अभियान के साथी

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

प्राण शर्मा की गजलें

कवेंट्री, यू.के निवासी प्राण शर्मा वजीराबाद (पाकिस्तान) में १३ जून १९३७ को जन्मे। प्राथमिक शिक्षा दिल्ली में हुई, पंजाब विश्वविद्यालय से एम. ए., बी.एड. किया। छोटी आयु से ही लेखन कार्य आरम्भ कर दिया था| मुंबई में फिल्मी दुनिया का भी तजुर्बा कर चुके हैं| १९५५ से उच्चकोटि की ग़ज़ल और कवितायें लिखते रहे हैं। वे १९६५ से यू.के. में प्रवास कर रहे हैं। यू.के. से निकलने वाली हिन्दी की एकमात्र पत्रिका ‘पुरवाई’ के ‘खेल निराले हैं दुनिया में’ स्थाई-स्तम्भ के लेखक हैं। आपकी रचनाएँ युवा अवस्था से ही पंजाब के दैनिक पत्र, ‘वीर अर्जुन’ एवं ‘हिन्दी मिलाप’, ज्ञानपीठ की पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ जैसी अनेक उच्चकोटि की पत्रिकाओं और अंतरजाल पर प्रकाशित होती रही हैं। वे देश-विदेश के कवि सम्मेलनों, मुशायरों तथा आकाशवाणी कार्यक्रमों में भी भाग ले चुके हैं। ग़ज़ल कहता हूँ , सुराही (मुक्तक-संग्रह) प्रकाशित पुस्तकें हैं। .‘अभिव्यक्ति’ में प्रकाशित ‘उर्दू ग़ज़ल बनाम हिंदी ग़ज़ल’ और साहित्य शिल्पी पर ‘ग़ज़ल: शिल्प और संरचना’ के १० लेख हिंदी और उर्दू ग़ज़ल लिखने वालों के लिए नायाब हीरे हैं। १९६१ में भाषा विभाग, पटियाला द्वारा आयोजित टैगोर निबंध प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार. १९८२ में कादम्बिनी द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कहानी प्रतियोगिता में सांत्वना पुरस्कार. १९८६ में ईस्ट मिडलैंड आर्ट्स, लेस्टर द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार। २००६ में हिन्दी समिति, लन्दन द्वारा सम्मानित।

                              1.
खुशबुओं को मेरे घर   में छोड़  जाना आपका
कितना अच्छा लगता है हर रोज़ आना आपका

जब से जाना, काम है मुझको बनाना  आपका
चल न पाया कोई भी तब से  बहाना  आपका

आते भी हैं आप तो बस मुँह दिखाने के  लिए
कब तलक  यूँ  ही  चलेगा  दिल दुखाना आपका 

क्यों न भाये  हर किसी को  मुस्कराहट  आपकी
एक  बच्चे  की तरह  है  मुस्कराना  आपका

मान लेता हूँ चलो मैं बात हर इक आपकी
कुछ अजब सा लगता है सौगंध खाना आपका

क्यों न लाता मँहगे- मँहगे तोहफे मैं परदेस से
वरना  पड़ता देखना फिर मुँह फुलाना आपका

बरसों ही हमने बिताये हैं दो यारो की तरह
" प्राण " मुमकिन ही नहीं अब तो भुलाना आपका
  
                       2.
होते ही प्रात:काल  आ जाती हैं तितलियाँ
मधुवन में खूब धूम  मचाती हैं तितलियाँ

फूलों से खेलती हैं कभी पत्तियों के  संग
कैसा अनोखा खेल दिखाती हैं तितलियाँ

बच्चे, जवान, बूढ़े नहीं थकते देखकर
किस सादगी के साथ लुभाती हैं तितलियाँ

सुन्दरता की ये  देवियाँ परियों से कम नहीं
मधुवन में स्वर्गलोक रचाती हैं तितलियाँ

उड़ती हैं किस कमाल से फूलों के आर-पार
दीवाना हर किसी को बनाती हैं तितलियाँ 

वैसा कहाँ  है जादू परिंदों का राम जी 
हर ओर जैसा जादू जगाती हैं तितलियाँ 

उनके ही दम से " प्राण " हैं फूलों की रौनकें 
फूलों को चार  चाँद लगाती हैं तितलियाँ 
                
प्रख्यात चित्रकार अनिमेष की रचना 


                                               ३.
सो रहा था चैन से मैं फुरसतों के शहर में 
जब जगा तो खुद को पाया हादसों के शहर में 

फासले तो फासले हैं दो किनारों की तरह 
फासले मिटते कहाँ हैं फासलों के शहर में 

दोस्तों का दोस्त है तो दोस्त बन कर ही तू रह 
दुश्मनों की कब चली है दोस्तों के शहर में 

थक गये  हैं आप तो आराम कर लीजै मगर 
काम क्या है पस्तियों का हौसलों के शहर में 

मिल नहीं पाया कोई सोने का घर तो क्या हुआ 
पत्थरों का घर सही अब पत्थरों के शहर में 

हर किसी में होती हैं कुछ प्यारी-प्यारी चाहतें 
क्यों न डूबे आदमी इन खुशबुओं के शहर में 

धरती-अम्बर,  चाँद-तारे, फूल-खुशबू, रात-दिन 
कैसा-कैसा रंग है इन बन्धनों के शहर में 

                             ४.
नफरत का भूत नित मेरे सर पर सवार है 
क्या हर कोई ए दोस्तो इसका शिकार है

दिल भी हो उसका वैसा ज़रूरी तो ये नहीं
चेहरे पे जिसके माना कि दिलकश निखार है

पूछो कभी तो दोस्तो उनके दिलों का हाल
जिनके सरों पे कर्जे की तीखी कटार है

धरती हो, चाँद हो या सितारे हों या हवा
हमको तो इस जहान की हर शै से प्यार है

आराम उनको क्या नहीं कुछ वक़्त के लिए
हमला दुखों का राम जी क्यों बार -बार है

जीते हैं  हम भी आस में हर कामयाबी की
हमको भी हर खुशी का सदा इंतज़ार है

ए  "प्राण"  देख- सुन के भला हर्ष क्यों न हो
हर बच्चा आजकल बड़ा ही होशियार है
                     




3 Crackston Close,
Coventry, CV2 5EB, UK
pransharma@talktalk.net   

68 टिप्‍पणियां:

  1. प्राण जी को पढ़ना हमेशा सुखद अनुभव होता है. आज भी आनन्द आ गया. आपका बहुत आभार.


    मान लेता हूँ चलो मैं बात हर इक आपकी
    कुछ अजब सा लगता है सौगंध खाना आपका


    -वाह!!

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  2. तितलियों सा हो जाए इंसान
    नफरत का मिट जाएगा कब्रिस्‍तान
    हादसों से फासला बढ़ जाएगा
    इंसानियत धर्म दिलों में रंग लाएगा
    फिर तितली की तरह इंसान
    पेड़ों की तरह इंसान
    खुशबू नई निराली महकाएगा
    प्राण बसी गजलें,नाम को चरितार्थ करती हैं।

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  3. प्राण जी शब्दों के भावानुकूल चयन औए प्रवाह से रचना को जीवंत करने की कला में निष्णात हैं. उनकी रचनाओं की हर पंक्ति पाठकों के मनोजगत के द्वार खटखटाती प्रतीत होती है. इन रचनाओं के लिये प्राण जी तथा इनकी प्रस्तुति हेतु संचालक को साधुवाद.

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  4. प्राण जी को पढने की सुखानुभूति सदैव हुई है...आज भी मन प्रसन्न हुआ है...
    हृदय से धन्यवाद...

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  5. जब कोई ग़ज़ल अच्‍छी लगती है तो मैं, निपट अज्ञानी, लपक लेता हूँ एक तरही के लिये और आज चार तरही का मसाला मुझे मिल गया है। प्राण सा‍हब मेरी इस आदत से परिचित हैं। और कुछ कहने के लिये नहीं, सिवाय इसके कि:

    मार डालेगा हमें यूँ दिल लुभाना आपका
    कनखियों से देखना और मुस्‍कराना आपका।

    देखो तो क्‍या छटायें दिखाती हैं तितलियॉं
    धरती पे धनुष इंद्र का लाती हैं ति‍तलियॉं।

    रोज मिलना, मुस्‍कराना और खो जाना कहीं
    रेलगाड़ी से चले हम पटरियों के शहर में।

    हमने तो मित्रता का बढ़ाया था हाथ पर
    तुमने ये क्‍या किया कि हृदय तार-तार है।

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  6. PRAN JI KI GHAZALE DE KAR AAPNE AUR BEHATAR KAAM KIYA. UNKO PARH KAR AANAND HI AATA HAI. HAR SHER KAAPNA RANG HAI. UNKE KAHAN KA APNA DHANG HAI. VEDESH MEY RAH KAR BHI APNI BHASHAA KI SEVA KAR RAHE HAI, ISE MAIN AUR BADEE BAAT MANATAA HOO. EK-EK SHER PAR BAAT HO SAKTI HAI. MAGAR FILHAAL ITANA HI. IS VISHVAAS KE SATH KI PRAN JI ISI TARAH SAKRIY RAHE.

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  7. क्यों न भाये हर किसी को मुस्कराहट आपकी
    एक बच्चे की तरह है मुस्कराना आपका
    ***
    वैसा कहाँ है जादू परिंदों का राम जी
    हर ओर जैसा जादू जगाती हैं तितलियाँ
    ***
    दोस्तों का दोस्त है तो दोस्त बन कर ही तू रह
    दुश्मनों की कब चली है दोस्तों के शहर में
    ***
    पूछो कभी तो दोस्तो उनके दिलों का हाल
    जिनके सरों पे कर्जे की तीखी कटार है

    ज़बान की सादगी और भावनाओं का प्रवाह प्राण साहब की ग़ज़लों को एक अलग मुकाम देता है...उनकी ग़ज़लों की अपनी एक पहचान है...भीड़ में वो सबसे अलग खड़े नज़र आते हैं...क्या कमाल का लेखन है...
    जिंदगी की तल्खियाँ खुशियाँ दुश्वारियां मसअले निहायत ख़ूबसूरती से प्राण साहब अपनी ग़ज़लों में पिरोते हैं...उनका हर अशआर हमें जीना सिखाता है...
    उन्हें पढ़ने की चाह कभी खतम नहीं होती...

