को देखते हैं। उनके ये अशआर इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं-

भँवर में डूबियो के आदमी उबर जाला
मरे के बा तऽ ऊ दरिया किनारे मर जाला
बहुत बा लोग जे मरलो के बाद जीयत बा
बहुत बा लोग जे जियते में, यार, मर जाला
बर्फ हs, भाप हs, पानी हs कि कुछुओ ना हs
जिन्दगी का हवे, ई राज बुझाते नइखे

ये ग़ज़लें उर्दू और हिन्दी के झगड़े का भी काफी हद तक उत्तर देती हैं| ये उर्दू की ग़ज़लें तो हैं नहीं, इसका अर्थ है कि फारसी और उर्दू के अतिरिक्त किसी और भाषा में भी ग़ज़लें सफलतापूर्वक कही जा सकती हैं। एक बड़ी मजेदार बात ध्यान में आ रही है कि ये सारी प्रतिभाएं नोएडा में क्यों एकत्रित होती जा रही हैं। अब देखिए न- अशोक रावत जी, सलिल वर्मा जी, आलोक श्रीवास्तव और अब मनोज जी। जिसे देखो वही नोएडा में निकलता है। क्या इसमें कुछ रहस्य है।  

संजीव की इस मधुर छेड़खानी से सलिल जी चुप नहीं रह सके, एक भूल सुधार की अनुमति चाहता हूँ... इस अनपढ़ का नाम (अभी अभी यह ख़िताब मिला है मुझे, या कहिए किसी ने पहली बार सही पहचाना है, इस बिहारी को) आपने प्रतिभावान लोगों में शामिल कर बड़ी भूल की है| अभी तक मुस्कुरा रहा हूँ आपकी इस टिप्पणी पर| जितेन्द्र जौहर भी लपके, .सलिल वर्मा जी (उर्फ़ ‘चला बिहारी...’), आप जैसे संतुलित/संयमित वाणी वाले व्यक्ति को किस ‘पढ़े-लिखे’ ने ‘अनपढ़’ कहा...हुज़ूर! मेरी राय में, यदि आप अनपढ़ हैं...तो फिर ‘पढ़ा-लिखा’ कौन है ? माहौल में चुहल की मिश्री घुली तो तिलकराज जी कैसे अपने को रोक पाते,  हुजूर 'नैन लड़ जइहैं तो मनवा मा कसक हुइवै करी' के ज़माने से हिन्‍दी के अन्‍य रूप सुनते आ रहें, अइसन बुडबक  न जानिये। इस तरह की गंभीर चर्चाओं में थोड़ी बहुत चुहल चलती रहनी चाहिये। वे बोले, भाषा का अपना व्‍याकरण और लिपि होना आवश्‍यक है जबकि बोली इनसे स्‍वतंत्र है|  पंजाबी मूल का होते हुए भी मेरे लिये पंजाबी और भोजपुरी एकसी हैं। दोनों में अर्थ समझ में आ जाता है, बोलते नहीं बनतीं। मनोज ने ऐसी रचनायें दी हैं कि कहने को कुछ छोड़ा ही नहीं, अब भाई कुछ न कुछ तो कहना ही पड़ेगा न, वरना ब्‍लॉग पर टिप्‍पणी-मेला कैसा लगेगा। लिव लाईफ़ किंग साईज़- जीवन के हर पल का आनंद लें।बस यहीं जौहर ने एक बखेड़ा खड़ा किया, हालाँकि बाद में उन्होंने अपनी गलती क़ुबूल की| उन्होंने कहा,  इस बार मेले में उतनी ‘दुकानें’ नहीं आयीं, जितनी कि आती रही हैं। ख़ैर...कभी-कभी ‘दुकानदारों’ की कुछ अन्य व्यस्तताएँ भी हो जाती हैं, संतुलन तो बनाना ही पड़ता है। राजेश उत्साही भाषा के संयम के प्रबल पक्षधर हैं, उन्होंने टोका, माफ करें जितेन्‍द्र जी, यहां जो लोग विमर्श कर रहे हैं वे 'दुकानदार' नहीं हैं। दुकानदार शब्‍द इस्‍तेमाल करके आप औरों के साथ-साथ अपना भी अपमान कर रहे हैं। आप जानते हैं दुकान में सामान बेचा जाता है। यहां कोई अपनी टिप्‍पणी बेचने नहीं आता है। तिलक जी ने मेले की बात की है। वह एक उत्‍सव की बात है। उसे आपको उसी संदर्भ में समझना चाहिए। जितेन्द्र ने गलती मानी, मैंने जानबूझकर हँसी-मज़ाक की मनःस्थिति में ‘दुकान/ दुकानदार’ शब्दों का प्रयोग किया है। आपकी बात पूरी तरह सही है। चूँकि डॉ.कपूर साहब मज़ाक में आ गये थे, सो मेरा भी मूड कर बन गया| उत्साही ने सचेत किया, कृपया साखी के इस मंच को मजाक और चुहल का मंच न बनाएं तो बेहतर होगा। यह एक सामूहिक विमर्श का मंच है। उन्होंने भाषा और बोली पर भी अपना मंतव्य  साफ़ किया, अब यह मान्यता पुरानी पड़ चुकी है कि भाषा और बोली अलग-अलग होती है या कि भाषा का व्या‍करण होता है और बोली का नहीं होता। मसला केवल लिपि का है। जिसकी लिपि है, उसे आप भाषा कहने लगते हैं। 

