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शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

वेद व्यथित की गीतिकाएं

  अप्रैल १९५६ में जन्मे डॉ. वेद व्यथित ने हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर पूरा करने के बाद नागार्जुन के साहित्य में राजनीतिक चेतना पर अपना शोध किया| कविता, कहानी, उपन्यास और आलोचना के क्षेत्र में निरंतर सक्रियता|  मधुरिमा [काव्य नाटक],  आखिर वह क्या करे [उपन्यास], बीत गये वे पल [संस्मरण],   आधुनिक हिंदी साहित्य में नागार्जुन [आलोचना],  भारत में जातीय साम्प्रदायिकता [उपन्यास] और  अंतर्मन [ काव्य - संकलन] कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं| वे सम्प्रति भारतीय साहित्यकार संघ के अध्यक्ष, सामाजिक न्याय मंच के संयोजक और अंतर्राष्ट्रीय पुनर्जन्म एवं मृत्यु उपरांत जीवन  शोध परियोजना  में शोध सहायक हैं| इसके अलावा केंद्र तथा हरियाणा राज्य के अनेक संगठनों में विभिन्न पदों पर विराजमान हैं| उनकी रचनाओं का जापानी तथा पंजाबी भाषाओँ में अनुवाद हो चुका है|  उनका कहना है कि उन्होंने हिंदी साहित्य में व्यक्ति चित्र नामक नवीन विधा का सर्जन किया है| वे कहते हैं कि वे नवगीतिका लिखते हैं| यह गजल नहीं है, क्योंकि ग़ज़ल बहर के बिना नहीं हो सकती| गीत की हमारी लम्बी परंपरा है, उसी की कड़ी में यह नवगीतिका है| पेश हैं उनकी कुछ गीतिकाएँ.....

  1.

ओस की  बूंदों में भीगे हैं पत्ते कलियाँ फूल सभी 
प्यार से छींटें मार गया है जैसे कोई अभी अभी  
अलसाये से नयन अभी भी ख्वाबों में खोये से हैं
बेशक आँख खुली है फिर भी टूटा कब है ख्वाब अभी
दिन कितने अच्छे होते थे रातें खूब  उजाली थीं  
पर लगता है जैसे  गुजरी हंसों की सी पांत अभी 
कितनी सारी बातें बरगद की छाया में होतीं थीं 
उन में शायद   ही होंगी तुम को कोई याद अभी
 खेल खेलते खूब  रूठना तुम को जल्दी आता था 
फिर कैसे मैं तुम्हें मनाता क्या ये भी है याद अभी 
कैसे भूलूँ वे सब बातें बहुत बहुत कोशिश की है 
पर मुझ को वे कहाँ भूलतीं सब की सब हैं याद अभी
 

2.      

तुम्हारी याद में मैंने बहुत आंसू लुटाये  हैं 
वही मोती बने हैं रात भर वो जगमगाते हैं 
तुम्हीं ने जो कहे दो बोल मीठे प्यार के मुझ से 
ये पक्षी चाव से उन को ही हर पल गुनगुनाते हैं 
तुम्हें मेरा पता है जानते हो हाल तुम सारा 
पपीहा बादलों को  ही उसे गा कर सुनाते हैं
तुम्हारी गंध चन्दन सी हमेशा पास रहती है 
उसे दिल में बसा कर फूल दुनिया में लुटाते हैं 
जहाँ से तुम गुजरते धूल भी अनमोल हो जाती
उसे चन्दन समझ कर लोग माथे पर लगाते हैं 
तुम्हारे नेह की बारिश है ये अमृत की बूँदें हैं 
इन्हीं बूंदों से अपनी प्यास सब चातक बुझाते हैं 
तुम्हें कैसे लगा ये हिम शिखर इतने निठुर होंगे 
यही तो नेह की मीठी बहुत नदियाँ बहाते हैं
बहुत जो दूर से आते भरोसा क्या करें उन का 
वे पाखी कुछ समय के बाद वापस लौट जाते हैं 
अँधेरा कब लगा  अच्छा  उदासी ही वो देता है 
सुबह सूरज निकलता है कमल सब खिलखिलाते हैं
कभी देखा सुना ना आज तक ऐसा किया क्या है 
व्यथित की बात क्या ऐसी जिसे सब को बताते हैं 

       

 
 






3.               

 वर्षा बादल पानी पानी हर पल मुझ को याद रहा 
 तेरी आँख का आँसू आँसू हर पल मुझ को याद रहा 
 झूठे जाहिल मक्कारों ने देश का सब कुछ लूट लिया 
 फाँसी फंदा दीवानों का हर पल मुझ को याद रहा 
 महल अटारी कोठी बंगला मुझ से दूर बहुत थे वे 
 टूटी छान टपकता छप्पर हर पल मुझ को याद रहा 
 कहने को हर पल कोई ना कोई कसम उठाते वे 
 सच्चाई उन में कितनी है हर पल मुझ को याद रहा 
 पिज्जा पेस्ट्री केक चाउमिन मुझ को याद नहीं आई 
 कंगाली  में आटा गीला हर पल मुझ को याद रहा 
 जब जब बिजली गिरी और अम्बर रोया नौ नौ आँसू 
 धरती का जब फटा कलेजा हर पल मुझ को याद रहा 
 कभी एक पल शीतलता के झोंके आये थे कितने 
 पर जब शीतल झोंका आया वो पल मुझ को याद रहा 
       
4.

तुम्हारे गीत पैने  है ये  दिल के पार जाते हैं 
तुम्हारे आँख के मोती बहुत दिल को दुखाते  हैं 
सुहाने बादलों की बात क्यों उन  को सुहाएगी    
सुरीली तान सुन कर गम बहुत से याद आते हैं 
तुम्हारा ही दिया है घाव ये भरता नहीं है जो 
तुम्हारे बोल मीठे हैं वह नश्तर सा चुभाते हैं 
नहीं भटके हवा मैं मान लूं कैसे कि ये होगा 
बहुत से रास्ते के मोड़ जब उस को सताते हैं 
हवा भी चाहती ठहराव तो उस का कहीं पर हो 
कहाँ ठहरे समय के जब बढ़े ही पांव जाते हैं
पुन:बौरा गये हैं आम तुम ने तान छेड़ी है
पपीहा और कोयल भी उसे ही रोज गाते हैं 


तुम्हें  कैसे बताऊँ प्रश्न जो मन में मेरे आते 
 वही क्या प्रश्न शायद रोज तुम को भी सताते हैं 
तुम्हीं ने भूल कर भी वो मधुर बातें नही छेड़ीं
कि जिन से जिन्दगी के गम हमेशा भूल जाते हैं
व्यथा की बात क्या बोलूं मुझे मीठी बहुत लगती 
मुझे मेरे सभी अपने तभी तो याद आते हैं
 
   
वर्तमान पता :    अनुकम्पा -१५७७ सेक्टर -३ फरीदाबाद-१२१००४  हरियाणा भारत 

फोन नम्बर:       ०१२९-२३०२८३४ ,०९८६८८४२६८८



44 टिप्‍पणियां:

  1. apni hi khaas maulik-rangat ke saath likhi gayee ye geetikaye dil ko chhoo gayee. yah pratibhaon ka desh hai. prayogdharmiyon ka desh hai. ved ji jaise prayogdharmee kavi har kaal mey huye hai. inkee ye rachanaye hameshaa yaad rahengee.