    नीरज

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  8. Salil jee mujhse umr mein chhote hain lekin unko
    aur unkee lekhni ko main naman kartaa hoon.unke
    vidwataapoorn shabdon se main sadaa gauravanvit
    mahsoos kartaa hoon. Tilak Raj jee kee kya baat
    hai ! unke is matle - " maar daalegaa hamen yun
    dil lubhanaa aapka , kankhiyon se dekhna aur
    muskrana aapka " ne to meraa dil hee loot liya
    hai.meree gazal ke saare sher unke is anupam
    sher par qurbaan.Avinash Vachaspati jee kavita
    aesee tippani kar jaate hain jo padhte hee bantee hai.Sameer jee kee khoobee hai ki unke
    munh se hamesha " Wah " hee nikalta hai . Unke
    is shabd ko choomne ko jee karta hai .Girish
    pankaj aur Neeraj Goswami donon mein khoobiyan hee khoobiyan hain.Tippani karne mein ve shabdon kee kanjoosee nahin karte hain . Donon
    hee umdaa kavi hain . Shesh sabhee tippani -
    karon kaa main hriday se aabhaaree hoon .Unke
    pyar kaa aadar kartaa hoon main.

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  9. सुब्‍ह तो ब्‍लॉग पर अवकाश-प्रभाव की टिप्‍पणी दे गया। अब कुछ कहने आया हूँ।
    गुणीजनों से जितना सीखा उससे मैनें ग़ज़ल की चार आधार आवश्‍यकतायें पहचानी हैं जो इस प्रकार हैं:
    तखय्युल, तग़ज्‍़जुल, तवज्‍़ज़ुन, तगय्युल
    ग़ज़ल तेरे आधार हैं चार जाने।
    प्राण साहब की ग़ज़लों में कुछ विशेषतायें उनकी ग़ज़लों से परिचित सभी ग़ज़लप्रेमियों ने पायी होंगी, जिनमें से एक यह है कि अगर कोई उर्दू शब्‍द आता भी है तो वह ऐसा होता है जो बोलचाल की हिन्‍दी में रच बस गया हो। सीधी सच्‍ची सी बातें सीधे सच्‍चे शब्‍दों में, शब्‍दाडम्‍बर रहित।
    चारों ग़ज़ल पर कुछ कहने के लिये तो बहुत समय चाहिये; बस चौथी ग़ज़ल से एक शेर ले रहा हूँ (कोई विशेष कारण नहीं)।
    नफरत का भूत नित मेरे सर पर सवार है
    क्या हर कोई ए दोस्तो इसका शिकार है
    में से पहले सिर्फ पहली पंक्ति देखें, अब पहली पंक्ति पढ़कर शाइर जब ठहरता है तो मजबूर करता है दूसरी पंक्ति की प्रतीक्षा के लिये और दूसरी पंक्ति में जब शाइर कहता है कि 'क्या हर कोई ए दोस्तो इसका ' तो सुनने वाला बेसाख्‍ता बोल उठता है 'शिकार है'। ग़ज़ल को जानने वाले जानते हैं कि यही है जो एक पुष्‍ट शेर की पहचान होती है।
    अब इसी शेर पर फिर से गौर फरमायें, शाइर के पास एक सवालाना खयाल है जो वह आपके सामने रखकर आपसे ही सवाल पूछकर आपको सोचने के लिये मजबूर कर रहा है। 'ग़ज़ल' काव्‍य का एक रूप होते हुए भी कुछ विशेष तत्‍वों के आधार पर ही ग़ज़ल कहलाती है।
    इतनी सी बात ध्‍यान में रखकर इस ग़ज़ल के बाकी अशआर को देखें। बाकी ग़ज़लों के अशआर भी देखें, कहीं सवाल तो कहीं दृष्‍यानुभूति की अभिव्‍यक्ति।
    खुशबुओं को मेरे घर में छोड़ जाना आपका
    कितना अच्छा लगता है हर रोज़ आना आपका
    का भीना भीना प्रभाव जो आनंद दे रहा है वह अनुभव की बात है।
    जब से जाना, काम है मुझको बनाना आपका
    चल न पाया कोई भी तब से बहाना आपका
    और इससे अगले शेर में छुपा हुआ आग्रह, अनुग्रह, निवेदन क्‍या क्‍या नहीं है।
    क्यों न भाये हर किसी को मुस्कराहट आपकी
    एक बच्चे की तरह है मुस्कराना आपका
    में एक बच्‍चे की मुस्‍कुराहट का प्रतीक लेकर आनंदानुभूति।
    संभव हुआ तो शेष फिर....

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  10. पता नहीं क्यों मेरे ब्लॉग फीड पर अपडेट नहीं मिल पा रहा है, लेकिन साखी का आज का अंक मेरे लिए सुखद ही नहीं एक पाठ्यक्रम का दर्ज़ा रखने वाला होगा.
    बिना मेरे कुछ कहे प्राण साहब ने कह दिया कि सलिल जी मुझसे उम्र में छोटे हैं, लेकिन उनको और उनकी लेखनी को मैं नमन करता हूँ. उनके विद्वतापूर्ण शब्दों से मैं सदा गौरवांवित महसूस करता हूँ. अपने चरण स्पर्श की अनुमति दें. मै सचमुच इस योग्य नहीं. क्योंकि मैं स्वयम् की भी समीक्षा करता हूँ तो पाता हूँ कि मेरी योग्यता इन शब्दों से कहीं छोटी है.
    सुभाष जी, मिलता हूँ एक ब्रेक के बाद!!अपनी (कान को हाथ लगाते हुए) टिप्पणियों के साथ!!

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  11. अदरणीय प्राण भाई साहिब की गज़लों पर कुछ कहूँ ? मगर कैसे कहूँ? मुझे तो अभी गज़ल की ए बी सी भा नही आती। चारों गज़लें एक से बढ कर एक हैं कुछ अशार तो कमाल के हैं पहली गज़ल का मतला और ये शेर
    क्यों न भाये----
    चलो मैं मान लेता हूँ
    वाह लाजवाब। दूसरी गज़ल से
    उडती हैं किस---
    वैसा जादू ----
    तीसरी गज़ल
    फासले तो फासल----
    मिल नही पाया---
    कमाल के शेर हैं
    और चौथी गज़ल तो पूरी की पूरी कोट कर दूँ तो भी कह न पाऊऊगी जो इसकी शान मे कहना चाहती हूंम्\ बहुत सुन्दर गज़लें हैं भाई साहिब को बधाई आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

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  12. शुक्रिया,आज लगता है नायाब खजाना हाथ लग गया है। हर ग़ज़ल बेहतरीन है प्राण जी किस की तारीफ़ में क्या कहें?

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  13. samajik srokaron se judi rchnayen hee rchna dhrmita kee ksauti hain pran ji ki rchnao me is ka sundr nirvhn hai
    bdhai deta hoon

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  14. आपकी ग़ज़ल हमेशा की तरह ही लाज़वाब है. किसी एक शेर या किसी एक ग़ज़ल के बारे में कुछ भी कहना नाइंसाफी होगी. एक बात कहाँ चाहूंगी की इतनी सरल और सीधी भाषा में ग़ज़ल कम ही पढ़ी है

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  15. सबसे पहले तो मैं साखी को गौरवान्वित करने के लिए परम श्रद्धेय प्रान सर को प्रणाम करता हूं।
    अब तक जितनी बातें आदरणीय प्रान जी, अषोक रावत जी, सर्वत जमाल जी, चन्द्रभान भारद्वाज जी, तिलकराज कपूर जी, सलिल जी और जिस-जिसने भी ग़ज़ल के ढांचे उसकी आत्मा आदि के बारे मे कहीं उन सबके साथ अगर उदाहरण अगर किसी को समझने हों तो साखी पर आदरणीय ओमप्रकाष नदीम जी, अशोक रावत जी और परमआदरणीय प्रान सर की ग़ज़लें गौर से पढ़ें। सारे भ्रम और असुलझे सवालों के उत्तर मिल जायेंगे।
    आदरणीय तिलकराजकपूर जी ने प्रान सर के एक शेर ‘नफरत का भूत‘ में शिकार शब्द को लेकर जो कहा है उसे मैं एक और शब्द देता हूं- जहां शाइर पाठक की सोच से आगे जाकर अपनी बात कहता है वहां उत्पन्न होता है, ‘अर्थ का विस्फोट‘ यही ग़ज़लपन है। यही ग़ज़ल की कहन है। यह अर्थ का विस्फोट रचना में जहां-जहां होगा वहीं-वहीं कविता होगी। यही वो बात है जो साधना से आती है।
    एक बार फिर से प्रान सर को प्रणाम।

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  16. डा. सुभाष राय जी को धन्यवाद कहना चाहूंगी
    जो उन्होंने अपने ब्लॉग पर, सुघड़ साज सज्जा के साथ
    बेहतरीन गज़लकार हमारे आदरणीय प्रान साहब की बेमिसाल,
    मन को एक नया आकाश देती रचनाओं को प्रस्तुत किया
    और हमे प्रान साहब के नफीस अंदाज से मुख़्तसर होने का सुअवसर दिया -
    क्या खूब कहते हैं
    हमारे बड़े भाई साहब ,
    जब् भी कोइ बात कहते हैं,
    हम सुनते ही रह जाते हैं
    हर बात जो वह हमसे कहते हैं
    सादर, स स्नेह,
    - लावण्या

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  17. खुशबुओं को मेरे घर में छोड़ जाना आपका
    कितना अच्छा लगता है हर रोज़ आना आपका

    सुभाष जी का यह ब्लॉग हिंदी शायरी का बहुत ही लोकप्रिय मंच बन गया है. इसकी खुशबू चारो ओर फैल रही है.चित्र अच्छा लगाया है आपने.प्राण शर्मा जी को बधाई.

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  18. बेहतरीन ग़ज़लें हैं प्राण साहब की .
    क्यों न भाये हर किसी को मुस्कराहट आपकी
    एक बच्चे की तरह है मुस्कराना आपका

    वाह बहुत खूब.