राजेश जी ने गजलों पर अपनी बात रखी, इसमें कोई शक नहीं है कि मनोज की ग़ज़लें उनके नाम के अनुरूप पढ़ने वाले को भावुक कर देती हैं पर मनोज मुझे दुविधाग्रस्त लगते हैं।  उनकी पहली ग़ज़ल केवल सवाल पूछती है, वह कोई उत्तर नहीं देती और न ही उत्तंर खोजने के लिए उकसाती है। दूसरी गजल में वे विरोधाभासी बातें कहते हैं। पहले यह शेर देखिए-
पता ई बा कि महल ना टिके कबो अइसन
तबो त रेत प बुनियाद लोग धर जाला और अब इसे पढ़ें- अगर जो दिल में लगन, चाह आ भरोसा बा
कसम से चाँद भी अँगना में तब उतर जाला
तीसरी ग़ज़ल में भी यही समस्या लगती है। पहले चार शेरों से बात जिस सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ती है, वह अचानक ही पांचवे शेर में आकर बिखर जाती है। शायर गहरे अवसाद में भर जाता है। और फिर छठें  शेर में वह अचानक अपने पुराने रूप में लौट आता है।चौथी ग़ज़ल में ऐसा लगता है कि मनोज अपने को दुहरा रहे हैं। पांचवी ग़ज़ल में वे जिंदगी के फलसफे की बात करते नजर आए लेकिन छठवीं गजल फिर एक बार निराशा में ले गई। तिलकराज जी ने राजेश को स्पष्ट करने के कोशिश की, ग़ज़ल में हर शेर का स्‍वतंत्र अस्‍तित्‍व होता है, एक पूर्ण कविता की तरह लेकिन हिन्‍दी काव्‍य प्रस्‍तुति में विषय निरंतरता की प्रथा के कारण ग़ज़ल में दृष्टिकोण बदलने की आवश्‍यकता पर ध्‍यान नहीं जाता है। यह स्थिति ग़ज़ल कहने वाले के लिये भी होती है| ग़ज़ल की मूल प्रकृति के अनुसार मनोज भाई ने अगर एक ही ग़ज़ल के अलग-अलग अशआर में विरोधाभासी बातें कही भी हैं तो वह अनुमन्य  है। पर तुरंत ही उन्होंने अपने विचार संशोधित किये, किसी भी रचनाधर्मी की रचनाओं में उसकी सोच स्‍पष्‍टत: दिखनी चाहिये। यहॉं सोच की मौलिकता का भी प्रश्‍न है, मौलिक सोच की दिशा एक सी ही रहेगी, अलग-अलग सोच दिखने से आभासित होता है कि बहुत सी जगह से पढ़ा हुआ मसाला रचनाधर्मी ने अपने शब्‍दों में प्रस्‍तुत कर दिया है। बाद में जितेन्द्र जौहर ने गजल के शेरों में अलग-अलग भाव पूर्णता के साथ प्रकट होने की सार्थकता को विस्तार से समझाया। 
 सलिल जी की पीड़ा फिर उभरी, हम बिहारी तो वैसे भी मूढ़ता के पर्याय माने जाते रहे हैं,  इसलिए मुझे अगर किसी ने मूढ़ कह दिया होता तो मुझे न ऐतराज़ होता, न ताज्जुब. लेकिन मेरे लपेटे में इब्ने इंशाँ जैसे अज़ीम शायर को कमअक़्ल कह दिया जाना नाक़ाबिले-बर्दाश्त है| अफ़सोस रहा कि मेरी वज़ह से उस महान शायर की तौहीन हुई| राजेश ने स्पष्ट किया, सलिल भाई की टिप्‍पणी को समझने के लिए आपको मेरे ब्‍लाग गुलमोहर पर आना पडे़गा। गुलमोहर पर जाकर आप भी चर्चा की लिंग-चर्चा का आनंद उठा सकते हैं| यह पुल्लिंग है या स्त्रीलिंग? भाई यह उभयलिंग है| उर्दू में पुल्लिंग और हिन्दी में स्त्रीलिंग| सलिल जी कौन कहता है कि आप मूढ़ हैं या बिहारी मूढ़ होते हैं? बुद्धि तो बिहार के दामन में ही कैद है भाई मेरे| जितेन्द्र की बात सुनें, राजकुमार सिद्धार्थ ने ’मूढ़ता’ की उसी धरती पर ’बोध’ पाया था| इसी धरती का  ’नालंदा विश्वविद्यालय’ दुनिया को रोशनी बाँटता था। सलिल द्रवित हो गये, भावुक हूँ इसलिए संयम न रख पाया, व्यथित था इसलिए असंदर्भ लिख गया| मनोज भावुक जी से क्षमा प्रार्थी हूँ कि मेरी बातों से दिशा भटक गई| 
 