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  2. तुम्हारा ही दिया है घाव ये भरता नहीं है जो
    तुम्हारे बोल मीठे हैं वह नश्तर सा चुभाते हैं
    नहीं भटके हवा मैं मान लूं कैसे कि ये होगा
    बहुत से रास्ते के मोड़ जब उस को सताते हैं
    हवा भी चाहती ठहराव तो उस का कहीं पर हो
    कहाँ ठहरे समय के जब बढ़े ही पांव जाते हैं

    बेहद सुन्दर रचनायें………………जिन मे से ये पन्क्तियाँ खास दिल मे उतर गयीं।

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  4. व्यथित जी की रचनाओं में भाव हैं, रस है और वह तत्व सारे हैं जो कविता को कविता बनाते हैं.

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  5. नए शिल्प और भाव बोध की रचनाएं -ऐसे तेवर के रचनाकार व्यथित जी से मिलाने का आभार

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  6. नवगीतिका के अंतर्गत वेद जी की चार रचनाएँ निस्संदेह शिल्प और कथ्य के स्तर पर पाठकों को बांधे रखने में सफल हैं. ये रचनाएँ श्रृंगार रस में डूबी, लोगों की कोमल भावनाओं को सहलाती-दुलराती, प्रेम के उस प्रकोष्ठ तक ले जाती हैं जिसका वर्तमान में अस्तित्व समाप्त प्राय है. फिर भी, टेक्निक, रिदम और प्रेम-रस, सभी मिलकर एक अनोखी दुनिया तक पहुंचा देते हैं पढ़ने वालों को.
    भाषा के स्तर पर रचना कई स्थानों पर कमजोर दिखी. अक्सर ऐसा हो जाता है जब रचना पूरी करने के प्रयास में भाषा, व्याकरण, प्रवाह पर रचनाकार ध्यान नहीं दे पाता. कुछ रचनाकार इस समस्या का समाधान स्वयं कर लेते हैं, वे रचना को २-३ बार देख कर जो अटकन होती है, उसे दूर कर लेते हैं लेकिन हर कोई ऐसा नहीं कर पाता. यह कोई दोष नहीं है, बस अपने-अपने ढंग से काम करने का तरीका है. मैं खुद अक्सर दुबारा नहीं देख पाता.
    वेद जी की आलोचना करना मेरा ध्येय नहीं, इस लिए मैं हर जगह उंगली नहीं लगा रहा, केवल ४ स्थान ऐसे हैं जहां मुझे खटक महसूस होती है:
    गीतिका-१ "उन में शायद ही होंगी तुम को कोई याद अभी".
    गीतिका-२ "पपीहा बादलों को ही उसे गा कर सुनाते हैं".
    " " " "यही तो नेह की मीठी बहुत नदियाँ बहाते हैं".
    गीतिका-३ "हर पल मुझको याद रहा", यह टेक अंत आते आते "वो पल मुझको......"में परिवर्तित हो गया.
    १- २ मात्राएँ कम हैं. मैं मीटर/फीता लेकर नहीं बैठा था लेकिन प्रवाह में अवरोध आने पर गणना की तो कमी दिखाई पड़ गयी.
    २- पपीहा बादलों.....भाषा के मुताबिक पपीहे होना चाहिए था.
    ३- यही तो नेह की मीठी बहुत..... यह बहुत नदियाँ के लिए है या नेह के लिए, स्थिति भ्रामक हो गयी है. एक पहेली जैसा मामला है, पाठक स्वयं तय करे और अर्थ का निर्धारण कर ले.
    ४- गीत का एक अनुशासन होता है, उसका पालन होना चाहिए, कई जगह तुक में भी छूट ली गयी है जिसे जायज़ नहीं ठहराया जा सकता.
    मेरा मकसद रचना और केवल रचना पर ही केन्द्रित रहा है. मैं ने किसी दुराव, ईर्ष्या, कुंठा के तहत कमियों की ओर इशारा नहीं किया है. 'साखी' ने यह कार्य जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आरम्भ किया है, मैं उसमें अपना तुच्छ अंशदान ही कर रहा हूँ. रचनाओं में अगर कहीं छूट ली जाती है, कहीं कमी है तो उसका उल्लेख करना मैं इस लिए भी जरूरी समझता हूँ की नई पौध को एक राह मिल सके.
    वेद जी को बधाई, मेरे द्वारा कुछ कमियाँ निकाल देने से उनके रचनाकार का कद कहीं से छोटा नहीं होता. लोगों के समक्ष अपनी रचनाएँ 'पोस्टमार्टम' के लिए पेश करना ही बहुत बड़े कलेजे का काम है. हम रचनाकार, आदमी हैं, फरिश्ता या देवदूत नहीं कि गलतियाँ नहीं करेंगे. फिर हम वेद-पुराण-कुरआन नहीं लिख रहे हैं कि गलतियाँ नहीं होगी.
    अंत में, मैं मस्का नहीं लगा रहा, सच्चाई यह है की वेद जी के गीतों ने मुझे भी स्नेह रस से शराबोर किया.

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  7. रस दे रही हैं रचनायें
    गीतिकाएं हों कि कविताएं
    तुक के साथ हों या कि हों बेतुकी
    रसदार हों या बेरस
    पर रचना कोई नीरस नहीं होती
    रचना जीवन में रस भरती है
    रंग भरती है
    तरंग भरती है
    आलोडि़त कर देती है मन को
    वही व्‍यथित भी करती है
    जब करे वेद को व्‍यथित
    तो घाव महत्‍वपूर्ण हो जाता है
    किसी के होने से ही
    उसका निदान किया जा सकता है
    इसलिए होनी जरूरी है
    और जरूरी है अनहोनी भी।
    सबके फायदे हैं
    इरादे हैं, कायदे हैं
    ज्‍यादा हैं, कम हैं
    इसीलिए तो जिंदगानी में
    गम है, खुशी है
    हंसी है और रस है
    अब मेरी तो रूक रही
    यहीं पर यह बस है।

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  8. बहुत ही सुंदर रचनाए हैं .... आनंद आ गया पढ़ कर ... ये सच है वरिष्ट रचनाकारों को पढ़ कर बहुत कुछ सीखने को मिलता है ...