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  19. एकः
    एक मासूम सी गज़ल, बच्चों की मुस्कुराहट की मानिन्द. एक रूमानी एहसास बिखेरता, शुरू से अख़ीर तक. “जब से जाना काम है मुझको बनाना आपका” में मुझको बनाना लफ्ज़ का इस्तेमाल मुस्कुराने पर मजबूर कर देता है. यह मुहावरा रोज़मर्रा की बोलचाल में बहुत इस्तेमाल होता है, और इसको इस क़दर ख़ूबसूरती से पिरोया है प्राण साहब ने कि इस शेर की मासूमियत पर हँसी आ जाती है. वैसे ही अचानक जब मुलाक़ात होती है एक और लफ्ज़ से “सौगंध खाना” से तो चौंक जाता है हर कोई.
    पूरी ग़ज़ल में मुझे चोट पहुचाया इस शेर नेः
    क्यों न लाता मँहगे- मँहगे तोहफे मैं परदेस से
    वरना पड़ता देखना फिर मुँह फुलाना आपका.

    यहाँ पर महँगे महँगे तोहफों की बात सारे जज़्बात को हल्का कर जाती है. जितनी मासूमियत से बाकी के अशार मोहब्बत बयान करते हैं, उनसे लगता है कि वो शख्स तो बस मुस्कुराहट या किसी भी तोहफे से बहल जाने वाला शख्स है, फिर महँगे तोहफों की बात अखरती है.

    दोः
    पूरी की पूरी ग़ज़ल किसी फुलवारी में बैठकर कही गई है और इसे (प्राण साहब से क्षमा याचना सहित) तो मैं नर्सरी राईम कहना चाहूँगा. बच्चों सी ग़ज़ल और तितलियों जैसी ख़ूबसूरत शै के बारे में.
    यहाँ भी दो बातों का ज़िक्र लाज़िमी है. मतले और चौथे शेर में कुछ खटक रहा है. दूसरी बात बात, पाँचवें शेर में फूलों के आर पार तितलियों का उड़ना अखरता है. फूलों के दर्मियान उड़ना तो सुना था पर आर पार नहीं सुना.

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  20. तीनः
    पूरी की पूरी ग़ज़ल एक साँस में पढी जाने वाली, मक्ते से मतले तक बाँध कर रखती है और इतना कसाव कि काँटे की टक्कर लेते हैं हरेक लफ्ज़ एक दूसरे से, मजाल नहीं कि चींटी भी गुज़र जाए दर्मियान से. मुशायरे में क़ाबिले दाद ग़ज़ल. प्राण साहब के क़द के मुताबिक़.

    चारः
    एक तंज़िया मिजाज़ (या कहें कि मौजूदा हालात पर रोशनी डालती) की ग़ज़ल, तंज़ आज के माहौल पर, जहाँ नफ़रत का भूत सबके सिर पर सवार है, चेहरा दिल का आईना नहीं, कर्ज़ के तले दबा इंसान, दुःखी और खुशी का इंतज़ार करते लोग. मक़्ते पर इंतिहाँ कर दी है शायर ने, जब यह कह दिया कि बच्चा इस दौर का होशियार है. हालाँकि शायर ने इसे बाइसे खुशी (हर्ष का विषय) माना है, लेकिन मुझे यह मानी समझ में आया कि बच्चे से उसका बचपन छिन गया है और वह तितलियों से खेलने और उनके पीछे भागने की उम्र में होशियार हो गया है. क्योंकि मेरा दिल आज भी यही कहता है कि सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी.
    .
    प्राण साहब की ग़ज़लें एक ऐसा सफर हैं, जिसमें वक़्त का पता नहीं चलता और सफर कट जाता है.वे अपने आप में एक ईदारा हैं, उनका इल्म हमारे लिए पूजनीय है. उम्र के इस पड़ाव पे उनके अशार अभी भी जवान नज़र आते हैं. उनकी ग़ज़लों पर बस इतना ही कहने को रह जाता है किः
    क्यों न मैं नित ही करूँ तारीफ़ उसकी
    इल्म में वो आदमी मुझसे बड़ा है.

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  21. प्राण साहब की ग़ज़लें आज पहली बार पढ़ी । ग़ज़ल से मेरा परिचय तो हाल ही में हुआ है , तिलक राज कपूर जी की मेहरबानी से ।
    चारों ग़ज़लें पढ़कर आज जाना कि ग़ज़ल क्या होती है ।
    तिलक जी की विस्तृत टिपण्णी पढ़कर ज्ञान में थोडा और वर्धन भी हुआ ।
    आभार प्राण साहब का , इस नायाब भेंट के लिए ।

    उत्तर देंहटाएं
  22. क्षमा चाहूँगा बिहारी ब्‍लॉगर साहब से पूर्व परिचय नहीं रहा,लेकिन खूब टिप्‍पणी करते हैं और सार्थक चर्चा करते हैं यह बात अच्‍छी लगी। समीक्षा करने में तो उनके लिये कह सकता हूँ कि:
    मेरा तो सर भी वहॉं तक नहीं पहुँच पाता
    जहॉं कदम के निशॉं आप छोड़ आये हैं।
    प्राण साहब को जब से मैं पढ़ रहा हूँ यही विशेषता देखी है इनके लेखन में; कभी निहायत निजि पलों में ले जाते हैं कभी लगता है कि किसी बच्‍चे के साथ बैठे बतिया रहे हैं यह परस्‍पर (one to one) संवाद की स्थिति एक विचित्र प्रभाव पैदा करती है। बस वैसी ही स्थिति का दर्शन 'क्‍यों न लाता ......मुँह फुलाना आपका' में हो रहा है। एक वास्‍तविक स्थिति का यथावत चित्रण। हर शेर स्‍वतंत्र कविता होने के कारण व्‍यक्ति चरित्र बदलना आपत्तिजनक तो नहीं। होता यह है कि हिन्‍दी साहित्‍य में पूरी रचना एक सोच विशेष से बॉंध कर देखने की प्रथा है और वही दृष्टिकोण ग़ज़ल में भी कायम रहता है।

    फुल के आर-पार ति‍तलियों का उड़ना तो व्‍यवहारिक नहीं लेकिन बगीचे में बैठकर फूलों की चादर के आर-पार उड़ने की कल्‍पना करें तो इस शेर की कोमलता का आनंद ही कुछ और है। फूल की जगह फूलों कहने का यही कारण स्‍पष्‍ट होता है।

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  23. मैं मानता हूं कि साखी मेरा ब्लाग है। यद्यपि इसकी मूल सामग्री में कुछ भी जोड़ने या घटाने का मेरे पास कोई अधिकार नहीं है।

    मैं किसी की भी रचनाओं पर अपनी बात निम्न आधारों पर करता हूं- सामयिकता,वैचारिक प्रतिबद्धता, समकालीन सामाजिक सरोकार और शिल्प। मेरे लिए पहली तीन बातें कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। लेकिन मुश्किल यह भी है कि जब मैं पहली तीन बातें किसी रचना में पाता हूं तो चौथी कसौटी अनायास ही ज्यादा मुखर होने लगती है। क्योंकि अगर आप अपने शिल्प के प्रति सतर्क न हों तो उन तीनों बातों का होना भी बेकार चला जाता है। दूसरी तरफ केवल चौथी बात का होना कोई मतलब नहीं रखता। यह वैसा ही जैसे अतीव सुंदर सुराही में रखा पानी अगर आपकी प्यास नहीं बुझा पाए तो उसका सुंदर होना किस काम का। पर इसका उल्टा भी है जो सुराही प्यास बुझाने में सक्षम हो, हो सकता है अपने अनगढ़पन के कारण वह गुणग्राहक की नजर में ही न आए।

    जब पहली तीन बातों पर मैं रचना को कसता हूं रचना के साथ-साथ वह मेरे लिए उस रचनाकार की समीक्षा भी होती है।

    मेरी यह भी मान्यता है साखी जैसे सार्वजनिक मंच पर कुछ कहने की सार्थकता तभी है जब आप औरों ने क्या् कहा,उसको भी ध्यान में रखें। अगर यह नहीं होगा तो सब अपनी अपनी बात कहकर चलें जाएंगे। उस पर कोई विमर्श नहीं होगा।

    तो कृपया मेरी बात को इस परिप्रेक्ष्य में देखें। जारी....

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  24. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  25. प्राण जी को मैं ब्लाग के माध्यम से ही जानता हूं। मेरी कुछ ग़ज़लनुमा रचनाएं ग़ज़ल के नाम से अविनाश जी के ब्लाग नुक्कड़ पर प्रकाशित हुईं थीं, प्राण जी ने उसके शिल्प को लेकर वैसी ही तल्ख टिप्पणी की थी,जैसी कि यहां हम लोग आजकल कर रहे हैं। मैंने तुरंत अपनी वे रचनाएं मेल के जरिए प्राण जी को भेजीं थीं। मैंने कहा था कि मैं ग़ज़ल के व्याकरण से बहुत परिचित नहीं हूं,समझना चाहता हूं। कुछ किताबें भी जमा की हैं,पर उनसे कुछ समझ नहीं आया। मुझे बहुत मदद मिलेगी आप कुछ मार्गदर्शन करें। मैं नहीं जानता था कि प्राण जी भारत में नहीं हैं। मुझे उनका कोई प्रतिउत्ततर नहीं मिला। बात आई गई होगी। जब साखी पर मेरी कविताएं प्रकाशित हुईं,तो उन पर प्राण जी ने बहुत उत्साणहवर्धक प्रतिक्रिया दर्ज की। मैं आभारी हूं।

    धीरे-धीरे मुझे यह समझ आया कि वे अपनी जगह सही हैं। तब से मैं अपनी रचनाओं को ग़ज़ल कहने से बचता रहा हूं। और केवल इतना ही नहीं किसी और की ग़ज़ल के शिल्प पर कहने से बचता ही नहीं, कुछ नहीं कहता क्यों कि वह समझ अभी हासिल नहीं कर पाया हूं। हालांकि यहां उनके परिचय से यह जानकारी मिली है कि ग़ज़ल के शिल्‍पविधान को लेकर साहित्‍य शिल्‍पी पर उनके दस लेख हैं। निसंदेह वे मेरे लिए उपयोगी होंगे।

    पर पहली तीन बातें मेरे लिए ग़ज़ल के संदर्भ में भी लागू होती हैं। इसलिए उन पर तो कहता ही हूं,कहना चाहूंगा और कहता रहूंगा। जारी....