जाने-माने शायर प्राण शर्मा जी और डा त्रिमोहन तरल भी आये| प्राण जी ने सारी गजलें पढ़ी   और जितेन्द्र जौहर की समीक्षा की तारीफ़ की| अच्छी और मर्मस्पर्शी गजलों के लिए उन्होंने मनोज भावुक को बधाई दी| साथ ही साथ यह भी कहा कि गजल का हर एक शेर स्वतंत्र होता है| गजल में एक शेर विरह पर भी कहा जा सकता है और दूसरा शेर संयोग पर भी| विभिन्न भावों से पिरोई होती है गजल की मालातरल जी ने कहा, किसी बागीचे की बगल से गुज़रते हुए कोई खुशगवार गंध नासिका-द्वार से होती हुई जब मन के भीतर अपना स्थान बना लेती है तो मन का स्वामी ये नहीं पूछता कि जिन फूलों से ये गंध आ रही है, उनका नाम क्या है। युवा रचनाकार मनोज भावुक की गज़लें गज़लियत की कसौटी पर कितनी खरी उतरतीं हैं, यह तो ग़ज़ल के तमाम बड़े उस्ताद ही जानें, लेकिन इतना कहना चाहता हूँ की मैंने भोजपुरी में गज़लें पहली बार पढ़ीं हैं और कई दूसरे लोगों की तरह ही मैं भी भोजपुरी नहीं जानता। बावजूद इसके इन्हें पढ़कर  तबियत प्रसन्न हो गयी। 
अबकी दियरी के परब अइसे मनावल जाए
मन के आँगन में एगो दीप जरावल जाए
रौशनी गाँव में, दिल्ली से ले आवल जाए
कैद सूरज के अब आजाद करावल जाए
हिन्दू, मुस्लिम ना, ईसाई ना, सिक्ख ई भाई
अपना औलाद के इन्सान बनावल जाए
ऐसे अशआर किसी भी भाषा में लिखे हुए हो सकते हैं। फर्क इससे नहीं पड़ता। फर्क इससे पड़ता है कि वे सीधे दिल में उतर रहे है या नहीं। मनोज भाई के शेर सीधे दिल में उतरकर अपनी गुणवत्ता सिद्ध कर रहे हैं।
कवि सुरेश यादव ने कहा कि मनोज भावुक की गज़लें पहली बार पढ़ने का अवसर मिला| भोजपुरी मुझे नहीं आती लेकिन इन ग़ज़लों का भावनात्मक बहाव ऐसा कि भाषा की दीवार महसूस ही नहीं होती है| संवेदना की दृष्टि से इन ग़ज़लों में आधुनिकता की आवाज़ है और मानवता की धड़कन है जो माटी की सोंधी गंध लिए है| बहस में शिरकत करके उत्साह बढ़ाने वालों में अरविन्द मिश्र, वेद व्यथित, दिगम्बर नासवा, स्वप्निल कुमार आतिश, राजेन्द्र स्वर्णकार और अविनाश वाचस्पति महत्वपूर्ण रहे। 