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  9. डा रूप चन्द्र शास्त्री मयंक6 सितंबर 2010 को 9:38 am

    बहुत सुन्दर गीतिकाएँ हैं!
    मगर ये लिंक देना ...!
    नया अंदाज सभी को पसंद हो यह जरूरी तो नहीं!
    --
    भारत के पूर्व राष्ट्रपति
    डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म-दिन
    शिक्षकदिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

    (आदरणीय शास्त्री जी ने यह टिप्पड़ी नुक्कड़ पपर दी गयी लिंक पर दी थी, वहां से साभार )

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  10. नवगीत की सतत परंपरा के संवाहक श्री वेद व्यथित जी की चारों गीतिकाएं मन को में अपने विविध भावों की सुगंध छिड़क गई..जिसकी महक अभी भी मस्तिष्क में संचरति हो रही है. हर गीतिका अपनी अलग खुशबू से सरोबार है. कही आंसुओं में, कही ओस की बूंदों में, आंसुओं के मोतियों में तो कही पपीहे का मधुर स्वर अपने साथ चन्दन की सौंधी खुशबू से आनादित कर जाता है तो कही गीतों की पैनी धार सीधे दिल में उतर गुदगुदाती है. किस-किस पंक्ति का हवाला दूँ? सभी अभिव्यक्ति के अथाह भावों तक जाकर प्रतिक्रिया की उत्तंग पराकाष्ठ तक जाणे में सक्षम है. साधुवाद आदरणीया वेद व्यथित जी का.
    साथ ही आदरणीय सुभाष जी का तो जितना भी आभार व्यक्त करूँ, कम होगा. इतनी सुमधुर, सशक्त और सुन्दर रचना से रूबरू करवाने बाबत. आभार !!

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  11. 1.प्रेम की ओस में भीगी सी यह गीतिका बाल्यावस्था के प्रेम का स्मरण, बड़े ही कोमल शब्दों में करती और कराती है. वह प्रेम जो हंसों की धवल श्वेत पंक्ति की तरह उड़कर विलीन हो गया अनंताकाश में, स्वप्न की तरह स्मृति में शेष है. वह स्वप्न जो भंग होता है उसी प्रेम की मृदु जल की फुहार से जो बिखरी है, ओस की तरह चारों ओर हृदय के प्रांगण में.
    कविता के पार्श्व में एक विरह का आभास दीखता है और ऐसा प्रतीत होता है कि कवि आज भी बाल्यावस्था के प्रेम पाश से मुक्त नहीं हो पाया है. कविता की सुंदरता यह है कि विरह के भाव के होते हुए भी यह अश्रु कण के स्थान पर प्रणय के जलकण से आर्द्र है. लयबद्धता कहीं भी भंग होती नहीं दिखती और शब्द विन्यास प्रत्येक शब्द को गरिमा प्रदान करता है.

    2. विरह में सौदर्य दर्शाती यह गीतिका भी पाठक को पहली पंक्ति से बाँध लेती है. प्रायः कवियों ने विरह का चित्रण बड़ी निर्दयता से किया है, जिसमें उलाहने और आँसुओं का संगम दिखता है. किंतु व्यथित जी ने वह परम्परा तोड़ी है. वे स्वीकार करते हैं कि यद्यपि उन्होंने आँसू बहाए हैं, तथापि वे आँसू मोतियों का स्थान रखते हैं. प्रेयसि के विस्मृत बोल, वे पक्षियों के कलरव में श्रवण करते हैं, पपीहे की पुकार बादलों को संदेश देती है विरही प्रेमी का, चंदन सी गंध और पथ की रेणु, प्रेम की अमृत वर्षा आदि श्रृन्गार के वे प्रतीक हैं जो विरह से उत्पन्न हुए हैं, किंतु इनका सौंदर्य प्रणय से कम नहीं दिखता. कवि हिमालय से ऊँची पीर नहीं देखता, उससे निकलती प्रेम की मीठी गंगा को देखता है, उदासी का अंधेरा नहीं, सिंदूरी भोर में प्रेम के कमल खिलते देखता है.
    स्वयम् कवि का यह दावा है कि
    कभी देखा सुना ना आज तक ऐसा किया क्या है
    व्यथित की बात क्या ऐसी जिसे सब को बताते हैं.

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  12. 3. गीतिका के बाद यह ग़ज़ल या इसे भी गीतिका कहें तो मुक्तक दोहों की गीतिका कही जा सकती है. लेकिन गज़ल के, मुझे मालूम सारे ग्रामर के हिसाब से, मैं इसे गज़ल ही कहने की हिमाक़त कर रहा हूँ. मतला व्यथित साहब के पुराने अंदाज़ यानि हिज्र के अंदाज़ से तर ब तर है, लेकिन अगले मिसरे से जो तेवर उन्होंने बदले हैं वो ग़ज़ब का कॉन्ट्रास्ट पेश करता है. जहाँ मुल्क़ की आज़ादी के शहीदों को वे याद करते हैं, वहीं टूटी टपकती छत, झूठे वादे और कंगाली का ज़िक्र करके याद दिलाते हैं कि उन शहीदों की क़ुर्बानियों के साथ हमारे लीडरान कितना भद्दा मज़ाक करते रहे हैं. देश की हालिया सूरते हाल पर तंज़ करती यह ग़ज़ल हर तरह से मौजू है.
    व्यथित साहब ने यहाँ एक बड़ा ख़ूबसूरत तजुर्बा किया है लफ्ज़ों के साथ. “नौ नौ आँसू रोना” और विदेशी खाने की फहरिस्त लफ्ज़ों पर उनकी महारत की तर्जुमानी करता है.

    4.बहुत ही ख़ूबसूरत मतला है, लेकिन एक छोटी सी भूल (जो शायद टाइपिंग की भूल भी हो सकती है) ने ठिठका दिया. “तुम्हारे आँख” की जगह पर “तुम्हारी आँख” होना चाहिए था. लेकिन यह इतनी मामूली बात है कि इसका ज़िक्र करके ख़ुद माफ़ी माँगने की ख़्वाहिश होती है. शुरुआती तीन अशार,व्यथित साहब के पुराने मूड को जारी रखती है, यानि हिज्र के ग़म का एहसास. लेकिन शायर कहीं भी उस दर्द देने वाले को कोसता हुआ, उलाहने देता हुआ या बद्दुआ देता हुआ नहीं मालूम पड़ता.
    बाद के दोनों शेर एक बेहतरीन मंज़र परोसते हैं जहाँ शायर की इमैजिनेशन इस ग़ज़ल को एक बेइंतिहाँ बुलंदी पर ले जाती हैं.
    नहीं भटके हवा मैं मान लूं कैसे कि ये होगा
    बहुत से रास्ते के मोड़ जब उस को सताते हैं .
    हवा भी चाहती ठहराव तो उस का कहीं पर हो
    कहाँ ठहरे समय के जब बढ़े ही पांव जाते हैं.

    हसरत जयपुरी साहब का कलाम बेसाख़्ता ज़ुबान पर आ जाता है कि मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा.
    आख़िर के तीनों शेर (मक़्ता मिलाकर) दूरी की टीस को इतने मीठे अंदाज़ में बयान करते हैं कि इंसान का दर्द को देखने का नज़रिया बदल जाए. बिलकुल फ़लसफ़ाई अंदाज़ में ये पूछते हैं कि बिछड़कर जो सवाल इनके दिल में आते हैं क्या वो उसके भी मन में आता हैं, या फिर उन मीठी बातों का ज़िक्र जो ज़िंदगी के ग़मों पर चाशनी फेर देते हैं और यह मान लेना कि ये वुजुहात ही अपने अपनों को याद करने का सामाँ है. इतनी मासूमियत है इस बयान में कि इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा!