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  26. तो प्राण जी की ग़जलों पर बयान यह है-

    पहली बात,
    कि उनकी इन ग़ज़लों में वैश्विक मानवीय संवदेनाएं और चिंताएं मुखरता के साथ मौजूद हैं। यह मुखरता सहज और सरल है। उनकी प्रवासी कलम से कर्जे की बात पढ़कर अपने ऊपर वर्ल्‍ड बैंक के भारी भरकम कर्जे की याद हो आती है। शहरीकरण के ऐब उनकी ग़ज़ल में दिख रहे हैं।

    दूसरी बात,
    उनकी ग़ज़लों में प्रकृति अपने सौदंर्य के साथ मौजूद है। ति‍‍तलियों का फूलों के आरपार जाना मुझे तो सहज लगा।

    तीसरी बात,
    मेरी मान्यता में कोई भी रचना वय की सीमाओं में बंधी नहीं होती है। इसलिए उनकी ग़ज़ल में जो रोमानियत नजर आती है वह इस बात की परिचायक है कि वे मन से अब भी युवा हैं। बहुत संभव है उनकी यह ग़ज़ल उनकी युवावस्था की हो। पर जब वे आज भी इन्हें हमारे सामने प्रतिनिधि ग़ज़ल रूप में रखते हैं,तो यह मेरी बात का प्रमाण है। पर हां मुझे भी लगता है कि मंहगे तोहफों की बात कुछ हल्कापन लाती है।

    चौथी बात,
    चूंकि वे लगभग पचास साल से भारत से बाहर रह रहे हैं,इसलिए मैं उनकी ग़ज़लों में कम से कम समकालीन भारत की चिंताओं और सामाजिक सरोकारों को खोजने का प्रयास नहीं कर रहा हूं। प्राण जी भी क्षमा करें,अगर वे अपने रचनाकर्म में इस बात का ध्यान रखते भी हैं, तो वह इनमें परि‍लक्षित नहीं हो रहा है। हां होशियार होते जिन बच्चों को देखकर वे हर्षित हैं संभवत: वह उनके अपने परिवेश की बात है। कम से कम हम तो अपने परिवेश के बच्चों को देखकर एक पल के लिए हर्षित होते हैं और अगले ही पल उसके अंजाम से कांप उठते हैं।

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  27. मेरी पसंद के तीन शेर...

    खुशबुओं को मेरे घर में छोड़ जाना आपका
    कितना अच्छा लगता है हर रोज़ आना आपका
    **
    दिल भी हो उसका वैसा ज़रूरी तो ये नहीं
    चेहरे पे जिसके माना कि दिलकश निखार है
    **
    हर किसी में होती हैं कुछ प्यारी-प्यारी चाहतें
    क्यों न डूबे आदमी इन खुशबुओं के शहर में

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  28. ख़ूबसूरत गज़लें...शुक्रिया

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  29. होशयार शब्‍द जैसा कि सभी जानते हैं अनेकार्थक है-बुद्धिमान, अक्‍लमंद, चतुर, सचेत, दक्ष, कुशल, जागरूक और माहिर जैसे धनात्‍मक अर्थ लिये हुए, वहीं इसके ऋणात्‍मक अर्थ भी हैं चालाक, छली, ठग। इसमें भी कोई विवाद नहीं कि अनेकार्थक होने के कारण इसका अर्थ संदर्भ से जोड़कर ही देखा जा सकता है अन्‍यथा अर्थ का अनर्थ हो जायेगा। हमारे दिमाग़ में बैठे गीत 'सब कुछ सीखा हमने ...' में एक भोले-भाले इंसान की व्‍यथा जुडुी है होशयारी से जबकि यहॉं शेर का संदर्भ अलग है जिसमें प्राण जी की उम्र में बैठा शायर अपने ज़माने के बच्‍चे को सरल और भोला-भाला मानते हुए भी मानता है कि उस दौर में भी बच्‍चे को होशयार होना चाहिये था जैसा कि आज का बच्‍चा है और उसी पृष्‍ठभूमि में आज के बच्‍चे के प्रति प्रसन्‍नता व्‍यक्‍त कर रहा है। यह तो सहज स्‍वीकार्य स्थिति है; पुरानी पीढ़ी के लोग आज भी कहते हैं कि 'जब से होश सम्‍हाला'। हम सभी जानते हैं कि आज का बच्‍चा पहले की तुलना में जल्‍दी होश सम्‍हालता है, कारण भी हैं इसके, लेकिन हर व्‍यक्ति चाहता तो यही है कि उसके बच्‍चे होशयार हों।
    हमारे देश के परिवेश संदर्भ में 'होशयार' बच्‍चे के प्रति उत्‍साही जी की चिंता सहज और सम्‍माननीय है। हॉं यह जरूर है कि हमारे बच्‍चे इतने होशयार हो गये हैं कि हमारे बिना भी अपना रास्‍ता बना लेंगे।
    गिरेंगे, उठेंगे, फिर आगे बढ़ेंगे,
    हमारे बिना भी ये जीवन जियेंगे।

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  30. प्राण शर्मा जी की गज़लें बहुत उम्दा शाइरी का बेहतरीन नमूना हैं ,इसमें कोई संदेह नहीं |सहजता इन ग़ज़लों का सौन्दर्य है ,जैसे नदी का सौन्दर्य पानी के आवेग से बनता है |,भावनाओं और विचारों का ऐसा ही आवेग इन ग़ज़लों में है ,जिसके लिए शर्मा जी बधाई के पात्र हैं | तिलकराज कपूर और राजेश उत्साही जी ने बहुत गहरे जाकर इन की जो पड़ताल की है ,वह सभी पाठकों के लिए और सभी रचनाकारों के लिए महत्वपूर्ण है |धन्यवाद |

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  31. संजीव गौतम जी ने एक बहुत अच्‍छी बात कही ग़ज़लियत के प्रस्‍फुटन की। काफि़या स्‍तर पर सामान्‍यतय: दो स्थिति हो सकती हैं एक तो यह कि वहॉं एक अनपेक्षित काफि़या निकले और शेर का अर्थ एकाएक प्रकट हो और श्रोता वाह-वाह कह उठे, दूसरी यह कि काफि़या श्रोता के मुख से निकले। पहली स्थिति बहुत कठिन होती है हॉं ग़ज़लियत के लिये इतना जरूरी है पहली पंक्ति से श्रोता काफि़या का अनुमान न लगा पाये और दूसरी पंक्ति में भी काफि़या से जितनी दूरी हो उतनी ही दूरी काफि़या का अनुमान लगाने से हो, इतना भी कर लिया तो काफ़ी होगा।
    उदाहरण के लिये एक पंक्ति लें:
    किसी की याद में जीना किसे कहते हैं क्‍या जानूँ

    अब अगर इससे संगत कोई रदीफ़ काफि़या दें तो दूसरी पंक्ति के कुछ संगत उदाहरण शायद मैं दे पाऊँ। लेकिन कुछ मुक्‍त उदाहरण मैं नीचे दे रहा हूँ:
    तेरी तस्‍वीर ऑंखों में भरे ऑंसू से धोता हूँ।
    (यहॉं दो अर्थ निकल रहे हैं, तस्‍वीर को ऑंखों में भरकर, ऑंसू से धोना और दूसरा तस्‍वीर को ऑंखों में भरे हुए ऑंसू से धोना)

    इसकी जगह
    तेरी तस्‍वीर ऑंखों में भरे पलकें भिगोता हूँ।
    भी हो सकता है, दोनों पंक्तियों में 'भरे' शब्‍द तक वाक्‍य रचना एकसी है और फिर बात बढ़ लेती है काफि़या की तरफ़।

    रदीफ़ काफि़या के चयन के आधार पर अन्‍य विकल्‍प ये भी हो सकते थे:
    खयालों में हो किसके ग़ुम, अभी ये कह गया कोई।
    मुझे हर शाम मेरे घर कोई पहुँचाने आता है।
    तेरी तस्‍वीर से दिन रात मैं तो बात करता हूँ।
    सुब्‍ह से शाम तक मैं तो तुम्‍हारी बात करता हूँ।
    तुझे मैं भूल जाऊँ, कोशिशें दिन रात करता हूँ।
    मुझे कब होश है इसका कि जिन्‍दा हूँ या मुर्दा हूँ।

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  32. -१-
    खुशबुओं को मेरे घर में छोड़ जाना आपका
    कितना अच्छा लगता है हर रोज़ आना आपका
    -२-
    क्यों न भाये हर किसी को मुस्कराहट आपकी
    एक बच्चे की तरह है मुस्कराना आपका
    -३-
    दिल भी हो उसका वैसा ज़रूरी तो ये नहीं
    चेहरे पे जिसके माना कि दिलकश निखार है

    आद. श्री प्राण जी,
    उपर्युक्त तीनों शे’र सीधे दिल में उतर गये! शे’र -२ में कितनी सरलता से आपने ’मासूमियत-भरी मुस्कान में सहज आकर्षण’ का संदेश संप्रेषित कर दिया!

    शे’र-३ मुझे अंग्रेज़ी का वह कथन याद दिला गया कि- "People having beautiful faces don't have, necessarily, a beautiful heart." यक़ीनन बहुत प्रभावित किया मुझे आपकी ग़ज़लों ने! बधाई!

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  33. इस बार रचनाएं अच्छी आयीं तो बातें भी अच्छी-अच्छी हो रहीं हैं। रिश्तों की डोर मजबूत से मजबूत होती जा रही है। आज तक आलोचनात्मक कविता पाठ की चैपाल ज्यादा दिनों तक कभी चली नहीं है। ये चुनौती है हर एक कवि और कविता के पाठक के लिए। जो भी दिल से मनुष्य है, संवेदना से युक्त है और मन-प्राण से इस कायनात की खूबसूरती को बचे हुए देखना चाहता है। उसे अपनी पूरी सामथ्र्य से इसे बचाने के लिए अपना योगदान देना होगा। ये क्रम कभी टूटे नहीं, चेहरे बेशक बदल जायें उत्तरदायित्व में परिवर्तन नहीं होना चाहिए, क्योंकि ये सिलसिला अगर टूटा तो बहुत कुछ टूटेगा। हम सब समय के संक्रमण काल में जी रहे है। बेषक हम आजाद हैं लेकिन परिदृश्य गुलामी से भी ज्यादा बदतर। सच बोलने की तो बात दूर मुंह खोलने तक पर पाबन्दी लगाने के लिए सत्ता अपनी समूची ताकत के साथ तत्पर है। मैं कम्यूनिस्ट नहीं लेकिन ये खतरा पूरी शिद्दत से महसूस करता हूं कि एक दिन पूंजीवाद भी बेहतर सिद्ध नहीं होगा। क्योंकि बुराई किसी विचार में नहीं बल्कि उसे क्रियान्वित करने वाले दिमागों में है। कुछ लोग अभी तक जंगल के कानून की मानसिकता से उबर नहीं पाये हैं। अकेले में अपने-अपने नाखूनों का नुकीलापन परखते रहते हैं और मौका मिलने पर उसके प्रयोग से चूकते नहीं हैं। मैं अक्सर सोचता हूं कि पहले असुर थे जो अपनी जमीन के लिए देवों से एक लम्बे समय तक लड़ते रहे, लेकिन उन्हें अपनी हुकूमत स्थापित करने के लिए जरा सी जमीन नहीं मिल सकी। वो लड़ाई यानि देवासुर संग्राम आज तक जारी है। आतंकवाद और क्या है ?