मनोज भावुक ने विनम्रतापूर्वक सभी सवालों के जवाब दिए|  भावुक ने कहा, बड़े भाई डा. सुभाष राय ने मुझे अपने दिल में और साखी पर जगह दी, मै उनका शुक्रगुजार हूँ|. साखी पर आना गर्व की बात है| मनोज ने साफ किया कि  'बेहया' शब्‍द में दरअसल टंकण त्रुटि है| भोजपुरी में यह शब्द ' बेहाया' होता है| शेर कुछ यूं है -
जमीर चीख के सौ बार रोके-टोकेला
तबो त मन ई बेहाया गुनाह कर जाला  भोजपुरी में हम नुक्ता  नहीं लगाते, इसलिए यह राज ही है, जिसका अर्थ है रहस्य| मेरी गजलों में जहाँ कहीं भी नुक़्ता लगा है, वह टंकण त्रुटि है| ऐसा किसने कहा कि 'वा' का इस्तेमाल कर के इनका भोजपुरीकरण कर लिया जाता है? जब हम भोजपुरी नाटक में किसी अनपढ़ आदमी के लिए संवाद लिखते हैं तो ऎसी भाषा का प्रयोग करते हैं | गजल और गीतों की भाषा अलग होती है| गजल में हम आदमी को अदमी और प्रेम को परेम नहीं लिखते| माधव मधुकर जी की वह गजल मै पढ़ना चाहूंगा| कृपया उस गजल को साखी पर प्रकाशित करें| सर्वत जी ने मुझे भोजपुरी का 'दुष्यंत' सम्बोधित किया है, शुक्रिया, भगवान करें ऐसा हो| सलिल जी  ये भोजपुरी गजलें हीं है|  मै भोजपुरी में ही सोचता हूँ| भोजपुरी मेरी मातृभाषा है | उर्दू या अंग्रेजी के कुछ शब्द आ जाने से ये गजलें उस भाषा की नहीं हो जातीं| मेरा मानना है भाषा की समृद्धि  के लिए रचनाओं में अन्य भाषाओं के उन शब्दों का प्रयोग होना चाहिए, जो भोजपुरी में रच-बस गये हैं| डूबियो शब्द सही है और भोजपुरी में डूबियो हीं लिखा जाता है| हम आदमी को आदमी हीं लिखते हैं अदमी नहीं| मै फिर कह रहा हूँ कि मै अभी गजल का विद्यार्थी हूँ| आप सबने जो रास्ता दिखाया है, उस पर चलने की कोशिश करूंगा| जो त्रुटियाँ रह गयीं हैं,उनको ठीक करूंगा| एक भोजपुरी गजल-संग्रह प्रकाशित है ' तस्वीर जिन्दगी के' उसका लिंक दे रहा हूँ, ताकि आप भोजपुरी गजलों का आस्वादन कर  सकें...
http://www.manojbhawuk.com/old/jindgi6.htm            
शनिवार को नीरज गोस्वामी की गजलें -------------------------------------------