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  14. 3. गीतिका के बाद यह ग़ज़ल या इसे भी गीतिका कहें तो मुक्तक दोहों की गीतिका कही जा सकती है. लेकिन गज़ल के, मुझे मालूम सारे ग्रामर के हिसाब से, मैं इसे गज़ल ही कहने की हिमाक़त कर रहा हूँ. मतला व्यथित साहब के पुराने अंदाज़ यानि हिज्र के अंदाज़ से तर ब तर है, लेकिन अगले मिसरे से जो तेवर उन्होंने बदले हैं वो ग़ज़ब का कॉन्ट्रास्ट पेश करता है. जहाँ मुल्क़ की आज़ादी के शहीदों को वे याद करते हैं, वहीं टूटी टपकती छत, झूठे वादे और कंगाली का ज़िक्र करके याद दिलाते हैं कि उन शहीदों की क़ुर्बानियों के साथ हमारे लीडरान कितना भद्दा मज़ाक करते रहे हैं. देश की हालिया सूरते हाल पर तंज़ करती यह ग़ज़ल हर तरह से मौजू है.
    व्यथित साहब ने यहाँ एक बड़ा ख़ूबसूरत तजुर्बा किया है लफ्ज़ों के साथ. “नौ नौ आँसू रोना” और विदेशी खाने की फहरिस्त लफ्ज़ों पर उनकी महारत की तर्जुमानी करता है.

    4.बहुत ही ख़ूबसूरत मतला है, लेकिन एक छोटी सी भूल (जो शायद टाइपिंग की भूल भी हो सकती है) ने ठिठका दिया. “तुम्हारे आँख” की जगह पर “तुम्हारी आँख” होना चाहिए था. लेकिन यह इतनी मामूली बात है कि इसका ज़िक्र करके ख़ुद माफ़ी माँगने की ख़्वाहिश होती है. शुरुआती तीन अशार,व्यथित साहब के पुराने मूड को जारी रखती है, यानि हिज्र के ग़म का एहसास. लेकिन शायर कहीं भी उस दर्द देने वाले को कोसता हुआ, उलाहने देता हुआ या बद्दुआ देता हुआ नहीं मालूम पड़ता.
    बाद के दोनों शेर एक बेहतरीन मंज़र परोसते हैं जहाँ शायर की इमैजिनेशन इस ग़ज़ल को एक बेइंतिहाँ बुलंदी पर ले जाती हैं.
    नहीं भटके हवा मैं मान लूं कैसे कि ये होगा
    बहुत से रास्ते के मोड़ जब उस को सताते हैं .
    हवा भी चाहती ठहराव तो उस का कहीं पर हो
    कहाँ ठहरे समय के जब बढ़े ही पांव जाते हैं.

    हसरत जयपुरी साहब का कलाम बेसाख़्ता ज़ुबान पर आ जाता है कि मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा.
    आख़िर के तीनों शेर (मक़्ता मिलाकर) दूरी की टीस को इतने मीठे अंदाज़ में बयान करते हैं कि इंसान का दर्द को देखने का नज़रिया बदल जाए. बिलकुल फ़लसफ़ाई अंदाज़ में ये पूछते हैं कि बिछड़कर जो सवाल इनके दिल में आते हैं क्या वो उसके भी मन में आता हैं, या फिर उन मीठी बातों का ज़िक्र जो ज़िंदगी के ग़मों पर चाशनी फेर देते हैं और यह मान लेना कि ये वुजुहात ही अपने अपनों को याद करने का सामाँ है. इतनी मासूमियत है इस बयान में कि इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा!

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  16. 3. गीतिका के बाद यह ग़ज़ल या इसे भी गीतिका कहें तो मुक्तक दोहों की गीतिका कही जा सकती है. लेकिन गज़ल के, मुझे मालूम सारे ग्रामर के हिसाब से, मैं इसे गज़ल ही कहने की हिमाक़त कर रहा हूँ. मतला व्यथित साहब के पुराने अंदाज़ यानि हिज्र के अंदाज़ से तर ब तर है, लेकिन अगले मिसरे से जो तेवर उन्होंने बदले हैं वो ग़ज़ब का कॉन्ट्रास्ट पेश करता है. जहाँ मुल्क़ की आज़ादी के शहीदों को वे याद करते हैं, वहीं टूटी टपकती छत, झूठे वादे और कंगाली का ज़िक्र करके याद दिलाते हैं कि उन शहीदों की क़ुर्बानियों के साथ हमारे लीडरान कितना भद्दा मज़ाक करते रहे हैं. देश की हालिया सूरते हाल पर तंज़ करती यह ग़ज़ल हर तरह से मौजू है.
    व्यथित साहब ने यहाँ एक बड़ा ख़ूबसूरत तजुर्बा किया है लफ्ज़ों के साथ. “नौ नौ आँसू रोना” और विदेशी खाने की फहरिस्त लफ्ज़ों पर उनकी महारत की तर्जुमानी करता है.

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  17. 4.बहुत ही ख़ूबसूरत मतला है, लेकिन एक छोटी सी भूल (जो शायद टाइपिंग की भूल भी हो सकती है) ने ठिठका दिया. “तुम्हारे आँख” की जगह पर “तुम्हारी आँख” होना चाहिए था. लेकिन यह इतनी मामूली बात है कि इसका ज़िक्र करके ख़ुद माफ़ी माँगने की ख़्वाहिश होती है. शुरुआती तीन अशार,व्यथित साहब के पुराने मूड को जारी रखती है, यानि हिज्र के ग़म का एहसास. लेकिन शायर कहीं भी उस दर्द देने वाले को कोसता हुआ, उलाहने देता हुआ या बद्दुआ देता हुआ नहीं मालूम पड़ता.
    बाद के दोनों शेर एक बेहतरीन मंज़र परोसते हैं जहाँ शायर की इमैजिनेशन इस ग़ज़ल को एक बेइंतिहाँ बुलंदी पर ले जाती हैं.
    नहीं भटके हवा मैं मान लूं कैसे कि ये होगा
    बहुत से रास्ते के मोड़ जब उस को सताते हैं .
    हवा भी चाहती ठहराव तो उस का कहीं पर हो
    कहाँ ठहरे समय के जब बढ़े ही पांव जाते हैं.

    हसरत जयपुरी साहब का कलाम बेसाख़्ता ज़ुबान पर आ जाता है कि मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा.
    आख़िर के तीनों शेर (मक़्ता मिलाकर) दूरी की टीस को इतने मीठे अंदाज़ में बयान करते हैं कि इंसान का दर्द को देखने का नज़रिया बदल जाए. बिलकुल फ़लसफ़ाई अंदाज़ में ये पूछते हैं कि बिछड़कर जो सवाल इनके दिल में आते हैं क्या वो उसके भी मन में आता हैं, या फिर उन मीठी बातों का ज़िक्र जो ज़िंदगी के ग़मों पर चाशनी फेर देते हैं और यह मान लेना कि ये वुजुहात ही अपने अपनों को याद करने का सामाँ है. इतनी मासूमियत है इस बयान में कि इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा!