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  34. वही विचारधारा न ? आतंकवादी क्या चाहते हैं अपना एक मुल्क जहां से वे इस दुनिया को मुट्ठी में करने का अभियान चला सके। ‘वयम रक्षाम्‘ की संस्कृति का प्रसार कर सकें। मैं ये सब कहकर अपनी निराशा जाहिर नहीं कह रहा हूं, न हम जैसों की ताकत को कम करके आंक रहा हूं। मुझ इस बात में विश्वास है कि ढेर सारे अंधेरे को भगाने के लिए एक छोटा सा दीपक जलाना ही काफी होता है, मैं तो यहां बातचीत को एक और दिषा की ओर ले जाना चाहता हूं। छन्द, व्याकरण आदि तो प्रारम्भिक उपकरण हैं उनको तो खैर होना ही चाहिए लेकिन आगे की वस्तु तो वही है न कि हमारे द्वारा रचित पंक्तियों हमें कितना संस्कारित कर रहीं हैं। हमारे पूर्वजों द्वारा हमें विरासत में जो चेतना का परिष्कृत रूप मिला है, उसमें कितनी श्रीवृद्धि कर रहीं हैं। राजेश जी ने सही कहा है। वास्तव में कला कला के लिए वाला समीक्षा का उपकरण पुराना ही नहीं अतिपुराना हो गया है। उससे काम नहीं चलने वाला। वो तो जैसे जब छोटा बच्चा पढ़ाई शुरू करता है तो उसे साल दो साल वर्णमाला सिखाई जाती है। फिर कुछ वर्श भाषा का व्याकरण भी सिखाया जाता है लेकिन बाद में तो यही देखा जाता है न कि वह लिख क्या रहा है। ये हमारा सौभाग्य है कि हमारे बीच आदरणीय प्रान जी, ओमप्रकाश नदीम जी, अशोक रावत जी, सरवत जमाल जी, तिलकराज जी, चन्द्रभान जी, सलिल जी, सुभाष जी, राजेश जी जैसे महामन् मौजूद हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि हम अपने मकसद में अवश्य ही सफल होंगे.....................

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  35. यह इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे
    इक आग का दरिया है और डूब के जाना है
    प्राण जी की रचनाओं पर कुछ कहने से पहले और अब भी, यह शेर बार-बार दिमाग में कौंध रहा है. इतने बड़े मनीषी की रचनाओं पर मैं कुछ कहूं, छोटा मुंह बड़ी बात का मुहावरा नजर के सामने है. १९५५, वह साल है जब प्राण जी ने लेखन आरम्भ किया था और प्रार्थी का तो जन्म भी नहीं हुआ था. ५४ वर्षों की साधना ने तो प्राण जी को उस बुलंदी पर पहुंचा दिया है जहां वह सिर्फ बोलें तो भी शेर ही फूटें. अब ऐसे व्यक्तित्व के आगे जबान खोलना शायद हिमाकत ही कहा जाएगा.
    फिर भी, कुछ कहने की हिम्मत कर रहा हूँ. प्राण जी की ये ४ रचनाएँ उनके शायर का पूरा व्यक्तित्व नहीं हैं. मुझे नहीं लगता कि ranking की दृष्टि से ये ४ गजलें अव्वल नम्बर की हकदार हैं लेकिन इनकी सरलता, भाव सम्प्रेषणता और शायरी के सभी 'लवाजमात' से लैस होने की सच्चाई से इंकार करना तो सूरज को चराग दिखाने वाला मामला है.

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  36. ... सीधी-सादी, आम बोलचाल की भाषा में लोगों से गुफ्तगू करती गजलें, शाहकार भले न हों, गजलें तो हैं ही और आम आदमी की पसंद भी. परदेस से मंहगे तोहफे लाने वाला शेर उस तल्ख हकीकत की अक्कासी है जो परदेस में ज़िन्दगी गुज़ारने वाला ही महसूस कर सकता है.
    प्राण जी के डिक्शन में एक जगह मैं सहमत नहीं हो पाया- उन्होंने तितलियाँ का जो उच्चारण इस्तेमाल किया है, मुझे ठीक नहीं लगा. titliyaan को (ति तलियां) पढ़ते समय मुझे, मुआफ करें, बहुत कोफ़्त हुई.
    खैर, यह तो बहर की मजबूरी थी और कुछ 'हिंदी' की छूट. इस छूट से हम में से शायद ही कोई बचा हो.
    मैं अभी तक बीमारी से संघर्षरत हूँ. प्राण जी पर कुछ कहने का मोह भी रोक नहीं सका. चश्मा चढ़ा कर आई फ्लू को धोखा देने की नाकाम कोशिश कर ही डाली.

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  37. आदरणीय प्राण शर्मा जी को पढ़ते समय लगता है जैसे एक ऐसे व्यक्तित्व की रचना पढ़ रहे हैं, जिनका मन एकदम कोमल निश्छल अबोध बालक सा है और अनुभव कई सदियों की सहेजी हुई ...

    मन एक अभूतपूर्व आनंद और पवित्रता से भर जाया करता है,इनकी रचनाओं के पठन से...

    एकसाथ इतनी सुन्दर रचनाएं पढवाने के लिए बहुत बहुत आभार !!!!

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  38. क्यों न भाये हर किसी को मुस्कराहट आपकी
    एक बच्चे की तरह है मुस्कराना आपका


    सो रहा था चैन से मैं फुरसतों के शहर में
    जब जगा तो खुद को पाया हादसों के शहर में

    सुभाष जी
    प्राण साब !
    सादर प्रणाम !
    मेरी पसंद के do sher आप कि nazar kiye है .
    आप कि गज़ले अच्छी लगी . कि ग़ज़लों में लग भाग हिदी का ही प्रयोग हुआ है यानी हिंदी ग़ज़ल अगर कही कही ''meetar '' ''बहर'' या वजन में फर्क नहीं आता तो शायद वहा हिंदी ही प्रयोग करते तो और अच्छा लगता , फिर भीसुंदर है .
    साधुवाद !

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  39. भाई सर्वत जी " तितलियाँ " शब्द को पढ़ कर आपको कोफ़्त हुई , मुझे अच्छा नहीं लगा है. बदली , झलकी , हस्ती , सिसकी आदि शब्दों का बहुवचन में उच्चारण बद + लियाँ , झल + कियाँ , हस + तियाँ , सिस + कियाँ होता है . इसी तरह तितली शब्द का बहुवचन में
    उच्चारण तित + लियाँ है और मैंने इसका प्रयोग इसी रूप में किया है. कृपया ध्यान से पढ़िए , यह कोफ़्त - वोफ्त को जाने दीजिये .

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  40. किसी भी कविता पर बात करते समय शिल्प और कथ्य की अलग- अलग बात नहीं की जा सकती. दोनों के समन्वया से हीकविता का स्वरूप तय होता है. लेकिन कभी जब ऐसा होता है कि शिल्प में कोई कमी नहीं होती और कथ्य में कोईमन की बात नहीं होती तो बात करने में मुश्किल तो होती है. श्री प्राण शर्मा जी की ग़ज़लें एक नज़रमें ठीक लगती हेंलेकिन कथ्यअच्छा होते हुए भी बांधता नहीं है. उनकी सादगी की तारीफ करनी होगी. यह मेरी पसंद का मामला है तथा मेंयहाँ उनकी रचनाओं की साहित्यिक विवेचना नहीं कर रहा हूँ. वैसे भी इसकी कोई ज़रूरत नहीं है. ज़िंदगी मेरे लिएकभी इतनी आसान नहीं रही कि नज़र तितलियों पर ठहर पाती.
    चलती रहती है हरदम इक आँधी सी
    एक ही मौसम मेरे भीतर रहता है.

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  41. मेरा तो सर भी वहॉं तक नहीं पहुँच पाता
    जहॉं कदम के निशॉं आप छोड़ आये हैं।

    Is kathan se main bilkul shamilrai hoon shri Tilak Raj ji se. Ghazal ka safar to bahut hi taveel hai, jitna aage badein manzil utni door lagti hai. Haan is raah mein anek ghazalkar hai jinki rachnaon se hamein safar mein bahut sahayat milti hai sameekshatmak tippinion se, shabdon ke rakh-rakhav ke bare mein..shabdon ke istemaal karne aur n karne ke beech ki uljhnon ke baare mein..
    Bawajood in sab baaton ke Shri Pran sharma ji ki ghazalon mein ek tazagi hai, soch ki udaan bhi paridon ke par karti hai kahin kahin jab unki kalam aaj , kal aur aane wale kal ke navneetam bimb kheechne mein kamyaaba hoti hai..

    सो रहा था चैन से मैं फुरसतों के शहर में
    जब जगा तो खुद को पाया हादसों के शहर में

    mujhe bhi yahi kahna hai

    चैन लूटा इस ग़ज़ल ने, लिखते लिखते सो गई
    जागी तब जब शेर गरजे काग़ज़ों के शहर में

    उत्तर देंहटाएं
  42. @ प्राण जी, मैं क्षमा चाहता हूं, असल में कुछ तबीयत की खराबी, कुछ आंख की लाचारी, कुछ काम का बोझ और सबसे बढ कर आपकी गज़लों पर कुछ कहने का मोह,इन सभी ने मेरी बुद्धि भ्रष्ट कर दी और इत्नी बडी गलती हो गई. क्षमा एक बार फिर. छोटा हून और यह काम तो उद्दंड्ता ही माना जाएगा. मैं सभी से क्षमाप्रार्थी हूं.
    उम्मीद रखूं प्राण जी, आप क्षमा प्र्दान करेंगे.