18 टिप्‍पणियां:

  1. रोचक आलेख लग रहा है..बुकमार्क कर लिया है...फिर आते हैं पढ़ने.

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  2. डॉ. सुभाष राय जी, इसे कहते हैं हॉलमार्क... एक बार ठप्पा लग गया साखी का और हो गई आपकी विवेचना तो लगता है कि रचना पर खरा होने की मुहर लग गई. यह गुरुवार का दिन वास्तव में आप जैसे गुरू जन के कारण ही याद रखता हूँ मैं. हम सभी तो अपनी अपनी टिप्पणी देकर निकल जाते हैं. लेकिन उसको समेटना और एक सम्पूर्ण समीक्षा का चोला पहनाना कितना दुरूह काम है, यह गुरूजन ही अनुभव कर सकते हैं. यह आपने अच्छा किया कि इसके लिए गुरूवार का दिन चुना. हमारे लिए तो यह दिन स्वनामधन्य दिवस हो गया.
    आपकी आज की चर्चा बहुत अच्छी रही (देखिए मैंने आपका और रहा शब्द नहीं प्रयोग किया है). मुझे किसी ने मेरे ब्लॉग लेखन के आरम्भिक काल में यह सलाह दी थी कि सलिल यहाँ टिप्पणी देते समय कभी जजमेंटल मत होना. बस तब से गाँठ बाँधे बैठा हूँ उस बात को. किसी ने कहा कि अमुक शब्द स्त्रीलिंग है और जब दूसरा उसके पुल्लिंग होने का प्रमाण दे रहा हो तो जजमेंटल होकर कभी नहीं कहना चाहिए कि दूसरा ग़लत है. आपने कितनी आसानी से कह दिया कि यह उभयलिंग है, बात ख़तम. मैं पहले भी उस शब्द को स्त्रीलिंग रूप में प्रयोग करता था, भविष्य में भी करता रहूँगा, पर जजमेंटल तो मैं साखी पर समीक्षा करते हुए भी नहीं होता.

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  3. एक और महत्वपूर्ण बात जो यहाँ देखने में अती है वो है शालीनता. यहाँ, प्राण साहब, तिलक राज साहब, सर्वत भाई, उत्साही जी, संजीवगौतम, जितेंद्र जौहर आदि जैसे लोग शिरकत कर रहे हैं. हर ग़ज़ल पर हमारे मतभेद होते रहते हैं,किंतु कभी कोई भी शालीनता की सीमा के बाहर नहीं गया. बलिक इतना सम्मान दिया मुझ जैसे व्यक्ति को भी कि मैंने अपनी टिप्पणियों को स्तरीय बनाने की चेष्टा प्रारम्भ कर दी ताकि उनका मान रहे. किसी की कोई भी टिप्पणि देखकर उससे मताइक्य न होना स्वाभाविक है, किंतुइसका अर्थ यह नहीं कि दूसरा जजमेण्टल होकर यह कहे कि आप अहमक़ हैं, किसी विद्वान से विमर्श करें, आपको शब्दकोष देखना चाहिए. हँसी तब आई जब मैंने सोचा कि इब्ने इंशा पंजाब के शायर थे और उनको नकारने वाली अज़ीम शख्सियत ही उसी सूबे से ताल्लुक रखती हैं.
    ख़ैर डॉक्टर साहब आभारी हूँ कि आपने इस विषय को भी छुआ जो संदर्भ से बाहर था. आगामी अंक तो मेरे प्रिय शायर का है. देखता हूँ लिखना सम्भव हो पाता है कि नहीं! धन्यवाद!!