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  18. कुल मिलाकर एक बेहतरीन मजमुआ (मैं तो इन चार गीतिकाओं को ही मजमुआ कहने की हिमाकत कर रहा हूँ). हिंदी या फिर हिंदुस्तानी ज़ुबान में की गई ये शायरी, गुफ्तगू करती मालूम पड़ती है. कहीं कोई लफ्फाज़ी नज़र नहीं आती. व्यथित जी की कलम को सलाम करने को जी चाहता है. अगर मुख़्तसर में बात कहनी हो तो बस इतना ही कहा जा सकता है कि एक ख़ुशनुमा बारिश के मौसम में, इतवार के रोज़ बालकनी में बैठे, अपने माज़ी से मुलाक़ात करने की ख्वाहिश हो, तो इनकी ग़ज़लों से बेहतर कोई हमसफर नहीं. यकीन न हो तो आजमा कर देख लें.
    .
    तुमसे जब बिछड़ा, तो बरसों लानतें भेजीं मगर
    आज इन ग़ज़लों को पढकर ख़ुद पे शर्मिंदा हूँ मैं.

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  20. वेद जी गीतिकाएं मुझे आत्‍मालाप ज्‍यादा लगीं। लगा जैसे वे बस खुद से बतिया रहे हैं। असल में मेरा पाठक मन हर रचनाकार की रचना में समकालीन परिदृश्‍य को ढूंढता है। वेद जी की एक रचना इस बात का हल्‍का सा आभास देती है कि वे वर्तमान में हैं। पर अगले क्षण वे लौट जाते हैं अपने एकाकीपन में। बाकी रचनाओं से तो यह पता ही नहीं चलता कि उनका रचनाकाल क्‍या रहा होगा। मैंने अलग अलग समय पर आकर कम से कम पांच बार ये गीतिकाएं पढ़ी। पर सच कहूं तो वेद जी मुझे व्‍यथित नहीं कर पाए। हो सकता है मैं ही असमर्थ हूं इन्‍हें समझ पाने में ।

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  21. डॉ. सुभाष राय जी,
    सर्वत साहब बड़े बुज़ुर्ग और खरे साहित्यकार हैं... उन्होंने जिन कमियों की ओर इशारा किया वो दुरुस्त है... सिर्फ एक बात जो उन्होंने कही (इस पोस्ट से असम्बद्ध)वो मुझे यहाँ अखर रही है.. याद नहीं पर पहले भी कहीं किसी ने साखी पर समीक्षा के लिए पोस्ट्मॉर्टेम शब्द का प्रयोग किया था, जो सर्वथा अनुचित है. मैं हाथ जोड़कर विनती करता हूँ कि किसी शायर या कवि की जीवंत रचना के लिए, जो शायर के मरने के बाद भी जीवित रहती है, पोस्टमॉर्टेम जैसे शब्द, जो एक मुर्दे की चीर फाड़ का काम है, का प्रयोग मज़ाक में भी न किया जाए. यह मेरा अनुरोध है.
    कविता एक जीती जागती कृति है, और ज़िंदा जिस्म पर पोस्टमॉर्टेम नहीं किया जाता, चाहे वो काग़ज़ पर लिखी हो या किसी पोस्ट पर.
    सलिल

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  22. अभी देखा तो यह हिस्सा ग़ायब था, इसलिए दुबाराः
    4.बहुत ही ख़ूबसूरत मतला है, लेकिन एक छोटी सी भूल (जो शायद टाइपिंग की भूल भी हो सकती है) ने ठिठका दिया. “तुम्हारे आँख” की जगह पर “तुम्हारी आँख” होना चाहिए था. लेकिन यह इतनी मामूली बात है कि इसका ज़िक्र करके ख़ुद माफ़ी माँगने की ख़्वाहिश होती है. शुरुआती तीन अशार,व्यथित साहब के पुराने मूड को जारी रखती है, यानि हिज्र के ग़म का एहसास. लेकिन शायर कहीं भी उस दर्द देने वाले को कोसता हुआ, उलाहने देता हुआ या बद्दुआ देता हुआ नहीं मालूम पड़ता.
    बाद के दोनों शेर एक बेहतरीन मंज़र परोसते हैं जहाँ शायर की इमैजिनेशन इस ग़ज़ल को एक बेइंतिहाँ बुलंदी पर ले जाती हैं.
    नहीं भटके हवा मैं मान लूं कैसे कि ये होगा
    बहुत से रास्ते के मोड़ जब उस को सताते हैं .
    हवा भी चाहती ठहराव तो उस का कहीं पर हो
    कहाँ ठहरे समय के जब बढ़े ही पांव जाते हैं.

    हसरत जयपुरी साहब का कलाम बेसाख़्ता ज़ुबान पर आ जाता है कि मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा.
    आख़िर के तीनों शेर (मक़्ता मिलाकर) दूरी की टीस को इतने मीठे अंदाज़ में बयान करते हैं कि इंसान का दर्द को देखने का नज़रिया बदल जाए.

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  23. वेद जी की चारों रचनाएं कथ्य के स्तर पर प्रभावित करती हैं। इस रूप में सलिल जी ने बहुत अच्छी विवेचना की है। राजेष जी ने रचनाओं की समकालीनता को लेकर जो कहा है वह भी काफी हद तक सही है। इसका कारण मुझे जो लगता है वह यह कि वेद जी के लिए कविता कर्म के द्वारा समाज को रचने के बजाय स्वयं को रचना ज्यादा है। मैं तो उनकी इस बात की दाद दूंगा कि उन्होंने इन रचनाओं को ग़ज़ल नहीं कहा। अगर उनकी जगह कोई और होता तो इन्हें ग़ज़ल ही कहता। इस बात के लिए औरों को वेद जी से सीख लेनी चाहिए। वेद जी बहुत संवेदनदशील रचनाकार हैं। इसमें कोई शक नहीं। लेकिन ईमानदारी से कहना पड़ेगा कि साखी की कसौटी पर ये रचनाएं हल्की है।
    एक बात और आदरणीय सर्वत जी ने वेद जी की एक पंक्ति ‘यही तो नेह की मीठी बहुत नदिया बहाते हैं।‘ में 'बहुत' शब्द के स्थान को लेकर कहा है कि वहां भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो रही है कि 'बहुत' नदियों के लिए है या नेह के लिए। मुझे लगा कि यहां आलोचना में जल्दबाजी से काम लिया गया है। यहां मैं सीधा सा अर्थ जो गद्य में ले रहा हूं वह यह कि, हिमशिखर ही तो नेह की बहुत मीठी नदियां बहाते हैं। अगर हम 'बहुत' षब्द को नेह, नदिया और मीठे, तीनों के साथ अलग-अलग भी रखकर देखें तो भी अनर्थ नहीं होता है।
    हिमशिखर ही तो बहुत नेह की मीठी नदियां बहाते हैं।
    हिमशिखर ही तो नेह की मीठी बहुत नदियां बहाते हैं।
    यहां मुझे रामचरित मानस की एक चैपाई याद आ रही है। धनुष टूटने का प्रसंग है-
    तेहि छन राम मध्य धनु तोरा।
    यहां ‘मध्य‘ शब्द सिर्फ धनु के लिए नहीं है बल्कि छन और राम के लिए भी है क्योंकि धनु मध्य था, राम भी मध्य थे और उन्होंने मध्य छन में ही धनु तोड़ दिया था। इस चैपाई की यह व्याख्या बिहार के एक प्रो0 दशायद रामकिंकर जी करते हैं। इस आलोचना से वेद जी को मुक्त करना चाहिए।