    उत्तर देंहटाएं
  43. मैं अपनी ग़ज़लों पर सभी टिप्पणियों का आदर करता हूँ . सभी गुणीजन मेरे लिए
    माननीय हैं . मैं तो एक बच्चे की सीख का भी मान करता हूँ . मेरी ग़ज़लों में दो -
    तीन ऐसे शब्द आयें हैं जो मेरे अनुभव पर आधारित हैं . कभी रघुपति सहाय फ़िराक
    गोरखपुरी ने कहा था कि ग़ज़लों में प्रकृति गायब है . मेरे मन - मस्तिष्क में यह बात
    बैठ गयी . मैंने कुछेक ग़ज़लें बदलियाँ , पंछी , मातृभूमि , तितलियाँ आदि पर कह दीं .
    " तितलियाँ " ग़ज़ल के जन्म की बात करता हूँ . शैख्सपीयर के जन्मस्थान स्ट्रेट अपोन
    ऐवोन में एक तितली घर है . निहायत खूबसूरत . किस्म - किस्म की सैंकड़ों ही तितलियाँ
    हैं उसमें . उनका फूलों के आसपास , बीच में और आर - पार उड़ना देखकर मुझे एक
    फ़िल्मी गीत याद आ गया -
    तितली उडी
    उड़ जो चली
    फूल ने कहा
    आजा मेरे पास
    तितली कहे
    मैं चली उस पार
    घर आया तो मेरा एक शेर " फूलों के आर - पार " तैयार हो गया .
    तिलक राज कपूर ने सही कहा है कि " होशियार " शब्द के अनेक अर्थ हैं - चतुर ,
    चालाक , कुशल ,जागरूक , माहिर आदि . मैंने इस शब्द को " कुशल और बुद्धिमान के अर्थ में
    लिया है अपने शेर में . शेर यूँ बना - एक बार मेरे घर में मेरी पत्नी की दो सहेलियाँ आयीं . बातचीत में
    एक ने दूसरी को कहा - आपके दोनों बच्चे कितने ज़्यादा होशियार और पढ़े - लिखे निकले है !
    दूसरी ने जवाब में कहा - आपके बच्चे भी तो होशियार और पढ़े - लिखे हैं .
    बीस साल पहले मैं जयपुर गया था . पत्नी के लिए चार सौ रुपयों की जयपुरी साड़ी
    खरीद ली . पत्नी को दी तो उसका मुँह फूल गया . दस साल पहले दिल्ली गया तो उसके लिए मँहगी
    से मँहगी साड़ी खरीदी . पाकर वह खुश तो हुईं लेकिन कह उठीं - इतनी मँहगी साड़ी लाने की क्या जरूरत
    थी ? मेरा यह शेर बन गया -
    क्यों न लाता मँहगे - मँहगे तोहफे मैं परदेस से
    वर्ना पड़ता देखना फिर मुँह फुलाना आपका
    इस शेर में ज़रा " फिर " शब्द " पर गौर सभी फरमाएँ .
    मैं सीधी - सादी भाषा में सीधे - सादे भावों को पिरोता हूँ . इसीलिये मेरे पसंद के कवि
    दाग़ देहलवी , माखन लाल चतुर्वेदी , जिगर मोरादाबादी , हरिवंश राय बच्चन , सुभद्रा कुमारी चौहान ,
    नागार्जुन , बशीर बद्र इत्यादि हैं
    एक बार फिर सब का धन्यवाद .

    उत्तर देंहटाएं
  44. मैं अपनी ग़ज़लों पर सभी टिप्पणियों का आदर करता हूँ . सभी गुणीजन मेरे लिए
    माननीय हैं . मैं तो एक बच्चे की सीख का भी मान करता हूँ . मेरी ग़ज़लों में दो -
    तीन ऐसे शब्द आयें हैं जो मेरे अनुभव पर आधारित हैं . कभी रघुपति सहाय फ़िराक
    गोरखपुरी ने कहा था कि ग़ज़लों में प्रकृति गायब है . मेरे मन - मस्तिष्क में यह बात
    बैठ गयी . मैंने कुछेक ग़ज़लें बदलियाँ , पंछी , मातृभूमि , तितलियाँ आदि पर कह दीं .
    " तितलियाँ " ग़ज़ल के जन्म की बात करता हूँ . शैख्सपीयर के जन्मस्थान स्ट्रेट अपोन
    ऐवोन में एक तितली घर है . निहायत खूबसूरत . किस्म - किस्म की सैंकड़ों ही तितलियाँ
    हैं उसमें . उनका फूलों के आसपास , बीच में और आर - पार उड़ना देखकर मुझे एक
    फ़िल्मी गीत याद आ गया -
    तितली उडी
    उड़ जो चली
    फूल ने कहा
    आजा मेरे पास
    तितली कहे
    मैं चली उस पार
    घर आया तो मेरा एक शेर " फूलों के आर - पार " तैयार हो गया .
    तिलक राज कपूर ने सही कहा है कि " होशियार " शब्द के अनेक अर्थ हैं - चतुर ,
    चालाक , कुशल ,जागरूक , माहिर आदि . मैंने इस शब्द को " कुशल और बुद्धिमान के अर्थ में
    लिया है अपने शेर में . शेर यूँ बना - एक बार मेरे घर में मेरी पत्नी की दो सहेलियाँ आयीं . बातचीत में
    एक ने दूसरी को कहा - आपके दोनों बच्चे कितने ज़्यादा होशियार और पढ़े - लिखे निकले है !
    दूसरी ने जवाब में कहा - आपके बच्चे भी तो होशियार और पढ़े - लिखे हैं .
    बीस साल पहले मैं जयपुर गया था . पत्नी के लिए चार सौ रुपयों की जयपुरी साड़ी
    खरीद ली . पत्नी को दी तो उसका मुँह फूल गया . दस साल पहले दिल्ली गया तो उसके लिए मँहगी
    से मँहगी साड़ी खरीदी . पाकर वह खुश तो हुईं लेकिन कह उठीं - इतनी मँहगी साड़ी लाने की क्या जरूरत
    थी ? मेरा यह शेर बन गया -
    क्यों न लाता मँहगे - मँहगे तोहफे मैं परदेस से
    वर्ना पड़ता देखना फिर मुँह फुलाना आपका
    इस शेर में ज़रा " फिर " शब्द " पर गौर सभी फरमाएँ .
    मैं सीधी - सादी भाषा में सीधे - सादे भावों को पिरोता हूँ . इसीलिये मेरे पसंद के कवि
    दाग़ देहलवी , माखन लाल चतुर्वेदी , जिगर मोरादाबादी , हरिवंश राय बच्चन , सुभद्रा कुमारी चौहान ,
    नागार्जुन , बशीर बद्र इत्यादि हैं
    एक बार फिर सब का धन्यवाद .

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  45. मैं अपनी ग़ज़लों पर सभी टिप्पणियों का आदर करता हूँ . सभी गुणीजन मेरे लिए
    माननीय हैं . मैं तो एक बच्चे की सीख का भी मान करता हूँ . मेरी ग़ज़लों में दो -
    तीन ऐसे शब्द आयें हैं जो मेरे अनुभव पर आधारित हैं . कभी रघुपति सहाय फ़िराक
    गोरखपुरी ने कहा था कि ग़ज़लों में प्रकृति गायब है . मेरे मन - मस्तिष्क में यह बात
    बैठ गयी . मैंने कुछेक ग़ज़लें बदलियाँ , पंछी , मातृभूमि , तितलियाँ आदि पर कह दीं .
    " तितलियाँ " ग़ज़ल के जन्म की बात करता हूँ . शैख्सपीयर के जन्मस्थान स्ट्रेट अपोन
    ऐवोन में एक तितली घर है . निहायत खूबसूरत . किस्म - किस्म की सैंकड़ों ही तितलियाँ
    हैं उसमें . उनका फूलों के आसपास , बीच में और आर - पार उड़ना देखकर मुझे एक
    फ़िल्मी गीत याद आ गया -
    तितली उडी
    उड़ जो चली
    फूल ने कहा
    आजा मेरे पास
    तितली कहे
    मैं चली उस पार
    घर आया तो मेरा एक शेर " फूलों के आर - पार " तैयार हो गया . jaree................

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  46. तिलक राज कपूर ने सही कहा है कि " होशियार " शब्द के अनेक अर्थ हैं - चतुर ,
    चालाक , कुशल ,जागरूक , माहिर आदि . मैंने इस शब्द को " कुशल और बुद्धिमान के अर्थ में
    लिया है अपने शेर में . शेर यूँ बना - एक बार मेरे घर में मेरी पत्नी की दो सहेलियाँ आयीं . बातचीत में
    एक ने दूसरी को कहा - आपके दोनों बच्चे कितने ज़्यादा होशियार और पढ़े - लिखे निकले है !
    दूसरी ने जवाब में कहा - आपके बच्चे भी तो होशियार और पढ़े - लिखे हैं .
    बीस साल पहले मैं जयपुर गया था . पत्नी के लिए चार सौ रुपयों की जयपुरी साड़ी
    खरीद ली . पत्नी को दी तो उसका मुँह फूल गया . दस साल पहले दिल्ली गया तो उसके लिए मँहगी
    से मँहगी साड़ी खरीदी . पाकर वह खुश तो हुईं लेकिन कह उठीं - इतनी मँहगी साड़ी लाने की क्या जरूरत
    थी ? मेरा यह शेर बन गया -
    क्यों न लाता मँहगे - मँहगे तोहफे मैं परदेस से
    वर्ना पड़ता देखना फिर मुँह फुलाना आपका
    इस शेर में ज़रा " फिर " शब्द " पर गौर सभी फरमाएँ .
    मैं सीधी - सादी भाषा में सीधे - सादे भावों को पिरोता हूँ . इसीलिये मेरे पसंद के कवि
    दाग़ देहलवी , माखन लाल चतुर्वेदी , जिगर मोरादाबादी , हरिवंश राय बच्चन , सुभद्रा कुमारी चौहान ,
    नागार्जुन , बशीर बद्र इत्यादि हैं
    एक बार फिर सब का धन्यवाद .