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  4. मुझे इस बार लगा कि कुछ लोग शालीनता की सीमा का उल्लंघन करने से भी नहीं चूके. साहित्य में इस क़िस्म के लोगों की घुसपैठ हमेशा से रही से रही है लेकिन पहले वे अपनी सीमा से बाहर आने का दुस्साहस नहीं करते थे. अब, यहां 'साखी' पर जो भाषा और मिज़ाज देखने में आए, उन से साहित्य चर्चा का आनंद तो समाप्त हुआ ही, भविष्य के खतरे भी नज़र आने लगे हैं. मैं पहले सहमत नहीं था लेकिन अब टिप्पडियों पर माडरेशन की खातिर अनुरोध करता हूं.

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  5. डा. सुभाष जी बहुत कष्टसाध्य कर ्रहे हैं आप।बहुत कुछ सीखने को मिलता है यहाँ। मैं भावुक जी की गज़लें भाषा के कारण समझ नही पाई इस लिये मेरा कुछ भी कहना मुनासिब नही था। अक़पने बहुत अच्छी समीक्षा की है धन्यवाद।

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  6. यहां पर तो शानदार विमर्श चल रहा है...हम भी आते रहेंगें.

    __________________________
    "शब्द-शिखर' पर जयंती पर दुर्गा भाभी का पुनीत स्मरण...

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  7. साखी पर ग़ज़ल के साथ-साथ भाषा पर हुए विमर्श से हम लाभान्वित हुए हैं । भाषा, बोली, उपबोली में अंतर स्पष्ट हुए हैं । ब्लागजगत में इस प्रकार के सार्थक विमर्श होते रहें तो भाषा के प्रति जागरुकता निश्चित रूप से बढ़ेगी । आपके समीक्षा करने के ढ़ँग से हम बहुत प्रभावित हैं । एक सही समीक्षा वही होती है...जो रचना के सभी पहलुओं या कहें कि अधिकतम पहलुओं का स्पर्श कर सके । मेरे देखे साखी न केवल प्रतिष्ठित लेखकों का ही मंच है बल्कि नव-सिखियों के लिए भी यहाँ बहुत कुछ सिखने को है । कविता या ग़ज़ल के भाव यहाँ बखूबी समझे और समझाए जाते हैं । साखी से ब्लाग जगत की सार्थकता सिद्ध होती है ।

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  8. baap re bhashai badlaw par itna chintan ho gaya .... manoj bhavuk ko padhte waqt itna socha nahi tha maine ...lekin haan ...bhojpuri ke liye inka yogdaan bahut shaandaar hai ....aap logon ne jo vivechna kee hai usse mujhe seekhne ko bahut kuch mila hai ... bahut bahut shukriya

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  9. भाषा, बोली और ग़ज़ल की विधा पर सार्थक चर्चा पढ़कर आनंद आया। लग रहा है कि अब ब्लॉग जगत भाषा और साहित्य की गंभीर चर्चा के प्रति सजग हो रहा है...यह अच्छा संकेत है।

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  10. Pran jee apana aasheervaad banaye rakhiye. Akaanksha jee swaagat hai, jaror aaiye. main chahata hoon ki sakhi par jyaada se jyaada log aayen, naye log ayen, taaki baatcheet men vividhata aur gambheerata paida ho, aap sab ke gyaan ka sab log labh utha saken.