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  24. आदरणीय सर्वत जी मुझे माफ करें यदि मुझसे कोई गुस्ताखी हो गई हो तो। उनकी बात को काटना मेरा उद्देष्य नहीं था।

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  25. आदरणीय सलिल जी,
    मुझे बेहद अफ़सोस है कि मुझसे एक बहुत भारी गलती हो गयी और एक शब्द 'पोस्ट मार्टम' का प्रयोग समीक्षा के लिए मैं ने कर दिया. मैं सफाई नहीं दे रहा और इस मुद्दे पर सफाई हो भी नहीं सकती, फिर भी मुझे अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए. मैं थोड़ा गैर-संजीदा आदमी हूँ, हंसने का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं देना चाहता. पोस्ट मार्टम शब्द भी मैं ने इसी लिए इन्वर्टेड कामा में लिखा था, मेरा आशय कत्तई किसी का अपमान करना अथवा दुःख पहुँचाना नहीं था.
    आपकी टिप्पणी पढ़कर मैं बेहद दुखी हूँ. झगड़े की सारी जड़ किसी की रचना पर कमेन्ट देना ही है, सो आज से यह काम बंद.
    सलिल जी जो भी हुआ, अनजाने में हुआ, आप सम्वेदनशील हैं, आप को दुःख पहुंचा, मैं क्षमाप्रार्थी हूँ, आइन्दा आपको शिकायत का मौक़ा नहीं मिलेगा. आदरणीय सलिल जी,
    मुझे बेहद अफ़सोस है कि मुझसे एक बहुत भारी गलती हो गयी और एक शब्द 'पोस्ट मार्टम' का प्रयोग समीक्षा के लिए मैं ने कर दिया. मैं सफाई नहीं दे रहा और इस मुद्दे पर सफाई हो भी नहीं सकती, फिर भी मुझे अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए. मैं थोड़ा गैर-संजीदा आदमी हूँ, हंसने का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं देना चाहता. पोस्ट मार्टम शब्द भी मैं ने इसी लिए इन्वर्टेड कामा में लिखा था, मेरा आशय कत्तई किसी का अपमान करना अथवा दुःख पहुँचाना नहीं था.
    आपकी टिप्पणी पढ़कर मैं बेहद दुखी हूँ. झगड़े की सारी जड़ किसी की रचना पर कमेन्ट देना ही है, सो आज से यह काम बंद.
    सलिल जी जो भी हुआ, अनजाने में हुआ, आप सम्वेदनशील हैं, आप को दुःख पहुंचा, मैं क्षमाप्रार्थी हूँ, आइन्दा आपको शिकायत का मौक़ा नहीं मिलेगा. आदरणीय सलिल जी,
    मुझे बेहद अफ़सोस है कि मुझसे एक बहुत भारी गलती हो गयी और एक शब्द 'पोस्ट मार्टम' का प्रयोग समीक्षा के लिए मैं ने कर दिया. मैं सफाई नहीं दे रहा और इस मुद्दे पर सफाई हो भी नहीं सकती, फिर भी मुझे अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए. मैं थोड़ा गैर-संजीदा आदमी हूँ, हंसने का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं देना चाहता. पोस्ट मार्टम शब्द भी मैं ने इसी लिए इन्वर्टेड कामा में लिखा था, मेरा आशय कत्तई किसी का अपमान करना अथवा दुःख पहुँचाना नहीं था.
    आपकी टिप्पणी पढ़कर मैं बेहद दुखी हूँ. झगड़े की सारी जड़ किसी की रचना पर कमेन्ट देना ही है, सो आज से यह काम बंद.
    सलिल जी जो भी हुआ, अनजाने में हुआ, आप सम्वेदनशील हैं, आप को दुःख पहुंचा, मैं क्षमाप्रार्थी हूँ, आइन्दा आपको शिकायत का मौक़ा नहीं मिलेगा.

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  26. आदरणीय डॉ. सुभाष राय जी,
    आदरणीय वेद व्यथित की रचनाओं के बारे में मैं ने जो कुछ भी कहा, क्षमा के साथ उसे वापस ले रहा हूँ. मेरी टिप्पणी निरस्त समझी जाए और गुरुवार की पोस्ट में इसे शामिल न किया जाए.
    मैं वेद जी तथा सलिल जी क्षमाप्रार्थी हूँ, मेरे कारण उनकी भावनाओं को ठेस पहुंची. भविष्य में ऐसी गलती न हो, इसकी कोशिश करूंगा.

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  27. सलिल जी आपकी पोस्‍टमार्टम वाली टिप्‍पणी मैंने रात को ही देखी थी और उस पर एक टिप्‍पणी भी की थी। लेकिन वह प्रकाशित नहीं हुई। हो जाती तो बेहतर होता। इस शब्‍द का इस्‍तेमाल गिरीश जी ने किया था उनकी टिप्‍पणी में। उनकी पंक्तियां थीं-मुझे बड़ी खुशी होती है जब कोई पोस्टमार्टम करता है. ऐसे लोग अब बचे ही कहाँ. एकाध दिखते है, तो इनका अभिनन्दन ही होना चाहिए।- अगर उनकी यह टिप्‍पणी आप पढ़ेंगे तो आपको समझ आ जाएगा कि यह व्‍यंग्‍य में कहा गया था। क्‍यों कहा गया था,यह भी वहां स्‍पष्‍ट है। यह मुझे तब भी खटका था और जैसा आपने भी कहा कि इस शब्‍द का इस्‍तेमाल जीवितों के साथ मजाक में भी नहीं किया जाना चाहिए। मैं तब भी टिप्‍पणी करना चाहता था,पर रह गया।
    सर्वत जी ने भी इस शब्‍द का उपयोग किया और इनर्वटेड कोमा लगाकर। जाहिर है वे गिरीश जी को ही कोट कर रहे हैं। यही बात मैंने रात को लिखी थी। जहां तक मैं समझ पाया हूं उनका आश्‍य भी यही था। वे स्‍वयं अपनी तरफ से यह बात नहीं कह रहे हैं।
    सर्वत जी की टिप्‍पणी भी मुझे लगता है भावावेश में आ गई है। मेरा उनसे अनुरोध है कि वे सलिल जी की बात को इस अर्थ में न लें।
    यह भी याद रखें सुभाष जी ने पिछले हफ्ते समीक्षा सार लिखते हुए कहा था यहां अब साहित्‍य की जीवंत मुठभेड़ हो रही हैं। तो इस मुठभेड़ में यह सब होगा ही। हमें मानसिक रूप से इसके लिए तैयार रहना चाहिए।

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  28. Miyan Sarrvat, aap sahaj men jaise hain, vaise hee raha kariye. aap shayar hain, shayar rahiye, aur bade shayar ban jaaiye, meree shubhkaamanayen, aap achchhe aalochak hain, aur achchhe aalochak baniye, meree shubhkaamanaayen par mere bhaai ab tippadee karana band, ab likhana band, ab khana band, ab paanee band, ab kshama kar do yah sab n kariye. aap ek tarkik baat kahate hain to theek hai, doosare log use samajh lenge aur kaheen shanka hai, to aap upasthit rahiye apanee baat kahane ke liye. aap se ham sab log seekhate hain, yah tunakmijajee theek naheen hai. hamen seekhane ka mauka deejiye.