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  47. प्राण साहब, एक बार पुनः आपके चरण स्पर्श करते हुए और कानों को हाथ लगाते हुए कुछ कहने की हिमाकत कर रहा हूँ..चुँकि इसमें मेरे उठाए हुए शब्दों की सफाई (फिर से माफ़ी, इस लफ्ज़ के लिए, वरना आपसे सफाई की उम्मीद मेरे लिए बाईसेशर्मिंदगी होगी) में आपने वे वाक़यात बयान किए हैं, लिहाजा मैं सफाई रखना चाहता हूँ:
    तितली उड़ी वाला गीत यूँ है
    “तितली उड़ी, उड़ जो चली/फूल ने कहा, आजा मेरे पास,/तितली कहे मैं चली आकास!”
    ऐसा होता है फिल्मी गानों के साथ. कोई गाता था “बैठा दिया पलंग पे मुझे खाट से उठा के” (बैठा दिया फ़लक पर, मुझे ख़ाक से उठा के)
    .
    होशियारी वाली बात तो मैं समझ गया, दरसल जहाँ आपका शेर ख़त्म होता है मैंने वहाँ से एक नया मानी गढने की कोशिश की. और तितली ऊड़ी की तर्ज़ पर न सीखी होशियारी की बात कही.
    .
    महँगे तोहफे की बात पर तो चलिए इस बात का इत्मिनान हुआ कि जिनके लिए वो तोह्फा था उन्होंने भी मेरे ख़यालात की तर्जुमानी की. एक प्यार भरी गुज़ारिश यह पूछने पर कि क्या लाऊँ तुम्हारे लिए परदेस से आज भी दिल में मीठी सी चुभन पैदा करती है
    बता दूँ क्या लाना, तुम लौट के आ जाना
    हमारी बेग़म होतीं तो कहतीं :
    ख़ामख़ाह ले आए इतने महँगे तोहफे आप क्यूँ
    बस यही अच्छा नहीं पैसे उड़ाना आपका.

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  48. प्राण जी क्षमा करें। तितली वाली ग़ज़ल के एक शेर के सन्दर्भ में ‘आर पार’ पर आपने जो कैफियत दी है मुझे नहीं लगता कि उसकी आवश्य कता थी। मैंने अपनी पहली टिप्पणी में कहा था कि मुझे तो यह प्रयोग सहज लगा। पर यह कैफियत देने से बात उलझ गई है। आपने जिस फिल्मी गीत से प्रेरणा ली है । वह इस तरह है -

    Titli Udi Ud Jo Chali
    Phool Ne Kaha
    Aaja Mere Paas
    Titli Kahe Main Chali Aakash

    आप देख सकते हैं कि इसमें पंक्ति है- तितली कहे मैं चली आकाश
    न कि - तितली कहे मैं चली उस पार
    हां आगे एक पंक्ति है- जाना है वहां मुझे बादलों के पार
    पर बात शुरू हुई थी सलिल जी की टिप्पणी से। उन्होंने फूलों के आर-पार पर असहजता महसूस की थी। पर मेरी समझ है कि बादलों के पार पर तो उनको भी कोई समस्या नहीं होगी।
    पूरा गीत इस तरह है-

    In Hai Janam Taare Ke Jo Door
    Bhale Meri Manjil Kaise Jaaoon Bhool

    Jahan Nahin Bandhan, Na Koi Deewar
    Jaana Hai Wahan Mujhe Badalon Ke Paar

    Titli Udi Ud Jo Chali
    Phool Ne Kaha
    Aaja Mere Paas
    Titli Kahe Main Chali Aakash

    Phool Ne Kahaa Tera Jaana Hai Bekaar
    Kaun Hai Vahan Jo Kare Tera Intezaar

    Boli Titli Donon Pankh Pasaar
    Wahan Pe Milega Mera Rajkumar

    Titli Udi Ud Jo Chali
    Phool Ne Kaha
    Aaja Mere Paas
    Titli Kahe Main Chali Aakash

    Titli Ne Poori Jab Kar Lee Udaan
    Nayi Duniya Main Hui Nayi Pehchaan
    Mila Use Sapanon Ka Rajkumar
    Titli Ko Mil Gaya Mann Chaha Pyaar

    Titli Udi Ud Jo Chali
    Phool Ne Kaha
    Aaja Mere Paas
    Titli Kahe Main Chali Aakash

    यह 1966 में बनी फिल्म सूरज से है। इसे लिखा है हसरत जयपुरी ने और गाया है शारदा ने। यह गीत हमें भी इसलिए याद रह गया है क्यों कि एक तो इसमें तितली की बात है दूसरे शारदा की आवाज ऐसी थी जैसे वे नाक से गा रही हों।

    तो प्राण जी इस गीत जो पंक्ति आई है वह है बादलों के पार। अगर सलिल भाई ने आपके इस शेर पर असहजता व्यतक्त की थी तो वह फूलों के पार जाने पर की थी। मेरी समझ से बादलों के पार जाने में उन्हेंी भी कोई समस्यार नहीं होगी।

    अब देखिए मंहगे तोहफे वाले शेर की कैफियत पर भी आप उलझ गए हैं। हमने माना कि आप प्रवासी हैं। पर सचमुच क्याश भारत आपके लिए परदेस हो गया है। कम से मैं तो इस शेर को भारत से बाहर जाकर भारत में लौटकर किसी परिचित से मिलने के संदर्भ में ही समझ रहा था।
    राजेश उत्‍साही

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  49. मुझे बेनामी के नाम से अपनी टिप्‍पणी डालनी पड़ी क्‍योंकि कुछ समस्‍या हो रही है और नाम से टिप्‍पणी जा नहीं रही है।
    अब यहां आकर देखता हूं कि जो मैंने अपनी टिप्‍पणी में कहा वही सलिल जी भी कहकर चले गए। प्राण जी माफ करें। आपके इस में आरपार को लेकर सलि‍ल जी असहज थे और मैं सहज। शायद इस‍ीलिए हम दोनों ही आपके सामने प्रस्‍तुत हो गए।
    एक और समस्‍या आती है कि यहां टिप्‍पणी बाक्‍स में जब लम्‍बी टिप्‍पणियां लिखो तो वो पोस्‍ट नहीं होती हैं। बाहर से फाइल लाओ तो यहां उसमें अतिरिक्‍त अक्षर आ जाते हैं। इसीलिए मेरी टिप्‍पणी में गलतियां नजर आएंगी। कृपया सुधारकर पढ़ लें।

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  50. @ रजेश उत्साही जीः
    सोने चला गया था, मगर दिमाग़ उलझा था आपके जवाब में, सो उठकर आना पड़ा अपनी बात कहने के लिए…
    उस गाने की पूरी लिरिक्स की ज़रूरत नहीं थी.. इस गीत को मैं अपनी हथेली की तरह पहचानता हूँ..उसपर बातें फिर कभी. फ़िलहाल, “बादलों के पार पर आपको कोई आपत्ति नहीं होगी” की बात समझ नहीं आई.. दरसल मैं पहले भी कह चुका हूँ कि यह मेरी ज़ाती राय है, क्योंकि मैंने कहीं ऐसी बात नहीं सुनी... मुझे यह लगता है कि आर पार का मतलब पैवस्त होने से है. और अंगरेज़ी में इसका मतलब जो मुझे मिला वो था इण्टरसेक्शन, जो पैवस्त होने जैसा है. जैसे तीर निशाने के आर पार होना.
    कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीरेनीमकश को
    वो ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता.
    और यह तो आशिक़ों का लोगो बन गया था शेर, याद करें, याद आ जाएगा. दिल में बिंधा हुआ इश्क़ का तीर आधा आर आधा पार.. और ब्लैक एण्ड वाईट की याद हो तो एक और नाक सए गाया हुआ गाना याद दिला दूँः
    कभी आर कभी पार लागा तीरे नज़र
    पिया घायल किया रे तूने मोरा जिगर.
    आर पार अगर हो गई तितलियाँ तो फूलों के घायल होने का ख़तरा है.

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  51. @सलिल भाई
    मैंने अपनी टिप्पणी आपकी टिप्पणी देखने के पहले ही लिख डाली थी। टिप्पणी लिखने में मुझे कुछ आधा घंटा तो लगा ही होगा। जब आपकी टिप्पणी देखी तब तक मैं उसे पोस्ट। करने की प्रक्रिया में था। पहले एक बार प्रयास किया तो नहीं गई। पहले सोचा आपकी टिप्पणी में असली बात आ ही गई है,रहने दूं। फिर लगा कि इतनी मेहनत की है और इसमें कुछ और बातें भी हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि यह मेरी राय है,इसलिए पोस्ट कर ही दो।

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  52. जारी....गाना मैंने आपके लिए नहीं प्राण जी के लिए दिया है। क्यों कि गाने में एक जगह बादलों के पार आता है। तो बहुत संभव है उन्हें वह पंक्ति याद रही हो। और आपको आपत्ति नहीं होगी वह इस अर्थ में कहा कि यह बादलों के पार प्रयोग तो इतना प्रचलित है कि आप भी उसको लेकर सहज होंगे।
    और सलिल भाई राय तो सबकी अपनी निजी ही होती है। मेरी भी है। कुछ लोग इत्त‍फाक रखते हैं कुछ नहीं। मैं तो अपनी बात तर्क के आधार पर ही रखता हूं। विमर्श वही लोग कर सकते हैं जो कुछ सोचते हैं,अलग नजरिए से सोचते हैं। सहमत होना या असहमत होना उसके बाद का चरण है। जारी...

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  53. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  54. सलिल भाई, आरपार होने के आपने बहुत से उदाहरण दे दिए। उनसे कतई असहमति नहीं है। प्राण जी का जो प्रयोग है वह काव्य की दृष्टि से ही है। इसीलिए उनसे भी कहा कि इस पर कैफियत की कोई जरूरत ही नहीं। और आपकी टिप्पणी की आखिरी पंक्ति की बात करें तो ति‍तलियां तो फूलों को घायल करने का काम करती ही हैं न।

    तो खड्गसिह जी, बाबा भारती की बात मान लीजिए। पर तर्कसम्मत हो तो। वरना अपना क्या है अपन तो कहते ही रहते है।

    जैसे कि...
    अब आया गया हूं तो प्राण जी की टिप्पणी में एक और बात जो मुझे रात भर परेशान करती रही वह यह है कि उन्होंने अपने तीन शेरों के बारे में जो कैफियत दी वह उनके सोच के दायरे को सीमित कर देती है। मैंने अब तक यह सीखा है कि आपका कोई भी निजी अनुभव साहित्य में तभी काम का होता है जब वह सर्वव्यापी होने की क्षमता रखता हो। इस दृष्टि से इन शेरों में कही गई बात कमजोर पड़ रही है,इसलिए वह उखड़ रही है।

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  55. प्राण साहब को पढ़ना हमेशा सकून देता है .... आज तो एक नही दो नही चार चार ग़ज़लें .... दिन बन गया हमारा ....
    बहुत बहुत शुक्रिया ...