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  11. भाई जितेन्द्र जौहर वाक़ई मेरी ग़ज़लों में गहराई तक उतरे हैं। उनकी गहन अंतर्दृष्टिपूर्ण समीक्षात्मक टिप्पणियाँ इस बात की गवाह हैं। मैं श्री राजेश उत्साही जी द्वारा उठाए गए सवालात पर कई बातें रखना चाहता था ...लेकिन मेरी तमाम व्यस्तताएँ लगातार बाधा बनती रहीं। आज थोड़ा समय निकालकर प्रस्तुत हुआ हूँ। उन्होंने मेरी ग़ज़ल-२ के जिन दो शेरों को एक ही ग़ज़ल में रखने के हिसाब से ‘अनफ़िट’ करार दिया है, वह बात वाज़िब नही है। बेहतर होता कि वे इस बावत ठोस तर्क भी देते। उस तार्किक स्थिति में मुझे उत्साही जी की बात पर विचार करने का एक मजबूत आधार मिलता। मैं ग़ज़ल के बारे में मैं अब तक जितना समझ सका हूँ, उसके अनुसार ग़ज़ल का हर शेर अपने आपमें स्वतंत्र होता है। जहाँ तक विरोधाभास की बात है, अव्वल तो मेरी उस ग़ज़ल में कोई विरोधाभास नहीं है, दोयम...यदि होता भी, तो पूछना चाहूँगा कि कोई भी ग़ज़लकार विरोधाभास से कहाँ तक बच सकता है। जीवन स्वयं दो विरोधी शक्तियों (दिन-रात, सुख-दुःख, धूप-छाँव,आदि) के बीच पलता है, और ग़ज़ल जीवन के बीच पलती है। निरंतर दो विरोधी शक्तियों को एक-साथ लेकर चलने वाले जीवन में पलने वाली ग़ज़ल विरोधाभासों से मुक्त कैसे रह सकती है ?

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  12. कभी कभी मूढ़ बन जाने का आनंद भी ले लेना चाहिये।
    मैनें एक मूढ़ की तरह ही कहा था कि 'मुझसे त्रुटि हुई 'राज' को भेद के रूप में पढ़ने की| मैंने दूसरी पंक्ति का आशय यह लिया था कि 'जि़दगी क्‍या है, यह भेद समझ नहीं आता है'। जबकि अब इसका आशय मुझे समझ आया कि 'जिन्‍दगी क्‍या है; इस प्रश्‍न को ये शासन हल ही नहीं करता है'।
    मैं अपेक्षा कर रहा था कि इसमें छुपी बात पर किसी का ध्‍यान जायेगा लेकिन नहीं गया, मुझे भी लगा कि इस विषय को यहीं समाप्‍त करना अच्‍छा रहेगा; क्‍योंकि 'राज़' की जगह 'भेद' का उपयोग कर सरलता से निराकरण हो रहा है।
    भोजपुरी में जिस तरह नुक्‍ता हटाकर शब्‍द लेने की व्‍यवस्‍था है उसमें कोई दोष नहीं है लेकिन राज़ को राज कर लेने में भारी दोष है और यह दोष लैक्सिकोग्राफ़ी के नियमों के कारण पैदा होता है। लैक्‍सोग्राफि़क नियमों के अनुसार यदि किसी अन्‍य भाषा से कोई शब्‍द आयातित होता है तो यह देखना आवश्‍यक होता है कि आयातित शब्‍द जिस रूप में लिया जा रहा है उस रूप में इस भाषा में कोई ऐसा शब्‍द पूर्व से तो नहीं है जिसका कोई अन्‍य अर्थ होता हो; जैसा कि राज़ को राज के रूप में लेने से हो रहा है। राज भोजपुरी में पूर्व से उपलब्‍ध शब्‍द है और उसका अर्थ शासन है। ऐसी स्थिति में राज़ अगर भोजपुरी में आयेगा तो राज़ के रूप में ही आयेगा अन्‍यथा वर्जित है।
    इस सबसे ग़ज़ल में कोई अंतर नहीं पड़ रहा है लेकिन मेरा सोचना है कि बात निकली है तो मनोज को इसका समुचित निराकरण कर लेना चाहिये।