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  29. परम आदरणीय सरबत जमाल साहब की अंतिम टिप्पणी मुझे बेहद आहत करने वाली और वे अगर मेरे शब्दों को अन्यथा न लें तो गैरजरूरी भी लगी. मैं तो शायद पहले भी यह निवेदन कर चुका हूँ कि सब का सोचने का अपना-अपना ढंग तो होता ही है अलावा इसके कई बार अलग-अलग मूड में पढने पर भी एक ही बात कई तरह के अर्थ दे जाती है, हम सब लोग जिनमें सरबत साहब भी शामिल हैं, कोमल भावनाओं में जीने वाले लोग हैं, जल्दी मर्माहत होते हैं, लेकिन आपस में एक दूसरे पर विश्वास करना और एक दूसरे को समझने की बेहतर कोशिश करना जारी रखें तो ऐसा करना संभवतः मौन रहने या कुछ कहना बंद करने से अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकता है. मैं तो अभी बच्चा हूँ, बाल चापल्य वश कुछ अधिक बडबोलापन हो गया हो तो आदरणीय सरबत जमाल साहब के साथ-साथ अपने और सभी मित्रों से भी क्षमाप्रार्थी हूँ. साखी अब अपने जोबन पर है, सब मिलजुल कर इस की खूबसूरती में चार चाँद लगाइए, इसी विनम्र प्रार्थना के साथ अपनी बात को विराम देने की आज्ञा चाहूँगा.

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  30. प्रचलित परिहास है ,कवि सम्मेलन में एक आदमी लठ्ठ ले कर खड़ा हो गया कवि धबरा गया तो उस आदमी ने कहा मैं आप को कुछ नही कहूँगा मैं उसे ढूंढ रहा हूँ जिस ने आप को बुलवाया है |अस्तु मुझे इस मंच पर लाने का पूर्ण रूपेण श्रेय श्री सुभाष राय जी को है "महावीर का यदि उन्हें मिलता नही प्रसाद "साकेत की भूमिका से ये पंक्तियाँ है |
    मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं तो साहित्य का बहुत ही अकिंचन प्रथम कक्षा का भी नही अपितु कच्ची पक्की (आजकल की नर्सरी के .जी )में ही हूँ परन्तु जिन भी मित्रों ने मेरा मार्ग दर्शन किया है व उत्साह बढ़ाया है मैं हृदय से उन का आभार व्यक्त करता हूँ |
    मत भेद बहुत जरूरी हैं परन्तु मन भेद न हों यह उस से भी जरूरी है बस मन भेद से बचाए रखना बाक़ी सब सह्यहै |किंचित भी कोई द्वेष या शिकवा किसी भी मित्र से कहीं दूर तक भी नही है अपितु हार्दिक आभारी अनुभव कर रहा हूँ | jaree.....

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  31. कुछ शब्दों ,पंक्तियों व व्याकरण सम्बन्धी त्रुटियों की और मित्रों ने ध्यान दिलाया है अत्यधिक विनम्रता से निवेदन कर रहा हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति एक ही शब्द को अलग २ ढंग से उच्चारित करता है सब का अपना अपना रिदम है उच्चारण है स्वांस की गति है मानसिकता है वातावरण है खान पान का भी इस में योगदान है हिंदी में जो बारी है पंजाबी में वही पारी हो जाता है |काव्य व गद्य में भी बहुत अंतर है शब्द का स्थान गद्य में बहुत महत्वपूर्ण है परन्तु शायद गद्य में थोड़ी छूट तो हो ही |
    फिर जो २ बन्धु जैसा २ पृथक २ सोचते हैं वह उनकी अपनी २ सोच है और सब को अपनी सोच या विचार रखने का पूरा अधिकार है इस लिए मैं सब के विचार का सम्मान करता हूँ इस में बुरा मानने की तो कोई बात ही नही है फिर बुरा मानने का मेरा अधिकार भी नही है जिन्होंने जो भी मेरे लिए लिखा है उन सब के मित्रवत स्नेह ,प्यार व आशीष को मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ |
    भाई सुभाष राय जी जो इस सारस्वत कर्म में कर्म योगी की भांति निंरतर गतिशील है निश्चित ही साधुवाद के पात्र हैं अपना श्रम ,समय व धन लगा कर औरो को मान बड़ाई देना यही उन की साधुता का आलोक है |jaree....

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  32. मैं उन का किन शब्दों में आभार व्यक्त करूं समझ नही आ रहा फिर भी भौतिक रूप से उन का विशेष आभार व्यक्त करता हूँ जिन्होंने मुझ जैसे साधारण किस्म के आदमी को इस मंच पर स्थान दिया |साथ ही वन्दना जी , जो पहले भी अपने चर्चा मंच पर मेरी रचनाएँ लगा चुकी हैं उन का भी विशेष आभारी हूँ अन्य सभी जिन मित्रों ने इन पर अपनी कृपा दृष्टि डाली है या जो अन्य भी आगे कृपा करेंगे उन सभी का मैं हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ
    सभी कृपया मेरा आभार स्वीकार कर लें मुझे प्रसन्नता होगी
    पुन: २ आभार

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  33. कहने को हर पल कोई ना कोई कसम उठाते वे
    सच्चाई उन में कितनी है हर पल मुझ को याद रहा

    नहीं भटके हवा मैं मान लूं कैसे कि ये होगा
    बहुत से रास्ते के मोड़ जब उस को सताते हैं

    तुम्हीं ने जो कहे दो बोल मीठे प्यार के मुझ से
    ये पक्षी चाव से उन को ही हर पल गुनगुनाते हैं

    bahut meethe geet the pyaat ki athkheliyan yaad aa gayi .. ped ke neeche baaten ruthna manana aur hindi shabdon ka chayan bhi khoob kiya hai aapne

    upar likhi panktiyan kahs tour par apni si lagi dil ko chhu gayi

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  34. परमादरणीय सरवत जी,
    मैं ईश्वर में विश्वास नहीं रखता, लिहाज़ा मैं यह भी नहीं कह सकता, विश्वास दिलाने के लिए, कि जो मैंने कहा, वह आपकी हतक करने की मंशा से कतई नहीं था, ऐसा भगवान को हाज़िर नाज़िर जानकर कह रहा हूँ...
    मेरी अगली लाइन आपने शायद ध्यान से नहीं पढी जिसमें मैंने कहा है कि पहले भी साखी पर यह शब्द किसी ने प्रयोग किया था... आपका यह लफ्ज़ मुझे पहले वाक़ये की याद दिला गया, जब मैंने ख़ुद को रोक लिया था, आपकी बात पर मेरे ज़ख़्म ताज़ा हो गए. और मैं नहीं रोक पाया ख़ुद को.
    मेरी बात सोलह आने सच्ची है, आपको बुरी लगी हो तो मैं दोनों हाथ जोड़कर माफी माँगता हूँ. आप बुज़ुर्ग हैं, आपके हाथ उठेंगे भी तो आशीर्वाद के लिए, ऐसा यकीन है मेरा. साखी को और इसमें शिरकत करने वाले तमाम शायर आपके आशीर्वाद के मुस्तहक़ हैं.
    मुझे तो ग़ज़ल के बारे में ये भी नहीं पता कि ये ग़ैन से लिखी जाती है या गाफ से... न शीन का शऊर है ना क़ाफ़ की क़ैफ़ियत पता है… केमिस्ट्री का स्टुडेंट हूँ, अच्छी केमिस्ट्री बनाकर चलने में यकीन रखता हूँ...
    डॉ. राय से गुज़ारिश है कि मेरी टिप्पणियाँ निकाल दें. और यकीन रखें सरवत साहब के लिए जो इज़्ज़त मेरे दिल में है, वो ज़रा भी कम नहीं होगी.
    इस नाअह्ल की मुआफी क़ुबूल फ़रमाएँ!!
    सलिल