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  56. विद्वजनों की चर्चा में मेरा उतरना शायद उचित न लगे लेकिन मंच खुला है तो बात रखना ही ठीक रहेगा।
    प्राण साहब की तितलियॉं बेचारी उलझ गयी लगती हैं।
    प्राण साहब को जितना पढ़ा उसमें इनकी लेखन शैली में एक विशिष्‍टता पाई है- एक तो इनकी ग़ज़लों में वज्‍़न का पालन ऐसा रहता है जो पहली नज़र में कभी-कभी खटकता है लेकिन फिर जब ध्‍यान जाता है कि भाई एक परिपक्‍व उम्र के उस्‍ताद शाइर की ग़ज़ल है तो ग़ज़ल विधा में अनुमत्‍य तरीके से देखने पर उसका कारण भी समझ में आ जाता है और निवारण भी हो जाता है; दूसरे ये कि इनके अधिकॉंश शेर अपने आस-पास के अनुभवों से भरे होते हैं और आम बोल-चाल की सीधी-सादी भाषा से लिये गये होते हैं जिसके कारण प्रथमदृष्‍टया ग़ज़ल बहुत सीधी-सादी सी लगती है। यहॉं फिर वही होता है कि जब इस बात पर ध्‍यान जाता है कि भाई एक परिपक्‍व उस्‍ताद शाइर की ग़ज़ल है तो शेर में उतरकर समझने की इच्‍छा होती है। उस स्थिति में शाइर के एहसास का अनुभव होने पर आनंद आता है। यह तो मैनें पहले भी निवेदन किया है कि प्राण शर्मा जी की ग़ज़लों का मुख्‍य आधार परस्‍पर संवाद की स्थितियॉं रहती हैं जिसमें संवाद पारिवारिक सदस्‍य, मित्र, प्रकृति, गली के नुक्‍कड़ पर या घर में खेलते बच्‍चे किसी से भी हो सकता है। इस दृष्टि से अशोक रावत जी की टिप्‍पणी भी ग़ल़त नहीं लगती। इसी ब्‍लॉग पर रावत जी की एक अलग एहसास पर आधारित बेहतरीन ग़ज़लें हैं जिन्‍हें देखने से स्‍पष्‍ट है कि उनकी शैली अलग तेवर लिये है। स्‍वाभाविक है कि उस एहसास को जीने और व्‍यक्‍त करने वाले शाइर को प्राण शर्मा जी की अभिव्‍यक्ति में सादगी ही दिखेगी।
    मुझे लगता है यहॉं समस्‍या कहन की शैली को लेकर है। मेरा निजि अनुभव यह रहा है कि साहित्‍यकार की रचना शैली के आधार में बहुत कुछ होता है लेकिन मुख्‍यत: सोच, संस्‍कार, संदर्भ और सरोकार खुलकर सामने आते हैं कहन में और इन्‍हें रूप देने में शब्‍द और शिल्‍प सामर्थ्‍य की महत्‍वपूर्ण भूमिका होती है (मेरा यह आशय कदापि नहीं कि प्रस्‍तुत रचनाकार अथवा चर्चा में सम्मिलित टिप्‍पणीकारों में से कोई इस विषय में कमज़ोर है)। यही शैली रचनाकार की समीक्षात्‍मक भूमिका का प्रमुख आधार बनती है। ऐसी स्थिति में रचना के प्रति विविध विचार होना ग़लत तो नहीं लगता।
    एक बात जरूर कहूँगा कि चूँकि प्राण शर्मा जी ने ग़ज़ल विधा पर काफ़ी अध्‍ययन भी किया है और उसपर खुलकर चर्चा भी करते रहे हैं तो ग़ज़ल के शिल्‍प अथवा शब्‍द प्रयोग के संदर्भ में उनकी ग़ज़लों को देखते समय यह बात ध्‍यान में रखना आवश्‍यक है कि सब जानते हुए भी ऐसा किया गया है तो क्‍यों? यह अलग बात है कि किसी नये शाइर को यह सौभाग्‍य नहीं मिलता; सीखने के काल में यह सौभाग्‍य शायद विकास में बाधक भी होगा।

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  57. अद्भुत आनन्द आ रहा है चर्चा में। बड़े होकर भी तितलियां के पीछे भागने में कितना आनन्द है आज जाना। आदरणीय तिलकराज जी ने बहुत खूबसूरती से बात को सामने रखा है।
    नजर आते हैं जो जैसे वो सब वैसे नहीं होते
    जो फल पीले नहीं होते वो सब कच्चे नहीं होते

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  58. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  59. @राजेश उत्साहीः
    बाबा भारती जी,
    आपकी बात कभी टाली है भला...और असहमत होने का प्रश्न ही कहाँ है...बकौल राजेश रेड्डीः
    दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह
    या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं.
    आप की बात मेरे लिए आदेश है...

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  60. @ सलिल भाई:
    यानी खड्गसिह जी,
    इस चर्चा में फिल्‍मी गीत भी आ गए हैं तो चलते चलते हम भी कह देते हैं- दिल जो भी कहेगा मानेंगे हम
    दुनिया में हमारा दिल ही तो है

    और बात संजीव भाई ने भी खूब कही बड़े होकर भी हम तितलियों के पीछे भागना नहीं भूले। सचमुच। और इस बार फिर हम सबने मिलकर सुभाष भाई का काम बढ़ा दिया। वे एक कुशल कक्षा अध्‍यापक की तरह हम सबकी कॉपियां जांचकर उसे लाल-हरा कर ही लेंगे। शुभकामनाएं।

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  61. और इस बार फिर हम सबने मिलकर सुभाष भाई का काम बढ़ा दिया। वे एक कुशल कक्षा अध्‍यापक की तरह हम सबकी कॉपियां जांचकर उसे लाल-हरा कर ही लेंगे।.........ha..ha...vah bhai Rajesh vah.

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  62. डाक्टर सुभाष राय के लिए यह सब बाएं हाथ का खेल है. एक मुउद्दत से अखबार के दफतर में कापियां ही तो जांचते रहे हैं. प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया, दोनों के कुशल सम्पादक की भूमिका अदा कर रहे हैं. एक राज़ की बात बताऊं, यह रात को भी नहीं सोते.

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  63. Main sabhee se anurodh karta hoon ki ve Subhash
    jee ke Sakhikabira blog ke is paar aayaa karen .
    Hansee - hansee mein Sanjeev jee , Rajesh jee,
    Tilak jee , Sarwat jee , Pankaj jee ,Gautam ji
    ityadi n jaane kitnee gyaan kee baaten kah jaate hain ! Bachchan jee ne kya khoob likha hai -- Is paar priy tum ho madhu hai
    us paar n jaane kyaa hogaa

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  64. सर्वत साहब ने खूब कहा सुभाष राय जी के लिये; उन्‍हीं की बात पकड़कर कहता हूँ कि:
    रात हो या दिन, नहीं सोता कभी
    सूर्य का विश्राम पल होता नहीं।

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  65. एक टंकण त्रुटि रह गयी थी
    रात हो या दिन, कभी सोता नहीं
    सूर्य का विश्राम पल होता नहीं।

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  66. प्राण साहब ने मुझे इत्यादि में सम्मिलित किया, पर उनकी बात से इत्तेफाक रखते हुए, सर्वत साहब के समर्थन में,तिलक राज जी के शेर को आगे बढाते हुए, अपनी तुकबंदी रखना चाहता हूँः
    ब्लॉग-मरुथल में कहीं भी ढूँढ लो
    “साखी” के अतिरिक्त, जल होता नहीं.

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  67. आदरणीय बिहारी ब्‍लॉगर जी खूब कहा आपने। बात ही बात में इस मत्‍ले पर एक ग़ज़ल बन गई और मैनें पोस्‍ट भी कर दी है। rastekeedhool.blogspot.com/2010/09/blog-post_29.html पर गुणीजनों की डॉंट-फ़टकार सुनने का इंतज़ार रहेगा।

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  68. सलिल जी, प्रान सर ने आपको इत्यादि में यूं ही नहीं रखा है इसका खास कारण है। इसके पीछे एक किस्सा है। किस्सा भी असली है बस कवियों के नाम भूल गया हूंं। हुआ यूं कि एक बार दो वरिश्ठ कवि रेल से किसी कवि सम्मेलन में जा रहे थे। टेन किसी स्टेशन पर आधे घंटे के लिए रूकती थी, तो जैसे ही टेन रूकी दोनों उतर गये। एक बोले कि चलो पास में बाजार में घूम आते हैं पीने की तलब लग रही है। मैं यहां जानता हूं पास में ही दुकान है ले आते हैं। दोनों कविगण चल दिये। दुकान बड़ी मुश्किल से मिली। खैर समय कम था सो दोनों लोग बोतल लेकर कपड़ों में छुपाकर ले आये। टेन चली। अब समस्या सामने आयी कि वहां और लोगों के सामने कैसे पियें। तरकीब भिड़ाते हुए दोनों ने कविताएं पढ़नी ‘ाुरू कीं। आस-पास बैठे लोग आनन्दित होने लगे। थोड़ी देर बाद उनमें से एक कवि पास बैठे सज्जन से बोले भाई साहब ये सामने क्या लिखा है। सज्जन ने पढ़ा डिब्बे में लिखा था कि,‘ डिब्बे में बीड़ी आदि पीना सख्त मना है।‘ उन सज्जन ने सोचा कि कवि महोदय बीड़ी पीना चाहते है, सो बोले हां-हां क्यों नहीं आप बीड़ी पी लीजिए हमें कोई तकलीफ नहीं है। कवि महोदय बोले नहीं बीड़ी नहीं पीनी है हमें तो आदि आदि पीना है।
    तो सलिल सर ये आदि इत्यादि कोई छोटी-मोटी चीज नहीं है। आप बड़े बड़भागी हैं। बधाई हो। हा हा

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