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  13. जौहर जी कि मेरे सवालों को इतनी गंभीरता से मत लीजिए कि नामचीन शायरों की ग़ज़लों से आप शेर छांटने बैठ जाएं। अगर गंभीरता से सोचना ही है तो इन बातों पर सोचिए आप भी,मनोज जी भी और साखी पर आने वाले तमाम साथी।

    पहली बात,
    कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनके जवाब सवाल उठाने वाले को देने की जरूरत नहीं होती है,बल्कि खुद को देने की जरूरत होती है। यानी उन सवालों के परिप्रेक्ष्य में आत्मावलोकन करने की दरकार होती है।

    दूसरी बात,
    तय करें कि आप पहले क्या हैं रचनाकार या किसी खास विधा के लेखक यानी गीतकार,ग़ज़लकार आदि आदि। अगर आप पहले ग़ज़लकार हैं तो मंच,मुशायरों,गोष्ठियों में अपनी ग़ज़लें तरन्नुम में गा-सुनाकर खुश रहिए। क्योंकि हो सकता है वही आपका उद्देश्य हो। और अगर पहले रचनाकार हैं तो सोचिए कि क्यों लिखते हैं और किसके लिए लिखते हैं। अगर खुद को खुश करने के लिए लिख रहे हैं तो लिखते रहिए, कोई कुछ नहीं कहेगा।

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  14. तीसरी बात,
    यह बात सच है और सच के अलावा और कुछ नहीं कि ग़ज़ल का हर शेर स्वतंत्र होता है पर यह भी उतना ही सच है कि हर शेर ग़ज़ल नहीं होता। कुछ शेर होते हैं जिनसे ग़ज़ल बनती है। पर सभी विद्वानों से मैं यह निवेदन भी करना चाहता हूं कि हम एक ही लकीर को क्यों पीटते रहें। क्या कुछ नई परम्पराएं नए सोच विकसित नहीं करें, अपने लेखन में। यहां विद्वानों ने कहा कि आपको एक रसता ढूंढनी है तो गीत में जाइए, कविता में जाइए। क्षमा करें,यह सामाजिक सरोकार रखने वाले रचनाकार का बयान नहीं हो सकता। पाठक रचना को नहीं ढूंढता है, रचना को अपने पाठक ढूंढने पड़ते हैं। नए दौर के जिस शायर को सबसे ज्यादा पढ़ा जाता है उसकी शायरी देखिए। उसने कितने प्रतिमान तोड़े हैं और कितने नए रचे हैं। मैं दुष्यंत की बात कर रहा हूं।

    चौथी बात,
    मनोज जी मैंने एक ग़ज़ल में दो शेरों के फिट न बैठने की बात कही है, वह किसी शिल्पंविधान की दृष्टि से नहीं कही है। वह कही है ग़ज़ल के मिजाज की दृष्टि से। जब ग़ज़ल की शुरुआत आपने एक मिजाज से की है तो उसे अचानक दूसरे मिजाज में ले जाना, ग़ज़ल में की जा रही बात के महत्व को कम कर रहा है। नामचीन शायरों की भी वे ही ग़ज़लें आम आदमी की जुबान पर होती हैं जो उसके मिजाज को भाती हैं। बाकी सब दफन रहती हैं, किताबों या कैसेटों में।

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  15. पांचवी बात,
    कोई भी समीक्षा किसी के सापेक्ष होती है। मेरे लिए वह समाज और पाठक के सापेक्ष है। आप अकादमिक रूप से हर शेर को तौलकर देखते रहिए। मेरे लिए वह प्राथमिक महत्व का नहीं है। मेरे लिए महत्व है उसमें कहा क्या गया है।

    छठवीं बात,
    जौहर जी जो कुछ मैं कह रहा हूं कतई जरूरी नहीं है कि आप या मनोज जी या कोई भी और उससे सहमत हो। आप असहमत हैं तो बनें रहिए। आखिर ग़ज़लें आपकी हैं,समीक्षा या प्रतिक्रिया मेरी है।

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