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  35. ये माफियों का दौर अच्छा नहीं लग रहा, अरे ये तो विचार हैं कोई सहमत कोई असहमत। इसमें बुरा नहीं मानना चाहिए। पिछली बार मुझ पर खूब व्यक्तिगत हमले बोले गए। अभी तक जारी हैं कि अपरिपक्व लोगों की टिप्पणी पर हंसी आती है आदि-आदि। लेकिन सच बताऊं मुझ पर कोई असर नहीं है। मैंने बहुत आनन्द लिया। मैं इस बहाने कहना तो सीख रहा हूं। मुझे इसका इनाम भी मिला। आदरणीय प्राण जी ने मेल पर मुझे ‘ाुभकामनाएं दीं। मेरे लिए बहुत है। आदरणीय राजेष जी, त्रिमोहन जी, सलिल जी, अविनाश जी का मुझे दुलार मिला। और मुझे क्या चाहिए।
    आदरणीय सर्वत दादा मेरा आपसे अनुरोध है कि आप खूब टिप्पणी करें। पहले से और ज्यादा करें। अगर साखी पर आप, सलिल जी, राजेष जी की टिप्पणियां न हों तो साखी का मतलब क्या है। आदरणीय सलिल जी का आषय आपको हर्ट करना नहीं था। और उन्होंने अनुरोध भी करबद्ध किया था इसलिए उस मामले को तूल देने का कोई मतलब नहीं हैं। वेद जी को देखिए उन्होंने किस उदार व्यक्तित्व के साथ सारी टिप्पणियां स्वीकार की। मेरा साफ मानना है कि वेद जी बड़े उदारमना, सबका सम्मान करने वाले और बेहद संवेदनषील व्यक्ति होंगे। उनकी संवेदनषीलता ही उन्हें कवि बनाती है। मुझे नहीं लगता उन्होंने व्यवस्थित ढंग से कभी कविता लिखने की कोषिष की होगी।
    उम्मीद है ये माफियों का दौर यहीं खत्म हो जायेगा। सब लोग फिर से पुरानी ऊर्जा के साथ टिप्पणी करेंगे और राय सर भी किसी की टिप्पणी सभा की कार्यवाही से बाहर नहीं निकालेंगे। हम अपने जीते जी एक नया इतिहास बनते हुए देखेंगे।

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  36. दुखी होने और बुरा मानने मे‍ ज़मीन-आसमान जैसा फ़र्क है. मुझे दुख हुआ, कुछ तो अपनी बात के न समझे जाने का दुख और दूसरी तरफ़ मेरी बात से किसी के दुखी हो जाने की पीडा. मै‍ ह्यूमरस मूड का आदमी हू‍ और ह‍सने मुस्कुराने का कोई भी अवसर हाथ से नही‍ जाने देना चाहता. वो शब्द भी मै‍ ने अपनी उसी मानसिकता मे‍ लिखा था और इन्वर्टेड कामा मे‍ ही लिखा था ताकि इसे सन्जीदगी से न लिया जाए.
    मेरी बदकिस्मती है कि मुझे कमिया‍ नज़र आ जाती है‍ और शायद सारे झगडे की जड यही है. मै ने भी अब फ़ैसला कर लिय है कि सभी प्रशन्सा ही करते है, मै ख्वामख्वाह आलोचना कर के किसी की बददुआए‍ क्यो लू.
    मै वास्तव मे दुखी हू, बुरा मानने का तो प्रश्न ही नही उठता.

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  37. ेअरे सर्वत भाई साहिब आपकी हमेशा हंसते रहने की और मज़ाक करने की आदत ही तो अच्छी लगती है इस मजाक मजाक मे आप कितना कुछ समझा देते हैं। मेरी राय है कि किसी को उनकी बात का गुस्सा नही करना चाहिये। हमे आलोचना को सकारात्मक रूप मे लेना चाहिये। अगर हम अपना नज़रिया रख रहे हैं तो जरूरी नही वो सब से मिलता हो। सर्वत भाई साहिब इतना बडा मज़ाक भी अच्छा नही कि कभी टिप्पणी नही करूँगा। मुझे तो हमेशा आपकी टिप्पणी की इन्तज़ार रहेगी जैसे पहले भी रहती है। व्यथित जी की सभी रचनायें बहुत अच्छी लगी। अच्छी लगी संवेदनाओं के सागर मे गोते लगाते हुये सभी रचनायें पढी । व्यथित जी को बधाई आपका धन्यवाद उन्हें पढवाने के लिये। धन्यवाद।

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  38. सभी बड़ों के समक्ष छोटा मुह बड़ी बात..(माफ़ कर दीजियेगा) वेद व्यथित जी का सृजन स्वाभाविक प्रकिया से गुजर कर एक परिस्कृत रूप पा, और अधिक निखर प्रतीत हो रहा है..! इतना उच्च और गहरा विश्लेषण पाकर ये काव्य सृजन सार्थक हुवा..आलोचना तो महज एक सहज प्रक्रिया है शिखर तक ले जाने की. बड़ी भाग्यशाली है वो रचना जिसका विश्लेषण या आलोचना ऐसी उम्दा हो. और आप सभी गुनीजनो और सम्मानित साहित्य शिल्पियों को बताना चाहूँगा कि इस गहन चर्चा से मुझे या मेरे जैसे नव-उत्साही सीखने वालों को कितना फायदा हुवा है और होता है...मैं बयान नहीं कर सकता. उम्मीद है ऐसी उच्चस्तरीय चर्चा भविष्य में भी पढने को मिलेगी. समस्त गुनीजनो को मेरा प्रणाम !
    तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय
    ना तुम हारे, ना हम हारे

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  39. सुभाष जी
    प्रणाम !
    एक लम्बे अन्तराल के बाद गीतिकाए पढने का अवसर प्राप्त हुआ इसके लिए'' वेद जी ''का आभार ! साधुवाद !
    सादर !

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  40. बहुत अच्छी रचनाएं हैं...भाई साहब लिखते रहिये...
    शुभकामनाएं...

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  41. बहुत अच्छी रचनायें भाव विभोर कर गयीं ।

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  42. तुम्हारी याद में मैंने बहुत आंसू लुटाये हैं
    वही मोती बने हैं रात भर वो जगमगाते हैं
    तुम्हीं ने जो कहे दो बोल मीठे प्यार के मुझ से
    ये पक्षी चाव से उन को ही हर पल गुनगुनाते हैं
    तुम्हें मेरा पता है जानते हो हाल तुम सारा
    आपको सुना भी है और आज पढ भी रही हूँ। अति सुन्दर।

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